Friday, November 22, 2019

शौकत आज़मी

गर्म हवा और उमराव जान जैसी मशहूर फिल्मों की अदाकारा शौकत आज़मी एक पीढ़ी का चेहरा थीं । थियेटर जिनकी धड़कन था,जिन्होंने इप्टा और प्रोग्रेसिव राइटर एसोशिएशन की खूबसूरती बुनी थी ।

जिनकी थाप से शबाना आज़मी और बाबा आज़मी जैसे टैलेंटेड हीरे निखरे । जिन्होंने कैफ़ी के साथ मुश्किल से मुश्किल वक़्त काटकर बेहतरीन सूरज निकाला । जो सचमे कैफ़ी की नज़्म,"उठ मेरी जान,साथ चलना है तुझे" को जीकर दिखा दिया ।

छोड़ गईं यह दुनिया और साथ ही छोड़ गईं यादों की रहगुज़र । शौक़त आज़मी जिन्होंने साथ कैफ़ी का चुना और अपनी ज़िंदगी अपने हाथ से लिखी । उसके हर उतार चढ़ाव की मालकिन । अपने बच्चों के दिलों में काम के लिए जूझना और जूझकर भी संवेदनाओं को ज़िंदा रखना,दोनो का अद्भुत काढ़ा पिलाया । एक तरफ कैफ़ी का पहाड़ जैसा वजूद तो दूसरी तरफ अपनी समन्दर जैसी आकृति उकेरने वाली एक अनूठी शख्सियत शौकत आज़मी से सीखना होगा,हर उसे,जिसे लगता है कि कपड़ों के कुछ टुकड़ों से शामियाने भी बनाए जा सकते हैं । कम में बहुत बनाना और बहुत में भी कम की अहमियत समझना ।

कुछ ही लोग हैं जिनको ज़िन्दगी भर दिल के सबसे खूबसूरत हिस्से में रख पाया हूँ,उनमें शौकत आज़मी हैं । लखनऊ में बिताए उनके पलों को पढ़ा है, उनके सफर को जिया है । अब वह नही हैं, लग रहा पूरा एक दौर खींचकर हटा दिया गया है । थियेटर औरफिल्मो की दुनिया का एक बड़ा हिस्सा सूना हुआ है । शौकत आज़मी दर्जनों फ़िल्म के ज़रिए तो सामने रहेंगी मगर अब कैफ़ी और मैं की खूबसूरत आवाज़ कैफ़ी से जा मिलेगी । उस कैफ़ी से जिसे उन्होंने खुद चुना था,जो सालों पहले बिछड़ गए ।

शौकत आज़मी बहुत याद आएँगी । कलाकार हमेशा ज़िन्दा रहता है अपने किरदारों में,आप भी हमेशा मिलेंगी,जब जब याद आएगी,याद की रहगुज़र मिला देगी आपसे । जल्द मिलते हैं, यहां बेहतर लोग कम हो रहें,तो जहां बढ़ रहें, वही चलते हैं, आपके पीछे पीछे...
नोट:- फ़ोटो में कैफ़ी, शबाना और शौकत आज़मी हैं । एक दूसरे की ज़िंदगी से इतना गुँथे हुए की बिना सबके किसी एक का ज़िक्र ही अधूरा है । 

Thursday, November 21, 2019

ज़मीर बेचकर अमीर होना

लड़का अपने बाप पर चीख़ रहा । बाप ज़िन्दगी के सत्तर बसन्त बिताकर पलँग पर लेटा लेटा सुन रहा । धूप गुनगुनी है, लड़के की आवाज़ ऊँची होती जा रही कि आपने मेरे लिए किया ही क्या है आजतक । बाप जो पैरालाइसिस का मरीज़ है, पलँग पर अकड़ा पड़ा है, सुन तो रहा मगर कहे तो क्या कहे,लड़का के पांव में अब बाप का जूता छोटा पड़ने लगा है, तो कहने को रह ही क्या जाता ।

लड़के ने घर के 6 कमरे किराए पर उठा दिए हैं । दो मकान बेच चुका है । 16 बीघा जमीन बेच चुका है । मगर चीख़ चीख़ कह रहा कि बाप ने किया ही क्या है । गांव के बुज़ुर्ग बाप की उस मेहनत को जानते हैं, जब गांव में एक झोपड़ी से उसने सफर शुरू किया था । बर्तन के नामपर एक कड़ाही और एक करछुल था । मगर यह बुज़ुर्ग खामोश हैं क्योंकि जानते हैं, फालिज में अकड़ा हुआ बाप तो अब कब्रिस्तान जाएगा, रहना तो लड़के के साथ ही है और कोई क्यों बेढब  नशेड़ी गंजेड़ी झूठे नौजवान के मुँह लगे ।

लड़का घर के तांबे,पीतल,स्टील सबके बर्तन बेच चुका है । अब उसे बूढ़े के नीचे बिछी दरी और मसेहरी बेचनी है । वह दरी खींचता हुआ चीख़ रहा कि मेरे बाप ने मेरे साथ किया ही क्या है, सब उसकी हां में हाँ मिला रहें ।

एक बूढ़ा बोला कि रुक जाओ,इतना सब कुछ बेच चुके हो,क्या यह तुम्हारे बाप ने नही बनाया था । ज़मीन क्या हवा में आई थी । बर्तन क्या प्रसाद में मिले थे । कमरे क्या ज़मीन पर लकीर खींचने से बन गए थे । अबे मूर्ख,यह सब जो बेचा जा रहा है, वही तो बनाया गया था । जब बना ही नही होगा,तो बिकेगा क्या । हमे समझ आ गया तुम्हारे बाप महान थे,तुम ही कामचोर निकम्मे हो ।

