Sunday, September 29, 2019

सच बनाम सच

कश्मीर का नाम मत लो वरना बहुसंख्यक खफ़ा हो जाएँगे । यह मत कहो,वह मत कहो नही तो बहुसंख्यक नाराज़ हो जाएँगे । बहुत साल पहले यही होता था कि तीन तलाक़ पर मत बोलो वरना अल्पसंख्यक नाराज़ हो जाएँगे । इसपर मत उस पर मत बोलो वरना अल्पसंख्यक नाराज़ हो जाएँगे । असल मे मसला यह है कि पहले भी और अब भी इंसानों को संख्याओं के झुंड समझकर सिर्फ अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक में बॉलीबॉल खेला जा रहा है ।

जब जिसके सर पर सत्ता का हाथ हुआ,वह बौराया बौराया फिरता है, मगर इनको हासिल कुछ भी नही होता । कुछ वक्त के बाद रोएँगे की हमारे बौराने से भी हमारे बच्चों को क्या मिला,भला पागलपन से भी कुछ हासिल हुआ है, सिवाए ईंटे पत्थर फेंकने के ।

हम आजतक यह क्यों नही कर पाए कि सच बात करें । पता नही क्यों सच अपने धर्म के लेंस से देखने की आदत है । अरे छोटी सी चीजें हैं, जो गलत है, वह गलत,इसमे चाहे कोई नाराज़ हो या खुश,हमे क्या ।
यह जो संख्याओं का खेल है, यह जो भीड़ की ताक़त का उत्सव है, इससे कोई तरक्की नही कर सका सिवाए मुट्ठीभर चालाक लोगों के,यह वही लोग हैं जिन्हें पता चल भर जाए कि आप की खाल बाजार में महँगी बिकेगी,एक झटके में खाल उतारने की फिराक में लग जाएँगे, बिना यह सोचे कि आप उनके धर्म या देश या मोहल्ले के हैं ।

नवरात्र चल रहें हैं, इसमें भी अगर सच कहने की सलाहियत नही आई तो बेकार हैं आप । अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक अगर वह सच बोलते हैं, तक़लीफ़ पर खड़े होते हैं,आपस मे एक दूसरे से मोहब्बत करते हैं, एक दूसरे को तरक्की के रास्ते पर ले जाते हैं, इंसान की बराबरी को मानते हैं तब तो वह जन्मभूमि के हितैषी हैं, वरना दुश्मन ही तो हैं ।

इधर गुज़र रहे हर वक़्त को देखिये,खुद को देखिये,यह देखिये की आप सच के साथ थे या झूठ के साथ । आपके साथ ने सच का झंडा ऊंचा किया या झूठ का । आपकी आंखें सच देख सकीं या केवल देख ही सकी जो दिखाया गया । गलत को गलत लगना और कहना नही आया तो बद्तर हैं आप,यहीं से तय होगा कि आप हैं क्या...

Monday, September 23, 2019

मसरूर जहाँ

एक दिन हम भी चुपके से चले जाएँगे, कोई आहट नही होगी । कौन पूछता है,परसों रात हमारे बीच से एक ऐसी शख्सियत गुज़र गई,जिसके गुज़रने से एक कुछ वक्त नही फिसला बल्कि पूरी एक सदी ही फिसल गई ।

परसों शाम उर्दू अदब में इतनी बड़ी जगह खाली हुई, जिसकी भरपाई हो ही नही सकती । ताज्जुब तो यह है लखनऊ में डूबे उर्दू के इस सूरज से कहीं भी मायूसी का अंधेरा नही छाया,क्योंकि बदनसीबी से बहुत लोग उनको जान ही नही पाए ।

जब लोग एक दो नावेल लिखकर इतराते नही फिरते तब 65 नावेल और 500 के ऊपर शार्ट स्टोरी लिखकर यह शख्सियत दुनिया ए फ़ानी से कूच कर गई। अभी तो लखनऊ ने उनकी शार्ट स्टोरी का कलेक्शन "ख्वाब दर ख्वाब सफ़र",सन 2016 में देखा था,किसे पता था यह आख़री है । हम जैसे तो किस्मत वाली यह आख़री पीढ़ी थे,जिन्होंने उनके साय में ज़िन्दगी की शुरआत की थी । दुनियाभर में बहुतों ने इनपर पीएचडी की,यही नही जावीद खोलोव,
तजाकिस्तान यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने भी इनपर ही पीएचडी की थी । आपको हैरत होगी कि अदब की यह शख्सियत जिसपर लोग पीएचडी कर रहे थे,वह खुद हाईस्कूल के आगे का मुँह नही देख सकी थीं । घर आंगन के तमाम फ़र्ज़ों में उन्होंने साहित्य की जड़ मे खूब खाद पानी डाला ।

