वह मीठा है।वह वैसा(हाथों का इशारा) है भाई समझा करो।अरे उसमे लचक है।अरे उसके पेच ढीले हैं।हम अपनी गन्दी ज़हेनियत के साथ नामकरण किया करते हैं।जो थोड़े मुँहफट हुए कह दिया की वह गे है।हे राम या ख़ुदा कौन से दिन आ गए।घोर कलियुग।हम सब गे को अभी तक एक्सेप्ट नही कर सके हैं।आजभी वह छुप कर मन मसोस कर जी रहे हैं।चाह के भी चाह नही पा रहे हैं।हो सकता है हमारी मान्यताओ के हिसाब से यह फिट न बैठे फिर भी उनका अपना वजूद है।आपको किसी की चाल में मज़ाक सूझ सकता है।आपके लिए यह तफ़रीह होगा मगर एक बार संजीदा होकर देखिये।अगर कोई एहसास पल रहा है तो उसे जगह देना हमारा फ़र्ज़ है।क्या गलत है की कोई लड़का किसी लड़के से प्यार करे।वह प्यार किस हद तक जाए यह वह दोनों तय करें, हम या आप नही।एक करीबी कह रहे थे की अगर गे को छूट मिल गई तो पूरी सोसाइटी इसमें लपेट जाएगी।तो भय्या जिसे ज़्यादातर लोग चाहे उसे क्यों रोका जाए।नौजवान जो शायद इसे अपनी पसन्द से चुनते हैं उन्हें मेरा पूरा समर्थन।जैसे हम हर एक को जीने का एक खुला माहौल देते हैं वैसे ही इन्हें भी दिया जाए।किसी गे का मज़ाक उड़ाने से पहले अपने वजूद को देखिये जो परम्पराओ का गुलाम है।जब आप अपने घर में बड़ो के बताए सारे रास्ते नही अपनाते वैसे ही यह एक कदम बढ़ कर नए रिश्ते बनाकर परम्परा तोड़ते हैं इसमें गलत क्या।
अब रही प्रकृति की बात तो अगर यह प्रकृति के विरुद्ध है तो इसे प्रकृति को रोकने दे आप दरोगा मत बने।अगर कोई लड़का आपको प्रपोस कर दे तो आप मना करें या मान जाए ऐसा खुला माहौल बनाए।एक बार दूसरे के मन में उठ रहे एहसास को इज़्ज़त दे शायद यही प्रकृति चाहती है।जब अपने हर चीज़ को आगे बढ़ कर अपनाया है तो इसे भी जगह दीजिये।मज़ाक तो मत ही बनाए।कुछ लोग कहते हैं की अगर आपको गे इतने ही पसन्द हैं तो खुद क्यों नही हो जाते तो वह सुन ले की अगर उन्हें लड़की इतनी ही पसन्द है तो वह लड़की क्यों नही हो जाते।मेरा सिर्फ इतना मानना है की अगर आपको,हमको आसानी से ज़िन्दगी जीने का हक़ है तो इन्हें भी उतना ही हक़ है।जो धर्म का हवाला देंगे वह पहले अपने गिरेहबान में देखें की वह धर्म का कितना पालन करते हैं।धर्म मज़ाक बनाने को रोकता है।झूठ,मक्कारी,फ़रेब समेत तमाम गुनाह से रोकता है तब वह रुकते नही और गे के मामले में दरोगा बन जाते हैं।हम,आप और वह गे अपनी अपनी ज़िन्दगी के मालिक हैं उनपर बंदिशे लगाकर हम अपनी ही कमज़ोरी को बढ़ा रहे हैं।जिस समाज में एक पूरी कम्युनिटी छुप छुप के जिए उस कम्युनिटी पर लानत है।एक बार बस एक बार दिल पर हाथ रख कर सोचिये की हमारा समाज कितना खूबसूरत है, तो इसमें हर एक को मुस्कुराने का पूरा हक़ है।सबको खिलखिलाकर हँसने का मौका दीजिये जिसमे सबकी ख़ुशी हो।बिना शर्म वह आपके सामने अपनी पसन्द चुन सकें और अपनी ज़िन्दगी को खूबसूरत बनाए।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Thursday, June 30, 2016
