Tuesday, September 26, 2017

भगत सिंह

मेरी कल्पनाओं में भगत सिंह वोह नही दिखते हैं।जो एक कच्ची उम्र में शहीद हो गए।मेरी कल्पनाओं में हल्की मूँछो और हैट लगाए चमकता हुआ नौजवान भगत सिंह नही हैं।मेरी कल्पनाओ में अधेड़ भगत सिंह भी नही है।मेरी कल्पना में सफेद बालों और गहरी आँखों वाला भगत सिंह है।उसकी आँखों पर वही गोल लेंस वाला चश्मा है।मेरी कल्पनाओं में संविधान पर मज़बूत पकड़ और देश का साँचा ढालता हुआ वोह भगत सिंह है जिसके माथे पर रेखाएँ गहरी हैं।

मेरा भगत सिंह बूढ़ा हो रहा है वक़्त के साथ,मगर रोज़ मुल्क़ के लिए नए विचार रख रहा है।वह देख रहा है कौन उसके साथ है और कौन उसको सिर्फ इस्तेमाल कर रहा है।मेरा भगत सिंह एक उम्र पर ठहरा हुआ नही है, वोह उम्र का सैकड़ा पार करके आजभी बिना सहारे,हमे सहारा दे रहा है।मैं जब आपसे बात करता हूँ तो अक्सर आप ठहर के बोलते हैं, मेरे दोस्त भगत सिंह,आपका यूँ ठहरना बता रहा की आपके शब्दों की गहराई ने अब जिस्म पर विजय पा ली है।मेरे अनुभवी भगत सिंह देश ही नही दुनियाँ का फ्रेम गढ़ रहे हैं।मैं देखता हूँ की आपकी कमर भले झुक रही है मगर गरीब,किसान,कमज़ोर,परेशान के लिए आप कुछ मज़बूत बुन रहे हैं।मैंने देखा है आपने खूबसूरत,मुलायम गद्दों पर बैठने से इनकार कर दिया है।

आप बुढ़ापे में भी वही खाट पर बैठे हैं जैसे नौजवान बड़े बालों वाला भगत बैठा हुआ है।मुस्कान और फ़िक्र आज भी एक सी हैं।झुर्रियों ने विचारों की गहराई को और बढ़ा दिया है।मैं आपको लेकर इतनी कल्पनाओं में हूँ की मुझे समझ नही आता की भगत सिंह आज हैं भी की नहीं।हैं तो किस तरह हैं,कैसे दिमागों को रूप दे रहे हैं।मैं आपकी अनंत कल्पनाओं में भी एक चीज़ साफ़ देख पा रहा हूँ मुल्क़ और इंसानियत।भगत सिंह चाहे नौजवान रहें या बूढ़े हो जाए,इन दो चीजों से तो कभी भी मुँह न मोड़ते।मै जिस्म में नही उलझता मगर रूह में न उलझूँ यह हो नही सकता।

आपकी रूह,यानि आपके विचार लगातार दिमाग को कुरेदते हैं।उसमे पड़ी गुलथियों को खोलते हैं।तब मुझे लगने लगता है की आप क्या चाहते थे और हम किधर जा रहें हैं।अपने जन्मदिन पर भगत सिंह हाँ आप मेरे दोस्त,एक तो वादा करो की ऐसे ही हमेशा साथ रहोगे।हमारी उम्र के साथ तुम भी बढ़ना।मेरा वादा था की आपके जन्मदिन पर आपकी ज़िन्दगी की ही बात करूँगा।अगर ज़माने ने आज से कल तक आपको शिद्दत से याद किया तो मैं भी आपकी वह बातचीत लिखूंगा जो कल रात आप कह रहे थे......

