Wednesday, December 23, 2020

राज़

राज़ एक ऐसी चीज़ है, जो मुँह से निकलने के बाद राज़ नही रह जाता है । 

इसे ऐसे समझें कि अगर कोई बहुत राज़ की बात आपके सीने में दफ़न है, और आपने उसे किसी अपने बहुत राज़दार को बताया तो वह राज़ नही रह जाएगा ।

यूँ समझिये की आपने अपना एक राज़ अपनी सबसे करीबी और राज़दार बीवी को बताया । आपको लगता है कि वह आपकी राज़दार है, उसका भी तो कोई राज़दार होगा,उसने वह बात अपनी माँ को बताई । उसकी माँ ने यह राज़ अपने राज़दार पति को बताई । पति ने यह राज़ अपने राज़दार जिगरी दोस्त को बताई । जिगरी दोस्त ने यह राज़ अपनी इकलौती बेटी को बताया । उस बेटी ने अपने राज़दार ब्वॉयफ्रेंड को बताया । ब्वॉयफ्रेंड ने यह राज़ अपनी दूसरी गर्लफ्रेंड को बताया । उस लड़की ने अपनी माँ को बताया । उसकी माँ ने कामवाली को बताया और कामवाली ने अपने राज़दारों को बताया ।

इस तरह एक राज़ की बात पूरी दुनिया घूम आई । आपको क्या लगता है, इनमें से कौन गलत है, कोई भी नही,सिवाए पहले आदमी के कोई भी गलती पर नही है ।

हम सबको यह मानना चाहिए की जो हमारा राज़दार है, उसका भी कोई उतना ही राज़दार होगा । आप बिलकुल बराबर से कोई विश्वास नही कर सकते कि आप का विश्वास जिसपर 70 प्रतिशत हो उसका आपपर भी 70 प्रतिशत ही हो । यह कम ज़्यादा हो सकता है मगर कभी बराबर नही हो सकता ।

इसलिए कहा जाता है, मुँह से निकली बात राज़ नही रहती । मेरी भी बात गिरह बाँध ले जो बात दफ़न रखना चाहते हैं, उसे सीने में दफ़न कर लें,कोई भी हो मगर दफ़न चीज़ ज़िन्दा न करें,दफ़न चीज़ ज़िन्दा होगी तो तबाही ही लाएगी और अपने राज़दार ख़ुद बनिये...
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Wednesday, December 9, 2020

मंगलेश डबराल

गुज़री रात एक कवि हमारे बीच से उठकर चले गए और चली गई वह व्यवस्था जो रोज़ बिगड़ी हुई व्यवस्था को टोकना जानती थी । गुज़री रात एक लेखक हमारे बीच से चले गए और चले गए वह ख्वाब जो बेचैन रातों का सहारा थे । गुज़री रात एक विचारक हमारे बीच से उठकर चले गए और चली गई वह चिंता की लकीरें भी जो भविष्य की बर्बादी के लक्षण सामने रख दिया करती थीं ।

गुज़री रात हमसे रूठकर एक एक्टिविस्ट चले गए और चले गए वह कदम जो हर नाइंसाफी पर खुद बखुद बढ़ आया करते थे । गुज़री रात हमारी आवाज़ चली गई और चली गई हमारी वह खूबी जिसपर कमज़ोर को भरोसा था कि वह उसके दर्द को आवाज़ देगा । क्या वाकई गुज़री रात एक कवि,एक लेखक,एक विचारक,एक एक्टिविस्ट,एक मुखर वक्ता चला गया या गुज़री रात एक व्यवस्था गुज़र गई,जिसको हम फलता फूलता देखना चाहते थे ।

मंगलेश डबराल जी का जाना हम सबके लिए एक ऐसा दर्द है, जिसको आज नही तो कल मिलना था मगर हम कभी भी यह दर्द सहने को तैयार नही थे । हमारे सरों से धीरे धीरे वह हाथ हट रहे हैं, जो अचानक हमारी अल्हड़ता,चंचलता,मासूमियत को पीछे छोड़कर ज़िम्मेदारी का एहसास करा रहे हैं । हम मंगलेश जी के साथ के कितने किस्से सुना सकते हैं मगर सच पूछिए काम की तो उनकी नसीहतें हैं, जो हमें इंसान से संवेदनशील इंसान बनाने की प्रक्रिया है । 

पलट कर देखिएगा कितने लिखने वाले हैं, जिनके आँख बंद करते ही सन्नाटा होते दिखाई दे । लेखक जिसे पढ़ने वाले कम बचे हैं, उस दौर में लेखक का गुज़रना लोगों को अपने घरों के किसी बुज़ुर्ग का जाना महसूस हो तो यह उस लेखक की वह कमाई है, जो हर एक कमाना चाहेगा । 

मंगलेश जी की तमाम यादों और किस्सों संग बस इतना सा वादा पूरा हो जाए,तो उनके स्पर्श का मान रह जाए कि अन्याय और चुप नही रहेंगे....क्या कहें जब घर खाली हो रहा हो,रोएँ या घर को बचाने के लिए खड़े हों,मंगलेश जी रोने की जगह खड़े होने की नसीहत हमें दे चुके हैं, वही सही है, दुःख में टूटेंगे नही बल्कि दुःखों को दूर करेंगे सर....
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रुक़य्या सखावत हुसैन

ये महिला हैं रुक़य्या बेगम।दुर्भाग्य से अब पूछियेगा की कौन रुक़य्या। रुक़य्या सखावत हुसैन।बंगाल की रूह रुक़य्या।अबरोध बासिनी लिखने वाली रुक़य्या।जो हमेशा मज़हब की शाल ओढ़कर,मज़हब के आडम्बर,ज़ंज़ीर से उलझती हुई रास्ते बनाती रही।वोह रुक़य्या जिसे सुनने वालों की तादात तब तक बढ़ती ही रही जब तक उसे भुला नही दिया गया।
आजही के दिन 1880 को उन्होंने दुनिया में पहली साँस ली थी और आजकी ही सुबह 1932 में रुक़य्या बेगम ने अपनी आखरी साँस भी ली थी।मैं जब तुम्हे स्त्री विमर्श पर बहस करते देखता हूँ तो खुश होता हूँ की चलो तुम उनकी आवाज़ तो बन रहे हो।मगर दोस्त थोड़ी देर बाद तुम्हे ख़ाली पाता हूँ।जानते हो क्यों।क्योंकि तुमने खुद को कभी खाद पानी दिया ही नही।तुम्हे उन औरतों को पढ़ना होगा।

उठो और कम से कम आज के दिन रुक़य्या सखावत हुसैन को पढ़ो उनकी अबरोध बासिनी को पढ़ो।मोतीचूर,पदमार्ग और सुल्ताना के ख्वाब को पढ़ो,देखो दिमाग की तहे खोलती यह कैसे उस दौर में ज़मीन पर टिकी।जब न मिले तो उनसे पूछो जिन्होंने इन्हें पढ़ा है।तब डट कर कुरीतियों,आडम्बरो से मुकाबला करो।हर लड़ाई लड़ने से पहले उस लड़ाई को लड़े जाने के पुराने तरीकों को मालूम करना ही अक्लमंदी है।उन महिलाओं को पढ़िए,खोजिए जिन्होंने सदियों पहले दहलीज़ से निकलकर ज़माने की तरक्की के दरवाज़े खोल दिए थे। रुक़य्या बेगम को नमन।

Wednesday, December 2, 2020

इख़्वानुसफा

बेहतरीन क़ाबिल लोगो की जमात ने 900 ईसवी में इख़्वानुस्सफ़ा नाम का ग्रुप बनाया। इसके माइने थे पवित्र बिरदरी। अरब अपने इल्म के सातवें आसमान पर थे। वह रश्क भी कर सकते थे क्योकि जब यूरोप अरस्तू को खो चुका था तब अरबी ज़बान में सिसली में वह ज़िंदा थे। अरब के मामूली से मदरसों में अरस्तू और अफ़लातून पढ़े जा रहे थे,क्या ही दौर रहा होगा वह।

इख़्वानुस्सफ़ा ने एक एनसाइक्लोपीडिया तैयार की और उसमें सब कुछ उतार डाला । यहाँ तक एक बेहतर इंसान की खूबियों पर,कमियों पर लंबे लम्बे तज़किरे किये गए । एक दूसरे को समझा गया फिर जाकर उन्होंने बेहतरीन इंसान की भोगैलिक खूबियों को परखकर कहा,

 "एक बेहतरीन इन्सान वह है जो ऊचे दिमाग का इरानी मूल का हो,अरब आस्था का हो,हनफ़ी हो,शिष्टाचार में ईराकी हो,परम्परा में यहूदी,सदाचार में ईसाई,समर्पण में सीरियाई,ज्ञान में यूनानी,द्रष्टि में भारतीय और ज़िंदगी जीने में सूफ़ी।।।।

हम आज इसे माने या नकारे,हमारी मर्ज़ी मगर एक बात तो हमेशा सच रहेगी,सबसे बेहतरीन इंसान वह जिसमें तमाम तरह की खूबियां हों,जिसमे तमाम धर्मों के रंग भरे हुए हों,जिसमे तमाम भोगौलिक विशेषताओं का जमावड़ा हो,जिसकी ज़ुबान हर तरह के जायके को इज़्ज़त देना जानती हो,जिसका दिमाग संकीर्णता से ऊपर उठकर हर विचार को बराबर में बैठाकर चलना सिखाता हो,जिससे इंसानियत को ख़तरा न हो,जिसके खड़े होने से लोग जुड़ जाएँ नाकि बंट जाए ।

इख़्वानुस्सफा और सूफ़ीज़्म पर पहले भी कहते रहे हैं, समझिये इसे न कि इसको सुनकर झूमिये । दिल को बड़ा कीजिये जिसमें अलहदा अलहदा रँग अपनी खूबसूरती बिखेर सकें,कोशिश कीजिये अपनी ज़मीन के सबसे बेहतरीन इंसान बनिये,मूल को हम नही मानते मगर कर्म को मानते हैं, कर्म ही आपके मूल हैं, प्रेम को कर्म बनाइये,मूल आपका श्रेष्ठ होगा,नफरत को कर्म बनाएंगे,तो बदनाम मूल ही होगा...
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Wednesday, November 18, 2020

कट्टरता

लोग चाहते हैं कि जिस्म भले तुम्हारा हो मगर इसमें सांसे उनके हिसाब से चले । वह चाहते हैं कि जिस सोच ने उनके दिमाग मे जगह बनाई है, वही सोच हर एक के दिमाग में फले फूले । असल में हम एक ऐसा समाज बनते जा रहे हैं, जिसमें समाज होने के मूल तत्व ही ग़ायब होते जा रहे हैं । आप अपनी मर्ज़ी से कुछ कर ही नही सकते हैं, क्योंकि सामाजिक दरोगा आपको अपने हिसाब से ही एक दिशा में ले जाना चाहते हैं ।

कोई मुसलमान मंदिर में पूजा करले तो आधे मुसलमानों के पेट मे दर्द हो शुरू हो जाती है । उस आदमी की लानत मलामत हो जाती है । उसे कुफ़्रियत के सर्टिफिकेट बंटने लगते हैं ।
कोई मुसलमान मंदिर में नमाज़ पढ़ ले तो आधे हिन्दू भड़क उठते हैं, उसे जेहादी के सर्टिफिकेट दिए जाने लगते हैं । कोई मज़ार पर बसंत मना ले तो उसपर सवाल । कोई दो धर्मो की सहिष्णुता और प्रेम पर बात कर ले तो उसकी खाल नोंचना शुरू ।

इसमें कोई एक धर्म ही झंडा नही गाड़े है, जब जिसे मौका मिलता है, वह यह बताने से नही चूकता की हमे देखो,हम ज़्यादा कट्टर हैं । असल मे यह समाज के जो नए बने दरोगा हैं, यह आपको हमेशा उस नज़र से देखना चाहते हैं, जैसा चश्मा इनकीं आंखों पर लगा हुआ है । उससे अलग दिखने पर यह आप पर भड़क पड़ेंगे ।

ख़ुद की आज़ादी जैसे एक ख्वाब हो गई है । आपका खाना, पहनना,निकलना,प्रार्थना सब वैसे ही तय किया जाएगा,जैसे आपको यह भीड़ देखना चाहती है । यह अजीब लोग अमीर खुसरो को भी सुधारने की सनक रखते हैं और तुलसीदास को  भी ।

कट्टर लोग सेक्युलर होने की परिभाषा बता रहे हैं । उन्हें मुसलमान के आरती में बैठने और हिन्दू का मज़ार पर सर झुकाने पर एतराज है । अरे भाई कट्टर व्यक्ति से कट्टरता सीखी जाएगी और सेक्युलर व्यक्ति से सेक्युलर सोच सीखेगा इंसान और किसी को यह अधिकार नही है कि सामने वाले के तौर तरीकों और कार्यों को अपनी हदबंदी में क़ैद करे ।

रही बात क़ौम या धर्म की तो जिन्हें इसकी मेड़ में क़ैद होना पसन्द है, उनसे हमे कोई एतराज नही मगर जिन्हें यह मेड़बन्दी तोड़कर हर तरफ जाने की इच्छा है, उन्हें भी एतराज़ की चादर नही ओढ़ानी चाहिए । रक आदमी की अपनी स्वतंत्रता का सम्मान करना सीखिए । उसपर अपनी सोच के जाल फेक फेक कर क़ैद मत करने की कोशिश कीजिये । कट्टरता यही तो है, की सब मेरे जैसे हो जाएं ।

जबकि ख़ुद का सगा भाई कुछ और पसन्द करता है मगर यह क़ौम और समुदाय को हुल्लड़ मचाकर एक करना चाहते हैं । आपसे सिर्फ इतना दरकार है कि लोगों से मोहब्बत कीजिये,जो जैसा है, उसकी वैसे इज़्ज़त कीजिये,अगर कोई कमी लगती है उसमें,तो उससे बात कीजिये,उसे भरोसा दिलाइये की आप उसका भला चाहते हैं । आख़री बात हमारे पुरखे इस जमीन के सबसे खूबसूरत दिन बिता कर जा चुके हैं, जानते हैं क्यों,क्योंकि न वह कट्टर थे,न लकीर के फ़क़ीर थे,वह एक दूसरे में घुल मिलकर चलने की ज़रूरत को समझते थे । 

वह असलियत में जानते थे कि सबको एक ईश्वर ने बनाया है, इसलिए मोहब्बत करते रहे और मोहब्बत से रहे । आप भी यही करिए,इधर उधर सर्टिफिकेट बाँटने से बेहतर है, खुद को सुधारिये । हम यह नही कह रहे कि मुसलमान आरती की थाल थामे और हिन्दू मस्जिद का रुख करें,मगर कोई ऐसा अगर करे,तो उसकी इज़्ज़त करें नाकि उसे गरियाया जाए । कट्टरता और नफरत कभी तरक्की नही ला सकती और न ही सुक़ून,आज मानो या कल,अंत मे शान्ति और प्रेम की ओर ही लौटना होगा । 
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Sunday, November 1, 2020

जाहिल हो

जाहिल हो ।।। यह लफ्ज़ हम अक्सर उसकी तरफ ढकेल देते हैं, जो हमारी राय जैसी राय नही रखता है । एक डॉक्टर के लिए जिस व्यक्ति को दवा कम्बीनेशन समझ न आए,उसे जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह फिलॉस्फर हो । एक वकील के लिए उसके बुने पेपर को न समझने वाले को जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह डॉक्टर हो । एक लेखक के लिए किसी किताब या कविता को न समझने वाले को जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह वैज्ञानिक हो । एक वैज्ञानिक के लिए विज्ञान की सामान्य परिभाषा न समझने वाले को जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह कलाकार हो । एक थियेटर आर्टिस्ट के लिए उसके नाटक के ट्विस्ट को न समझने वाले को जाहिल कह देना आसान है, भले ही वह व्यक्ति कामयाब पॉलिटिशियन हो ।

असल में हम सब अपने से अलग या हमारी बात को न समझने वालों को जाहिल की माला पहनाने को तड़पते रहते हैं । कभी एक पूरे वर्ग को जाहिल कहते हैं, कभी दिल नही भरता तो पूरे देश को जाहिल कहते हैं, कभी पूरे धर्म को जाहिल कहते हैं तो कभी पूरी जाति को जाहिल कहते हैं । हम अक्सर जिस तरफ उंगली उठाकर यह जहालत के तमगे बांट रहे होते हैं, उसे वक़्त यह तमगा हमारे माथे भी चमक रहा होता है, बस हमें दिखता ही तो नही है मगर औरों को तो दिखता ही होगा ।

चार किताब पढ़कर अगर हम बिना किताब पढ़ने वाले को जाहिल कहकर निकलेंगे,तो ज़ाहिर है,यह पहचान है कि वह चार किताबें भी हम पर असर नही कर सकी हैं, कोई बदलाव नही ला सकी हैं ।

ज्ञान को पाना जितना कठिन है, उससे कहीं ज़्यादा कठिन उसे संभालना है । ज्ञान को संभालने की एक प्रैक्टिस बताते हैं, आपको दूसरा जब तक जाहिल नज़र आए,तब तक ख़ुद में ज्ञान की खूब वृद्धि करें । खूब पढ़ें,सीखें,लोगों से मिले,यात्रा करें,जिस दिन दूसरे जाहिल नज़र आना बंद हो जाएं,जिस दिन आपके ज़िक्र में किताबों,लेखकों और भद्रजनों के नामों की जगह विचार आ जाएं,वह दिन आपकी शुरआत होगा । एक बात मेरी गिरह बाँध लें,इस ज़मीन पर जाहिल कोई नही है, क्योंकि सांसों का हिसाब रखकर उन्हें पूरा करना खुद में बहुत महान काम है, बल्कि इन्हें जाहिल समझना ही असल जहालत है...
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Saturday, October 31, 2020

पुराने की कद्र

हमेशा नए आने वाले पर नज़र रखो,यदि नए आने वाले से पुराने वफ़ादार लोग उठकर जाने लगें, समझ लो यह नयापन बर्बादी लाएगा ।
जिसके पास खुद कोई प्रभावी प्लान नही होता है,वह बड़ी चालाकी से पुराने लोगों पर सवाल उठाता है, उनको निकम्मा ठहराता है और फिर उन्हें किनारे लगाकर अपने कद को रोज़ फुला फुला कर बड़ा करता है ।

यह बात हर राजनैतिक दल,सामाजिक संगठन और परिवार के लिए है । यदि पुराने वफ़ादार लोग जा रहे हैं तो समझ लो कि चौखट पर किसी धूर्त युवा ने पैर रख दिया है ।

मैं बदलाव का बड़ा समर्थक हूँ । युवाओं को आगे लाने का भरसक प्रयत्न करता हूँ मगर यह जान लो इसका कतई यह अर्थ नही की पुराने लोगों को,उत्साहजनक परिणाम न देने वाले बुज़ुर्गों को या उस वफ़ादार आदमी को जिसने बुरे वक्त में भी घर मे चिराग जलाए रखा, इनको निकालने,इनको बेइज़्ज़त करने और इनसे किनारा करने के सख्त से सख्त खिलाफ हूँ ।

मैंने गाँधी से सीखा है कि पुराने को साधो । यदि पुराने लोग हटने लगें तो यह किसी भी युवा की सबसे बड़ी अयोग्यता है, जिसके परिणाम बिल्कुल भी सकारात्मक नही होंगे, बल्कि जो घर अभी बुढ़ापा लिये खड़ा था,वह भी ढहकर खत्म हो जाएगा....यदि किसी के आने की आहट,किसी के जाने की सदा है, तो यह बुरी है, बेहद बुरी । फिलहाल जिस भी राजनैतिक दल में जो भी इस परिपाटी पर है, उसकी बर्बादी जल्द ही दिख जाएगी,उससे पहले की सम्भल जाएँ...
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Friday, October 30, 2020

