Friday, March 30, 2018

हसीन कब्रिस्तान

कभी फुर्सत मिले तो अपने शहर के सबसे पुराने कब्रिस्तान टहल आइयेगा।इसलिए नही की इसकी बाउण्ड्री किसने बनवाई बल्कि यह देखने की यह कब्रिस्तान इस क़दर खामोश क्यों हैं।पुराने में इसलिए जाने को कह रहें हैं की इसमें वोह लोग दफ़न है जो किसी ज़माने में काबलियत की मिसाल रहें हैं।इनमे वोह भी दफ़न हैं जिनके लिखे पर हज़ारों ने पीएचडी की है।इसमें अकेले सन्नाटे में वोह भी दफ़न हैं जिनके पीछे लाखों की भीड़ रहती थी।जब इन कब्रिस्तानों में जाएँगे तो हो सकता है पाँव के नीचे उस वक़्त के क़ाज़ी या मुफ़्ती ही लेटे हों।क्या पता इस ज़मीन में कौन कौन हस्ती मिट्टी बन गई।

अब तो सवाल ज़हन में आएगा की सबको मरना है और ऐसे ही खत्म हो जाना है।इन कब्रों में आने वाली नस्लें जानेगी भी नही की कौन दफ़न है।इन्ही कब्रों में ज़िन्दगी भर मर्दों से पर्दा करने वाली औरतों की कब्र पर कब किसी मर्द की कब्र बन गई कौन जानता है भला।कब्रिस्तान में मिटटी के नीचे सब एक जैसे दफ़न हैं।कहीं अल्लामा दफ़न हैं तो बगल में तांगे वाला दफ़न है।किसी और मोलवी दफ़न हैं तो ठीक उनके पैतयाने उस वक़्त की मशहूर तवायफ दफ़न है।है न कितना खूबसूरत कब्रिस्तान,जो सबको एक न एक दिन एक जैसा कर देगा।

अब सोचिये वोह क्या है जो ज़िंदा रहता है।कब्रिस्तान में तो सब मर खप गए मगर बाहर ज़िंदा कौन रह गया है।अगर मजाज़ कुछ गज मिटटी में दफ़न हो जाते तो किताबों में क्या उनका भूत ज़िंदा है।मीर की कब्र कब की सिटी स्टेशन के नीचे आकर अपने ऊपर रेलवे के इंजन की गुनगुनाहट को सुन खत्म हो गई तो पन्नों में जो मीर ज़िंदा है वोह कौन है।कबीर को माटी खत्म न कर पाई।हज़ारों कब्रों को कोई नही जानता की कौन हैं इसमें मगर उसमे से ही लेटे हुए हसरत मोहानी की ग़ज़ल"चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है" में भला कौन ज़िंदा है।मनो मिटटी में दबे अब्दुल कलाम और अबुल कलाम और मौलाना आज़ाद को कहाँ यह कब्रिस्तान खत्म कर पाए।

कहना सिर्फ इतना भर है की सच है मौत तो आनी ही है।यह भी सच है इसी मिटटी में वजूद खत्म हो जाना है जिसमे सुकरात और अरस्तू का हुआ है।मगर हाँ मगर हमारे काम हमे ज़िंदा रखेंगे।हमारी इंसानियत के लिए की गई कोशिशें कोई भी कब्रिस्तान खत्म नही कर पाएगा।हमारी मोहब्बत हमे हमेशा ज़िंदा रखेगी।हो सके तो इन पुराने कब्रिस्तानों में उन कब्रो को ढूंढियेगा जिनके नाम आपको बचपन से याद हों।कब्र तो आपको न ही मिले मगर इतना तो यक़ीन है उस फर्द की शख्सियत हमेशा आपमें और हममे ज़िंदा रहेगी।अपने आप को मोहब्बत से पैबस्त करदो वरना बदन तो वैसे भी सड़कर खत्म हो ही जाएगा।ज़िंदा रहते हुए तो अपने दिल ओ दिमाग को मत सड़ाओ।मोहब्बत पैदा करो ताकि आने वाली नस्ले सुक़ून की ज़िन्दगी जी सकें।