वोह जो ये हैं
Tuesday, June 28, 2016
बख्श दो
यह मुसलमानो वाला कपड़ा नही पहनना है.... यह हिन्दुओ वाला खाना नही खाना है.... यह लफ्ज़ जब किसी सात आठ साल के बच्चे के मुँह से सुनता हूँ तो दिल बैठ जाता है।जाने अनजाने माँ बाप के दिलों का ज़हर मासूमो में उतरते देख रूह टूट जाती है।आईना देखता हूँ,चेहरा धुन्धला नज़र आता है।आँसू,जो बहते भी नही,सूखते भी नही,दिमाग को भारी कर देते हैं।कितना धोखा दे रहा हूँ अपने आप को।लगता है की यह जो अमन और मोहब्बत का एहसास रोज़ जीता हूँ,वह कितना फ़र्ज़ी है।जिस ज़हर से आने वाली नस्लो को बचाने के लिए मेहनत करता हूँ,वह बच्चों में कुदरती आ गया है या माँ के दूध के साथ आया है।उन माँ बाप पर तरस आता है जो बच्चे को खूबसूरत ज़िन्दगी तो नही दे सके मगर नफ़रत दे गए।जिन्होंने अपने बच्चे को पुचकारते हुए दूसरे बच्चों के लिए डायनामाइट को पैदा कर दिया।यह कोई मज़ाक नही है की चन्द सालों के बच्चे हिन्दू मुसलमान करने लगें।यह तफ़रीह नही है, यह एक सवाल है।हमारी परवरिश का सवाल।सोचता हूँ अब अपना सारा वक़्त टीके को खोजने में लगा दूँ।यह टीका जो बचपन में ही एंटी हेट वैक्सीन की तरह काम करे।
अब बड़ो को समझाना तो इसलिए नामुमकिन है क्योकि उन्होंने न्यूटन के सारे सिद्धान्त को छोड़कर सिर्फ क्रिया प्रतिक्रिया का सिद्धान्त रटा है और उसमे पीएचडी की है।उन्हें अच्छे से पता है की तलवार की प्रतिक्रिया त्रिशूल से कैसे देनी है।इनकी आँखों की रेटिना इंसान नही देख पाती, यह सिर्फ हिन्दू मुसलमान देख पाते हैं।यह अभी यहाँ भी डंक मारने आएँगे।मैं इन भस्मासुरों से ज़रा भी उम्मीद नही करता।यह वह लोग हैं जो एक व्यक्ति को पूजने में या उसका विरोध करने में इतना ज़हरीले हो चुके हैं की इनके स्पर्श मात्र से लकवा मार जाए।यक़ीन न हो तो इनके घरों के बच्चों और आश्रितों को देखिये।उनकी ज़बानें भी काली पड़ने लगी हैं।मेरे लिए अब सिर्फ बच्चे ज़रूरी हैं, जो इनके ज़हर से भर रहे हैं।जब शिव जी ने दुनिया का सारा ज़हर पी लिया था तब हैरत होती है की यह इंसान कहाँ से इतना ज़हर ले आया।यह झूठे,फ़र्ज़ी मज़हब के नाम पर पूरी इंसानियत को घुन की तरह खाने लगे हैं।हो सकता है मैं पागल हूँ, बहरा हूँ, नही सुनूंगा,आप कुछ भी बक्के।मैं अपने बच्चों का जिस्म इस ज़हर से नीला होते नही देखना चाहता।मुझे मेरे बच्चे में बच्चा देखना है, साँप नही।मैं यह ज़हर मिटाकर ही रहूँगा।भले हज़ार साल जीना पड़े।©
Monday, June 27, 2016
धूप छाँव
