Thursday, October 31, 2019

बचो इनसे

प्रश्न: किससे बचकर रहें ?
उत्तर : फ़रेबी से ।
प्रश्न : फ़रेबी कौन है ?
उत्तर : अपने धर्म का कट्टर इंसान और दूसरे धर्म का सेक्युलर इंसान जिन्हें बहुत अच्छा लगता है, वही तो फ़रेबी हैं ।

Wednesday, October 30, 2019

इंदिरा

तेरह साल की मामूली सी उम्र में "बाल चरखा संघ"बनाया।बचपन में ही कुछ था,जो लोगो को दिख रहा था।दिल्ली में 47 के दंगो में वोह कूद गई।गाँधी के कहने पर उसने दंगो में लोगो की ख़िदमत करना अपना मकसद बना लिया।हमसे कई बार होता है किसी की बुराई करते करते हम इतने बुरे हो जाते हैं की उसकी अच्छाइयों को भी नज़रअंदाज़ कर जाते हैं।
इंदिरा गाँधी ने सारी ज़िन्दगी काम किया।सारी ज़िन्दगी मुल्क़ के लिए जी।इंदिरा ने एक के बाद एक भारत के बाहर अपने कदम बढ़ाए।उनके कदमो से दूसरे मुल्कों में भारत की धाक पहुँची।

अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, बर्मा, चीन, नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में वोह पहुंची। उन्होंने  फ्रांस, जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य, जर्मनी के संघीय गणराज्य, गुयाना, हंगरी, ईरान, इराक और इटली जैसे देशों का आधिकारिक दौरा किया।अल्जीरिया, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया बेल्जियम, ब्राजील, बुल्गारिया, कनाडा, चिली, चेकोस्लोवाकिया, बोलीविया और मिस्र जैसे बहुत से देशों का दौरा किया।वह इंडोनेशिया, जापान, जमैका, केन्या, मलेशिया, मॉरिशस, मेक्सिको, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, नाइजीरिया, ओमान, पोलैंड, रोमानिया, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, सीरिया, स्वीडन, तंजानिया, थाईलैंड,त्रिनिदाद और टोबैगो, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, अमेरिका, सोवियत संघ, उरुग्वे, वेनेजुएला, यूगोस्लाविया, जाम्बिया और जिम्बाब्वे जैसे कई यूरोपीय अमेरिकी और एशियाई देशों के दौरे पर गई।उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भी अपने कदम रखे।

यह गिनती सिर्फ इसलिए है की उस वक़्त वोह कितनी तेज़ कदम बढ़ा रही थीं।मुल्क़ के लिए जी रही थीं।कुछ कदम गलत हो सकते हैं।उसकी सज़ा उनकी ही ज़िन्दगी में उन्हें मिल गई।कुछ को लगा यह सज़ा कम है तो उनकी ज़िन्दगी ही उनसे छीन ली गई।यह नेहरू परिवार की पहली शहादत थी या कहें शहादत की नीव थी।
इंदिरा को अपने हर कदम का बखूबी अंदाज़ा था।इंदिरा ने मुल्क़ तो टूटने से बचा लिया था मगर खुद को बचाने को तनिक भी फिक्रमन्द नहीं थी।उनमे नफ़रत भी नही थी।नफ़रत अगर होती तो उनके अंगरक्षक कब के बदल जाते।

इंदिरा के दामन पर जो भी छींटे डाली जाती हैं,उन छींटों में कहीं साम्प्रदायिकता नही है,कहीं पर नफ़रत नही है।इंदिरा इन सब चीज़ों से आज़ाद थीं।इंदिरा के व्यक्तित्व पर लगातार ऊँगली भी उठी और सराहना भी हुई।लिखने को कितना कुछ लिख सकते हैं उनकी शखसियत पर मगर वक़्त उनको ज़िन्दगी में उतारने का है। आज उनकी शहादत के मौके पर हम उनकी मेहनत,जज़्बे,मोहब्बत और पूरी समर्पित ज़िन्दगी को सलाम करते हैं।
देश की सबसे सशक्त,निडर,प्रधानमन्त्री इंदिरा की बहुमुखी प्रतिभाओं और पूरी ज़िन्दगी मुल्क़ के लिए लगा देने को दिल से सलाम।

 जिन्होंने एक नाखून तक नही कटवाया मुल्क की खिदमत में वह तो इंदिरा की शहादत से जलन रखेंगे ही मगर नागरिक,वाक़ई जो भारत गणराज्य का नागरिक है,वह अपनी बेमिसाल हिम्मती इंदिरा की इज़्ज़त करेगा । मेरा हाँ सिर्फ मेरा मानना है, इसमे कोई ज़बरदस्ती नही की इंदिरा के बाद से देश की कुर्सी पर वैसी कोई शख्सियत नही विराजी,इंदिरा बहुत अलग थीं,तमाम परतों में ढली एक मज़बूत काया...