Thursday, March 29, 2018

खुद को मिटा दें

http://epaper.navbharattimes.com/details/65667-3404382-1.html

Wednesday, March 28, 2018

महावीर जयंती

जब हम ज़बान,ज़ायके और ज़िन्दगी की गिरह सुलझा रहे थे।हर चीज़ के बनने बिगड़ने में प्रयोग कर रहे थे।जब इंसान और जानवर के दरमियानी फासला कम था।तब उसने एहसास कराया की हम इंसान हैं।उसने बताया दो हाथ और पैरों का सिर्फ यह काम नही है की खाना और खाना।हमे अपने इर्द गिर्द हर चीज़ के लिए जीना होगा।हम ख़ुदा की बनाई हर शय की हिफाज़त और ख़िदमत के लिए हैं।

उसने ज़बरदस्त राजसी ज़िन्दगी को ठुकराया।जंगलों में टहला, भूख और प्यास में उस ताकत का एहसास किया जिसने हमारी रूहों को बनाया।ज़मीन में बिछे काँटों ने तलवों में चुभकर दिल की गाँठे खोल दी।हर वक़्त शहज़ादे की तरह हिफ़ाज़ती दस्ते से घिरा वोह जब जँगल का रुख कर गया तो उसके इर्द गिर्द जानवर थे।बातें करने के लिए पेड़ थे।एक सन्नाटा था जो सभ्यता में शोर पैदा करने को बेताब था।राजसी लाव लश्कर तो सब छोड़ते हैं उसने तो तन के कपड़े तक को उतारकर प्रकृति से प्रकृति जैसा बनकर दिखा दिया।
हर तरफ बिखरे घने जँगल में रुई से मुलायम बदन को बरगद की खाल सा सख़्त कर लिया।मुझे हैरत है की जब हमसे एक मामूली से रुमाल का मोह नही छूटता,पंखे की ज़द से हम बाहर नही जाना चाहते,कुछ हो न हो रौशनी को तो हम नही ही छोड़ सकते।तब कैसे उसने एक झटके में सब ऐसे उतार फेका जैसे वोह उसे क़ैद कर रहा हो।उसने ज़िन्दगी को इतना तपाया की उसका जिस्म कुंदन हो गया।

ईसा मसीह से 599 साल पहले उसने दुनिया को एक विचार दिया,सिद्धान्त दिया।ऋषभ देव से चली सीढ़ियों में 24वें नम्बर पर उसने रौशनी दिखाई।वैशाली में त्रिशला और सिद्धार्थ के आँगन में वह वर्धमान पैदा हुआ।जिसने अपनी ज़बरदस्त वैचारिक ताकत से और तप त्याग से दुनिया के सामने महावीर स्वामी नाम दिया।अहिंसा,सत्य, अपरिग्रह,अचौर्य और ब्रह्मचर्य के वह पाँच नियम दिए जिनके सामने ज़माना झुक गया।जँगल ने नगरों को जीने का सलीक़ा दिया।

मैं महावीर स्वामी की जूझने,समझने,प्रयोग,तप,त्याग को देखता हूँ,सोचता हूँ हज़ारों साल पहले यह कैसे मुमकिन था,लोगों को,आदिवासियों को इंसानियत से कैसे जोड़ा उन्होंने।आज सब कुछ है मगर हम चाह कर भी इंसान को इंसान होने का एहसास नही करा पा रहे हैं।जानते हैं क्यों,क्योंकि हममे महावीर का रत्ती भर भी सच,लगन, त्याग,समर्पण नही है।आइये आज महावीर जयंती में महावीर को याद करने की जगह उन्हें ज़िन्दगी में उतारे।जिनके दिल में वाक़ई महावीर होंगे,या जो महावीर को समझते होंगे,उनके दिल से सबसे पहले नफ़रत अलविदा कह जाएगी,फिर दिखावा,शान शौकत जाएगी।यह हरगिज़ नही चलेगा की तन के तो कपड़े उतार दिए मगर मन संकीर्णता,हिँसा,बदले और लालच से ग्रस्त हो।मेरे महावीर मन को ही देखेंगे।

