Thursday, September 27, 2018

बचा लो

मस्जिद की काई लगी सफ़ेद दीवार के सामने खड़ा मैं उस तारीख़ को देख रहा था जब यह बनाई गई होगी ।उस ईंट में लगे हाथ को महसूस कर रहा था जिसने इन्हें चुना होगा । मैं दीवार की तरफ़ खड़ा अपने दरकते वजूद से लड़ रहा था और सवाल कर रहा था,बताओ की मैं किससे लड़ूं तुम्हारी इस फीकी बासी सूरत के लिए ।

बताओ काफिरों से लड़ूं ।या यहूदियों से लड़ूं,या फिर ईसाईयों से लड़ूं,या हिंदुओं से लड़ूं ।तुम बताओ अपनी शानदार तारीख़ के गिरते खण्डहर को बचाने के लिए कादियानी से लड़ूं ।या शिया से लड़ूं ।या सुन्नी से लड़ूं । या बोहरा से लड़ूं ।या वहाबी से लड़ूं ।बताओ देवबन्दी से लड़ूं या बरेलवी से लड़ूं ।या औरत से लड़ूं ।या समलैंगिक से लड़ूं ।नास्तिक से लड़ूं तो कहो आस्तिक से लड़ूं ।

तभी गुद्दी पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ता है और आवाज़ आती है । कमबख्त कापी क़लम किताब से लड़ो ।पढ़ना लिखना है नही ।फ़ौरन ही दूसरा हाथ गाल पर पड़ता है और मस्जिद की काई हमारे गालों पर उतर आती है ।कान खोलकर सुनलो अगर आज फिर इन वाहियात बातों के लिए स्कूल नही गए तो इसी मस्जिद की तारीख़ी नीव के नीचे गाड़ देंगे ..और इस तरह एक क्रन्तिकारी विचारक कोर्स की किताबों में डुबो कर मार दिया गया ।

दुनिया की सबसे शानदार लैब में से एक में खड़ा जब वह माइग्रेन की दवा खोजकर मुस्कुराता हुआ निकला,दुनिया ने उस साइंटिस्ट के सामने पलकें झुका दीं, तब एहसास हुआ की अगर वह थप्पड़ सही वक़्त पर न पड़ा होता तो...

Monday, September 17, 2018

प्रेम पर पहरा

मुझे पता है यह जो मैं लिखने जा रहा हूँ,उससे आप कन्नी काटकर चुपचाप निकल जाएँगे ।मेरे लफ़्ज़ आपके गिरेहबान तक तो जाएँगे चाहे मैं खुद को रोकना भले ही जितना चाहूँ ।तेलंगाना में अभी कुछ रोज़ पहले एक लड़के को मार दिया गया क्योंकि उसने प्रेम किया था ।उसकी पत्नी और माँ किसी के भी सामने मारा जाए या छिपा कर मारा जाए,हालात तो दोनों ही भयानक हैं ।लड़के लड़की की हँसती हुई तस्वीर के बगल में गर्दन से टपकते ख़ून की तस्वीर ने बहुतों को परेशान कर डाला ।मैं अपनी बात बता दूँ की मुझे अब ख़ून विचलित नही करता,लाश को चाहे जितना उधेड़ दिया गया हो,मुझे असर नही होता क्योंकि अपने समाज के अंदर जीवित राक्षसी प्रव्रत्ति को हमने स्वीकार कर लिया है ।

एक बार सोचियेगा की आपने अपने किसी को कभी अपनी ज़िन्दगी जीने भी दी है ।आप खाना तय करते हैं, पहनना तय करते हैं, देखना तय करते हैं, बोलना तय करते हैं, रिश्ता तय करते हैं, नेता तय करते हैं, विचार तय करते हैं, विषय तय करते हैं ।इसके विपरीत अगर कुछ भी हुआ तो आपकी भावनाएँ चकनाचूर हो जाती हैं ।
आप अजीब मक्कार लोग हैं, जो पूजते जैसा हैं, वैसे होना नही चाहते ।पड़ोस के घर में तो मोहम्मद सा चरित्र चाहिए मगर अपना बच्चा अनाप शनाप कमाऊ ही चाहिए । फ़िल्मो में मार खाकर भी हीरो के हाथ में हीरोइन देख आप खुश होते हैं मगर घर में इश्क़ पर ज़बरदस्त पहरा ।

