Friday, June 30, 2017

बिधान बाबू

मामूली उम्र में माँ ने साथ छोड़ दिया,वह माँ जो उन्हें हर मुश्किल से बचाए बस आगे बढ़ने के ख्वाब दिखा रही थी।छोटे भाई बहनो की ज़िम्मेदारी और माँ के ख्वाब आपस में टकराकर उसे कमज़ोर करते मगर वह इनसे जूझता रहा।पैसों की तंगी से जूझती पढ़ाई और देश पर छाया गुलामी का अँधियारा उन्हें चैन से नही बैठने दे रहा था,फिर भी वह पढ़ते गए।एक वक़्त के बाद लगा की पहले खुद को इतना क़ाबिल करलें की देश उनसे फायदा उठा सके।हुआ भी यही,देश विदेश में अपने दम पर पढ़कर वह आवाम की ख़िदमत में लग गए।

देशबन्धु चितरंजनदास भी उनके कँधे से कँधे लगकर देश की आज़ादी की लड़ाई समझते रहे।सुभाष चन्द्र बोस ने भी उनसे मिलकर एक किरण उन्हें थमाई।आखिर वह महात्मा गाँधी तक जा पहुँचे और जवाहरलाल नेहरू का हाथ पकड़ कर आज़ादी की अलख जगाते हुए बंगाल में खड़े हो गए।एक ऐसा इंसान जिसके खड़े होने से बंगाल खड़ा होता था,आज ही के दिन उसके लेटने से बंगाल लेट गया था।उसके जाने पर सिसक सिसक कर बंगाल रोया था।वह ऐसी शख्सियत थे जो बंटवारे में दिलों को जोड़ते रहे।उनका दिल पूरे भारत के दिल को जोड़ रहा था।जो इंसान और इंसान के बीच मोहब्बत और इंसानियत के बीज ही बोता रहा।

जब मुल्क़ आज़ाद हुआ तो उन्हें मंत्रालय में जगह दी जाने लगी।बड़ी विनम्रता से उन्होंने मना कर दिया और कहा मुझे मेरे देश की जनता की सेवा हमारे अपने क्षेत्र से करने दें।वह पढ़ाने में लग गए।जो उनका ख्वाब था की यह देश अपने पाँव पर खड़ा होकर सीना तानकर चले।ख़ामोशी से बंगाल में इतना बड़ा स्वतन्त्रता सेनानी पढ़ाने चला गया मगर गाँधी तो ज़िंदा थे।उन्हें एक एक इंसान के क़द और अहमियत का बड़ा अंदाज़ा था।बंगाल की उथल पुथल से पहले ही नेहरू को भेजकर उन्हें बंगाल के पहले मुख्यमंत्री बनवाने पर राज़ी कर लिया।इस तरह बिधान चन्द्र राय का वजूद इतिहास में दर्ज हुआ।

वह ऐसी शख्सियत जिसका दिल बेहद विशाल,मिजाज़ नरम और ख़िदमत का अटूट जज़्बा।ताज्जुब है प्रकृति ने उन्हें आज ही के दिन पैदा किया और आज ही के दिन अपने पास बुला लिया।एक ऐसा इंसान जिसका होना इस मुल्क़ के लिए ज़रूरी था।बिधान चन्द्र राय को पढ़ा जाना चाहिए।काँग्रेस के इस महान नेता ने बंगाल को बहुत गहरी नीव दी साथ ही देश को शिक्षा और स्वास्थ्य में अमिट पहचान।वह व्यक्ति जो आज़ादी की लड़ाई भी लड़ता और रात तक लोगों के दर्द भी दूर करता।मैं बार बार कहता हूँ यह देश बिधान चन्द्र राय जैसे मोहब्बत से भरे हुए इंसानों के ख़ून पसीने की नीव पर खड़ा हुआ है।हो सके तो भारत रत्न बिधान बाबू को उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि,जो आज ही हैं थोड़ा सा याद करलें।इस देश की बुनियाद और फ़ख्र दोनों ही हैं बिधान चन्द्र राय और उनके जैसे समाज सेवी,राजनीतिज्ञ,स्वतन्त्रता सेनानी।।।।।।।।

Thursday, June 29, 2017

अज़ीज़ मिया की बेगम

यह दूध वाली सिंवई मुझसे बर्दाश्त नही होती।तुम यही क्यों खिलाने पर अड़ी हो।मालूम है को तुमने बनाया है मगर क्या करें,मुझे दूध देख कर ही नाक बन्द करनी पड़ती है।अब गुस्से में प्याले तो न पटको,चीनी के हैं टूट गए,तो तुम्हारे अब्बा इसके भी पैसे ले लेंगे जैसे गाड़ी की खरोच के लिए थे,खासीस बाप।

