Wednesday, August 29, 2018

मैं कौन हूँ

आईने के सामने खड़ा खुद को देख पूछ रहा था की मैं कौन हूँ ।सवाल सुनते ही आईना चटख कर बोला मेरी क्या दुनिया की नज़र में देखो तुम हो क्या ।कमबख्त नज़र जब बाज़ार हुई तो खुद को कस्टमर पाया ।नज़र बदल कर बाबाओं की हुई तो खुद को भक्त पाया ।नज़र जब राजनीति के चश्मे में डूबी तो खुद को वोटर पाया ।

नज़र जब सरकारी हुई तो खुद को लाभार्थी पाया ।जब स्कूल का रुख किया तो विद्यार्थी पाया ।यही नज़र जब मालिक की हुई तो खुद को मज़दूर पाया । नौकरी वालों की नज़र में बेरोज़गार था ।नौकरी के कभी न पूरे होने वाले प्रयास देने वालों की नज़र में अभ्यर्थी था ।मज़हब में डूबी नज़र के सामने काफ़िर था ।खास मज़हब से चिढ़न वालों की नज़र में जेहादी था ।

यह अजब दुनिया थी जिसकी नज़रों में मैं वैसा ही था जैसा उनकी नज़र दिखलाती ।लेखक की नज़र में मैं पाठक था,फिल्मिस्तान की नज़र में दर्शक,कवि की नज़र में श्रोता तो एक आमजन की नज़र में भीड़ था ।मैं संविधान की नज़र में तो नागरिक भी था ।बाँटने वालों की नज़र में मैं बहुसंख्यक था या अल्पसंख्यक था,पिछड़ा था या अगड़ा था,मलेच्छ था या शुद्ध था  मगर इंसान नही था ।क्या यह सिर्फ मैं था जो मैं नही था बाकि सब था ।टूटे आईने की आख़री किरच मुस्कुरा के बोली आज से कुछ की नज़र में तू अर्बन नक्सली भी तो है ......

Thursday, August 16, 2018

अटल बिहारी

अब जब अटल जी नही हैं ।तब वह तमाम उम्मीद बेईमानी होगी जो हम एक सभ्य राजनेता से करते हैं ।जिस गरिमा की राजनीति के आख़री पायदान पर हमने अटल जी को देखा था,वह सीढ़ियाँ अब खत्म हो गई ।
जब आप एक लम्बी राजनैतिक पारी खेलते हैं तो सबसे पहले दलगत सीमाएँ टूटती हैं,फिर जातिगत और धार्मिक बन्धन खुल जाते हैं ।यह भी एक परम्परा रही है, जिसे अटल जी ने आख़री तक समेट रखा ।अब यह सीमाओं को तोड़ने वाली खेप खत्म हो गई ।अब कोई चाहे जितनी लम्बी।पारी खेले और चाहे जितने बड़े संवैधानिक पद पर पहुँचे, उसका दिल संकुचित ही रहेगा,वह धर्म और जाति में बंधा बँधुआ गुलाम मात्र है ।अटल बिहारी वाजपेयी की खींची लकीर के सामने उनके पीछे चलने वाले हर नेता बौने ही नज़र आने वाले हैं ।

यह देश अपनी लम्बी समृतियों में उस शोखदिल कवि को अलग जगह देगा ।जो बहुत बार खुद में एक विपक्ष था,जिसके अंदर एक इंसानियत की सत्ता थी ।जो अपने रास्ते खुद बनाता था तो कई बार पुराने बने हुए रास्तों से लौट आता था ।रथ यात्रा के नायक को अपने पीछे चलाने की सलाहियत और देश के आमजन के दिलों में पहुँचने का हुनर बहुतों के लिए शोध और सीखने का विषय है ।
मैं आज जब बन्द आँख किये हुए अटल जी को देखता हूँ,तो सोचता हूँ की आखिर हमारे लोकतन्त्र की खूबियों को क्यों न सराहें,क्यों न संविधान बनाने वाले और देश को बुनने वालों की तारीफ़ करें जिनकी बदौलत अटल जी जैसी शख्सियत बिलकुल सही पद तक पहुँची ।
मैं नेहरू के बारे में सोचता हूँ की यह कैसी शख्सियत थी जिसका अपने दल पर तो प्रभाव पड़ा ही विपक्ष पर भी अपनी छाप डाल गए ।उनकी छाँव से गुज़रा विपक्ष का यह सूरमा अपने ही दल में सबसे अलग और विशिष्ट था ।वह कौन सी वजह थीं जिन्होंने अटल जी को उनकी ही पँक्ति के सभी नेताओं से अलग सभी के दिलों का टुकड़ा बना दिया था ।