लड़के की हत्या के बाद चीख़ती हुई वह पाँच महीने की गर्भवती लड़की हो सकता है आपको रुला दे ।हो सकता है आप फौरी तौर पर उसपर अफसोस करें मगर क्या आप अपने बच्चे को यह आज़ादी दे पाएँगे ।जो बड़े दिल के प्रगतिशील लोग हैं वह भी आज लड़के लड़की के प्रेम भले बर्दाश्त करलें मगर लड़के लड़के के इश्क़ से भौ तन जाएँगी ।

एक नज़र ज़रा इसपर भी डाल लें की जिस बाप ने अपनी बेटी की माँग उजाड़ी है, उसने भला क्यों किया ।समाज के डर से,समाज की बेइज़्ज़ती से,समाज के तिरस्कार से,अब यह तो जानते ही होंगे की समाज हम और आप हैं मंगल ग्रह के लोग नही ।हमने आपने ऐसा माहौल बना रखा है जिसमे प्रेम ख़ून के आँसू रोए ।हम आप हैं, जिन्होंने धरती को प्रेम से ऊसर बनाने का ठेका ले रखा है ।

ईश्वर भी हम पर थूकता होगा की क्या इंसान उससे बन गए ।ईश्वर के सबसे प्रिय "प्रेम"को ही इंसान ने ज़हर बना दिया ।वह लड़की और लड़का जिसे आपने धर्म की नज़र से देखा,जाति के चश्मे से देखा और फिर मार डाला, उसमे हर उसका हाथ है जिसके दिल में धर्म और जाति का अलगाव है ।

प्रेम पर पहरा बिठाकर हम असभ्य समाज की पहली पँक्ति में खड़े सबसे बड़े मूर्ख हैं ।हर वह समाज सड़ा हुआ है जो प्रेम को बर्दाश्त नही कर सकता,हर वह समाज सभ्य है जो प्रेम को सींचता है ।

हम भूल रहे थे यहाँ प्रेम को लव जेहाद का नारा देकर हत्या को पुण्य कहने वाली एक भीड़ है।हम तो फ़िल्मो में भी नही चाहते की दो धर्मो के बीच प्रेम करने वाले हीरो हीरोइन हो ।हम तो दो धर्मो के प्रेमी जोड़ों को हिकारत की नज़र से देखने वाले औंधी बुद्धि वाले लोग हैं, बताओ हम हत्या करें न तो क्या करें ।

प्रेम,त्याग और अहिँसा का ताबीज़ लेकर आज़ाद हुआ देश सत्तर साल बाद नफ़रत,दिखावा और हिँसा की डोर पकड़ अब अपने ही बच्चों के गले उतारने लगा है ।मैं उन बच्चों की मुस्कुराती तस्वीर देखता हूँ ।लगता है कान्हा इन्ही के होंटो पर मुस्कुरा रहें हैं फिर तुम्हारी उस नफ़रत को देखता हूँ जिसमे लड़के की गर्दन पर ऐसा घाव है जैसे कोई आदमखोर मुँह मारकर गया हो ।इतने सबके बावजूद मैं अपनी हत्या तक इस बात पर कायम रहूँगा की जिसके हृदय में प्रेम है, ईश्वर वहीं हैं ।जो प्रेम से नफ़रत करता है, वह राक्षस है ।

एक बार अपने दिल में झाँकना और खुद को देखना की कहीं तुम भी प्रेम के दरोग़ा तो नही हो ।हर वह व्यक्ति प्रेम पर बैठा दरोग़ा है जो किसी को भी अपनी जाति, धर्म,लिंग,रँग,क्षेत्र,विचार के साथ ही प्रेम की छूट देना चाहता है ।हर वह हत्यारा है जो प्रेम को केवल अपने मानको पर तौलना चाहता है ।मैं उम्मीद करता हूँ की जिन्हें वाक़ई अफसोस है, वह अपने दिलों की गिरह खोलें,हर एक के लिए खोलें...यही उस प्रेम में शहीद प्रणय को श्रधांजलि होगी ।