अब घूरो नही,किमामी सिंवई ला पाओ तो खा लें वरना यह दही बरे ही काफी हैं।तुम कितनी ढीठ हो,कुर्सी से उठ जाओ न,अंदर तुम्हारी ही अम्मी प्याले धो रहीं हैं, एक आध धुलवा लोगी तो मर नही जाओगी।जब उनपर रहम नही आ रहा तो मुझे क्या ख़ाक किमामी सिंवई मिलेगी।

अब यह क्या,सौंफ का डब्बा बढ़ा रही हो।अभी खाया भी क्या की सौफ देदी।न खाए।भाड़ में जाओ।कुछ नही खाएँगे।ले जाओ अपना खर पतवार।अपनी अम्मी को भी ले जाओ।और जाते जाते यह मनहूस चूड़ियों भी उतारती जाना,इनकी खनक मेरे दिमाग का दही बना रही हैं।यह जो लाल लाल लिपस्टिक लगाई है, हो सके तो मय होंट के काट के हटा देना,बिल्कुल जँगली लगती हो।अज़ीज़ मिया चीखें जा रहे थे।

उधर ख़ाली कुर्सी,ख़ाली कोठी,उनकी इन रोज़ की शिकायतों की आदी हो गई थी।ईद में बिखरे सन्नाटे पन में उनकी दीवारें इन शिकवों से ही ईद की ख़ुशी महसूस करती हैं।अज़ीज़ मिया के बाप ने तो अपनी ज़िन्दगी में किसी को चौखट लाँघने न दी और खुद अज़ीज़ ने कभी नाक पर मक्खी बैठने न दी।सारी उम्र अकेले इन्ही दीवारों में कट गई।अब हर तीज त्यौहार ख़ाली बर्तनों से लड़ते हैं।चीखते हैं।उन्हें तोड़ते हैं।सामने बैठी उनकी सोच के मुताबिक बेगम ठिठक जाती हैं।

शादी क्या,घर में उनकी माँ के बाद कोई भी औरत के पाँव नही पड़े।हमे तो लगता है छिपकली मकड़ी काकरोच भी मेल ही आते होंगे।यहाँ तक पपीते और नीबू में भी फल नही आते।गुलाब के पेड़ झाड़ी में बदल चुके हैं, फूल ही नही आते।इन सबके बीच अज़ीज़ मियाँ रोज़ सुबह नाश्ते के लिए,खाने के लिए,कपड़ों के लिए,भीगी तौलिया के लिए,उलटी चप्पल के लिए अपनी बेगम से लड़ते रहते हैं।कभी उनके सोफ़े पर पड़े दुपट्टे पर चीखते तो कभी उनके परफ्यूम की खुशबू पर एतराज़ करते हुए नाक पर रुमाल धर लेते।वही बेगम जो कभी कोठी में तो आई नहीं मगर अज़ीज़ मिया के दिमाग में ज़रूर उतर गई।जिन्हें अज़ीज़ मियाँ के सिवा किसी ने न देखा,यहाँ तक खुद बेगम ने खुद को न देखा।ख्याल भी कभी जिस्म धरता है भला।आपको क्या लगता है सिर्फ लखनऊ की नूर मंज़िल में ही पागल रहते हैं।बहुत से घरों में भी नूर मंज़िल है और उन नूर मंज़िल के नवाब हैं अज़ीज़ मियाँ।

Wednesday, June 28, 2017

इंसान बन जाओ

यह मुसलमानो वाला कपड़ा नही पहनना है.... यह हिन्दुओ वाला खाना नही खाना है.... यह लफ्ज़ जब किसी सात आठ साल के बच्चे के मुँह से सुनता हूँ तो दिल बैठ जाता है।जाने अनजाने माँ बाप के दिलों का ज़हर मासूमो में उतरते देख रूह टूट जाती है।आईना देखता हूँ,चेहरा धुन्धला नज़र आता है।आँसू,जो बहते भी नही,सूखते भी नही,दिमाग को भारी कर देते हैं।कितना धोखा दे रहा हूँ अपने आप को।लगता है की यह जो अमन और मोहब्बत का एहसास रोज़ जीता हूँ,वह कितना फ़र्ज़ी है।