Monday, September 25, 2017

माचिस

मेरे अंदर बहुत कुछ
है जला हुआ,
जिसे मैं फिर से देखना चाहता हूँ
चाहता हूँ,
भाँप बन चुकी वह बून्द,फिर से ओस बन जाए।
मैं चाहता हूँ वह जले हुए ख्वाब दोबारा तरोताज़ा हों जाएँ।
मुझमे जो तुम मर चुकी हो,
दोबारा मेरे कन्धों पर हाथ रख कर।
मेरे हाथ से वह गुलज़ार की माचिस छीनकर दूर,बहुत दूर फ़ेंक दो,
जिससे मैंने अपने अंदर का बहुत कुछ जला डाला है,
मैं अब सबको ज़िंदा रखना चाहता हूँ।
मैं जिस्म को यादो का कब्रिस्तान नही बनते देख सकता।
मैं जले हुए ख्वाबों के श्मशान से दूर,
बहुत दूर,एक खूबसूरत हर भरा बाग़ ही तो हूँ,
जहाँ तुम सब रोज़ आती हो,रोज़ आती हो,रोज़ आती है

कलम

#कलम

टाइपिंग ने क़लम की अहमियत को धुंधला कर दिया है लेकिन जिनकी यादें इनसे जुड़ी है वो कभी इन्हें भुला नही पायंगे....मुझे ग़ालिब का एक शेर याद आता है..

आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीं ख़याल में
ग़ालिब सरीर-ए-ख़ामा नवा-ए-सरोश है

"सरीर" उस आवाज़ को कहते है जो सरकंडे के क़लम से कागज़ पर निकलती है ग़ालिब को ये आवाज़ बहुत पसंद थी
मुझे भी खुरदुरे कागज़ पे पेन की आवाज़ बहुत पसंद है...

कलम कई तरह के हुए है अलग अलग जहां अलग चीज़ों से बने हुए।

नरकुल से जिन्होंने लिखा होगा या क्लिक से...

क्लिक भी एक तरह का दरियाई नरकुल है भूरे रंग का पतला सा ये कलम नरकुल से भी बहुत मज़बूत होता था उसकी नोक घिसती नही थी और कम इंक में ज़्यादा लिखा जा सकता था

सबसे बड़ी बात ये है कि ये ब्लेड से नही कटता था इसके लिए तेज़ चाकू की ज़रूरत पड़ती थी.... जो लोग उर्दू या अरबी लिखते थे वो इसकी नोक बीच से काट देते थे जैसे आजकल निब होती है

बहुत लोग सेठे से भी लिखते थे।

उसके बाद होल्डर आया इसमें G निब अलग से लगती थी.... ये निब आम निब से लंबी होती थी और आजकल की तरह आगे पॉइंट पे गोल नही थी, उसके  ऊपर G बना होता था।

होल्डर लकड़ी का होता था.... आगे लोहा जिसमे निब फिट कर दी जाती थी। इससे बेहतरीन उर्दू या अरबी किसी और कलम से नही लिखी जा सकती।

मैनें नरकुल से लिखा है लेकिन स्कूल में फॉउंटेंन पेन से लिखना शुरू किया था पांच रुपये का पेन आता था जिसमे ड्राप से इंक भरते थे सस्ता होने का ये नुकसान था कि उंगलिया इंक से खराब हो जाती थी।

उसी दौरान कुछ पेन ऐसे भी आये जिसमे ड्राप लगा हुआ था उसमें इंक अलग ड्राप से भरना नही पड़ती थी वो खुद ही "सक" कर लेता था।

जूनियर क्लास में डॉट पेन इस्तेमाल करने का मौका मिला एक नया पेन आया था "सेलो ग्रिपर" बहुत बारीक लिखता था कई बार इसकी रिफिल के पॉइंट से बॉल गिरकर वरक़ पे लुढ़कने लगती थी हम लोग फिर से उसे लगा लेते लेकिन वो स्मूथनेस नही आती थी

जेल पेन का भी चलन आया, खासकर एग्ज़ाम में उसी से लिखा जाता था।

एक और नया पेन था पायलेट उसका भी अलग जलवा था 35 रुपिये का आता था। कुछ ही स्टूडेंट्स के पास होता था

मेरी टीचर्स के पास रेड रिनॉल्डस रहता था मुझे हमेशा से ब्लू वाले से उलझन रही....

हाई स्कूल में मैनें जाना कि एक पेन "पारकर" भी आता है सैंकड़ो से लेकर हज़ारो रूपियो तक, कुछ में  तो गोल्ड की निब होती थी......एक दो साल बाद दो हज़ार का पारकर खरीद कर शौक पूरा किया था।

चार रिफिल वाला पेन भी लाजवाब था एक साथ बटन दबाकर चारो रिफिल निकालने की बेवकूफ़ी सबने की होगी...