Monday, March 19, 2018

केदारनाथ सिंह

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की,
उड़ने लगी बुझे खेतों से
झुर-झुर सरसों की रंगीनी,
धूसर धूप हुई मन पर ज्यों —
सुधियों की चादर अनबीनी,
दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की साँस रोक कर खड़े हो गए
लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन,
चिलबिल की नंगी बाँहों में —
भरने लगा एक खोयापन,
बड़ी हो गई कटु कानों को 'चुर-मुर' ध्वनि बाँसों के वन की ।
थक कर ठहर गई दुपहरिया,
रुक कर सहम गई चौबाई,
आँखों के इस वीराने में —
और चमकने लगी रुखाई,
प्रान, आ गए दर्दीले दिन, बीत गईं रातें ठिठुरन की ।
....कल से पढ़ रहें हैं, दिल कह ही नही रहा की केदारनाथ जी को हैं की जगह थे लिखा जाए ।अनगिनत क़िस्से रात से सामने आ रहें हैं, लग रहा बचपन के कोर्स की किताब में बिखरी कविताएँ एक एक करके मिट रहीं हैं ।

सच तो यह है की केदारनाथ जी तब तक ज़िंदा हैं, जब तक कविताएँ हवा में तैर रहीं ।भला कवि और लेखक अपनी रचनाओं से कभी निकल पाते हैं, बल्कि हर शब्द में उनकी आत्मा ऐसे गुँथति है की वह उस हर शब्द में अमर हो जाते हैं ।हम सबके बीच से चलते फिरते बोलते उठते बैठते केदारनाथ जी भले चले गए हों मगर वह खुद तो यहीं हैं, कविताओं में,रोते,मुस्कुराते,हँसते,डाँटते,समझाते हुए,हमारे केदारनाथ जी...

Tuesday, March 13, 2018

इन सबको याद कीजिये आज

एक तरफ मार्क्स खड़े हैं तो दूसरी तरफ आइंस्टीन।तीसरी ओर लांस नायक करमवीर सिंह है तो चौथी ओर जय नारायण व्यास।इनके साथ बीच में बैठे हैं आमिर खान।मार्क्स,कर्मवीर और नारायण व्यास आजके दिन यह ज़मीन छोड़ कर गए थे अनंत की ओर तो उसी अनंत से आइंस्टीन और आमिर इधर ज़मीन पर अपने हुनर के रँग बिखेरने आए थे।
मार्क्स को कौन नही जानता,हर देश में उनके आर्थिक,सामाजिक और दार्शनिक विचारों से प्रभावित इंसान मिल जाएगा।दूर भारत के गाँव में अकेले पलँग पर पड़ा कोई व्यक्ति जब उसे अंदर से खंगालो तो मार्क्स उसमे कहीं छुपे आराम कर रहें होंगे।यह हैं मार्क्स जो भूगोल को ध्वस्त करके मानव मात्र में घुल गए।

करमवीर सिंह को लोग कम जानते होंगे।कश्मीर पर चीखने वाले बहुत लोग मिल जाएँगे मगर वोह यह नही जानेंगे की इस रियासत को हाथों से खिसकते खिसकते रोकने में किन किन का हाथ था।पढ़ाई में बेहद कमज़ोर और शरारत में अव्वल करमवीर को जब घर वाले खेती में लगा देना चाहते थे तब ही उसने सब पाबन्दी छोड़ फ़ौज़ का रुख किया और कई युद्धों में माटी के लिए लड़े।कश्मीर उनमे से सबसे बड़ा मसला है जिसमे करमवीर ने कमान सम्भाली।

अब आजके ही दिन गुज़रे जयनारायण व्यास को देखिये पहला इंसान जिसने जागीरदारी प्रथा को खत्म करने की बात की।काँग्रेस के ऐसे नेता जिनके पीछे अथाह हुजूम।राजस्थान के मुख्यमंत्री बनते ही देश को बुनने का काम शुरू।मुझे अफ़सोस है की इन बनाने वाले लोगों को एक ही तराज़ू में तौलकर सब कुछ भुला दिया गया।