अटल बिहारी वाजपेयी का न रहना उस बदनसीब घर के जैसा है, जिसके वारामदे से बड़े बुज़ुर्ग का साया हट गया हो ।दरवाज़े पर जिनके रहने से घर ,घर लगता,रौनक थी,जिनके न होने से दर ओ दीवार तो रहेंगे,लोग भी रहेंगे बस घर का मज़ा चला गया ।हम सब दिल को बहलाने के लिए कहेंगे की हमने अटल जी को देखा था,सुना था,मिले भी थे ।हम भी कभी राजनीति में निकले तो कहेंगे की हम अटल जी की उन अलहदा गलियों से होकर गुज़रे हैं जो नेहरू तक जाती थीं ।देश को,देश के हर इंसान को,देश की परम्पराओं को,देश के संविधान को,देश के लोकतन्त्र को बेइंतेहा बेलौस चाहने वाले उसके पुत्र अटल जी आज महान देश की गोद में वापिस सो गए।तमाम सुनहरी जलती बुझती यादों के साथ नमन

Friday, August 10, 2018

दीमक

हम लगातार चढ़ रहे थे ।सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ रहे थे ।आकाश ,जिसे छूने की तमन्ना थी,हम लगातार उसकी और हाथ बढ़ाते दौड़ रहे थे ।हर वह सीढ़ी जो विज्ञानं से जाती थी,कला से जाती थी,संस्कृति और शिक्षा से जाती थी,मूल्यों और समानता से जाती थी,प्रेम और भाईचारे से जाती थी,सबको पार करके हम चढ़ते जा रहे थे ।
इस चढ़ान में नही देख पाए,बिल्कुल नही देख पाए की हमारी सीढ़ी कितनी मज़बूत है ।हम सब चढ़ते हुए सीढ़ियों की में शुरू से लगी दीमक नही देख सके ।सीढ़ी के सबसे नीचे के हिस्से में लगी वह दीमक जो आज़ादी के मुश्किल से दो दशक पहले लगी थी,हम सबने दरकिनार किया ।

नतीजा यह हुआ की बीच रास्ते से हम आकाश को छूने की ख्वाहिश लिए मुँह के बल लुढ़कते आ रहें हैं ।इस लुढ़कने पर भी देखिये जिन सीढ़ियों से हम चढ़ रहे थे,वह सब दीमक चाट चुकी हैं ।अब कोई सीढ़ी हमारे वज़न को बर्दाश्त करने लायक ही नही रही क्योंकि दीमक हर सीढ़ी को अंदर से चाट चुकी है ।हम रोज़ गिर रहें हैं, गिरते ही जा रहें हैं, अब यह गिरना पाताल लोक में खत्म होगा या उससे पहले,मालूम नही ।इस गिरते में एक ही अफसोस है की दीमक को दीमक क्यों नही समझा उसे संस्कृति का सेवक क्यों समझा ।

यह छदम् अनुशासित,संगठित दीमक अपना नब्बे प्रतिशत काम कर चुकी हैं फिर भी दस प्रतिशत का ख़ौफ़ उन्हें मालूम है ।यह आज जागे तो कल से दीमक का सर्वनाश शुरू हो जाएगा क्योंकि वह कायर है, कपड़ों में छुपी रहती है,अक्सर धोती पैजामो में छिपती है,उसे छिपना पड़ता है क्योंकि आज भी समाज दीमक को स्वीकार नही करेगा,इसलिए वह छिप छिप कर मक्कारी से मज़बूत चीज़ को चाट चाट खत्म करती है।
अब गिरने वालों उठो और आकाश की ओर देखो ज़रूर मगर दीमक का इलाज करके ताकि लम्बे वक़्त तक ऊंचाई का मज़ा लो।

