Monday, February 26, 2018

चन्द्रशेखर

आज़ादी की चाहत के जुर्म में वोह बच्चा जब बचपन में बेत खाने की सज़ा पा रहा था तो सबने सोचा था की बच्चा है, डर जाएगा।नँगे जिस्म पर जब काला बेंत कत्थई निशान छोड़ता तो बड़े बड़े सिमट कर बैठ जाते,वोह तो बच्चा था।हर बेंत अपना निशान छोड़ता और हर बार उसकी ज़बान दर्द और राल के साथ मुल्क़ का नारा बुलन्द करती।यह नारा मारने वाले को बेचैन करता तो वोह और तेज़ हाथ चलाता।इस तरह उसकी सफ़ेद पीठ पर तब तक ज़ुल्म के निशान पड़ते रहे जब तक वोह बेहोश नही हो गया।

बचपन में मुल्क़ के लिए देखा ख्वाब जब उन बेंतों से नही कमज़ोर हुआ तो बाद में तो इसे बढ़ना ही था।जवानी के जोशीले दौर में उसने लपक कर अपने तरह के हर नौजवान को सहारा दिया।लोग तो उन्हें क्रांतियों से याद रखते हैं।मैं बताता हूँ उससे पहले की जाने वाली अथक मेहनत को।वोह ख़ामोशी से गाँव में निकल जाता,देखता कोई तो नौजवान हो जिसका ख़ून ज़ुल्म के खिलाफ उफान मारता हो।

वोह भूखा, प्यासा बस संगठन को मज़बूत करने के लिए पगडंडियों पर भागता रहता।कब गाँव से शहर निकल जाते पता ही नही चलता।पूरे संगठन को नैतिकता के साथ चलाए रखना भी तो उसकी ही आर्ट थी।नौजवानों के जोश को एक दिशा देना भी तो उसे ही बखूबी आता था।लोग उसके खूबसूरत और जोशीले शरीर और हावभाव से आकर्षित होकर इकट्ठे होते रहे।गंगा यमुना के किनारों पर उसकी बुनी शख्सियतें अंग्रेज़ों को लगाम लगाने को काफी थीं।

मैं बात कर रहा हूँ चन्द्र शेखर आज़ाद की।उस आज़ाद की जो आज के ही दिन शहीद हुआ।जो किसी भी हाल में अँगरेज़ की कैद से बेहतर मौत को समझता था।जिसके सीने में इतना कुछ दबा था की आज़ादी के आंदोलन को कुचला जा सके।जिसके पास नरम गरम सब तरह के लीडरों के अथाह राज़ थे।उसे पता था यह सब अंग्रेज़ों के हाथ लगने से पहले खत्म होने होंगे।

उसे पता था की कहीं उसे इतना ज़ुल्म न दिया जाए की उसकी तक़लीफ़ को देख कोई उसका साथी टूट जाए और राज़ बाहर आ जाए।वोह इतना संवेदनशील था की अपने मामूली से मामूली साथी के लिए दुश्मन पर झपट पड़ता था।मैं कहता हूँ आज़ाद को वैसे मत पढ़ो जैसे लिखा गया है।उनकी संगठन क्षमता,लड़ने के तरीकों और साथियों के लिए सहारा बनने की कला को देखो। आज़ाद की सबको साथ लेकर चलने की खूबी को कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।
हो सके तो आज शहादत के दिन आज़ाद की एक वोह ही खूबी अपना लो जो मुल्क़ के लिए ज़रूरी है।

Sunday, February 25, 2018

ख्वाबिस्तान में बच्चे

गुज़री रात मैं एक ऐसी जगह था जहाँ सिर्फ बच्चे थे ।अलग अलग रँग,अलग अलग मुल्क़ के मालूम पड़ते थे मगर लाख देखने पर भी उनका मज़हब और ज़ात मालूम नही पड़ता था ।सब खेल रहे थे ।कोई किसी के कान खींचता तो कोई किसी की टाँग ।बड़े से दरख्त की डाल इतनी झुक जा रही थी की बच्चे उनसे खेल सकें मैंने देखा की वहाँ गिद्ध अपनी पीठ पर बच्चों को हवा में कुलांचे भर भर उड़ रहे थे ।कुछ बच्चे मगरमच्छ के दाँतो में उंगलिया फंसा कर गिनतियाँ सीख रहे थे ।हैरत हुई की कुछ भेड़िये अपनी पीठ पर बच्चों को बैठाकर लुका छिपाई खेल रहे थे ।