लखनऊ के पास फतेहपुर में पैदा हुई और लखनऊ में ही शुरुआती तालीम हासिल करने वाली शख्सियत लखनऊ में तालकटोरा के कब्रिस्तान में सो रहीं। कल ही सुपर्द ए ख़ाक किया गया,कल लखनऊ बारिश से सराबोर था,उर्दू अदब के डूब चुके इस सितारे को बादल गरज गरज कर सलामी दे रहे थे । जब शहर नही रोया,तो बादलों ने सारी ज़मीन ही नम करदी । उनके वालिद नसीर हुसैन "ख्याल" भी आला दर्जे के शायर थे। उनकी परवरिश ने ही अपनी बच्ची में वह बीज बोए जो अदब का भरा पूरा बाग़ हुईं ।

उनकी पहली नावेल रूमा 1965 में पब्लिश हुई । भारत पाकिस्तान और कनाडा में बराबर से उनकी कहानियाँ छपती रहीं हैं । दुनिया के हर कोने में जहाँ उर्दू पहुँची वहाँ लखनऊ के आंगन की ज़ीनत वह मशहूर कलम "मसरूर जहाँ" भी पहुँची । लोगों ने उनकी कलम को पलकों पर बैठाया ।

किताबों की एक लंबी फेहरिस्त और ज़िन्दगी के हर तजुर्बा को हमारे लिए छोड़कर मसरूर जहाँ साहिबा सुक़ून की तरफ लौट गईं । उनका जाना और जाने पर यूँ बिखरी खामोशी ने हमे उलझन में तो डाला,मगर जल्द ही हमने भी मान लिया,जो बाज़ार से दूर है, उसके जाने पर बाज़ारवादियों पर फ़र्क़ नही पड़ता । मसरूर आपा,हाँ आपा क्योंकि वह किसी की आंटी थी तो किसी की आपा, किसी के दादी, तो किसी की नानी,वह इन्ही रिश्तों के बीच चोटी की राइटर थीं । मसरूर आपा के बारे में मुझे सबसे पहले मेरे नाना ने बताया,नानी अम्मी तो आख़री तक उन्हें पढ़ती ही थीं । इसलिए,वह घर की कलम रहीं । उनका न होना अफ़सोसनाक तो है मगर वह अपनी ज़िन्दगी से बहुत ज़्यादा काम कर गई । आज नही तो कल उनको ढूंढा जाएगा,जब उनकी कलम तो मिलेगी मगर वह नही,कभी नही ...

Saturday, September 21, 2019

धर्म को मत जाने

मुझे अच्छा लगता है जब कोई खुद के जुड़े धर्म के सवाल को नही बता पाता । इधर दो तीन चीज़े नज़र से गुज़री, जिनपर अच्छे अच्छे लोग ट्रोल बन गए । पहले दोनों तस्वीर समझ लीजिए ।

कौन बनेगा करोणपति में गुज़रे दिनों सोनाक्षी सिन्हा से पूछा गया कि हनुमान जी इनमे से किसके लिए संजीवनी लेने गए थे,वह नही बता पाई,इसके लिए लाइफ लाइन का इस्तेमाल किया । अब लग गए लोग उन्हें ट्रोल करने,क्या क्या नही कहा,हर एक ने कहा कि उन्हें इतना भी नही पता एक हिन्दू होकर ।

दूसरी तस्वीर भी इसी महीने की है । एक बड़ी कम्पनी में काम करने वाले आसिम चौधरी से केबीसी में सवाल किया गया कि इनमे से कौन पैगम्बर नही है । वह नही बता पाए और लाइफ लाइन इस्तेमाल करके ट्रोल के निशाने पर आ गए । हर एक नए कहा कि मुसलमान होकर उन्हें इतना नही पता कि पैगम्बर कौन है, कौन नही,जमकर गालियां खाई । पूरे खानदान को खासकर माँ बाप को गालियाँ मिली कि पढ़ाई करके लाखो की तनख्वाह तो दिलवा दी मगर इस्लाम नही बता सके ।