बूढ़ा पूरी बात बोल पाता कि लड़ने ने खींचकर पत्थर उसके सर पर मारा,बूढ़ा वहीं लुढ़क गया,गांव वालों ने कहा ठीक किया,तुम्हारे बाप और इस बूढ़े ने किया ही क्या है और लड़का हंसते हुए पड़ोस की झोपड़ी और दो बीघा ज़मीन का सौदा भी कर आया ।जो साथ खड़े हैं, न समझ हैं, वह भी बिकेंगे,पूरा गांव बिकेगा,क्योंकि बेचने की लत, ज़मीर बेचकर अमीर होने से शुरू होती है और अनवरत चलती रहती है ।

Monday, November 18, 2019

हिटलर

घुप धुएँ में एक काया उभरी,धुएँ में कुछ समझ न आया । धुँधलके में स्पष्ट कुछ दिखाई नही दिया,फिर भी कुछ लोगों ने कहा वह काया नही, हिटलर हैं ।

बहुत से लोग अनसुना करके धुएँ में क़रीब गए । वह लोगों की पहली अवधारणा के खिलाफ थे । धुएँ को चीरकर बतलाना चाहते थे कि वह हिटलर नही है, क्योंकि उसके पास से उन्हें दाता की गंध आ रही है । वह चले फिर भी गहरा ही धुआँ था,आधी दूरी तय करने पर इन लोगों में से कुछ ने हड़बड़ाकर कहा हां हां यह हिटलर ही है । वह सही कह रहे थे,यह हिटलर ही है ।

कुछ लोगों ने इनकी भी आँखों पर शक किया और घने अंधेरे में आगे बढ़ना तय किया । वह नही चाहते थे कि किसी शक और शुबहे की आड़ में वह बेहतरीन,मज़बूत और जोशीले तने खड़े उस इंसान से किनारा कर लें,जो उन्हें मुश्किल से निकालेगा, क्योंकि उसके तन से उठी जोशीली गन्ध उन्हें घुप अंधेरे में खींचे चली जा रही थी । जब काया बिल्कुल क़रीब आ गई,धुआँ बीच से छँट गया, सब स्पष्ट दिखने लगा,तो लोग बोले हां यह हिटलर ही है, हमे पहले ही मान लेना था,वह हिटलर ही था । गन्ध दुर्गंध की धोखा था,हमे मान लेना चाहिए था साथियों यह हिटलर ही था । 

दो चार ने अपनी आँखों पर भी विश्वास नही किया,दूसरों की आँखों पर भी विश्वास नही किया और कहा हम छूकर देखेंगे । कुछ कुछ प्रतीत भले हो मगर यह हिटलर नही हो सकता । हम महसूस करके देखेंगे, वह बिल्कुल नज़दीक़ गए । काया के कॉलर पर टके सितारों को छूने को हाथ बढ़ाया । काया ने उनके गले पकड़कर हवा में लटका दिया । काया का सीना इन लोगों को हवा में  टांगते फूलकर चौड़ा होता चला गया । वह लोग,जिनकी आँखे बड़ी होकर बाहर उभर आई थीं,ज़बान बाहर निकल कर लटकने लगी ,सांस लेने की आखरी कोशिश की और तड़पते हुए बोलना चाहे मगर नही बोल सके,क्योंकि काया ने उन्हें हिटलर कहने भर का भी वक़्त नही दिया....

Friday, November 15, 2019

गाँव ऐसा ही है

आप चमचमाती गाड़ी लीजिये,भले ही उसमें किसी को मत बैठाइए, गाँव वाले आपकी तारीफ के पुल बांधेंगे । अब बड़ा हवेली नुमा घर बना लीजिए,भले ही उसमें किसी को घुसने मत दीजिये,आपके रिश्तेदार  आपके किस्से सुनाएंगे अपने बच्चों को । आपकी चमक,आपकी दौलत,आपकी शोहरत गांव वालों और रिश्तेदारों और नज़दीकियों को आकर्षित करती है । आप उनसे सीधे मुँह बात मत कीजिये मगर वह आपके टेढ़े मुँह की तारीफ़ की झड़ियाँ लगा देंगे ।

वहीं आपका घर कच्चा हो,गाड़ी के नाम पर बस कोई गाड़ी हो,खाने भर की दौलत हो,फिर भी आप दिन रात अपने गाँव वालों,रिश्तेदारों,नज़दीकियों की मदद करते रहें । आपकी कोई कदर नही होगी । कहिये तो देर सवेर दुत्कार दिए जाएं । आपकी सेवाओं के किस्से अपने बच्चों को सुनाकर उन्हें कोई बिगाड़ेगा नही । कोई परिवार नही चाहेगा उनका बच्चा आपसा बनें ।

गणितज्ञ वशिष्ट नारायण जी हों या कैफ़ी आज़मी,किसका गांव वालों ने स्वागत किया है । यह अगर बाहर रहते,चमकते रहते,तो इनके किस्से इनके गांव में घर घर कहे जा रहे होते मगर नही,यह गांव लौट आए माटी के प्यार में और माटी हो गए ।

मुझे न समाज से शिकायत है और न ही कोई उम्मीद है । अपना काम करते जाओ और करते करते मर जाओ । यही हम सबकी किस्मत है । कोई नही याद करता सेवा करने वालों को,कोई नही चाहता उनका बच्चा चमकती ज़िन्दगी छोड़कर दूसरे का मददगार बने । हमे भगवान राम चाहियें मगर मन्दिर में या तो पड़ोस में,अपने घर मे नही,जो सौतली मां के वचन की भी लाज रखे ।

हम एक समाज के रूप में बस समाज हैं । अच्छे बुरे को क्या ही कहें । जो समाज नेहरू के पहाड़ जैसे कामों को झुठला दे,उस समाज मे बस एक ही सूत्र है, काम करो,काम करते हुए मर जाए,पहाड़ से रेत बनकर किसी के पैरों के नीचे दबकर खत्म हो जाओ,बस । पलकों पर बैठाने की बारी आएगी तो एक से एक हल्के लोग भी इनकी पलकों पर बैठकर महान हो जाएँगे । वशिष्ट नारायण जी हो या जब्बार भाई,तिश्ना आलमी हों या प्रोफेसर जीडी अग्रवाल,सबको यूहीं मर जाना है, हमे और आपको भी....