इंदिरा गाँधी

तेरह साल की मामूली सी उम्र में "बाल चरखा संघ"बनाया।बचपन में ही कुछ था,जो लोगो को दिख रहा था।दिल्ली में 47 के दंगो में वोह कूद गई। गाँधी जी के कहने पर उसने दंगो में लोगो की ख़िदमत करना अपना मकसद बना लिया। पीड़ितों की सेवा करना और ज़ख्मो पर मरहम रखना उसकी ज़िन्दगी हो गई । हमसे कई बार होता है किसी की बुराई करते करते हम इतने बुरे हो जाते हैं की उसकी अच्छाइयों को भी नज़रअंदाज़ कर जाते हैं।

इंदिरा गाँधी ने सारी ज़िन्दगी काम किया।सारी ज़िन्दगी मुल्क़ की ख़िदमत में गुज़ारी । इंदिरा को अपनी माटी से ऐसा अटूट प्रेम था,जिसने कभी तबियत से इंदिरा को सोने ही नही दिया,मुल्क की वफ़ादार बेटी इंदिरा ने एक के बाद एक भारत के बाहर अपने कदम बढ़ाए।उनके कदमो से दूसरे मुल्कों में भारत की धाक पहुँची।

अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, बर्मा, चीन, नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में वोह पहुंची। उन्होंने  फ्रांस, जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य, जर्मनी के संघीय गणराज्य, गुयाना, हंगरी, ईरान, इराक और इटली जैसे देशों का आधिकारिक दौरा किया।अल्जीरिया, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया बेल्जियम, ब्राजील, बुल्गारिया, कनाडा, चिली, चेकोस्लोवाकिया, बोलीविया और मिस्र जैसे बहुत से देशों का दौरा किया।वह इंडोनेशिया, जापान, जमैका, केन्या, मलेशिया, मॉरिशस, मेक्सिको, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, नाइजीरिया, ओमान, पोलैंड, रोमानिया, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, सीरिया, स्वीडन, तंजानिया, थाईलैंड,त्रिनिदाद और टोबैगो, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, अमेरिका, सोवियत संघ, उरुग्वे, वेनेजुएला, यूगोस्लाविया, जाम्बिया और जिम्बाब्वे जैसे कई यूरोपीय अमेरिकी और एशियाई देशों के दौरे पर गई।उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भी अपने कदम रखे।

यह गिनती सिर्फ इसलिए है की उस वक़्त वोह कितनी तेज़ कदम बढ़ा रही थीं।मुल्क़ के लिए जी रही थीं।कुछ कदम गलत हो सकते हैं।उसकी सज़ा उनकी ही ज़िन्दगी में उन्हें मिल गई।कुछ को लगा यह सज़ा कम है तो उनकी ज़िन्दगी ही उनसे छीन ली गई। यह नेहरू परिवार की पहली शहादत थी और आज़ाद भारत में बड़ी शख्सियत में महात्मा गाँधी के बाद दूसरी शहादत थी या कहें आने वाले वक्त के लिए  शहादत की नीव थी ।
इंदिरा को अपने हर कदम का बखूबी अंदाज़ा था।इंदिरा ने मुल्क़ तो टूटने से बचा लिया था मगर खुद को बचाने को तनिक भी फिक्रमन्द नहीं थी।उनमे नफ़रत भी नही थी।नफ़रत अगर होती तो उनके अंगरक्षक कब के बदल जाते।

इंदिरा के दामन पर जो भी छींटे डाली जाती हैं,उन छींटों में कहीं साम्प्रदायिकता नही है,कहीं पर नफ़रत नही है।इंदिरा इन सब चीज़ों से आज़ाद थीं।इंदिरा के व्यक्तित्व पर लगातार ऊँगली भी उठी और सराहना भी हुई।लिखने को कितना कुछ लिख सकते हैं उनकी शख्सियत पर मगर वक़्त उनको ज़िन्दगी में उतारने का है। आज उनकी शहादत के मौके पर हम उनकी मेहनत,जज़्बे,मोहब्बत और पूरी समर्पित ज़िन्दगी को सलाम करते हैं।
देश की सबसे सशक्त,निडर,प्रधानमन्त्री इंदिरा की बहुमुखी प्रतिभाओं और पूरी ज़िन्दगी मुल्क़ के लिए लगा देने को दिल से सलाम।

जिन्होंने मुल्क की खिदमत में एक नाखून तक नही कटवाया वह तो इंदिरा की शहादत से जलन रखेंगे ही मगर वाक़ई जो भारत गणराज्य का नागरिक है,वह अपनी बेमिसाल हिम्मती इंदिरा की इज़्ज़त करेगा । मेरा मानना है, इसमे कोई ज़बरदस्ती नही की इंदिरा के बाद से देश की कुर्सी पर वैसी कोई शख्सियत नही विराजी,इंदिरा बहुत अलग थीं,तमाम परतों में ढली एक मज़बूत काया...वीर शहीद इंदिरा गाँधी को उनकी शहादत पर कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से नमन...
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Thursday, October 29, 2020

हज़रत मोहम्मद के नाम से

जब आप किसी को मानते हैं मगर उसकी कही को नही मानते हैं, तब आप दो दिशाओं में फँसकर बर्बादी की तरफ बढ़ते हैं । अगर आप पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब को तो मानते हैं मगर उनकी कही बात नही मानते,तो फिर आप उनके नज़दीक रहकर भी नज़दीक नही होते हैं ।

पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद एक समुदाय की ताक़त का नाम है मगर जज़्बात में आकर पूरा एक समुदाय उन्हें अपनी कमजोरी बनाने पर तुला है । एक समझदार इंसान की सबसे बुरी चीज़ है, उसकी कमज़ोरी का ज़ाहिर हो जाना । अब कोई भी बेहूदा इंसान इस कमज़ोरी से जब चाहे तब अच्छे भले इंसानों को भड़का सकता है ।

आप मेरी लाख बुराई कर सकते हैं,मेरा सर नेज़ो पर टांग सकते हैं, हमे कोई शिकवा नही होगा । बस एक ही बात का शिकवा रहेगा कि काश पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद को पढ़कर समझकर अपने रास्ते बनाए होते । हर उस बुराई से ऐसे ही लड़ते जिसे हज़रत मोहम्मद साहब ने बुरा कहा है ।

आज की शाम जब पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब की याद में रौशनी को देखिएगा, फ़िज़ाओं में रौशनी बिखेरियेगा,तब एक पल के लिए ज़रूर सोचिएगा की वह दुनिया की आलातरीन कौन हस्ती थी जिसने अपने मिजाज़ से,जिसने अपने क़ौल से,जिसने अपनी खिदमत से अपने से ठीक मुख़्तलिफ़ लोगों को अपना बना लिया था ।

आज जब मैं एक से एक दानिशमंद को उनके नामपर अपनी लाइन से बहक जाने को देखता हूँ तो अफ़सोस होता है कि यह उन्हें तो मानते हैं मगर उनकी नही मानते हैं ।
मैं अपने पैग़म्बर की मार्फ़त दुआ करता हूँ कि उनके पीछे चलने वालों को मोहब्बत के साथ अपने से खिलाफ लोगों को बर्दाश्त करने की कूव्वत दे ।

हुज़ूर की शान में गुस्ताख़ी सिर्फ कार्टून बनाने या कुछ अल्लम गल्लम बकने में ही नही है, बल्कि हुज़ूर का नाम लेते हुए हुज़ूर के दिखाए रास्ते से डिग जाने में भी है । आप हमारी जमकर आलोचना कीजिये मगर यह जान लीजिए पैगम्बर हज़रत मोहम्मद मोहब्बत का नाम है, खिदमत का नाम हैं, जिसको हमारे जीते जी कोई रुसवा नही कर सकता है ।

हुज़ूर के नामपर हुए किसी भी क़त्ल को सही नही ठहराया जा सकता । हम न उनकी सुनते हैं, जो गाहे बगाहे इस्लाम को हिंसा की शक्ल मे देखते हैं और न ही उनकी सुनते हैं, जो उनके नामपर क़त्ल को जायज ठहराते  हैं । 

ईद ए मिलादुन्नबी की मुबारकबाद बस यही दुआ की हमारे दिल अल्लह नरम करे और हमसे इंसानियत फ़रोग़ पाए,यही रसूल का रास्ता है । जो इंसानियत से डिगेगा, हमारे रसूल के रास्ते से डिगेगा ।

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Wednesday, October 28, 2020

बृज यात्रा

ज़मीन जब मोहब्बत की माँग करती है, तो किसी इंसान में ऐसे बीज रोप देती है, जिसके चलने से मोहब्बत फ़िज़ाओं में फैल जाए । वह कुछ इंसानों को ऐसे दरख़्त में तब्दील कर देती है, जिनसे ज़माना सांस पाता है । आज जब हमें लग रहा कि नफरत बुलंद हो रही,तब ऐसे इंसान कहते हैं कि दोस्त ज़मीन पर तो उतरो,मोहब्बत तुम्हारा इंतेज़ार कर रही है ।

यह फैसल भाई हैं और उनके सहयात्री,जो "बृज 84 कोसी परिक्रमा" कर रहे हैं । इनका मकसद अपने हृदय में प्रेम को जगाना है, यह बताना भी है कि चाहे जब लौटिए,शांति और समृद्धि के लिए प्रेम की ओर ही आना होगा ।

26 अक्टूबर से 29 अक्टूबर तक चलने वाली यह यात्रा ऐसे अनुभव को खुद में समेटे है कि आप हैरत करेंगे । फैसल भाई का कहना है कि कोई भी दिल प्रेम से खाली नही है, बस उसके अन्दर के प्रेम को अपने आने की सूचना पहुँचानी है । प्रेम कभी मरता नही है, हमारे न आने से वह खामोश भले हो जाए मगर जब कोई उसे आवाज़ देगा,तो इंसान के अन्दर का प्रेम बोल ज़रूर उठेगा ।

खुदाई ख़िदमतगार की इस "बृज 84 कोसी यात्रा " यात्रा को देखते रहिए । जितना हो सके इसके मकसद को आगे बढ़ाइए और अपने हृदय में प्रेम के दीये को जलाए रखिये । यकीनन नफरत बुरी तरह हारेंगी और प्रेम घर घर महकेगा क्योंकि प्रेम के साथ कृष्ण जी हैं, जहाँ प्रेम है, वहीं कृष्ण जी हैं, इसलिए देर सबेर प्रेम का परचम लहराएगा । 

सभी यात्रियों को मुबारकबाद और शुभकामनाएं की वह उस मकसद तक पहुँच रहे हैं, जिसके ख्वाब हम सब देखते हैं । आपकी मेहनत बहुतों के दिलों का सुक़ून है । यह जो थककर आप झपकी लेते हैं, यह हमारे जागने की प्रथम सूचना है । आपके कदम इस मिट्टी के रँग, खुशबू और ख़मीर को एक दिन ज़रूर उभारेंगे.....

अखिलेश यादव

राजनीति प्रयोगों का नाम है और इस इंसान ने इतनी कम उम्र में जितने प्रयोग करें हैं, वह बहुत कम लोगों के हिस्से में आया है । आज जब राज्यसभा सीटों में शानदार पॉलिटिकल ट्विस्ट देखने को मिला, तो लगा कि हमारे बीच अभी वह राजनैतिक चेतनाएँ खत्म नही हुई हैं, जिनपर स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स चलते हैं ।

हम अखिलेश यादव की कद्र करते हैं, वजह सिर्फ एक है कि उनको एक साथ अलग अलग देखने की समझ है । उन्हें कोई राजनैतिक उड़ान दिखाकर चरा नही सकता है । वह खुद प्रयोग करने का रिस्क रखते हैं, नतीजे तो अच्छे बुरे आते ही रहते हैं लेकिन यह निडर होकर खुद पर भरोसा करते हैं ।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी के पास इतनी व्यापक समझ वाला नौजवान शीर्ष नेतृत्व नही है । आप मीडिया और आईटी सेल के प्रोपेगेंडा को बाहर रखकर देखेंगे तब समझ पाएँगे इनमे मासूमियत के साथ शानदार समझ है । कब बोलना है, कितना बोलना है, कहाँ बोलना है, क्या बोलना है, इसमें अखिलेश यादव का कोई सानी नही है । यह न उत्तेजित होते हैं और न ही शांत,बीच की एक अपनी लाईन है, उसपर खड़े मिलते हैं ।

कल तक राज्यसभा की सीटों पर एक से एक चाणक्य बने फिर रहे थे,सब एक झटके में हवा हो गए । हम इस कूटनीति के ही तो कायल हैं, राजनीति ऐसे ही होती है ।

मेरा किसी की हार जीत से डेटा प्रभावित नही होता है । मुझे कोई आरोपों लगाकर किसी की समझ के ख़िलाफ़ नही कर सकता है । मैं राजनीति के उन हिस्सों को देखता हूँ,जो छोटे ज़रूर नज़र आते हों मगर आने वाले वक्त में बड़े बनकर उभरते हैं । उत्तर प्रदेश की राजनीति में आप अखिलेश यादव की आंधी देखने को तैयार हो जाएं,यह मेरा अनुभव है क्योंकि उनकी जो फील्डिंग सज रही है, उसका तोड़ विपक्ष में तो किसी दल के पास नही है, सत्तापक्ष ही उसका मुकाबला करेगी ।

अखिलेश यादव के कदम भले अभी असर नही दिखा सके हों,मगर कभी कदम हल्के नही रहे हैं । रणनीति में अभी उनके पसंघे बराबर कोई नही है । मेरे लिए तो सबसे बेहतर चीज़ है कि अखिलेश यादव के संगठन में कोई हल्का युवा भी नही बैठा है, अखिलेश को कोई संघर्ष की तस्वीरों से झांसा नही दे सकता,यह लीडर आँखे पढ़ना जानता है ।

मैं इनकी हर आलोचना सुन सकता हूँ । हर लीडर की आलोचना होना कोई बुरी बात नही है । मगर एक बार बिना लाग लपेट कहना चाहूँगा की देश की राजनीति में उनके इतना समझदार युवा राजनीतिज्ञ नही है, वह राजनेता है । समझ न आए तो गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव से लेकर आजतक राज्यसभा चुनाव को देख लें,बिना तमाशे ढोल के राजनीतिक कदम कैसे उठते हैं, देख लीजिए ।
एक झटके में किसी को खारिज करना बड़ा आसान है मगर उसे समझना बहुत समझदारी का काम है, जो अक्सर हमसे छूट जाता है....

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Tuesday, October 27, 2020

अपराध महिला के विरुद्ध

हम अब इतने हल्के समाज मे तब्दील हो चुके हैं कि बुराई जब तक लिख न दी जाए,तब तक उसे बुराई नही अच्छाई माना जाता है । अरे भाई कोई लिखे या न लिखे,बोले या न बोले हत्या,झूठ,अन्याय यह सब अपराध में ही गिना जाएगा,इसे हमारी आपकी स्वीकृति की आवश्यकता नही है ।

एक अपराधी लड़के ने एक लड़की की हत्या कर दी,बहाना कथित प्रेम को बनाया गया । हत्या तो अपराध है ही,प्रेम को बहाना लेकर हत्या तो धूर्तता और अपराध का मिश्रण है । अब बताइये,इसे कौन इंसान सही ठहराएगा । कोई भी सभ्य इंसान हत्याओं को सही नही ठहरा सकता ।

अब आते हैं भत्सर्ना पर,जो खुद दिल के चोर होते हैं, वह इधर उधर झाँकते फिरते हैं कि किसने विरोध किया और किसने नही किया । चलो ऐसे लोगों को घेरा जाए । यह दिमाग से इतने दरिद्र होते हैं कि इन्हें यह भी नही पता कि कोई भी इंसान,जिसकी चेतना और विवेक,किसी दूसरे के पास गिरवी नही है, वह कभी भी हत्या,बलात्कार,हिंसा को सही नही ठहरा सकता है, वह तो हमेशा उसके खिलाफ ही होगा,भले वह लिखे या न लिखे ।बोले या न बोले ।

एक चीज़ की गिरह बाँध लें,हत्या,हिंसा,बलात्कार या कोई भी मानवता के विरुद्ध अपराध में हर इंसान इसके खिलाफ रहता है । इसपर शक वही करेगा,जो कभी न कभी ऐसे अपराधों को मौन स्वीकृति दे चुका होता है, तब उसे अपनी तरह सारा संसार मक्कार ही नज़र आता है, जबकि बाहर निकलकर किसी एक से पूछ लो,वह यही कहेगा कि यह बुरा है, बहुत बुरा है, बचो इससे ।

जब जब घटनाओं में हम जाति, धर्म,वर्ग,क्षेत्र का छौंका लगाते हैं, तब हम असल मे अपनी क्रूर मानसिकता को अपराध में घोलकर पीड़ित इंसान के साथ अन्याय कर रहे होते हैं । एक अपराध हुआ है, उसकी सजा मिलनी चाहिए,यह एक शास्वत सत्य है, बाकी इसमे जितने मसाले डाले जाएँ,वह भी इस सत्य को झुठला नही सकते हैं ।

अपराध में लिप्त अपराधी,वह कोई भी हो,उसे सजा मिले, न्याय की प्रक्रिया सरल और जल्द पूरी हो,यही पीड़ित के साथ न्याय है, बाकी अपने घरों के लड़कों को समझाइए की हिंसा दीमक है, जो उनके पूरे कुनबे को खा जाएगी, फिर वह भला कोई भी हो । हिंसा,नफ़रत,हत्या हर उस घर मे विराजेगा जहां अन्याय को स्थान दिया जाएगा । इससे बचिए,यह हम सबके लिए ज़रूरी है ।

किसी की भत्सर्ना का इंतेज़ार मत कीजिये,समाज को संभालने और सुधारने निकलिए । बच्चों पर ध्यान दीजिए,उनमें सरलता, प्रेम,त्याग और समर्पण के मूल तत्व पिरोए वरना कोई दिन आपकी चौखट से कोई किसी को अपने अहंकार में निगल जाएगा । अपने बच्चों को बचा लीजिये,उन्हें इंसानों जैसा बर्ताव करना सिखाइये और बताइये,अपराध की नियति दण्ड है, इससे कोई नही बचेगा,कोई भी नही । देश के कानून पर भरोसा रखिये, अपराधी के समर्थन में खड़ा होना,खुद को अपराधी बनाना है, यह बच्चों को सिखाइये । 

उस बेटी को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि,देश के संविधान और कोर्ट से उम्मीद है कि अपराधी को बहुत जल्द उसके किये की सज़ा मिल जाएगी । हमें भी आगे बढ़कर ऐसे अपराधी को अपने घरों में न पैदा होने देने के लिए सजग होना होगा । 

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Monday, October 26, 2020

गाँधी

जब उस्ताद जाग रहा होता है, तब शागिर्द को नीम गहरी नींद ले लेनी चाहिए,क्योंकि जब उस्ताद पाँव ज़मीन पर रखेगा,तो उसकी पहली थाप शागिर्द को ही महसूस करनी होगी और फिर उस शागिर्द को जागते हुए उस्ताद के बुने ख्वाब को पूरा करने के लिए आखरी सांस तक जगना ही होगा ।

गाँधी से मोहब्बत है, इसलिए नही की वह बड़े राजनैतिक कार्यकर्ता थे बल्कि इसलिए कि उन्होंने जिसे छुआ,उसमें खुद को डाल दिया । लोग जैसे थे,वैसे स्वीकारा, फिर जैसा चाहा, वैसा बनाया । गाँधी एक शानदार प्रयोगशाला थे,जहाँ इंसानों को इंसान बनाने की प्रक्रिया चलती थीं ।

गाँधी ने बताया नफरत का विकल्प और अधिक नफरत नही है, बल्कि प्रेम है । झूठ का विकल्प और अधिक झूठ नही बल्कि सच है । मक्कारी का विकल्प और अधिक धूर्तता नही है, बल्कि सरलता है । एक दिन ज़मीन थककर मानेगी की झूठ के सामने सच ही टिकेगा,नफरत के सामने प्रेम...
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Sunday, October 25, 2020

गणेश शंकर

मेरे लिए जिस तरह राजनीति में पंडित नेहरू लिटमस पेपर हैं, ठीक वैसे ही पत्रकारिता में गणेश शंकर विद्यार्थी हैं, इनसे ही हम दाएं या बाएं का फर्क देखते हैं, मेरे लिए गणेश जी का जीवन वही माप है, जिसपर रोज़ खुदको रखकर तौलते हैं और हमेशा कम निकलते हैं । गणेश जी के ज़िक्र उस दिल मे होने चाहिए जो अपनी मौत तक हिन्दू मुसलमान में एकता चाहते हैं । एक बात उनसे और सीखिए,नए लोगों को बढ़ाना,समझाना और सहारा देकर खड़ा करना,यह भी तो हम भूल चुके हैं ।