Thursday, August 9, 2018

धर्म जब धर्म न रहे

धर्म जब पहले पहले आते हैं, तब समन्दर होते हैं ।विशाल हृदय के समन्दर हर एक को अपने में समा लेने का हुनर रखते हैं ।
फिर धीरे धीरे यह समन्दर बहकर नदियों में बदल जाते हैं ।उसके बाद यह तालाब में बदलते हैं ।फिर यह नालियों में बदल जाते हैं और एक वक़्त के बाद यह नालियों में सड़ते हुए कीचड़ में बदलकर अपने अंदर की बदबू से हर एक को नाक पर रुमाल रखने को मजबूर कर देते हैं ।

यह भी है की नालियाँ सदैव अपने समुद्र रूप का बखान करती हुई बदबू छोड़ती रहती हैं । वह बोलते हैं की प्राचीनकाल से ही हमारा हृदय विशाल और सहिष्णु रहा है, यह ज़रा कुछ लोगों के चक्कर में हम ख़ून चख भर लेते हैं, वरना हम तो सदैव शाँति प्रिय ही रहें हैं । और यह कहते हुए हर धर्म के लोग खुद के नाली रूप पर चादर ढककर समन्दर होने का झाँसा पाते या देते रहते हैं

Wednesday, August 8, 2018

अगस्त क्राँति

....हमेशा ज़ुल्म के लम्बे दौर के बाद एक वक़्त आता है जब कमज़ोर से कमज़ोर जीव ताक़तवर हो जाता है।वह दर्द के पार जाकर दर्द को हराकर ज़ुल्म के मुकाबले खड़ा हो जाता है।हम यहाँ लीडरशिप की बात नही कर रहें।यहाँ बात उस आम से लोगो की है जो जल्दी जल्दी विरोध में खड़े नही होते।जिनमे लम्बे ज़ुल्म की वजह से लड़ाई न लड़ पाने की कई वजह बैठ जाती हैं।जो देश या संस्कृति के संघर्ष से पहले भूख के लिए लड़ता है।जिसकी ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा एक वक़्त के खाने के लिए खर्च हो जाता है।यह वह जीवट लोग होते हैं जो रोज़ ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष करते हैं।मगर हाँ मगर जब यह लोग किसी मुद्दे के लिए बाहर आ गए तो ज़ुल्मी को हारना ही होता है।
बात अगस्त क्राँति की कर रहा हूँ।हम हमेशा ऊपर के नेतृत्व तक सिमट कर क्रांतियों की चर्चा करते हैं।बड़े नामवर नेताओ के इर्द गिर्द हमारी चर्चाए होकर खत्म हो जाती हैं।अगस्त क्राँति को समझना हो तो उसमे कूदे हर जनमानस के मन को टटोलना होगा।

महात्मा गाँधी ने अपने लगातार प्रयत्न से इस क्राँति में उस वर्ग को बाहर ला दिया जो स्वयं अपने ही जीवन से रोज़ संघर्ष कर रहा था।वैसे नौ अगस्त 1942 से क्राँति का आरम्भ माना जाता रहा है मगर उससे पहले ही बहुत से काँग्रेसी नेताओ को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया।यह वह नेता थे जिनके निकलने भर से गरीब अमीर सब घर छोड़ देते।इनकी घर के चूल्हो में पैठ थी।इसलिए इनकी गिरफ्तारी पहले ही हो गई।बम्बई के अधिवेशन में जब गाँधी जी ने भारत छोड़ो का उद्घोष किया तो वहीं से गिरफ्तारियां शुरू हो गई।उत्तर प्रदेश से गया प्रतिनिधि मण्डल गिरफ्तार हो गया।सभी बड़े लीडर जेल में थे ऐसे में वही वर्ग सड़क पर आ गया जो बेहद कमज़ोर था।शहर शहर गाँव गाँव से लोग निकलने लगे।पता नही वह कौन सा जादू था की देश ने भूख पर विजय पा ली और आगे बढ़कर अंग्रेज़ों भारत छोड़ो के नारे को थाम वह कूद पड़े।