Tuesday, November 12, 2019

jnu jnu

होना तो यह चाहिए था कि jnu जैसी व्यवस्था सब यूनिवर्सिटी की होती मगर हो यह रहा कि सब यूनिवर्सिटी की तरह jnu को भी तबाह किया जा रहा है । बाकी जगह लोग jnu से जूझने की ट्रेनिंग लेते हैं, तो क्यों न इसको ही बर्बाद कर दिया जाए,जो विरोध को स्वर देता है 

फ़ीस बढ़ा दी,दूसरी कटौती कर दी गई,क्यों,क्योंकि वह चुभती हैं । आंखों में चुभती है । मन मे चुभती है । jnu तो हर तानाशाही हृदय में एक फाँस की तरह चुभती है । हर पढ़े लिखे जाहिल को चुभती है । हर मन के छोटे और गन्दे दिल को चुभती है । jnu को ढहा देने को हर वह दिल छलांग मारता है, जिसे इंसान को मार डालने में ज़रा भी तक़लीफ़ नही होती है ।

इस मौके पर जब jnu को बर्बाद करने की कोशिशें हो रही हैं । हम jnu के साथ हैं । जो निर्लज्ज निकम्मे फीस बढ़ाने का समर्थन कर रहें हैं, वह सब्ज़ी के मोलतोल में उम्र काटते और ऊपर से मुफ्त धनिया लेने वाले अपने पूर्वजों को देख लें,तब बात करें ।
देश का सभ्य और समझदार नागरिक तो माँग यह करता कि jnu जैसी फीस,जैसी शिक्षा,जैसी सुविधाएँ देश की दूसरी यूनिवर्सिटी में भी मिले । अक्लमंद गले के फंदे खोलना सीखते हैं और मुर्ख उसे खोलने के चक्कर मे फंदा कसते चले जाते हैं । इस वक़्त jnu पर सरकार का समर्थन वही मूर्ख की तरह हरकत है, जो फंदा खोलते खोलते उसी में कसकर मर जाएगा ।

अभी वक़्त है, jnu के साथ खड़ें हों,ताकि आपके साथ खड़े रहने वाले ज़िन्दा रह सकें । मेरा समर्थन jnu के साथ है, मेरा पूरा विरोध निर्लज्जता से  बढ़ाई गई फीस को लेकर है...

Sunday, November 10, 2019

मौलाना आज़ाद

अगर आपको सिर्फ मुसलमान होने के लिए याद किया जाए तो यह आपकी तौहीन है।अगर आपको मुसलमान सिर्फ अपना समझकर याद करें तो यह आपपर ज़ुल्म है।आपकी सोच इतनी गहरी थी की उसमे सब समा जाएँ।आपका इल्म इतना गहरा था जिसके सामने जाहिलियत खुद बखुद दम तोड़ दे।आज जिस इल्म की इमारत पर हम इतराते नही फिरते उसकी नीव आपने रखी।

आज ही 11 नवम्बर को जब ज़मीन पर आपके कदम पड़े तो किसने सोचा था की यह इंसान नही बल्कि अनमोल मोतियों को गूँथने वाला धागा है।जिसकी ज़िन्दगी लोगो को जोड़ने में खर्च होगी।किसने सोचा था जो बेटा अपनी माँ को 11 साल की उम्र में ही खो देगा,वह मदरसों के चबूतरों पर बैठ कर एक दिन दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत में इल्म का झण्डा बुलन्द करेगा।किसने सोचा था मदरसों की काई से लिपटी दीवारों में वोह अरबी,फ़ारसी,इंग्लिश,हिंदी,उर्दू का नायाब शरबत बनेगा।भला किसने ख्वाब में भी यह सोचा होगा की बहारों से महरूम कोई लड़का पत्रकारिता,लेखन,एक्टिविज्म,पॉलिटिक्स,समाज सेवा,लीडरशिप में सबसे ऊँचा परचम थामेगा।

कौन देख रहा था की मुल्क़ में सबसे पहले काँग्रेस का, सबसे कम उम्र का प्रेसिडेंट यह ही चुना जाएगा।किसी ने सोचा भी नही था की बंटवारे में अपनी ज़मीन को रोते हुए छोड़ते लोगो को किसी के लफ़्ज़ ऐसे बाँध लेंगे, की जो जहाँ रहा वही रुक गया।
वह मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे ,जिनकी आज पैदाइश है।यह भारत जैसा महान देश है जिसने उन्हें अपना पहला शिक्षा मंत्री चुना।यह मौलाना आज़ाद की महानता थी की उन्होंने इस माटी में ही अपनी हर साँसों को जिया निखारा और खूबसूरती से रुखसत हो गए 

आज़ादी की लड़ाई का बहुत मज़बूत स्तम्भ मौलाना आज़ाद ही तो जो नेहरू के कंधे पर हाथ रखकर कह सके कि चलो अब बिना थके,बिना रुके,बिना देरी के देश की हर ज़रूरत को पूरा करते हुए निर्माण में लगा जाए । गाँधी के ख्वाबों के संस्थान खड़े किए जाएं,शिक्षा का सर्वोच्च छुआ जाए ।