चील,बिज्जू,लोमड़ी,साँप,बिच्छू सबके साथ बच्चे बड़ी हँसी ख़ुशी खेल रहे थे ।लग रहा था पूरी कुदरत यहाँ बच्चों की मुस्कान के लिए उतर आई थी।की तभी शेर की आवाज़ गूँजी,सारे बच्चे इकट्ठे हो गए। शेर हमारी तरफ पंजा उठाकर उनसे बोला की बच्चों खेलते खेलते उधर मत जाना,उधर इंसान रहते हैं ।

उनसे बचना,जब कोई परेशानी आए तो हममे से किसी को भी बुला लेना मगर इनके नज़दीक़ मत जाना।यह तुम्हारे ख़ून पर जगह जगह ठहाके लगाते हैं क्योंकि तुम्हारा ख़ून उनके मज़हब,उनकी ज़ात,उनके विचार का नही है ।यह तो हम सबको भी मार चुके हैं ।अब यहाँ ख्वाबिस्तान में हम न तुम्हे दोबारा मरने देंगे और न खुद को.....ख्वाबिस्तान के दरवाज़े पर मैं लाचार, बेबस,पूरे जिस्म पर दूसरों का ख़ून मले,एक अदद मुस्कान पाने की ख्वाहिश में दम तोड़ता रहा की ख्वाब टूट गया और वह सारे बच्चे अख़बार में अलग अलग हेडलाइन में सिमट कर मुझपर हँसते रहे...

Friday, February 23, 2018

गाँधी vs हमारा एक्टिविज़्म

यह पढ़कर हमे जी भर कोस सकते हैं, मैं इस कोसने का स्वागत करता हूँ।देखिये एक्टिविज़्म दो तरह का होता है।एक गाँधी जी वाला और आजकल हम सब वाला।हो सकता है जो हम लिख रहें यह हमारे लोगों को तक़लीफ़ दे मगर करें तो क्या करें,इस एक्टिविज़्म से ज़ख्म नासूर जो बनता जा रहा।

गाँधी जी के सामने जब कोई दंगो,हिँसा,नफ़रत से पीड़ित आता था तो वह उससे कहते थे की जाओ और उसी सम्प्रदाय के पीड़ित की मदद करो।जाओ बदहाल परेशान की मदद करो।राहत शिविरों में जाओ और पानी पिलाओ,दवा दो।

अब हमारा एक्टिविज़्म देखिये।हम पीड़ित को ले लेकर देशभर घुमाते हैं।उसके बैनर लगाते हैं।उसके पीड़ित के ज़ुल्म के पर्चे बाँटते हैं।उसके ज़ख्म को मार्मिक या गुस्से दोनों से लोगों को बतलाते हैं।

गाँधी के एक्टिविज़्म का हासिल यह था की दुनिया के सबसे बड़े मानव पलायन और दंगो के बावजूद हमारे देश ने उन ज़ख्मो को भरकर आगे बढ़ने का संकल्प लिया और सभी भाई भाई बनकर बढ़ते गए।हमारे एक्टिविज़्म का हासिल यह है की जो एक दूसरे से नफ़रत,गुस्सा,डर था वह कई गुना बढ़कर नासूर बन गया।

मेरी बात से गुस्सा हो सकते हैं, क्योंकि आजके एक्टिविज़्म में यह भी तो है की कोई उसके तरीकों की आलोचना करे तो यह तिलमिला उठती है।जबकि गाँधी जी के सामने उनकी आलोचना होती रहती और यह सूत के धागों में लिपटी चादर बनकर किसी पीड़ित के ज़ख्मो को ढक कर उसे दूसरो की सेवा करने  लायक बना देती।