अच्छा तो रोज़ा हो।सुबह जब सोकर उठते होंगे,सुबह कितनी फीकी फीकी लगती होगी।दस बजने पर चेहरे पर बारह बज रहे होंगे।फिर ग्यारह बजे तक हल्की हल्की प्यास से गला सूख रहा होगा।बारह बजते ही हल्की हल्की भूख भी लगेगी।एक बजे से तीन बजे के बीज चिड़चिड़ाहट भी हो सकती है।तीन से चार,पाँच बजे तक भूख और प्यास दोनों जवाब दे देते होंगे।दिमाग ख़ुश्क हो जाता होगा।बदन निढाल हो जाता होगा।छः बजे तक सब कुछ बोझिल सा हो जाता होगा।अब तो दिल दिमाग भी भूख प्यास जैसी मामूली सी ख़ुशी की तरफ दिमाग लगाने को न तैयार होते होंगे।साढ़े छः बजे तक सारी ख्वाहिशों से जी हट जाता होगा,कुछ भी याद नही रहता होगा।दिमाग शून्य की तरफ जाता होगा।यह परेशानी की चरम सीमा है।
अब बजते हैं सात और एक दम से खुशियो का दरवाज़ा खुलता है।दिन भर थका, प्यासा,भूखा जिस्म ढेर सारी खुशियो पर टूट पड़ता है।गीला, सुखा, तला, भुना सब दस मिनट में ख़ाली पेट के अंदर और सुकून की साँस की चलो एक रोज़ा कटा।उन घन्टो में सब कुछ खा लेने की चाह, पा लेने की चाह।फिर बजते हैं आठ,पेट थोड़ा थोड़ा फूलता है।बैठना और लेटना मुश्किल होता है।थोड़ा टहलना चाहता है जिस्म।किसी तरह अल्लम् गल्लम् पेट में अपनी जगह अख्तियार करता है तब बजते हैं दस।कुछ खास खाना खाया नही जाता और हल्का फुल्का खाकर सो जाना बेहतर लगता है।फिर अगली सुबह।रात भर का इकट्ठा एक दम से बाहर।
जिस्म फिर आज़माइश के किनारे पर।आपकी खाने की तमाम तहे और लीटरो पानी ने सुबह ही साथ छोड़ दिया ताकि आपकी आज़माइश ईमानदारी से हो।इसलिए खुशियो में इकठ्ठा हर चीज़ परेशानी के दौर में पहले खत्म होगी।यह जो रोज़े का चक्र है यह मुझे बड़ा अजीब मगर बड़ा वास्तविक लगता है।यह बताता है परेशानी लम्बे वक़्त रहती है और धीरे धीरे बढ़ती जाती है।खुशहाली कम वक़्त रहती है,एक दम से आती है और ज़रा सी लापरवाही में कम वक़्त ठहर के निकल जाती है।इसीलिए अगर हम ख़ुशी को धीरे धीरे इंजॉय करें तो ज़्यादा मज़े ले पाए।एक दम से ढेर भर इफ्तार हमारे पूरे खाने के सिस्टम को बैठा देता है।इसीलिए परेशानी के बाद आने वाली खुशियो में बौखलाना नही चाहिए।वैसे भी कुदरती तरीके से परेशानी का वक़्त लम्बा ही होता है।दिनभर के सोलह घण्टे के रोज़े के बाद इफ्तार आता है।महीने भर के रमज़ान के बाद ईद आती है।तो घबराइये नही।मुश्किल वक़्त को सब्र और मेहनत से काटिये।खुशियाँ आने पर परेशानी का वक़्त मत भूल जाइये,क्योकि वह कल फिर आएगा।तब तक इतना जिस्म खराब मत कर लीजिये की कल का वक़्त काटे न कटे।जब परेशानी में दिल ओ दिमाग काम करना बन्द कर दे तो यक़ीनन सामने वह इफ्तार का चाँद मुस्कुराने ही वाला होगा मेरे दोस्त।©
बेमिसाल सब्र
एक खन्जर से जिस जिस्म को वह ख़तम करने चला था,वह दुनिया में ऐसा चमका,ऐसा चमका की पूरी क़ायनात ही रौशनी से भर उठी।उनमें नरमी ऐसी की मोम भी उनसे सीखे।ताक़त इतनी की उस दौर में सबसे ज़्यादा।मोहब्बत इतनी की खुशबू अब तक है।इल्म इतना की इल्म का बादशाह।ख़िदमत ऐसी की मिसाल या यूँ कहे हर फ़न में तारीख़ गढ़ने वाली मिसाल।जिनकी पैदाइश का गवाह काबा और शहादत का मन्ज़र मस्जिद ने देखा हो उनकी तारीफ़ में क्या कहें, उनकी खुशबू को किन लफ़्ज़ों में समेटे,वह तो हर मासूमियत में हैं।यही तो हैं हज़रत अली।अथाह ताक़त के बावजूद दिल में अथाह नरमी।
