Monday, June 29, 2020

पुलिस और शासन

जो शासक शासन में पुलिस पर अधिक निर्भर होगा,उसमे शासकीय गुणों का अभाव होगा ।

पुलिस पर जितना कम निर्भर होगा और दूसरे विभागों पर अधिक पकड़ होगी,वह शासक ही शासकीय गुणों का धनी होगा ।

कुछ मामलों को अगर छोड़ दें तो अधिकतर पुलिस अच्छी या बुरी नही होती है, बल्कि उसको नियंत्रित करने वाला शासक अच्छा या बुरा होता है  ।
कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो कमज़ोर हुक़ूमत हमेशा पुलिस पर निर्भर होगी, मज़बूत हुक़ूमत हमेशा अपने दूसरे शासकीय हाथों पर निर्भर होगी । 

पुलिस शासक के शासन को सुचारू चलाने का अंतिम विकल्प होती है, यदि यह पहला विकल्प बनने लगे,तो शासक अयोग्य है । बड़ी आसानी से अयोग्य शासक उसके फैसलों से पहचाना जा सकता है, यदि फैसला लागू करने में पुलिस की ज़रूरत पड़ रही तो वह कमज़ोर शासक है और यदि बिना पुलिस के उसके फैसले लागू हो रहे,तो वह कुशल शासक है ।

शासन डराकर नही बल्कि बहलाकर किया जाता है, लाड और लाठी में हमेशा लाड बेहतर विकल्प है, लाड-प्यार से मसले हल हो जाते हैं, शासन में लाठी आवश्यक है मगर सबसे अंत में जब कोई विकल्प न रह जाए,इसे पहला ही विकल्प नही बनाना चाहिए,इसीलिए हम सड़क पर बिछी पुलिस देखकर जान लेते हैं कि हमारा हुक्मरान कमज़ोर है या मज़बूत । चौराहों पर अधिक पुलिस तो कमज़ोर हुक़ूमत,कम पुलिस तो मज़बूत हुक़ूमत बशर्ते अपराध न हो क्योंकि बिना पुलिस के भी अपराध रोका जा सकता है, यही कुशल शासन है ।

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Thursday, June 25, 2020

आपातकाल

वह पीढ़ी कितनी खुशकिस्मत थी जिसने कम से कम सीना ठोककर आपातकाल लगाने वाली लीडर भी देखा और उनसे टूटकर लड़े भी । 
यह तो हम अभागी पीढ़ी हैं, जिन्हें आपातकाल लगाए बिना आपातकाल से कठिन समय से गुज़रना पड़ रहा है ।

यह चालाकी उस समय के लीडर में नही थी कि बिना आपातकाल की घोषणा किये भी तमाम साँसे क़ैद की जा सकती हैं । वह नही जानते थे,जो मीडिया आपातकाल की घोषणा से उनके सामने लेट जाती थी,वह बिना आपातकाल लगाए भी लिटाई जा सकती थी ।

इमरजेंसी लगाने वाले सूत्रधार  के असली वंशज वहीं मौजूद हैं, जहाँ बिना इमरजेंसी लगाए,अपने मुख़ालिफ़ हर आवाज़ को दबा दिया जा रहा है । इमरजेंसी हमारे लिए एक सबक़ थी कि अगर हमने ज़रा सी लापरवाही की तो कोई भी खुद को मिली ताक़त का दुरुपयोग कर बैठेगा ।

इंदिरा गाँधी साहसी थीं, गलती किया तो सबके सामने किया । गलती की सज़ा भुगती और फिर उसी जनता में वापिस भरोसा जीता,जिस जनता से वह हारी थीं ।

जिन्होंने इमरजेंसी झेला था,वह अपने सीने पर हाथ धर कर कहें कि जो आजके हालात हैं, यह ज़्यादा बुरे हैं या वह ज़्यादा बुरे थे । हमे इमरजेंसी पर ज्ञान देने की आवश्यकता नही है क्योंकि 1857 से आजतक हर बुरी और गुलामी भरी बात के ख़िलाफ़ हमारे आँगन से आवाज़ उठी है । अगर इंदिरा और मेनका गाँधी के पति संजय गाँधी की ज़्यादती के खिलाफ बोला है, तो आज भी बोलेंगे । घोषित इमरजेंसी से हमेशा बुरी और पीड़ादायक अघोषित इमरजेंसी होती है । 

हिम्मती लीडर सामने से आते हैं । जनता की आंख में आंख डालकर बात करते हैं । अगर मन में अपने मुख़ालिफ़ आवाज़ को दबाने का भाव आए भी तो खुली इमरजेंसी लगाते हैं । जिनमे हिम्मत नही होती है, वह पर्दे के पीछे छिपकर इमरजेंसी जैसे हालात थोप देते हैं ।