गणेश शंकर विद्यार्थी का आज जन्मदिन है ।1890 अक्टूबर 26 को जन्मे गणेश उस पत्रकारिता की लम्बी लकीर हैं जिसे अभी तक कोई पार नही कर सका ।गणेश शंकर कभी यह कहकर रोए नही और न ही लोगों को उकसाया की हमे मार दिया जाएगा । न ही वह चीखे चिल्लाए और न ही डरे।बेख़ौफ़,साफदिल गणेश उस कट्टर मुसलमानों की भीड़ में कूद गए जो उनके नाम से ही उन्हें खत्म करने को आमादा थी ।वह उन कट्टर हिन्दुओं में भी उतरे जो मुसलमानो के घर और दुकान जलाकर उनके लोगों को मार देना चाहती थी ।

गणेश जब कट्टरपन से पगलाई भीड़ के सामने थे,तब भीड़ ठहर गई । लोगों ने कहा गणेश भैय्या हैं रुक जाओ,भीड़ रुक गई और गणेश जी के लफ्ज़ सुनना चाहती थी मगर एक बार नफ़रत में दहक चुके लोग,भला कब रुकते,भीड़ के पीछे से किसी ने उनपर कोई  धारदार हथियार से हमला किया और भीड़ तीतर बितर हो गई,गणेश एकता और भाईचारा के पौधे को अपने खून से सींचने निकल गए ।

ख़ैर वह वक़्त निकल गया ।मारने वाले लोग नए आ गए तो मरने वाले भी नए आ गए ।गणेश शंकर को नमन की उन्होंने लिखने की ऐसी लकीर खींची जिसपर चलना सच्चे दिल की निशानी है । गणेश की मोहब्बत लम्बे अरसे तक हम जैसों को ताक़त देती रहेगी । हममें में से जो मर जाएँगे मगर शिकवा नही करेंगे ।जो मिट जाएँगे मगर अपनी माटी को शर्मिंदा नही होने देंगे । गणेश जी ने हमे सिखाया की हम सबके ख़ून से इंसानियत अगर खुशहाल हो तो मरना हमारा फ़र्ज़ हो जाता है... गणेश नमन आपको....
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Monday, October 19, 2020

रबीउल अव्वल

इस्लामी महीना रबीउल अव्वल का आगाज़ हो गया है । यह महीना पैगम्बर हज़रत मोहम्मद की दुनिया में ली साँसों के हिसाब की शिनाख्त का महीना है । जब हम लोग ठीक मुसलमान नही हुए थे,जब हम लोगों को कपड़े और दाढ़ी टोपी की जगह किरदार की शिनाख्त की तरबियत दी जाती थी,तब यह महीना हमारे घरों की ज़ीनत होता था ।

घर घर महीने की शुरुआत से ही रोज़ मीलाद होती थी । जिनमें पैगम्बर हज़रत मोहम्मद का दुनिया मे आना, दुनिया को समझना,दुनिया से सीखना और दुनिया को सिखाना और किरदार को तराशना घर घर मे सुनाया जाता था । यह खलिस ऐसा तरीका था जिससे कोई भी अपने पैग़म्बर के किरदार को समझ लेता,बच्चे और बूढ़े खुद को तरबियत दे लेते मगर फिर हमने तरक्की कर ली । फिर हम पढ़े लिखे मुसलमान हो गए और फिर यह फ़ालतू की रवायतों को घरों के जंग लगे सन्दूक में समेट कर रख दिया और एक रोज़ पुरानी छत ढह गई,उसमे सन्दूक समेत खूबसूरत रवायतें दबकर खत्म हो गई ।

मैं इस्लामी नुक्ते नज़र पर उंगली नही चलाना चाहता,मैं तो बस इस महीने की आमद पर बचपन के उन दिनों को याद कर रहा हूँ,जब तख्त पर मेरी नानी बैठी कुछ पढ़ती थीं और हम खीर खाने के ख्वाब देखते हुए,उनके पढ़ने को सुना करते थे । जब सुनकर उठते थे तो ज़ुबान पर खीर होती थी और ज़हन में शानदार तारीख़ दर्ज ही जाती थी । आज भी हमें मोहम्मद साहब का जीवन चरित्र पढ़ने की ज़रूरत नही पड़ी,क्योंकि हर करवट को सुनकर बड़े हुए हैं ।

मीलाद मेरे लिए वर्कशॉप थीं,ख़ैर इस महीने हम कोशिश करेंगे कि हज़रत मोहम्मद की ज़िन्दगी के तमाम बदलाव आपतक ला सकें । रेत में मोहब्बत की तस्वीर उकेर सकें । यह पूरा महीना उनके ज़िक्र का महीना है, हमें वह लोग ज्ञान न दें जो कहते हैं कि रोज़ ही उनके ज़िक्र के दिन हैं । कोई किसी का भी रोज़ ज़िक्र नही कर सकता अगर करता है तो वह इस दुनिया से हट चुका होता है, इसलिए आम लोगों के लिए खास दिन,खास महीने हमेशा बहुत खास ज़िक्र के रहेंगे ।

हम यहाँ इरके फिरके वाले ज़हन के कंगाल लोगों का ज़िक्र भी नही करते हैं । मेरा मानना है, हज़रत मोहम्मद एक वैश्विक चरित्र हैं । उनपर पूरी दुनिया का अधिकार है । उन्हें जैसे चाहे याद करे,यह कोई कुंद ज़हन नही तय करेगा । जिस तरह दुनिया को रोशनी देने वाली हर पर्सिनोलिटी से हम बेहतर चीज़े लेते हैं, मोहम्मद साहब से भी लेंगे,उन्हें केवल एक धर्म या एक क़ौम या एक फिरके या एक मुल्क की सीमाओं में कैद करना, उनके साथ ज़ुल्म है ।

रबीउल अव्वल की सभी को मुबारकबाद । हज़रत मोहम्मद की तबियत से ज़िक्र के महीने की मुबारकबाद । रौशनी का ज़मीन पर आना मुबारक....पैगम्बर हज़रत मोहम्मद पर बात कीजिये,मोहब्बत कीजिये,मोहब्बत ही मोहम्मद हैं, इससे डिगकर उनके नही रहोगे,इसलिए कोई भी तरीका अपनाओ,इकट्ठे हो और उनकी बात करो,भले ही वह मीलाद हो या कुछ और,ज़िक्र के रास्ते खोलो,ज़िक्र को रोको मत....
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Friday, October 16, 2020

नवरात्र

जिसमें प्रेम नही है, वह कैसे नवरात्र के पहले दिन की महिमा को समझेगा । जिस हृदय में प्रेम,त्याग और सहिष्णुता है, वह ही तो पवित्र नवरात्र के योग्य हृदय है, क्योंकि इसकी शुरुआत ही उन शैलपुत्री से होती है जो कहती हैं,

हे शिव तुम्हे पता है की पिता जी ने एक बहुत बड़ा यज्ञ रखा है।हमे नही बुलाया।सती अपने पति शिव को अपने पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ में न बुलाए जाने पर ग़म में थीं।सती ने शिव से पूछा की चलो हो सकता बुलाना भूल गए हों,तो हमे जाना चाहिए की नही।शिव मना कर देते हैं।सती के दिल को करार नही आता।माँ,बाप,बहनो से मिलने की तड़पन सती को बेचैन कर देती है।उन्हें शिव का इनकार तोड़ देता है।इस क़दर ख्वाहिश को देख शिव जाने को राज़ी हो जाते हैं।सती की एक एक मुस्कान शिव के लिए ख़ुशी थी।

दोनों साथ पिता प्रजापति दक्ष के यहाँ जाते हैं।मगर वहाँ तो माहौल ही उल्टा।कोई सीधे मुँह बात ही नही कर रहा।दक्ष ने शिव से मुँह फेर रखा।नाराज़गी की इन्तेहाँ की बेटी सती पर भी कोई ध्यान नहीं।बहनें बोली बोलने में लगीं,शिव का मज़ाक उड़ाया जाने लगा।सती से पति शिव की उछलती इज़्ज़त देखि न गई।एक बेटी बाप का क्या करती।एक बहन दूसरी बहन को क्या जवाब देती।सती चाहती तो सबको एक झटके में खत्म कर देती।मगर नहीं, उसने अपने आप को खत्म कर लिया।अपने आप को भस्म कर डाला।शिव अपनी सती का यह हाल देख नही सके और एक झटके में दक्ष के सारे अमले जमले को खत्म करके सती के गम में डूब गए।

सती ने योगाग्नि से ख़ुद को खत्म कर लिया।अपने तप से शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में अगलाजन्म लिया।इस बार वे “शैलपुत्री”के नाम से मशहूर हुईं।
शिव की मोहब्बत में इतनी ताक़त थी की सती फिर से उनके साथ रहीं।इस नयी ज़िन्दगी में भी वोह शिव की पत्नि बनीं।यही शैलपुत्री ज़मीन के सभी चरिंद, परिन्द,शजर हजर के लिए हिम्मत बनीं।लोगों ने उन्हें पूजा।उनकी मूर्तियाँ जँगल,जानवर,इंसान सबकी हिफाज़त की पहचान बनी।इन्ही शैलपुत्री की पूजा से ताक़त,सब्र,हिम्मत,मोहब्बत,बुराई के ख़ात्मे और अच्छाई के जश्न नवरात्र की शुरआत होती है।

सिर्फ इतना मानना भर है की जो भी धागा तुम्हे जोड़ सके,उसे पकड़ो।जो भी डोर तुम्हारे सबके दिलों को थाम सके,उसे मज़बूत करो।अपने इर्द गिर्द रह रहे हर इंसान की खुशियों में वजह ढूँढो, उन्हें महसूस करो और उसे सेलिब्रेट करो।उनके गम को देखो,मायूसी को पकड़ो और सहारा दो।कोई भी त्यौहार बेवजह नही है।कोई भी लोग बेवजह नही हैं।किसी की भी संस्कृति फ़िज़ूल नही है।हर एक में मोहब्बत है।उसे ज़िंदा रखो।

आज से नवरात्र शुरू हो रहे हैं।मां शैलपुत्री हम सबको एक साथ मुस्कुराता हुआ देखना चाहेंगी, न की अपनों का ख़ून बहाते।अगर अपनों का ख़ून बहाना होता तो सती की कहानी कुछ और ही होती और पवित्र नवरात्र की शुरआत कुछ और होती ।

 यदि तुम्हारे हृदय में वास्तव में उनके लिए मां का स्थान है, तो धरती पर मौजूद हर इंसान में उनके बच्चों की अनुभति करो और मां को उसकी सभी औलादों से बराबर का प्रेम करके उपहार दो,एक माँ अपने बच्चों को प्रेम में देखना चाहती हैं, नफरत में डूबे बच्चे मां के लिए अभिशाप हैं, इसलिए प्रेम करो और प्रेम फैलाओ ।आज पहले दिन से सीखिये और मोहब्बत को फ़िज़ाओं में घोल दीजिये।नवरात्र की खूब मुबारकबाद....
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Wednesday, October 14, 2020

कलाम की सालगिरह

डॉक्टर अब्दुल कलाम एक औसत व्यक्ति थे । उनसे अच्छे अच्छे क़ाबिल वैज्ञानिक हुए हैं । उन्हें ज़बरदस्ती सर पर चढ़ाया जाता रहा है । वह ओवररेटेड हैं । धर्म के मामले में वह खाली थे । डॉक्टर कलाम को जबरदस्ती इतने ऊँचे स्थान पर बैठाया जाता है जबकि वह इसके बराबर के थे भी नही,सैकड़ो कहानियाँ हैं, जो बताती हैं कि यह चरित्र केवल गढ़ा गया है, बुद्धिजीवीयों में उनकी गड़ना बहुत कमज़ोर है । 

यह बातें हमारे इर्द गिर्द अक्सर घूमती रहती हैं । लोग कलाम की चर्चा होने से उनमें कीड़े निकालते हैं और चर्चा न होने में भी कीड़े ही निकालेंगे । कुछ लोग मक्खी सिफत के होते हैं, गन्दगी ढूंढकर उसपर ही बैठते हैं । ऐसे ही लोग कलाम में कमियां ढूंढते हैं, फिर उसे अपने पैरों से दूसरे घरों तक फैलाते फिरते हैं ।

कलाम के वैज्ञानिक पक्ष पर हम नही जाते,न ही राजनीति की परत को खोलेंगे,हम सिर्फ इतना कहेंगे कि जिस एकता और भाईचारे की बातें हम।सब करते नही थकते हैं, क्या उसकी जीती जागती मिसाल नही थे डॉ अब्दुल कलाम । एक ही जिस्म में सभी धर्मों के मूल को समेटे सादी ज़िन्दगी नही गुज़ार रहे थे कलाम । जाओ और कोई ऐसा किरदार इतनी ऊँचाई पर बैठा ढूंढकर लाओ,जिसकी ज़ुबान,दिल,किरदार और काम में यकसा चाल हो । जिसमें प्रेम हो,जिसमे समर्पण हो,जो सिर्फ जोड़ने के लिए जाना जाता हो,जिसके रहने से कोई भी खतरा न महसूस करे,जिसके जाने से उस सड़क पर हमेशा हमेशा के लिए सन्नाटा हो जाए ।

आज डॉक्टर अब्दुल कलाम का जन्मदिन है । रामेश्वरम से उठे और रामेश्वरम में ही सो चुकी इस शख्सियत के बीच के हिस्से को दुनिया हमेशा याद रखेगी । कोई उनकी आलोचना में किताबें भर दे या कोई भी उनकी तारीफ में लाइब्रेरी भर दे,दोनों उनके नज़दीक बेकार हैं तबतक,जब तक उनके खुद के किरदार में यह लिखा पढ़ा झलके न । डॉ कलाम किरदार से मज़बूत इंसान थे । राम और अल्लाह को एक ज़ुबान पर ही नही बल्कि एक दिल मे बसाने वाले व्यक्ति थे । कृष्ण और खुसरू को अपनी धड़कन में पिरोने जानते थे और दुनिया की सबसे मासूम क़ौम में भरपूर जगह रखते थे । यह क़ौम थे,बच्चे । बच्चे जिसे मोहब्बत करने लगे,बच्चों को जो मोहब्बत करने लगे,समझ लो कि अबयहाँ मक्कारी नही बल्कि हृदय की पवित्रता का जादू चलेगा ।

मैं अपनी मुलाकातों का ज़िक्र नही करता हूँ मगर यह अनुभव ज़रूर बता सकता हूँ कि आजतक मिली हर शख्सियत से उनका मिलना सबसे अलहदा और सबसे पवित्र था । आज उनका जन्मदिन है, सिर्फ इसलिए लिख रहें कि जिस चश्मे से उन्हें देखिएगा,उसी चश्मे से हर उसको देखिएगा,जिसे आप मानते हैं । अगर राजनीति में कोई डा कलाम से बीस होगा तो सरलता में सत्तरह ही होगा, कोई विज्ञान में बीस होगा तो सच्चाई में अठ्ठारह ही होगा । कलाम हो सकता है हर ओर अठ्ठारह ही हों मगर जिधर हैं, तो उधर मज़बूत हैं ।

मैं हमेशा उसे ही लीडर मानता हूँ जो बहुत सारे विषयों में दखल रखता हो,जो बहुत तरह के काम कर सकता हो,जिसकी आंखों में घोड़े वाली पट्टी न बंधी हो, जो उसे एक ही दिशा में दौड़ाए,मेरा लीडर हर दिशा में दौड़ने वाला होगा, भले वह सेकंड या थर्ड आए मगर उसकी मौजूदगी हर ओर हो और ऐसी खूबी वाले डॉ कलाम ही वह आखरी व्यक्ति थे,जिनसे हमने हाथ मिलाया था । इंतेज़ार है कि कोई तो आए, जो बैठे तो विषय की बाध्यता न रहकर उसका वजूद बोलता रहे,कलाम ऐसी ही भरपूर शख्सियत थे ।

 आजकल तो आप बहुत बहुत याद आते हैं, जब जब प्रेम कमज़ोर होगा, कलाम की ज़रूरत बढ़ती ही चली जाएगी,कलाम प्रेम में ज़िन्दा रहते हैं और प्रेम के खत्म होने पर प्रेम को लाने के लिए उठ खड़े होते हैं,कलाम मरा नही करते हैं....
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Friday, August 14, 2020

आज़ादी स्पीकिंग ट्री

आजके नवभारतटाइम्स में मेरा स्पीकिंग ट्री....

आज़ादी,जिसके लिए लोग मर मिटना पसन्द करते हैं । क्या यह एक शब्द भर है,बिल्कुल नही क्योंकि एक शब्द के लिए कोई अपने घर आँगन के मिट जाने तक नही जूझा करता है । आज़ादी,एक स्वयं में एक जीवन है, जिसे पाने के लिए इंसान कुछ भी करने को तैयार हो जाता है । आज़ादी से पहले भी एक जीवन होता है, आज़ादी के बाद भी एक जीवन होता है, जिसने पहले वाला जीवन जिया है, वह हमेशा लड़ेगा दूसरा जीवन पाने के लिए और जो दूसरा जीवन ही जी रहा,उसे हमेशा लड़ना होगा इसे बचाए रखने के लिए,क्योंकि यह एक ऐसा शिखर है, जिसपर बहुत कठिन तपस्या के बाद ही पहुँचा जा सकता है ।

हमें लगता होगा कि यह आज़ादी किसी राजा से चाहिए,कोई समझता है कि विदेशी सत्ता की पकड़ से निकलना ही आज़ादी है । कोई कोई यह भी समझता है कि हमारे मन के ठीक विपरीत लोगों की हुक़ूमत की जकड़ से निकलना ही आज़ादी है । वास्तव में क्या यह आज़ादी है या एक जाल से निकलकर दूसरे जाल में फँसने का भरम है । आज़ादी भला है क्या ।

आध्यत्म कहता है, सभी बुराइयों से मुक्ति ही आज़ादी है । तमाम मोह से निकलना ही आज़ादी है । संकीर्णता और असहिष्णुता को त्यागना ही आज़ादी है । वास्तव में हृदय की विशालता ही आज़ादी है, क्योंकि जिस हृदय में भय होगा,जो हृदय जंजीरों से जकड़ा होगा,जो हृदय अपने मन की बात कहते हुए घबराएगा,वह आज़ाद ही कहाँ हुआ है । 

आध्यात्म आत्मा की स्वतंत्रता पर बल देता है । यह सच है, हम जब किसी से आज़ादी माँग रहे होते हैं, तब हम असल मे उसकी बुराइयों से ही आज़ादी माँग रहे होते हैं । भले ही वह कोई राजा हो या शासन सत्ता,असल मे हम उसकी बुराई से व्यथित होकर ही तो उससे मुक्ति चाहते हैं । हम इसे महसूस भले न कर सकें मगर वास्तव में हमारी आत्मा दुःखी होती है और वह इसके विरुद्ध संग्राम करने की इच्छाशक्ति देती है । इंसान कभी भी अच्छाइयों से आज़ादी नही चाहता है, बल्कि बुराइयों से आज़ादी के लिए लड़ता है ।

हम जिस धरती पर हैं, उसमें भी समय समय पर आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई मगर यहाँ हमारे बुजुर्गों ने बताया कि हम सिर्फ सत्ता परिवर्तन के लिए नही लड़ रहे हैं । हम वास्तव में मानव जीवन के उत्थान और सत्यमार्ग की स्थापना का संघर्ष कर रहे हैं । हम आज़ादी कुछ सालों के संघर्ष में पा सकते हैं मगर तमाम बुराई से आज़ादी का जो संघर्ष है, वह लंबा चलता है और हमे लंबे रास्तों से घबराना नही चाहिए क्योंकि दीर्घ उन्नति और शांति उसी में छिपी हुई है ।

