रात बेचैनी में गुज़री।मेरे पास ज़्यादतर के पोस्टल एड्रेस थे मगर एक नही था।तमाम दोस्त,रिश्तेदार,दुश्मन सबके थे मगर नही था तो हिंदुस्तान का।मेरा हिंदुस्तान जिसकी पहचान ख़ालिस हिन्दोस्तानी हो।जिसमे मज़हब,ज़ात,रँग न हो।तड़प कर मुझे उसकी याद आ गई जो ज़िन्दगी भर हिंदुस्तान के पोस्टल एड्रेस को ढूंढता हुआ पता नही कहाँ चला गया।उसकी याद में जैसे ही लिखने की सोचा की रात का को पाँव पटकते चाँद की याद आ गई।उसकी नज़र वाले चाँद की याद।अब जब चाँद याद आ गया तो उस अकेले चीखते इंसान के लफ्ज़ भी दिल में उतर गए...
हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चाँद
अपनी रात की छत पर, कितना तनहा होगा चाँद
रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम में जाकर, अटका होगा चाँद
चाँद बिना हर दिन यूँ बीता, जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चाँद।।
यह अल्फ़ाज़ मेरे नही हैं।उसके हैं जिसने दिल पर हाथ रखा तो वोह लफ्ज़ निकाले की दुनिया देखती रही।जिसने आँख में आँख डाल कर वोह लिख दिया जिसे हम सोच भी नही पाए।भारत का कोई भी शख्स बचा होगा जिसने उसके क़लम को महसूस न किया हो।वोह जब यह अल्फ़ाज़ उकेर रहा था तो सोचिये उसके दिल में कौन सा बादल फट रहा होगा....
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
मेरे उस कमरे को लूटो जिसमें मेरी बयाने जाग रही हैं
और मैं जिसमें तुलसी की रामायण से सरगोशी करके
कालीदास के मेघदूत से यह कहता हूँ
मेरा भी एक संदेश है।
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझ को कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है
मेरे लहू से चुल्लू भर महादेव के मुँह पर फेंको
और उस योगी से कह दो-महादेव
अब इस गंगा को वापस ले लो
यह जलील तुर्कों के बदन में गढा गया
लहू बनकर दौड़ रही है।
नीम का पेड़,आधा गांव, दिल एक सादा कागज, ओस की बूंद, हिम्मत जौनपुरी, कटरा बी आर्ज़ू, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद, सीन ७५,छोटे आदमी की बड़ी कहानी,लिखने वाले कलम के मज़बूत स्तम्भ की बात कर रहा हूँ।अब भी नही समझे।अर्रे वही जिनके लिखे लफ्ज़ घर घर में दोहराये,पूजे जाते थे।महाभारत के डायलॉग लिखने वाले ग़ाज़ीपुर,यूपी के छोटे से गाँव गंगौली में पैदा हुआ राही मासूम रज़ा की बात कर रहा हूँ।मैं राही पर लिखने को तैयार बैठा था मगर क्या करूँ,उनमे उलझता ही चला गया।अपनी मामूली सी कलम में राही को उतारने की कोशिश करनी चाही,मगर लगा यह तो बेईमानी है।जब आपसे राही की बात करूँ तो राही केही अल्फाज़ो के साथ करूँ ताकि आप उन्हें महसूस कर सकिये।राही के इन अल्फाज़ो में सौंधी खुशबु और दिल में चुभी टीस को महसूस कीजिये...
क्या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए
क्या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए।
हम भी कैसे दीवाने हैं किन लोगों में बैठे हैं
जान पे खेलके जब सच बोलें तब झूठे कहलाए।
इतने शोर में दिल से बातें करना है नामुमकिन
जाने क्या बातें करते हैं आपस में हमसाए।।
हम भी हैं बनवास में लेकिन राम नहीं हैं राही
आए अब समझाकर हमको कोई घर ले जाए ।।
क्या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए ।
अगर बोर न हो रहे हों।तबियत ऊब न रही हो तो इन अल्फाज़ो में छुपे राही को भी लपक लीजिये।इन्हें इसकी सिलवटों में ढूंढ लीजिए।साथ ही देखिये हमारे राही ने कौन सी राह बनाई है।उस राह में कौन फूल है।कौन कांटा है।कौन उस राह को रोक रहा तो कौन उस राह को बना रहा।....