Monday, October 28, 2019

निज़ामुद्दीन में दीवाली

इस बार हमने दीपावली अपने उस्ताद सँग मनाई । रौशनी का त्यौहार,अँधेरी ज़िन्दगी में रौशनी दिखाने वाले के साथ,यानि हज़रत निज़ामुद्दीन की दरगाह पर । तीन दिन रहे,लोगों को आते जाते देखा,उठते बैठते देखा,सोते,जागते देखा,यहाँ ही तो भारत बसता है दिखलाई देता है ।

जब कोई नफरत की बात करता है, जब कोई।दो धर्म के बीच तकरार करता है, मेरा मन करता है कि इसके सीने में मैं हाथ उतारकर,दिल निकाल लूँ और उसे साफ पानी से धोकर,उसका सारा मैल धो दूँ, फिर उसका दिल उसके सीने में पवित्र करके लगा दूँ, ताकि उसे एहसास हो कि वह इंसान है, हैवान नही,इंसान जोड़ने का नाम है, हैवान तोड़ने का नाम है ।

मैं चाहता हूँ मस्जिदों में चिराग जलें, मंदिरों में सिवई बंटे, यह तो इतना मुश्किल भी नही,बस दिल ही तो बड़ा करना है । निज़ामुद्दीन की दरगाह पर जो चिराग जलाए गए,यकीनन उससे खुदा मुस्कुराए होंगे। हमारी "लिंचिंग और हिंसा मुक्त भारत यात्रा" के यूपी के एक गाँव मे पड़ाव पर,मां काली के मंदिर में पुजारी ने फैसल भाई और यात्रियों को नमाज़ पढ़ने की जगह दी,तो यकीनन उससे भगवान प्रसन्न ही हुए होंगे । कौन ईश्वर है, जो चाहता है कि उसके मानने वालों के दिल छोटे और नफरत भरे हों,कोई तो नही...

बहुत अरसे से दिल मे एक ख्वाहिश थी कि कभी तो दीपावली अपने उस्ताद सँग मनाया जाए । हज़रत निज़ामुद्दीन और अमीर ख़ुसरो के बीच बैठकर मैं रौशनी ही तो निहारता रहा,सिर्फ यह सोचकर कि मेरे दिल का सारा अंधियारा मिट जाए और मैं भी मैं न रहकर कुछ भी न रह जाऊं । इस बार की दीपावली,जिसको मेरी आँखों ने देखा,दिल ने महसूस किया,बिल्कुल ही अलहदा दीवाली रही,सब चिराग बाहर जला रहे थे,लपक लपक,बेलौस मोहब्बत से जला रहे थे,मैं अपने अन्दर चिराग जला भी रहा था और बुझा भी,क्योकी हर बुझाने में कोई बार बार आ रहा था,उस चिराग को जलाने,उसका आना ही तो मेरा मैं से मिटकर सिफर हो जाना है.....

Saturday, October 26, 2019

एकदा

एकदा चिदम्बरम पिल्लै

स्पीकिंग ट्री

एनबीटी स्पीकिंग ट्री

जन्म की पूर्व संध्या

कल जब वह पैदा होगा,कुछ लोग जिनकी बपौती है, वह अधिकार स्वरूप उसपर दावा ठोकेंगे । कल ही वह भी उसके हाथ बेशर्मी से खींचकर अपने सर पर रख कर आशीर्वाद लेंगे,जिनके दिल मे उससे नफरत है । कल वह जन्म लेगा जिसके जनमने से पुतलीबाई संसार में जानी गई,कल वह जन्म लेगा, जिसके धरती पर पाँव रखने से करमचंद गाँधी सदियों याद किये जाएँगे । कल वही तो जन्मेगा,जिसके जन्म ने उसके मां बाप भाई बहन  पत्नी पुत्र सबके नाम दुनिया के ज़बान पर याद करवा दिए । एक ऐसा दीपक जिसने कुल को तो मशहूर किया,साथ ही धरती के उस हिस्से को भी मशहूर किया,जो वक़्त के कोहरे में कहीं छिप गया था ।

चाहे जितनी उससे नफरत कर लो या चाहे जितना उससे प्रेम करलो,दोनों ही स्थितियों में तुम दोनों उसके नज़दीक़ बराबर ही होते । दुश्मन का दोस्त और दोस्त का दोस्त,शिष्यों के गुरु और गुरुओं का गुरु,कुछ भी आसमान से लेकर नही आया था । किसी जंगल या पहाड़ पर लोगों से हटकर नही गया,बल्कि लोगों में रहकर,गलतियाँ करके,उन्हें सुधारकर उसने खुदको तपा कर,पिघला कर,चोट देकर गढ़ा था। इस धरती का ऐसा ज़ेवर,जो खुद ही धातु था,खुद ही निर्माता था और खुद ही सही गले का हार बनकर छजता था ।

कल जब वह जन्मेगा,दोस्त दुश्मन सब उसको खींचेंगे की यह मेरा है । नफरत करने वाले भी उसे देखकर खुद के दिल को ठंडक देंगे । हर एक दावा ठोकेगा की मोहन मेरा है । मोहन भला कब किसी एक का है ।