मैं आइंस्टीन के किस्से में हाथ नही डालूँगा क्योंकि उनपर खूब लिखा पढ़ा गया है।रबीन्द्रनाथ टैगोर का उनसे मिलना और वोह बातचीत किस हद तक लिखी जा चुकी है पढ़ी जा चुकी है।आइंस्टीन का संघर्ष और उनकी दुनिया की दें को कौन भुला पाएगा।गाँधी पर आइंस्टीन का जवाब ही तो मुझे गाँधी की तरफ और बढ़ जाने को कहता है।अब रही बात आमिर खान की तो वोह आपके सामने हैं।उनकी कला को चाहे नकारिये या तारीफ़ करिये यह आपके खुद के किरदार का मसला है।

मुझे देश की सीमा के लिए करमवीर चाहियें,ज़िन्दगी आसान करने के लिए आइंस्टीन तो ज़िन्दगी को दिशा देने के लिए मार्क्स,उस दिशा को ज़मीन पर उतारने के लिए जयनारायण व्यास और इस ज़िन्दगी में रस के लिए आमिर खान।तभी तो ज़िन्दगी खुशनुमा बनेगी जब सब तरह के रँग होंगे।जब सब तरह का मज़ा होगा।यही तो दुनिया है आज उन सबको याद करलें।यह हमारे अपने हैं।

Sunday, March 11, 2018

अन्न दाता के पाँव

कोई उन्हें अन्न दाता लिख रहा है तो कोई उनकी टूटी चप्पलों को वाल पर सजाए है ।कोई पैरों में फटी बिवाइं की तस्वीर लगाए है तो कोई तलवों से रिसते ख़ून की तस्वीर उकेर रहा ।यह महाराष्ट्र के किसानो के उन क़ाफ़िले की धूल है जो सैकड़ो किलोमीटर और हफ्तों बाद हम सबकी आँखो में घुसी है ।

कभी सोचियेगा की कोई यह तस्वीरें क्यों लगा रहा,कोई इन्हें क्यों लिख रहा,हर अल्फ़ाज़ से आपको यह शिकायत नही लगती की वह आपके दिल की कुण्डी खटखटा रहा,की यार अब तो जाग जाओ।यह सारे लोग चाहते हैं की इन तस्वीरों से ही सही,उनके पाँव की गुलथियाँ और जूझने की इस कसमसाहट पर तो जागो ।

आज भी हमेशा की तरह सुबह होगी ।मेज़ पर बढ़िया नाश्ता भी होगा ।यह तस्वीरें भी होंगी और हम आँख फेर कुछ अच्छा देखने पढ़ने की ख्वाहिश लिए अनाज को नए नए रूप और रँग में गटकते हुए आगे बढ़ जाएँगे ।

कोशिश करियेगा की उन किसानों की आवाज़ बन जाइये ।अब न वह तोड़फोड़ में हैं, न दँगे फ़साद में,वह तो चुपचाप बढ़ रहें हैं अपनी ज़िन्दगी में एक अदद ख़ुशी के लिए ।पार्टी,धर्म,विचार,वर्ग,जाति से ऊपर उठकर इन बढ़ते हुए क़दम को आराम दीजिये ।इनकी ख़िदमत कीजिये ।जो महाराष्ट्र में उन तक नही पहुच सकते वह अपने दरवाज़े खोल दें,किसानो की जितनी हो सके मदद करें ।
मुझे गाँधी इनके हर कदमो में नज़र आ रहें,लग रहा वह कह रहें की जाओ और वह लेलो जो तुम्हारा है मगर उस तरफ नज़र भी मत उठाना जो दूसरों का है ।तभी तो वह किसान सिर्फ अपने हक़ की माँग के लिए क़दम दर क़दम चलते जा रहें हैं ।कुछ क़दम हम भी उनके लिए चल लें या बात करलें या समर्थन दे दें तो उनकी फीलियों में ताक़त बढ़ जाए,जो कल आने वाली नस्लों के लिए फिर खेत में होगी...