स्टूडेंट का रेड पेन रखना उस वक़्त अफीम रखने से बड़ा गुनाह माना जाता था। मेरी तो इस बात को लेकर कई बार पिटाई हुई थी।
एक बार ग्रीन पेन से होम वर्क कर लिया था टीचर ने फ़र्ज़ी कहानी बताकर पीट दिया कहने लगे ग्रीन पेन प्रेजिडेंट यूज़ करते है... कभी भी मेरी मुलाकात प्रेसिडेंट से हुई उनसे इस बारे में ज़रूर पूछूँगा।

बहरहाल कलम के बहुत किस्से  कहाँ तक लिखूं लेकिन आज भी मुझ स्क्रीन पे टाइपिंग के मुकाबले वरक़ पे कलम से लिखना ज़्यादा पसंद है।

कलम

#कलम

टाइपिंग ने क़लम की अहमियत को धुंधला कर दिया है लेकिन जिनकी यादें इनसे जुड़ी है वो कभी इन्हें भुला नही पायंगे....मुझे ग़ालिब का एक शेर याद आता है..

आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीं ख़याल में
ग़ालिब सरीर-ए-ख़ामा नवा-ए-सरोश है

"सरीर" उस आवाज़ को कहते है जो सरकंडे के क़लम से कागज़ पर निकलती है ग़ालिब को ये आवाज़ बहुत पसंद थी
मुझे भी खुरदुरे कागज़ पे पेन की आवाज़ बहुत पसंद है...

कलम कई तरह के हुए है अलग अलग जहां अलग चीज़ों से बने हुए।

नरकुल से जिन्होंने लिखा होगा या क्लिक से...

क्लिक भी एक तरह का दरियाई नरकुल है भूरे रंग का पतला सा ये कलम नरकुल से भी बहुत मज़बूत होता था उसकी नोक घिसती नही थी और कम इंक में ज़्यादा लिखा जा सकता था

सबसे बड़ी बात ये है कि ये ब्लेड से नही कटता था इसके लिए तेज़ चाकू की ज़रूरत पड़ती थी.... जो लोग उर्दू या अरबी लिखते थे वो इसकी नोक बीच से काट देते थे जैसे आजकल निब होती है

बहुत लोग सेठे से भी लिखते थे।

उसके बाद होल्डर आया इसमें G निब अलग से लगती थी.... ये निब आम निब से लंबी होती थी और आजकल की तरह आगे पॉइंट पे गोल नही थी, उसके  ऊपर G बना होता था।

होल्डर लकड़ी का होता था.... आगे लोहा जिसमे निब फिट कर दी जाती थी। इससे बेहतरीन उर्दू या अरबी किसी और कलम से नही लिखी जा सकती।

मैनें नरकुल से लिखा है लेकिन स्कूल में फॉउंटेंन पेन से लिखना शुरू किया था पांच रुपये का पेन आता था जिसमे ड्राप से इंक भरते थे सस्ता होने का ये नुकसान था कि उंगलिया इंक से खराब हो जाती थी।

उसी दौरान कुछ पेन ऐसे भी आये जिसमे ड्राप लगा हुआ था उसमें इंक अलग ड्राप से भरना नही पड़ती थी वो खुद ही "सक" कर लेता था।

जूनियर क्लास में डॉट पेन इस्तेमाल करने का मौका मिला एक नया पेन आया था "सेलो ग्रिपर" बहुत बारीक लिखता था कई बार इसकी रिफिल के पॉइंट से बॉल गिरकर वरक़ पे लुढ़कने लगती थी हम लोग फिर से उसे लगा लेते लेकिन वो स्मूथनेस नही आती थी

जेल पेन का भी चलन आया, खासकर एग्ज़ाम में उसी से लिखा जाता था।

एक और नया पेन था पायलेट उसका भी अलग जलवा था 35 रुपिये का आता था। कुछ ही स्टूडेंट्स के पास होता था

मेरी टीचर्स के पास रेड रिनॉल्डस रहता था मुझे हमेशा से ब्लू वाले से उलझन रही....