आज लड़ाई ज़्यादा मुश्किल है । आज ख़ुद को खड़ा रखना ज़्यादा मुश्किल है । बकौल एक बड़े संगठनकर्ता के इमरजेंसी में मीडिया से बैठने को कहा गया,वह लेट गया । हम आज कहते हैं, मीडिया से लेटने को कहा गया,वह सामने से सिपाही बनकर खड़ा गया ,यह मीडिया उनपर सवाल ठोकता है, जिनके सवाल उसे उठाने थे ।

इमरजेंसी का अगर दुःख वास्तविक है, तो लालू यादव,मुलायम सिंह जैसे लीडर्स की इज़्ज़त करना सीखें,जिन्होंने मुकाबला किया । इनको हटाकर इमरजेंसी का दुःख जताना बेईमानी और मक्कारी है ।

इमरजेंसी को याद करिए मगर यह जानकर की वह इतने बुरे दिन नही थे । इंदिरा और मेनका के पति संजय को कोसिए मगर यह जानकर की आज इंदिरा के दो बेटों में से जो एक इमरजेंसी का जनक था,उसकी नस्ल सत्ता में है और जिस बेटे का इमरजेंसी से कोई ताल्लुक नही था,उसकी नस्ल विपक्ष में है, यहीं से आपको अपना रास्ता तय करना है, वर्तमान देखिये,भविष्य सुधारिये,बस...
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Tuesday, June 16, 2020

एकदा

प्रख्यात साहित्यकार प्रेमचंद उन दिनों साहित्यिक पत्रिका हँस निकाला करते थे । प्रेमचंद के ही दौर में एक लेखक उभरे भुवनेश्वर । जिनका एकांकी लेखन में बड़ा स्थान रहा है । भुवनेश्वर के साहित्यिक सफर में प्रेमचंद का अद्भुत योगदान रहा है, उनकी पत्रिका हँस में भुवनेश्वर को तब महत्वपूर्ण जगह दी जब यह लेखक अपने व्यवहार से हर एक से अलग थलग था ।

एक दिन प्रेमचंद के एक सहयोगी ने उनसे पूछा कि आप उस व्यक्ति की मदद कैसे कर सकते हैं, जो नित नित नए बहाने बनाकर सबको तो ठगता ही है, वरन आपको भी ठग ही रहा है । वह व्यक्ति जो हर एक को झूठे झांसे में फँसाता है, उससे आपको इतना स्नेह कैसे हो सकता है । प्रेमचंद उत्तर देते हुए कहते हैं, निःसन्देह उसने हमें ही नही हर एक को ठगा है, झूठ बोला है और प्रपंच किया है । मगर उसका लेखन अद्भुत है, उसके बुरे व्यवहार के कारण उसकी अद्भुत प्रतिभा को नकारा नही जा सकता है । पाठक तक उसके लेखन को पहुँचना चाहिए भले ही हमे उसका व्यवहार कितना ही झेलना पड़े । हम पाठक को अच्छी रचना से वंचित रखने का पाप नही कर सकते हैं ।उनके साथी निरुत्तर हो गए । 
यही हमारे लिए भी प्रेमचंद का संदेश है कि किसी की खूबियों को फैलाने का मौका नही छोड़ना चाहिए,भले ही उसका व्यवहार कैसा हो ।

 खूबियों पर समाज का अधिकार है और व्यवहार पर हमारा कर्तव्य है कि उसका सामना करें । लेखन और व्यवहार को समान मानने की न गलती करनी चाहिए और न ही भरम पालना चाहिए । इनमे जो भी बेहतर हो उसको ऊंचा स्थान देना चाहिए,इसलिए प्रेमचंद ने कभी भी भुवनेश्वर के लेखन को नज़रंदाज़ नही किया,बल्कि उनकी जो बातें ठीक नही थीं,उसे नज़रंदाज़ किया ।
(आजके नवभारतटाइम्स में एकदा)
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Sunday, June 14, 2020

सुशांत आत्महत्या

यार मरने वाला मर गया । आत्महत्या,डिप्रेशन,व्यवहार,माहौल,दोस्त,बीमारी,समाज को गाली देना,दोस्तों को कठघरे में खड़ा करना,यार यह सब बन्द करो । हममें से कोई भी किसी को नही बचा सकता,सिवाए उसके,जो ख़ुद को बचाना चाहता है । 