Thursday, February 22, 2018

सरी सक्ति और जुनेद बगदादी

http://epaper.navbharattimes.com/details/59146-63255-1.html

कस्तूरबा गाँधी को नमन

लम्बा लिखा है, फुर्सत हो तो पढ़िए,वरना फुर्सत निकालकर कभी पढ़ियेगा।22 फ़रवरी 1944 यानि आज ही के दिन हम सबकी बा यानि कस्तूरबा गाँधी का निधन हो गया था।हम उनपर बहुत लिख सकते हैं मगर आज दिल किया की वह ख़त पोस्ट करदें,जो सुभाष चन्द्र बोस ने कस्तूरबा के निधन पर लिखा था.....

"श्रीमती कस्तूरबा गांधी नहीं रहीं । ७४ वर्ष की आयु में पूना में अंग्रेजों के कारागार में उनकी मृत्यु हुई । कस्तूरबा की की मृत्यु पर देश के अड़तीस करोड़ अस्सी लाख और विदेशों में रहने वाले मेरे देशवासियों के गहरे शोक में मैं उनके साथ शामिल हूं । उनकी मृत्यु दुखद परिस्थितियों में हुई लेकिन एक गुलाम देश के वासी के लिए कोई भी मौत इतनी सम्मानजनक और इतनी गौरवशाली नहीं हो सकती । हिन्दुस्तान को एक निजी क्षति हुई है । डेढ़ साल पहले जब महात्मा गांधी पूना में बंदी बनाए गए तो उसके बाद से उनके साथ की वह दूसरी कैदी हैं , जिनकी मृत्यु उनकी आंखों के सामने हुई । पहले कैदी महादेव देसाई थे , जो उनके आजीवन सहकर्मी और निजी सचिव थे। यह दूसरी व्यक्तिगत क्षति है जो महात्मा गांधी ने अपने इस कारावास के दौरान झेला है ।

इस महान महिला को जो हिन्दुस्तानियों के लिए मां की तरह थी , मैं अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं और इस शोक की घड़ी में मैं गांधीजी के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं । मेरा यह सौभाग्य था कि मैं अनेक बार श्रीमती कस्तूरबा के संपर्क में आया और इन कुछ शब्दों से मैं उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहूंगा । वे भारतीय स्त्रीत्व का आदर्श थीं , शक्तिशाली, धैर्यवान , शांत और आत्मनिर्भर। कस्तूरबा हिन्दुस्तान की उन लाखों बेटियों के लिए एक प्रेरणास्रोत थीं जिनके साथ वे रहती थीं और जिनसे वे अपनी मातृभूमि के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मिली थीं । दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के बाद से ही वे अपने महान पति के साथ परीक्षाओं और कष्टों में शामिल थी और यह सामिप्य तीस साल तक चला ।

अनेक बार जेल जाने के कारण उनका स्वास्थ्य प्रभावित हुआ लेकिन अपने चौहत्तरवे वर्ष में भी उन्हें जेल जाने से जरा भी डर न लगा । महात्मा गांधी ने जब भी सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया,उस संघर्ष में कस्तूरबा पहली पंक्ति में उनके साथ खड़ी थीं हिन्दुस्तान की बेटियों के लिए एक चमकते हुए उदाहरण के रूप में और हिन्दुस्तान के बेटों के लिए एक चुनौती के रूप में कि वे भी हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई में अपनी बहनों से पीछे नहीं रहें ।
कस्तूरबा एक शहीद की मौत मरी हैं । चार महीने से अधिक समय से वे हृदयरोग से पीड़ित थीं । लेकिन हिन्दुस्तानी राष्ट्र की इस अपील को कि मानवता के नाते कस्तूरबा को खराब स्वास्थ्य के आधार पर जेल से छोड़ दिया जाए , हृदयहीन अंग्रेज सरकार ने अनसुना कर दिया । शायद अंग्रेज यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि महात्मा गांधी को मानसिक पीड़ा पहुंचा कर वे उनके शरीर और आत्मा को तोड़ सकते थे और उन्हें आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर सकते थे ।