बहुत मामूली सी बात है कि यदि आपके हृदय में आपके अपने भाई के लिए कटुता है, तो आपको चाहे जो आज़ादी दे दी जाए,आप कभी निर्माण नही कर सकेंगे । जब आपको कटुता से आज़ादी मिल जाएगी,तब आप ऐसी नींव रखेंगे जिनपर महल के महल खड़े किए जा सकें । इसलिए कहा जाता है, पहले अपनी बुराइयों से आज़ादी के लिए संघर्ष करो । खुद बुराइयों से जकड़कर कोई आज़ाद हो ही नही सकता है । हमारे पूर्वजों ने हमेशा उदाहरण दिए हैं, उन्होंने अपने दिलों को बड़ा किया,उसमे सबके सम्मान को जगह दी,सबको बढ़ने का मौका दिया,अन्याय और असत्य के विरुद्ध संघर्ष किया और एक ऐसी ईमारत खड़ी की जिसपर संसार ने अपना खूब प्यार उड़ेला । यह सब वह अपने अंदर की बुराइयों से आज़ादी के बिना नही कर सकते थे ।

बुद्ध कहते हैं, अपने अन्दर की यात्रा करो । कृष्ण कहते हैं, अपने अन्दर झाँको, मोहम्मद अपने अन्दर की आवाज़ को बाहर रखने के पक्षधर रहे हैं । यह कैसे सम्भव है, जब आपके अन्दर बुराइयाँ हों । हर एक इशारा ही तो कर रहा कि अपने अन्दर झाँको और कमियों से मुक्ति पाओ । जब तुम बिना किसी बाधा के,बिना किसी अवगुण की गुलामी के,अपने अन्दर की यात्रा कर सकोगे,तब ही तो तुम्हारे चेहरे पर तेज अपनी छटा बिखेरेगा । 

सत्य,न्याय,भाईचारे की स्थापना के लिए,असत्य,अन्याय और अलगाव से आज़ादी आवश्यक ही नही बल्कि धर्म है । एक इंसान अगर अपने अन्दर की बुराई से आज़ाद हो जाए,तो वह आज़ाद समाज की रचना करेगा । बुराइयों की ग़ुलामी से जकड़ा इंसान कभी भी आज़ाद समाज नही बना सकेगा । क्योंकि कभी न कभी उसकी बुराइयों के हित किसी से टकराएगा और वह अधर्म मार्ग पर पहुँचेगा । दो अच्छाइयाँ कभी आपस मे टकरा नही सकती मगर दो बुराइयाँ कभी न कभी ज़रूर आपस मे टकराएंगी,इसलिए इनके मूल से आज़ादी ही हमारा ध्येय होना चाहिए । आध्यात्म की ऊँचाई पर वही पहुँचा है, जिसने तन मन की बुराइयों से स्वतंत्रता पा ली हो,जो इसमें फंसा हुआ है, उसे अपने अन्दर की आज़ादी के लिए निरन्तर संघर्ष करते रहना चाहिए,जब तक सभी बुराइयों पर विजय न प्राप्त हो जाए ।
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Sunday, August 9, 2020

धर्म तो यही है

शुरू शुरू में जब धर्म आते हैं, तब समन्दर होते हैं,अपने प्रवर्तक की छाँव में उस धर्म की तमाम खूबियाँ हवा में बिखर रही होती । वह विशाल हृदय के समन्दर हर एक को अपने में समा लेने का हुनर रखते हैं ।

फिर धीरे धीरे यह समन्दर बहकर नदियों में बदल जाते हैं ।उसके बाद यह तालाब में बदलते हैं ।फिर यह नालियों में बदल जाते हैं और एक वक़्त के बाद यह नालियों में सड़ते हुए कीचड़ में बदलकर अपने अंदर की बदबू से हर एक को नाक पर रुमाल रखने को मजबूर कर देते हैं ।

यह भी है की नालियाँ सदैव अपने समुद्र रूप का बखान करती हुई बदबू छोड़ती रहती हैं । वह बोलते हैं की प्राचीनकाल से ही हमारा हृदय विशाल और सहिष्णु रहा है, यह ज़रा कुछ लोगों के चक्कर में हम ख़ून चख भर लेते हैं, वरना हम तो सदैव शाँति प्रिय ही रहें हैं । कोई बोलता मेरा मज़हब तो भाईचारे,त्याग और शांति का परचम है मगर क्या करें विरोध को तो कुचलना ही पड़ता है और यह कहते हुए हर धर्म के लोग खुद के नाली रूप पर चादर ढककर समन्दर होने का झाँसा देते रहते हैं । इनमें से कोई भी समुंदर रूप की खूबियां खुद में नही लाना चाहता बस समंदर रूप पाने के लिए खून बहाने को बेचैन रहता है, वह जानते हैं कि वह अब नाली बन चुके हैं, जिसमें खून बहाकर वह लोटते रहना चाहते हैं, यह सभी जानते हैं कि इनकी नालियों में इनके महान प्रवर्तक कभी नही आएँगे,क्योंकि समुद्र हृदय नालियों में समा भी नही पाएँगे ।

छोटे दिल के बड़े लोग कभी धर्म को बढ़ा नही सकते,बल्कि उसे घिनौना ही बना सकते हैं । बड़े दिल के लोग ही तो धर्म की सुंगन्ध फैलाते हैं, जिनको अब यह नालीनुमा लोग न सुनना चाहते हैं न ही उनकी बात करना चाहते हैं । एक दिन नालियाँ चोक होंगी मगर समंदर बेलौस शांत अपनी जगह उनका इंतेज़ार करता रहेगा,जिनका हृदय इतना छोटा नही की किसी दूसरे के खड़े भर हो जाने से चोक हो जाए....
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Saturday, August 8, 2020

अगस्त क्रांति और आजका समय

जब मन टूटने लगे,यह लगने लगे कि समाज बर्बादी की तरफ निकल चुका है । सत्ता बेशर्मी का चोला ओढ़ चुकी है । अन्याय और अधर्म अहंकार के हाथ पैर बनकर आमजन पर टूट पड़े हों । आपको सच बात कहने पर ही खींच कर मार दिया जाए । आपके विरोध के स्वर को सलाखों के पीछे सड़ने के लिए भेज दिया जाए,तब भी मेरा एक मंत्र याद रखना,निराश मत होना,क्योंकि तुम्हारी निराशा और हताश सूरत ही तो किसी भी आक्रांता की विजय है । यह बात तुम आज के दिन यानि अगस्त क्रांति दिवस से सीखना ।

जब बड़े बड़े राजा महाराजा,जिनके पास सेनाएं थीं,दौलत थी,लोग थे और दस दस आदमियों से ऊँची दीवारों के महल कोठियाँ थीं,उन्हें भी लगता था कि वह अंग्रेज़ों को हटा नही पाएँगे । वह मन से हारे और हताश बड़े बड़े लोग थे । उनके पास जीतने की इच्छाशक्ति ही नही थी ।

दूसरी तरफ थे वह जिनके पास महल नही थे,सेनाएँ नही थीं,इतनी दौलत नही थी की बेतहाशा बहा सकें,मगर इसी के साथ उनके पास न निराशा थी और न ही उनके चेहरे पर हताशा का डेरा था,उन्हें खुदपर यक़ीन था कि वह अंग्रेज़ों को अपनी चौखट से हटा देंगे ।

यह लोग थे गांधी,कस्तूरबा,नेहरू,सुभाष,मौलाना आज़ाद जैसे जिनको जेल में सड़ना तो मंज़ूर था मगर हताश होना कतई नही मंज़ूर था । नारे हवा में उछाल दिए गए,"अंग्रेज़ों भारत छोड़ो" और लोग बोल उठे "करेंगे या मरेंगे" । जन जन सन 42 के इस आंदोलन में जुट गया और अहंकारी सत्ता ने भरपूर सितम ढाना शुरू किया मगर इन स्वतंत्रता सेनानियों पर पड़ने वाली हर लाठी अंग्रेज़ सत्ता के पैरों पर ही पड़ती,यह चोट थी तो गाँधी की काँग्रेस के सेनानियों की पीठ पर मगर खाल उतर रही थी अंग्रेज़ी हुक़ूमत की और देखते देखते कुछ ही सालों में वह अहंकारी सत्ता डूब गई,जिसके राज में सूरज नही डूबा करता था ।

अगस्त क्रांति में चोटी के सारे कांग्रेसी और समाजवादी नेता जेल की सलाखों में थे । दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं ने आंदोलन की डोर संभाली और जनता के सहयोग से क्रांति आंदोलकारियों के अड्डो से घर घर पहुँच गई । आम किसान,नौजवान,मज़दूर, ज़मींदार सब जुट गए और भिड़ पड़े उस सत्ता से जो ताक़त में हज़ार गुना ज्यादा थी उनसे ।

इन सब दिनों का इतिहास आखिर हम क्यों पढ़ाते हैं । आखिर हम क्यों बताते हैं कि देखो हमारे बुजुर्गों ने कितना संघर्ष किया है । हम आपको इतिहास का विद्यार्थी नही बनाना चाहते,बस कहना चाहते हैं कि जब आप अन्याय और अधर्म देखेंगे,संविधान पर चोट होते देखेंगे,तब आपमें इसके विरोध का साहस होना चाहिए । बिना यह सोचे कि सामने वाला अंग्रेज़ हुक़ूमत की तरह अभेद्य है ।

अगर हमारे पूर्वज उस हुक़ूमत की ताकत,ज़ुल्म और खुद मिट जाने से डरते तो यकीन जानो अगस्त क्रांति होती ही नही । लोग जेल गए,उनके घरों की कुर्की हुईं,उन्हें सख्त सज़ाएँ मिली,घर परिवार वाले बर्बाद हुए,बच्चों के सर बाप का साया छीना गया,खाने का अनाज छीनकर जला दिया गया,कपड़ों को आग में झोंक दिया गया,दीवारें चिटखा दी गईं,मगर वह न डिगे,न रुके,न निराश हुए,न ही हताश हुए और आखिर अहंकारी सत्ता ख़ुद घुटनो के बल आई ।

अगस्त क्रांति और उसके नेतृत्व को ज़रूर देखिये,उनको भी खोजकर पढ़िए जिन्होंने उस समय इस क्रांति के विरुद्ध अंग्रेज़ों के दरवाजे के ब्रेड एंड बटर को तरजीह दी थी । जो जेल की सख्तियों के विरुद्ध आराम देह ज़िन्दगी के लिए क्रांति से धोखा कर रहे थे ।

यह भी जानिएगा की इसी क्रांति में जेल जाने के बाद किसने अपने परिवार को जेल में मरते हुए देखा था । सदी की सबसे खूबसूरत पति पत्नी की जोड़ी में कस्तूरबा को बिछड़ते देखा था । सबसे समर्पित सहायक महादेव देसाई को ज़िन्दगी से पिछड़ते देखा था । पढ़िए,तब जानिएगा आज बेलौस दहाड़ने के लिए कल कितना संघर्ष किया गया और इसके लिए किसने कुर्बानियां दिया ।

अगस्त क्रांति की देशवासियों को बधाई । बस इससे सीखियेगा की असत्य,अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध बोलते वक़्त घबराइयेगा नही और विपरीत से विपरीत माहौल में निराश मत होइएगा वरना हमारे बुजुर्ग मायूस होंगे,जो तमाम सख्तियाँ झेलते हुए नही टूटे वह हम जैसों को टूटा हुआ देखकर ज़रूर टूट जाएँगे । हिम्मत रखिये,हर अन्याय,हर अहंकार का एक ही परिणाम हुआ है कि उसका नामलेवा कोई नही रहा । अगस्त क्रांति अमर है ।

Sunday, August 2, 2020

रक्षाबंधन

जो बहन कमज़ोर हो तो भाई उसकी मज़बूती बन जाए । जब भाई कमज़ोर हो तो बहन उसकी मज़बूती बन जाए । जब भाई बहन कमज़ोर हों तो परिवार उनकी मज़बूती बन जाए । जब परिवार कमज़ोर हो तो समाज उनकी मज़बूती बन जाए । हमें ऐसे ही तो रक्षाबंधन मनाना होगा । यह ज़रूरी नही की हमेशा बहन की रक्षा ही ज़रूरी है, बहुत बार बहन भी भाई की रक्षा ज़्यादा बेहतर कर सकती हैं ।
हाथों पर बंधने वाली राखी दोनों को बराबर कर्तव्य और अधिकार देती है । इनमें से जिसे भी रक्षा की ज़रूरत होगी,दूसरा उसके सामने अपने को हमेशा समर्पित करेगा ।

सभी त्यौहारों में सबसे पसंदीदा त्यौहार है रक्षाबंधन । इसमें एक डोर है, जो परिवार को जोड़ती है, एक धागा है, जो परिवार को बुनता है । एक खलिस मोहब्बत में डूबी रस्म है, जो कहती है, अपनी जान की बाज़ी लगा दो मगर इस बंधन में बंधे रिश्ते और इंसान को बचाने से पीछे मत हटो ।

रक्षाबंधन हमसे कहता है, जिसको ज़रूरत पड़े उसके लिए आप मज़बूती से खड़े हो । यह भाई का बहन के लिए खड़ा होना पहली व्याख्या तो हो सकता है मगर दर्शन कहता है कि जो कमज़ोर हो,जिसे ज़रूरत हो,उसके लिए वह खड़ा होए,जो मज़बूत है । कमज़ोर और मज़बूत भाई बहन दोनों हो सकते हैं, इसलिए इसको और बड़े नज़रिए से देखें और जाने,ज़रूरत पर हमें अपना कर्तव्य निभाना है, चाहे हम बहन हों या भाई ।

आप सबको रक्षाबंधन की बहुत बहुत बधाई । ईश्वर यह बीमारी भरा कोरोनाकाल जल्द खत्म करे, प्रार्थना । इस रक्षाबंधन हम सबकी एक राखी समस्त देश को भी होनी चाहिए । जहाँ जो भी देशवासी कमज़ोर और असहाय हो,उसकी मदद और उसे सेहत के साथ ज़िन्दा रखने का हम सभी समेत हर मज़बूत व्यक्ति का कर्तव्य है । एक दूसरे के साथ खड़े होइए । बिना रँग,जाति,धर्म,वर्ग के भेद के रक्षा का एक धागा उनसे बंधवा लीजिये,जिन्हें आपकी ज़रूरत है ।

सभी लोगों को रक्षाबंधन की बहुत बहुत बधाई💐💐💐
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Sunday, July 26, 2020

कलाम पुण्यतिथि

मौत ऐसी की मन ललचाए,ज़िन्दगी ऐसी की मिसाल बन जाए । एक इंसान,जिसका प्रारम्भ से अंत तक सब ऐसा,जैसे किसी ने बहुत सलीके से बुना हो,जैसे कोई महान इंसान को बनाने के सारे तत्व एक जगह,एक जिस्म में करीने से पिरो दिए गए हों । यही तो थे मेरे कलाम । आपको अब याद ही कर सकते हैं ।

कई दिन से कुछ भी लिखने का खास मन ही नही कर रहा,मन उचाट सा है,रह रह के आपकी ही याद आ रही थी। रह रह के भविष्य की धुँधली तस्वीर मन को बेचैन किये हैं । सबको याद है,यही 27 जुलाई थी की आप एक झटके में हमे छोड़ गए । वह नज़ारा जितना दर्दनाक था उतना ही खूबसूरत भी,भला मौत कब हमे हमारी मर्ज़ी की मिली है, आपतो चाहते ही थे कि आखरी साँस विद्यार्थियों के बीच लें और ईश्वर ने जैसे आपके लिए करीने से मौत के दरे ख़ुद बिछाए हों,जहाँ से आहिस्ता से वह आपको बुला ले और मुस्कुराते हुए आप चल दें और हम सब भीगी आँखों से यह सफर देखते रह जाए ।

जब आपसे मिला था तो यक़ीन नही था की उन यादों को इतनी बार लिखना कहना पड़ेगा।मेरे पास कुछ नही है की मैं आप पर बड़े बड़े प्रोग्राम कर पाऊँ।मैं सिसक कर रहा जा रहा हूँ की आज मेरे सबसे बड़े अध्याय की पुण्यतिथि है मगर मैं खुद उसको याद नही कर पा रहा हूँ।गुज़री रात आपके तस्वीर के साथ गुज़री थी।इतनी बार उसपर हाथ फेरा था की उंगलियो को आपके उलझे बाल महसूस होने लगे थे।

मैं पिछले कई दिन से आपसे मिलता रहा हूँ।आपकी छोटी छोटी आँखे मुझे बड़ा परेशान करती हैं।जब मैं कहता हूँ की कुछ नही हो सकता हैं तब आप सख्त हो जाते हैं।मुझे कामचोर कह कर डाँटते हैं।मैं फिर खड़ा हो जाता हूँ।कलाम साहब,नही नही मेरे कलाम,आज आपको सब याद करेंगे।इस याद के सिलसिले में मुझ गरीब की याद बड़ी मामूली सी,फीकी सी है।लेकिन हमे पता है आप सारा लावलश्कर छोड़कर मेरी यादों में ही आएँगे।डॉक्टर साहब मैं कह नही सकता आप महसूस तो कर ही रहे होंगे की हमे क्या चाहिए।आपके जाने के बाद हम सब बेहद अकेले हो गए हैं।इस अकेलेपन ने हमे अक्खड़ और बदतमीज़ बना दिया है।आज जब आप मेरे पास आइयेगा तो हमे बताइयेगा दिल मासूम कैसे होता है।हमे मिज़ाइल नही जाननी, हमे बताइयेगा मोहब्बत कैसे होती है।

हमे उड़ने की नही पहले चलने की ट्रेनिंग दीजियेगा।आपका 2020 के भारत का सपना धुन्धला न हो इसलिए हम सब लाइन लगाएं खड़े हैं।इन खड़े लोगों को एक साथ मोहब्बत से खड़े होने की दुआ दीजिये कलाम।कलाम मैं, हाँ मैं, बिलकुल अकेला,टुटा हुआ हूँ।बस एक आप हैं जो ऊपर से मुझे जोड़े हुए हैं।आखरी बात या तो वापिस आ जाइये नही तो हमे बुला लीजिये।मुझपर 27 जुलाई कयामत की तरह गुज़रती है।मैं बर्दाश्त नही कर पाता हूँ यह दिन। मुझे जीने नही देता आपका 2020 वाला सपना,कहाँ आप और हम दुनिया को वह भारत दिखाना चाहते थे,जिसे दुनिया गर्व से देखे,कहाँ हमारी नाव फिर से हिन्दू मुसलमान की मंझदार में फंस गई हैं ।

आपके एक से एक मानने वाले देखे,कड़वे से कड़वे आलोचक भी देखे मगर यह सभी भी तो सुंदर भारत बनाने में आपके साथ थे,अब यह एक दूसरे से धर्म देखकर प्यार या नफरत करते हैं । 2020 जिसमे हमे उड़ना था,हम रेंगने लगे हैं । जो चाल हमे मिलकर तेज़ दौड़कर पार करनी थी,वह हम अब उल्टी दौड़ में शामिल हो चुके हैं । हमें भविष्य का भारत बुनना था,हम भूतकाल का भारत ढूंढने में व्यस्त हो चुके हैं । हमें आज की गलतियां सुधार कर भविष्य सुन्दर करना था । हम भूतकाल की गलतियां खोजकर आज को चकनाचूर कर रहे हैं ।

देख तो कलाम आप भी रहे होंगे । खुशी हुई कि इतने कठिन वक़्त में आप नही रहे,क्योंकि यह तक़लीफ़ आपको खोखला कर देती । न्यूज़ चैनल देखकर ही आप मर जाते । मुँह से आग उगलती ज़ुबाने देख अग्नि की उड़ान को जलाकर राख कर देते ।

आज याद तो सभी करेंगे मगर आपके रास्ते पर होगा ही कौन । अब कितने दिल बचे हैं, जिनमे राम और अल्लाह साथ रह सकें । आज तो सबसे बड़े खतरे में वही लोग हैं, जो सबकी बात करते हैं, जिनका दिल किसी एक मज़हब की डोर से नही बंधा,वह ही तो आज निशाने पर हैं । आज तो कोई मनचला आप पर भी अपने मन की गंदगी उछाल देता,जब आप बोलते की मिल जुलकर रहो, सेक्युलरिज़्म आपके मुंह से निकलता और सैकड़ो मुँह आपको भर भर कर ट्रोल कर रहे होते । 