अब देखिए,इन दोनों को क्या मालूम है क्या नही,हम इसिपर आते हैं, इन्होंने जो काम चुना,उसमे तो यह परफेक्ट रहे । तसल्ली हुई की जितने हिन्दू ट्रोल हैं,उनसे बराबरी के मुसलमान ट्रोल भी हैं,ज़हनी जाहिल । कोई सोनाक्षी को लताड़ रहा तो कोई आसिम को,लताड़ने वाले बूढ़े नही है, नौजवान हैं । ताज़े ताज़े नौजवान,गले तक धर्म मे डूबे हुए ।

मैं बिल्कुल गलत नही मानता कि आपको अपने धर्म के बेसिक्स नही पता,मेरे लिए यह मायने रखता है कि आपको इंसानियत आती है या नही,आपमें संवेदना है या नही,आप में ईश्वर और धर्म को लेकर जीके मज़बूत है या ईश्वर के बंदों से मोहब्बत ।

अरे तुम कुरान पढ़े हो या न पढ़े हो,गीता देखे हो जीवन मे या नही,अगर तुममे लोगों के लिये हमदर्दी हो,तो बस तुम सबसे बड़े धार्मिक हो । अगर जीके सही चेक करोगे तो रावण का जनरल नॉलेज भगवान राम से ज़्यादा मज़बूत था,संवेदना तो राम में थी । अरब में पैगम्बर मोहम्मद से बहुत ज़्यादा क़ाबिल शायर और लेखक,वैज्ञानिक थे,मगर उनमें हज़रत मोहम्मद जैसी हमदर्दी नही थी,तो क्या तुम हज़रत मोहम्मद को उनके सामने खारिज करदोगे ।

इन उदाहरणों से इन लोगों को जोड़कर देखने की ज़रूरत नही है, बस समझने की ज़रूरत है कि इंसान देखो,उसकी जनरल नॉलेज नही । हो सकता है वह अपने धर्म की बेसिक चीज़ नही बता पाए,आप भी तो अपने घर मे ही अपने पर दादा या पर नाना या उनके भाइयों के नाम नही बता सकते,यह तो बमुश्किल तीन पीढ़ियों की जानकारी है, तो क्या हम आपको शून्य कह दें,हरगिज़ नही,क्योंकि आपको दूसरी बहुत सी चीज़े आती हैं ।

लोगों के कपड़े नोचना बन्द कीजिये । उन्हें कमतर साबित करके क्या ही मिलने वाला है । और यह धर्म की भेड़चाल से बचिए । आपको अगर भगवान राम की या पैगम्बर मोहम्मद की जानकारी नही है, तो इससे समाज पर कोई प्रभाव नही पड़ने वाला है । आपको तो बस अपने व्यवहार को देखना है और यह भी देखना है कि आपके होने से आपके परिवार को कोई लाभ है भी या नही,समाज को कोई लाभ है भी या नही ।

मुझे दिल से अच्छा लगा जब यह नही बता पाए अपने धर्म के सवाल को । गर्व हुआ इनके मां बाप पर की उन्होंने भयँकर धर्म से संक्रमित होते समाज मे भी इन्हें बचा रखा ।  यह भी अच्छा लगा कि देखो,जिन्हें तुम कट्टर कहते हो,उनमें ही बहुत से लोग हैं, जो कुछ भी नही जानते,मासूम हैं ।

ट्रोलर मत बनिये,हर एक को हर चीज़ जानने की ज़िम्मेदारी मत दीजिये । आप खुद को सुधारें,अगर सुधरें हैं तो और सुधारे, निखारे मगर धर्म के दरोगा मत बनिये । धर्म को दरोगाओं की आवश्यकता नही है, धर्म को सेवक चाहिए । सेवक लाठी लेकर मालिक को मारते नही हैं, उनके पाँव दबाते हैं और मालिक ईश्वर के बनाए लोग हैं । यह तो वैसे आपसे होगा नही,बस घड़ी घड़ी अपने कट्टरपन का भोंडा प्रदर्शन कीजिये,ट्रोल कीजिये,गाली दीजिये,आप ही अपने धर्म की दीमक हैं । मुझे आसिम और सोनाक्षी को देखकर खुशी हुई....

