Saturday, March 9, 2013

कुबूल नहीं !कुबूल नहीं !

(ये मंज़र्काशी इक औरत के शौहर के गुज़र जाने के बाद उसकी दूसरी शादी और उससे पहले की दुश्वारियों पर की गई है .ये हमारी छोटी सी कलम का बड़ा दर्द है. अब आपके सामने है किस्तों मे।)
                 
                                   कुबूल नहीं !कुबूल नहीं !
                            (१)
एक बेवा बेवागी के गम से तंग आई हुई
सारे आलम की सख्ती से घबराई हुई
आँख में रंगों हया चेहरे पर आसरे  मलाल 
दुबली पतली मिसकीन गम से निढाल 
साथ दो बच्चे खस्ता जानो दिल फ़िगार 
जिनकी मासुमी  पर यतीमी का गुबार 
                          आ गई मैके में अपना गम भुलाने के लिए 
                           भाइयो बहनों को दागे दिल दिखने के लिए 
कुछ दिन तो घर का घर खामोश ही रहा 
मज्हबो तहज़ीब के कानून पर चलता रहा
यानि  हर तरह गम ख्वारिया होती रही 
फ़र्ज़ की परदे में दुश्वारिय होती रही 
रफ्ता २ फिर मोहब्बत में कमी होने लगी 
लुत्फ़ के दमन से पैदा दुश्मनी होने लगी 
                                भावजो के दिल का अक्सर यूँ निकलता था गुबार  
                                उसके मसुमे पे उसके सामने पड़ती थी मार 
उँगलियाँ उठती थी बच्चो पर की भूके चोर है 
खा गए  यह बाप को कमबख्त आदमखोर है
वोह कह न सकती थी कुछ खुल के रूबरू 
औरतो में इस तरह होती थी पहरों गुफ्तारू 
"पीर जी कहते है सच इसका कदम मनहूस है 
जब से यह आई है इस घर की फिजा मायूस है 
                                       इसके इमां में खलल है,इसकी नियत में फितूर 
                                        यह जहाँ होगी वहां मनहूसियत एगी ज़रूर .............................(जारी)
 हफीज किदवई