जिन्हें लगता है, कोई बात तो उनसे करता,दिलों के हाल जानता,तो सुन लें,आपको चल कर हम हर तरह के लोग दिखाएँगे, कोई है जो बात ही नही करना चाहता तो कोई है, अपने ज़िक्र से ही नाराज़ हो जाता है । अपना अपना मिजाज़ है, आप हमसे लिख कर ले लें मृतक अगर ज़िन्दा भी होता तो अपनी परेशानी नही बतलाता । नही अच्छा लगता है दूसरों के आगे अपनी ज़िंदगी की परतें खोलते,आप बकिये खुद को क़रीबी, नही मानता होगा किसी को करीबी की कुछ कह पाए । होंगे बहुत से क़रीबी मगर नही कहा,न कहता, क्या हुआ,काहे आप सब साइकैट्रिस्ट बनने पर तुले हैं ।

अफसोस कीजिये मगर कम से कम समाज को,रिश्तों को या उन किसी को मत कठघरे में खड़े करिए,जिनको आपको लगता है कि वह रोक सकते थे,कोई नही रोक सकता,सिवाए उसके खुद के ।

हमारे बीच से रोज़ ही कोई न कोई खत्म हो रहा है, हम किसे रोक पा रहे हैं । रोक पाते तो अपने घरों में बुझती साँसों को पहले ही रोक लिया होता । बन्द कमरों की मौत क्या कोई भी मौत हम नही रोक सकते हैं,बुझ चुके दिल को हम जला नही सकते हैं, तो क्या कोसें समाज को ।

जो ज़िन्दा हैं, उनकी ही क्या हम इज़्ज़त करते हैं । अपने माँ बाप भाई बहन और रिश्तेदारों नातेदारों को बर्दाश्त नही करते हैं और चले हैं दूसरों काअकेलापन दूर करने,दूसरे को बात करके आत्महत्या से रोकने,भाई जिन्हें भी तक़लीफ़ है, जो वाक़ई चाहते हैं कि आत्महत्या रुके,वह सिर्फ ख़ुद के घर,रिश्तेदार,गली को सम्भाल लें काफी है ।

और एक बात,दिल हल्का वलका नही होता है, असल मे लोग आपके दिलों के राज़ जानना चाहते हैं । राज़ उनपर खोल दो,बस यही जुगत तो लगी है । सैकड़ो को देखा है जो सबके राज़ सुनते हैं और अलग अलग बताते रहते हैं कि देखा,वह जब परेशान था तो मेरे पास आता था । यही तमाशे से इंसान को मौत बेहतर लगती है । जिसे जीना होगा,उसका दिल जीने का कोई न कोई बहाना बना ही लेगा । 

हमेशा यही तो कहा है कि ज़िन्दा रहने का संघर्ष ही ज़िन्दगी है, संघर्ष ख़त्म, ज़िन्दगी ख़त्म । आत्महत्या के एक्सपर्ट मत बनिये,आपकी हरकतों से आजकल के न्यूज़ एंकर टाइप फील होता है,जल्दी जल्दी सब कुछ बतला देना चाहते हैं आप,बिना रुके,सबको सवालों में लेते हुए । हो सके तो बस इतना करिए कि रोज़ बेहतर दुनिया बनाने का प्रयत्न करिए,जो ज़िन्दा रह गए,उनकी ज़िंदगी आसान बनाइये,मरना हम सबको ही है । जो पहले चला गया,वह खुशनसीब है, जो बादमे जाएगा,उसे अपनी आखरी सांस तक अच्छी खुशहाल दुनिया बनाने में लगना होगा । किसी को कोसिए मत,खुद को मज़बूत कीजिये,लोगों की मदद कीजिये और एक भी ज़िन्दगी अगर संघर्ष करती नज़र आ जाए,तो उसके संघर्ष का साथ दीजिये,हो सकता है वह थोड़ा और जी जाए ।

हर मौत दर्द देती है मगर जब तक ख़ुद की मौत न आ जाए,यह दर्द तो भुगतना ही है । बस प्रेम और सहिष्णुता रखिये,उससे भी रखिये जिसे आप नापसन्द करते हों,यही काम है, कर सकिये तो ठीक,वरना कर ही क्या सकते हैं... कुछ भी नही...
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Friday, June 12, 2020

आनन्द मोहन जुत्शी उर्फ गुलज़ार देहलवी

चोट उँगली में थी और दोष पूरे शरीर को देते रहे । उँगली नीतीश थे और शरीर लालू । कितनी आसानी से लालू को खलनायक बना दिया और खलनायक को नायक बनाकर पूजते रहे । पन्द्रह साल में क्या हासिल किया बिहार ने,मीडिया ने बनाया बीमारू और मीडिया ने ही कहा नीतीश को विकास पुरुष,खैर हमे नीतीश से कोई लेना देना नही क्योंकि इमरतीबुद्धि लोगों से क्या ही उलझें,आज कुछ,कल कुछ,परसो कुछ,न ज़ुबान का ठिकाना और न ही किरदार का कोई ठिकाना । कुर्सी के लिए किसी को भी पाया बना लेने वालों पर बात ही बेईमानी है । 