जिस ज़हर से आने वाली नस्लो को बचाने के लिए मेहनत करता हूँ,वह बच्चों में कुदरती आ गया है या माँ के दूध के साथ आया है।उन माँ बाप पर तरस आता है जो बच्चे को खूबसूरत ज़िन्दगी तो नही दे सके मगर नफ़रत दे गए।जिन्होंने अपने बच्चे को पुचकारते हुए दूसरे बच्चों के लिए डायनामाइट को पैदा कर दिया।यह कोई मज़ाक नही है की चन्द सालों के बच्चे हिन्दू मुसलमान करने लगें।यह तफ़रीह नही है, यह एक सवाल है।हमारी परवरिश का सवाल।सोचता हूँ अब अपना सारा वक़्त टीके को खोजने में लगा दूँ।यह टीका जो बचपन में ही एंटी हेट वैक्सीन की तरह काम करे।

अब बड़ो को समझाना तो इसलिए नामुमकिन है क्योकि उन्होंने न्यूटन के सारे सिद्धान्त को छोड़कर सिर्फ क्रिया प्रतिक्रिया का सिद्धान्त रटा है और उसमे पीएचडी की है।उन्हें अच्छे से पता है की तलवार की प्रतिक्रिया त्रिशूल से कैसे देनी है।इनकी आँखों की रेटिना इंसान नही देख पाती, यह सिर्फ हिन्दू मुसलमान देख पाते हैं।यह अभी यहाँ भी डंक मारने आएँगे।मैं इन भस्मासुरों से ज़रा भी उम्मीद नही करता।यह वह लोग हैं जो एक व्यक्ति को पूजने में या उसका विरोध करने में इतना ज़हरीले हो चुके हैं की इनके स्पर्श मात्र से लकवा मार जाए।यक़ीन न हो तो इनके घरों के बच्चों और आश्रितों को देखिये।उनकी ज़बानें भी काली पड़ने लगी हैं।

मेरे लिए अब सिर्फ बच्चे ज़रूरी हैं, जो इनके ज़हर से भर रहे हैं।जब शिव जी ने दुनिया का सारा ज़हर पी लिया था तब हैरत होती है की यह इंसान कहाँ से इतना ज़हर ले आया।यह झूठे,फ़र्ज़ी मज़हब के नाम पर पूरी इंसानियत को घुन की तरह खाने लगे हैं।हो सकता है मैं पागल हूँ, बहरा हूँ, नही सुनूंगा,आप कुछ भी बक्के।मैं अपने बच्चों का जिस्म इस ज़हर से नीला होते नही देखना चाहता।मुझे मेरे बच्चे में बच्चा देखना है, साँप नही।मैं यह ज़हर मिटाकर ही रहूँगा।भले हज़ार साल जीना पड़े।यह पोस्ट कुछ साल पुराना है मगर प्रतिबद्धताएं वैसी ही नई और अटल हैं।यह ज़मीन खूबसूरत होगी,वादा।।।।।

Friday, June 23, 2017

हम सब खत्म होंगे

एक दिन यह भी आएगा जब भीड़ जुटकर हैशटैग लिखने वाले को मारेगी।वह चीखकर कहेगा की उसके नाना को अंग्रेज़ों ने बागी कहकर तोप से उड़ा दिया था।तब भीड़ कहेगी लो अब हम भी उड़ा देंगे।फिर वह दर्द में चिल्लाकर कहेगा की उसके दादाओं को अंग्रेज़ों ने दसयों साल जेल में डाल दिया की तुम भारत को आज़ाद कराओगे।तब भीड़ कहेगी हम तुम्हे जेल भी नही देखने देंगे।

यह सच है अब सरकार,शासन से दूर लोग भीड़ बन चुके हैं।हमारे अपने भीड़ बन चुके हैं।पता नही कब,कहाँ कौन मेरा नाम ले और सबकी भावनाओ चिथड़ा चिथड़ा हो जाएँ।बेचारे अपनी टूटी फूटी भावनाओ को रफ्फू करने के लिए हमारे ख़ून का सहारा लेंगे।बड़ी ख़ुशी होगी जब किसी के बेक़रार दिल को सुक़ून देने के लिए मेरे ख़ून की ज़रूरत होगी।

मुझे अब कोई शिकायत नही,मुझे पता है भीड़ के पागल होते हालात से मेरे करीबी भी मायूस हैं।वह इसे गलत कह रहें हैं मगर वह हमसे ज़्यादा मजबूर हैं।वह बेचारे अपने घरों में बन्द कमरों में भी इनकी आलोचना नही कर सकते क्योंकि खूनी भीड़ के मोहरे उनके घरों तक पहुँच चुके हैं।उनके जासूस है।हम तो कम से कम खुलकर इन्हें बुरा भला तो कह सकते हैं।हमे अपने दोस्तों को देख बड़ी ख़ुशी होती है की कल जब भीड़ हमे कुचल कुचल कर मारेगी तो यह कम से कम अफसोस में तो होंगे ही।