करो या मरो,उन्हें लगने लगा की वाक़ई अब आगे बढ़ना ही होगा।बिरतानियो को निकालने के अलावा कोई सूरत नज़र नही आती थी।ज़ुल्म से आम से आम इंसान इतना आजिज़ था की उसने इसका विरोध ही अपना पहला काम बना लिया।करो या मरो ने घर घर में जगह बना ली।इतने बड़े आंदोलन को हिन्दू महासभा,कम्युनिस्टों और लीगियों ने समर्थन नही दिया फिर भी यह जन जन तक पहुँच कर अंग्रेज़ों को परेशान करने लगा।
अगस्त क्राँति का एक जो पहलू ज़मीनी था तो वहीं दूसरा वैश्विक भी था।भारत के कड़े विरोध और इतने मज़बूत नारे ने दुनियाँ को अपनी तरफ खींचा।गाँधी को विश्व युद्ध के दौरान विश्व ने गाँधी की नज़र से देखना शुरू किया।यह आंदोलन विश्व पटल पर बड़ा उदाहरण बना जिससे अँगरेज़ बड़े घबराकर इसे दबाने लगे।दमन का वह चक्र चला की हर तरफ गोलियाँ चलने लगी।बहुत से आंदोलनकारी शहीद हो गए।कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व जेलों में ठूँस दिया गया।अब यहाँ एक बात गौर करने वाली है की जब यह आंदोलन चला तो काँग्रेस तो पूरी जेल चली गई।राज्यो में कांग्रेस के सभी बड़े लीडर जेल में थे।उत्तर प्रदेश का बड़ा छोटा सभी कार्यकर्ता जेल में थे या छुपे हुए थे ऐसे में मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा को अपनी बढ़त के अवसर दिखने लगे।यह काँग्रेस के कमज़ोर होने का तो इंतज़ार कर ही रहे थे।अँगरेज़ सरकार ने इन्हें बड़ा मौका दे दिया।कांग्रेस के सारे करिश्माई नेता जेल में थे ऐसे में इन दोनों संगठनो ने अपनी कार्यवाहियां तेज़ कर दी।काँग्रेस के विरुद्ध अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए इनके नेताओ ने दौरे तेज़ कर दिया।इस आंदोलन की सबसे कमज़ोर कड़ी यही थी।यहीं से साम्प्रदायिकता को वह खाद रसद मिली की उसका परिमाण भयावह हुआ।कांग्रेस के सभी लीडर इस स्थिति के लिए बेचैन थे मगर उनपर इतनी सख्ती थी की उनका एक शब्द भी बाहर नही जा पा रहा था।

हाँ तो इस नाज़ुक मौके को भी देखिये दोनों संगठनो ने खूब मेहनत की मगर देश की जनता ने इन्हें नकार दिया।अवाम ने जेलों में बन्द अपने नेताओ को ही अपनाया और इस बीच होने वाले चुनाव में इन दोनों दलो को काँग्रेस के मुकाबले हरा दिया।अगर हम भारत छोड़ो आंदोलन को उत्तर प्रदेश की नज़र से देखें तो काफी कुछ साफ़ हो जाता है।आंदोलन से पहले ही यहाँ के काफी लीडर जेल चले गए थे।कुछ कांग्रेसियो के तो इतने बुरे हाल थे की उनके घरों के चूल्हे बुझ गए।तब जेल से रफ़ी अहमद क़िदवई इन घरों में आर्थिक मदद भिजवाते ताकि संघर्ष कमज़ोर न होने पाए।उत्तर प्रदेश में कमज़ोर तबक़े ने मज़बूती से संघर्ष को थामा इसलिए यह ज़रूरी था की उन्हें पारिवारिक कामो में कमज़ोर न होने दिया जाए।बम्बई से निकला यह आंदोलन पूरे देश में एक साथ बढ़ गया।