इन पशुओं के लिए मैं केवल अपनी घृणा व्यक्त कर सकता हूं जो दावा तो आजादी , न्याय और नैतिकता का करते हैं लेकिन असल में ऐसी निर्मम हत्या के दोषी हैं । वे हिन्दुस्तानियों को समझ नहीं पाए हैं । महात्मा गांधी या हिन्दुस्तानी राष्ट्र को अंग्रेज चाहे कितनी भी मानसिक पीड़ा या शारीरिक कष्ट दें , या देने की क्षमता रखें, वे कभी भी गांधीजी को अपने अडिग निर्णय से एक इंच भी पीछे नहीं हटा पाएंगे । महात्मा गांधी ने अंग्रेजों हिन्दुस्तान छोड़ने को कहा और एक आधुनिक युद्ध की विभीषिकाओं से इस देश को बचाने के लिए कहा ।

अंग्रेजों ने इसका ढिठाई और बदतमीजी से जवाब दिया और गांधीजी को एक सामान्य अपराधी की तरह जेल में ठूस दिया । वे और उनकी महान पत्नी जेल में मर जाने को तैयार थे लेकिन एक परतंत्र देश में जेल से बाहर आने को तैयार नहीं थे । अंग्रेजों ने यह तय कर लिया था कि कस्तूरबा जेल में अपने पति की आंखों के सामने हृदयरोग से दम तोड़ें । उनकी यह अपराधियों जैसी इच्छा पूरी हुई है , यह मौत हत्या से कम नहीं है । लेकिन देश और विदेशों में रहने वाले हम हिन्दुस्तानियों के लिए श्रीमती कस्तूरबा की दुखद मृत्यु एक भयानक चेतावनी है कि अंग्रेज एक-एक करके हमारे नेताओं को मारने का ह्रुदयहीन निश्चय कर चुके हैं। जब तक अंग्रेज हिन्दुस्तान में हैं , हमारे देश के प्रति उनके अत्याचार होते रहेंगे।

केवल एक ही तरीका है जिससे हिन्दुस्तान के बेटे और बेटियां श्रीमती कस्तूरबा गांधी की मौत का बदला ले सकते हैं, और वह यह है कि अंग्रेजी साम्राज्य को हिन्दुस्तान से पूरी तरह नष्ट कर दें। पूर्वी एशिया में रहने वाले हिन्दुस्तानियों के कंधों पर यह एक विशेष उत्तरदायित्व है , जिन्होंने हिन्दुस्तान के अंग्रेज शासकों के खिलाफ सशस्त्र युद्ध छेड़ दिया है। यहां रहने वाले सभी बहनों का भी उस उत्तरदायित्व में भाग है । दुख की इस घड़ी में हम एक बार फिर उस पवित्र शपथ को दोहराते हैं कि हम अपना सशस्त्र संघर्ष तब तक जारी रखेंगे , जब तक अंतिम अंग्रेज को भारत से भगा नहीं दिया जाता ।"
(नेताजी संपूर्ण वांग्मय,पृ.१७७,१७८,टेस्टामेंट ऑफ सुभाष बोस, पृ. ६९-७० )

Wednesday, February 21, 2018

मौलाना आज़ाद

जामा मस्जिद का दरवाज़ा।एक कंधे की टेक लगाए खड़ा एक शख्स।रुंधा गला।,एक तरफ झुकी गर्दन,भर्राती आवाज़...रुक जाओ मुसलमानो,तुम्हे जामा मस्जिद की मीनारे पुकार रही हैं..... एक मज़बूत आवाज़ जिसने टूटते रिश्तों,बिखरते भरोसे को रोक दिया।हर शख्स ठहर गया जो जहाँ था।।।।।।दौड़ कर अपने खड़े भाइयो को गले लगा लिया और कहा,हम जैसे भी रहे,खाना हो य न हो मगर अब तुमको नही छोड़ेंगे।इसी माटी में दफ़न होंगे।वादा।