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख़्वाब
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बन्दा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मकतल
चारों तरफ बस ख़ून और आँसू, चीख़ें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आँखों से कुछ दरवाज़े
ख़ून में लिथड़े कमसिन कुरते
एक पाँव की ज़ख़्मी चप्पल
जगह-जगह से मसकी साड़ी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी
दरवाज़ों की ओट में आवेजों की कबरें
ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ए श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और ख़ून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।
ऐ राही,मेरे राही मासूम रज़ा मुझे माफ़ करना,आपके लफ़्ज़ों के साथ अपने अल्फ़ाज़ को जोड़ने की गुस्ताखी की है।आज आपकी सालगिरह पर मैं करूँ तो क्या करूँ।चाह रहा हूँ पूरा आपको पढ़ डाले।चाहत है आप पर सब लिख डाले।राही मैं महाभारत के संजय की तरह आपकी पूरी कहानी कह देना चाहता हूँ मगर आप विशाल हैं, विराट हैं और मैं कोई राही तो नही की इतनी विशालता को इतने आसान लफ़्ज़ों में उतार लूँ।बस राही हमेशा की तरह राह में साथ रहना।ताकि आपकी समझ से और अपनी आँखों से खूबसूरत भारत देख और जी पाऊँ। ©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Wednesday, August 31, 2016
राह के राही
Tuesday, August 30, 2016
मोबाईल
चाय के साथ जैसे ही मोबाईल उठाया तो पहली नज़र fb पर गई।कुछ देर देखा।अलग अलग विचारों, तस्वीरों को देखा।फिर पोस्ट लिखकर डाल दिया।पोस्ट डालने के बाद fb से बाहर निकल वॉट्सऐप देखा।बहुत से मैसेज।कुछ के जवाब दिए,कुछ गोल।कोई अच्छा मैसेज लगा फॉरवर्ड कर दिया फिर वहाँ से भी बाहर।इतने में एनडीटीवी के एप ने पन्द्रह बीस खबरे भेज दी,वोह देखने लगे।उसी में एडिटोरियल बढ़िया आ गया,उसे पढ़ डाला।की तभी समंदर पार बैठे भाई का मैसेज आ गया तो उसे देखा।उनसे बात का सिलसिला शुरू हुआ।कुछ देर बाद वोह खत्म हुआ तो लगा अभी मेल तो चेक नही किया।फौरन मेल देखा।कुछ ज़रूरी का जवाब नही बाकि डिलीट।किसी ने अर्जेंट आर्टिकल माँगा तो उसके लिए अर्जेंट लिखने लगा।
लिखते में लगा यह तो हमे पूरा मालूम नही,चलो गूगल खोलते हैं।गूगल पर गए तबियत से ढूंढा पढ़ा,मगर मतलब का कम ही मिला।फौरन उस सब्जेक्ट की मौजूद ई-बुक ढूंढी गूगल प्ले स्टोर से,खरीदी,पढ़ डाली।फिर लिखना शुरू।किसी तरह चाय,नाश्ते के साथ यह सब चला की दूर के रिश्तेदार की वीडियो कॉल आ गई।बात चीत फिर शुरू।वोह खत्म हुई तो नज़र ब्लॉग पर गई।आज तो लिखा ही नही।लिखने से पहले लगा की fb चेक करले कुछ आया तो नही।fb के बाद दोबारा वाट्सएप फिर ब्लॉग।ब्लॉग लिखने के बीच पसन्दीदा ब्लॉग को पढ़ने का रुख।पढ़ने में किसी ने यूट्यूब वीडियो का बढ़िया रिव्यू लिखा,तो उसे ढूंढ कर देखने लगा।