हम उन चालाक लोगों से रत्ती भर भी बात नही करना चाहते जो भीड़ के अन्याय और अधर्म को किसी दूसरी भीड़ के अन्याय और अधर्म से मिलाकर सब कुछ सही साबित करदे।काश जब मेरे जिस्म के टुकड़े हों तो वह बोटियाँ हमारे घर न आए।वह इनके खानों में चली जाए।इनके आलू के साथ मेरी टाँग की बोटी इनकी ज़बान को बढ़िया ज़ायका देगी।

अब एक ऐसी हुकूमत है जो हमारी नही है।उसे हमारे ख़ून से लहलहाने का मौका मिलता है।मुझे ताज्जुब है की वह क्यों नही एक साथ बीस करोण लोगो को मारने का हुक्म दे देती है।हिम्मत से काम लें उन्हें सिर्फ और सिर्फ यही लिए चुना गया है और चुना जाता जाएगा।तो अपनी आर्मी लगाकर,यह प्राइवेट वाली नही,असली वाली लगाकर,एक साथ उड़वा दें।अगर उन्हें या उनके मानने वालों को यह इलज़ाम लगता है तो ज़रा दिखा दें की लिजलिजी सरकार ने एक बार भी अधर्मी भीड़ के राक्षसी होने पर अफसोस जताया हो।

वैसे इतना यक़ीन हमेशा रहेगा चाहे सारे घोड़े खोल लो,यह देश गाँधी,बुद्ध से ही पहचाना जाएगा।इसकी खासियत अनेकता में एकता ही रहेगी।चाहे एक एक को मार डालो हमे जब तुम पीट रहे होगे तब भी हम वही महसूस कर रहे होंगे जो मेरे नाना दादा कर रहे थे।उन्होंने उस वक़्त मुल्क़ के लिए मौत चुनी थी,हम आज चुन रहे हैं।चाहे सब वहशी हो जाए फिर भी हमारे देश की माटी वैसी ही नरम और उपजाऊ रहेगी।यहाँ धर्म भले अधर्म में बदल जाए मगर मुल्क़ वैसा ही खूबसूरत रहेगा जिसकी हवा हमे अंत तक लगेगी।काश इसी ज़मीन में मारा जाऊँ,इसकी खूबसूरती बरकरार रखने के लिए मारा जाऊँ।ज़िन्दगी का क़र्ज़ मिट जाए।हमारा ख़ून मोहब्बत की फसल का खाद पानी ही बनेगा।

Thursday, June 22, 2017

मीर का लाल सलाम

यह क्या मीर बगल में जानमाज़ दबाए,सर झुकाए चले जा रहें हैं।कल तक तो बड़ी बड़ी बातें कर रहे थे की धर्म यह है, वह है, वाहियात चीज़ है, बेड़ियाँ हैं अल्लम् गल्लम्।मीर को तेज़ी से मस्जिद की तरफ जाते देख पण्डित विद्याधर मन ही मन कुढ़ रहे थे।आखिर अपने मज़बूत साथी को यूँ अल्लाह के सामने टूटता देख उनसे देखा नही गया।मस्जिद की सीढ़ियाँ चढ़ते मीर को आवाज़ दी विद्याधर ने,मीर रुक जाओ,यह कौन सा गुनाह करने जा रहे हो।

मीर ठिठक कर रुक गए,विद्याधर ने नज़दीक़ जाकर मीर के कानों में अपना कलमा पढ़ा "ऐ मीर,धर्म एक अफीम है।"मीर के हाथ से जानमाज़ और तस्बीह छूट गई।तस्बीह सीढ़ियों पर टूट कर बिखर गई,एक मोती यहाँ तो एक वहाँ।कायदे से गुंथे सौ मोती, बेकायदे से सौ तरफ बिखर गए।मीर खामोश सीढ़ियों पर बैठ गए बगल में विद्याधर भी।