हाई स्कूल में मैनें जाना कि एक पेन "पारकर" भी आता है सैंकड़ो से लेकर हज़ारो रूपियो तक, कुछ में  तो गोल्ड की निब होती थी......एक दो साल बाद दो हज़ार का पारकर खरीद कर शौक पूरा किया था।

चार रिफिल वाला पेन भी लाजवाब था एक साथ बटन दबाकर चारो रिफिल निकालने की बेवकूफ़ी सबने की होगी...

स्टूडेंट का रेड पेन रखना उस वक़्त अफीम रखने से बड़ा गुनाह माना जाता था। मेरी तो इस बात को लेकर कई बार पिटाई हुई थी।
एक बार ग्रीन पेन से होम वर्क कर लिया था टीचर ने फ़र्ज़ी कहानी बताकर पीट दिया कहने लगे ग्रीन पेन प्रेजिडेंट यूज़ करते है... कभी भी मेरी मुलाकात प्रेसिडेंट से हुई उनसे इस बारे में ज़रूर पूछूँगा।

बहरहाल कलम के बहुत किस्से  कहाँ तक लिखूं लेकिन आज भी मुझ स्क्रीन पे टाइपिंग के मुकाबले वरक़ पे कलम से लिखना ज़्यादा पसंद है।

Sunday, September 24, 2017

सेवा बनाम सुधार

आजके मेरे लफ्ज़ सिर्फ उनके लिए है जिनके लिए समाज कुछ है।जिसके लिए उन्हें जीना है।उनके लिए सिर्फ दो लफ़्ज़ हैं सुधार या सेवा।सेवा को हमेशा सराहा गया जबकि सुधार को गालियाँ मिली।हर आदमी सेवा चाहता है मगर सुधरना नही।जो नए नए लोग थोक के भाव में समाज की फ़िक्र कर रहे हैं, वोह अपनी कूव्वत के हिसाब से अपने रास्ते तय कर लें।अगर हल्के मिजाज़ के हों,वक़्ती मेहनती हों और कमज़ोर दिल के हों साथ ही खुद के शौक़ भी न मारने हों तो वोह समाज सेवा का कुछ वक़्त रास्ता अपना लें।
रोटी,कम्बल,किताबें,दवा,कपड़े,खाना,शरबत बाँटे।यह भी बेहद अहम् है जो दूसरे नही कर रहे हैं।आप उन सबसे बेहतर हैं जो घर में मगरमच्छ की तरह लेटे हैं।उनसे भी बेहतर हैं जो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने लिए ज़िंदा हैं।

अब बात आती है समाज सुधारक की,तो बड़े गौर से सुनो।यह रास्ता बेहद कठिन,पथरीला और उबड़ खाबड़ है।यह भी गारन्टी नही की तुम्हारे सामने सुबह होगी या तुम्हारे जैसी सैकड़ों नस्ल के खत्म होने के बाद सुबह आएगी।इस रास्ते में तुम्हारा ही समाज तुम्हे रत्ती भर मोहलत नही देगा।तुम्हारे कपड़े फाड़े जाएँगे,कालिख़ पोती जाएगी,समाज अपने दिमाग से मिलते हुए जानवर पर तुम्हे बैठाएगा और तुम पर ठहाके मारकर हँसेगा।
इसलिए कह रहा हूँ समाज सेवा को पकड़ो उसमे वाहवाही भी मिलेगी और अख़बार के चिकने पन्नों पर सुंदर तस्वीर भी छपेगी मगर भूलकर भी समाज सुधारक मत बनना।