Thursday, September 13, 2018

गणेश चतुर्थी

मोदक प्रिय मृद मंगल दाता, विद्या बारिधि बुद्धि विधाता।’ बार-बार ये पंक्तियां मन में दोहरा जाती हैं। अशांत मन में ज्वार-भाटे से उठते विचार, स्थिरता की ओर बढ़ने लगते हैं। गणेशजी पर लिखी ये पंक्तियां बहुत कुछ कह रही हैं। यह जो श्री गणेश हैं, यह जीवन में मंगल लाने वाले हैं। अपनी जिंदगी में सुकून पाने को आतुर भीड़ सिर्फ मंगल के लालच में उलझती ही जा रही है।

मेरे सामने गणेशजी के बहुत से किस्से दौड़ रहे हैं। हर किस्से में जो खास है, वह है- न्याय के लिए उनका खड़े रहना, कर्तव्य के लिए टूटकर भी डटे रहना, मां के आदेश को दुनिया में हर चीज से ऊपर रखना। सारी बाधाओं के बावजूद हमेशा मुस्कुराते रहना। एक तरह से हम कह सकते हैं कि गणेश दुनिया के इस भूभाग के रोल मॉडल हैं जिनकी बातें और जिनकी कहानियां लोगों को जीवन में कॉपी करनी चाहिए। कभी उनकी तस्वीर में झांकिए, एक अलग सी मुस्कान दिखेगी। वह अमिट, अटूट धैर्य जिसकी तुलना किसी लोक में संभव नहीं है। सिर कटने के बावजूद जो न काटने वाले से दुखी होता है और न विचलित होता है बल्कि मुस्कुराता हुआ खड़ा रहता है, ऐसा विशाल हृदय भला किसका हो सकता है?

एक बार उनकी जिंदगी में झांकिए। एक ऐसा चरित्र, जिसने सिर्फ हाथ उठाकर हर एक के मंगल की कामना की है। हम उनके मानने वाले लोग हैं। चरित्र की इस दीवानगी में ही तो हम सारे फर्क मिटाकर जश्न मनाते हैं। ध्यान सिर्फ यह रखना है कि उनके चरित्र की बूंद भर भी अगर हममें आ गई तो यह जश्न सफल है। उनके जितना न सही, मगर जरा भी धैर्य आ गया तो बहुत कुछ बदल जाएगा। न्याय और कर्तव्य के लिए जूझना आ गया तो धरती मुस्कुराएगी। प्राणी मात्र के मंगल की कामना की भावना आ गई तो यह हृदय सागर जितना विशाल और हिमालय जितना ऊंचा होगा।

यहां के त्योहारों को गौर से देखने, उसमें छिपे चरित्रों में झांकने, लाभ हानि के विरुद्ध शून्य में रहकर सोचने से बहुत संदेश ग्रहण कर सकते हैं। हर चरित्र एक ऐसा संदेश देकर जा रहा है। हमसे गलती हो रही है कि जश्न की आवाज में उस चरित्र की पुकार को सुन नहीं पा रहे हैं। उनके चेहरे पर बिखरे सुकून को तो देख रहे हैं, मगर खुद की जिंदगी में उतार नहीं पा रहे। गणेश जी की कथा सुनते हुए बड़े तो हो गए, मगर उसमें छिपे मर्म को नहीं समझ सके। मां पार्वती के लिए जिंदगी को दांव पर लगाने वाले पुत्र की जिंदगी की सबसे बड़ी सीख से खुद को दूर किए हुए हैं। हो सके तो धर्म, जाति, सोच सबसे ऊपर उठकर एक ऐसा चरित्र गढ़िए जो हमारे गणेश के करीब हो। कल जब कंधे पर गणेश हों, हाथ में मोदक हो तब हृदय और आत्मा में उनका चरित्र भी होना चाहिए। खुद के लिए प्रसाद लेने के स्थान पर हर एक को प्रसाद देने वाले हृदय का निर्माण कीजिए।