मीर ने विद्याधर का हाथ अपने हाथ में लिया और बोले।धर्म एक अफीम है।विद्याधर ने हाँ में सर हिलाया।मीर बोले यानि धर्म एक नशा है,विद्याधर ने हाँ कहा।मीर फिर बोले यानि नशा बुरा चीज़ है।विद्याधर हाँ में सर हिलाए।फिर मीर ने कहा तो कल रात हम तुम जो शराब की बोतलों के साथ लुढ़क रहे थे वह क्या है।अगर बीती रात शराब का नशा जायज़ है विद्याधर तो आज सुबह की नमाज़ का नशा भी जायज़ है।विद्याधर तुम्हे पता है की मार्क्स बड़े चालाक थे।अगर वह अफीम का नशा कर रहे होते तो धर्म को कभी अफीम नही बताते बल्कि कोकीन बताते।कोकीन का नशा करते तो धर्म को हीरोइन बताते।अगर चाय का नशा करते तो धर्म को पुरानी शराब बताते।

विद्याधर मुँह खोले हैरत से मीर को देख रहे थे।मीर ने वापिस सारे मोती बीने,जानमाज़ उठाई और कहा जिस दिन हर नशे से दूर हो जाना उस दिन धर्म के नशे से भी दूरी रखना।हम आज रात भी शराब पियेंगे और सुबह यहाँ सीढ़ियों पर भी मिलेंगे।नशा हर तरह का बुरा है साथी।अब जब नशा छूटेगा तो सारा छूटेगा।अफीम,शराब,सिगरेट सब वरना सब तरह का नशा मीर को चलाता रहेगा।

विद्याधर ने मायूसी से मीर को जाते हुए देखा और लौटते में दो बोतल शराब की लीं और बड़बड़ाता हुआ कहा जाओ,देखते हैं किस नशे में ज़्यादा मज़ा है।रास्ते में गुड़हल के पेड़ से एक ताज़ा गुड़हल का फूल तोड़ता हुआ विद्याधर आगे बढ़ता है।दो क़दम बाद फूल को कान्हा के मन्दिर की तरफ उछालता हुआ कहता है, यहलो रख लो,जब तक मैं नशे में हूँ,तब तक तुम भी हो,जैसे मीर का ख़ुदा है।तुम मनाओ की हमारा नशा न उतरे,हम दोहरे चरित्र से बाहर न आ जाएँ।

तुम सब भगवान लोग मिले हुए हो।तुमने साजिश से मीर को तोड़ा है, अब मुझे भी तोड़ लिया।मैं खुद से वादा करता हूँ जिस दिन सारा नशा छोड़ दूँगा उस दिन तुम्हारे धर्म के नशे का आखरी दिन होगा।खैर घबराओ नही,अभी मेरा लीवर दो सौ लीटर शराब और सोख सकता है।तब तक तुम धूब बत्ती में मॉक्स लगाकर मीर के ख़ुदा के साथ हमे बोतलों के साथ लुढ़कता पुढकता देखो।गुड बाय।रेड सैल्यूट कान्हा।

Wednesday, June 21, 2017

धर्म कर्म

मै जब तुममे दाखिल होता हूँ। तुम्हारी अंदरूनी खूबसूरती निखर आती है।तुम्हे दुनिया अच्छी लगने लगती है क्योकि तुमने उसे सँवारने के लिए मुझे चुना था।तुम्हे हर तरफ मोहब्बत और ख़ुलूस दिखता है।तुम हर बेचैन आँख को देख कर तड़प उठते हो। जब तक मै तुम्हारे अन्दर होता हूँ तब तक तुम इंसानियत की खुशबू से महकते हो।तुममे जब मैं होता हूँ,तब तुम सख्त से सख्त ज़ुल्म से निपट लेते हो।हर परेशानियों से लड़ लेते हो।तुम इतना खूबसूरत किरदार बनाते हो की हज़ार दो हज़ार नही करोणों अरबों में लोग इंसान हो जाते हैं।

एक दूसरे का कन्धा बन जाते हैं।एक दूसरे के आँसू पोछ डालते हैं।गले मिलकर वह मुस्कान बिखेरते हैं जिससे यह ज़मीन खिलखिलाकर हँस देती है।मेरी रूह तुम्हारी ज़िन्दगी में सलीक़ा,मोहब्बत और सब्र लाती है।तुम इकट्ठे होकर मुश्किल से लड़ते हुए एक ऐसा निज़ाम देते हो जो तकलीफों पर मरहम रखता हुआ दुनिया को दस क़दम आगे ले जाता है।
मगर हाँ मगर
जैसे ही मै तुम्हारे दोस्त,परिवार,घर,खानपान,खेल,पहनावा,सोच,पढाई,व्यापार,नौकरी, और पसंद नापसन्द में घुसता हूँ वैसे ही एक ज़हर सा हो जाता हूँ।वो ज़हर जो ऊपर कही हर बात को झुठला देता है और तुम्हे मुझे इन्सान से हैवान बनाने में देर नहीं लगती।