 आज जब लोग अपने छोटे छोटे घर बनाते हैं, उसपर फौरन अपने नाम अपने पूर्वजों के नाम के पत्थर टांक देते हैं कि दुनिया देखे उन्होंने कितना खूबसूरत घर बनाया है, वही लोग आज़ादी की लड़ाई और देश बनाने वाले नामों को सुनकर कान आंख बंद करके चुपके से सरक जाने का हुनर रखते हैं । यह सच्चाई रहती दुनिया तक नही बदलेगी की भारत की आज़ादी में किसने किसने अपना सब कुछ लुटा दिया,मिटा दिया । मौलाना आज़ाद तो वह शख्स थे,जो जेल में रहकर अपनी पत्नी की मौत की खबर सुनकर भी अंग्रेज़ों से यह गुज़ारिश भी नही करने गए कि आखरी बार उन्हें बीवी को देखना है । सब कहते रहे मगर उसूल का पाबंद यह शख्स अड़ गया कि नही,हरगिज़ नही,अपने निजी कार्यों के लिए हम अंग्रेज़ों से कोई छूट नही लेंगे और जेल की सलाखों के पीछे ही वह दर्दनाक वक़्त अकेले काटा । मौलाना आज़ाद आप हमारे मुल्क को बनाने वाले हाथों में से थे,आपके हाथ पकड़ कर अब बस रोने को दिल चाहता है,खूब रोने को,इकलौते आप हैं जिनका हाथ पकड़कर आज अपनी बेबसी और अकेलेपन को जकड़कर बहुत रोने का दिल करता है......


Saturday, November 9, 2019

हज़रत मोहम्मद

जब लड़कियो को ज़िंदा ज़मीन में गाड़ दिया जाता था।जब औरतों को हर हुक़ूक़ से महरूम रखा जाता था।इल्म से मायूस थी वह ज़मीन। जिहालत का ही बोलबाला था। इंसानी रिश्ते रोज़ टूट और बिखर रहे थे।आपसी नफरत आसमान छू रही थी। इंसान इंसान को ही गुलाम बना रहा था। उन गुलामों को मेले में खरीदकर,उनकी जिंदगियां दूसरे की चौखट पर बांध दी जाती थीं । जहाँ मौत तक उन्हें जानवरों की तरह अपने जैसे इंसानों की खिदमत करना था । बेइंसाफी और बेईमानी तख्तों पर बैठ मज़लूमो पर हँस रही थी।तब वह रौशनी बन कर आए

उन्होंने इंसान को इंसान बनाया। लड़कियो की ज़िन्दगी की बात की,उन्हें बराबरी पर लाने की पुरज़ोर कोशिश की और उनकी इज़्ज़त व अज़मत की वकालत की। गुलाम को मालिक के साथ  बराबर में खड़ा कर दिया। बेइंसाफी और बेईमानी का गला घोटा।भाई को भाई की मोहब्बत दी।इंसानियत को आसमान तक बुलंदी पर लेकर गए। हर एक से लरज़कर, झुककर,उसकी इज़्ज़त करके सही बात पर कायल करते हुए अपना कारवाँ बनाया ।वह थे हज़रत मोहम्मद।

वही रसूल जो हातिम ताई के खानदान की बेटियो को देख तख्त से खड़े हो जाते थे। जिन्होंने अपनी खुद की बेटी की हमेशा इज़्ज़त की और पहली बार बेटियो को बाप की जायदाद में एक बड़ा हिस्सा फ़र्ज़ किया। यह वही हज़रत मोहम्मद हैं जिनपर कूड़ा फेंका जाता था।रास्ते में काँटे बिछा दिए जाते थे फिर भी बिना उफ़्फ़ किये हर फर्द को गले लगाया। कूड़ा फेंकने वाली की इज़्ज़त की और अपना बना लिया । कांटे डालने वालों की ज़िंदगी के कांटे चुनने लगे और फिर एक दिन उनके भी दिल हज़रत मोहम्मद के सामने नरम पड़ गए । जिसने दुनिया को जिहालत से निकाला उन हज़रत मोहम्मद को याद कर लें। हज़ारों साल पहले जिन्होंने पानी की फिक्र करते हुए कहा कि झरने के किनारे बैठे हो,तब भी पानी बर्बाद मत करना,बताइए कौन था जो उस वक़्त पानी की फिक्र कर रहा था । अफसोस होता है की दुनिया के नाम पेश करके उदाहरण देने वालों ने भी हज़रत मोहम्मद को नही पढ़ा। न उनपर बात ही कि,न उन्हें जाना ही ।

समाजवाद और तमाम विचार बहुत बाद में आए,हज़रत मोहम्मद ने उस वक़्त कह दिया कि अमीर गरीब के बीच कमाई का अंतर बहुत नही होना चाहिए,काम कोई भी कोई करे मगर हैं सब भाई, बराबर,किसी का किसी पर ज़ोर नही । व्यापार में एक चुटकी भर लाभ लो,यह नही की अनजान को बेवक़ूफ़ बनाकर लूट लो । घर मे इकट्ठा न करो चीज़ें, अनाज वगैरह,पड़ोस में कोई भूखा सोया,तो तुम्हारे पेट का अनाज हराम है । अनाथ बच्चों के सामने अपने बच्चों को इतना लाड न करो कि उन्हें अपने माँ बाप याद आए । फल के छिलके बाहर मत फेको की किसी को कसक हो कि यह खरीद नही सका । बताइए उस दौर में इससे बढ़कर मानवता की कौन सी लकीर थीं ।उन्हें आप इस्लाम,पैगम्बर से अलग हट कर तो पढ़ ही सकते हैं।देखिये उनमे और इन मुसलमानो में कितना फ़र्क है।हज़रत मोहम्मद को पढ़ना और ज़िन्दगी में उतारना एक बड़ा कदम है।जो कमज़ोर अक़्ल वालों के लिए मुमकिन नही है।

दोस्ती,रिश्ते,गरीब,हक़,फ़र्ज़,पानी,पहाड़,ज़मीन,बड़े,बच्चे,बूढ़े,औरत,कमज़ोर,लाज़ार,खानपान,इल्म,मेहनत,मज़दूर सब पर  बारीक़ से बारीक़ निगाह रखने वाले हज़रत मोहम्मद की ज़िन्दगी को पढ़ लीजिये।देख लीजिये।परख लीजिये।जैसे हर आदर्श को अपनाते हैं वैसे ही हज़रत मोहम्मद को भी देखिये और अपनाइये ।

 उनकी ज़िन्दगी में गुँथी फिलॉसफी को समझिये क्योंकि एक बार यह डोर पकड़ ली तो काफ़ी कुछ हाथ आ जाएगा ।जो पैग़म्बर मानकर हज़रत मोहम्मद को बस रट रहें हैं उनसे इतर,उनकी ज़िन्दगी की बारीक़ी में झाँकिये आपको वह सूत्र मिलेगा जो शिखर पर ले जा सकेगा...