Tuesday, September 11, 2018

मोहर्रम और कर्बला

मोहर्रम के दस रोज़ हो सके तो करीब से देखिएगा। इन दस दिनों के इतिहास को झाँक कर देखिये,बहुत कुछ मिलेगा।ज़िन्दगी का पूरा फ़लसफ़ा इसी में गुँथा हुआ है।छः महीने के बच्चे से ज़ईफ़ तक की शहादत में इस्तेमाल हुई राजनीति और कूटनीति कितना कुछ समेटे है।मीर,दबीर सब तो इन दस दिनों को लिख चुके हैं जिन्हें सुन सुन कर हर हस्सास दिल रो दे मगर मेरा मकसद तो यह है की इन दस दिनों को अपनी ज़िन्दगी का सबक बना लिया जाए ।

सच के लिए क़ुर्बानी इतिहास में भरी पड़ी हैं मगर कहीं कोई पन्ना नही मिलता जहाँ ईश्वर के सत्यमार्ग में पूरा का पूरा परिवार लड़ जाए और उस लड़ाई में सबसे ज़्यादा शहादत के बावजूद तारीख़ में हमेशा हमेशा के लिए ज़िंदा हो जाए।
मैं इन मोहर्रम को नही कहता की तुम मुसलमानो की नज़र से देखो।मैं हरगिज़ नही कहता की कर्बला को शिया सुन्नी की नज़र से देखो।इसे बहुत दूर से अपने खुद के दिल पर अपना काबू पाकर देखो की कैसे 72 लोग हज़ारों के लश्कर पर भारी पड़ गए।यह सब शहीद हुए मगर दूर कर्बला के रेगिस्तान से इनकी शहादत कैसे हमारे हरे भरे बागो,मैदानों,पहाड़ों तक जा पहुँची ।कैसे कर्बला के बाद कर्बला की दास्ताने हज़ारों मील दूर,बीसों पीढ़ियों तक नीचे पहुँचती चली गई ।

सच पूछो तो यह एक आंदोलन था।इमाम हुसैन का आंदोलन,सत्य के लिए असत्य के विरुद्ध एक आंदोलन ।अपने घर की तमाम शहादतों के बाद जब बीबी ज़ैनब नेज़ो पर टँगे अपने भाई भतीजो के सर को देखती हैं, तब उनकी कैफ़ियत को देखना,जिसने अपने हर एक को रेगिस्तान में शहीद होते देखा हो,उसके दिल को महसूस करना।इस सबके बावजूद जब उनके सर से दुपट्टा खींच,नँगे सर उन नेज़ों में अपने शहीद रिश्तों के साथ कर्बला से ले जाया जाता है, उनके उस वक़्त के तारीख़ी काम को समझना।मुझे पता है की कर्बला रुलाती है, ज़ार ज़ार रुलाती है मगर कर्बला सबक भी देती है।कर्बला दुनिया का वह पहला आंदोलन था जिसे एक औरत ने सम्भाला था,लौटते वक़्त वह बीबी ज़ैनब ही तो थीं जिन्होंने मदीना पहुँचते पहुचँते सारी अवाम के दिल में हुसैन की शहादत की आग दहका दी थी।एक बार उनके तरीके को देखना।

कर्बला और यह मोहर्रम हमे हमेशा याद दिलाएगा की ज़ुल्मी चाहे जितना बड़ा हो,चाहे जितना खूँखार हो और हम चाहे जितने कम हों,अगर ईमानदारी से उसके खिलाफ हैं तो उसका नेस्तनाबूद होना तय है।मोहर्रम के इन दस दिनों को दिल की तमाम गांठो से इतर देखिये,आपको एक रास्ता दिखाएगा।मैं बहुत नही लिखूंगा,वह नही लिखूंगा जो पहले लिखा जा चुका है, उसे नही बताऊंगा जो वहाँ हुआ था,आपको रुलाउंगा भी नही बस इतना कहूँगा जब सच के लिए झूठ के आगे झुकने की मजबूरी आन पड़े तो कर्बला को देखना,सर कटकर भी बहुत बार सच को ज़िंदा रखता है।
बस यह तय कर लेना की सच ज़्यादा ज़रूरी है या आप ।जिस दिन यह फैसला कर लेंगे उस दिन कर्बला का ताबीज़ पा जाएँगे।