Friday, March 9, 2018

फार्मी मुर्ग़े की योनि

जब मैं फार्मी मुर्गों को देखता हूँ तो दहल जाता हूँ की आखिर यह कौन से लोग हैं जिन्होंने एक जैसा गुनाह किया और फार्मी मुर्ग़े की शक्ल में दूसरा जन्म पाया।मैं जब उन्हें जाल में बन्द देखता हूँ,एक दूसरे के ऊपर मरिहल सी हालत में खड़ा पाता हूँ तो सोचता हूँ इस वक़्त वह कौन सा गुनह है जो हमे इस रूप में जन्म दिलवाएगा ।जब उसे तराज़ू पर झुका हुआ देखता हूँ,जबकि उसके कानों में एक की चीखें और उसकी खुद की मौत चन्द बाँटो के दरमियान होती है तो भी वह उचक कर भागने की कोशिश नही करता,यह बेबसी आखिर किस गुनाह की सज़ा के लिए मिलेगी ।

जिन्हें अगले पिछले जन्म में यक़ीन हैं, वह पोल्ट्री फॉर्म में ठसे हुए मुर्गों को देखें और सोचे की आखिर वह कौन सा समूहों में किया गया गुनाह है जो एक रँग,एक जाल,एक छूरी से एक साथ इस जन्म में मिल रहा है ।कहीं यह वियतनाम पर बम बरसाने वाले तो नही,कहीं यह तालिबानी तो नही,कहीं यह आइसिस के लोग तो नही,कहीं यह इज़राइल से तो नही,कहीं यह कुर्दों के क़ातिल तो नही,कहीं यह रशिया के ख़ूनी हाथ तो नही,कहीं यह अमरीका के नफ़रती तो नही,कहीं सीरिया म्याँमार या यहूदियों की नस्लकुशी करने वाले हिटलर के लोग तो नही ।

कहीं यह हमारे मुल्क़ के बंटवारे के वक़्त वह वहशी लोग तो नही जो हर आने जाने वालो को लूटते थे,उनकी लड़कियों को आपस में बाँटते थे और रोते हुए हर बेबस के सामने ठहाके लगाते थे,कहीं यह कश्मीरी पण्डितों,चौरासी के सिखों,गोधरा के सन्तों,गुजरात के मुसलमानो,भागलपुर के इंसानों और मुज़फ्फर नगर के बेघरों के क़ातिल के जन्म तो नही या कहीं यह वह तो नही जो आज भी दंगो में औरतों के कपड़े नोचते हैं, बच्चों को हथियारों पर टाँगकर अपनी घिनौनी ताक़त को दिखाते हैं, इंसान को मारने के वीडियो बनाते हैं, इन सबसे इतर यह फार्मी मुर्ग़े कहीं वह तो नही जो इन सारे गुनाहों पर पर्दे डालने वाले लोग हों ।
पता नही,यह फार्मी मुर्ग़े किस योनि में आते हैं, किसके हिस्से का गुनाह है जो आज इस जन्म में उन्हें सामूहिक दर्द,बेबसी और मायूसी में ढकेले है ।

क्या क्या सोच लिया,सब तो हमारा ही वहम है ।बेचारे यह मुर्ग़े तो खुद मज़लूम हैं ।न कोई अगला पिछला जन्म  ।इस वक़्त ही होना है जो होना है ।दंगो में ठहाके मारकर हँसने वाले हर खूँखार को बहुत तरक्की करते देखा है ।इसीलिए तो इसपर यक़ीन नही,बस मुर्गा खरीदिए,पकाइये और खा जाइये । मेरी तरह यूँ लफ़्ज़ की सड़क पर हैशटैग के ठेले में अल्फ़ाज़ का ढेर लगाए, रोज़ के फेरीवाले के चक्कर में मत पड़िये,एक दूसरे से लड़ते रहिये ।नोच डालिये हर वह गिरेहबान जो आपकी पसन्द का नही है, आखिर इंसानियत को खत्म करने का ठेका भी तो उठाया ही गया है...