Thursday, November 7, 2019

मैं कौन हूँ

हफ़ीज़ क़िदवई कौन हैं?

उत्तर -बर्फ़ का खंजर हैं ,नही नही सूफ़ी सन्त हैं,अरे नही 
दोहरे चरित्र की ओढ़न हैं । शायद यह भी नही,वह
सच्चे सीधे सरल इंसान हैं ।
कोई कहता मक्कार और चालक है । किसी ने कहा क़ाबिल हैं, कोई चीखा की सिफर हैं । कोई ने मनचला कहा,तो कोई बोला शातिर ।

किसी ने औरत से नाम जोड़ा तो किसी ने आदमी से,कोई बोला हँसमुख हैं, तो एक बोला गुस्सैल हैं । एक आवाज़ आई कि घमंडी हैं, तो दूसरा बोला बड़ा ही आम सा इंसान है । कोई ने साधू देखा उसमे तो कोई उसमें ख़लीहर हठी इंसान देख भाग आया । एक ने कहा लेखक है तो दूसरा बोला निरा जाहिल है । एक ने कहा वह बोलता अच्छा है तो दूसरा बोला वह क्या ही बोलता है, बकवास । उत्तर में तो यह भी आया कि वह प्रेमी है, तो एक उत्तर आया फ़रेबी है, दिलों को फ़रेब में फँसाकर निकल जाने वाला निर्दयी है । एक ने कहा चालाक लीडर है तो दूसरे ने कहा बेवक़ूफ़ आत्ममुग्ध बैल है । एक ने कहा बेशक़ीमती है तो दूसरे ने कहा फ़िज़ूल है ।

 हिन्दू ने कहा मुसलमान है तो मुसलमान बोला हिन्दू है हफ़ीज़ । नास्तिक ने कहा आस्तिक है, आस्तिक ने कहा नास्तिक है हफ़ीज़ । एक ही तो सवाल आया था कि कौन है हफ़ीज़ क़िदवई ।
फिर किसी बूढ़ी अनुभवी लरज़ती हुई आवाज़ ने कहा कहीं वह आईना तो नही और फिर दौड़ गई खामोशी...

Tuesday, November 5, 2019

मोहम्मद साहब

बहस चलेगी की जुलूस निकलना सही है या नही,ईद ए मिलादुन्नबी दस तारीख़ को है । कोई इसे मानेगा कोई नही मानेगा,दोनो ही बातों से फ़र्क़ नही पड़ता । फ़र्क़ तो पड़ता है कि कौन पैगम्बर मोहम्मद साहब की बात मानेगा । अच्छे अच्छे लोग देंखे हैं, उनकी ज़ुबान और ज़हनियत देखी है, अपने रसूल के किरदार से कोसो मीलों दूर ठीक उल्टा किरदार लिए,रसूल के नाम पर ही आपस मे लड़ते फिरते हैं ।

जो यह कहते हैं की हज़रत मोहम्मद को खुद में उतारो,उनकी बताई बातों को दिल से लगाओ ।उनके दिखाए रास्ते पर चलो ।उनके किये कामो को अपने उसूल बनाओ ।वो भी अच्छे से जानते हैं की यह आसान नही है । वह कह तो रहें हैं मगर ज़रा ज़रा सी मुख़्तलिफ़ बातों से भिनक जाते हैं ।

पैग़म्बर मोहम्मद की ज़िन्दगी को खुद में उतारना इतना ही कठिन है जितना पानी में मिटटी घोलना । जब तुम्हे लगेगा की मिटटी घुल गई,तो ज़रा से वक्फे के बाद वह तलहटी में बैठ जाएगी और पानी फिर ऊपर मुस्कुराता रहेगा । यह आसान भी ऐसा है जैसे किसी बच्चे को देख चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ जाना ।

तुम्हारे लिए तो इतना ही पैमाना काफ़ी है की जब तुम तस्लीमा नसरीन,सलमान खुर्शीद और फ़्रांस के कार्टूनिस्ट की क़लम की सियाही से बेचैन न हो,उनके किये को उनकी सोच समझ माफ़ कर दो,किसी के भड़काने पर बारूद का ढेर मत बन जाओ,जब ऐसा करलोगे तो हज़रत मोहम्मद के पीछे पाओगे ।

जब तुम बाथरूम में हो और एक ज़रूरत से ज़्यादा पानी मत बहाओ,तुम्हे बेवजह बहते पानी को देख दर्द हो,तब तुम उनके रास्ते पर होगे । किसी बच्चे जिसके माँ बाप न हों उसके सामने अपने बच्चों को बहुत दुलार प्यार मत करो की बच्चा अपने माँ बाप की मोहब्बत को बेक़रार हो जाए,तब तुम उनके पीछे होगे ।