आजके नौजवान को यह ज़रूर मालूम होना चाहिए की यह आज़ाद मुल्क़ किस किस की मेहनत का हिस्सा है।उन घरों को हम कैसे नज़रअंदाज़ कर सकते हैं जो अपना सब कुछ मिटाकर इसमें कूद पड़े।किसी को नही पता था की वह जेल से निकलेंगे भी या नही।वह जीवन के दूसरे छण जी भी पाएँगे या नही।बस एक ज़िद थी करो या मरो।
अगस्त क्राँति की बड़ी कामयाबी थी की यह गाँव गाँव कूचे कूचे से निकल रही थी।एक और जहाँ अरुणा आसफ अली जैसी महिलाए छुप छुप कर इसे मज़बूत कर रही टीही वहीं गाँव की साधारण औरते अँगरेज़ सैनिको के सामने खड़ी थीं।यह आंदोलन पूरी तरह से व्यवस्था के विरुद्ध था,जिसमे जन सहभागिता ने ऊर्जा भर दी थी।अँगरेज़ एक और विश्वयुद्ध में थे तो दूसरी ओर भारत में ज़बरदस्त विरोध झेल रहे थे।इससे खीजकर वह इतने बर्बर हो गए की क्या औरत क्या आदमी,बच्चों तक को बख्शा नही गया।यह हिंसात्मक दमन ने आग में घी का काम किया।पहले कांग्रेस के लीडर लड़ते थे मगर इस आंदोलन ने उन लीडर के रिश्तेदारो,नातेदारों,दोस्तों जानने वालो को भी प्रेरित किया आंदोलन में कूदने के लिए।यही वह वक़्त था जब यह तय हो रहा था की भारत का भविष्य क्या होने वाला है।

महात्मा गाँधी का नेतृत्व सब पर भारी पड़ता गया और उनकी छाप आम जनता के दिलों पर छप गई।नेहरू का पूरा परिवार जेल में था,देश की जनता ने उनके नेतृत्व पर विश्वास जताया।
एक तरफ देश के चोटी के नेता जेल में थे तो दूसरी तरफ आम जनता सड़क पर थी।मैं परिवार के उस हिस्से को ज़रूर बताना चाहूँगा जब रफ़ी अहमद क़िदवई जेल गए तो उनकी पहली फ़िक्र थी आज़ादी के सिपाहियो के घर की स्थिति।रफ़ी अहमद क़िदवई चन्दा जुटाने में बड़ी महारथ रखते थे।जब कांग्रेसी नेताओ पर ज़ुल्म बढ़ने लगा और उनके परिवार को तोड़ा जाने लगा तब रफ़ी अहमद क़िदवई का नेतृत्व काम आया।उन्होंने परिवार के लोगो को जेल में बुलाकर अपने छोटे से छोटे कार्यकर्ता का नाम पता दिया और सख्त हिदायत दी की उनके घरों में चूल्हे बुझने नही चाहिए।उनके कहे का असर की आम लोग बीही इनके घरों में खाना पानी लेकर पहुँचने लगे।यह बड़ा रोमांचक छण होता है की जब आप जेल में हो और कोई अंजान आपके परिवार को अपना समझ सेवा करे।ऐसे मैं वह आपके परिवार के साथ साथ संघर्ष में बराबर का साथी बन रहा होता है।अगस्त क्राँति ने ऐसे हज़ारों क्रान्तिकारियो को पैदा कर दिया जो छुपकर,बचकर मदद को खड़े हो रहे थे।उत्तर प्रदेश से निकला यह मॉडल देशभर में बढ़ता गया।