आप जरूर मरना पसन्द करते यह सुनकर की कोई एंकर राष्ट्रीय मीडिया में प्राइम टाइम पर बैठकर खुद को कम्युनल कहे और इसपर गर्व करे । यह सब हम देख रहे हैं, यही हमारी सज़ा है कलाम और यही आपका पुण्य की मनहूस दिन देखने से पहले चले गए । बस यही प्रार्थना की यह दिन सुधरे वरना हम ही सिधार जाएँ और आपके पैतयाने बैठकर 2020 के भारत पर पेंसिल फेरते फेरते रोते रहें...नमन नही कहेंगे, क्योंकि कलाम मरा नही करते हैं, जब तक सपना अधूरा है, तब तक कलाम जा भी नही सकते....
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Tuesday, July 21, 2020

शीला दीक्षित

अस्पताल में अपने सीरियस मरीज़ के साथ वक़्त काटना कितना मुश्किल है।सब बाहर इंतज़ार कर रहे हैं और मरीज़ अंदर सबका इंतज़ार। यह वह वक़्त है जब पूरा परिवार एक साथ इकट्ठे होकर परेशानी का मुकाबला करने की कोशिश कर रहा है।उसी वक़्त वहीं से एक लाश को अस्पताल के कर्मचारी ले जा रहे हैं। उस गुज़रे हुए इंसान के साथ के लोग पीछे पीछे रोते बिलखते निकलते हैं। ऐसे में हमारे साथ के भी लोग रोने लगते हैं। मेरे अपने ऐसे रोते हैं जैसे कोई अपना निकल गया हो।इस तरह जितनी लाशें जाती हैं वह सब हमारे लोगों को रुलाती जाती हैं।

इनकी चीखें, इनका सिसकना, इनकी टूटन हमें मज़हब,राज्य,जाति, दल को जाने बिना रुला देता है।जानते हैं यह कौन रुला रहा होता है।यह होती है संवेदना।जो हमे हमारे लेटे मरीज़ से जोड़कर ,उसे खोने का एहसास पैदा करती है। हर जाती हुई लाश हमे खोखला करके जा रही होती है।मेरे साथ मौजूद हर कोई, गुज़रती लाश पर या तो रो रहा था या आँखे चुराकर इधर उधर देख रहा था। यह एक अंजान डर होता है जो हमें रुलाता रहता है।

अस्पताल हमे बहुत कुछ सिखाता है। ज़िन्दगी से लड़ना,ज़िन्दगी के लिए लड़ना दोनों चीज़ें सिखाता है।बगल के बेड पर मौजूद मरीज़ का दर्द दिखता है ना की उसका धर्म। मरीज़ को डॉक्टर सिर्फ डॉक्टर दिखता है ना की उसमे धर्म। जब परेशानी सर पर होती है तो लड़कपन के सारे चोचले अस्पताल के गेट के बाहर रह जाते हैं। ताउम्र कट्टर से कट्टर रहा आदमी अपने मरीज़ के लिए जब ख़ून ढूंढता है तब अपनी ज़बान की बनाई सारी सीमाए तोड़ देता है। तड़पते हुए मरीज़ के लिए दुआओं के बन्धन भी टूट जाते हैं। मैं अस्पताल के एक कोने में खड़ा दूर से मायूस से इंसान को देखता हूँ।दीवार से सर लगाए अपने मरीज़ के साथ सामने वाले के लिए भी दुआ खुद बखुद निकल जाती है।पड़ोस के वार्ड में झांकता हूँ तो देखता हूँ एक हनी सिंह टाइप नौजवान किसी बूढ़े की पेशाब की थैली बदल रहा है।यह वह दृश्य था जो हमे एहसास कराता है की दर्द और ज़िम्मेदारी क्या होती है।दूसरे बेड पर बैठे उस अधेड़ को भी देखता हूँ जो शायद पत्नी पर रोज़ रौब गांठता रहा होगा मगर आज मासूम बच्चे की तरह उसके हाथ से दाल पी रहा है।

यह जो अस्पताल है न यह मुझे बहुत उम्मीद देता है।यहाँ पर निकली लाश से लोग बिना कर्मकांड की परवाह किये उससे लिपट कर रो लेते हैं। उसके सीने पर सर रखकर आंसुओ के सहारे खुद को हल्का कर लेते हैं । इस मौके पर धर्म का दखल नही होता बल्कि संवेदनाओं का पहरा होता है, जब संवेदना सर उठाती है, तो धर्म पिघल जाता है ।
यहीं पर किसी का घर बिखरता है तो किसी का बचता है।यहीं हरे पर्दों और सफेद चादरों में पता चलता है की यह जो लेटा है यह कितना ज़रूरी इंसान है।जिसको मुँह ढके रोते हुए लोग ले जा रहे हैं, पता चलता है की यह अपने परिवार की रीढ़ था। 

जो एक पल में इंसानों का सर कलम कर डालते हैं मेरी समझ से उन्हें अस्पताल में एक महीने सिर्फ खड़ा रखा जाए।तब वह दर्द को देख पाएँगे।एक ज़िन्दगी की अहमियत समझ पाएँगे।मैं अपने मरीज़ को अकेला छोड़ अक्सर अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठा सोचता रहता हूँ की यह क्या है जो सब जगह है मगर इस अस्पताल के गेट के अंदर नही है।नफ़रत गेट के बाहर खड़ी है और मैं अंदर खड़ा,एक दूसरे को सवालिया निशान से देख रहा हूँ। अक्सर एक ही वार्ड में दँगे में ज़ख़्मी मरीज़ भी होते होंगे और उसी में दँगे करने वाले के अपने सगे भी लेटे होंगे। हो सकता है न यह संयोग। मैं देख पा रहा हूँ दर्द हमे कैसे जोड़ता है।तक़लीफ़ हमे कैसे संगठित करती है।चोट हमें कैसे एक करती है।

मैं आजकल अस्पताल से बहुत कुछ सीख रहा हूँ।आजकल तो कोरोनाकाल में आप अपने मरीज़ को भी नही देख सकते,एक बेबसी है, जिसमें कोई शामिल नही । सबका दर्द एक जैसा है मगर अलग अलग,कोई एक दूसरे के कंधे पर सिर भी रखकर नही रो सकता । हम तो कहते हैं कि मरने,मिटने से पहले इंसानियत सीख लो,एक दिन नही रहेंगे हम सब,मगर हमारी छाप सभ्यता पर ज़रूर पड़ेगी । नफरत की छाप नफरत बनकर गूँजेगी और प्रेम की छाप प्रेम बनकर हवा में भीनी भीनी घुल जाएगी । तुमसे कहते हैं कि दिल में संवेदना लाओ,अस्पतालों को देखो,उनमें से टूटते हुए लोगों को देखो और सम्भल जाओ । बस यही दुआ की आपको ज़िन्दगी के फ़लसफ़े सीखने के लिए वहाँ न जाना पड़े जहाँ ज़िन्दगी का हेड-टेल सेकेंडो में हो रहा हो.....
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अस्पताल बोलते हैं

अस्पताल में अपने सीरियस मरीज़ के साथ वक़्त काटना कितना मुश्किल है।सब बाहर इंतज़ार कर रहे हैं और मरीज़ अंदर सबका इंतज़ार। यह वह वक़्त है जब पूरा परिवार एक साथ इकट्ठे होकर परेशानी का मुकाबला करने की कोशिश कर रहा है।उसी वक़्त वहीं से एक लाश को अस्पताल के कर्मचारी ले जा रहे हैं। उस गुज़रे हुए इंसान के साथ के लोग पीछे पीछे रोते बिलखते निकलते हैं। ऐसे में हमारे साथ के भी लोग रोने लगते हैं। मेरे अपने ऐसे रोते हैं जैसे कोई अपना निकल गया हो।इस तरह जितनी लाशें जाती हैं वह सब हमारे लोगों को रुलाती जाती हैं।

इनकी चीखें, इनका सिसकना, इनकी टूटन हमें मज़हब,राज्य,जाति, दल को जाने बिना रुला देता है।जानते हैं यह कौन रुला रहा होता है।यह होती है संवेदना।जो हमे हमारे लेटे मरीज़ से जोड़कर ,उसे खोने का एहसास पैदा करती है। हर जाती हुई लाश हमे खोखला करके जा रही होती है।मेरे साथ मौजूद हर कोई, गुज़रती लाश पर या तो रो रहा था या आँखे चुराकर इधर उधर देख रहा था। यह एक अंजान डर होता है जो हमें रुलाता रहता है।

अस्पताल हमे बहुत कुछ सिखाता है। ज़िन्दगी से लड़ना,ज़िन्दगी के लिए लड़ना दोनों चीज़ें सिखाता है।बगल के बेड पर मौजूद मरीज़ का दर्द दिखता है ना की उसका धर्म। मरीज़ को डॉक्टर सिर्फ डॉक्टर दिखता है ना की उसमे धर्म। जब परेशानी सर पर होती है तो लड़कपन के सारे चोचले अस्पताल के गेट के बाहर रह जाते हैं। ताउम्र कट्टर से कट्टर रहा आदमी अपने मरीज़ के लिए जब ख़ून ढूंढता है तब अपनी ज़बान की बनाई सारी सीमाए तोड़ देता है। तड़पते हुए मरीज़ के लिए दुआओं के बन्धन भी टूट जाते हैं। मैं अस्पताल के एक कोने में खड़ा दूर से मायूस से इंसान को देखता हूँ।दीवार से सर लगाए अपने मरीज़ के साथ सामने वाले के लिए भी दुआ खुद बखुद निकल जाती है।पड़ोस के वार्ड में झांकता हूँ तो देखता हूँ एक हनी सिंह टाइप नौजवान किसी बूढ़े की पेशाब की थैली बदल रहा है।यह वह दृश्य था जो हमे एहसास कराता है की दर्द और ज़िम्मेदारी क्या होती है।दूसरे बेड पर बैठे उस अधेड़ को भी देखता हूँ जो शायद पत्नी पर रोज़ रौब गांठता रहा होगा मगर आज मासूम बच्चे की तरह उसके हाथ से दाल पी रहा है।

यह जो अस्पताल है न यह मुझे बहुत उम्मीद देता है।यहाँ पर निकली लाश से लोग बिना कर्मकांड की परवाह किये उससे लिपट कर रो लेते हैं। उसके सीने पर सर रखकर आंसुओ के सहारे खुद को हल्का कर लेते हैं । इस मौके पर धर्म का दखल नही होता बल्कि संवेदनाओं का पहरा होता है, जब संवेदना सर उठाती है, तो धर्म पिघल जाता है ।
यहीं पर किसी का घर बिखरता है तो किसी का बचता है।यहीं हरे पर्दों और सफेद चादरों में पता चलता है की यह जो लेटा है यह कितना ज़रूरी इंसान है।जिसको मुँह ढके रोते हुए लोग ले जा रहे हैं, पता चलता है की यह अपने परिवार की रीढ़ था। 

जो एक पल में इंसानों का सर कलम कर डालते हैं मेरी समझ से उन्हें अस्पताल में एक महीने सिर्फ खड़ा रखा जाए।तब वह दर्द को देख पाएँगे।एक ज़िन्दगी की अहमियत समझ पाएँगे।मैं अपने मरीज़ को अकेला छोड़ अक्सर अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठा सोचता रहता हूँ की यह क्या है जो सब जगह है मगर इस अस्पताल के गेट के अंदर नही है।नफ़रत गेट के बाहर खड़ी है और मैं अंदर खड़ा,एक दूसरे को सवालिया निशान से देख रहा हूँ। अक्सर एक ही वार्ड में दँगे में ज़ख़्मी मरीज़ भी होते होंगे और उसी में दँगे करने वाले के अपने सगे भी लेटे होंगे। हो सकता है न यह संयोग। मैं देख पा रहा हूँ दर्द हमे कैसे जोड़ता है।तक़लीफ़ हमे कैसे संगठित करती है।चोट हमें कैसे एक करती है।

मैं आजकल अस्पताल से बहुत कुछ सीख रहा हूँ।आजकल तो कोरोनाकाल में आप अपने मरीज़ को भी नही देख सकते,एक बेबसी है, जिसमें कोई शामिल नही । सबका दर्द एक जैसा है मगर अलग अलग,कोई एक दूसरे के कंधे पर सिर भी रखकर नही रो सकता । हम तो कहते हैं कि मरने,मिटने से पहले इंसानियत सीख लो,एक दिन नही रहेंगे हम सब,मगर हमारी छाप सभ्यता पर ज़रूर पड़ेगी । नफरत की छाप नफरत बनकर गूँजेगी और प्रेम की छाप प्रेम बनकर हवा में भीनी भीनी घुल जाएगी । तुमसे कहते हैं कि दिल में संवेदना लाओ,अस्पतालों को देखो,उनमें से टूटते हुए लोगों को देखो और सम्भल जाओ । बस यही दुआ की आपको ज़िन्दगी के फ़लसफ़े सीखने के लिए वहाँ न जाना पड़े जहाँ ज़िन्दगी का हेड-टेल सेकेंडो में हो रहा हो.....
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Friday, July 3, 2020

विवेकानंद

जब तक आपको मूर्ति में भगवान दिख रहें है तब तक आप ईश्वर से मिलने की पहली ही सीढ़ी पर हैं। जैसे ही ईश्वर मूर्ति से आज़ाद हो जाए वह दूसरी सीढ़ी है और जब यह आपमें दिखने लग जाए तो यह अंतिम सीढ़ी है।आप किसी भी सीढ़ी को नकार नही सकते,कमतर नही समझ सकते,हाँ अपनी समझ के साथ आप आगे बढ़ते हैं।यह लफ्ज़ हमारे नही हैं।यह वह गहराई के अल्फ़ाज़ हैं जो मेरे कान हमेशा सुनते रहे हैं।दिल ने हमेशा आपके हर लफ्ज़ को उतारा है। मैं सोचता हूँ की आप पर लिखने का साहस भला कैसे लाऊं ।

आप पर मैं लिखूं,यह कैसे हो सकता है।आपके क़दमों में लिखूं यह भी तो आपको नही पसंद था। अब आप सामने हैं, तो सबकुछ दिखने लगा है । आपका यौवन ओढ़े गम्भीर चेहरा अजब सी रौशनी पैदा करता है।आपको पढ़ा,सुना फिर जब आपसे अकेले घंटों बातें की तब खुद को समझ सका।वह आप ही तो थे जिसनें आखों को ऐसे खोला की दीवार के पार दिखने लगा।दिमाग को ऐसे परत दर परत खोला की किसी तरह का मैल नही रह गया।

मेरी ज़िन्दगी को हर घङी जिसनें मज़बूत किया वह ही तो थे आप ,वही तो थे नरेंद नाथ दत्त जी यानि हमारे विवेकानन्द। महान संत रामकृष्ण परमहँस की छाँव से निकले मेरे विवेकानंद । देखिये आपनें हमे क्या पढ़ाया और लोगों नें आपको कैसे पढ़ा इसमें बङा फ़र्क है।
आपने हमे मोहब्बत के साथ मिलकर रहने को सिखायाऔर दूसरे आपके ही नाम पर नफ़रत बांट रहे। आपने हमे सवाल करने का साहस दिया,अगर आपके सवाल नही होते तो रामकृष्ण परमहँस के वह उत्तर,जिनसे आपके दिल की गांठ खुली,कभी न खुलती । लोग सवाल से भागते हैं, उनके पास उत्तर नहीं, आपने सवाल पूछना और उत्तर देना दोनों हमे सिखाया । आपने दूसरों को नीचा दिखाने से ज़्यादा खुद को ऊंचा उठाना हमे सिखाया,यही तो सत्य का रास्ता है, जो झूठ का ज़िक्र नही करता,बल्कि खुद खुल जाता है, जो झूठ होगा वह खुद बखुद खत्म हो जाएगा,सत्य को झूठ की चर्चा से बचना होगा । मैं तो दावे से कहता हूँ मेरे विवेकानन्द नें 39 साल की मामूली सी उम्र में जो वैचारिक,आध्यात्मिक और सामाजिक रेखा खींची है उसे इस काल में तो कोई छूने वाला नहीं, पार करना तो सोचे भी ना।

हां बीती रात उन्होंने हमसे कहा दोस्त घबराना नहीं जितना दिल करे मेहनत करो,मुझे एक सुकून पसंद और तरक्की पसंद हिंदुस्तान चाहिए ,मै हर वक्त तुम्हारे पीछे साए की तरह हूँ ।तब से मै भी बेफिक्र हूँ एक दिन ज़रूर हमारा मुल्क मुस्कुराएगा।लिखने को तो बहुत से किस्से याद आ रहे,आखरी वक़्त पर बिस्तर पर पड़े बीमार चिड़चिड़े विवेकानंद को लिख सकता हूँ,दुनिया को रौशनी देता हुआ चमकदार विवेकानंद लिख सकता हूँ,परमहंस के सामने अपने दिल को खोलते विवेकानंद को लिख सकता हूँ,आध्यत्म और सेवा में सेवा को प्रमुखता देते विवेकानंद पर लिख सकता हूँ । दूसरों से नफरत और प्रेम में अथाह प्रेम पकड़े विवेकानंद पर लिख सकता हूँ  मगर कम्बख़्त आंखें भीग कर लिखना दुश्वार कर रहीं हैं और मेरे विवेकानन्द को आंसू पसंद नहीं । सारी दुनिया फख्र करे की हमारे पास विवेकानन्द हैं और मै फख्र करू क्योंकि अपनें दोस्त की ज़मीन पर पैदा हुआ हूँ। विवेकानंद जैसे चरित्र एक धर्म के डोर में नही बंधते, बल्कि उनपर हर एक का अधिकार होता है । रौशनी किसी एक के लिए कभी होती भी नही,वह तो हर आँख वाले के लिए होती है ।

 आज लोग कहते हैं कि विवेकानंद की पुण्यतिथि है, जबक हम कहते हैं कि आज वह ज़मीन की बेड़ियाँ तोड़कर पूरे संसार के सफर पर निकल गए थे,एक घर से आज़ाद होकर हर शरीर के घर यानी हृदय में रहने निकल गए थे । मेरे लिए विवेकानंद एक रोशनी है, जो मेरा सफर खत्म किये बिना भला खत्म कैसे हो सकते हैं...पढ़िए उन्हें,इतना पढ़िए की दिल सख्त से मुलायम होने लगे,फिर जीवन मे इतना उतारिये की आपमें नफरत दम तोड़ दे,जबतक नफरत,अहंकार है तब तक विवेकानंद सिर्फ जीभ पर आएँगे,कंठ से नीचे नही जाएँगे,उनका स्वाद जो मस्तिष्क को निर्देशित करेगा ,आप ले ही नही सकेंगे जब तक हृदय विशाल नही होगा । उसको पाने के लिए सबसे प्रेम आवश्यक है,तो मर्ज़ी आपकी चाहे जीभ पर नाम जपिये चाहे उन्हें शरीर मे धारण करने तरफ बढ़िए....