इसके बाद बारी आती है ट्विटर की।बढ़िया सा ट्वीट किया और वहाँ से दफ़ा हुए।उतने में आई राईटर का मेल आ गया,उन्हें तीन आर्टिकल चाहिए।वोह लिखे की फ्रीलांसर एप ने बताया की फला बुक का रिव्यू चाहिए।वोह लिखा उसके बाद दूसरा मेल,उसी बीच फोन।फोन पर बात के बाद मैसेज।तो मैसेज के जवाब।बेड़ा ग़र्क हो हमारा।हमें यह समझ नही आ रहा की हम मोबाईल यूज़ कर रहे हैं या मोबाईल हमें।दूसरे सवाल करते हैं हर वक़्त मोबाईल हाथ में,उन्हें कौन बताए की इसमें हम क्या क्या कर आए हैं।कोई रिश्तेदारो से न मिलने का ताना दे रहा तो उन्हें कैसे बताए की समन्दर पार के भी रिश्ते निभा रहा हूँ।कोई पढ़ाई का ताना दे तो कैसे दिखाऊं की यही मोबाईल में सैकड़ों ई-बुक पड़ी हैं।चाय मोबाईल चाय मोबाईल चाय मोबाईल।बेड़ा ग़र्क़ है।
एक दिन आजिज़ आकर मोबाइल बैग में डाल दिया की आज नही छुएंगे।उसी दिन करीबी रिश्तेदार निकल गए।पूरा घर हैरान इत्तेला को।जब वोह कब्र में कीड़े मकौड़े से जा मिल बैठे तब हमने फोन देखा और अफ़सोस किया।कोशिश कर रहे हैं की दुनिया को देखें,टच स्क्रीन से नही,वाक़ई महसूस करके,बड़ी खूबसूरत है।पूरे का लब्बोलुआब यह है की यह जो कमबख्त स्मार्टफोन है न बड़ा स्मार्ट है।गुलाम बना लिया है कमबख्त ने,अरे बुरा न मानो अभी चार्जिंग पर लगा रहे हैं।ज़रा से कुछ कहो, सुर्ख़ होने लगते हैं।इनकी अदाओं में लिखने को बहुत कुछ रह गया है, इसलिए कम लिखे को बहुत बहुत बहुत ज़्यादा मानियेगा।ज़िन्दगी सिमट कर चाय के कप और स्मार्ट फोन में आ गई है।लोग कहते थे पैर चलते हैं, यहाँ तो उँगलियाँ सुबह सुबह कई किलोमीटर चल आती हैं।खैर इसमें बुराई भी क्या,सब कुछ एक जगह है,बढ़िया ही है।मज़े कीजिये। ©
Monday, August 29, 2016
आशिकी दशम्
कितनी तक़लीफ़ थी,जब मैंने हॉस्पिटल का रुख किया था।डॉक्टर ने एडमिट कर लिया।दर्द के साथ यहाँ बेड पर पड़े रहना ज़ुल्म था।मैं लाख कोशिश करता रहा की एडमिट न होऊ मगर मेरी एक न चली।सिर्फ तीन दिन के लिए रुकने को कहा मगर हमे यह जेल लग रहा था।किस परेशानी से वोह रात कटी।सुबह तुम्हे देखा।तुम्हारे गोरे हाथों में इंजेक्शन देखा।कसम से इंजेक्शन से भाग जाने वाला मैं तुम्हे देखता रहा और तुम आहिस्ता आहिस्ता इंजेक्शन के सहारे मुझमे दाखिल हो गई।हमे भी लगा चलो अस्पताल के मुर्दा माहौल में तुम्हारी मुस्कान हमे ज़िंदा रखेगी।तुम तरह तरह के बहाने से मेरे बेड तक आती रही और मैं तुम्हारे क़रीब।डॉक्टर ने कहा आप तो जल्दी ठीक हो रहें कल डिस्चार्ज कर देंगे,मायूसी ने हमे घेर लिया।लटके हुए मुँह से कहा की डॉक्टर साहब इतना ठीक करदो की दोबारा न आना पड़े भले पन्द्रह दिन रोक लो।डॉक्टर मुस्कुराए और निकल गए।तुमसे दिलकश बातों का दौर चलता।दूसरे मरीज़ जलते थे।