Wednesday, November 18, 2020

कट्टरता

लोग चाहते हैं कि जिस्म भले तुम्हारा हो मगर इसमें सांसे उनके हिसाब से चले । वह चाहते हैं कि जिस सोच ने उनके दिमाग मे जगह बनाई है, वही सोच हर एक के दिमाग में फले फूले । असल में हम एक ऐसा समाज बनते जा रहे हैं, जिसमें समाज होने के मूल तत्व ही ग़ायब होते जा रहे हैं । आप अपनी मर्ज़ी से कुछ कर ही नही सकते हैं, क्योंकि सामाजिक दरोगा आपको अपने हिसाब से ही एक दिशा में ले जाना चाहते हैं ।

कोई मुसलमान मंदिर में पूजा करले तो आधे मुसलमानों के पेट मे दर्द हो शुरू हो जाती है । उस आदमी की लानत मलामत हो जाती है । उसे कुफ़्रियत के सर्टिफिकेट बंटने लगते हैं ।
कोई मुसलमान मंदिर में नमाज़ पढ़ ले तो आधे हिन्दू भड़क उठते हैं, उसे जेहादी के सर्टिफिकेट दिए जाने लगते हैं । कोई मज़ार पर बसंत मना ले तो उसपर सवाल । कोई दो धर्मो की सहिष्णुता और प्रेम पर बात कर ले तो उसकी खाल नोंचना शुरू ।

इसमें कोई एक धर्म ही झंडा नही गाड़े है, जब जिसे मौका मिलता है, वह यह बताने से नही चूकता की हमे देखो,हम ज़्यादा कट्टर हैं । असल मे यह समाज के जो नए बने दरोगा हैं, यह आपको हमेशा उस नज़र से देखना चाहते हैं, जैसा चश्मा इनकीं आंखों पर लगा हुआ है । उससे अलग दिखने पर यह आप पर भड़क पड़ेंगे ।

ख़ुद की आज़ादी जैसे एक ख्वाब हो गई है । आपका खाना, पहनना,निकलना,प्रार्थना सब वैसे ही तय किया जाएगा,जैसे आपको यह भीड़ देखना चाहती है । यह अजीब लोग अमीर खुसरो को भी सुधारने की सनक रखते हैं और तुलसीदास को  भी ।

कट्टर लोग सेक्युलर होने की परिभाषा बता रहे हैं । उन्हें मुसलमान के आरती में बैठने और हिन्दू का मज़ार पर सर झुकाने पर एतराज है । अरे भाई कट्टर व्यक्ति से कट्टरता सीखी जाएगी और सेक्युलर व्यक्ति से सेक्युलर सोच सीखेगा इंसान और किसी को यह अधिकार नही है कि सामने वाले के तौर तरीकों और कार्यों को अपनी हदबंदी में क़ैद करे ।

रही बात क़ौम या धर्म की तो जिन्हें इसकी मेड़ में क़ैद होना पसन्द है, उनसे हमे कोई एतराज नही मगर जिन्हें यह मेड़बन्दी तोड़कर हर तरफ जाने की इच्छा है, उन्हें भी एतराज़ की चादर नही ओढ़ानी चाहिए । रक आदमी की अपनी स्वतंत्रता का सम्मान करना सीखिए । उसपर अपनी सोच के जाल फेक फेक कर क़ैद मत करने की कोशिश कीजिये । कट्टरता यही तो है, की सब मेरे जैसे हो जाएं ।

जबकि ख़ुद का सगा भाई कुछ और पसन्द करता है मगर यह क़ौम और समुदाय को हुल्लड़ मचाकर एक करना चाहते हैं । आपसे सिर्फ इतना दरकार है कि लोगों से मोहब्बत कीजिये,जो जैसा है, उसकी वैसे इज़्ज़त कीजिये,अगर कोई कमी लगती है उसमें,तो उससे बात कीजिये,उसे भरोसा दिलाइये की आप उसका भला चाहते हैं । आख़री बात हमारे पुरखे इस जमीन के सबसे खूबसूरत दिन बिता कर जा चुके हैं, जानते हैं क्यों,क्योंकि न वह कट्टर थे,न लकीर के फ़क़ीर थे,वह एक दूसरे में घुल मिलकर चलने की ज़रूरत को समझते थे । 