जो दर्द से तड़पते दिल को देखे,न कि उसकी चमड़ी । जो मायूस बैठे इंसान को उठाए बिना उसकी जाति देखे,जो टूटे हुए दिल को जोड़े बिना उसके धर्म देखे,जो एक गाल परथप्पड़ खाने को कहे और उससे आगे बढ़कर गोली खाए । क्या अब भी करनी और कथनी के संगम देखने को कोई और तरफ नज़र दोहराओगे ।

तुम तो एक गाल से दूसरे गाल के थप्पड़ पर बिदक जाते हो,कहते हो कि यह सम्भव नही,जबकि उसने सीने पर एक के बाद एक करके तीन गोलियाँ उतरने दीं और बदले में क्या कहा,हे राम,हे राम,हे राम ।

उसने तो करके दिखलाया । मोहन तो करके ही दिखलाते हैं । उनका दर्शन उनके कर्म में है । कल जब वह जन्मेगा,तब उसके विचारों पर बात होगी,विचारों का दोहराया जाना ही तो मोहन को मोहन बनाता है । तुम उसे अच्छा कहो या कहो बुरा,दोनो ही का वह आधार है । मोहन को श्रेष्ठता के लिए किसी आधार की आवश्यकता नही है, क्योंकि  संपूर्णता इससे परे है ।

मोहनदास करमचंद गाँधी एक न मिटने वाली लकीर है,इस लकीर को लोग अपनी अक़्ल के हिसाब से आज नही तो कल मानेंगे । जिसके पास जब अक़्ल आएगी,वह जानेंगे कि कौन था मोहन ।
कल दुनिया मोहनदास करम चंद गाँधी का पैदा होना देखेगी और महात्मा गाँधी बनने तक के सफर में खुद को जितना पाएगी,उतने में ही उल्लास मनाएगी । कोई मोहन की सफाई भर से खुश होएगा,कोई मोहन के प्रेम से तरेगा,कोई मोहन की राजनीति से इतराएगा, कोई ब्रह्मचर्य के प्रयोग में खुद को भीगा हुआ पाएगा,कोई मोहन के लेखन से आंखे दो चार करेगा,सबको अपने अपने हिस्से का मोहन कल मिल ही जाएगा । पता नही किसको सम्पूर्ण मोहनदास करम चंद गाँधी मिलेगा....

Tuesday, October 22, 2019

शासन के नियम

"संसार एक उद्यान है, जिसकी सिंचाईं राज्य से होती है । राज्य एक शक्ति है जिसपर धर्म का जीवन मरण आधारित है । धर्म एक राजनीती है, जिसकी बागडोर  बादशाह के हाथ में है । बादशाह उस व्यवस्था के लिए उत्तरदायी है जो सेना की सहायता पर निर्भर है । सेना उन सहायकों के समूह का नाम है जिनका पालन पोषण धन द्वारा होता है । धन वह कर है जो प्रजा से एकत्र किया जाता है । प्रजा उन लोगों के समूह को कहते हैं जो न्याय के आधार पर जीवित रहता है । न्याय वह उत्तम वस्तु है जो संसार के अस्तित्व का कारण है ।"

सिर्रुल असरार में अरस्तू ने यह आठ वाक्यों का गोला बना दिया और इसी में दर्शन और राजनीती के ऐसे टाँके लगाए जिसकी कढ़ाई देख आने वाली नस्लें पलकें ही झुकाती रहीं । इस गोले का कौन सा वाक्य सिरा है और कौन अंत, पता नही,कहाँ से शुरू और कहाँ ख़त्म ।बस इतना पता है की सर्वोश्रेष्ठ शासन वह है जो न्याय कर सके । न्याय,जो प्रकृति या ईश्वर ने किया है ।मैं हर उस शासन को शासन ही नही मानता जहाँ शासक अन्याय करे ।

वैसे मैं दिन रात लगा हूँ की अरस्तू,अल मिस्क काफ़ूर,अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद,अबु जाफ़र मुहम्मद बिन जरीर अत्तबरी, मुहम्मद बिन उमर अल वाकेदी ,अली बिन हुसैन अल मसऊदी, ह्य्यान बिन खलफ़,अब्दुर्रहमान इब्ने खलदून,अफ़लातून और सुकरात जैसे विचारकों  ने जो पुरानी गिरह खोलकर फिर से अपने आसान तरीके से नई गिरह बांधी,वह गिरह खुल जाएँ ।ज़माना ज़माने की नब्ज़ पकड़ना सीख जाए

वह जान जाए की आज़ादी,ख़ुराक और इंसाफ किसी भी इंसान के इंसानी पहचान की पहली शर्त है, जिसे कोई दूसरा इंसान खत्म नही कर सकता बल्कि इसे पूरा करने में मदद ही कर सकता है, तभी वह इंसान हुआ । जो इंसानियत से ख़ाली है, वह इंसान ही कहाँ और ऊपर का चक्र तो इंसानों के लिए है,एक ही सूत्र सब साथ चलो,साथ बढ़ो ...

