मेरी कल्पनाओं में भगत सिंह वोह नही दिखते हैं।जो एक कच्ची उम्र में शहीद हो गए।मेरी कल्पनाओं में हल्की मूँछो और हैट लगाए चमकता हुआ नौजवान भगत सिंह नही हैं।मेरी कल्पनाओ में अधेड़ भगत सिंह भी नही है।मेरी कल्पना में सफेद बालों और गहरी आँखों वाला भगत सिंह है।उसकी आँखों पर वही गोल लेंस वाला चश्मा है।मेरी कल्पनाओं में संविधान पर मज़बूत पकड़ और देश का साँचा ढालता हुआ वोह भगत सिंह है जिसके माथे पर रेखाएँ गहरी हैं।
मेरा भगत सिंह बूढ़ा हो रहा है वक़्त के साथ,मगर रोज़ मुल्क़ के लिए नए विचार रख रहा है।वह देख रहा है कौन उसके साथ है और कौन उसको सिर्फ इस्तेमाल कर रहा है।मेरा भगत सिंह एक उम्र पर ठहरा हुआ नही है, वोह उम्र का सैकड़ा पार करके आजभी बिना सहारे,हमे सहारा दे रहा है।मैं जब आपसे बात करता हूँ तो अक्सर आप ठहर के बोलते हैं, मेरे दोस्त भगत सिंह,आपका यूँ ठहरना बता रहा की आपके शब्दों की गहराई ने अब जिस्म पर विजय पा ली है।मेरे अनुभवी भगत सिंह देश ही नही दुनियाँ का फ्रेम गढ़ रहे हैं।मैं देखता हूँ की आपकी कमर भले झुक रही है मगर गरीब,किसान,कमज़ोर,परेशान के लिए आप कुछ मज़बूत बुन रहे हैं।मैंने देखा है आपने खूबसूरत,मुलायम गद्दों पर बैठने से इनकार कर दिया है।
आप बुढ़ापे में भी वही खाट पर बैठे हैं जैसे नौजवान बड़े बालों वाला भगत बैठा हुआ है।मुस्कान और फ़िक्र आज भी एक सी हैं।झुर्रियों ने विचारों की गहराई को और बढ़ा दिया है।मैं आपको लेकर इतनी कल्पनाओं में हूँ की मुझे समझ नही आता की भगत सिंह आज हैं भी की नहीं।हैं तो किस तरह हैं,कैसे दिमागों को रूप दे रहे हैं।मैं आपकी अनंत कल्पनाओं में भी एक चीज़ साफ़ देख पा रहा हूँ मुल्क़ और इंसानियत।भगत सिंह चाहे नौजवान रहें या बूढ़े हो जाए,इन दो चीजों से तो कभी भी मुँह न मोड़ते।मै जिस्म में नही उलझता मगर रूह में न उलझूँ यह हो नही सकता।
आपकी रूह,यानि आपके विचार लगातार दिमाग को कुरेदते हैं।उसमे पड़ी गुलथियों को खोलते हैं।तब मुझे लगने लगता है की आप क्या चाहते थे और हम किधर जा रहें हैं।अपने जन्मदिन पर भगत सिंह हाँ आप मेरे दोस्त,एक तो वादा करो की ऐसे ही हमेशा साथ रहोगे।हमारी उम्र के साथ तुम भी बढ़ना।मेरा वादा था की आपके जन्मदिन पर आपकी ज़िन्दगी की ही बात करूँगा।अगर ज़माने ने आज से कल तक आपको शिद्दत से याद किया तो मैं भी आपकी वह बातचीत लिखूंगा जो कल रात आप कह रहे थे......