मेरा दिल जब डूबने को होता है तब उसे सहारा देते हैं मेरे अली।उनका किरदार बोलता है।आवाम के लिए उनके जिस्म का हिस्सा हिस्सा लगा था।अली ने सूफ़िज़्म की वह नीव रखी जिसकी आगोश में सारा जहाँ आ गया।जब उन्होंने मोहब्बत से बाहे फैलाई पूरी आवाम सर झुका के खड़ी हो गई।हर एक के सवाल,परेशानी,दर्द,तकलीफ़ में जिसने फाहे का काम किया वह अली थे।जब आँखों में अँधेरा और मुस्तकबिल में कालिख़ दिखी तब रौशनी का काम किया अली ने।मेरे अली ने हर दर्द में चीरा लगाया।हर तकलीफ़ में मरहम लगाया।इंसानियत को अपनी मोहब्बत और दूर की सोच से ऐसा रास्ता दिखाया की राह आसान हो गई।उनके सामने ज्ञान,कला,विज्ञान,धर्म,दृष्टि,विचार ने ऐसी तरक्की की की उसका असर आज तक है।अगर ज़रा भी दिल में काम की,इल्म की,मोहब्बत की,ख़िदमत की गुंजाईश हो तो हज़रत अली को पढ़िए।
जिन्होंने हज़ारों साल पहले वह कह दिया जिसकी आज भी उतनी ही ज़रूरत है जितनी तब थी।अपने क़ातिल तक के लिए कहा की इसको सिर्फ इतनी ही सज़ा देना जितना इसका गुनाह है।मुल्क,मज़हब,सोच,पार्टी का बन्धन खोलकर जब उन्हें पढ़ेंगे तब अली की दिखाई राह के मज़े ले पाएँगे जैसी सूफी आजतक लेते आए हैं।आज 21वीं रमज़ान उनकी शहादत का दिन है,एक बीमार दिमाग के ग़ुलाम ने उन्हें खत्म करना चाहा था।अली जिस्म से लोगों की रूह में उतर गए।यह उन्हें ज़िन्दगी में उतारने का वक़्त है।अली कल,आज और कल ज़रूरी रहेंगे क्योकि वह रौशनी हैं।इल्म की रौशनी।©
Saturday, June 25, 2016
वोह बारिश के दिन
एक चीज़ समझ नही आ रही की यह घमौरियाँ यानि अंधौरियाँ क्यों खत्म हो गई।पहले गर्मियों में कितनी होती थी,अब देखने को नही मिलती।आखिर वह कौन सी हवा है जो बदल गई।बचपन में दाने निकलना तो आम होता था,अब देखने को नही मिलते।यह वह मामूली सी बीमारियाँ थी जो गर्मी को और खूबसूरत बनाती थीं।एक बीमारी थी जिसमें बच्चे के दोनों गाल फूल जाते थे,ज़बरदस्त सूजन से,वह भी अब नही दीखता।धीरे धीरे यह घरेलू बीमारियाँ भी खत्म ही हो गई।एक वजह यह भी है की या तो हमारी नज़र में यह नही हैं, या वाक़ई यह खत्म हो गई।चिलचिलाती गर्मी में उमस के साथ ही खूबसूरत अंधौरियो का धावा होता था।गर्दन,माथा तो इनके खेलने की जगह होता था।एक बारिश के बाद फुँसी, फुड़ियो की बहार आ जाती थी।पैर के ज़्यादतर हिस्सों और खुले हुए हाथों में इनका आतँक होता था।मैं सोचता हूँ अब के बच्चे कितने कमज़ोर होंगे,जब यह ज़िन्दगी के इन मामूली से दर्द से नही गुज़रेंगे तो कैसे बड़ी तकलीफो से लड़ेंगे।एक बात और की कहीं इनके बोझ से स्कूल बैग को देखकर दाने,फोड़े,फुँसी,घमौरियाँ तरस खाकर भाग न जाते हों।