आते हैं लालू यादव पर,उनके ऊपर चवन्नी छाप भी उठकर भृष्टाचारी का आरोप लगा देते हैं । वह भी चारा चोर कहकर खी खीखी करते हैं जिनमें राजनैतिक अक़्ल एक रत्ती से भी कम है । यह मासूम लोग हैं, इन्हें टीवी में बैठा एंकर बता देता है फलाने चोर हैं, यह चोर चोर बकने लगते हैं, टीवी का एंकर कह देता है कि फलाने महान हैं, विकास पुरुष हैं, यह उसके नाम ले लेकर लहालोट होते हैं । यह कभी भी पलट कर अपने इर्द गिर्द नही देखते हैं ।

लालू के ज़माने में हुए अपराध को देखते वक़्त सूक्ष्मदर्शी इस्तेमाल करते हैं और वर्तमान के अपराध झाँकने में अपनी मटर ऐसी आँखे इस्तेमाल करते हैं ।
अगल बगल के मुख्यमंत्री को भी देखें,उन्होंने अपने राज्यों में बिहार से ज़्यादा काम किया है, जबकि वह आते जाते रहे हैं । यूपी को ही ले लें,नीतीश के समकक्ष मुलायम सिंह यादव,मायावती या राजनाथ सिंह,सबने इनसे बेहतर काम कम वक्त में किया है । अखिलेश यादव के पाँच साल के काम तो नीतीश अगले पचास साल में भी नहीं कर पाएँगे और योगी आदित्यनाथ की तरह नीतीश कभी इतने सख्त प्रशासक भी नही हों पाएँगे की लोग इनकी चर्चा करें । नीतीश एक ढोल थी जो सिर्फ लालू लालू लालू कहकर बज रही थी । लालू को गरियाओ और सत्ता पाओ । लालू को गले लगाओ और सत्ता पाओ । यानी सत्ता सिर्फ एक नाम से मिलती,लालू । 

लालू कभी नैतिकता में नीचे नही गिरे,कभी घिनौनी राजनीति नही की,गलतियाँ उतनी ही कि जितनी हमारे देश के तमाम विख्यात नेता करते रहे और काम भी उतना ही किया ।

क्या समझते हैं कि लालू के वक़्त जज मॉर्निंग वॉक पर नही जाते थे । क्या समझते हैं कि लालू फ़ैसले मैनेज नही कर सकते थे,सब कर सकते थे मगर नही किया गया । आज सलाखों में हैं, तभी न्यायालय पर आपको भरोसा है । हमने बहुत से गुंडों को बहुत ऊंचे पद पर बैठे देखा है, आप भी देख रहे हैं, तब भी आपको लगता है कि लालू गलत थे ।
एक बार लालू के सर लगे इल्ज़ाम को देखिएगा,रुपयों की गिनती कर लीजिएगा और यह भी देखिएगा उतने रुपये में आज सर्वशक्तिमान खरीदार कितने विधायक खरीदकर चुनी हुई सरकार गिराता है ।

वह बेहिया लोग लालू पर सवाल उठाते हैं, जो विधायक खरीदने वाले के सामने सर झुकाया करते हैं । ईमानदार हो तो सर उठाकर उसको भी इतना ही कोसो जो लालू के सर मढ़े भ्रष्टाचार की कीमत में एक या डेढ़ विधायक ही खरीद पाता, जबकि उसने बीसों को खरीदा है, सोचो कितना खर्च किया होगा ।

लालू का जेल मे रहना और लालू को बदनाम करना, दोनों से किसी की चुनावी दुकान चलती है । लालू जेल में हैं, यह भी उनकी ईमानदारी है । मैं राहुल गाँधी से जो थोड़ा नाराज़ हूँ, उसकी वजह लालू प्रसाद यादव हैं । राहुल गाँधी को इस भारत मे अगर आज किसी से राजनीतिक दीक्षा लेनी चाहिए, वह सिर्फ लालू प्रसाद यादव हैं, वह भी बिना अगर मगर लगाए,क्योंकि लालू देश की मिट्टी की नब्ज पहचानते हैं ।

मैं खुद हमेशा ख़ुद को कोसता हूँ कि लालू को मापने में हमने इतना अगर मगर क्यों किया । क्यों लालू को जाँचने में हमने उनकी सुनी जो अपनी जुबान कहीं से उधार लाए थे । लालू प्रसाद यादव का जन्मदिन है, हम इसका प्रायश्चित करते हैं कि हमने उस समय मुँह नही खोला जब खोलना चाहिए था । लालू का सलाखों में जाना हमारा खुद का क़ैद हो जाना था,एक ही तो आवाज़ थी,जो बिना तराज़ू लिए बोलती थी । 
बस ख़ुशी इतनी है कि लालू प्रसाद यादव को हमने कभी खलनायक नही माना । कभी उनकी लीडरशिप में खामी नही देखी और कभी उन्हें कमज़ोर, मजाकिया या फ़िज़ूल नही जाना,हमेशा यह तो माना कि वह अद्वितीय हैं ।