वो बगल के रूम वाले बुड्ढे मरीज़ से तुम भी तो छुप कर यहाँ आती थी।वोह बड़बड़ाते रहते और तुम मुस्कुराती।तुम अक्सर उस सामने वाली मरीज़ को नींद की दवा दे देती थीं,जो तुम्हे मेरे पास देखते ही बार बार बुलाता था।तुम्हारी बातों कभी मुकम्मल नही हुई।हफ्तेभर के बाद डिस्चार्ज होकर मैं घर लौट आया।अस्पताल के बाद तुम से कोई बात नही।तफ़रीह समझ सब भूलकर मैं अपने कामो में लग गया और तुम अपने।मुझे वोह आँधी की रात कभी नही भूलेगी जब तुम अपने शहर से साठ किलोमीटर दूर मेरे गाँव,मेरे दरवाज़े,भीगी हुई,दो बड़े सूटकेस लिए खड़ी थी।ज़मीदार और ईमाम की चौखट पर एक अधेड़ लड़की वोह भी रात में भीगी खड़ी थी,क्या यह किसी क़यामत से कम थी।अब्बा ने खड़े लहजे में पूछा था तुम कौन हो और तुमने उतने ही खड़े अंदाज़ में कहा था "आपके इकलौते चराग़ का तेल"।कसम से इतना बेहूदा जवाब अब्बा ने कभी नही सुना था।मारे शर्म के वोह अम्मी को आगे करके वज़ू करने चले गए।अम्मी सिर्फ तुम्हारी बड़ी बड़ी आँखे और ज़रूरत से ज़्यादा खुल चुके होंट देख भौचक खड़ी देखती रहीं।तुम बेपरवाह घर में दाखिल हुई और मेरे सीने पर सवार होकर तुमने कहा था "मियां क्या समझे थे,खेलोगो,कूदोगे और निकल लोगे।मैं फरा हूँ।अपना हक़ छीन कर लुंगी।मियाँ मोहब्बत लौंडो का खेल नही है।"
मैं कह नही सकता की वोह डर मैंने कभी दोबारा जिया।कनपटी के पास से निकली तुम्हारी भयंकर मोहब्बत से पीछा छुड़ाने की लम्बी दास्ताँ है।फ़िलहाल नर्स से मोहब्बत दोबारा नही हुई।तुम्हारे कदम ने सालों मुझे अब्बा की आँखों से दूर रखा।अब भी कोई कहीं मुस्कुरा के देखता है तो तुम्हारे यह लफ्ज़ मुझे ख़ामोशी से निकल लेने को कहते हैं की.... मियाँ मोहब्बत लौंडो का खेल नही है। ©
Sunday, August 28, 2016
कश्मीर
कश्मीर न जन्नत है, न ही खूबसूरत ज़मीन का टुकड़ा।यह सिर्फ और सिर्फ एक प्रयोगशाला है।यहाँ इंसान नही रहते,यहाँ वह जिस्म हैं जिनपर सिर्फ प्रयोग किया जाता है।अब ज़रा देर छदम् देशभक्ति को किनारे रख दीजिये।अपने अपने धर्मो के चोंगे उतारकर खूंटियों पर टांग दीजिये।आइये एक एक कप चाय साथ लेकर बैठिये।देखिये यह एक प्रयोगशाला है की नही।देश में आने वाले हर उन्नत हथियार को प्रयोग करने की इससे खूबसूरत जगह कोई हो सकती है।पहले के हथियारों का ज़िक्र करके आपके उचाट हो चुके मन को नही थाकाएंगे।हम अभी की बात करते हैं।आपने पैलेट गन का प्रयोग किया।सैकड़ो की आँखे चली गई।जिस्म पर आपकी सोच के तारा मण्डल बन गए।दुनिया को लगा यह तो हैवानियत है तब आपने देखा और कहा ओह गलत हुआ।यह पैलेट ठीक नही हैं।अब से इनके लिए मिर्ची बम ठीक रहेगा।वह इन्हें बेहोश कर देगा।इनकी लड़कियो को भी बेहोश कर देगा,शायद बेहोश जिस्म कुछ काम आ जाए।खैर छोड़ो,मिर्ची बम देखो।हम बताएं जब यह भी प्रयोग हो जाएगा तब आप कालीमिर्च बम का भी लगे हाथ प्रैक्टिकल कर लीजियेगा।