गुज़रा बचपन हल्की हल्की परेशानियो से जूझता था,अबका बचपन बड़ी मोटी मोटी किताबो से,ताज्जुब है आपके बचपन की वह मोटी मोटी किताबें पिछले बचपन में आवारगी से घूमने वाली,घमौरियों वाली गर्दन ने लिखी हैं।खैर जो भी हो पिछले वक़्त की हल्की हल्की बीमारियो को याद कीजिये,उनका इलाज याद कीजिये और बड़ों की बेफिक्री सोचिये आपको कल की खूबसूरत हवा महसूस होने लगेगी।उस दर्द में भी नीम की ठण्डी हवा,उस तक़लीफ़ में बारिश की सारी बौछारें आपको चेहरे पर पड़ती हुई महसूस होंगी।©
Friday, June 24, 2016
मैं ऐसा ही हूँ
हाँ तो भैय्या यह बताओ की तुमने कौन सी मिज़ाइल बना दी है।मिज़ाइल छोड़ो पंखे का मोटर ही कौन सा बना दिया है।अच्छा यह भी छोड़ो,विज्ञान की कोई किताब लिखी है।मैं भी नास्तिक क्यों हूँ इस पर लाखों शब्दों की किताब लिख सकता हूँ।सुबह से शाम तक धार्मिक लोगों या धर्म की तफ़रीह उड़ा सकता हूँ।भगवान या ख़ुदा के वजूद पर वह तंज कर सकता हूँ,जो तुम चाहकर भी नही कर सकते।मैं धार्मिक क्यों हूँ,इस पर करोणों शब्द लिख सकता हूँ।जिन्नात,हूरों,देवताओं, राक्षसो के किस्सों से किताबे भर सकते हैं।क़ुरान और वेद पर थोड़ा बहुत कह सुन सकते हैं,मगर इसका मतलब यह नही की विज्ञानं और वैज्ञानिको को तमाशा बना दूँ।नास्तिको की प्रैक्टिकल बातों को सिरे से काटने लगूँ,यह नही हो सकता।मेरे लिए आस्तिक या नास्तिक होना बेहद आसान है।दूसरे की कमियों से रफ भरना भी बेहद आसान है, मगर इनको समझना बेहद कठिन है।मैं अपने बारे में कहता हूँ की अभी मैं आस्तिक और नास्तिक को समझ रहा हूँ,पता नही कितना वक़्त लगे।मेरी राय एक घण्टे,एक किताब,एक व्यक्ति,एक पैगम्बर,एक देवता पर नही टिकने वाली।मैं इनको समझने में लगा हूँ,पता नही इसकी मंज़िल क्या हो।वैसे मुझे मंज़िल से ज़्यादा रास्ते पसन्द हैं।मैं मंज़िल को प्यार नही करता।चाहता हूँ की उम्र इन रास्तों में कट जाए।मैं आस्तिक नास्तिक को सिर्फ रास्ता समझता हूँ।इनको देखता हूँ तो सोचता हूँ की क्या दिन रात विज्ञानं और भौतिक बातो को करने वाले कोई चीज़ खोज रहे हैं या विज्ञानं को पूज रहे हैं।जो आस्तिक हैं, वह ईश्वर,धर्म को समझ भी रहे हैं या सिर्फ पूजने में लगे हैं।मैं माजिद दरियाबादी की प्रैक्टिकल ज़िन्दगी के ज़्यादा करीब हूँ।कभी कभी खुसरु तो कभी कार्लमार्क्स तो कभी लेनिन तो रूसो या गाँधी के करीब चला जाता हूँ।मेरी उम्र सीखने की है हो सकता है पूरी उम्र सीखने में लग जाए।फिर भी मैं अभी किसी नतीजे पर नही पहुंचना चाहता।थोड़ा रुकिये,हमसे बहस मत कीजिये,हमे रास्ता दीजिये,सहयोग कीजिये ताकि यह रास्ता कट जाए।वैसे काँटे भी बिछाइयेगा तो क्या आपके पैगम्बर और आपके ही मार्क्स और लेनिन से सीख कर निकल जाएँगे।यह ज़िन्दगी सीखने के लिए कुर्बान,यहीं सीखा हुआ अल्लम् गल्लम् लिख कर जाऊँगा।दोस्त,तुम मुस्कुराते हुए लाल पीले होते रहो।©
Thursday, June 23, 2016
धर्म एक कला है