अन्ना के झाँसे के वक़्त लालू ही एक आवाज़ थे जो संसद से सड़क तक बोल रहे थे कि यह आंदोलन सही नही है । लालू उस वक़्त ही नब्ज़ पकड़ चुके थे मगर सरकार मदमस्त थी लालू को ही घेरने में,उनकी आवाज़ अनसुनी की गई । संसद में लालू के वह भाषण आज भी ऐतिहासिक है, जो बता रहा है कि संसद सर्वोच्च है,क्योंकि जनता ने उसे चुना है । लालू एक दौर की राजनीति का पर्याय हैं और अपने विरोधी की ऑक्सीजन हैं, बिना लालू नाम लिए,वह आज भी क्लास मॉनिटर तक का चुनाव नही लड़ सकते...

लालू प्रसाद को जन्मदिन की मुबारकबाद और प्रार्थना की वह अभी मज़बूती से और रहें,क्योंकि देश को उनकी जरूरत हैं । जिन्हें लालू के आरोप,सज़ा या परिवारवाद से दिक्कत है, वह हमें उस पार्टी का नाम बताएँ जिनमें यह अवगुण न हों,कम या ज़्यादा तराज़ू लेकर वह बैठे,हमने यह मान लिया है कि कुछ कमियों के साथ अच्छी चीजें फेंक नही दी जाती हैं । लालू प्रसाद यादव इस माटी का हमको प्रसाद है, हम उनकी इज़्ज़त करते हैं, लालू कुछ भी हों,धोखेबाज़,चालबाज़,मक्कार नही हो सकते और लाशों पर राजनीति नही करते,बस इतना काफी है, उनके प्रति प्रेम के लिए,हाँ हम लालू से प्रेम करने लगे हैं... जन्मदिन मुबारक,प्रभु कृष्ण आपको सफलता और सरलता दोनों दें जैसे देते रहे हैं ।
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Thursday, June 11, 2020

लालू प्रसाद यादव

चोट उँगली में थी और दोष पूरे शरीर को देते रहे । उँगली नीतीश थे और शरीर लालू । कितनी आसानी से लालू को खलनायक बना दिया और खलनायक को नायक बनाकर पूजते रहे । पन्द्रह साल में क्या हासिल किया बिहार ने,मीडिया ने बनाया बीमारू और मीडिया ने ही कहा नीतीश को विकास पुरुष,खैर हमे नीतीश से कोई लेना देना नही क्योंकि इमरतीबुद्धि लोगों से क्या ही उलझें,आज कुछ,कल कुछ,परसो कुछ,न ज़ुबान का ठिकाना और न ही किरदार का कोई ठिकाना । कुर्सी के लिए किसी को भी पाया बना लेने वालों पर बात ही बेईमानी है । 

आते हैं लालू यादव पर,उनके ऊपर चवन्नी छाप भी उठकर भृष्टाचारी का आरोप लगा देते हैं । वह भी चारा चोर कहकर खी खीखी करते हैं जिनमें राजनैतिक अक़्ल एक रत्ती से भी कम है । यह मासूम लोग हैं, इन्हें टीवी में बैठा एंकर बता देता है फलाने चोर हैं, यह चोर चोर बकने लगते हैं, टीवी का एंकर कह देता है कि फलाने महान हैं, विकास पुरुष हैं, यह उसके नाम ले लेकर लहालोट होते हैं । यह कभी भी पलट कर अपने इर्द गिर्द नही देखते हैं ।

लालू के ज़माने में हुए अपराध को देखते वक़्त सूक्ष्मदर्शी इस्तेमाल करते हैं और वर्तमान के अपराध झाँकने में अपनी मटर ऐसी आँखे इस्तेमाल करते हैं ।
अगल बगल के मुख्यमंत्री को भी देखें,उन्होंने अपने राज्यों में बिहार से ज़्यादा काम किया है, जबकि वह आते जाते रहे हैं । यूपी को ही ले लें,नीतीश के समकक्ष मुलायम सिंह यादव,मायावती या राजनाथ सिंह,सबने इनसे बेहतर काम कम वक्त में किया है । अखिलेश यादव के पाँच साल के काम तो नीतीश अगले पचास साल में भी नहीं कर पाएँगे और योगी आदित्यनाथ की तरह नीतीश कभी इतने सख्त प्रशासक भी नही हों पाएँगे की लोग इनकी चर्चा करें । नीतीश एक ढोल थी जो सिर्फ लालू लालू लालू कहकर बज रही थी । लालू को गरियाओ और सत्ता पाओ । लालू को गले लगाओ और सत्ता पाओ । यानी सत्ता सिर्फ एक नाम से मिलती,लालू । 