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Monday, June 29, 2020

पुलिस और शासन

जो शासक शासन में पुलिस पर अधिक निर्भर होगा,उसमे शासकीय गुणों का अभाव होगा ।

पुलिस पर जितना कम निर्भर होगा और दूसरे विभागों पर अधिक पकड़ होगी,वह शासक ही शासकीय गुणों का धनी होगा ।

कुछ मामलों को अगर छोड़ दें तो अधिकतर पुलिस अच्छी या बुरी नही होती है, बल्कि उसको नियंत्रित करने वाला शासक अच्छा या बुरा होता है  ।
कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो कमज़ोर हुक़ूमत हमेशा पुलिस पर निर्भर होगी, मज़बूत हुक़ूमत हमेशा अपने दूसरे शासकीय हाथों पर निर्भर होगी । 

पुलिस शासक के शासन को सुचारू चलाने का अंतिम विकल्प होती है, यदि यह पहला विकल्प बनने लगे,तो शासक अयोग्य है । बड़ी आसानी से अयोग्य शासक उसके फैसलों से पहचाना जा सकता है, यदि फैसला लागू करने में पुलिस की ज़रूरत पड़ रही तो वह कमज़ोर शासक है और यदि बिना पुलिस के उसके फैसले लागू हो रहे,तो वह कुशल शासक है ।

शासन डराकर नही बल्कि बहलाकर किया जाता है, लाड और लाठी में हमेशा लाड बेहतर विकल्प है, लाड-प्यार से मसले हल हो जाते हैं, शासन में लाठी आवश्यक है मगर सबसे अंत में जब कोई विकल्प न रह जाए,इसे पहला ही विकल्प नही बनाना चाहिए,इसीलिए हम सड़क पर बिछी पुलिस देखकर जान लेते हैं कि हमारा हुक्मरान कमज़ोर है या मज़बूत । चौराहों पर अधिक पुलिस तो कमज़ोर हुक़ूमत,कम पुलिस तो मज़बूत हुक़ूमत बशर्ते अपराध न हो क्योंकि बिना पुलिस के भी अपराध रोका जा सकता है, यही कुशल शासन है ।

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Thursday, June 25, 2020

आपातकाल

वह पीढ़ी कितनी खुशकिस्मत थी जिसने कम से कम सीना ठोककर आपातकाल लगाने वाली लीडर भी देखा और उनसे टूटकर लड़े भी । 
यह तो हम अभागी पीढ़ी हैं, जिन्हें आपातकाल लगाए बिना आपातकाल से कठिन समय से गुज़रना पड़ रहा है ।

यह चालाकी उस समय के लीडर में नही थी कि बिना आपातकाल की घोषणा किये भी तमाम साँसे क़ैद की जा सकती हैं । वह नही जानते थे,जो मीडिया आपातकाल की घोषणा से उनके सामने लेट जाती थी,वह बिना आपातकाल लगाए भी लिटाई जा सकती थी ।

इमरजेंसी लगाने वाले सूत्रधार  के असली वंशज वहीं मौजूद हैं, जहाँ बिना इमरजेंसी लगाए,अपने मुख़ालिफ़ हर आवाज़ को दबा दिया जा रहा है । इमरजेंसी हमारे लिए एक सबक़ थी कि अगर हमने ज़रा सी लापरवाही की तो कोई भी खुद को मिली ताक़त का दुरुपयोग कर बैठेगा ।

इंदिरा गाँधी साहसी थीं, गलती किया तो सबके सामने किया । गलती की सज़ा भुगती और फिर उसी जनता में वापिस भरोसा जीता,जिस जनता से वह हारी थीं ।

जिन्होंने इमरजेंसी झेला था,वह अपने सीने पर हाथ धर कर कहें कि जो आजके हालात हैं, यह ज़्यादा बुरे हैं या वह ज़्यादा बुरे थे । हमे इमरजेंसी पर ज्ञान देने की आवश्यकता नही है क्योंकि 1857 से आजतक हर बुरी और गुलामी भरी बात के ख़िलाफ़ हमारे आँगन से आवाज़ उठी है । अगर इंदिरा और मेनका गाँधी के पति संजय गाँधी की ज़्यादती के खिलाफ बोला है, तो आज भी बोलेंगे । घोषित इमरजेंसी से हमेशा बुरी और पीड़ादायक अघोषित इमरजेंसी होती है । 

हिम्मती लीडर सामने से आते हैं । जनता की आंख में आंख डालकर बात करते हैं । अगर मन में अपने मुख़ालिफ़ आवाज़ को दबाने का भाव आए भी तो खुली इमरजेंसी लगाते हैं । जिनमे हिम्मत नही होती है, वह पर्दे के पीछे छिपकर इमरजेंसी जैसे हालात थोप देते हैं ।

आज लड़ाई ज़्यादा मुश्किल है । आज ख़ुद को खड़ा रखना ज़्यादा मुश्किल है । बकौल एक बड़े संगठनकर्ता के इमरजेंसी में मीडिया से बैठने को कहा गया,वह लेट गया । हम आज कहते हैं, मीडिया से लेटने को कहा गया,वह सामने से सिपाही बनकर खड़ा गया ,यह मीडिया उनपर सवाल ठोकता है, जिनके सवाल उसे उठाने थे ।

इमरजेंसी का अगर दुःख वास्तविक है, तो लालू यादव,मुलायम सिंह जैसे लीडर्स की इज़्ज़त करना सीखें,जिन्होंने मुकाबला किया । इनको हटाकर इमरजेंसी का दुःख जताना बेईमानी और मक्कारी है ।

इमरजेंसी को याद करिए मगर यह जानकर की वह इतने बुरे दिन नही थे । इंदिरा और मेनका के पति संजय को कोसिए मगर यह जानकर की आज इंदिरा के दो बेटों में से जो एक इमरजेंसी का जनक था,उसकी नस्ल सत्ता में है और जिस बेटे का इमरजेंसी से कोई ताल्लुक नही था,उसकी नस्ल विपक्ष में है, यहीं से आपको अपना रास्ता तय करना है, वर्तमान देखिये,भविष्य सुधारिये,बस...
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Tuesday, June 16, 2020

एकदा

प्रख्यात साहित्यकार प्रेमचंद उन दिनों साहित्यिक पत्रिका हँस निकाला करते थे । प्रेमचंद के ही दौर में एक लेखक उभरे भुवनेश्वर । जिनका एकांकी लेखन में बड़ा स्थान रहा है । भुवनेश्वर के साहित्यिक सफर में प्रेमचंद का अद्भुत योगदान रहा है, उनकी पत्रिका हँस में भुवनेश्वर को तब महत्वपूर्ण जगह दी जब यह लेखक अपने व्यवहार से हर एक से अलग थलग था ।

एक दिन प्रेमचंद के एक सहयोगी ने उनसे पूछा कि आप उस व्यक्ति की मदद कैसे कर सकते हैं, जो नित नित नए बहाने बनाकर सबको तो ठगता ही है, वरन आपको भी ठग ही रहा है । वह व्यक्ति जो हर एक को झूठे झांसे में फँसाता है, उससे आपको इतना स्नेह कैसे हो सकता है । प्रेमचंद उत्तर देते हुए कहते हैं, निःसन्देह उसने हमें ही नही हर एक को ठगा है, झूठ बोला है और प्रपंच किया है । मगर उसका लेखन अद्भुत है, उसके बुरे व्यवहार के कारण उसकी अद्भुत प्रतिभा को नकारा नही जा सकता है । पाठक तक उसके लेखन को पहुँचना चाहिए भले ही हमे उसका व्यवहार कितना ही झेलना पड़े । हम पाठक को अच्छी रचना से वंचित रखने का पाप नही कर सकते हैं ।उनके साथी निरुत्तर हो गए । 
यही हमारे लिए भी प्रेमचंद का संदेश है कि किसी की खूबियों को फैलाने का मौका नही छोड़ना चाहिए,भले ही उसका व्यवहार कैसा हो ।

 खूबियों पर समाज का अधिकार है और व्यवहार पर हमारा कर्तव्य है कि उसका सामना करें । लेखन और व्यवहार को समान मानने की न गलती करनी चाहिए और न ही भरम पालना चाहिए । इनमे जो भी बेहतर हो उसको ऊंचा स्थान देना चाहिए,इसलिए प्रेमचंद ने कभी भी भुवनेश्वर के लेखन को नज़रंदाज़ नही किया,बल्कि उनकी जो बातें ठीक नही थीं,उसे नज़रंदाज़ किया ।
(आजके नवभारतटाइम्स में एकदा)
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Sunday, June 14, 2020

सुशांत आत्महत्या

यार मरने वाला मर गया । आत्महत्या,डिप्रेशन,व्यवहार,माहौल,दोस्त,बीमारी,समाज को गाली देना,दोस्तों को कठघरे में खड़ा करना,यार यह सब बन्द करो । हममें से कोई भी किसी को नही बचा सकता,सिवाए उसके,जो ख़ुद को बचाना चाहता है । 

जिन्हें लगता है, कोई बात तो उनसे करता,दिलों के हाल जानता,तो सुन लें,आपको चल कर हम हर तरह के लोग दिखाएँगे, कोई है जो बात ही नही करना चाहता तो कोई है, अपने ज़िक्र से ही नाराज़ हो जाता है । अपना अपना मिजाज़ है, आप हमसे लिख कर ले लें मृतक अगर ज़िन्दा भी होता तो अपनी परेशानी नही बतलाता । नही अच्छा लगता है दूसरों के आगे अपनी ज़िंदगी की परतें खोलते,आप बकिये खुद को क़रीबी, नही मानता होगा किसी को करीबी की कुछ कह पाए । होंगे बहुत से क़रीबी मगर नही कहा,न कहता, क्या हुआ,काहे आप सब साइकैट्रिस्ट बनने पर तुले हैं ।

अफसोस कीजिये मगर कम से कम समाज को,रिश्तों को या उन किसी को मत कठघरे में खड़े करिए,जिनको आपको लगता है कि वह रोक सकते थे,कोई नही रोक सकता,सिवाए उसके खुद के ।

हमारे बीच से रोज़ ही कोई न कोई खत्म हो रहा है, हम किसे रोक पा रहे हैं । रोक पाते तो अपने घरों में बुझती साँसों को पहले ही रोक लिया होता । बन्द कमरों की मौत क्या कोई भी मौत हम नही रोक सकते हैं,बुझ चुके दिल को हम जला नही सकते हैं, तो क्या कोसें समाज को ।

जो ज़िन्दा हैं, उनकी ही क्या हम इज़्ज़त करते हैं । अपने माँ बाप भाई बहन और रिश्तेदारों नातेदारों को बर्दाश्त नही करते हैं और चले हैं दूसरों काअकेलापन दूर करने,दूसरे को बात करके आत्महत्या से रोकने,भाई जिन्हें भी तक़लीफ़ है, जो वाक़ई चाहते हैं कि आत्महत्या रुके,वह सिर्फ ख़ुद के घर,रिश्तेदार,गली को सम्भाल लें काफी है ।

और एक बात,दिल हल्का वलका नही होता है, असल मे लोग आपके दिलों के राज़ जानना चाहते हैं । राज़ उनपर खोल दो,बस यही जुगत तो लगी है । सैकड़ो को देखा है जो सबके राज़ सुनते हैं और अलग अलग बताते रहते हैं कि देखा,वह जब परेशान था तो मेरे पास आता था । यही तमाशे से इंसान को मौत बेहतर लगती है । जिसे जीना होगा,उसका दिल जीने का कोई न कोई बहाना बना ही लेगा । 

हमेशा यही तो कहा है कि ज़िन्दा रहने का संघर्ष ही ज़िन्दगी है, संघर्ष ख़त्म, ज़िन्दगी ख़त्म । आत्महत्या के एक्सपर्ट मत बनिये,आपकी हरकतों से आजकल के न्यूज़ एंकर टाइप फील होता है,जल्दी जल्दी सब कुछ बतला देना चाहते हैं आप,बिना रुके,सबको सवालों में लेते हुए । हो सके तो बस इतना करिए कि रोज़ बेहतर दुनिया बनाने का प्रयत्न करिए,जो ज़िन्दा रह गए,उनकी ज़िंदगी आसान बनाइये,मरना हम सबको ही है । जो पहले चला गया,वह खुशनसीब है, जो बादमे जाएगा,उसे अपनी आखरी सांस तक अच्छी खुशहाल दुनिया बनाने में लगना होगा । किसी को कोसिए मत,खुद को मज़बूत कीजिये,लोगों की मदद कीजिये और एक भी ज़िन्दगी अगर संघर्ष करती नज़र आ जाए,तो उसके संघर्ष का साथ दीजिये,हो सकता है वह थोड़ा और जी जाए ।

हर मौत दर्द देती है मगर जब तक ख़ुद की मौत न आ जाए,यह दर्द तो भुगतना ही है । बस प्रेम और सहिष्णुता रखिये,उससे भी रखिये जिसे आप नापसन्द करते हों,यही काम है, कर सकिये तो ठीक,वरना कर ही क्या सकते हैं... कुछ भी नही...
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Friday, June 12, 2020

आनन्द मोहन जुत्शी उर्फ गुलज़ार देहलवी

चोट उँगली में थी और दोष पूरे शरीर को देते रहे । उँगली नीतीश थे और शरीर लालू । कितनी आसानी से लालू को खलनायक बना दिया और खलनायक को नायक बनाकर पूजते रहे । पन्द्रह साल में क्या हासिल किया बिहार ने,मीडिया ने बनाया बीमारू और मीडिया ने ही कहा नीतीश को विकास पुरुष,खैर हमे नीतीश से कोई लेना देना नही क्योंकि इमरतीबुद्धि लोगों से क्या ही उलझें,आज कुछ,कल कुछ,परसो कुछ,न ज़ुबान का ठिकाना और न ही किरदार का कोई ठिकाना । कुर्सी के लिए किसी को भी पाया बना लेने वालों पर बात ही बेईमानी है । 

आते हैं लालू यादव पर,उनके ऊपर चवन्नी छाप भी उठकर भृष्टाचारी का आरोप लगा देते हैं । वह भी चारा चोर कहकर खी खीखी करते हैं जिनमें राजनैतिक अक़्ल एक रत्ती से भी कम है । यह मासूम लोग हैं, इन्हें टीवी में बैठा एंकर बता देता है फलाने चोर हैं, यह चोर चोर बकने लगते हैं, टीवी का एंकर कह देता है कि फलाने महान हैं, विकास पुरुष हैं, यह उसके नाम ले लेकर लहालोट होते हैं । यह कभी भी पलट कर अपने इर्द गिर्द नही देखते हैं ।

लालू के ज़माने में हुए अपराध को देखते वक़्त सूक्ष्मदर्शी इस्तेमाल करते हैं और वर्तमान के अपराध झाँकने में अपनी मटर ऐसी आँखे इस्तेमाल करते हैं ।
अगल बगल के मुख्यमंत्री को भी देखें,उन्होंने अपने राज्यों में बिहार से ज़्यादा काम किया है, जबकि वह आते जाते रहे हैं । यूपी को ही ले लें,नीतीश के समकक्ष मुलायम सिंह यादव,मायावती या राजनाथ सिंह,सबने इनसे बेहतर काम कम वक्त में किया है । अखिलेश यादव के पाँच साल के काम तो नीतीश अगले पचास साल में भी नहीं कर पाएँगे और योगी आदित्यनाथ की तरह नीतीश कभी इतने सख्त प्रशासक भी नही हों पाएँगे की लोग इनकी चर्चा करें । नीतीश एक ढोल थी जो सिर्फ लालू लालू लालू कहकर बज रही थी । लालू को गरियाओ और सत्ता पाओ । लालू को गले लगाओ और सत्ता पाओ । यानी सत्ता सिर्फ एक नाम से मिलती,लालू । 

लालू कभी नैतिकता में नीचे नही गिरे,कभी घिनौनी राजनीति नही की,गलतियाँ उतनी ही कि जितनी हमारे देश के तमाम विख्यात नेता करते रहे और काम भी उतना ही किया ।

क्या समझते हैं कि लालू के वक़्त जज मॉर्निंग वॉक पर नही जाते थे । क्या समझते हैं कि लालू फ़ैसले मैनेज नही कर सकते थे,सब कर सकते थे मगर नही किया गया । आज सलाखों में हैं, तभी न्यायालय पर आपको भरोसा है । हमने बहुत से गुंडों को बहुत ऊंचे पद पर बैठे देखा है, आप भी देख रहे हैं, तब भी आपको लगता है कि लालू गलत थे ।
एक बार लालू के सर लगे इल्ज़ाम को देखिएगा,रुपयों की गिनती कर लीजिएगा और यह भी देखिएगा उतने रुपये में आज सर्वशक्तिमान खरीदार कितने विधायक खरीदकर चुनी हुई सरकार गिराता है ।

वह बेहिया लोग लालू पर सवाल उठाते हैं, जो विधायक खरीदने वाले के सामने सर झुकाया करते हैं । ईमानदार हो तो सर उठाकर उसको भी इतना ही कोसो जो लालू के सर मढ़े भ्रष्टाचार की कीमत में एक या डेढ़ विधायक ही खरीद पाता, जबकि उसने बीसों को खरीदा है, सोचो कितना खर्च किया होगा ।

लालू का जेल मे रहना और लालू को बदनाम करना, दोनों से किसी की चुनावी दुकान चलती है । लालू जेल में हैं, यह भी उनकी ईमानदारी है । मैं राहुल गाँधी से जो थोड़ा नाराज़ हूँ, उसकी वजह लालू प्रसाद यादव हैं । राहुल गाँधी को इस भारत मे अगर आज किसी से राजनीतिक दीक्षा लेनी चाहिए, वह सिर्फ लालू प्रसाद यादव हैं, वह भी बिना अगर मगर लगाए,क्योंकि लालू देश की मिट्टी की नब्ज पहचानते हैं ।

मैं खुद हमेशा ख़ुद को कोसता हूँ कि लालू को मापने में हमने इतना अगर मगर क्यों किया । क्यों लालू को जाँचने में हमने उनकी सुनी जो अपनी जुबान कहीं से उधार लाए थे । लालू प्रसाद यादव का जन्मदिन है, हम इसका प्रायश्चित करते हैं कि हमने उस समय मुँह नही खोला जब खोलना चाहिए था । लालू का सलाखों में जाना हमारा खुद का क़ैद हो जाना था,एक ही तो आवाज़ थी,जो बिना तराज़ू लिए बोलती थी । 
बस ख़ुशी इतनी है कि लालू प्रसाद यादव को हमने कभी खलनायक नही माना । कभी उनकी लीडरशिप में खामी नही देखी और कभी उन्हें कमज़ोर, मजाकिया या फ़िज़ूल नही जाना,हमेशा यह तो माना कि वह अद्वितीय हैं ।

अन्ना के झाँसे के वक़्त लालू ही एक आवाज़ थे जो संसद से सड़क तक बोल रहे थे कि यह आंदोलन सही नही है । लालू उस वक़्त ही नब्ज़ पकड़ चुके थे मगर सरकार मदमस्त थी लालू को ही घेरने में,उनकी आवाज़ अनसुनी की गई । संसद में लालू के वह भाषण आज भी ऐतिहासिक है, जो बता रहा है कि संसद सर्वोच्च है,क्योंकि जनता ने उसे चुना है । लालू एक दौर की राजनीति का पर्याय हैं और अपने विरोधी की ऑक्सीजन हैं, बिना लालू नाम लिए,वह आज भी क्लास मॉनिटर तक का चुनाव नही लड़ सकते...