Wednesday, March 7, 2018

महिला दिवस

कोई कहता है की महिलाओं के लिए खास दिन की ज़रूरत क्या है और हम कहते हैं ज़रूरत है।कम से कम उस एक दिन हम हर उस महिला को एक साथ याद तो कर सकते हैं जिसने परम्पराये तोड़ी।रास्ते बनाए।खुशबू बिखेरी।अपने पसीने से चमक पैदा की,हमारी आपकी आँखे खोली।फर्क मिटाए।वक़्त आने पर लगाम थामी और नई नज़ीर बनाई।
वह औरत जब साहस में होती है तब इंदिरा बनती है।जब करुणा में होती है तब मदर टेरेसा बनती है। विज्ञान में कल्पना चावला।जब राजपाट सम्भालती है तब महारानी विक्टोरिया होती है।पर्दे में दुश्मनो के पर्दे उतारकर रज़िया सुल्ताना होती है।रानी झाँसी और बेग़म हज़रत महल बनकर दुश्मन के दांत खट्टे करती है,वो जहाँ होती है एक तारीख बुन रही होती है।जब जिस्म दिखाती है तो सनी लियोन बनती है।जब अदाकारी पर आती है तब रेखा बनती है।जब गला आवाज़ से सुर्ख़ होता है तब बेगम अख्तर बनती है।

जब व्यापार सम्भालती है तो नैना लाल क़िदवई बनती है।जब कलम थामती है तो महादेवी बनती है।इस्मत चुगताई बनकर घर घर से कहानी बटोरती है ।सावित्रीबाईफूले बनकर दासता को तोड़ती है।ज़ुलैखा बनकर मौलाना आज़ाद को कन्धा देती है तो कस्तूरबा बन गाँधी गढ़ती है।बीबी अमतुस्सलाम बन कर संगठन खड़ा करती है।आदिवासी की आवाज़ सोनी सोरी बनती है तो सबसे जूझती इरोम शर्मीला बनती है।जब अध्यात्म को थामती है तो भगिनी निवेदिता बनती है।सूफियाना होकर राबिया बसरी बनती है।रस में मीरा तो प्रेम में लैला होती है।एक धागे को दो तीलियों में बुनकर ऐसी नक़्क़ाशी उभारती है की जिस्म ढककर भी खिल उठें।सर पर ईंट लादे जब कोई औरत बहुमंज़िला इमारत में मज़दूरी करती है तो अच्छी अच्छी ताक़तों का गुरूर चटख जाता है।

कौन सी शय है जिसमे उसने बुलंदिया नहीं पाई।औरत के हर रूप को आज याद करने का दिन है।एक बार उसे आज़ाद करिये।हाथ पैरों से नहीं अपने थोपे विचारों से आज़ाद करिये तब देखिएगा वो इतने ऊपर उड़ेगी की आप फ़ख्र से भर जाएंगे।औरत का सतरूपा या हव्वा या ईव या देवी वाले रूप से छुटकारा पाइए तब देखिएगा वो कितनी बहुरंगी और प्रतिभा वाली है।उसका हर कदम हमारे आपके कदमों से मज़बूत,अडिग और तरक्की वाला है।उसकी समझ हमारी आपकी समझ से परे है।वह हर रूप में सबसे ऊपर है।ईश्वर की सबसे सफल रचना है औरत ।

और हाँ मैं नही कहता की औरतो को तुम बराबरी का स्थान दो,क्योंकि यह तुम्हारे बस में ही नही है।औरत खुद जब चाहेगी,जो चाहेगी ले लेगी,हम और आप देने की ड्रामेबाज़ी ही करते रहेंगे।हम उसे क्या ख़ाक देंगे,हम खुद उसके मोहताज हैं।इसकी एक छींट भर मोहब्बत हमारी ज़िन्दगी को खूबसूरत बना देती है, तो मांगने वाले तो हम हुए।हम सिर्फ इतना कर सकते हैं,की अपने अंदर फ़र्ज़ी गढ़ा हुआ गुरूर तोड़ सकते हैं।