लालू कभी नैतिकता में नीचे नही गिरे,कभी घिनौनी राजनीति नही की,गलतियाँ उतनी ही कि जितनी हमारे देश के तमाम विख्यात नेता करते रहे और काम भी उतना ही किया ।

क्या समझते हैं कि लालू के वक़्त जज मॉर्निंग वॉक पर नही जाते थे । क्या समझते हैं कि लालू फ़ैसले मैनेज नही कर सकते थे,सब कर सकते थे मगर नही किया गया । आज सलाखों में हैं, तभी न्यायालय पर आपको भरोसा है । हमने बहुत से गुंडों को बहुत ऊंचे पद पर बैठे देखा है, आप भी देख रहे हैं, तब भी आपको लगता है कि लालू गलत थे ।
एक बार लालू के सर लगे इल्ज़ाम को देखिएगा,रुपयों की गिनती कर लीजिएगा और यह भी देखिएगा उतने रुपये में आज सर्वशक्तिमान खरीदार कितने विधायक खरीदकर चुनी हुई सरकार गिराता है ।

वह बेहिया लोग लालू पर सवाल उठाते हैं, जो विधायक खरीदने वाले के सामने सर झुकाया करते हैं । ईमानदार हो तो सर उठाकर उसको भी इतना ही कोसो जो लालू के सर मढ़े भ्रष्टाचार की कीमत में एक या डेढ़ विधायक ही खरीद पाता, जबकि उसने बीसों को खरीदा है, सोचो कितना खर्च किया होगा ।

लालू का जेल मे रहना और लालू को बदनाम करना, दोनों से किसी की चुनावी दुकान चलती है । लालू जेल में हैं, यह भी उनकी ईमानदारी है । मैं राहुल गाँधी से जो थोड़ा नाराज़ हूँ, उसकी वजह लालू प्रसाद यादव हैं । राहुल गाँधी को इस भारत मे अगर आज किसी से राजनीतिक दीक्षा लेनी चाहिए, वह सिर्फ लालू प्रसाद यादव हैं, वह भी बिना अगर मगर लगाए,क्योंकि लालू देश की मिट्टी की नब्ज पहचानते हैं ।

मैं खुद हमेशा ख़ुद को कोसता हूँ कि लालू को मापने में हमने इतना अगर मगर क्यों किया । क्यों लालू को जाँचने में हमने उनकी सुनी जो अपनी जुबान कहीं से उधार लाए थे । लालू प्रसाद यादव का जन्मदिन है, हम इसका प्रायश्चित करते हैं कि हमने उस समय मुँह नही खोला जब खोलना चाहिए था । लालू का सलाखों में जाना हमारा खुद का क़ैद हो जाना था,एक ही तो आवाज़ थी,जो बिना तराज़ू लिए बोलती थी । 
बस ख़ुशी इतनी है कि लालू प्रसाद यादव को हमने कभी खलनायक नही माना । कभी उनकी लीडरशिप में खामी नही देखी और कभी उन्हें कमज़ोर, मजाकिया या फ़िज़ूल नही जाना,हमेशा यह तो माना कि वह अद्वितीय हैं ।

अन्ना के झाँसे के वक़्त लालू ही एक आवाज़ थे जो संसद से सड़क तक बोल रहे थे कि यह आंदोलन सही नही है । लालू उस वक़्त ही नब्ज़ पकड़ चुके थे मगर सरकार मदमस्त थी लालू को ही घेरने में,उनकी आवाज़ अनसुनी की गई । संसद में लालू के वह भाषण आज भी ऐतिहासिक है, जो बता रहा है कि संसद सर्वोच्च है,क्योंकि जनता ने उसे चुना है । लालू एक दौर की राजनीति का पर्याय हैं और अपने विरोधी की ऑक्सीजन हैं, बिना लालू नाम लिए,वह आज भी क्लास मॉनिटर तक का चुनाव नही लड़ सकते...

लालू प्रसाद को जन्मदिन की मुबारकबाद और प्रार्थना की वह अभी मज़बूती से और रहें,क्योंकि देश को उनकी जरूरत हैं । जिन्हें लालू के आरोप,सज़ा या परिवारवाद से दिक्कत है, वह हमें उस पार्टी का नाम बताएँ जिनमें यह अवगुण न हों,कम या ज़्यादा तराज़ू लेकर वह बैठे,हमने यह मान लिया है कि कुछ कमियों के साथ अच्छी चीजें फेंक नही दी जाती हैं । लालू प्रसाद यादव इस माटी का हमको प्रसाद है, हम उनकी इज़्ज़त करते हैं, लालू कुछ भी हों,धोखेबाज़,चालबाज़,मक्कार नही हो सकते और लाशों पर राजनीति नही करते,बस इतना काफी है, उनके प्रति प्रेम के लिए,हाँ हम लालू से प्रेम करने लगे हैं... जन्मदिन मुबारक,प्रभु कृष्ण आपको सफलता और सरलता दोनों दें जैसे देते रहे हैं ।
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Monday, June 8, 2020