जामा मस्जिद की दीवारें गवाह हैं की बंटते हुए लोगों को उसके सहन से ही जोड़ा गया था।उसके दरवाज़े पर खड़े शख्स ने वोट की नही बल्कि दिल जोड़ने की अपील की थी।उसकी मीनारों से उस बूढ़े शख्स की टूटती हुई आवाज़ भी इंसान को रोने को मजबूर कर रही थी।
वोह लाल दीवारें देख रहीं थी कोई कैसे इतने दिलों पर राज कर सकता है।जब हर तरफ अपनो से भरोसा टूट रहा था तब उसकी आवाज़,हाँ सिर्फ आवाज़ लोगों में ऐसा भरोसा दे गई की इंसान इस माटी का ही होकर रह गया।

यक़ीन न हो तो हमारे ख़मीर में शामिल उस शख्स को देख लो जो अपने आप में चलता फिरता इंस्टिट्यूट था।जिसकी ज़मीन पर जितनी पकड़ थी उतनी ही कलम पर।उतनी ही ज़बान पर।तभी तो वोह दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र का सबसे पहला शिक्षामंत्री बने।उनकी रखी बुनयाद पर ही आज हम झण्डे गाड़ रहे हैं।

वह अपने किरदार,बातो में एक सा वज़न रखने वाले मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे।आज उन्हें याद करलें।आज उनको रोज़ से ज़्यादा याद करने का दिन है।उनकी जामा मस्जिद की स्पीच को सुन लीजिये।आपके पाँव खुद बखुद नफ़रत से दूर मोहब्बत को जोड़ने बढ़ जाएँगे।

Monday, February 19, 2018

पायथा गोरस थ्योरम वाले

मैं कहता हूँ जब तुम प्योर दूध के लिए घँटों घोसी की चौखट पर बैठ सकते हो,शुद्ध घी के लिए 20 किलोमीटर दूर जा सकते हो तो खुद को शुद्ध करने के लिए थोड़ा वक़्त क्यों नही दे सकते।मैं नही कहूँगा की तुम जंगलो की ख़ाक छानो, या आसमान पर पाँव धर दो।बस अपनी पिछली किताब को दोबारा खंगालो।जिन नामो को कभी भी पढ़ा हो और वोह याद हों तो उन्हें दोबारा टटोल कर पढ़ो।
पायथागोरस प्रमेय तो याद होगी या याद न सही तो पायथागोरस तो नाम सुना होगा।एक बार उन्हें उनकी प्रमेय से अलग झाँक कर देखो।मैं तो हैरत में हूँ की इतने बड़े दार्शनिक को प्रमेय की पहचान में कैद कर दिया।यह देखो उसने अपने दिल में झाँक कर कैसे समाज को एक किया।कैसे एक गणितज्ञ ने दर्शन का वोह सिद्धान्त रखा की दिल गुलाबी हो गए।

पाइथोगोरस की समझ धार्मिक और वैज्ञानिक थी, उनकी नजर में विज्ञान और धर्म एक दुसरे से सम्बंधित हैं।वह आत्मा के पुनर्जन्म में विश्वास करते थे।उनका मानना था कि आत्मा जब तक सदाचारी नहीं हो जाती तब तक वह मानव, पशु या पेड़ पौधों में बार बार अवतार लेती रहती है। उनका पुनर्जन्म का विचार प्राचीन यूनानी धर्म से बहुत हद तक प्रभावित था।पायथागोरस पहले इंसान थे जिसने यह प्रस्तावित किया की विचार,प्रक्रिया और आत्मा दिल में न होकर मस्तिष्क में स्थित है।

पाइथोगोरस का एक विश्वास यह था कि जीवन का सार संख्या है। इस प्रकार से, सभी चीजों की स्थिरता ब्रह्माण्ड को बनाती है। स्वास्थ्य जैसी चीजें तत्वों के एक स्थिर अनुपात पर निर्भर करती हैं; किसी भी चीज का बहुत कम या बहुत ज्यादा होना एक असंतुलन का कारण होता है जो किसी भी जीव को अस्वस्थ बना सकता है। वे विचारों की तुलना संख्या की गणनाओं से करते थे। जब दर्शन लोक सिद्धांतों से जुड़ जाता है तो वह विश्वास बन जाता है कि जीवन के सार को संख्याओं के रूप में खोजा जा सकता है।