Tuesday, March 6, 2018

महिला दिवस

सुभद्रा जोशी,बेग़म अनीस क़िदवई और मृदुला साराभाई यह वह तीन नाम हैं जिनको हमेशा याद रखना चाहिए ।जब कभी दँगे फ़साद हों और दिल करे की इन्हें कैसे रोकें तो इन औरतों की ज़िन्दगी में झाँकिये और देखिये की कैसे जूझा जाता है।
इन तीनों ने आज़ादी की लड़ाई लड़ी ।मगर उससे कहीं ज़्यादा इन्होंने बंटवारे के ज़ख्मो पर फाहे रखने का काम किया ।यह तीनो गाँधी जी के एक इशारे पर लोगों के दर्द को अपना दर्द समझ मिटाने में लग गईं ।

मृदुला साराभाई का काम आखिर हम कैसे भूल सकते हैं ।मखमल के गद्दों और खूबसूरत बड़े बड़े कमरों को छोड़कर उन्होंने खुले मैदान में लगे राहत शिविरों में सेवा करते हुए बहुत सी रातें गुज़ारी हैं ।
बेग़म अनीस क़िदवई ने तो दंगो में अपने शौहर को क़त्ल किये जाने के एक हफ़्ते के अंदर देश के लिए खड़े होने को मजबूर कर दिया ।वह गाँधी जी के सामने थीं और आँसू रुकते न थे,गाँधी जी ने उन्हें भी राहत शिविरों में सेवा में लगाया और वह वहाँ ख़िदमत करते करते अपने हर दुःख को भूल दूसरे के दर्द में शरीक हो गई ।
सुभद्रा जोशी जैसी मिसाल इतिहास में नही है जो दँगाई इलाकों में बेधड़क चली जाए।एक दुबली पतली लड़की दंगाइयों के बीच जाकर उनमे से लड़कियों को छुड़ा लाए,ऐसा जिगरा किसमे था भला ।

कल महिला दिवस है, बहुत सी मशहूर महिलाओं के ज़िक्र निकलेंगे ही मगर थोड़ी ज़हमत करके उन महिलाओं को भी याद कीजिये जिन्होंने अपनी मेहनत,हिम्मत और लगन से इस देश की बुनियाद की ईंटे रखी हैं।जिनके होने से तड़पते दिलों को सुक़ून मिला है ।जो न होती तो हमारी सूरत भी अच्छी न होती ।जिनके हाथों ने घर और चूल्हे से इतर देश को गढ़ा है।जिनके हाथों ने देश को संवारा है।इन तीनों और इनके जैसी अनगिनत उन औरतों को सलाम जिन्होंने हमारे लिए एक खूबसूरत दुनिया बनाने में अपनी ज़िन्दगी लगा दी।

लेनिन स्टेच्यू त्रिपुरा

जीत बहुत बार हाज़मा बिगाड़ देती है, घमण्ड और क्रूरता को सर पर चढ़ा देती है ।जीत को सम्भाल पाना हल्के लोगों के बस की बात नही ।त्रिपुरा में यह जो लेनिन की मूर्ति मदहोशी में गिराई गई है ।यह तकलीफ़देह है, आखिर कोई किसी से इतनी नफ़रत कैसे कर सकता है।उनके मन मुताबिक कुछ नही होगा तो देश सीरिया बन जाएगा ।उनके विचार से जो मेल नही खाएगा वह मारा जाएगा,मर गया है तो उसकी मूर्तियाँ तोड़ेंगे ।उन्हें हर उससे दिक्कत है जो उनकी ज़ुबान नही बोलता,जो उनका कहा नही खाता, जो उनके ख्वाबों में अपने ख्वाब नही देखता।

उन्हें जो नही पसंद उसे ढहा देते हैं, जैसे तालिबान ने बामियान में बुद्ध को ढहा दिया था और बहुत खुश थे की आज बुद्ध ज़मीदोज़ हो गए,जबकि वक़्त ने बता दिया की बुद्ध फिर भी मुस्कुरा रहें और तालिबान कहाँ मिट गया ।बामियान से बुद्ध की मूर्ति दूर दूर पहुँच गई,वैसे ही यह गिरते हुए लेनिन के स्टेच्यू को देखो आज किस किस की वाल पर पहुँचकर घर घर में दिखने लगा,तुम पर हर तरफ हँस रहें हैं लोग।