फल खाकर छिलके ऐसी जगह मत डालो जिससे कोई को इसके न मिल पाने की ख्वाहिश जगे,जब तुममें यह संवेदना होगी,तब तुम उनके रास्ते पर होगे । पड़ोस में अगर कोई भूखा है और तुम्हारा पेट भर रहा है, तो तुम हज़रत मोहम्मद के रास्ते से कबके हट चुके हो ।
बीमार को तुम देखने नही जाते,इंसान के मिलने पर उसकी खैरियत नही पूछते,बाजार में बैठकर सिर्फ अपने फायदे की फ़िक्र करते हो,दूसरे की अमानत में खयानत करते हो,बेटे को बेटी से ज़्यादा पढ़ाते हो,बेटी को अपनी कमाई में हिस्सा नही देते,बेटियों से ऊँची आवाज़ में बात करते हो,औरत से सख़्त लहजा इस्तेमाल करते हो,बूढ़े तुमसे बात करने,पूछने या कुछ भी कहने में डरते हों तो यक़ीन जानो तुम हज़रत मोहम्मद के जलाए चराग़ की रौशनी के बावजूद एक अँधेरा हो  ।

अगर तुम्हारे लफ़्ज़ किसी के दिल को दुखाते हैं । तुम्हारा होना गरीब मज़लूम को दर्द देता है । तुम ज़ुल्म के हिमायती हो ।तुम नौकर और खुद के खाने और पहनने में फ़र्क़ करते हो ,तो चाहे तुम जुलुस निकालो और चाहे सुबहों से शाम मस्जिद में सजदे में पड़े रहो । बावजूद इसके तुम हज़रत मोहम्मद साहब की नज़र से अलग रास्ते पर हो। जिन्हें लगता है की रसूल को वाक़ई ज़िन्दगी में उतारा जाना चाहिए,वह कुछ भले न करें मगर शुरुआत वह तक़लीफ़ पहुँचाने वाले अल्फ़ाज़ से किनारा करके कर सकते हैं ।मोहब्बत है तो मोहम्मद हैं, वरना कुछ भी नही...

Monday, November 4, 2019

प्रयावरण लखनऊ

लखनऊ में एक है लोहिया पार्क और एक है जनेश्वर मिश्र पार्क । वैसे तो और भी पार्क हैं मगर यह दो पार्क लखनऊ के फेफड़े हैं । भर भर कर इसमें पेड़ लगवाए गए,ताकि लखनऊ वासी भर भर के सांस ले सकें ।
वैसे तो यहाँ पूरे शहर में साइकिल पथ भी होता था मगर बदली सियासी आँखों में चुभ गया और उखड़वा फेका गया । कहा गया पैसे की बर्बादी है । मान लिया कि बर्बादी थी,पर आपने कौन सा आबाद करने वाला काम किया । आज जब लखनऊ शहर और सूरज एक दूसरे से मिलने को तड़प रहें हैं, तब ख्याल आया होगा कि साइकिल पथ क्यों था ।बड़े- बड़े पेड़ तो हर एक हुकूमत ने कटवाए मगर कुछ ने उनको कटवाने का प्रायश्चित किया तो कुछ ने भोंडेपन से हँस कर काम चलाया । यह दोनों पार्क हर आने वाले वक्त और ज़रूरी होते जाएँगे । 

वैसे यह अजीब शहर है । मुझे यह शहर बिल्कुल पसन्द नही मगर मैं इससे बेइंतेहा मोहब्बत करता हूँ । पसन्द इसलिए नही क्योंकि इसको जिसने सँवारा उसको इसने तख्त से उतारा है । प्यार इसलिए है क्योंकि इसकी मिट्टी में पहली सांस ली थी,यही शहर ने मेरे माथे पर अपनी मोहर लगाई थी,जो ताउम्र साथ रहेगी । यही वह शहर है जो मेरे साथ साथ चलता रहा,अच्छे बुरे सब हालात में ।

आज जब दम घोटू माहौल है । हवा भी हमारे मिजाज़ सी बदतर हुई जा रही है । ज़हर जो हमारे दिमागों में भरा था अब हवा में फैल चुका है । फिर भी यह शहर उन शख्सियतों की तारीफ़ में दो लफ्ज़ नही खर्चा करता, जो उनको लोहिया-जनेश्वर पार्क जैसे फेफड़े दे गए हैं ।

हम तो इस वक़्त राजनीति से उकता चुके हैं । यही क्या कम भला है कि अभी तक इस धुंध को किसी ने लपक कर "पॉल्यूशन जेहाद" नही कहा अगर ऐसा कोई कह देता तो शायद "एंटी पॉल्यूशन स्क्वाएड" ही नज़र आने लगता मगर ख़ैर, ऐसा कुछ है नही,बस धुआँ धुआँ है ।

पर्यावरण,प्रदूषण,ग्लोबल वार्मिंग, जंगल,ज़मीन यह सब हमारे विषय ही नही हैं । अभी हफ्ते भर में हम बढ़िया से किसी और डुगडुगी पर नाच रहे होंगे । अभी तो बहुचर्चित सुप्रीम कोर्ट का अयोध्या पर फैसला आना है, बस तब ही तक यह स्मॉग स्मॉग खेल लें,उसके बाद तो हवा में हवा ही नही रह जाएगी सिवाए नारेबाज़ीयों के,क्या कहें ।

लखनऊ हो या कोई और शहर,अगर उसे जो चाहिए,उसकी जगह कुछ और दिया जाता रहे,तो यही हश्र होता है । आपको मेरी बातों पर मिर्ची लगे तो लगे,आँख में तो मिर्ची पर्यावरण ने घोल ही दी है । अभी कहते हैं, धर्म जाति से अपनी राजनीति मत तय करो । राजनीति काम से तय करो,जो एक ईंट भी नही रखते,वह क्या जाने निर्माण क्या होता है ।