लालू प्रसाद को जन्मदिन की मुबारकबाद और प्रार्थना की वह अभी मज़बूती से और रहें,क्योंकि देश को उनकी जरूरत हैं । जिन्हें लालू के आरोप,सज़ा या परिवारवाद से दिक्कत है, वह हमें उस पार्टी का नाम बताएँ जिनमें यह अवगुण न हों,कम या ज़्यादा तराज़ू लेकर वह बैठे,हमने यह मान लिया है कि कुछ कमियों के साथ अच्छी चीजें फेंक नही दी जाती हैं । लालू प्रसाद यादव इस माटी का हमको प्रसाद है, हम उनकी इज़्ज़त करते हैं, लालू कुछ भी हों,धोखेबाज़,चालबाज़,मक्कार नही हो सकते और लाशों पर राजनीति नही करते,बस इतना काफी है, उनके प्रति प्रेम के लिए,हाँ हम लालू से प्रेम करने लगे हैं... जन्मदिन मुबारक,प्रभु कृष्ण आपको सफलता और सरलता दोनों दें जैसे देते रहे हैं ।
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Thursday, June 11, 2020

लालू प्रसाद यादव

चोट उँगली में थी और दोष पूरे शरीर को देते रहे । उँगली नीतीश थे और शरीर लालू । कितनी आसानी से लालू को खलनायक बना दिया और खलनायक को नायक बनाकर पूजते रहे । पन्द्रह साल में क्या हासिल किया बिहार ने,मीडिया ने बनाया बीमारू और मीडिया ने ही कहा नीतीश को विकास पुरुष,खैर हमे नीतीश से कोई लेना देना नही क्योंकि इमरतीबुद्धि लोगों से क्या ही उलझें,आज कुछ,कल कुछ,परसो कुछ,न ज़ुबान का ठिकाना और न ही किरदार का कोई ठिकाना । कुर्सी के लिए किसी को भी पाया बना लेने वालों पर बात ही बेईमानी है । 

आते हैं लालू यादव पर,उनके ऊपर चवन्नी छाप भी उठकर भृष्टाचारी का आरोप लगा देते हैं । वह भी चारा चोर कहकर खी खीखी करते हैं जिनमें राजनैतिक अक़्ल एक रत्ती से भी कम है । यह मासूम लोग हैं, इन्हें टीवी में बैठा एंकर बता देता है फलाने चोर हैं, यह चोर चोर बकने लगते हैं, टीवी का एंकर कह देता है कि फलाने महान हैं, विकास पुरुष हैं, यह उसके नाम ले लेकर लहालोट होते हैं । यह कभी भी पलट कर अपने इर्द गिर्द नही देखते हैं ।

लालू के ज़माने में हुए अपराध को देखते वक़्त सूक्ष्मदर्शी इस्तेमाल करते हैं और वर्तमान के अपराध झाँकने में अपनी मटर ऐसी आँखे इस्तेमाल करते हैं ।
अगल बगल के मुख्यमंत्री को भी देखें,उन्होंने अपने राज्यों में बिहार से ज़्यादा काम किया है, जबकि वह आते जाते रहे हैं । यूपी को ही ले लें,नीतीश के समकक्ष मुलायम सिंह यादव,मायावती या राजनाथ सिंह,सबने इनसे बेहतर काम कम वक्त में किया है । अखिलेश यादव के पाँच साल के काम तो नीतीश अगले पचास साल में भी नहीं कर पाएँगे और योगी आदित्यनाथ की तरह नीतीश कभी इतने सख्त प्रशासक भी नही हों पाएँगे की लोग इनकी चर्चा करें । नीतीश एक ढोल थी जो सिर्फ लालू लालू लालू कहकर बज रही थी । लालू को गरियाओ और सत्ता पाओ । लालू को गले लगाओ और सत्ता पाओ । यानी सत्ता सिर्फ एक नाम से मिलती,लालू । 

लालू कभी नैतिकता में नीचे नही गिरे,कभी घिनौनी राजनीति नही की,गलतियाँ उतनी ही कि जितनी हमारे देश के तमाम विख्यात नेता करते रहे और काम भी उतना ही किया ।

क्या समझते हैं कि लालू के वक़्त जज मॉर्निंग वॉक पर नही जाते थे । क्या समझते हैं कि लालू फ़ैसले मैनेज नही कर सकते थे,सब कर सकते थे मगर नही किया गया । आज सलाखों में हैं, तभी न्यायालय पर आपको भरोसा है । हमने बहुत से गुंडों को बहुत ऊंचे पद पर बैठे देखा है, आप भी देख रहे हैं, तब भी आपको लगता है कि लालू गलत थे ।
एक बार लालू के सर लगे इल्ज़ाम को देखिएगा,रुपयों की गिनती कर लीजिएगा और यह भी देखिएगा उतने रुपये में आज सर्वशक्तिमान खरीदार कितने विधायक खरीदकर चुनी हुई सरकार गिराता है ।

वह बेहिया लोग लालू पर सवाल उठाते हैं, जो विधायक खरीदने वाले के सामने सर झुकाया करते हैं । ईमानदार हो तो सर उठाकर उसको भी इतना ही कोसो जो लालू के सर मढ़े भ्रष्टाचार की कीमत में एक या डेढ़ विधायक ही खरीद पाता, जबकि उसने बीसों को खरीदा है, सोचो कितना खर्च किया होगा ।

लालू का जेल मे रहना और लालू को बदनाम करना, दोनों से किसी की चुनावी दुकान चलती है । लालू जेल में हैं, यह भी उनकी ईमानदारी है । मैं राहुल गाँधी से जो थोड़ा नाराज़ हूँ, उसकी वजह लालू प्रसाद यादव हैं । राहुल गाँधी को इस भारत मे अगर आज किसी से राजनीतिक दीक्षा लेनी चाहिए, वह सिर्फ लालू प्रसाद यादव हैं, वह भी बिना अगर मगर लगाए,क्योंकि लालू देश की मिट्टी की नब्ज पहचानते हैं ।

मैं खुद हमेशा ख़ुद को कोसता हूँ कि लालू को मापने में हमने इतना अगर मगर क्यों किया । क्यों लालू को जाँचने में हमने उनकी सुनी जो अपनी जुबान कहीं से उधार लाए थे । लालू प्रसाद यादव का जन्मदिन है, हम इसका प्रायश्चित करते हैं कि हमने उस समय मुँह नही खोला जब खोलना चाहिए था । लालू का सलाखों में जाना हमारा खुद का क़ैद हो जाना था,एक ही तो आवाज़ थी,जो बिना तराज़ू लिए बोलती थी । 
बस ख़ुशी इतनी है कि लालू प्रसाद यादव को हमने कभी खलनायक नही माना । कभी उनकी लीडरशिप में खामी नही देखी और कभी उन्हें कमज़ोर, मजाकिया या फ़िज़ूल नही जाना,हमेशा यह तो माना कि वह अद्वितीय हैं ।

अन्ना के झाँसे के वक़्त लालू ही एक आवाज़ थे जो संसद से सड़क तक बोल रहे थे कि यह आंदोलन सही नही है । लालू उस वक़्त ही नब्ज़ पकड़ चुके थे मगर सरकार मदमस्त थी लालू को ही घेरने में,उनकी आवाज़ अनसुनी की गई । संसद में लालू के वह भाषण आज भी ऐतिहासिक है, जो बता रहा है कि संसद सर्वोच्च है,क्योंकि जनता ने उसे चुना है । लालू एक दौर की राजनीति का पर्याय हैं और अपने विरोधी की ऑक्सीजन हैं, बिना लालू नाम लिए,वह आज भी क्लास मॉनिटर तक का चुनाव नही लड़ सकते...

लालू प्रसाद को जन्मदिन की मुबारकबाद और प्रार्थना की वह अभी मज़बूती से और रहें,क्योंकि देश को उनकी जरूरत हैं । जिन्हें लालू के आरोप,सज़ा या परिवारवाद से दिक्कत है, वह हमें उस पार्टी का नाम बताएँ जिनमें यह अवगुण न हों,कम या ज़्यादा तराज़ू लेकर वह बैठे,हमने यह मान लिया है कि कुछ कमियों के साथ अच्छी चीजें फेंक नही दी जाती हैं । लालू प्रसाद यादव इस माटी का हमको प्रसाद है, हम उनकी इज़्ज़त करते हैं, लालू कुछ भी हों,धोखेबाज़,चालबाज़,मक्कार नही हो सकते और लाशों पर राजनीति नही करते,बस इतना काफी है, उनके प्रति प्रेम के लिए,हाँ हम लालू से प्रेम करने लगे हैं... जन्मदिन मुबारक,प्रभु कृष्ण आपको सफलता और सरलता दोनों दें जैसे देते रहे हैं ।
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Monday, June 8, 2020

बिरसा मुंडा

आप सबने कंकर कंकर जोड़कर जिस मुल्क़ की बुनयाद धरी थी उसमे हम सब बहुत दिन ख़ुशी ख़ुशी जी लिए।जिस आज़ादी के लिए सलाखों में आज आपने आखरी साँस ली थी उसका पूरा मज़ा हम लोगों ने पिछले बहुत से सालों में ले लिया।
अब हमारा दिल भर गया है।अब आप सबकी कुर्बानियाँ पीले पन्नों में दीमक का इंतज़ार कर रही हैं।

हमने नए रास्ते चुन लिए हैं, उन रास्तों में कहीं आप नही हैं।होना भी नही चाहिए वरना आपका दम घुटेगा।खैर हम पागल,बोझिल,पुराने,फ़ालतू के लोगों की तरफ से श्रद्धांजलि।।नए लोग अपने नए हीरो को याद करेंगे । अभी हमारे जिस्म से पुराने ख़ून के क़तरे नही गए हैं, इसलिए याद आ गए।

देश के एक हिस्से के मज़दूर,आदिवासी और किसानों को एक करके आपने सुनहरे भारत के लिए जो क़ुर्बानी दी थी ।उसने इस मुल्क़ को बहुत सालों तक मिलजुलकर चलने की सलाहियत दी ।हम ही गलत थे,अपनी तरक्की के रास्तों में आपको भूलते गए और बढ़ते गए ।आज जब पता नही कहाँ पहुँच चुके हैं, तब हम सब आपस में बहुत बंटे, बिखरे हुए हैं ।हमारे दिलों में मोहब्बत दम तोड़ चुकी है ।अब एहसास होता है बिरसा,की आप सब क्या करके गए थे ।किस शिद्दत से सबके दिल जोड़कर जंज़ीरों से मुकाबला किया था ।इस वक़्त शिद्दत से याद आ रही है।

बचपन देखें,बेहद खूबसूरत स्कूल है,इतना आकर्षक और विशाल की उसकी कल्पनाएँ मन में हिलोरे पैदा कर रही हैं।इंग्लिश ऐसी की वारे जाऊँ।यहीं स्कूल की दहलीज़ से खूबसूरत चमकता हुआ सुनहरा भविष्य दिख रहा है।आने वाला कल जिसमे मेरी टेबल पर ब्रेड एंड बटर के साथ इंग्लिश का रुतबेदार अख़बार होगा।चार नौकर होंगे जो मुँह से निकले लफ़्ज़ को ऐसे लपकेंगे जैसे उनकी किस्मत बदलने वाली हो।यह सब किसे नही अच्छा लगता होगा।यह कल्पनाएं किसे नही ललचाएँगी।मगर जो इन सबको एक झटके में तोड़ दे।

जो सुनहरे स्कूल की शक्ल से मुँह फेर ले।जो बटर एंड ब्रेड से हाथ हटाकर धनुष थाम ले।जो अपनी भूख में दूसरों की भूख की तड़प देखे।जिसका भरा हुआ पेट,अपनों की ख़ाली थाली के तसव्वुर भर से बेचैन कर दे।जिसके गले में बिलखते बच्चों को देखकर निवाले फंसने लगे।जो अपने कमज़ोर,परेशान,बेसहारा,पिछड़े लोगों की सेवा करते करते 24 साल की मामूली उम्र में ही उस पूरे समुदाय का भगवान बन जाए।वही तो है, जिसपर आज लिखा जाएगा।जिसपर कल भी लिखा जाएगा।

सर उठाकर देखिये।रोते बिलखते नेता बहुत मिल जाएँगे।गर्दन घुमाकर कर देखिये डराने वालों की कतार लगी हुई है।एक बार दिल में झाँक कर देखिये,तब दिल कहेगा की दोस्त तुम ख़ाली हो।तुम्हारे पास कोई लीडर नही,जो दिल के ख़ौफ़ को दूर करे।जो तुम्हे डराए नही बल्कि बढ़ाए।जो तुम्हारे लिए संघर्ष करते हुए सलाखों में दम तोड़ दे।दोस्त तुम्हारे पास कोई बिरसा मुंडा नही है।

बिरतानियों के दिल में जो ख़ौफ़ बिरसा मुंडा ने भरा वोह कौन कर सकता है।आदिवासियों को जो हिम्मत दी वोह कौन कर सकता है।अपना सुनहरा कल छोड़ संघर्ष में कुर्बान बिरसा मुंडा की आज पुण्यतिथि है। आज ही जेल में आखरी सांस लेकर हमारी किस्मत के ताले को खोल दिया था । आज उनको याद करके संघर्ष सीखने का दिन है।पूरे समाज को कैसे आगे लाए,कैसे उनकी साँसों की हिफाज़त करें,सीखने का दिन है। थोड़े थोड़े बिरसा हो जाओ दोस्तों,हम सब साथ चलकर कल का बेहतरीन भारत गढ़ेंगे। अपने लोगों से बेपनाह मोहब्बत करो,बिना उनकी कमियों में फंसे,उन्हें चाहो,बिरसा की छाँव बन जाओगे । बिरसा ने अपने लोगों से प्रेम में मृत्यु चुन ली और खुशी खुशी चले गए,पहले मोहब्बत सीखो,रास्ता खुद बखुद निकलेगा । बिरसा को नमन,आज 9 जून है,बिरसा को मत भूलिएगा,वरना खुद को भूल जाइयेगा, खुद को भूलना बर्बादी है.... सलाम बिरसा
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Sunday, June 7, 2020

कोरोना और इंसान

दुनिया में जो भी हो कोरोना का मगर हमारे यहाँ कोरोना के लिए राह बहुत मुश्किल है । यहाँ घड़ी घड़ी पानी,भोजन,भाषा और व्यवहार बदल जाता है, बेचारा कोरोना खुद को जीवित रखने के लिए कितना बदले ।
एक घर पहुँचा तो उनके यहाँ कालीमिर्च के काढ़े में कोरोना का दम घुटने लगा,इससे थोड़ा जीतकर और कालीमिर्च से लड़ने की ताकत लेकर दूसरी गली पहुँचा तो उनके यहाँ काढ़े में हल्दी आ गई । अब पीली आफत से लड़ते हुए कोरोना ने ताक़त बटोरी और चौथे शहर पहुँचा,वहाँ काढ़े में तुलसी मां उसका इंतेज़ार कर रही थीं,देखते ही पीट दिया चप्पलों से,जब तुलसी जी से रक्षा करके बेचारा अगली जगह बढ़ा तो वहाँ जराकुस ने काढ़े में कब्ज़ा जमा लिया था,कोरोना की आँखे बाहर आ गई कि घड़ी घड़ी इनका काढ़ा भी बदल जा रहा है, कैसे लोग हैं यह ।

हर तरफ उछल कूद मचाकर कोरोना उन मुँह में भी पहुँचा, जहाँ न काढ़ा था,न खाना था,न उसे मारने की दवा थी,न उसके फैलते वंश को रोकने की जद्दोजहद थी । कोरोना ने उसकी नाक से झाँक कर देखा कि क्या यह वही देश है, जहां काढ़ा हज़ार तरीके का है, यह मुँह में कुछ ले क्यों नही रहा । पता चला उस घर मे पानी के सिवा कुछ नही,कोरोना ने चप्पल उठाई और भाग खड़ा हुआ कि यहाँ तो वह खुद भूखा मर जाएगा । उसकी संताने भूखी दम तोड़ देंगी,इससे तो भले काढ़े वाले लोग हैं ।

कोरोना ने कहा कि हम पूरी दुनिया घूम आए मगर भाई असल में यहीं है पूरी दुनिया,दुनियाभर की सारी वैरायटी यहीं है । हम इन्हें मार नहीं पाएँगे, क्योंकि जब मारने चलो तो कोई अल्लाह को याद कर लेता है, जब तक अल्लाह से मुखातिब हो कोई देवता आ जाते हैं, उनसे थोड़ी देर बात करो कि कोई ईसा को बुला लाता है, जब ईसा से दोस्ती बैठाओ तो बुद्ध आ धमकते हैं,जब बुद्ध को समझो तब तक उनके जैसे ही महावीर आ जाते हैं, बताओ किससे किससे निपटें । जब इनसे भागो तो कोई दादी माँ हैं इनके यहाँ, खटिया पर लेटे लेटे कोरोना को मारने के नुस्खे पत्तियों मसालों और मन्त्रो में बताकर सो जाती हैं ।

कोरोना ने निराश होकर कहा,हम यहाँ फैल तो रहे हैं मगर विजय नही प्राप्त कर पा रहें । तभी पीछे से एक नेताजी बोले,ओए कोरोना,इन्हें आपस मे बाँट दो,बस फिर एक एक कर सबको मारना, आसानी से मर जाएँगे । कोरोना ने कहा,दोस्त,शुक्रिया,हम वायरस हैं, इंसान नही हैं की रूप,रँग,सोच से बाटें, यह तुम्हारा काम है,हम इनसे ऐसे ही निपटेंगे,भले हम निपट जाएँ....
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Sunday, May 31, 2020

गंगा दशहरा

भगीरथ ने मां गंगा के पाँव पकड़े और पहाड़ से मैदान तक उन्हें लेकर आए । मां गंगा ने प्यास और भूख से तड़पते लोगों को अपने आँचल में ले लिया और अपने बच्चों में बिना फर्क के हर एक कि ख्वाहिशें पूरी की । जिसे अनाज चाहिए था,उसे अपने हुनर से अनाज सौंपा, जिसे प्यास थी,उसके गले तो ताज़गी बख्शी । पेड़ पौधे,चिड़िया,जानवर,कीड़े मकोड़े और इन सबके सामने खड़े इंसान को मां गंगा ने ज़िन्दगी दी,सब जी उठे,सब बढ़ चले ।

आज गंगा जी कैसी हैं, यह किसी से छिपा नही है । आज गंगा दशहरा है, यानि गंगा जी के समतल भूमि  पर आने का शुभ दिवस । राजा भगीरथ जब उन्हें लेकर आए थे,तभी से आजतक यह बात तो तय थी कि गंगा जी की ज़िम्मेदारी शासक की थी और जिसकी ज़िम्मेदारी शासक ले,उसकी सेवा करने का कर्तव्य जनता का था मगर अफसोस शासक और जनता दोनों ने अपनी ज़िम्मेदारी ऐसे नही निभाई की गंगा जी मुस्कुराती हुई बह सकें । गंगा जी ने अपनी ज़िम्मेदारी से मुँह नही मोड़ा,राजा भगीरथ से जो वादा किया,आजतक निभा रही ।

गंगा जी को नज़रंदाज़ करके आप अपनी मिट्टी से जुड़ाव को कमज़ोर करेंगे । राही मासूम रज़ा अपनी तीन माँ होने का ज़िक्र करते हैं, उनमें से पहली मां गंगा जी हैं । शिव हों या राम,बुद्ध हों या महावीर,तुलसी हों या कबीर, अकबर हों या अशोक, खुसरू हों या जायसी,शेरशाह हों या हुमायूँ,गाँधी हों या नेहरू सबको जिस एक आँचल ने समेटा है, वह हैं गंगा जी । शिव जी की जटा से धरती के सबसे कमज़ोर व्यक्ति तक जिसने अपनी पहुँच बनाई,वह हैं गंगा जी ।

आज गंगा दशहरा की बधाई और साथ मे यह कि गंगा जी से सीख सको तो सीखो,गंगा जी ने अपने खूबियों को किसी एक धर्म,किसी एक जाति,किसी एक लिंग,किसी एक जीव तक ही बांधे नही रखा,बल्कि हर एक के लिए बाहें खोल दीं इसीलिए तो वह मां गंगा हो गईं ।

किसी ने सूरज को गंगा जी का जल चढ़ाया तो किसी ने उसी जल में वज़ू करके नमाज़ पढ़ी,बताइए इससे पवित्र जल और क्या हो सकता है । गंगा जी किसी एक कि नही हैं, सबकी हैं,सबकी ज़िम्मेदारी भी है कि उनके आँचल में हमारी कमियों की छींटे ऐसे न लग जाएं कि उनको बहने में तक़लीफ़ हो । वह बच्चे सबसे बुरे होते हैं, जिनसे उनकी माँ तक़लीफ़ पाए और वह बच्चे बुरे बच्चों से भी बुरे बच्चे होते हैं, जो अपनी माँ के दुःख दूर करने की जगह आपस मे लड़ें ।

गंगा जी हमे मिलकर रहने का आशीर्वाद दें । गंगा जी धरती की तमाम गन्दगी बहा ले जा रहीं ऐसे ही हमारे मन की गंदगी को भी बहा ले जाएं । गंगा जी हमारे मन और आत्मा को इतना निर्मल कर दें कि उसमे नफ़रत,सम्प्रदायिकता,अलगाव,हिंसा जैसे कीटाणु पैदा ही न हो सकें ।