यह लेनिन को कभी समझ ही नही पाएँगे,जो अपनी ज़मीन पर मौजूद गाँधी को नही समझ सके,उनके ख़ून पर मिठाइयां बाँटी, गाहे बगाहे गाँधी पर फब्तियां कसें वह लेनिन के पाँव को भी नही छू सकते ।बदकिस्मत,बेहया और मगरूर भीड़ निर्माण नही विध्वंस ही करती है ।त्रिपुरा में लेनिन नही गिरे हैं बल्कि वह गिरें हैं जिनसे जीत सम्भाले नही सम्भल रही....

Saturday, March 3, 2018

खाने की सम्प्रदायिकता

लखनऊ से अच्छा खाना कहीं का नही है।साऊथ से बढ़िया खाना कहीं का नही है।मुझसे पूर्वांचल के खाने का बाटी चोखा बर्दाश्त नही होता।मराठा बड़ा पाव का मुकाबला कोई भाई लोग कहाँ कर सकते हैं।खाने को लेकर तरह तरह की सीमाएँ हैं।
आपको बता दें यह भी एक प्रकार की साम्प्रदायिकता है।अपने खाने को श्रेष्ठ और दूसरे को बद्तर समझना ही तो साम्प्रदायिकता है।यह खाने की साम्प्रदायिकता है।बाटी चोखा खाने वाले भोगौलिक क्षेत्र के लिए बाटी चोखा ही महत्वपूर्ण है वहाँ आपकी बिरयानी मुँह बाए खड़ी रहेगी।जहाँ पोर्क खाया जाता है उनके सामने मटन को सर चढ़ाना बेहतर नही।साऊथ की इडली राजस्थान की मिर्च पर ज़बरदस्ती नही चढ़ सकती है।

मैं फिर कह रहा हूँ हमारे साम्प्रदायिकता से लड़ने वाले लोग रँग,भोजन,पेय,कपड़े,हेयर स्टाइल,बोली,भाषा की सांप्रदयिकता को तवज्जो नही देते हैं।यही चीज़ें बड़ी होकर हमे तहस नहस करती हैं।एक पोर्क खाने वाले के बगल में मटन खाने वाले सेक्युलर से सेक्युलर लोग नाक भौं चढ़ाएंगे।लखनऊ के तो मशहूर से मशहूर एक्टिविस्ट अपने खाने को लेकर ऐंठता मिल जाएगा।तब वोह खाने के फ़र्क को बढ़ाएगा।

हैदराबादी ज़िन्दगी भर यही बकते रहेंगे की उनकी बिरयानी मोरादाबाद और लखनऊ से अव्वल है।इतना समझ लीजिये जो मज़ा मेरे लिए हमारे खाने का वही मज़ा दूसरे को उसके खाने के लिए है।शराब पीने वाले को चाय पीने वाला बर्दाश्त नही कर सकता।दूध पीने वाला कोल्ड्रिंक वाले को निचली नज़र से देखता है।पिज़्ज़ा वाला समोसे को दबाता है।तो सत्तू वाला शिकंजी पर शिंकजा कसता है।क्या यह खाने की साम्प्रदायिकता नही है।

खाने में जब हम फ़र्क कर रहे होते हैं तब हमे ज़रा भी गुमान नही होता की हम इस मामले में किस हद तक साम्प्रदायिक हैं।बड़ी बड़ी बातें करने वाले भी अपने ज़ायके के गुलाम हैं।पसन्द नपसन्द तो आपकी हो सकती है मगर आप किसी के खाने को नीचा नही दिखा सकते हैं।जो जिस खाने के सहारे ज़िंदा है वही उसका सर्वश्रेष्ठ खाना है।इसलिए अपने ज़ायके पर राल बहाने से पहले दूसरे किसी ज़ायके का मज़ाक उड़ाने से बचिये।
भूगोल में जकड़ा ज़ायका धर्म की सीढ़ी चढ़ कर कब ज़हर में बदल जाता है, पता ही नही चलता।इसलिए हर एक की भूख,भोजन का सम्मान करना चाहिए।