जाइये और लोहिया पार्क-जनेश्वर पार्क में टहलकर अपने फेफड़ो को ज़िन्दगी दें । चल सकें तो मेरे साथ आइये और धर्म,जाति, हिंसा,भड़काउपन और बाँटने वाली राजनीति से हटकर निर्माण का रास्ता खोलें । जहाँ हवा आपके फेफड़ो को भी सही रखे और दिमाग को भी, ईश्वर से प्रार्थना की यह दिन और न खिंचे,जल्द से जल्द पर्यावरण सुधरे और हम सब निर्बाध ऑक्सीजन ले सकें,जिसमे मिलावट न हो । अब ईश्वर हर वह हाथ मज़बूत करे, जिससे देश समेत हमारे शहर लखनऊ की हवा,पानी और दिमाग भी शुद्ध रहे ।

Sunday, November 3, 2019

धर्म की खूबी कर्म में लाओ

मैं हिन्दुओं से अक्सर पूछता हूँ की तुम्हारे धर्म की अच्छाइयां क्या क्या हैं । वह वाक़ई बहुत प्रसन्न होकर गर्व के साथ अच्छाइयां बताते हैं । मुझे अच्छा लगता है, यह सब सुनकर ।

मैं मुसलमानों से पूछता हूँ कि तुम्हारे पैग़म्बर और तुम्हारे मज़हब में क्या क्या खूबियाँ हैं । मुसलमान भी मेरे दिल मे इस्लाम को लेकर कोई कसर न रह जाए,इसका ध्यान रखते हैं,खूब खूबियाँ बतलाते हैं, मुझे सुनकर सुक़ून मिलता है, खुशी होती है ।

मगर मैं जैसे ही हिंदुओं से यह पूछता हूँ कि जो धर्म की अच्छाई तुमने बताई है उनमें से तुममे खुद में कितनी हैं, तो उनकी आँखों मे मेरे लिए गड़न पैदा हो जाती है । यही मैं मुसलमानों से भी पूछता हूँ कि इस्लाम और रसूल की खूबियों में से तुममे कितनी हैं भाई,तो उनकी आँख में भी मैं चुभने लगता हूँ ।

सच तो है कि मैं इनकी आँखों मे गड़ना या चुभना नही चाहता हूँ, मैं तो बस यह चाहता हूँ जिसको मान रहे हो,उसकी ही मान लो,प्रेम करो ,त्याग को अपनाओ,
समर्पण को दिल मे जगह दो और सरलता को लक्ष्य रखो और मानवता के काम आओ । अब बताओ भला किस धर्म ने इसके खिलाफ शिक्षित किया है, जो भी इनके खिलाफ है, वह धर्म ही कहाँ है, वह तो धर्म के नाम का झांसा है और झांसे में अक्लमंद इंसान फँसा नही करते,मूर्खो की बात और है ।

धर्म के जिस हिस्से को सुनाकर तुम दूसरों को प्रभावित करना चाहते हो,श्रेष्ठ बनना चाहते हो,उस अच्छाई को खुद में उतार लो,मेरा यक़ीन करो,तुम्हे देखकर हर एक प्रभावित होगा । मोहम्मद साहब की ज़िंदगी के किस्से मत गाओ,उन्हें खुद में उतारो, भगवान और अवतारों की कथा मत सुनाओ उन्हें कर्म में उतारो,लोग तुम्हारे साथ तुम्हारे धर्म का सम्मान करेंगे,यह सम्मान प्रेम से होगा,किसी के डर से नही...

Saturday, November 2, 2019

भिखारी मीडिया

एक भिखारी था,उसकी आवाज़ बड़ी मधुर थी । किसी भी गाँव मे वह गाता हुआ जाता,तो लोग प्रेम से उसे कुछ न कुछ दे ही देते । यह दौर चलता रहा कि एक रोज़ गाँव के एक नए नए अमीर हुए व्यक्ति ने भिखारी को गाते सुना ।

वह भिखारी को पकड़कर बोला की तुम कितना कमा लेते हो,भिखारी ने कहा,सुबह से शाम में जितना भी ईश्वर प्रबन्ध कर दे । अमीर इंसान बोला,फिर भी कुछ तो गिनती होगी,भिखारी ने कहा यही पाँच छः हज़ार ।
अमीर इंसान ने भिखारी से कहा कि अगर तुम सिर्फ मेरे लिए,मेरी चौखट पर गाओ तो तुम्हे दस हज़ार मिलेंगे । भिखारी को यह प्रस्ताव भा गया,सोचा उसमें दर दर की ठोकरे खाओ,यहाँ एक ही चौखट पर दस हज़ार मिल रहें, उसने प्रस्ताव मान लिया ।

अब भिखारी जाता,तो बस उसी के दरवाज़े गाता । एक आध लोगों ने उसे बुलाने,कुछ देने की कोशिश की मगर भिखारी ने नही लिया । कई महीने गुज़र गए,दूसरी कोई चौखट उसने नही देखी,बस यहाँ इतना मिल जाता कि वह मगन रहता । गाँव वाले जबरन उसे लाना भी चाहें,तो वह न आए,उस अमीर चौखट पर उसे पूरा आनंद मिल रहा था । बहुत कहने पर वह गाँव वालों को बुरा भला कहने लगा,तो वह भी कतराकर निकलने लगे ।
सालों गुज़र गए,अब भी वह उसी दरवाज़े पर बैठा गाता रहता और अपने तय पैसे लेकर निकल जाता । एक दिन उस अमीर आदमी ने कहा,यार तुम पर हम फ़िज़ूल ही इतना पैसा बर्बाद करते हैं, अब क्योंकि पुराने हो तो हटाएँगे नही,बस तुम्हे अब से पाँच हज़ार ही मिलेंगे । भिखारी चीखा की यह क्या बदतमीज़ी है । अमीर आदमी ने खींचकर एक चांटा दिया और कहा आवाज़ नीची,चुपचाप पांच हज़ार लो और पड़े रहो ।