अगस्त क्राँति ने हमारी मुलभूत संरचना को भी खूब सींचा।हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग अथक मेहनत के बावजूद काँग्रेस की जगह नही ले पाई।जबकि इन्हें सरकार से सहयोग नही मिलता रहा मगर देश की जनता ने देश के लिए संघर्ष करने वालो को चुना।मैं इसीलिए कह रहा हूँ की अगस्त क्राँति ने बहुत हद तक भारत के चेहरे की कल्पना को मूर्त रूप दे दिया था।कम्युनिस्टों ने इस आंदोलन से खुद को अलग करके उसी वक़्त आमजन से अपने रिश्ते पर चोट ले ली थी।समाजवादियो और कांग्रेसियो ने पूरे आंदोलन में बढ़ चढ़ कर घर घर में जगह कर ली।इस आंदोलन ने हमारी प्राथमिकताएँ भी तय कर दीं।
वैसे भारत को समझना हो तो उसके ग्रामीण अंचल को समझये।अगर आंदोलन की कामयाबी समझनी हो तो गाँव में झाँक कर देखिये।अगर आंदोलन गाँव में आ गया तो समझये उसको वह ताक़त मिल गई जिसे कोई कमज़ोर नही कर सकता।अगस्त क्राँति गाँवो में ऐसी पहुंची की ब्रिटिश हुकूमत के पास गाँव की निगरानी के लिए सिपाही कम पड़ गए।कुछ लोगो को लालच देकर वैकल्पिक पुलिस की व्यवस्था भी की जाने लगी।बाराबंकी के तो बहुत से किसानो ने अपने अनाज को जेल में बन्द नेताओ के घरों में पहुँचाना शुरू कर दिया।किसानो और मज़दूरों के इस कदम ने अंग्रेज़ों को बेहाल कर दिया।बहुत से किसान इनकी गोलियों से शहीद हुए।अगस्त क्राँति में हर वर्ग ने हिस्सा लिया।उन्होंने उस नारे को ज़िन्दगी बना लिया करो या मरो।
बहुत बार बहुत सारा कुछ आंदोलन पर लिखा जा चुका है।समाजवाद,गांधीवाद पर महीन से महीन कलम चल।चुकी है।अगस्त क्राँति के बाद देश की आज़ादी और बटवारे को देश ने देखा है।अपने करिश्माई वैश्विक लीडर महात्मा की शहादत को बर्दाश्त किया है।वह पूरा एक दौर निकल चुका है।हम अब आज में जी रहे हैं।मैं बहुत सी बातों, नामों,विचारो को लिख सकता था मगर मेरे लिए वह नब्ज़ ज़रूरी थी जो मैं पकड़ना चाह रहा था।आंदोलन का शुरू होना,उसका बढ़ना,जन जन तक जाना,संघर्ष और परिणाम।इसको समझना ज़रूरी है।यह देखना ज़रूरी है की आम सहभागिता कैसे बढ़े।अगस्त क्राँति में इन सब सवालो के उत्तर निहित हैं।अब आप आगे बढ़िए और इस नारे को फिर से थाम लीजिये।अब हमे अंग्रेज़ों भारत छोड़ो ने कहना हैं।

अब हम गरीबी भारत छोड़ो,नफ़रत भारत छोड़ो,साम्प्रदायिकता भारत छोड़ो,जातिवाद भारत छोड़ो,नशा भारत छोड़ो,अशिक्षा भारत छोड़ो,महिला हिँसा,बाल हिँसा,घरेलू हिँसा भारत छोड़ो,गैर बराबरी,असमानता,अमानवता,हिँसा,दहेज,भृष्टाचार,साम्प्रदायिकता भारत छोड़ो का आंदोलन चलाना चाहिए।यह सब तब सम्भव होगा जब हमे संघर्ष का रास्ता मज़बूती से थामना आ जाए।हममे हर स्तर की लीडरशिप बढ़ानी होगी।जो मज़बूती से इससे लड़ सके।अगस्त क्राँति के बाद फिर एक अगस्त क्राँति की ज़रूरत है।ईमानदारी से अगर इनमे से किसी एक में भी सही नेतृत्व पैदा हो जाए तो यक़ीनन वह खत्म हो जाएगा।हमारे पास गाँधी, नेहरू,लोहिया,अम्बेडकर,रफ़ी अहमद क़िदवई,नरेंद्र देव,आचार्य। कृपलानी,जेपी जैसे संगठनकर्ता और लीडर हैं।जिनके काम को देख कर हम अपने रस्ते तय कर सकते हैं।जब हम दिल से ईमानदार होंगे तो हमारी आवाज़ें हर दिल में पहुँचेंगी।यह भारतभूमि है, इसने हर संघर्ष को समय दिया है तो हमे भी कल के भारत को बनाने में आज मेहनत करनी ही होगी।अब इतिहास को देखकर आगे का रास्ता बनाना होगा नाकी इतिहास की खूबियों पर बात करके वक़्त काटना।मैं तभी अगस्त क्राँति की बहुत सी ऐतिहासिक चीज़ों से किनारा करके सिर्फ यह दिखाना चाहता हूँ की यह कहाँ तक पहुँचा था।भारत का भविष्य अगस्त क्राँति के रास्ते से ही जाएगा।इसलिए इसकी व्यापकता पर पैनी नज़र रखकर आजकी दिशा तय करनी होगी।