तुम्हारा अदृश्य,निराकार के सामने पाँच वक़्त झुकना क्या है।एक कला है।कितनी खूबसूरती से तुम सब मिलकर ,एक वक़्त में,एक जगह,एक साथ,एक जैसी प्रार्थना करते हो।वह प्रार्थना में तुम्हारे सर से पैर के अंगूठे तक पूरे जिस्म को तरह तरह की कला से मुड़ते हुए देखता हूँ।तुम्हारे मुँह से एक धुन में कलमा का निकलना और कुरान की तिलावत एक नायाब कला है।यह आवाज़,याददाश्त और खूबसूरत एहसास की मिलीजुली कला है।सोचता हूँ इतनी अरब की रेत में कला की समझ कैसे आई।नमाज़ के हर अरकान में कला की सारी खूबियों को बारीक़ी से कैसे पिरो दिया गया।मुँह धोने से नहाने तक,कपड़ो से खाने तक,कला को कितना सींच दिया अरब के इस धर्म ने।यह अद्भुत है, मैं सोचता हूँ वह कौन कला का ख़ुदा होगा जिसने इतनी खूबसूरती से कला को प्रार्थना में पिरो दिया।तुम ही नही मैं तो गंगा के किनारे एक साथ हज़ारों हाथों को आग को ऊपर नीचे करता हूँ तो सोचता हूँ यह अद्भुत कला किसने पिरोई है इनमें।जब शँख की आवाज़ दिमाग की अंतिम सतह को हिला रही होती है, तो सोचता हूँ यह किसने खोजा होगा।जब मैं मन्दिरो में सिंदूर और चुनरी ओढ़े मूर्ति देखता हूँ,तब कलाकार के हाथ चूमने का दिल करता है।एक धार से दूध को गिरते देखने की कल्पना से भर जाता हूँ।यही नही धीरे धीरे चलते ज़ाफ़रानी इंसानो के मुँह से एक जैसी आवाज़"बुद्धम् शरणम् गच्छामी" सुनना दिल को छंछना देता है।मेरे लिए यह सारी क्रियाएँ एक कला हैं।मैं नँगी तस्वीरों में कला को कम देख पाता हूँ,नंगेपन से उचकते छिछोरे टाइप के लड़को में कला को धुन्धलाता देखता हूँ।मेरे लिए धर्म में कला है या कला में धर्म है।मैं सारे साज को धर्म में देखता हूँ।मेरा संगीत जायसी,खुसरु तो नृत्य मीरा से होते हुए कृष्ण और शिव से मिल जाता है।मैं सधी हुई कला को पैगम्बर मोहम्मद की बताई प्रार्थना की क्रिया में देखता हूँ।बिना बैर भाव के कला की दृष्टि से इन्हें देखो तो तुम्हे नमाज़ पढ़ते हुए लोगों में तरंगे तो आरती उतारते लोगों में लहरे दिखेंगी।इनकी एक एक हरकत को दिल लगाकर देखो तो देख पाओगे की यह धर्म कला से भरपूर हैं।इनकी ऊँगली से लेकर सर तक कला में डूबे हैं।इनकी आँखों की पुतलियो से ज़बान तक की हरकतें कला से भरी पड़ी हैं।इन्हें उस नज़र से मत देखो जिस नज़र से यह खुद देखते हैं।इन्हें कला की नज़र से देखो तब सोचो वह जो ऊपर है, या नही भी है, कोई भी है, वह कितना बड़ा कलाकार है।उसकी प्रार्थना में कला की बेजोड़ झलक देखो और मुस्कुराओ की कितनी समझदारी से हमारे धार्मिक विद्वानों ने कला को घर घर में ज़िंदा रखा।बच्चे बच्चे में पैबस्त कर दिया।इस कला को भी दूसरी कलाओं की तरह इज़्ज़त दो।यह नायाब है।©
Wednesday, June 22, 2016
अमजद साबरी