जैसे ही मैं एक फ़र्क़ के साथ तुम्हारी मगरूरियत से जुड़ता हूँ तो विनाश बन जाता हूँ।तुम मुझे जैसे ही सिर्फ अपना और दूसरे को सिर्फ अपने जैसा बनाने चलते हो वैसे ही मैं दरक कर हर एक की आँखों का कंकर बन जाता हूँ।जैसे ही तुम्हारे झूठे मन गढ़न्त किस्सों में शामिल होता हूँ शैतान हो जाता हूँ।जैसे ही तुम्हारे रिश्तों में दाखिल होता हूँ तो मुस्कान को आँसू में बदल देता हूँ।तुम्हारी लालच भरी आँखों में घुसता हूँ तो ज़ुल्म की सारी हदें तोड़ देता हूँ।अब तक तुम्हे पता चल गया होगा मै कौन हूँ।
मै धर्म हूँ।मैं धर्म हूँ।मैं धर्म हूँ।

Tuesday, June 20, 2017

योग दिवस

आइये आपको ले चलें नरम नरम हरी घाँस पर।भीगी भीगी मिट्टी पर पाँव रखते हुए ऊपर ले चलें।इतना ऊपर जिसमें रूह तो ऊपर जाए ही,जिस्म भी हल्का महसूस करे।आज कुछ लोग साँस धीरे और तेज़ छोड़कर आपका काफी कुछ ढीला कर देंगे।जो अपनी ज़बान,किरदार से सिर्फ तोड़ने का काम करता हो वह मेरे मुल्क़ की हज़ारों सालों की परम्परा,योग को कैसे कर सकता है।अगर योग आपकी आत्मा को शुद्ध नही कर रहा यो वह केवल छदम् योग है।

आइये हम उस योग की तरफ ले चलें जो सदियों से सादगी से हमारी खूबसूरती को निखरता रहा हैं।इसमें ॐ या आमीन का झगड़ा नही है।न सियासत है न कोई चालाकी।यह ख़ालिस हमारी और हमारे मुल्ककी सेहत का योग है।योग की आठ क्रियाओ में इंसान को जुड़ने को कहा गया है नाकि तोड़ने का।यह योग रूह को जोड़ता है।पहले है यम यानि बुरे काम छोड़ना,अब आपको बुरे काम को तो बताना नही पड़ेगा ।उसके बाद आता है नियम यानि अच्छे कामो को करना,खूबसूरती से इन्हें अंजाम देना ।

फिर आता है आसन, जिसमे शरीर को दुराग्रहों,बीमारियो से बचाना है यह बीमारिया नफ़रत की हैं।फिर प्राणायाम है, जिसमे साँसों पर संयम रखना है,हर ऊँचे नीचे पर संयम। फिर है प्रत्याहार, जिसमे अपने दोषों को दूर करना होगा अगर आपको आपके दोष बताने पड़े तो घर के आईने तोड़ दीजिये।उसके बाद आती है धारणा, जिसमें चित्त पर ध्येय लगाना है।अगला क़दम है ध्यान,जो वही लगा सकता है जिसके सफेद दामन में झूठ, मक्कारी, ख़ून ख़राबा,धोखा न दिया हो,वरना ध्यान के पहले ही चरण में आपका नँगा चरित्र आपके ध्यान को तोड़ देगा।

अष्टांग योग का अंतिम चरण है समाधि यानि स्थिर हो जाना यह तभी सम्भव है जब आपके दिल में किसी दूसरे के लिए नफ़रत न हो,बदले की आग न हो।वैसे यह योग कठिन है इसलिए लोग उस योग को थाम लेते हैं जो योग नही घटाओ है।एक सच्चा योगी कोमल हृदय का होगा,उसकी ज़बान ईश्वर की ज़बान होगी,जिसमे गाली, अपशब्द,नफ़रत का कोई स्थान नही होगा।यह योग त्रिशूल या तलवार से,क्रिया की प्रतिक्रिया से नही चलता यह विशुद्ध योग है।