बिरसा मुंडा

आप सबने कंकर कंकर जोड़कर जिस मुल्क़ की बुनयाद धरी थी उसमे हम सब बहुत दिन ख़ुशी ख़ुशी जी लिए।जिस आज़ादी के लिए सलाखों में आज आपने आखरी साँस ली थी उसका पूरा मज़ा हम लोगों ने पिछले बहुत से सालों में ले लिया।
अब हमारा दिल भर गया है।अब आप सबकी कुर्बानियाँ पीले पन्नों में दीमक का इंतज़ार कर रही हैं।

हमने नए रास्ते चुन लिए हैं, उन रास्तों में कहीं आप नही हैं।होना भी नही चाहिए वरना आपका दम घुटेगा।खैर हम पागल,बोझिल,पुराने,फ़ालतू के लोगों की तरफ से श्रद्धांजलि।।नए लोग अपने नए हीरो को याद करेंगे । अभी हमारे जिस्म से पुराने ख़ून के क़तरे नही गए हैं, इसलिए याद आ गए।

देश के एक हिस्से के मज़दूर,आदिवासी और किसानों को एक करके आपने सुनहरे भारत के लिए जो क़ुर्बानी दी थी ।उसने इस मुल्क़ को बहुत सालों तक मिलजुलकर चलने की सलाहियत दी ।हम ही गलत थे,अपनी तरक्की के रास्तों में आपको भूलते गए और बढ़ते गए ।आज जब पता नही कहाँ पहुँच चुके हैं, तब हम सब आपस में बहुत बंटे, बिखरे हुए हैं ।हमारे दिलों में मोहब्बत दम तोड़ चुकी है ।अब एहसास होता है बिरसा,की आप सब क्या करके गए थे ।किस शिद्दत से सबके दिल जोड़कर जंज़ीरों से मुकाबला किया था ।इस वक़्त शिद्दत से याद आ रही है।

बचपन देखें,बेहद खूबसूरत स्कूल है,इतना आकर्षक और विशाल की उसकी कल्पनाएँ मन में हिलोरे पैदा कर रही हैं।इंग्लिश ऐसी की वारे जाऊँ।यहीं स्कूल की दहलीज़ से खूबसूरत चमकता हुआ सुनहरा भविष्य दिख रहा है।आने वाला कल जिसमे मेरी टेबल पर ब्रेड एंड बटर के साथ इंग्लिश का रुतबेदार अख़बार होगा।चार नौकर होंगे जो मुँह से निकले लफ़्ज़ को ऐसे लपकेंगे जैसे उनकी किस्मत बदलने वाली हो।यह सब किसे नही अच्छा लगता होगा।यह कल्पनाएं किसे नही ललचाएँगी।मगर जो इन सबको एक झटके में तोड़ दे।

जो सुनहरे स्कूल की शक्ल से मुँह फेर ले।जो बटर एंड ब्रेड से हाथ हटाकर धनुष थाम ले।जो अपनी भूख में दूसरों की भूख की तड़प देखे।जिसका भरा हुआ पेट,अपनों की ख़ाली थाली के तसव्वुर भर से बेचैन कर दे।जिसके गले में बिलखते बच्चों को देखकर निवाले फंसने लगे।जो अपने कमज़ोर,परेशान,बेसहारा,पिछड़े लोगों की सेवा करते करते 24 साल की मामूली उम्र में ही उस पूरे समुदाय का भगवान बन जाए।वही तो है, जिसपर आज लिखा जाएगा।जिसपर कल भी लिखा जाएगा।

सर उठाकर देखिये।रोते बिलखते नेता बहुत मिल जाएँगे।गर्दन घुमाकर कर देखिये डराने वालों की कतार लगी हुई है।एक बार दिल में झाँक कर देखिये,तब दिल कहेगा की दोस्त तुम ख़ाली हो।तुम्हारे पास कोई लीडर नही,जो दिल के ख़ौफ़ को दूर करे।जो तुम्हे डराए नही बल्कि बढ़ाए।जो तुम्हारे लिए संघर्ष करते हुए सलाखों में दम तोड़ दे।दोस्त तुम्हारे पास कोई बिरसा मुंडा नही है।