वैसे उस बम का भी प्रयोग करिये न जो ज़बान को खत्म कर देता।ताज्जुब है की आप पोखरण गए थे परमाणु बम का प्रयोग करने,अगर कश्मीर में किया होता तो अच्छा प्रयोग होता।मैं शुरू से देखूं तो यह वाक़ई प्रयोगशाला ही तो है।राजा हरी सिंह,शेख अब्दुल्लाह,कथित सांस्कृतिक संगठन,राजनितिक दल,धार्मिक कट्टरपंथी,आतंकवादी,अलगाववादी सबके लिए प्रयोगशाला।कश्मीरी पंडितो का पलायन भी तो एक प्रयोग था।यहाँ प्रयोग खूब हुए हैं और डिस्टिल वाटर की जगह इंसानों के ख़ून का खूब इस्तेमाल हुआ है।मैं घर में उस मंत्री की बात के ज़िक्र को सुनता रहा हूँ जिसकी घनिष्ट दोस्ती जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्लाह दोनों से रही है।जिसके बुलावे पर शेख बिना शक किये दिल्ली आ गए और गिरफ्तार हो गए।जिसकी कोशिश से कश्मीर में चरमपंथी किनारे हो गए थे।वह रफ़ी अहमद क़िदवई थे,जिनकी अचानक मौत ने उस कदम को तोड़ दिया जिससे कश्मीर में मरहम लगता था।कुछ बेहतर रास्ता निकल सकता था।अब उनको भी ज़रा ढूंढिये जो किसी भी हाल में कश्मीर में सुकून नही देखना चाहते थे।नेहरू को बदनाम करने के लिए नेहरू को बिना बताए वह कौन था जिसने शेख की गिरफ्तारी का आदेश दिया।वोह कौन लोग थे जो कश्मीर में धार्मिक विद्रोह के बीज बो रहे थे।मैं लिखूं तो किताब भर जाए।ऐसा नही है की कश्मीर में इकतरफा नफ़रत बोई गई है।यहाँ नफ़रत का किसी ने पेड़ लगाया,तो किसी ने खाद डाली तो किसी ने पानी डाला।बड़े सलीक़े से इस प्रयोगशाला में नफ़रत को पाला गया है।जब शेख धोखे से गिरफ्तार हुए तो उनके ही उत्तराधिकारी ने उनसे मुँह मोड़ा।
शेख अब्दुल्लाह के उत्तराधिकारी बख्शी गुलाम मोहम्मद थे।रफ़ी अहमद क़िदवई ने उनसे कहा की हम भरसक कोशिश करके शेख को रिहा करवा लेंगे।बख्शी ने जवाब दिया शेख के रिहा होने के मायने हैं की मेरा हट जाना।तब रफ़ी अहमद क़िदवई ने कहा की इससे कोई फ़र्क नही पड़ता की कौन आता है और कौन जाता।शेख का रिहा होना कश्मीर के लिए ज़रूरी है।कश्मीर में सुकून देश के लिए ज़रूरी है और मैं देश के लिए कोई भी कदम उठा सकता हूँ।रफ़ी अहमद ने संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि डॉ. ग्राहम को भी भारत बुलाया था तब भारतीय मुसलमानो ने कश्मीर को भारत का अटूट अंग और कश्मीरी संविधान सभा पर पूरा विश्वास और पाकिस्तान के दावे के विपरीत हस्ताक्षर का ज्ञापन दिया था।जिसका पॉज़िटिव असर रहा और बाहरी देश इससे दूर ही रहे।
रफ़ी अहमद क़िदवई आखरी दम तक यह कहते रहे की कश्मीर को नासूर बनने से पहले हमे उसे उसके नेचर के साथ अपनाना होगा।