वह व्यक्ति गंगा जी को मां कैसे कहेगा,जिसका दिल क्षेत्र,लिंग और धर्म मे बंटा हुआ है, गंगा जी का असली पुत्र तो वही होगा जो गंगा जी की तरह बिना फर्क सबके लिए प्रेम रखे,सबकी सेवा करे और सबके काम आए । मां गंगा ने कभी अपने आशीर्वाद से मुँह नही मोड़ा,हमें भी अपने कर्तव्यों से मुँह नही मोड़ना चाहिए,चाहे मिट जाएँ । बिना कोई अन्तर किये हर धर्म,जाति, वर्ग,क्षेत्र की सेवा करते हुए मिट भी जाएँ,तो क्या है, मां गंगा के सच्चे पुत्र तो बने जाएँगे । गंगा दशहरा हमे याद दिलाने का दिन है कि अपने हृदय को गंगा जी जैसा विशाल और निर्मल कर लो ताकि उसमे हर बुराई बह जाए और अच्छाइयाँ पनप उठें,जैसे भगीरथ प्रयास के बाद फसल और इंसान मुस्कुराए थे...
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Friday, May 29, 2020

आर्थिक मदद या फ्रॉड

अच्छा जो अब हम कहने जा रहे उसे बड़े ध्यान से पढ़ें,क्योंकि बिना जाने भविष्य में उठाए गए आपके कदम के आप ही जिम्मेदार होंगे ।
आप अपने इर्द गिर्द देखिये,कोई भी ऐसा व्यक्ति जिससे आपके मिलने जुलने के सम्बंध नही हैं, जिससे फोन पर बात तक नही होती,वह अचानक आपको अपनी परेशानी बताकर अगर आर्थिक मदद माँगता है, तो सतर्क हो जाइए । जो भी आपसे मदद की गुहार लगाए उसकी मदद से पहले उससे दूसरे माध्यमों से बात कर लें,अब क्योंकि मदद के नाम पर ऑनलाइन ठगी बहुत बढ़ गई है, तो खूब ख्याल रखिये ।

आप मेरे कितने ही क़रीबी हों,एक बात ध्यान रखिएगा की हम आर्थिक मदद कभी नही माँगते हैं । हमारे घर और संगठन दोनों जगह की एक ही ट्रेनिंग है कि कहीं भी हाथ मत फैला दो,इसलिए अगर हमारे नाम से कोई मैसेज आर्थिक मदद का मिले तो प्लीज़ उसे मेरा मत मानियेगा,तुरन्त रिपोर्ट कीजिये या उसे सार्वजनिक कर दीजिएगा क्योंकि इनबॉक्स में बतियाने, मदद माँगने और दूसरी किसी भी तफरीह की मेरी आदत नही है ।

यह बताना इसलिए जरूरी है कि हम हों या कोई दूसरा,सबके काम लोग देख रहें । अब अगर मेरे नाम से कोई मदद मांगे तो सबको लगता है कि कर देनी चाहिए, जबकि हम जैसों की माँग को ज़्यादा सवालिया नज़रों से देखना चाहिए की न कोई बात होती है और न ही कोई बहुत घरेलू सम्बन्ध हैं, तब काहे हफ़ीज़ भाई पैसे माँगने बैठ गए ।

हमारे नामपर इनबॉक्स में मांगी गई आर्थिक मदद को बिल्कुल नज़रंदाज़ करें और हो सके तो ज़िम्मेदार लोगों सहित हमे भी सूचना दीजिये । यही नही हर एक जो भी आपसे आर्थिक मदद मांगे,इमोशन में डूबने की ज़रूरत नही है, पहले थोड़ा ठहर जाएँ ।

आप पहले उस व्यक्ति से बात कीजिये या उसके बहुत नजदीकियों से पूछिए,जब तक मदद माँगने वाले कि सच्चाई न पता चले मदद मत कीजिये क्योंकि इससे दोहरा नुकसान है,एक तो जिस व्यक्ति की मदद कर रहें,वह ही इस फ्रॉड से अनजान हैं, दूसरा यह कि आपका आर्थिक नुकसान भी हो रहा और ज़रूरतमंद तक कुछ पहुँच भी नही रहा ।

एक हाथ से दो,दूसरे हाथ को पता न चले,यह थ्योरी भौतिक रूप में हो सकती है । ऑनलाइन माँगों में आपको सतर्कता बरतनी ही पड़ेगी । आप हमें ही नही बल्कि हर किसी को,जो भी आपसे आर्थिक मदद मांगे,उसकी पहले जाँच कीजिये, जांच के बाद जो समझ आए वह कीजिये मगर बिना परखे रुपये मत भेजिएगा ।

पैसे भेजने से पहले वाली मदद कीजिये,अगर सामने वाला पैसों के चक्कर मे ही पड़ा है तो तुरन्त हट लीजिये और शिकायत भी कीजिये । आजकल बेरोज़गारी बढ़ी है, खासकर पढ़े लिखे वर्ग के लड़के अपने खर्चे निकालने में असमर्थ हैं, वह ही यह हरकते कर रहे हैं, नज़र बनाए रखिये,अपने घर के उन बच्चों पर भी नज़र रखिये जो बिना कुछ काम किये पैसे खर्च कर रहे हैं, क्योंकि धन का स्त्रोत न पता हो तो बहुत कुछ काले घेरे में आ जाता है ।
सावधान रहिए,ठगी से बचे रहिए,मदद कीजिये मगर जाँच परख कर और हमारी मदद की इनबॉक्स की माँग को पूरी तरह नज़रंदाज़ कीजिये क्योंकि जैसे आरबीआई फोन पर कोई जानकारी नही माँगता वैसे ही हम सोशल मीडिया या वह जिससे मेरे खाने पीने के सम्बंध नही हैं, आर्थिक मदद नही माँगते हैं, ध्यान रखिएगा,सावधानी हटने पर हुए नुकसान के आप खुद ज़िम्मेदार होंगे,इसलिए सतर्क रहिए....
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Wednesday, May 27, 2020

नेहरू बेरूत

यह बेरूत,लेबनान की तस्वीरें हैं, सन साठ की,नेहरू को बेरूत की यूनिवर्सिटी में सुनने की ललक देखिये,यूनिवर्सिटी हॉल में जगह नही मिलने के बावजूद स्टूडेंट खिड़कियों में लटके सुन रहे हैं....
नेहरू बेरूत में क्या बोले यह महत्वपूर्ण नही था,बल्कि सबसे महत्वपूर्ण था कि वह बेरूत में क्या नही बोले ?

फिलस्तीन होते हुए जब वह बेरूत उतरे तो उनके भाषण से सभी मंत्रमुग्ध थे और उनकी तारीफों के किस्से आम होने लगे । जब नेहरू भारत लौटे और उन्होंने इस दौरे की बातें संसद में रखी,जैसा वह हमेशा करते कि हर विदेश यात्रा का पूरा ब्यौरा सभी सांसदो को संसद भवन में देते । यहीं उन्होंने खुलासा किया कि जब वह भारतीय एयरफोर्स के जहाज़ से जा थे थे तो इज़राइल के दो लड़ाकू विमान ने उनके जहाज़ को गिराने की कोशिश की,वह भी यह जानकर की इसमे भारत के प्रधानमंत्री मौजूद हैं ।

संसद में नेहरू जी से पूछा गया कि जब इतनी महत्वपूर्ण घटना घटी और आपपर जानकर इज़राइल ने हमला किया,तो आपने बेरूत में इस बात को क्यों नही उठाया,वहां इस करतूत की भत्सर्ना क्यों नही की,तब नेहरू बोले ।

इज़राइल हमे मारना नही चाहता था,बस चाहता था कि हम वह बात जो कहने निकले हैं, वह न कहें और सारी बातें हम पर हुए हमले के शोर में गुम हो जाएँ । इसलिए हमने खुद पर हुए दुस्साहसिक हमले का ज़िक्र बेरूत में नही किया और वहाँ वही बातें कहीं,जो करना महत्वपूर्ण था । आप सांसदों को हर सच मालूम होना चाहिए इसलिए यह बताया ।

यहाँ कितना कुछ सीखा जा सकता है कि आपकी बात महत्वपूर्ण है या आपका जेल जाना,आपका लक्ष्य महत्वपूर्ण है या आपकी चर्चा,इनमे से जितना आप समझ सकेंगे,उतना ही नेहरू को जान पाएँगे, बाकी रही लोकप्रियता तो सत्तरह साल आखरी साँस तक हमारे पुरखों ने उन्हें चुनकर बैठाया था और आज जब वह चले गए,तब करोणों घरों में खाना नही पक्का था,आँखे नम थीं ,इसके लिए किसी वट्सएप फॉरवर्ड या ट्रोल लेहड़ी की ज़रूरत नही है, दुनिया उन्हें ऐसे ही सुनती थी जैसे बेरूत के युवा सुन रहे हैं...
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Tuesday, May 26, 2020

पण्डित जी

जब दो टुकड़ों में देश मिला,वोह इसका रोना नही रोए। रियासतो का झगड़ा मिला,वोह इसका रोना भी नही रोए।शुरुआत में ही महात्मा का साथ छूटा,वोह इस ज़बरदस्त झटके के बावजूद भी मायूस होकर नही बैठे। बहुत से बनने वाले अपनो ने जी भर कोसा,इसपर भी उन्होंने रोना नही रोया।दुनिया ने शक से देखा,उन्होंने उफ़्फ़ तक नाकि।

मज़हबी रँग से उनपर कीचड़ फेका गया,वोह इसपर भी पलट कर जवाब देने नही मुड़े। तमाम दूसरे विचारपंथियों ने उनमे अपने आप को ना देखकरकर खूब आलोचना की।उन्होंने तब भी इनमे से किसी एक को भी देशद्रोही या अपने रास्ते का कांटा नही कहा।बहुतों ने उनकी जड़ो में दही डालने का काम किया,उन्होंने उन्हें भी साथ रखकर दुनिया के सामने लोकतन्त्र  और धर्मनिरपेक्षता की वह मिसाल रखी जिसे आज भी कोई तोड़ नही पाया।

17 साल देश के शीर्ष पद पर रहे मगर कभी अपने आलोचको को नही दबाया।अडिग अपने काम करते ही रहे।देश की हर उस चीज़ जिसपर तुम फ़ख्र कर सकते हो,उसकी बुनियाद रखी।देश की भुजाओं को जिसने हर दिशा में फैला दिया।जिसकी छाँव में सब धर्म,सब विचार फलते फूलते रहे,उन्होंने किसी को जबरन नही रोका,ऐसी ही आज़ादी का तो ख्वाब बुना गया था। वह आधुनिक तो थे ही मगर उनमे ज़बरदस्त आध्यात्म भी था जो आपको नही दिखेगा।उनकी ज़िन्दगी के तमाम रँग बिखरे पड़े हैं, हर एक अपने मतलब का रँग लिए मतवाला फिरता है। वह आगे देखना चाहते थे मगर पिछली सँस्कृति की अच्छी बातों को सहेजना भी चाहते थे । उनकी दूरदृष्टि जितनी शानदार थी,उतनी ही निकट दृष्टि भी श्रेष्ठ थी ।

आपने तो उन्हें कुछ खास किताबो से जाना जिसपर उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कभी रोक नही लगाई,जमकर अपनी आलोचना करने के मौके दिए।मैं मानता हूँ की गलतियां हुईं होंगी।निर्माण के मार्ग पर बहुत बार गलतियाँ होती हैं मगर इसका मतलब यह नही की वोह व्यक्ति पूरा गलत है।हो सकता है एक बेहतर मुल्क़ की तस्वीर बनाते में आपके धर्म को चोट पहुँची हो मगर उससे ज़्यादा ज़रूरी उन्होंने इस मुल्क को हर जतन से एक किया। आज जो पाकिस्तान और हमारे भारत मे बड़ा फ़र्क है, जिसे आपको छोड़ पूरी दुनिया महसूस करती है।वह यह है की पाकिस्तान को नेहरू जैसा व्यक्तित्त्व नही मिला। वोह देश अस्थिर और असफल है।नेहरू ने हमे स्थिर किया और प्रगति की दिशा दी।

हाँ अगर दिल ज़रा से भी प्रेम को जगह देता हो आपका तो देश के इस पहले प्रधानमंत्री को इज़्ज़त से याद कर लेंगे देशभक्ति कम नही पड़ जाएगी।मुझे भी लगता है जिसका कट्टर हिन्दू हों या कट्टर मुस्लिम अगर जमकर विरोध करें,तो वोह ही सही है ।नेहरू हिन्दू मुस्लिम की कट्टर सोच के सामने खड़ी एक बड़ी शक्ति थे । नेहरू में छिपी हर तरह की समझ को समझना मामूली बात नही है।नेहरू चन्द पन्नों के मोहताज नही।जो खुद मोटी मोटी किताबों को लिख गया हो उन्हें समझने के लिए समझ चाहिए । आज ही के रोज़ आपने एक कामयाब तारीख़ बना कर आखरी साँस ली थी।

आज नेहरू की पुण्यतिथि है, हमे पता है उन्हें याद करने में बहुतों की साँस फूलने लगेगी।हर वोह व्यक्ति उन्हें याद करने में कतराएगा जो आपने धर्म के तो करीब है मगर देश से दूर है।नेहरू जब तक हम हैं तब तक भले अकेले आपको याद करें,करते रहेंगे।मेरे देश के निर्माता आप ही हैं।कोई इसका चाहकर,जितना रूप बदलने की कोशिश करे,ज़र्रे ज़र्रे में पड़ी नेहरू की छाप को खत्म करने में उनके मुँह से ख़ून आ जाएगा,मगर वोह यह बिल्कुल भी मिटा नही पाएँगे। दुनिया के तमाम देशों के महान नेताओं को दोस्त बनाने वाले,सलाह देने वाले,फ़िक्र को सुनने वाले और प्रधानमंत्री रहते हुए किसी गरीब के हाथ अपने गिरहबान तक पहुँचने देने वाले नेहरू को नमन । आपने जो किया है, वह याद किया जाएगा,जो जोभी करेगा उसे आने वाली नस्लें वैसे ही याद करेंगी । पण्डित जवाहर लाल नेहरू एक अमर चरित्र है । हमारे घर के पुरखे महान थे जो उन्होंने पण्डित जी को उनकी आखरी साँस तक उस कुर्सी पर बैठाए रखा,जो भारत का निर्माण कर रही थी,आधुनिक भारत का ऐसा चरित्र जिससे दुनिया बेपनाह मोहब्बत करती थी,जो हर एक का दोस्त था,जो बच्चों से बूढ़ों तक कि जमात में बेधड़क चला जाता था,आज ही के रोज़ हमारी मिट्टी में मिल गया,हमारे पानी मे घुल गया और आजतक हमारी हवाओं में तैर रहा है, वह अमर चरित्र.....
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पण्डित नेहरू

जब दो टुकड़ों में देश मिला,वोह इसका रोना नही रोए। रियासतो का झगड़ा मिला,वोह इसका रोना भी नही रोए।शुरुआत में ही महात्मा का साथ छूटा,वोह इस ज़बरदस्त झटके के बावजूद भी मायूस होकर नही बैठे। बहुत से बनने वाले अपनो ने जी भर कोसा,इसपर भी उन्होंने रोना नही रोया।दुनिया ने शक से देखा,उन्होंने उफ़्फ़ तक नाकि।

मज़हबी रँग से उनपर कीचड़ फेका गया,वोह इसपर भी पलट कर जवाब देने नही मुड़े। तमाम दूसरे विचारपंथियों ने उनमे अपने आप को ना देखकरकर खूब आलोचना की।उन्होंने तब भी इनमे से किसी एक को भी देशद्रोही या अपने रास्ते का कांटा नही कहा।बहुतों ने उनकी जड़ो में दही डालने का काम किया,उन्होंने उन्हें भी साथ रखकर दुनिया के सामने लोकतन्त्र  और धर्मनिरपेक्षता की वह मिसाल रखी जिसे आज भी कोई तोड़ नही पाया।

17 साल देश के शीर्ष पद पर रहे मगर कभी अपने आलोचको को नही दबाया।अडिग अपने काम करते ही रहे।देश की हर उस चीज़ जिसपर तुम फ़ख्र कर सकते हो,उसकी बुनियाद रखी।देश की भुजाओं को जिसने हर दिशा में फैला दिया।जिसकी छाँव में सब धर्म,सब विचार फलते फूलते रहे,उन्होंने किसी को जबरन नही रोका,ऐसी ही आज़ादी का तो ख्वाब बुना गया था। वह आधुनिक तो थे ही मगर उनमे ज़बरदस्त आध्यात्म भी था जो आपको नही दिखेगा।उनकी ज़िन्दगी के तमाम रँग बिखरे पड़े हैं, हर एक अपने मतलब का रँग लिए मतवाला फिरता है। वह आगे देखना चाहते थे मगर पिछली सँस्कृति की अच्छी बातों को सहेजना भी चाहते थे । उनकी दूरदृष्टि जितनी शानदार थी,उतनी ही निकट दृष्टि भी श्रेष्ठ थी ।

आपने तो उन्हें कुछ खास किताबो से जाना जिसपर उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कभी रोक नही लगाई,जमकर अपनी आलोचना करने के मौके दिए।मैं मानता हूँ की गलतियां हुईं होंगी।निर्माण के मार्ग पर बहुत बार गलतियाँ होती हैं मगर इसका मतलब यह नही की वोह व्यक्ति पूरा गलत है।हो सकता है एक बेहतर मुल्क़ की तस्वीर बनाते में आपके धर्म को चोट पहुँची हो मगर उससे ज़्यादा ज़रूरी उन्होंने इस मुल्क को हर जतन से एक किया। आज जो पाकिस्तान और हमारे भारत मे बड़ा फ़र्क है, जिसे आपको छोड़ पूरी दुनिया महसूस करती है।वह यह है की पाकिस्तान को नेहरू जैसा व्यक्तित्त्व नही मिला। वोह देश अस्थिर और असफल है।नेहरू ने हमे स्थिर किया और प्रगति की दिशा दी।

हाँ अगर दिल ज़रा से भी प्रेम को जगह देता हो आपका तो देश के इस पहले प्रधानमंत्री को इज़्ज़त से याद कर लेंगे देशभक्ति कम नही पड़ जाएगी।मुझे भी लगता है जिसका कट्टर हिन्दू हों या कट्टर मुस्लिम अगर जमकर विरोध करें,तो वोह ही सही है ।नेहरू हिन्दू मुस्लिम की कट्टर सोच के सामने खड़ी एक बड़ी शक्ति थे । नेहरू में छिपी हर तरह की समझ को समझना मामूली बात नही है।नेहरू चन्द पन्नों के मोहताज नही।जो खुद मोटी मोटी किताबों को लिख गया हो उन्हें समझने के लिए समझ चाहिए । आज ही के रोज़ आपने एक कामयाब तारीख़ बना कर आखरी साँस ली थी।

आज नेहरू की पुण्यतिथि है, हमे पता है उन्हें याद करने में बहुतों की साँस फूलने लगेगी।हर वोह व्यक्ति उन्हें याद करने में कतराएगा जो आपने धर्म के तो करीब है मगर देश से दूर है।नेहरू जब तक हम हैं तब तक भले अकेले आपको याद करें,करते रहेंगे।मेरे देश के निर्माता आप ही हैं।कोई इसका चाहकर,जितना रूप बदलने की कोशिश करे,ज़र्रे ज़र्रे में पड़ी नेहरू की छाप को खत्म करने में उनके मुँह से ख़ून आ जाएगा,मगर वोह यह बिल्कुल भी मिटा नही पाएँगे। दुनिया के तमाम देशों के महान नेताओं को दोस्त बनाने वाले,सलाह देने वाले,फ़िक्र को सुनने वाले और प्रधानमंत्री रहते हुए किसी गरीब के हाथ अपने गिरहबान तक पहुँचने देने वाले नेहरू को नमन । आपने जो किया है, वह याद किया जाएगा,जो जोभी करेगा उसे आने वाली नस्लें वैसे ही याद करेंगी । पण्डित जवाहर लाल नेहरू एक अमर चरित्र है । हमारे घर के पुरखे महान थे जो उन्होंने पण्डित जी को उनकी आखरी साँस तक उस कुर्सी पर बैठाए रखा,जो भारत का निर्माण कर रही थी,आधुनिक भारत का ऐसा चरित्र जिससे दुनिया बेपनाह मोहब्बत करती थी,जो हर एक का दोस्त था,जो बच्चों से बूढ़ों तक कि जमात में बेधड़क चला जाता था,आज ही के रोज़ हमारी मिट्टी में मिल गया,हमारे पानी मे घुल गया और आजतक हमारी हवाओं में तैर रहा है, वह अमर चरित्र.....
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