हाँ तो तुमने चन्द गोलियों से उसे मार दिया।बेवक़ूफ़।तुमसे बड़ा बेवक़ूफ़ नही देखा।तुम्हे क्या लगता है वह मर गए हैं।रूह कहीं मरा करती हैं।तुम्हारी गोलियों की आवाज़ उनके मुँह से निकली आह की आवाज़ के आगे बौनी है।वह जो उनके मुँह से आखरी आवाज़ निकली होगी,तुम्हे पता है वह क्या है।वह ख़ुदा ने भी सुनी होगी।तुम्हारी गन्दी ज़हेनियत ख़ुदा के दिए फ़न को मिटा देना चाहती थी।सुनों, ध्यान से आसमान और ज़मीन की धड़कन को सुनों, वह रो रहीं हैं।उनके रोने से मौसिकी पैदा हो रही है।वह मौसिकी जो मेरे ख़ुदा से तुम्हारी शिकायत कर रही है।उठाओ बारूद और पीतल की गोलिया और इस ज़मीन और आसमान को छलनी कर दो।तुम आज मुझे और छोटे और बेचारे दिख रहे हो।तुम्हे लगा मेरे दोस्त अमजद साबरी को खत्म कर दोगे, बेवक़ूफ़।वह जिस्म से आज़ाद होकर दुनिया के ज़र्रे ज़र्रे में मिल गए हैं।जब तुम अकेले में परेशान होना।चीख कर अपने बाल नोचने का दिल करे तो साबरी की कव्वाली सुनना, तुमहे सुकून मिलेगा।तुम्हे पता है जब से तुमने उन्हें गोली मारी है तबसे मैं उनको सुन रहा हूँ,लोग उन्हें सुन रहे हैं।लग रहा है वह मेरे सामने बैठे हैं।मैं उन्हें देख पा रहा हूँ और सुनो अपनी सारी नस्ल लगा देना और अपने जैसों से कहना की वह भी पूरी ताक़त झोक दे,तब भी एक सिंगल साबरी नही पैदा कर पाओगे।मुझे रत्ती भर हैरत नही है तुमपर,तुम्हारा ख़मीर ही खट्टा है।तुम उस आवाज़ के जादूगर को अब क्या खामोश कर पाओगे।तुम्हारी नस्ले उन्हें सुन कर बड़ी होंगी।जब तुम्हारे बेटे इश्क़ में होंगे तब साबरी उनकी रूह में होंगे।जब तुम्हारी बेटियां अपनी आवाज़ खुद बुलन्द करने लगेंगी तो उसकी रिदम होंगे साबरी।तुम्हारे दिमाग का ख़ालिस पागलपन कभी भी रूहों को छू भी नही पाएगा।कुछ पागलों को लगता था की गाँधी,बेनज़ीर,पनसरे,दाभोलकर,स्कूली बच्चों,मासूमो को वह मार कर जीत जाएंगे,वह सब हार गए।यह सब आजभी हमारे ज़हनों,दिलों, रूहों में ज़िंदा हैं।तुम्हारी कुछ पागलपन से भरी गोलियों ने हमे यहाँ हज़ारों किलोमीटर दूर मेरे दोस्त अमजद साबरी से मिलवा दिया।आओ हमे मारो क्योकि अब हम में हैं साबरी,उनको मारो जिनमे हैं साबरी।देखें तुम साबरी को मार पाते हो या अपनी रूह को।खैर अपनी रूह को क्या मारोगे।तुम तो मरी हुई रूह के सड़े हुए जिस्म हो।हट जाओ बदबू आ रही है।©
Tuesday, June 21, 2016
मैं धर्म हूँ
मै जब तुममे दाखिल होता हूँ। तुम्हारी अंदरूनी खूबसूरती निखर आती है।तुम्हे दुनिया अच्छी लगने लगती है क्योकि तुमने उसे सँवारने के लिए मुझे चुना था। तुम्हे हर तरफ मोहब्बत और ख़ुलूस दिखता है।तुम हर बेचैन आँख को देख कर तड़प उठते हो। जब तक मै तुम्हारे अन्दर होता हूँ तब तक तुम इंसानियत की खुशबु से महकते हो।तुममे जब मैं होता हूँ तब तुम सख्त से सख्त ज़ुल्म से निपट लेते हो।हर परेशानियों से लड़ लेते हो।तुम इतना खूबसूरत किरदार बनाते हो की हज़ार दो हज़ार नही करोणों अरबों में लोग इंसान हो जाते हैं।एक दूसरे का कन्धा बन जाते हैं।एक दूसरे के आँसू पोछ डालते हैं।गले मिलकर वह मुस्कान बिखेरते हैं जिससे यह ज़मीन खिलखिलाकर हँस देती है।मेरी रूह तुम्हारी ज़िन्दगी में सलीक़ा,मोहब्बत और सब्र लाती है।