मैं उन सभी सालों को लिख सकता हूँ जिसमे कश्मीर में प्रयोग की नीव रखी गई।मेरे लिए इतिहास बड़ा महत्व अब नही रखता।मैं आपमें से बहुतों के बहुत से उलटे सीधे कमेंट पर कान भी नही धरता।मेरे लिए कश्मीर को भारत के अभिन्न अंग के साथ उसे प्रयोगशाला बनने से रोकना भी है।मेरे लिए ज़मीन की अहमियत इंसान की अहमियत से ज़्यादा नही है।कितना गन्दा लगता है सुनते हुए की अब इनपर पैलेट की जगह मिर्ची बम डाली जाए।मुझे नही लगता की इनमे से किसी के पास इसे सुलझाने की समझ या नियत है।कश्मीर पर हर बात करने वाला बढ़िया तर्क रखता है मगर उस तर्क में कश्मीरियत नही होती।मैं नही कहता की मेरा हर लफ्ज़ सही ही है मगर इतना तो देखिये जो हम कश्मीर में करते हैं वैसे देश के दूसरे हिस्सों में भला करते हैं।पुलिस पर पत्थर मारने वालो को हम एक जैसा बर्ताव करते हैं, नहीं।मेरी सिर्फ इतनी ख्वाहिश है की कश्मीर को प्रयोगशाला मत बनाइये।वहाँ इंसान हैं, चूहे नहीं।एक एक इंसान की उतनी ही अहमियत है जितनी आपकी और हमारी है।इसे बहुत से राज्यो में होने वाले चुनाव में फायदा लेने वाला भी प्रयोग मत बनाइये।आपकी ज़बरदस्ती,वोट तो दिलवा देगी मगर देश को कमज़ोर कर देगी।देश को पहले रखिये।देश जोड़ने से मज़बूत होता है तोड़ने से कमज़ोर।देखिये की हमारी हरकते जोड़ने वाली हैं या तोड़ने वाली।कश्मीर का हल हो सकता है बशर्ते आप ईमानदारी से हल चाहते हों।हमारे मुल्क़ की बेहतरी के लिए एक बार धर्म,चुनावी फायदे को किनारे कर के ईमानदारी से बैठिये ताकि कश्मीर में सुकून आए तो साथ ही मुल्क़ में सुकून आए।टूटे,मायूस,बिखरे हुए दिलों पर कभी कोई देश मज़बूत नही हो पाया है।समझिये और आगे बढ़िए। #हैशटैग #hashtag ©
Friday, August 26, 2016
नासूर
मैं झाँक कर तुम्हारी आँखों में देखता हूँ,तुममे मुझे हिन्दू दिखता है।मैं तुम्हारी आँख में आँख डालकर देखता हूँ,तुममे मुसलमान दिखता है।मैं हर कोण से देखता हूँ तुममे मुझे ईसाई,बौद्ध,जैन,सिख दिखता है।मैं सच बताऊँ लाख कोशिश करता हूँ।आँखों में गुलाबजल डालता हूँ ताकि साफ़ दिखने लगे।शहद भी लगा लेता हूँ ज़बरदस्त मिर्च के साथ फिर भी नही दिखता।तुममे मुझे किसी कोने से भारतीयता नही दिखती।तुममे हिंदुस्तान नही दिखता।
तुम चाहे जितने नारे लगा लो।चाहे जितनी आवाज़ बुलन्द कर लो।चाहे जितनो को भरी सड़क पर पीट लो।चाहे जिसके गिरेहबान फाड़ कर देशभक्ति को चेक कर लो,सच्चाई यह है की तुममे ही हिंदुस्तान नही है।तुम जब भी निकलोगे अपने धर्म की चादर ओढ़कर निकलोगे।तुम चाहे जैसे रँग चढ़ा लो,भारत तुम सा तो नही है।यक़ीन न हो तो सुबह उठना और दिल पर एक थर्मामीटर रखना।देखना दिल में कितनी गर्मी है।वह गर्मी धर्म की आड़ की है नाकी मुल्क़ की।