बिरतानियों के दिल में जो ख़ौफ़ बिरसा मुंडा ने भरा वोह कौन कर सकता है।आदिवासियों को जो हिम्मत दी वोह कौन कर सकता है।अपना सुनहरा कल छोड़ संघर्ष में कुर्बान बिरसा मुंडा की आज पुण्यतिथि है। आज ही जेल में आखरी सांस लेकर हमारी किस्मत के ताले को खोल दिया था । आज उनको याद करके संघर्ष सीखने का दिन है।पूरे समाज को कैसे आगे लाए,कैसे उनकी साँसों की हिफाज़त करें,सीखने का दिन है। थोड़े थोड़े बिरसा हो जाओ दोस्तों,हम सब साथ चलकर कल का बेहतरीन भारत गढ़ेंगे। अपने लोगों से बेपनाह मोहब्बत करो,बिना उनकी कमियों में फंसे,उन्हें चाहो,बिरसा की छाँव बन जाओगे । बिरसा ने अपने लोगों से प्रेम में मृत्यु चुन ली और खुशी खुशी चले गए,पहले मोहब्बत सीखो,रास्ता खुद बखुद निकलेगा । बिरसा को नमन,आज 9 जून है,बिरसा को मत भूलिएगा,वरना खुद को भूल जाइयेगा, खुद को भूलना बर्बादी है.... सलाम बिरसा
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Sunday, June 7, 2020

कोरोना और इंसान

दुनिया में जो भी हो कोरोना का मगर हमारे यहाँ कोरोना के लिए राह बहुत मुश्किल है । यहाँ घड़ी घड़ी पानी,भोजन,भाषा और व्यवहार बदल जाता है, बेचारा कोरोना खुद को जीवित रखने के लिए कितना बदले ।
एक घर पहुँचा तो उनके यहाँ कालीमिर्च के काढ़े में कोरोना का दम घुटने लगा,इससे थोड़ा जीतकर और कालीमिर्च से लड़ने की ताकत लेकर दूसरी गली पहुँचा तो उनके यहाँ काढ़े में हल्दी आ गई । अब पीली आफत से लड़ते हुए कोरोना ने ताक़त बटोरी और चौथे शहर पहुँचा,वहाँ काढ़े में तुलसी मां उसका इंतेज़ार कर रही थीं,देखते ही पीट दिया चप्पलों से,जब तुलसी जी से रक्षा करके बेचारा अगली जगह बढ़ा तो वहाँ जराकुस ने काढ़े में कब्ज़ा जमा लिया था,कोरोना की आँखे बाहर आ गई कि घड़ी घड़ी इनका काढ़ा भी बदल जा रहा है, कैसे लोग हैं यह ।

हर तरफ उछल कूद मचाकर कोरोना उन मुँह में भी पहुँचा, जहाँ न काढ़ा था,न खाना था,न उसे मारने की दवा थी,न उसके फैलते वंश को रोकने की जद्दोजहद थी । कोरोना ने उसकी नाक से झाँक कर देखा कि क्या यह वही देश है, जहां काढ़ा हज़ार तरीके का है, यह मुँह में कुछ ले क्यों नही रहा । पता चला उस घर मे पानी के सिवा कुछ नही,कोरोना ने चप्पल उठाई और भाग खड़ा हुआ कि यहाँ तो वह खुद भूखा मर जाएगा । उसकी संताने भूखी दम तोड़ देंगी,इससे तो भले काढ़े वाले लोग हैं ।

कोरोना ने कहा कि हम पूरी दुनिया घूम आए मगर भाई असल में यहीं है पूरी दुनिया,दुनियाभर की सारी वैरायटी यहीं है । हम इन्हें मार नहीं पाएँगे, क्योंकि जब मारने चलो तो कोई अल्लाह को याद कर लेता है, जब तक अल्लाह से मुखातिब हो कोई देवता आ जाते हैं, उनसे थोड़ी देर बात करो कि कोई ईसा को बुला लाता है, जब ईसा से दोस्ती बैठाओ तो बुद्ध आ धमकते हैं,जब बुद्ध को समझो तब तक उनके जैसे ही महावीर आ जाते हैं, बताओ किससे किससे निपटें । जब इनसे भागो तो कोई दादी माँ हैं इनके यहाँ, खटिया पर लेटे लेटे कोरोना को मारने के नुस्खे पत्तियों मसालों और मन्त्रो में बताकर सो जाती हैं ।

कोरोना ने निराश होकर कहा,हम यहाँ फैल तो रहे हैं मगर विजय नही प्राप्त कर पा रहें । तभी पीछे से एक नेताजी बोले,ओए कोरोना,इन्हें आपस मे बाँट दो,बस फिर एक एक कर सबको मारना, आसानी से मर जाएँगे । कोरोना ने कहा,दोस्त,शुक्रिया,हम वायरस हैं, इंसान नही हैं की रूप,रँग,सोच से बाटें, यह तुम्हारा काम है,हम इनसे ऐसे ही निपटेंगे,भले हम निपट जाएँ....
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