Monday, October 21, 2019

हिटलर गांधी

जब आप हिटलर और गाँधी दोनों की परछाई ओढ़ना चाहते हैं, तो लगता है कि आपमें कुछ तो ख़ाली है, जिससे आप हर एक को भ्रम में रख रहें । हिटलर की सनक और गाँधी की धमक दोनों एक जिस्म में कहाँ रह सकती हैं । हिटलर के कपड़े और कपड़ों से खाली गाँधी की काया में से दोनो को पकड़ेंगे तो बौखल ही लगेंगे ।

गाँधी और हिटलर ऐसी दो नावें हैं, जिनकी अकेले अकेले सवारी करना ही क्या कम दुशवार है,जो ऐसी दो विपरीत नावों की एक साथ सवारी करना परम् मूर्खता ही दर्शाएगी । जो लीडर इन दोनों के गुणों को खुद में पैवस्त करेगा,वह ज़मीन का सबसे बौखल इंसान ही होगा या तो खुद को जनवाने पहचनवाने वाला कमज़र्फ इंसान ।

मैं दुनिया के तमाम लीडर देखता हूँ,वह गाँधी को ज़ुबान पर रखते हैं और हिटलर को मन में, तब लगता है कि क्या खुद का कुछ इनमें है भी,या बस खाली डब्बा ।

गाँधी की बात करना जितना आसान है, उतना ही कठिन है उनके रास्ते पर चलना । हिटलर की बात करना जितनी कठिन है, उतना ही आसान है उसके रास्ते पर चलना । यह दो विपरीत ध्रुव हैं, विपरीत नावें हैं ।

खुद में रखना है तो किसी एक का गुण रखिये,किसी एक कि तरह बनिये, कोई एक सिम्त की नाव पर चलिए,कहीं तो पहुँचियेगा । दोनों नावों की सवारी कहीं नही पहुँचाएगी, यह आज़ादी की लड़ाई के एक मज़बूत स्तम्भ साबित भी कर चुके हैं । हिटलर और गाँधी, एक साथ कहीं भी नही पहुँचेंगे । अलग अलग इनके बड़े आसमान हैं, जिस आसमान को इनकी मौत के बाद भी सम्मान मिले, उस आसमान को चुनिए ।

आपको लग रहा होगा कि मैं यह कौन सी फालतू बात लेकर बैठा हूँ,मेरा यक़ीन करो,उस आदमी को गौर से देखो जिसमें गाँधी और हिटलर दोनो की छींटे हों,वह खाली है, डब्बा है, वह तुम्हे कहीं भी नही पहुचाएगा,वह सिर्फ झांसा भर है, एक दिन मंझदार में छोड़ जाएगा,तब डूबोगे,ऐसे हर इंसान,लीडर,दोस्त,व्यवहारी से दूरी बना लो । जो विस्तार देगा,वह गाँधी है, जो संकुचित करेगा,वह हिटलर है, जो मूर्ख बनाएगा,वह दोनों को एक जिस्म में ढालेगा । फैसला आपका की आप खुद को विस्तार देंगे या संकुचित करेंगे या मूर्ख बनेंगे ।

Friday, October 18, 2019

मजाज़

आहिस्ता बोलिये,ज़िन्दगी भर जागने के बाद अब ये सोए हुए मजाज़ हैं । काश अब यहाँ बिखरा हुआ सुक़ून उस सदी की सबसे बेचैन रूह को जागते हुए मिल गया होता । मैं मजाज़ की नज़्मो से दूर वहाँ खड़ा हूँ जहाँ वह अपनी सबसे अज़ीज़ बहन सफ़िया अख्तर के हाथ पर सर रखे हुए सोए हैं ।मैं मजाज़ के उस सब्र को देख रहा हूँ जब सफ़िया आपा ने जाँनिसार अख्तर को पसन्द किया । ज़माने को मुट्ठी में करने वाला मजाज़ बहन के इस क़दम को रोक नही सका ।बस इतना कहा देख लो,जाँनिसार आँधी है ।

एक तरफ़ मजाज़ का दिल था,जिसे सब समझते थे मगर समझ कर समझना नही चाहते थे तो दूसरी तरफ़ सफ़िया थीं,जिनका दिल जाँनिसार जैसी आँधी को ज़ब्त करके भी, खामोश भाई की सरकती ज़िन्दगी देख रहीं थीं ।
आज मजाज़ की पैदाइश है, सफ़िया जानती थीं की मजाज़ को ज़ाफ़रानी रवे का हलवा और परतोंदार पराठा पसन्द है ।मजाज़ के हर शौक़ को उसका पूरा परिवार जानता है ।देर रात तांगे वाला जब मजाज़ को किसी बुझ चुकी महफ़िल से उठा कर लाएगा तो बारामदे में तकिया के नीचे उसका किराया रखने वाली मजाज़ की माँ भी जानती हैं की मजाज़ का दिल भरा है मगर जेब ख़ाली है ।