अपनी ज़बान से बेहिसाब गालियों को तौलना और देखना की क्या यही भारतीयता है या यह तुम्हारी निजी संस्कृति है।मैं यहाँ एक धर्म की बात नही कर रहा,मेरी फ़िक्र हज़ारों साल से,800 साल से,200 साल से,70 साल से हर एक के शासन को पूजने वालो से है की क्या वह कभी हिंदुस्तानी बनकर आज को जिएंगे।पुरखों को जो करना था वोह कर गए,तुममे कितना हिंदुस्तान बचा है यह बताओ।मैं जानना चाहता हूँ की देश की बात करते करते तुम कब धर्म का झण्डा थाम लेते हो।फिर चाहते हो की धर्म की आँख से देश देखा जाए।यह तो भरम है और कुछ भी नहीं।देशप्रेम की पहली सीढ़ी है उसमे बसने वाले हर नागरिक से अटूट प्रेम।जिसमे तुम सब बुरी तरह फेल हो जाते हो।आगे की सीढ़ियों का ज़िक्र ही क्यों करूँ।इतने बिखरे,बँटे और टूटे हुए लोग कभी भी मज़बूत इमारत की बुनियाद नही हो सकते।जाओ और खूब मीनारों से नारा ए तकबीर बुलंद करो।मन्दिरो से धर्म की जय जयकार करो।एक दूसरे धर्मो से भिड़ो।एक दूसरे को खत्म कर डालो।मगर इसे भारतीयता तो मत ही कहो।मेरे हर शब्द बुरे लगेंगे,लगने भी चाहिए।नासूर में जब औज़ार लगता है तो दर्द तो होती है।यह दर्द आपकी ज़बानों पर गाली भी लाएगा।दीजिये।मगर मैं लिखता रहूँगा।करता रहूँगा।या तो तुम्हारी नफ़रत का नासूर खत्म होगा या तो मैं।मैं आखरी साँस तक तुम्हारे बंटे हुए दिलों को रफ्फू करता रहूँगा।एक बार मुल्क़ के लिए सोचो।नफ़रत को दिलों से निकाल दो ताकि यह ज़मीन की भारतीयता बनी रहे।इतनी ज़िद,घमण्ड,झगड़े,फसाद,नफ़रत,बदले से तुम धर्म का झण्डा तो लहरा दोगे मगर भारतीयता की लाश पर।खुद सोच लो की करना क्या है। ©
Thursday, August 25, 2016
बजबजाती व्यवस्था
एक आदमी अपनी बीवी की लाश लिए जा रहा।सब के सब विचलित हो गए।किसी का मन टूटा तो किसी का दिल फट कर बाहर आ गया।मुझे फ़र्क नही पड़ता।बिलकुल फ़र्क नही पड़ता।आप बारह किलोमीटर की बात कर रहे हैं मैंने यहीं बारह घण्टे एक लाश को बिना कपड़े देखा है।जब पहुँचा तो मेरा फटा अंगौछा उस लाश के काम आया।अभी साल भर पहले की एक लाश याद है सड़क किनारे पड़ी थी और उसके पाँच छोटे छोटे बच्चे रातभर उस लाश के पास खेलते और रोते रहे।पूरी रात के बाद अगली सुबह दस बजे उसे बाँस में बांध कर लेकर गए।सही बताऊँ कीचड़ में करीब दस के करीब लड़की के भ्रूण को कुत्तो को जिसने नोचते देखा हो,उसे वह लाश की तस्वीर नही डराएगी।मैं उस ज़िंदा लाश को भी तो देख चुका हूँ जिसे 24 लड़को ने रात भर नोचा और मरा हुआ जानकर सड़क पर फेक दिया।लोगो ने उस लड़की को ज़िंदा पाया जबकि मुझे उसकी मरी हुई आँखे आजभी नही भूलती।यह तो लाश है मैंने जेल में बन बारह बारह सालो से बन उन नौजवानों को भी देखा है जो हज़ार रूपये मुआवज़ा नही जमा कर पा रहे और उनके माँ बाप ज़िंदा से मुर्दा हो चुके,वह नौजवान जेल में ज़िंदा जिस्म के साथ मुर्दा रूह लिए बस वक़्त काट रहे।