Sunday, February 18, 2018

Saturday, February 17, 2018

रफ़ी अहमद क़िदवई

इर्द गिर्द अनगिनत दोस्त।जिससे एक बार मिल लिए उसके दिल में अपना हिस्सा बना गए।तक़लीफ़ के बावजूद मुस्कुराना ताकि दोस्त उनके दर्द पर मायूस न हों।अपनी स्कूल फ़ीस से दोस्तों की ज़रूरतें,उनकी फ़ीस जमा कर देने के बाद जब उन्हें खुद सज़ा मिलती तो वोह मुस्कुराते रहते।किसे पता था की बचपन में दोस्तों पर सब कुछ लुटा देने वाला यह शख्स एक दिन इस माटी पर अपने आप को पूरा खत्म कर देगा।

नेहरू के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलने पर भी जब उनका कोई दोस्त उनको याद करता तो वोह खड़े मिलते।यहाँ तक अपने दुश्मन के घरों में भी उनके एहसास और ख़िदमत के चर्चे थे।मुल्क़ बटा तब लोगों ने देखा की कम बोलने वाला और शर्मीला सा उनका लीडर कैसे दूसरों के पाँव के काँटे चुन रहा है।पूरा घर शरणार्थी कैम्प में बदल चुका था।हर एक की भूख में वोह निवाला लिए खड़े थे।

सोचिये कभी यह हुआ है की किसी के दोस्तों के पूरे समूह को उसका नाम दे दिया गया हो।उनके दोस्त अपने आप को रफियन कहकर फ़ख्र से मुस्कुराते थे।आज रफ़ी अहमद क़िदवई का जन्मदिन है।किस्से बहुत हैं लिखने के लिए मगर उससे ज़्यादा चीज़ें हैं ज़िन्दगी में उतारने के लिए।नेहरू को उनके इंतेक़ाल के बाद जब पता चला की उनके ऊपर लाखों रुपयों का कर्ज़ा है और घर की दीवारें कच्ची हैं, तो वहीं, मसौली में उनके आँगन में रो दिए।देश का इतना कद्दावर नेता इतना ईमानदार,नेहरू काफी देर रोते रहे।

मैं नही कहता की उनकी तुम जयकार करो मगर यह तो सोचो की इस मुल्क़ की बुनयाद में कैसी कैसी ईंटे थीं।एक बार उनको पढ़कर तो देखो मेरा यक़ीन करो तुम्हारे दिलों से नफ़रत कहीं दूर छिटक कर दम तोड़ देगी।रफ़ी अहमद क़िदवई को आज उनके जन्म दिवस पर याद करके देखिये।वोह ज़रूरत हैं मुल्क़ की।लखनऊ के प्लाटेक्निक चौराहे पर खामोश खड़े हैं, किसी को नही याद की आज उनपर से धूल हटा दी जाए।हम भी इस धूल से ज़्यादा उस धूल को मानते हैं जो उनके विचारों और व्यक्तित्व पर पड़ गई है, नए लोग तो जानते भी नही की मुल्क़ की बुनावट में ऊन कौन सा था,हाथ कौन थे,यह धूल हट जाए तो मूर्ति की धूल कुछ भी नही...

Friday, February 16, 2018

तो यह भी कविता ही है

जब हम पर रोज़ नए टैक्स लग रहें हों।हर योजना के लिए जनता पर बोझ लादा जाए।राजनेता खुद की तनख्वाहें,भत्ते दिन दूने रात चौगने बढ़ाएँ।अपने मित्रों के लिए हमारे पसीने की बूंदों से इकट्ठे राजकीय कोष को तीतर बटेर कर दें।तब मुझे बचपन में पढ़ी एक कविता याद आती है।शायद किसी किताब केपहले या दूसरे पन्ने पर थी मगर आज भी हूबहू याद है।यह तमिल की एक प्राचीन कविता है,इसका हिंदी अनुवाद आप भी पढ़ें और हाथी को पहचानने की कोशिश करें।कुछ कविताएँ हज़ारों साल भी सच्ची ही होती हैं-