यह पाँच कब्रें हैं, यह एक दौर की अजब नक़्क़ाशी हैं । जो रिश्ते ज़िन्दगी भर एक दूसरे को समझने में उलझे रहे,वह यहाँ सुक़ून से सुलझे हुए सो रहें ।ख़ैर कितना लिखे और क्या क्या कहें,जब भी कब्र पर हाथ रखता हूँ तमाम दस्तावेज़ वरक़ दर वरक़ खुलने लगते हैं ।

मजाज़ का जन्म आजके दिन का है और मृत्यु भयँकर सर्द रात की है । ज़ाहिर है जो अक्टूबर के खूबसूरत दिल का मालिक हो,वह आती ठिठुरन को गले तो लगाएगा ही और एक दिन यह बर्फ सी ठंडक दिल की गर्मी को भी जकड़ लेगी,किसने जाना । मजाज़ नही रहे,वह तो दो दिलों की नफरत से बेचैन बेचैन घूमते फिरते,अगर आज होते तो क्या होता । जब कोई मजाज़ से पलट कर पूछ लेता की बताओ,तुम्हारी देशभक्ति क्या है, मजाज़ का जवाब इस सदी की सबसे ताक़तवर नज़्म होती,जिसके पीछे हम सब छिपकर अपनी ताकत का हुल्लड़ मचा रहे होते,मगर न अब मजाज़ हैं और हवाएं गर्म हो रहीं हैं, दिल मुर्दा....

Tuesday, October 15, 2019

रुक जाओ

आप नही पढ़ेंगे अगर हम लिखें की नौकरी जा रहीं हैं । आप ध्यान भी नही देंगे मुझपर अगर मैं कहूँ की अर्थव्यवस्था मुँह के बल गिर रही है । आप को न यह पढ़ना पसन्द है और न ही इसपर सोचना,क्योंकि आप मज़े में हैं । मज़ा भी यह कि दूसरे धर्म के छक्के छूटते दिख रहें हैं, तो चलो खींस निपोड़कर मुस्कुराया ही जाए  । दूसरों की बर्बादी के लिए सरकार चुनते हुए,खुद किस क़दर बर्बाद हो गए,आपको यह सुनना भी पसन्द नही है ।

हमारा क्या है, चाहे जितने झींगुर बोलें,चाहे जितने भेड़िये घेर लें,चाहे जितने बिज्जू बदन को नोचें,सच तो बोलना है, बोलेंगे,सच पर चलना है, चलेंगे । सच यह है कि आजतक किसी कौम, किसी जाति,किसी धर्म को मटियामेट करने का ख्याल ही मन मे नही आया,वोट तो बहुत दूर की बात है ।

पचासों इस्लामी मुल्क थे,खूब इस्लामी कट्टरपन कुछ मुल्कों के सर चढ़कर बोला, पलट कर देख लीजिए बर्बाद हो गए । ईसाई मुल्क भी देख लीजिए,जब ईसा की निंदा पर सर में कीलें ठोक दी जाती थीं,तब यह देश भी बर्बाद ही हुए,यह तरक्की पर तब आए, जब हर एक को साथ लाए । इस्लामी मुल्क जो कट्टरपन को ढोते रहे,बर्बाद हो गए । अब आपकी बारी है, धर्म सर चढ़कर बोल रहा है, बरबादियाँ दरवाज़े तक आ चुकी हैं और धर्म का नशा है कि और मदहोश कर रहा है । मकसद क्या है, बस दूसरे धर्म को जूतों की नोक पर रखना,भले ही यह करने में मुँह के बल गिरकर अपना पूरा वजूद ही बर्बाद कर दें ।

जो लोग अपनी तरक्की में किसी दूसरे को रोड़ा समझते हैं, वह मक्कार किस्म के लोग होते हैं । अभी वक़्त है, दिलों से नफरत,जलन को निकाल फेकिये,वरना बर्बाद हो जाइयेगा । एक होइए, य न भी एक होइए मगर आपस मे नफरत मत रखिये । ऐसे लोगों को नेतृत्व दीजिये,जो दिलों को न बांटता हो,जो नफरत को न बढ़ाता हो और जिसे काम करना आता हो । कट्टरपन और ताक़त का नशा दुनिया मे अच्छे अच्छे देश बर्बाद कर चुका है,सम्भल जाइये,इससे पहले की मिट जाइये । मिलकर,एक होकर, एक दूसरे का साथ देकर,खूबसूरत भारत का निर्माण करें,क्योंकि अंत मे यही शांति पर सबको लौटना है....