यह एक शब्द पर नही टिका है, यह पूरी परम्परा है जो गँगा को जमुना से जोड़ता है।यह मेरे दिल से आपके दिल से होता हुआ ईश्वर तक जाता है।इसलिए इस रास्ते को वह अपनाए जिनके दामन बदबूदार न हों, जिनकी बुनयाद नफ़रत पर न हो,जो दिलों को बाँटता न हो।यह है हमारा अष्टांग योग।यही है भारत की मूल परम्परा।आइये मिलकर करें नरम नरम घाँस पर दिलों को जोड़ने वाला योग।मुझे गर्व है की मेरे गुरु हरिशंकर शुक्ला यानि गुरु जी ने योग को तो बचपन में ही जिस्म में उतार दिया था साथ ही एक मन्त्र दिया था की जहाँ कहीं जाना मोहब्बत,नरमी से रहना।योग तुम धैर्यवान बनाएगा।मेरे लिए आज भी वही पतंजलि के बाद की परम्परा के हैं।वह बाजार,व्यापार से दूर सिर्फ रूह को खूबसूरत बनाने वाले लोग थे।आज नरम घास हमारे दिल को नरम करदे तो सब सफल वरना यह धारावाहिक चलता ही रहेगा।।।।

Monday, June 19, 2017

पन्द्रहवी आशिकी

अब अगर पूछा की शादी क्यों नही कर रहे हो,तो जान लो या तो तुम अपने दिन पूरे कर चुकी होगी या फिर मैं।।क़त्ल और ख़ुदकुशी में बड़ा बारीक़ फासला रखा है।रोज़ रोज़ एक ही सवाल,शादी।अरे क्यों करे शादी,ज़िन्दगी तो यूँहीं गुलज़ार है, उसे यलगार में बदलने का हमे कोई शौक़ नही।।

जब मैं यह बक रहा था तब वह एक थके से अख़बार में मुस्कुरा कर 'वधु चाहिए' वाले कॉलम में मेरे नाम की गलत स्पेलिंग पर ऊँगली रखकर इशारा कर रही थी।खीज कर मैंने कहा यह मेरे दुश्मनों की चाल है, मुझे बदनाम करने की।।तब उसने कहा आपके दुश्मन भी कितने लाजवाब हैं और यह कहकर मेरे ज़ख्मो पर मुट्ठी भर नमक छिड़क दिया।छिड़क क्या बल्कि धर कर रगड़ दिया।

कल फिर जब तुमने इशारों में शादी का वाहियात सवाल दागा तो मैं धूप में खड़ा तुम्हारे घर के सामने चीखा की क्या कोई बादशाह अकबर हूँ की मुगलिया सल्तनत को चिराग देने हैं या कोई राजस्थान की रेत का राणा हूँ की कुल के बगैर कुछ नही रह जाएगा।मुझे शादी करनी ही नही है।अपने जैसा एक और नमूना संसार को देने की मैं ज़रा भी हिमाकत नही कर सकता।

पता नही कहाँ से आकर एक चप्पल पीठ पर पड़ी,देखा उधर वह दूसरी चप्पल हाथ में लिए चीख़ रही है।अरे कमबख्त,हवसी शादी करने को कह रहें,बच्चों की लाइन लगाने को नही कह रहें।मुगलिया सल्तनत नही लेकिन क्या कमीने ऐसे एक अदद ताजमहल नही बना सकते।शादी करलो,हमी से करलो,इतना प्यार करूँगी की तुम्हारा ताजमहल बनाना पड़ जाएगा।अबे कोई तो घाँस नही डाल रहा,मैं ऑफर कर रहीं हूँ मान लो,साईं बाबा बार बार मौका नही देते और एक मौका हर निठल्ले को देते है, छीन लो मेंरा हाथ पप्पा से।

मैं चौराहे पर इतनी फ़ूहड़ तरीके से मोहब्बत और शादी के प्रपोज़ल को सुन बेहोश ही होने वाले थे की दूसरी चप्पल आकर पड़ी,साथ में सवाल की आखिर इतना सोच क्यों रहे हो,कौन मुगलिया सल्तनत से हो की लाइन लगी है।जो मिल रहा लेलो,मुझे भी तुम्हारे साथ अपने करम फोड़ने है।

मैंने दोनों चप्पल उठाई,अपने नँगे पैरों को पहनाई,और मुस्कुराकर उसके सामने रखी चाय की दुकान के टूटे स्टूल पर बैठ कर तीन कुल्हड़ चाय पी।हम एक दूसरे को लगातार देखते रहे।आँखों से बाते होती रहीं।स्टूल से उठ रहे थे की उसमे घुसी कील ने साले की तरह ज़ख्म पहुँचा दिया,एक दर्द सा निकला उधर वह आधे छज्जे पर लटक गई की क्या हुआ,मैं उठ चुका था और वह हमारे जवाब के इंतज़ार में खड़ी थी,मैंने चीखकर कहा "चल घुस" और निकल लिया।जाते जाते पीठ पर एक और चप्पल पड़ी,मगर वह टूटी थी,किसी काम की नही।