छोटे खेतों में भी
पके धान की फ़सल
ठीक से काटी जाए और मुँह भर खाई जाए
तो वह बहुत दिन चलेगी,
धान के सौ खेत हों
और अकेला हाथी उनमे पहुँच जाए
और खाने लगे
तो जितना मुँह में जाएगा
उससे ज़्यादा पैरों से रौंदा जाएगा
ऐसे ही बुद्धिमान राजा
प्रजा से उचित कर ठीक ढंग से वसूले
तो उसे करोणों की आय होगी
और देश समृद्ध होगा
किन्तु यदि
राजा अय्याश और अविवेकी हो
चाटुकारों,
वाचाल मंत्रियों,
लोभी मित्रों से घिरा हो
अपनी उत्पीड़ित प्रजा से
आए दिन मनमानी उगाही करना चाहे,
करों के बोझ लादे
तो धान केखेतों में हाथी की तरह
न तो उसे भरपूर प्राप्ति होगी
न देश समृद्ध हो पाएगा।।।।।

Tuesday, February 13, 2018

शिव

वो जिसने देवता क्या राक्षसो का भी ख्याल किया।सबको बराबर की मोहब्बत दी।उन सबके हिस्सों का ज़हर खुद पी लिया।वो जिनको मानने में देवता,इंसान,जानवर,राक्षस,संत सब हैं।आप सबको शिव त्रिशूल में दिखते होंगे हमे तो हर कोमल ह्रदय में शिव दिखते हैं।जिनको सबके जज़्बात का एहसास था।जो बिना किसी चालाकी के सबके अपने था।हर एक की पहुँच में थे।पाप पुण्य के ऊपर,वही तो शिव थे।

शिव की तीसरी आँख से पहले कोमल दिल को देखो।आँख तो एक झटके में दिख जाएगी मगर नीले बदन में दिल तब दिखेगा जब दिल से देखोगे।मासूमियत तब दिखेगी जब दिल शिव के लिए सच्ची मोहब्बत होगी।उनके मानने वाले ज़हर उगल सकते हैं मगर उनसे मोहब्बत करने वाले ज़हर पीते हैं।इंसानियत की ख़ुशी के लिए हम ज़हर पी ले तभी तो हम शिव के हैं और शिव हमारे हैं।
बिना फ़र्क किये सबको गले लगाए तभी तो आपमे शिव होंगे।सांप और गंगा एक ही जिस्म में बसे ऐसे विशाल ह्रदय के हैं मेंरे शिव।हाँ मेरे शिव।आप पूजिए हम तो उनसे मोहब्बत करते हैं।

मैं पलट कर देखता हूँ तो सर झुक जाता है की शिव का दिल कितना बड़ा और मासूम था।कौन नही था जो शिव तक आसानी से पहुँच जाता था,किसे आखिर शिव हासिल नही थे।उनको पाने में न कोई शर्ते,न बन्धन,न नियम वोह तो सबके हैं।नीले जिस्म में मौजूद सफ़ेद रँग सा ठहराव ऊपर से चेहरे पर दूर तक बिखरी मुस्कान अपने आप में सारा संसार लपेटे हुए।

पार्वती को अपने समक्ष बैठा कर औरत के दर्जे की हिमायत करते शिव आखिर क्यों नही दिखते।प्रकृति के हर सजीव में कोई विभेद किये बिना वोह सबके हैं।जानवर,कीड़े मकौड़े,पक्षी,मछली,इंसान सब तो शिव की चौखट तक आसानी से पहुँच सकते हैं, क्योंकि शिव आकार, लिंग,विचार सबको पार करके ही तो गले लगाते हैं।मुझे शिव से मोहब्बत।शिव को मुझसे मोहब्बत है।जहाँ मोहब्बत होगी वहाँ किसी तरह का भेद नही होगा।वही तो शिव होंगे।