Monday, October 14, 2019

कलाम जन्मदिन

और एक रोज़ वह चले गए ।जैसे कोई बच्चा घाँस से हरे भरे मैदान में खेल रहा हो और फ़रिश्ते उसका हाथ पकड़ आहिस्ता आहिस्ता खेलते हुए ही दूर बहुत दूर आसमान तक लिए चले जाएँ । जहाँ से वह दिखे भले न मगर उसके क़हक़हे यहीं ज़मीन पर मौजूद गूँजते रहें ।

कलाम मेरे दोस्त,मेरे उस्ताद,मेरे मुर्शिद,मेरा इश्क़,मेरा ग़ुरूर,मेरा वजूद ऐसे ही हवा में सीढ़ियाँ चढ़ते हुए इतना ऊपर चले गए की अब बस किस्से और बातें ही यहाँ रह गईं ।

एक ऐसी शख्सियत जिसका जन्मदिन जयंती में बदलते देखा है हमने,एक ऐसी रूह जिसका किसी पर कोई ग़म,कोई बदला,कोई तक़लीफ़ बाक़ी नही । मैं कलाम को ज़िन्दगी में उतारता चाहता था,उनकी क़ाबलियत नही बल्कि सादापन,अथाह भरे होने के बावजूद ख़ालीपन, तमाम ऊँचाइयों के बाद भी ज़मीन पर मौजूद रहना ।

कलाम हाँ मैं जी या साहब लगाकर कभी अपनी खुद की रूह को ख़िताब नही करता ।कलाम के चेहरे पर बिखरी यह सफ़ेदी मुझे ख़ूब लुभाती थी,जिससे जवानी में ही बूढ़ा होने की अजीब खब्त सवार रही । ख़ैर कलाम सुबह के बाद अब ढंग की दो प्याली चाय मौजूद है और सामने ही 2020 का भारत भी नज़दीक़ है ।

आइये और चाय पीते पीते ख़ुद को इसमें ग़र्क करदें । देखते हैं यह दिलों को जोड़ने वाला साल होगा या तोड़ने का,यहीं से कलाम का युग शुरू होगा,इतना तो यक़ीन है ।प्रेम,त्याग,समर्पण,सादगी और तरक़्क़ी का युग । कलाम को मैं वैज्ञानिक से ज़्यादा एक भला इंसान मानता हूँ, वह सीधे और सरल थे,उनमें गुरु और शिष्य दोनों साथ रहे,ताउम्र,वह काम करने आए और काम करते ही हुए इस दुनिया पर अपनी मोहर लगा कर चले गए । वह मोहर मेरे दिल पर भी इतने गहरे तक धँस चुकी है कि सोने नही देती कलाम,आपकी यह मोहर कहती है कि एक दिन हम सुधरकर इंसान बन जाएँगे, तब विज्ञान मुस्कुराएगी...

Sunday, October 13, 2019

मच्छर लिंचिंग

मच्छरों ने आपातकालीन मीटिंग बुलाई । नौजवान हों या बूढ़े,हर लिंग,हर वज़न, हर किस्म के मच्छर इकट्ठे हुए । मच्छरों की लीडर ने ललकारते हुए कहा कि हमारे बीच कौन नमक हराम पैदा हो गया है, जो खाने की थाली में ही छेद कर रहा है ।

लीडर तो बूढ़ा मच्छर था,वह तमतमा कर लाल हो रहा था । उसने बोलना जारी रखा और कहा ,हमारे बीच कोई डेंगू मच्छर आ गया है, जो पूरी प्रजाति को बदनाम कर रहा है । अरे हम लोग भी इंसान का खून पीते हैं, मगर मारते तो नही हैं, इंसान को मारने की ज़िम्मेदारी हमने इंसान पर ही छोड़ रखी है । यह डेंगू,हमारी संस्कृति और विचारधारा के विरुद्ध है, इसे बांध कर ऊंचे तख्त पर लाओ ।

कुछ मच्छरों ने एक सफेद धारी दार थोड़े तन्दरुस्त मच्छर को पकड़ कर,रस्सी से जकड़ कर ऊंचाई पर ले जाने लगे । डेंगू मच्छर गिड़गिड़ाया,लड़खड़ाया और बोला,मालिक, मैं तो ऊँचाई पर चढ़ नही सकता और यह जो ज़हर है, आपको पता है हमारा अपना नही है । हम भला क्यों इंसान को मारेंगे । हमने तो एक दिन दो इंसानों को किसी बात पर लड़ते देखा,मैं बहुत भूखा था,मेरे देखते देखते दोनो के झगड़े में कहां से सैकड़ो की भीड़ आ गई,मैं बहुत खुश था कि चलो,भूख मिटेगी । मगर उस भीड़ ने अपने जैसे ही एक इंसान को कुचल कुचल कर मार डाला । पूरी ज़मीन पर खून बिखरा था,भीड़ भाग चुकी थी । उस रात मैं बहुत रोया,की बताओ,इंसान ने मेरा खाना सड़क पर फेंक दिया मगर मुझे खाने नही दिया । खून सड़क पर बह गया मगर सूंखे होंठ तक नही आया ।

मैं बिलबिला रहा था कि तभी उस खून पर कुछ दूसरे जानवर झपट पड़े,मैं उन जानवरो पर झपट पड़ा और शायद भीड़ का वह ज़हर तमाम बदन से होता हुआ मुझमें आ गया । मैं उतना ही ज़हरीला हो गया,मुझे मार डालिये,मैं पूरी प्रजाति पर कलंक हूँ ।