हाँ अगर तुम्हे रात में नींद न आए।तुम्हे सन्नाटे में मासूमो की चीखें सुनाई दें।तुम्हे चमकदार फर्श और ऐसी में घुटन लगे।तुम्हे समाज में लगी गाँठे चुभें।तुम्हे दिल की दरारे दूर से दिखने लगे।तुम्हे भगवान की चौखट पर अमीर गरीब का फ़र्क दिखने लगे।तुम्हे मस्जिद में अमीर का रौब और गरीब की सिकुड़न दिखने लगे।तुम्हे मज़हब किसी मज़लूम के लिए फंदा दिखने लगे।तुम्हे लड़की के मन की चिटखन दिखने लगे तो उठना और शीशा देखना।अपना बदन देखना।अपनी ताक़त देखना।सबसे पहले तुमसे तुम्हारी ही ड्योढ़ी लड़ेगी।अगर उससे लड़ने की हिम्मत हो तो निकल जाना सुधारने।टूटकर बिखर जाओ समाज में।अपने आप को भूल जाओ एक दिन यह ज़माना तुम्हे याद करेगा।

मेरी आवाज़ सुनों।समाज सेवक बनोगे तो लोग तुम्हारे सामने ईनाम और शोहरत से नवाजेंगे,मगर ज़्यादा याद नही रखेंगे।हाँ अगर समाज सुधारक बनोगे तो इस ज़िन्दगी में तो पता नही मगर हमेशा हमेशा के लिए पीले पन्नों में दर्ज हो जाओगे।अपने रास्ते जल्द तय करो।यह दोनों रास्ते आम नही हैं।दोनों के लिए दिल,ईश्वर अपने हाथ से बनाता है।तुम भीड़ का हिस्सा नही हो,क्योकि तुम्हारे दिल में खुशबू है।तुम्हे ज़रा भी दूसरे की फ़िक्र है तो यक़ीनन तुम खास ही हो.....

Saturday, September 23, 2017

BHU

BHU पर क्या कहा जाए,निर्लज्जता को भी शब्द देने पड़ें तो इससे बुरे दिन और क्या होंगे।अफसोस इस बात का है की कोई भी अपना हक़ माँगता है तो उसे आप एंटी नेशनल गैंग में शामिल कर देते हैं और चैन की नींद सो जाते हैं।आपको खुद नही पता की हर बार दूसरें के हक़ पर पाँव रखकर एंटी नेशनल-एंटी नेशनल का तराना गाते गाते आप खुद एंटी ह्यूमन गैंग में बदल चुके हैं।

लड़कियाँ हैं, जो सिर्फ सुरक्षा माँग रही हैं।भूल गए निर्भया और उसपर रोने वाले देश के आँसू।आप लड़कियों को हॉस्टल में सुरक्षा नही दे सकते,दें भी तो कैसे,जब कैम्पस में उनपर ही लाठियाँ चलवा सकते हैं, तो आपकी सुरक्षा देने की मंशा ही नही है।
सच तो यह है की अब हम ऐसा समाज बन चुके हैं की हमारे ही आँगन से बेटियाँ उठा ली जाएँ तो हम दूसरी तरफ मुँह घुमा बहुत से बहुत रो सकते हैं मगर रोक नही सकते हैं।यहाँ तो हर दर्द का सौदा धर्म और विचार के तराज़ू पर हो रहा है।

एक बार सोचिये लड़कियां वही तो BHU में माँग रही हैं जो उन्हें अपने घर में भी मिलना चाहिए,सुरक्षा।।न आपसे खाना,न कपड़ा,न फ़ीस,न स्कॉलरशिप कुछ भी तो नही,वह भी बर्दाश्त नही हो रहा।हाँ हमे पता है आपको कोई भी माँग पसन्द नही,आपतो सबकुछ भीख की तरह देने के आदी हैं।
इस वक़्त लड़कियों के समर्थन में बनारस के शहर को,उनके परिवारों को और हर उसको आना चाहिए जो चाहता है देश की हर लड़की सुरक्षित रहे।जो भी अगर मगर लगाकर इससे मुकर रहा है, यक़ीन जानो यही वह लोग हैं जो मौका पाते लड़की को इंसान नही समझेंगे।रही बात वीसी की तो उनके सर की काली टोपी ने पहले उनका दिमाग में अँधेरा भर दिया है, अब तो वह हर तरफ अँधियारा ही चाहते हैं।