मगर हाँ मगर
जैसे ही मै तुम्हारे दोस्त,परिवार,घर,खानपान,खेल,पहनावा,सोच,पढाई,व्यापार,नौकरी, और पसंद नापसन्द में घुसता हूँ वैसे ही एक ज़हर सा हो जाता हूँ.वो ज़हर जो ऊपर कही हर बात को जुठ्ला देता है और तुम्हे मुझे इन्सान से हैवान बनाने में देर नहीं लगती।जैसे ही मैं एक फ़र्क़ के साथ तुम्हारी मगरूरियत से जुड़ता हूँ तो विनाश बन जाता हूँ।जैसे ही तुम्हारे झूठे मन गढ़न्त किस्सों में शामिल होता हूँ शैतान हो जाता हूँ।जैसे ही तुम्हारे रिश्तों में दाखिल होता हूँ तो मुस्कान को आँसू में बदल देता हूँ।तुम्हारी महत्वकांक्षा में घुसता हूँ तो ज़ुल्म की सारी हदें तोड़ देता हूँ।
अब तक तुम्हे पता चल गया होगा मै कौन हूँ।
मै धर्म हूँ।मैं धर्म हूँ।मैं धर्म हूँ।
©
Sunday, June 19, 2016
आशिक़ी सप्तम
हाँ तो मैं क्यों न रोऊँ।कैसे इन आँखों को समझाऊँ।तुम ही तो हो इनकी वजह।मुझे याद है जब तुम हमारे साथ चुपके चुपके टिफिन शेयर करती थीं।जबकि तुम्हारा भाई मेरे ही क्लास में था।कितना रिस्क लेती थीं।मेरे लिए तुमने सारी खुशियाँ लाकर रख दिया।यहाँ तक जब तुम्हारी माँ मरी तब भी तुमने हमे बड़ी लापरवाही में बताया की मुझे गम न हो।उस वक़्त तुम मेरे सामने फ़फ़क कर रो सकती थीं।नही रोई।जब तुम्हारा मेरे हमउम्र भाई मरा तब भी तुम खामोश रहीं की कहीं मुझे दुःख न हो।तुम मेरा हर पल खुशियो से भर देना चाहती थीं।स्कूल की पीटी में तुम मेरे सामने खड़ी होती की कहीं मैं गलत न कर दूँ।मेरी ज्योग्रफी की कॉपी के सारे फिगर तो तुमने ही बनाए थे,वही तो मेरा भूगोल था।इंटरवल में खीरे में नमक तुम ही तो लगाकर खिलाती थीं।फील्ड की हरी घास के निशान जब मेरी सफेद पैंट के घुटनो में लग जाते,तो तुम ही तो उस पर नीबू घिस घिस निशान मिटाती।मैं दावे से कह सकता हूँ होली की पहली गुझिया भी तुम्हारे हाथ से ही खाई थी।पेपर में जब ब्लैक पेन की रिफिल खत्म हो गई तो तुमने अपना पेन चुपके से मेरी पीठ पर फेका था,वह मेरे पास आज भी है। मैं वह भुने मटर के दाने कैसे भूल सकता हूँ जो तुम सफेद दुपट्टे में छुपा कर लाती थीं।तुम्हारे साथ कभी लगा ही नही की हम दोनों अलग हैं।तुम पण्डित थीं, लगा हम खुद पण्डित हैं।मज़ाक मज़ाक में पूरा हनुमान चालिसा और दुर्गा की आरती तुमने याद करवा दिया।आज मायूस बिखरे हुए दिल से पूँछ रहा हूँ की जब इतनी मोहब्बत थी तो क्यों छोड़ा।सब कुछ पता है।ऐश्वर्या सलमान की सज़ा मुझे मिली।तुम्हारे बाप ने उस वक़्त मुम्बई में बैठे सलमान और ऐश्वर्या के किये धरे की सज़ा हमें दी।तुम भी चुप चाप मिश्रा परिवार में चली गई।अथाह मोहब्बत को कमबख्त सलमान की गलती भुगतनी पड़ी।जाते जाते जान लो मैं आज भी पूरी पण्डित बिरादरी से मोहब्बत करने लगा हूँ।मुझे वह अपने लगते हैं।बेहद अपने।©