वोह कौन सा अपराध है जिसे हम सबने नही देखा।हमे अफसोस होता है, मगर दो कदम नही निकलते।हाँ अगर मामला धर्म का हो तो हम सैकड़ो मील चल सकते हैं।धर्म की रक्षा के नामपर हथियार उठा सकते हैं मगर व्यवस्था की रक्षा के नामपर सिर्फ अफ़सोस।क्यों नही बेईमान अफसरों को खींचकर सड़क पर लाते हो।क्यों नही भृष्ट,कामचोरो को पीटने के वीडियो बनाते हो।पता है क्यों,क्योकि करप्शन,बेईमानी में कोई तुम्हारा ही अपना लगा होगा।मैं इस व्यवस्था से ज़रा भी विचलित नही होता।न ही ज़रा भी हैरत होती है।वह आदमी तो एक लाश कन्धे पर लिए हुए है।यहाँ तो सब मरे हुए हैं, कोई कन्धा भी नही है।हम सब मरे,बदबूदार कट्टरपन से भरे दिमाग भर हैं।यह देश ऐसे करोणों नफ़रत से भरे मरे हुए दिमागों को ढो रहा है।इसलिए कोई विचलन नही।कोई सिहरन नही।कोई अफसोस भी नही।बस इंतज़ार की कब हमारे कन्धे पर हमारी सड़ी हुई लाश हो और किनारे खड़े लाखो सड़े हुए जिस्म हम पर अफसोस करें।बेहद अफसोस।अथाह अफसोस।©
Tuesday, August 23, 2016
वोह वादियाँ और तुम
उठते ही पहली फ़िक्र थी की आज यह पूरा पहाड़ पार कर लूँगा।जम्मू से वादियों की दूरी लम्बी थी।किस्से तमाम तरह के थे।भूख तो लगी थी मगर जाने की जल्दी में खाना छोड़ दिया।अकेले का डर ऊपर कश्मीर की तरह तरह की कहानियाँ।पहले भी गया था मगर तब दसयों साथी थे।बातचीत में न रास्ता देखा न कोई फ़िक्र,मगर अब डर था।पहाड़ खूबसूरत तो लग रहे थे मगर डरा रहे थे।सब भीगा भीगा था इतना भीगा की मेरा माथा भी भीग सा रहा था।ढेर भर इलाईची भी थी मगर खाई नही जा रही थी।थोड़ी थोड़ी दूर पर लगे चेकपोस्ट पहले से डरे लड़के को और डरा रहे थे।एक तरफ गाड़ी में बैठे अनजाने लोग दूसरी तरफ यह रौबदार रंगरूट।मन में था काश कोई जानने वाला मिल जाए।तभी पाँच घण्टे के बाद गाड़ी एक जगह रुकी थी।हल्की बदली में रौशनी धूँधली हो गई थी की अचानक तुम दिख गई।तुम्हे देखते ही लगने लगा की वाक़ई ख़ुदा है।तुम्हारे होने से मैं चहक उठा।मुझे वादियाँ खूबसूरत लगने लगी।तुम्हे देखते ही लगा की वाक़ई इकलौती तुम ही तो हो जो मेरे हर बुरे वक़्त पर मिलीं।जैसे ही तुमने बढ़कर मुझे छुआ मेरी रूह खिल गई।एक हिम्मत सी आ गई।जैसे ही तुम मेरे होंटो से आ लगीं मेरी दुनिया मुझे यहाँ दूर वादियों में मिल गई।रास्ते से ठंडे हुए बदन ने हल्की सी गर्मी के एहसास को जिया।अब सारे अजनबी लोग दोस्त लगने लगे।रंगरूटों की खूबसूरत मुस्कान AK47 पर भारी पड़गई।तुम्हारे होने से ही खूबसूरती निखर आई।मुझे लगा की वाक़ई मैं तुम्हारी मोहब्बत से कुछ वक़्त के लिए ख़ाली थातभी यह मायूसी आई।सुन लो।हाँ सुन लो मेरी चाय,तुम्हारे बगैर मैं ऐसा ही हो जाता हूँ।मेरी हाँ सिर्फ मेरी चाय,तुम यूँ इतनी देर दूर मत रहा करो।आओ हम तुम एक हो जाएँ।या तो तुम मुझे पी लो या तो मैं तुम्हे।मेरी चाय सिर्फ तुम ही तो हो मेरी रूह।मेरी हिम्मत।मेरा हौसला। तुम्हारा गाढ़ा रँग मुझे कश्मीर से ज़्यादा खूबसूरत लगने लगा है उस दिन से।चलो देर हो गई काफी।आओ,अब देर मत करो मेरा सबकुछ,मेरी चाय..... ©