Monday, September 10, 2018

विनोबा भावे

विनोबा का एक क़िस्सा हमसे भी सुन लीजिये,कोई नही सुनाएगा।एक बार कहीं जाने के लिए अपने साथियों के साथ विनोबा लखनऊ आए।लखनऊ में बस स्टैण्ड तक पहुँचे।बस में ज़बरदस्त भीड़ थी।लोग तले ऊपर चढ़े जा रहे थे।कंडक्टर के पास उनके एक साथी ने कहा की हम आठ दस लोग हैं, हमे भी जाना है।कंडक्टर ने कहा यहाँ कहाँ जगह है, अगली बस से जाओ।उसके बहुत कहने पर भी कंडक्टर ने चढ़ने ही नही दिया।

उनके साथ एक बूढ़ा आदमी भी था,जिनको मामूली सा भाँप,उन्होंने बस में बिना चढ़ाए,झिड़क कर उतार दिया ।बस आगे बढ़ गई।बस बाराबंकी पहुँचती की उससे पहले कंडक्टर सस्पेंड हो गए ।पता चला उन्होंने विनोबा भावे को बस में चढ़ने नही दिया ।अब लगे इधर उधर की सिफारिश में मगर कोई रास्ता नही।महीने भर के बाद किसी ने सुझाया की विनोबा ही तुम्हे बहाल कर सकते हैं,उन्ही के पाँव पकड़ लो।बेचारे विनोबा के पास पहुँचे और माफ़ी तलाफ़ी की,आखिर विनोबा पसीज गए और जनाब वापिस नौकरी पर लौटे।

यह क़िस्सा मैंने खुद उन कंडक्टर साहब से सुना था।सुनाते में वह बताते रहे की इतना सादा इंसान,गन्दी सफ़ेद चादर,बेतरतीब सफ़ेद पीली दाढ़ी,हमे लगा कोई होगा गाँव सांव का मगर भय्या उस दिन से कान पकड़ा की कोई हो,उसे झिड़कना नही चाहिए मगर वह इतने ही सीधे थे तो हमे सस्पेंड नही करवाना चाहिए था।डाँट लेते,मार लेते।अब इन्हें कौन बताए वह अहिंसक विनोबा थे।खैर विनोबा की ज़िन्दगी खुद में एक सन्देश है,बहुत कुछ सीखने के लिए।गाँधी जी की छाँव जिनपर पड़ी,उनमे विनोबा ही तो थे जो लम्बे वक़्त तक उन्हें जीते रहे।विनोबा भावे के बहुत से किस्से याद हैं मगर करें क्या,यह मन मानने को तैयार ही नहींकी लोग अभी भी इन्हें या इनके जैसे किरदारों को पढ़ना चाहते हैं।आज विनोबा का जन्मदिन है।

आजका दिन गुज़रते गुज़रते एक क़िस्सा और सुन लें,विनोबा ने वैसे तो ज़्यादातर धर्म ग्रन्थो का अध्ययन किया और उसे अपने शब्दों में लिखा।उन्ही में से कुरान पर उनके सार को खूब अहमियत मिली।उनके कुरान सार के बारे में मौलाना मूसदी ने कहा कि पचीस मौलवी दस साल बैठकर और दसों लाख खर्च करके भी जो काम नहीं कर पाते ऐसा यह काम हुआ है। जब विनोबा जी कुरान का अध्ययन कर रहे थे, जब यह बात गांधीजी को पता चली। तो उन्होंने कहा कि हममें से किसी को तो यह करना ही चाहिए था। विनोबा कर रहा है, यह आनंद का विषय है। कुरान के अध्ययन के बारे में विनोबा लिखते हैं उन्होंने सन् 1939 में कुरान शरीफ का अंग्रेजी तर्जुमा देखा था, लेकिन उससे संतोष नहीं हुआ। विनोबाजी ने अरबी भाषा सीखकर पूरा कुरान सात बार पढ़ा। कम-से-कम 20 साल उसका अध्ययन किया।इतना दूसरे मज़हब को कौन पढ़ता है।