मोहब्बत शिव में है, शिव मोहब्बत में है।हो सके तो उनके नाम लेकर चीख़ पुकारने से अच्छा है, उनके ह्रदय के गुलाबीपन को महसूस करना।मेरे शिव बड़ी आसानी से मोहब्बत वाले दिल में उतर जाते हैं।जिस दिन तुम्हारी ज़बान से शिव या भोले,तुम्हारे ह्रदय में उतर जाएँगे वही दिन महाशिवरात्रि होगी।वही मेरे शिव का पर्व होगा,मोहब्बत का पर्व,निर्माण का पर्व,ज़हर पीकर दूसरे को ज़िन्दगी देने का पर्व,मेरे शिव का मूल यही तो है।

Friday, February 9, 2018

राबिया बसरी हैं वह

जब हर तरफ ईश्वर का भय पैदा किया जा रहा था।तरह तरह से लोग ख़ुदा से डरा रहे थे।नाज़ुक दिल इंसान ख़ुदा और रसूल से डर कर ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे।एक ख़ौफ़ था की कहीं कुछ ऐसा न हो जाए की ख़ुदा या रसूल की शान में गुस्ताखी न हो जाए।

तब हाँ यानि उस डर के साय में उन्होंने इश्क़ की एक लकीर खींची।डर और इबादत की गलियों में नँगे पाँव चल कर कहा की ए इंसानों ख़ुदा से डरने की ज़रूरत नही है।ख़ुदा के नज़दीक़ जाओ और देखो उनमे झाँक कर, उनमे उतर कर, उनमे डूब कर।यह जो तुम्हारा ख़ुदा है उसके सीने में अथाह इश्क़ है।
रेत के मैदानों में खड़े होकर उसने ख़ुदा से मोहब्बत का एलान किया।पुरानी बनी सारी बंदिशे टूटने लगी।डर की ज़ंज़ीर चिटखने लगीं।जो दिल डर से किसी कोने में सिमटे थे,वोह इश्क़ में खिलकर बहार ले आए।राबिया बसरी ने पहली बार बताया की इंसान क्या चीज़ है इश्क़ हो तो ख़ुदा भी उसकी ज़द से बाहर नही।

राबिया बसरी ने तब ख़ुदा से इश्क़ का एलान किया जब लोग अपने दिलों में इंसान से इंसान का दिल कहने को हिचकते थे।राबिया ने रसूल के दिल की नरमी पर हाथ रखा।रसूल की मोहब्बत का एहसास कराया।रसूल के दिल से निकली मोहब्बत की छाँव में हर एक को समेटलिया।

राबिया का इश्क़ इस क़दर परवान चढ़ा की इश्क़ ए इलाही की वोह पहली औरत बन गईं।दुनिया डर के ऊपर मोहब्बत को महसूस करने लगी।राबिया के चेहरे से दमकती गुलाबी रौशनी गवाही थी की ख़ुदा ने उसकी ज़िद के साथ मोहब्बत में होना ही बेहतर समझा।
अगर इश्क़ हो,तो करो।किससे, कब,कहाँ,क्यों नही बस इश्क़ होना चाहिए।इतना टूटकर चाहो की हर पन्ने में तुम्हारे किस्से हों।मेरे साथ चलो तो मैं तुम्हे कभी मैदान में मीरा से मिलवाऊं तो कभी रेत में राबिया से,मोहब्बत से कोई ज़मीन छूटी ही नही।

राबिया ने मोहब्बत की जो मिसाल रखी वोह उसे सूफ़िज़्म की सबसे ऊँची चौखट तक ले गया।राबिया ने करके दिखा दिया की इश्क़ सबसे पहले डर को खत्म करता है।जिस दिन डर पर जीत लिए उसी दिन इश्क़ की पहली कश्ती,इश्क़ के समन्दर में निकल गई।उठो और टूटकर चाहो,यह दुनिया मोहब्बत पर सवाल भले करे मगर इनसे भाग कर नही जा सकती।क्योंकि इसकी बुनियाद ही मोहब्बत है।यही तो है इश्क़ में राबिया होना।