सब मच्छर रोने लगे,लीडर बोला,जाओ और कहीं छिपकर बैठ जाओ । तुम्हे हम मार नही सकते,इंसान नही हैं कि इंसान को ही मार दें । तुम बेफिक्र रहो, यह लाखो मच्छर नाराज़ ज़रूर हैं मगर तुम्हे अकेला पाकर भीड़ बनकर मारेंगे भी नही । हममे नैतिकता है, हम सब तुम्हे खून लेकर देंगे,बस अब तुम इंसान को कट काटना,अगर वह मर गया,तो हम जैसे लाखों जीवों के खाने की थाल खत्म हो जाएगी । इंसान नही जानता कि वह ज़रूरत है हमारी,उसे आपस मे मरना नही चाहिए,उसकी सद्बुद्धि की दुआएँ.... और भिनभिनाहट के साथ आसमान एकदम से काला हुआ और फिर साफ़, फिर कोई आवाज़ आई चट से,देखा इंसान के हाथ मे एक मच्छर मरा हुआ था और वह हाथ धोने बढ़ गया...

Friday, October 11, 2019

उमराव और तरक्की

कल रात उमराव आई थीं।पूछ रहीं थी लखनऊ की शाम अब कैसी होती है।हमने भी कहा,अरे वाह, जाते जाते खुद ही सारी शाम अपने साथ लेती गईं और अब पूछ रहीं हैं की शाम कैसी होती है।
अरे उमराव आपके जाते ही लखनऊ ने सिर्फ सबेरा ही देखा है।हमारे हिस्से की शाम का सुरमई अँधेरा तो आपने अपनी कब्र में क़ैद कर रखा है।हम रोज़ सुबह उठते हैं और अब दिन रात अपनी सुबह ही बनाने में लगे रहते हैं।

हमे रोज़ अव्वल आने के लिए लड़ना पड़ता है।ए उमराव इस जीतने की दौड़ में हम सबकी शाम खो गई है।गोमती का पानी छुए अरसा हुआ है,अगर हो सके तो उमराव हमारी वह शाम लौटा दो,जो तुम्हारी आँखों से होते हुए,जिस्म की किसी सिलवटों में कहीं खो गई है।

आखरीबार जब उस रोज़, सरे शाम जब तुमने अपने नाज़ुक हाथों बेदर्दी से चराग़ बुझाया था,तो किसे पता था की यह हमारी मुस्कुराहट पर तुमने हाथ रख दिया है। वह जो दीये की लौ लहलहाती हुई तुम्हारी उँगलियों से टकराकर तड़पती हुई बुझ गई थी,हमें क्या पता था यह मेरे दिल के सुक़ून की मौत है ।उस रोज़ बिखरने वाला अँधियारा हम सबपर रौशनी बनकर तारी हो गया है। हमारी आँखे बेहियायी से खुली बस अपने अपने लिए चीजें समेटने लगीं । अब हमें किसी के पाँव की थपकी,किसी के गले से गूंजते सुर,किसी की सियाही में डूबते उतराते अल्फ़ाज़ ,बिल्कुल भी नही खींचते । हम सब तरक्की की दौड़ में हैं ।

उमराव इस दौड़ में हमारे पास हमारे अपने लिए वक़्त नही है, बताओ इस लखनऊ की शाम देखें या हमारी किस्मत में ज़बरदस्ती टांक दिया गया तरक्की का सवेरा देखें । हम चौंध्यायी आँखों से बिना देखे भाग रहे है ।हो सके तो हमे थोड़ा ठहरना बतला दो उमराव,हम अब भागते भागते ठहरना भूल चुके हैं । तरक़्क़ी जो कभी पूरी हुई नही,इसमे बौराए हुए हम घुल रहें हैं, दोस्त....

Wednesday, October 9, 2019

राजनीति समझो न यार

अभी हाल ही में कहीं हम बोले थे कि गाँधी ने अपनी बैटल फील्ड बनाई थी । उसमें अंग्रेज़ों को उतरने पर मजबूर किया,जहां वह फिसल फिसल कर गिरे । गांधी जानते थे कि शस्त्र से हम इतनी विशाल सेना से नही जीत सकते इसलिए अहिंसा को हथियार बनाया और नैतिकता,सत्य और मानवता का बैटल फील्ड बनाया,अंग्रेज़ यहीं मुँह के बल गिरे,क्योंकि इन मुद्दों पर गाँधी का मुकाबला करना उन्हें भी नही आया ।

खैर इसकी तफसील में नही जाते हैं, हम जाते हैं आजकी राजनीति पर,जहाँ बैटल फील्ड सत्ता प्रमुख तय करते हैं और मुँह के बल फिसल फिसल कर अच्छे अच्छे विरोधी गिरते हैं, वह फील्ड है, धर्म ।