विनोबा हर तरह के धर्मों के अध्ययन के बारे में अपने अनुभव के बारे में लिखते हैं, 'मैंने जितनी श्रद्धा से हिंदू-धर्मग्रंथों का अध्ययन किया, उतनी ही श्रद्धा से कुरान का भी किया। गीता पाठ करते समय मेरी आँखों में अश्रु भर जाते हैं, वैसे ही कुरान और बाइबिल का पाठ करते समय भी होता है। क्योंकि सबमें मूल तत्व का ही वर्णन है।खैर विनोबा तो सब रास्ते दिखा ही गए हैं।आज उनके जन्मदिन पर जिसे वह रास्ता दिखाई दे वह बढ़ चले,बाकि लोगों का क्या है,वह मस्त रहें,मौज करें क्योंकि विनोबा ,उनके गुरु और साथी नीव तो डाल कर इमारत खड़ी कर गए।हम चाहे उसे चमकाए या खण्डहर बनाएँ।

Thursday, September 6, 2018

सतरंगी कुदरत

आसमान और ज़मीन को पूरी तरह देखने के बाद मैंने ईश्वर से कहा की आपकी।पूरी सृष्टि को जान लिया है मैंने ।मैं चाँद के घूमने और सूरज के टिके रहने को जान गया हूँ ।मैं पाताल में और आकाश में बराबर की हनक रखने लगा हूँ ।हे ईश्वर,मैं तुम्हारे सिंघासन के इर्द गिर्द बिखरे कण कण को जान चुका हूँ ।
आसपास खड़े ईश्वर के लोग मुझपर हँसने लगे ।ईश्वर भी ठहाके मारकर हँसने लगे ।तब एक स्वर में सब बोले यह जो ब्रह्माण्ड है, यह जो क़ुदरत है, यह जो ईश्वर है, इसका अभी तुम सूई की नोक के बराबर ही जान पाए हो ।अभी से यह ग़ुरूर,अभी से यह सुर्ख़ आँखे,अभी से यह सर उठाता तमतमाया चेहरा,जाओ और अभी हज़ारों लाखों नस्लों तक इंतज़ार करो समझने के लिए की कुदरत है क्या।

मैं मुस्कुराया,ईश्वर ने सवालिया निगह डाली मुझपर तो मैं बोल उठा ।दोस्त,ओह सॉरी हे ईश्वर,नीचे ज़मीन पर जो आपके सिपाही मुस्तैद हैं, वह तो केवल एक ही किताब से कुदरत की सारी गुत्थी खोलते रहते हैं ।यहीं ज़मीन पर आग के चारो और डोरा बाँधे बैठे लोग तो आपको चन्द शब्दों में समेट कहते हैं की उन्होंने प्रकृति को जान लिया ।

यह अजीब अजीब हुलिया वाले आपके सिपाही कहते हैं की वह कुदरत को जानते हैं, तभी तो वह कुदरत के खिलाफ,अप्राकृतिक व्यवहार को समझकर फैसला देते हैं ।हे ईश्वर यह बताएँ,जो लोग अभी सूई की नोक के बराबर ही कुदरत को जाने हैं वह कैसे दावा कर सकते हैं की अपने जीवन का विस्तार,प्रेम,करुणा,विनाश,निर्माण कहाँ कहाँ रोप रखा है ।

हे ईश्वर वह कैसे कह सकते हैं की दो हृदय में प्रेम लिंग देखकर जाग्रत होगा ।यह तो ईश्वर आप खुद हैं जो अप्राकृतिक हैं ।आपको न किसी ने जना है और न जन सकता है ।आप का न कोई माँ बाप है और न हो सकता है ।आपका न कोई पुत्र पुत्री है और न हो सकती है ।इस दृष्टि से तो ईश्वर आप ही अप्राकृतिक हैं ।