मैं चाहता हूँ की इसपर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल तुरन्त संज्ञान लें,जैसे वह साल भर पहले लिया करते थे और वीसी को वहाँ से हटाकर उनकी सही शाखा में भेजें।आज वक़्त माँगा है महामहिम से,मिल गया तो शिकायत पत्र उन्हें सौपेंगे ही,तब तक हम सबको BHU के लिए,उसके स्टूडेंट के साथ मज़बूती से खड़े रहना होगा।हम सब एक हैं।एंटी ह्यूमन गैंग के खिलाफ हम सब एक हैं।

Friday, September 22, 2017

तजुर्बा

आपको हमेशा ऐसा क्यों लगता है की आपका तजुर्बा ही सही है।आपके सफ़ेद होते बाल हमेशा ही सही हों, यह तो मुमकिन नहीं।जैसे ही हम पिज़्ज़ा हाथ में लेंगे आप सत्तू की तारीफ़ के पुलिंदे बाँधने लगेंगे।हमे काली शर्ट पसन्द है तो आपको उसपर एतराज़।हमे कसे कपड़े पसन्द है तो आप ढीले कपड़ों की खूबियाँ बताएंगे।इत्तेफ़ाक़ से डर डर कर अगर बाहर खाना खाने को कह दिया तो आसमान सर पर उठा लेंगे।ख़ुद सारा दिन टीवी पर न्यूज़ देखेंगे मगर हमारी पसन्द की एक भी हॉलीवुड मूवी आपके गले नही उतरती।भय्या यह जो ढेर भर त्यौहार आपने पाले हैं,यह तो और गले की हड्डी बने हुए हैं।न्यू यर की पार्टी तो आपसे बर्दाश्त नही होती और खुद के बेसिर पैर के त्यौहार हम पर थोप दे रहे हैं।सच बताएँ यह जो बात बात में व्रत आते हैं यह तो और जीना हराम किये हैं।इनकार कर दो तो धर्म संकट में,अब इनसे कैसे पूछे की धर्म के हिसाब से इन्हें भी वानप्रस्थ या सन्यास ले लेना चाहिए,मगर नही,वोह नही होगा।

बात असल में यह नही है की आपका कहना न माना जाए,बात यह है की आखिर ऐसा क्या है की एक उम्र पर आप ज़रूरत से ज़्यादा फिक्रमन्द हो जाते हैं।क्यों आपको लगने लगता है की यह सामने खड़ा लड़का कुछ नही जानता।आप भी जवान थे।आपके पास आजभी सैकड़ों किस्से हैं बेधड़क ज़िन्दगी गुज़ारने के।शरारते आपने हमसे ज़्यादा की हैं।तो अब आप क्यों हर बात में दखल दे रहे हैं।आपके भी माँ बाप ने आपको बेफिक्र ज़िन्दगी दी,तो आप हमें क्यों मिटठू बनाने पर तुले हैं।इस फ़र्क़ को समझये,बूढ़े हुए हैं तो बूढ़े होईये।

ज़रा से जस्टिन बीबर को हमने क्या सुना की आपको मुकेश और रफ़ी की तारीफ़ का मौका मिल गया।हम कैटरीना पर अटके तो आप राखी और नगमा पर।इसमें कुछ भी बुरा नही,बल्कि बुरा यह है की इस बहाने आप हमे,हमारी जेनरेशन में बुराई निकालने का कोई मौका नही छोड़ते।अपनी तरह दूसरे की भी पसन्द की इज़्ज़त करिये।जेनरेशन गैप को समझये।अब सड़क पर वोह ज़िन्दगी नही रही जो तीस साल पहले थी।न वैसे लोग हैं, तो अपनी तरह बनाकर हमे आजके लिए नमूना तो मत ही बनाइये।

यहाँ मेरा मकसद बुढ़ों की बुराई का रत्तीभर नही है।हम महसूस कर सकते हैं आपकी फ़िक्र को,यक़ीन मानिये आपके हर लफ्ज़ हमारे कानों में रहते हैं, दिल में रहते हैं मगर जब आप एक ही बात को बार बार करते हैं तो यह लफ्ज़ कानों में गड़ने लगते हैं।दिल में चुभने लगते हैं।जो भी हो हम सबको वक़्त के साथ अपने आप को ढाल लेना चाहिए।आप ज़िन्दगी में कभी सत्तू में पिज़्ज़ा का मज़ा नही डाल सकते और हम चाहकर सत्तू में पिज़्ज़ा का,तो यही बेहतर है जो जिसे पसन्द है वोह खाए।इससे हम सब खुश रहेंगे।सुन रहे हैं न हम सब।ख़ाली आप या मैं नही।हम सब खुश रहेंगे।