हमे हर बुराई को खत्म करने के लिए गाँव गाँव मेहनत करनी होगी।उनको संघर्ष का रास्ता और जूझने की ऊर्जा देनी होगी।उन संघरशील नेताओ को सहारा देना होगा जो अकेले पड़ गए हैं।कोई आए या न आए हमे खुद एक बुराई को चुनकर।उसे खत्म करने के लिए करो या मरो का रास्ता अपनाना होगा।आज युवा बेहद समझदारी से अपना भविष्य तय कर रहा है।उसे देश के निर्माण और संवारने में लगाना सम्भव है बशर्ते सही नियत से लीडरशिप आगे ए।तो अंत में बस यह की अगस्त क्राँति को अब देश आज़ाद हो जाने,अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद फिर से शुरू करना है।हमे वह भारत बनाना है जो अबको खुशियो के मौके दे।जो भेद को मिटा दे।आइये आज प्रण ले की अपनी आज़ादी के नायकों के ख्वाबो को पूरा करेंगे।नफ़रत पर हमारा प्रेम भारी पड़जाएगा।आतंकवाद,हिँसा,सम्प्रदायिकता हमारे प्रयासों से हार जाएगी।उठिये और अगस्त क्राँति की 76वीं वर्षगांठ को सलाम करके इसे आगे बढ़ाइए।हम सब भारतीयो का कर्तव्य है भारत को सुंदर,सुरक्षित,भाईचारे से भरा,सशक्त,विकसित बनाना।

Saturday, August 4, 2018

नील आर्मसट्रोंग

"Houston, Tranquility Base Here. The Eagle has landed.”
यह वह लफ़्ज़ हैं जिन्होंने तमाम किस्से कहानियों को तोड़ दिया।उन दुकानों को कमज़ोर कर दिया जो धर्म की आड़ में चल रही थीं।यह लफ़्ज़ जब गुँजे तो यक़ीन हो गया की वह कोई और नही,हमारे जैसा ही एक गोला है।उस गोले का इस गोले से सिर्फ यह फ़र्क़ है की यहाँ हम हैं और वहाँ हम नही हैं।

ऊपर की लिखे यह वोह लफ़्ज़ हैं, जो सबसे पहले चाँद पर पहुँचकर पृथ्वी पर भेजे गए।ज़मीन ने यूँ तो चाँद के बहुत से किस्से सुने थे मगर 20 जुलाई को वह पहला दिन था जब ज़मीन पर पला बढ़ा कोई इंसान चाँद पर पाँव धरकर,अपने पहुँचने की इत्तेला धरती को देता है।

यह नील आर्मस्ट्रांग का सन्देश था।अब आप कहेंगे इन्हें काहे खींच लाए यहाँ। जब बात सियासत की हो,समाज के संवेदनशील किस्से हों, साहित्य के चटखारे हों तो नील आर्मस्ट्रांग का दामन पकड़ काहे खींचे ला रहे हो।तो यह जान लें की आज उनका जन्मदिन है।चाँद देखकर सब कुछ तय करने वालों को भी आज यह याद रखना चाहिए की नील ने बतला दिया था की चाँद महबूबा का न तो माथा है और न बच्चों का मामा, हाँ अगर रिश्तों से ही हर अहमियत तलाशनी है तो बात अलग,वरना थोड़ी मेहनत के बाद चाँद भी हमे पनह देने को तैयार हो सकता है।