ईश्वर मुस्कुराए और बोले,बेचैन मत हो,यह ज़मीन के कण कण में हमने प्रेम पैबस्त किया है तो साथ ही नफ़रत भी बोई है ।लोग अपने व्यवहार से उसे लेकर मेरे नाम से खुद के खेत सीचेंगे ।जो भी उससे पैदा होगा,वह उनका ही होगा ।तुम देखो उन्होंने अपने ही साथ पैदा हुई औरत की कितनी धज्जियां उड़ाई ।औरत को हर अधिकार देने में इन्होंने ख़ून के आँसू रुलाया ।यही लोगों ने औरत को बराबरी के नाम से मेरे ही नामपर गढ़े विधान यानि धर्म से जंज़ीरों को बाँधा ।तुम पलट कर देखो यही धार्मिक लोग औरत के लिए कहते थे की अगर उसे आज़ादी मिली तो वह बदचलन और आवारा हो जाएगी ।बताओ इनके घर की औरतें आज़ाद हैं तो क्या आवारा हो गईं ।

यह लोग कुछ भी करके,कुदरत,ईश्वर,धर्म का नाम लेकर पहले रोकेंगे मगर यह कुदरत है, जिसे चलते जाना है ।यह सारा कूड़ा मेरे तेज़ बहाओ में बह जाएगा बस तुम हर साँस को आज़ाद साँस देने के लिए लड़ना ।इस भरोसे के साथ की कुदरत तुम्हारे ही साथ है ।इन्हें क्या पता हमने सिर्फ आदमी और औरत ही नही बनाए हैं ।यह कुदरत को समझते तो दिलों में उठती मोहब्बत को कब का पकड़ लेते ।इनके दिल सड़े हुए और दिमाग़ बंधे हुए हैं, खूंटो से बंधे ।जाओ और कुदरत की परते खोलो और देखो यह कितना सतरंगी है..

Wednesday, September 5, 2018

मेरे विरुद्ध लड़ो

कुछ लोग हमसे बेहद नाराज़ थे । मेरा अनुशासन उन्हें गले का फंदा लगता था ।वह मेरे साथ बैठना भी नही चाहते ।उनके खिलाफ मोहल्ले के बड़े क़ाज़ी ने एक फ़ैसला दे दिया,हालाँकि उन नाराज़ लोगों के ख़िलाफ़ मोहल्ले के कुछ लोग भी लामबंद थे और वह मेरे साथ थे ।यह सब आम लोग थे और मैं सियासी ।

मैने अपनी ताक़त का इस्तेमाल करके क़ाज़ी के फैसले को पलट दिया ताकि नाराज़ लोग मेरे साथ आ जाएँ मगर यह क़दम बहुत कारगर नही हुआ क्योंकि उन नाराज़ लोगों की फ़ेहरिस्त में मैं था ही नही,उन्हें हमपर ज़रा भी भरोसा नही था । ऊपर से मेरे साथ वाले भी हमसे उलझ गए ।
उसी रात मैने अपने मोहल्ले के खास चम्मच को कहा कल सुबह तुम मेरे खिलाफ नारे बाज़ी करते हुए मोहल्ले भर में जुलूस निकालना ।वह चम्मच बोला हुज़ूर हमेशा आपका नमक खाया अब आपके खिलाफ हरगिज़ नही ।तब मैंने कहा कल जब तुम मोहल्ले वालों के साथ मिलकर मेरे खिलाफ नारे लगाओगे तो वह नाराज़ बिरादरी मुझमे मसीहा देखने लगेगी और मेरे साथ हो लेगी ।