Thursday, September 21, 2017

मोहर्रम

यह मोहर्रम के दस रोज़ हो सके तो करीब से देखना।इन दस दिनों के इतिहास को झाँक कर देखिये,बहुत कुछ मिलेगा।ज़िन्दगी का पूरा फ़लसफ़ा इसी में गुँथा हुआ है।छः महीने के बच्चे से ज़ईफ़ तक की शहादत में इस्तेमाल हुई राजनीति और कूटनीति कितना कुछ समेटे है।मीर,दबीर सब तो इन दस दिनों को लिख चुके हैं जिन्हें सुन सुन कर हर हस्सास दिल रो दे मगर मेरा मकसद तो यह है की इन दस दिनों को अपनी ज़िन्दगी का सबक बना लो।

सच के लिए क़ुर्बानी इतिहास में भरी पड़ी हैं मगर कहीं कोई पन्ना नही मिलता जहाँ ईश्वर के सत्यमार्ग में पूरा का पूरा परिवार लड़ जाए और उस लड़ाई में सबसे ज़्यादा शहादत के बावजूद तारीख़ में हमेशा हमेशा के लिए ज़िंदा हो जाए।
मैं इन मोहर्रम को नही कहता की तुम मुसलमानो की नज़र से देखो।मैं हरगिज़ नही कहता की कर्बला को शिया सुन्नी की नज़र से देखो।इसे बहुत दूर से अपने खुद के दिल पर अपना काबू पाकर देखो की कैसे 72 लोग हज़ारों के लश्कर पर भारी पड़ गए।यह सब शहीद हुए मगर दूर कर्बला के रेगिस्तान से इनकी शहादत कैसे हमारे हरे भरे बागो,मैदानों,पहाड़ों तक जा पहुँची।

सच पूछो तो यह एक आंदोलन था।इमाम हुसैन का आंदोलन,सत्य के लिए असत्य के विरुद्ध एक आंदोलन।अपने घर की तमाम शहादतों के बाद जब बीबी ज़ैनब नेज़ो पर टँगे अपने भाई भतीजो के सर को देखती हैं, तब उनकी कैफ़ियत को देखना,जिसने अपने हर एक को रेगिस्तान में शहीद होते देखा हो,उसके दिल को महसूस करना।इस सबके बावजूद जब उनके सर से दुपट्टा खींच,नँगे सर उन नेज़ों में अपने शहीद रिश्तों के साथ कर्बला से ले जाया जाता है, उनके उस वक़्त के तारीख़ी काम को समझना।मुझे पता है की कर्बला रुलाती है, ज़ार ज़ार रुलाती है मगर कर्बला सबक भी देती है।कर्बला दुनिया का वह पहला आंदोलन था जिसे एक औरत ने सम्भाला था,लौटते वक़्त वह बीबी ज़ैनब ही तो थीं जिन्होंने मदीना पहुँचते पहुचँते सारी अवाम के दिल में हुसैन की शहादत की आग दहका दी थी।एक बार उनके तरीके को देखना।

यह कर्बला और यह मोहर्रम हमे हमेशा याद दिलाएगा की ज़ुल्मी चाहे जितना बड़ा हो,चाहे जितना खूँखार हो और हम चाहे जितने कम हों,अगर ईमानदारी से उसके खिलाफ हैं तो उसका नेस्तनाबूद होना तय है।मोहर्रम के इन दस दिनों को दिल की तमाम गांठो से इतर देखिये,आपको एक रास्ता दिखाएगा।मैं बहुत नही लिखूंगा,वह नही लिखूंगा जो पहले लिखा जा चुका है, उसे नही बताऊंगा जो वहाँ हुआ था,आपको रुलाउंगा भी नही बस इतना कहूँगा जब सच के लिए झूठ के आगे झुकने की मजबूरी आन पड़े तो कर्बला को देखना,सर कटकर भी बहुत बार सच को ज़िंदा रखता है।बस यह तय कर लेना की सच ज़्यादा ज़रूरी है या आप।।जिस दिन यह फैसला कर लेंगे उस दिन कर्बला का ताबीज़ पा जाएँगे।