Sunday, June 18, 2017

राहुल गाँधी

मैंने सोचा की इनके बारे में लिखूँ या न लिखूँ।कई बार खुद से सवाल किये,सोचा की मेरी कलम से निकला एक अल्फ़ाज़ हमे सियासी चादर उढ़ा देगा।मैं रुक गया।फिर ख्याल आया जब यह कलम अशोक सिंघल,नरेंद्र मोदी,अटल बिहारी,परमहँस,मायावती पर चल सकती है।कलाम,गाँधी,नेहरू,कबीर,तुलसी पर लिख सकते हैं तो इनसे परहेज़ क्यों।बड़ा विचार किया की आखिर लिखने से पहले लिखे या न लिखें यह विचार आया ही क्यों,कहीं मैं भी उसके खिलाफ हुए दुष्प्रचार का शिकार तो नही हो गया।

एक नज़र उसकी तस्वीर पर डाली।सिर से पाँव तक मासूमियत।झूठ का कहीं कोई वजूद नही।कभी मज़ाक उड़ाने से उबर पाना तो यह सोचना की आखिर तुम्हे उसके जैसा बचपन मिला होता तो तुम कैसे होते।पड़ोस के शहर में जब कोई हादसों में मारा जाता है तो आसपास के बच्चे सहम जाते हैं।घर की चौखट पर दुनिया को हिला देने वाली उसकी दादी को जब मारा गया तब उसके बालमन पर क्या प्रभाव पड़ा होगा।इस सबके बीच जब उसके बाप के ख़ून से लथपथ जूते उसके हाथ में रखे गए होंगे तब उसके दिल पर क्या बीती होगी।हाँ तुम मज़ाक उड़ा सकते हो,उसका जीभर मज़ाक उड़ाओ।

अभी कुछ लोग यहीं आएँगे और अपने संस्कारो का खुला प्रदर्शन करेंगे।बीस बीस रूपये पर पोस्ट पर कमाई करने वाले उसके चरित्र की धज्जिया उड़ाएंगे।लेकिन मैं कहता हूँ कुछ भी करो,मगर शुचिता से तो करो।मुझे मालूम है बेरोज़गारी में गाली लिखने के पैसे मिले तो उसमे क्या बुरा है।तुम्हे सीधे तो नौकरी नही मिल सकती तो गाली गलौज से रोटी चल जाए इससे अच्छा क्या है।

संगीन के साए में वह बड़ा हुआ।उसके इर्द गिर्द ऐसी सख़्ती की दोस्त जैसी चीज़ ही खत्म हो गई।रिश्तेदार के नाम पर माँ और बहन की ही छाँव रह गई।उसके ना चाहते हुए भी उसे सुरक्षा घेरे में क़ैद कर दिया गया।अब ज़रा सोचना यह सब तोड़ते हुए उसे कितनी जद्दोजहद खुद में करनी पड़ी होगी।फिर भी ख़ुशी है वह जैसा है बिना मक्कारी झूठ फ़रेब वह सबके सामने है।

रही बात उसकी समझ की तो उसे समझने से पहले अपने दिमाग में जमी काई को हटाना पड़ेगा।विषयों पर उसकी पकड़ को देखना हो तो अपनी आँखों पर जमी पीत पत्रकारिता की परत हटानी ही होगी।आज उसका जन्मदिन है।बड़े बड़े जिस्म वाले मगर छोटे से दिल वाले भी उसे बधाई नही देंगे।मैं राजनैतिक दावे न करता हूँ न उसपर भरोसा है।इसके ठीक उलट मुझे इतना पता है वह बहुत उम्दा शख्सियत है।सच्चा है,सीधा है, जैसा है वैसा दिखता है।हमारी जनता ने उसे एक नही कई बार चुना है, वह भी मोहब्बत के साथ।

राजनीती में वैसे तो कोई स्तर रहा ही नही है, समाज ने बीही अपना चरित्र खोया ही है।राहुल गाँधी को उनके जन्मदिन की हार्दिक बधाई।ईश्वर उनसे और बेहद ज़रूरी काम ले।राहुल में किसी तरह की कोई कमी नही है।मुझे ख़ुशी है की दुष्प्रचार के बावजूद उसने अपने आपा नही खोया।कहीं पर ज़बान को इतना गिरने नही दिया की शर्मिंदगी हो।ज़बरदस्त कीचड़ उछालते लोगों के बीच वह मुस्कुराता हुआ अपने काम में लगा है।ईश्वर उसकी मेहनत के साथ न्याय करेगा।फ़िलहाल राहुल गाँधी को जन्मदिन की हार्दिक हार्दिक बधाई।