चम्मच बोला मगर हुज़ूर जो मोहल्ले के लोग आपके खिलाफ हो जाएँगे,तब मैं मुस्कुराया और बोला अबे मोहल्ले भर को मालूम है की भला मैंने कभी क़ाज़ी की सुनी है ।जब मैं उसके फैसले को उलट सकता हूँ,तो उसे अपनी ऊँगली पर भी नचा सकता हूँ ।सबको पता है क़ाज़ी का फैसला भले ही पलट दिया है मगर मैं अपनी बिरादरी को इस फैसले की चपेट में आने ही नही दूँगा ।पूरा मोहल्ला मुझपर इसीलिए तो भरोसा करता है ।और हाँ यह चाहे जितना उछले कूदें ,बिरादरी की रक्षा के नामपर यह लाइन सीधी करते हुए मेरे ही पास आएँगे,जाओ और
मेरे खिलाफ लड़कर मेरे जीतने का मार्ग प्रशस्त करो...

Tuesday, September 4, 2018

टीचर्स डे

हज़रत निजामुद्दीन जैसे उस्ताद और अमीर खुसरु जैसे शागिर्द को सही मायने में टीचर्स डे की मुबारकबाद।इतना तो नही मगर ज़िन्दगी में जिसने भी ज़रा कुछ सिखाया है, तराशा है, बनाया या बिगाड़ा है, ऐसे सभी शिक्षक को मुबारकबाद।उन बच्चों को भी खूब मुबारकबाद जिन्होंने शिक्षक को शिक्षक नही समझा और मौका बेमौका जमकर धुनाई कर डाली,उन्हें पीटा,ऊपर से पटका, उनकी कुर्सी पर बबूल के काँटे बिछाए,यही नही कभी कभी रेलवे लाइन पर भी बांध आए।यह सब झेलने के बावजूद बच गए उन सभी शिक्षको को शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई।

उन शिक्षको को भी बधाई जिन्होंने एक पान की एवज़ में पेपर लीक करवाया।जिन्होंने पढ़ाने के सिवा सबकुछ किया।जिन्होंने किताबों की जगह जाति और धर्म के इंजेक्शन लगाए।इनके योगदान से ही तो आज हर तरफ यह रँग बिखरे पड़े हैं।इन सबके बीच उन शिक्षको को भी बधाई जिन्होंने अपनी जेब से बच्चों की फ़ीस जमा की,जिन्होंने अपने घर का राशन काटकर बच्चों की किताबें मंगाई, जिनहोने शाम को बिना फ़ीस अलग से बच्चों को पढ़ाया।जिन्होंने ताउम्र चमक से दूर बच्चों को बेहतरीन इंसान बनाया।जिन्होंने धर्म जाति लिंग के फ़र्क को मिटाया,दिलों में प्रेम भरा ।

वाट्सएप यूनिवर्सिटी के शिक्षको को भी बधाई बस ईश्वर से प्रार्थना की इनकी बातों का असर हर पल कम होता जाए ।उन शिक्षको को भी बधाई जो आदिवासी,झुग्गी झोपड़ी,राहत कैम्प,शरणार्थी कैम्प, पिछड़े हिस्सों में शिक्षा के दिए जला रहें हैं ।फेसबुक के उन शिक्षको को भी बधाई जो हर नए लिखने वाले से जलकर भुन जाते हैं और यहीं के उन शिक्षकों को भी बधाई जो नए को थामकर दूर आसमान तक उड़ा ले जाते हैं ।गाली सिखाने वाले गुरुजनो को बधाई तो गाली सहकर मुस्कुराते हुए निकल जाने का हुनर सिखाने वाले गुरुओं को भी बधाई ।

दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्ण जी के जन्मदिन से शुरू हुए शिक्षक दिवस की मुबारकबाद,नैतिक अनैतिक जो है, सबमें शिक्षक का ही योगदान है।इसलिए आप महत्वपूर्ण है।इसलिए आपको पलकों पर बैठाना ही चाहिए।मेरी ज़िन्दगी की हर कशीदाकारी में शिक्षक ही तो हैं।अच्छा हूँ तो,बुरा हूँ तो सबमें शिक्षक ही हैं।इसलिए ज़िन्दगी के किसी भी मोड़पर आने वाले,ज़िन्दगी को नए रास्ते देने वाले आप सब शिक्षको को खूब मुबारकबाद।