Wednesday, September 20, 2017

नवरात्र

हे शिव तुम्हे पता है की पिता जी ने एक बहुत बड़ा यज्ञ रखा है।हमे नही बुलाया।सती अपने पति शिव को अपने पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ में न बुलाए जाने पर ग़म में थीं।सती ने शिव से पूछा की चलो हो सकता बुलाना भूल गए हों,तो हमे जाना चाहिए की नही।शिव मना कर देते हैं।सती के दिल को करार नही आता।माँ,बाप,बहनो से मिलने की तड़पन सती को बेचैन कर देती है।उन्हें शिव का इनकार तोड़ देता है।इस क़दर ख्वाहिश को देख शिव जाने को राज़ी हो जाते हैं।सती की एक एक मुस्कान शिव के लिए ख़ुशी थी।

दोनों साथ पिता प्रजापति दक्ष के यहाँ जाते हैं।मगर वहाँ तो माहौल ही उल्टा।कोई सीधे मुँह बात ही नही कर रहा।दक्ष ने शिव से मुँह फेर रखा।नाराज़गी की इन्तेहाँ की बेटी सती पर भी कोई ध्यान नहीं।बहनें बोली बोलने में लगीं,शिव का मज़ाक उड़ाया जाने लगा।सती से पति शिव की उछलती इज़्ज़त देखि न गई।एक बेटी बाप का क्या करती।एक बहन दूसरी बहन को क्या जवाब देती।सती चाहती तो सबको एक झटके में खत्म कर देती।मगर नहीं, उसने अपने आप को खत्म कर लिया।अपने आप को भस्म कर डाला।शिव अपनी सती का यह हाल देख नही सके और एक झटके में दक्ष के सारे अमले जमले को खत्म करके सती के गम में डूब गए।

सती ने योगाग्नि से ख़ुद को खत्म कर लिया।अपने तप से शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में अगलाजन्म लिया।इस बार वे “शैलपुत्री”के नाम से मशहूर हुईं।
शिव की मोहब्बत में इतनी ताक़त थी की सती फिर से उनके साथ रहीं।इस नयी ज़िन्दगी में भी वोह शिव की पत्नि बनीं।यही शैलपुत्री ज़मीन के सभी चरिंद, परिन्द,शजर के लिए हिम्मत बनीं।लोगों ने उन्हें पूजा।उनकी मूर्तियाँ जँगल,जानवर,इंसान सबकी हिफाज़त की पहचान बनी।इन्ही शैलपुत्री की पूजा से ताक़त,सब्र,हिम्मत,मोहब्बत,बुराई के ख़ात्मे, अच्छाई के जश्न के त्यौहार नवरात्र की शुरआत होती है।

सिर्फ इतना मानना भर है की जो भी धागा तुम्हे जोड़ सके,उसे पकड़ो।जो भी डोर तुम्हारे सबके दिलों को थाम सके,उसे मज़बूत करो।अपने इर्द गिर्द रह रहे हर इंसान की खुशियों में वजह ढूँढो, उन्हें महसूस करो और उसे सेलिब्रेट करो।उनके गम को देखो,मायूसी को पकड़ो और सहारा दो।कोई भी त्यौहार बेवजह नही है।कोई भी लोग बेवजह नही हैं।किसी की भी संस्कृति फ़िज़ूल नही है।हर एक में मोहब्बत है।उसे ज़िंदा रखो।आज अंतर्राष्ट्रीय शाँति दिवस से नवरात्र शुरू हो रहे हैं।शैलपुत्री हम सबको एक साथ मुस्कुराता हुआ देखना चाहेंगी।न की अपनों का ख़ून बहाते।अगर अपनों का ख़ून बहाना होता तो सती की कहानी कुछ और होती।नवरात्र की शुरआत दूसरी होती।आज पहले दिन से सीखिये और मोहब्बत को फ़िज़ाओं में घोल दीजिये।नवरात्र की खूब मुबारकबाद....