वह असलियत में जानते थे कि सबको एक ईश्वर ने बनाया है, इसलिए मोहब्बत करते रहे और मोहब्बत से रहे । आप भी यही करिए,इधर उधर सर्टिफिकेट बाँटने से बेहतर है, खुद को सुधारिये । हम यह नही कह रहे कि मुसलमान आरती की थाल थामे और हिन्दू मस्जिद का रुख करें,मगर कोई ऐसा अगर करे,तो उसकी इज़्ज़त करें नाकि उसे गरियाया जाए । कट्टरता और नफरत कभी तरक्की नही ला सकती और न ही सुक़ून,आज मानो या कल,अंत मे शान्ति और प्रेम की ओर ही लौटना होगा । 
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Sunday, November 1, 2020

जाहिल हो

जाहिल हो ।।। यह लफ्ज़ हम अक्सर उसकी तरफ ढकेल देते हैं, जो हमारी राय जैसी राय नही रखता है । एक डॉक्टर के लिए जिस व्यक्ति को दवा कम्बीनेशन समझ न आए,उसे जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह फिलॉस्फर हो । एक वकील के लिए उसके बुने पेपर को न समझने वाले को जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह डॉक्टर हो । एक लेखक के लिए किसी किताब या कविता को न समझने वाले को जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह वैज्ञानिक हो । एक वैज्ञानिक के लिए विज्ञान की सामान्य परिभाषा न समझने वाले को जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह कलाकार हो । एक थियेटर आर्टिस्ट के लिए उसके नाटक के ट्विस्ट को न समझने वाले को जाहिल कह देना आसान है, भले ही वह व्यक्ति कामयाब पॉलिटिशियन हो ।

असल में हम सब अपने से अलग या हमारी बात को न समझने वालों को जाहिल की माला पहनाने को तड़पते रहते हैं । कभी एक पूरे वर्ग को जाहिल कहते हैं, कभी दिल नही भरता तो पूरे देश को जाहिल कहते हैं, कभी पूरे धर्म को जाहिल कहते हैं तो कभी पूरी जाति को जाहिल कहते हैं । हम अक्सर जिस तरफ उंगली उठाकर यह जहालत के तमगे बांट रहे होते हैं, उसे वक़्त यह तमगा हमारे माथे भी चमक रहा होता है, बस हमें दिखता ही तो नही है मगर औरों को तो दिखता ही होगा ।

चार किताब पढ़कर अगर हम बिना किताब पढ़ने वाले को जाहिल कहकर निकलेंगे,तो ज़ाहिर है,यह पहचान है कि वह चार किताबें भी हम पर असर नही कर सकी हैं, कोई बदलाव नही ला सकी हैं ।

ज्ञान को पाना जितना कठिन है, उससे कहीं ज़्यादा कठिन उसे संभालना है । ज्ञान को संभालने की एक प्रैक्टिस बताते हैं, आपको दूसरा जब तक जाहिल नज़र आए,तब तक ख़ुद में ज्ञान की खूब वृद्धि करें । खूब पढ़ें,सीखें,लोगों से मिले,यात्रा करें,जिस दिन दूसरे जाहिल नज़र आना बंद हो जाएं,जिस दिन आपके ज़िक्र में किताबों,लेखकों और भद्रजनों के नामों की जगह विचार आ जाएं,वह दिन आपकी शुरआत होगा । एक बात मेरी गिरह बाँध लें,इस ज़मीन पर जाहिल कोई नही है, क्योंकि सांसों का हिसाब रखकर उन्हें पूरा करना खुद में बहुत महान काम है, बल्कि इन्हें जाहिल समझना ही असल जहालत है...
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