भिखारी खामोश हो गया,उसने पास से गुजरते दूसरे गांव वालों को देखा, उन्होंने भिखारी की तरफ ध्यान ही नही दिया । कुछ वक्त फिर गुज़रा, अमीर आदमी बोला अब से तुम्हे दरवाज़े झाड़ू पोछा भी करना होगा,कार भी साफ करनी होगी और तीन हज़ार रुपये ही मिलेंगे । भिखारी तिलमिलाकर बोला,यह तो हद दर्जे की बदतमीज़ी है । वह बोला ही था कि उसे एक लात पड़ी । अमीर आदमी ने दो जूते भी मारे और कहा कि औकात भूल रहे हो,तीन चार हज़ार के मोहताज थे,घर घर माँगते फिरते थे,औकात से ज़्यादा दे दिया,तो सर चढ़ गए । होश में रहो, इस चौखट को छोड़ने के बाद कोई तुम्हारे मुँह पर पेशाब भी नही करने आएगा,भिखमंगे,पड़े रहो ।

उस रात भिखारी को बड़ा गुस्सा आया । उसने सोचा कि हमने अपना ज़मीर थोड़े ही बेचा है । हम फिर से घर घर गाएँगे और मस्त ज़िन्दगी जिएंगे । वह चल दिया,गाता जाता,घर निकलते जाते मगर किसी घर से कोई नही निकला । उसने कई घर खटखटाए,कोई निकला तो याद दिलाकर चला गया कि तब कहाँ थे,जब हम तुम्हारे संगीत सुनना चाहते थे । तब तो तुम्हे वह चौखट प्यारी थी । तुम उस चौखट के पालतू हो चुके,अब हम सबके काम के नही हो,तुम्हारी आवाज़ बिक चुकी,बिकी हुई चीज़ें समाज मे कबाड़ बन जाती हैं, यह बाजार नही है ।

भिखारी हफ़्तों टहला,भूखा प्यासा और वापिस उस अमीर की चौखट पर बैठ गया । अमीर ने कहा अब तुम्हे पैसे नही मिलेंगे,बस दो वक्त का खाना और तुम्हे यह खटरागी गाने के साथ कुछ काम भी करना होगा,सफाई,शौचालय की सफाई और जूतों पर पोलिश और मैदान की घाँस भी निकालनी होगी ।
भिखारी की हिम्मत नही पड़ी की वह दो वक्त के खाने के इस प्रस्ताव को ठुकरा सके,उसने सर डाल दिया । उसे चौखट दिखाई दी,चौखट में खुद को बंधा देखा और सर झुकाकर गाते हुए देखा,खुद के सामने फेंकी हुई रोटी देखी और दूसरे गाँव की तरफ असंख्य दरवाज़े देखे,जो देते भले कम थे मगर प्रेम करते थे,बराबरी पर रखते और सम्मान से खेलते नही थे,यही हाल तो मीडिया का हुआ है, वह भिखारी और कौन है सिवाए मीडिया के...

Friday, November 1, 2019

छठ

यूँ हल्की सी सर्द सुबहों और नदी का ठंडा पानी।सूरज की संतरी शक्ल और हमारा नदी में डूबा आधा जिस्म।आँखे बेताब उस सूरज को क़ैद करने के लिए जो हफ्ते भर पहले आँखों को चौंधया रहा था।हाथ नदी के पूरे पानी को समेट लेने के लिए  बेचैन।हल्के हल्के होंटो से झरते गीत।बाँस का सूप,फूँस की डलिया, गुड़ गन्ने का रस और चावल गेहूँ से बना देसी ज़ायका।कुल मिलाकर ख़ालिस हिंदुस्तानी नब्ज़।न मज़हब के रोड़े,न ज़ात की फ़िक्रें,न पुरोहितों के नखरे,न पहुँच से बाहर के देवी देवता।
यही तो छठ है।हमारा आपका छठ।

रामराज्य शुरू होने का छठ।सीता का राम के राजतिलक लगाने का छठ।कर्ण की तपस्या का छठ।द्रोपदी के ताप का छठ।राजा प्रियेवद, महर्षि कश्यप,मालिनी और देवसेना का छठ।गंगा का यमुना के पानी को खुशबू देने का छठ।दो दिलों को जोड़ने का छठ।दो रूहों को रूहों से मिलने का छठ।यह सादे से किसानो,हमारे जैसे आम से लोगों,मज़दूरों का वोह खूबसूरत त्यौहार है जिसकी सौंधी सी खुशबू मगरूर दिल महसूस नही कर सकते हैं।
मेरा मुल्क़ मामूली सी चीज़ों में खुशियाँ ढूँढने वाला रहा है।हमने अपनी नदियों को,अपने खाने को,अपने हिस्से के सूरज को,अपनी जोड़ने वाली संस्कृति को अपने टूटे फूटे अल्फ़ाज़ों में समेट कर, लोकगीत गढ़े हैं।उन गीतों में हमारी रूहें हैं।उन गीतों में मेरा भारत है।

जब नदी में आधा डूबकर हम सूरज को सलाम कर रहे होते हैं, तब हमारे दिल की जो धड़कन होती है, वही तो भारत है।इस छठ को महसूस कीजिये।इसमें छुपी कहानियों को देखिये।इस त्यौहार में मिलने वाले गंगा जमुनी दिल को पढ़िए।तब ही तो भारत की रूह को छू पाएँगे।
आओ इस छठ पर क़सम ले की हम दिलों को इतना बड़ा कर देंगे,जहाँ नफ़रत गुम जाएगी।मेरे राम के रामराज्य की शुरआत का यह जो छठ है, उसके होने को मोहब्बत से सींच देंगे।जैसे ही हम नदी में नारंगी सूरज के सामने डुबकी लगाएँगे,तो यक़ीनन सारी नफ़रत उस खुशबूदार पानी में धूल जाएगी।बस एक ही दुआ,छठ हमारे देश मे प्रेम,सहिष्णुता,एकता और भाईचारे के साथ तरक्की की छटा बिखेर दे...