भय्या गाँधी से ही सीखो,अपना मैदान बनाना सीखो । कब तक वर्तमान सत्ताधीषों की बिछाई चादर पर पड़ी गाँव तकिया लगाए लेटे हुए ट्रोल के सामने थिरकोगे । रफेल विमान के नीचे रखे गए दो नीबुओं ने तुम्हे उनकी थाप पर नचवा ही दिया ना ।

यह राजनीति है, कुरुक्षेत्र से भी भयँकर मैदान है । यहाँ हर चाल राजनीति ही तय करती है । तुम्हे पता है इन दो नीबुओं ने तुम्हे उसका विरोधी बना दिया है, जो रोज़ सुबह घर की छत पर काले मुँह की हंडियां टांगे, अपने ही नातेदारों से नज़र लगने से बचने की ढाल लगती है ।

यह तटपुनजुअहा विरोध छोड़ो,यह लिजलिजते मुद्दे में मत बहको, विरोध करना है तो उसका करो,जिससे देश की दिशा बदल रही है ।

यह भी ध्यान रखो,जनता है, उसे इन सबसे कोई दिक्कत नही,जिससे दिक्कत है, उस बात पर टिको । यूँ रोज़ ही चारा फेका जाएगा और तुम सब बेचारों की तरह उसमे उलझकर दम तोड़ दोगे ।

नीबू रखना,पूजा करना,वंदना करना,ईश्वर को याद करना,बिल्कुल भी गलत नही है । जो इसे धर्मनिरपेक्षता की आड़ में गलत कह रहें, वह सब जानते हैं कि उस कुर्सी पर नेहरू नही हैं और नेहरू के सिवा सौ प्रतिशत धर्मनिरपेक्ष कोई प्रधानमंत्री नही हुआ है । कोई न कोई,कहीं न कहीं इसकी जद में रहा है है, जो कि बुरा भी नही है । धर्म को मानना,उसके कर्मकांड की आलोचना राजनीति में आत्मघाती ही हुई है, यह काम सुधारकों का है ।

मैं फिर कह रहा हूँ कि हल्केपन से बचो । उनके फेके मुद्दों पर मत जाओ,वह इसके महारथी हैं । धर्म हमारे देश की रीढ़ है, इसे अपने हाथों में लो । धर्म गलत नही है, बस गलत हाथों में हो सकता है । धर्म का मखौल उड़ाने वाले चार वोट के मोहताज हैं । ऐसी हालत से बचो अगर राजनीति में हो । अगर अकेले घर पर लेटे लेटे तफरीह ही उड़ानी है, तो कुछ भी कहा,क्या ही फ़र्क़ पड़ता है । राजनीति करनी है, तो अपनी बैटल फील्ड बनाओ, उसमे सामने वाले को लाओ और मसलकर फेंक दो या फिर उसकी क्षेत्र की समझ रखकर उससे बड़ा,उसके क्षेत्र का महारथी बनकर,उसके मैदान में हरा पाओ,उसका क्षेत्र है धर्म....धर्म ही विजय है, धर्म ही पराजय और महात्मा गाँधी से बड़ा योद्धा इस क्षेत्र का हमे कोई नज़र नही आता । उन्हें मानते हो तो मेरी मान लो,अपना लक्ष्य तय करो,उसपर ही लड़ो न कि इधर उधर....

Friday, October 4, 2019

मिलकर रहो

अलखल्क़ अयालुल्लाह यानि सम्पूर्ण सृष्टि खुदा का परिवार है । वसुधैव कुटुम्बकम यानि यह पूरा संसार एक कुटुंब है । यह बात कहने को रह गई है । कुछ लोग मानते हैं, वह पागल हैं क्योंकि धर्म के झंडे अब उनके हाथ में हैं, जिनके दिल छोटे,दिमाग गन्दा और विचार हिंसक हैं ।

जिसे भी लगता है कि उसकी तरक्की उसके धर्म से है और उसके धर्म की तरक्की दूसरे धर्म के लोगों को मिटाने और कमज़ोर करने से ही सम्भव है । वह बेहद मूर्ख हैं क्योंकि हर एक कि तरक्की हर एक के साथ मिलकर चलने से ही है ।

मानो या न मानो हिन्दू या मुसलमान मिलकर चलेंगे तो तरक्की करेंगे,जैसे पिछले दिनों उन्होंने बैलगाड़ी से होते हुए अंतरिक्ष तक का सफर तय कर डाला । अगर बंटकर चलेंगे, एक दूसरे को नीचा दिखाएंगे,एक दूसरे को बर्बाद करेंगे तो मिट जाओगे,सब के सब बर्बाद हो जाओगे,यह चाहे अपनी बर्बादी होते देख कर सतर्क हो जाओ या पूरे ही बर्बाद हों जाने के बाद मानो,मानना तो पड़ेगा ही ।

अपने धर्म के ऊपर लिखे सूत्र को याद करलो,परिवार की तरह एक दूसरे से पेश आओ,यह जानकर की तुमसे जलने वाले सबसे पहले परिवार ही तोड़ते हैं...