खैर बचपन में उड़ते जहाज़ देखने वाले और बाप की ऊँगली थाम जहाज़ों की कलाबाजियों पर खिलखिलाकर हँसने वाले नील कब उड़ने लगेंगे किसने सोचा था।पन्द्रह साल की मामूली उम्र में पायलट बनकर यह तो दस्तक दे ही दी थी की उनकी ऊंचाई का कोई अंदाज़ा नही लगा सकता ।नील का मिजाज़ लाजवाब।सबके दोस्त,ज़बान मासूम,मोहब्बत और इंसानियत की मिसाल।वाक़ई बेहद नरम मिजाज़ और सबको साथ लेकर चलने की कला।न किसी से प्रतियोगिता और न बुराई बस अपने मकसद में चलते चले जाना।
सोचिये जब चाँद पर पाँव धरकर लौटे तो लोग उनके लम्बे लम्बे भाषणों का इंतज़ार कर रहे थे ।होता भी तो यही था,मगर नील ने अपनी क़ाबलियत को मासूमियत में लपेट कर सिर्फ इतना कहा..

That’s one small step for man, one giant leap for mankind.” ('एक आदमी का छोटा क़दम, मानवता के लिए बड़ी छलांग') और चल पड़े अगले सफ़र की तरफ।।।आज नील का जन्मदिन है, हमे तो यह हमेशा आकर्षित करते रहे,खासकर तब जब जब पूरा चाँद आसमान से झाँकता है।मुझे उसपर नील का पाँव नज़र आता है।हो सके तो नील को देखकर वैज्ञानिक सोच पैदा कीजिये वरना जो माहौल है वह तो हम सबको विज्ञानं से बहुत बहुत दूर ले जा रहा है ।हो सके तो आपस में धर्म के नामपर ख़ून खराबे से ज़्यादा विज्ञान की चिंता कीजिये ।यही से नस्ले सुधरेंगी और खुश होंगी ।विज्ञान ही विकास है बाकि सब भरम है ।नील की तरह बड़े दिल का इंसान बनिए,नील को बहुत सी मोहब्बत आज...

Thursday, August 2, 2018

कक्षाद्रोही

दो का दो ,दो दूनी नौ
नही सर दो दूनी चार
निकल जाओ कक्षा से
....
राम जी बनारस में पैदा हुए
नही सर वह तो अयोध्या
निकल जाओ तुम भी
....
अहमदाबाद देश की राजधानी है
नही सर वह तो दिल्ली
अबे तुम भी निकल लो कक्षाद्रोही बे
....
सर आप यह सबको गलत पढ़ा रहें,जो टोक रहा उसे निकाल दे रहें,हम इसकी शिकायत प्रिंसपल से करेंगे
अबे तुम्हे तो मरना होगा,वह भी प्रिंसिपल के हाथ हाहाहाहा
.....
जो पढ़ा रहें हैं, पढ़ लो,करोणों लोग वही पढ़ रहें,बस तुम्है स्मार्ट बन रहे हो ।ई जान लो प्रिंसिपल जी और हमसे स्मार्ट ह्याँ कोई नही ।कच्छा भक्त बनो,ओह सॉरी कक्षा भक्त बनो या फिर कक्षाद्रोही । पढ़ो या मरो ।केवल दुई विकल्प हैं....सब मिलकर बोलो जय श्री.....अच्छा रहन दो,ई तो क्लास है.. ओए चपरासी सब बिद्यार्थी जन की रस्सी खोल दो,पढ़ाई हो गई,स्मार्ट क्लास आज पूरी भई ।जो निकाल दिए गए हैं, उनका सरीर दिखना नही चाहिए यहाँ,वरना....