Friday, September 20, 2019

मीर और विश्व शांति

आज विश्व शांति दिवस है तो आज ही मीर तक़ी मीर के गुज़रने का दिन भी  । मेरे लिए इन दोनों वजहों से आजका दिन हमेशा क़रीब रहा ।
मीर ने लखनऊ की चौखट पर आखरी सांस ली और लखनऊ ने उनके ऊपर सैकड़ो ट्रेन दौड़ाकर हमेशा के लिए शांति छीन ली । अब यह नही पता कि मीर को सुक़ून है भी या नही,क्योंकि सिटी स्टेशन पर दौड़ती रेलगाड़ी और उसके पीछे भागते ज़िन्दगी के सफर पर निकले लोग,मीर के दिल को चीरते होंगे या सुक़ून पहुचाते होंगे,क्या मालूम ।

ख़ैर मीर की कब्र न सही,निशान ए मीर ही सही । हमने उन्हें बेहद सुक़ून की जगह तो सौंप ही दी है । मैं अक्सर सोचता हूँ कि अगर मान लो मीर की कब्र न मिटती तो क्या होता,फिर मान लेता हूँ कि कुछ भी नही होता,क्योंकि एक से एक लोग तो मिट्टी में दफन हैं, किसे उनकी फ़िक्र, जब जिसकी ज़रूरत लगी तो उसपर बाल्टियों मोहब्बत उड़ेल दी,ज़रूरत नही तो उनका ज़िक्र ही नही रहा ।

मीर का आज इंतेक़ाल हुआ,तो इतने लंबे अरसे बाद आजका दिन विश्व शांति दिवस की पहचान पाया । हालांकि दोनों का एक दूसरे से कोई ताल्लुक नही,फिर भी मैं सोचता हूँ कि एक शायर,खासकर बेचैन शायर के मौत ही तो शांति है । फिर रही बात दुनिया के सबसे बड़ी जमात के शायरों में से एक मीर की मौत तो तक़ी मीर के लिए शांति ही होगी । इसलिए यह दिन बहुत हद तक जुड़े भी हैं ।

मैं इतना घुमा फिराकर जानते हैं क्यों कहा रहा हूँ,क्योंकि शांति पर मुझसे नही लिखा जा रहा है । मै कश्मीर देखता हूँ और शांति मुझे 45 दिन से कुएँ में पड़ी एक फूली हुई लाश नज़र आती है । मैं असम की एनआरसी देखता हूँ,लाखों लोगों के होंटो से जनगणमन छीन लिया जाता देखकर,शांति की तरफ मुँह करता हूँ,वह मुझपर थूककर निकल जाती है ।

मैं मीर का दामन पकड़ कर रोते हुए खुद से छिप जाना चाहता हूँ । बताओ उन लड़कियों से कैसे कहें कि आज शांति दिवस है, जिनका बलात्कार होता है, जिनसे नँगे बदन धर्मरक्षक तेल लगवाते हैं, जिनके कपड़े के साथ जिस्म नोचे जाते हैं और जिनके साथ कोई खड़ा नही होना चाहता । बताओ इन्हें विश्व शांति दिवस की मुबारकबाद दूँ ।

एक मज़हब का नशा इतना चढ़ता है कि वह सैकड़ो लोगों के बीच बम बांधकर फट जाता है । सैकड़ों ज़िन्दा लोग लाश बन जाते हैं । उन लोगों को शांति दिवस कैसे समझाऊँ । बताओ उस भीड़ को बताऊँ की शांति क्या है जो गाय, बच्चा चोर और अपने खिलाफ की हर सोच को इकट्ठे होकर मार डालती है । राक्षस बनती इस भीड़ को खुद के खून सने हुए हाथों और इंसान के गोश्त नोचते दांतों पर गर्व होता है, इन्हें बताऊं विश्व शांति दिवस ।

मैं मीर के पैतियाने बैठकर,खुद को इस भरम में रखना चाहता हूँ कि यहाँ सब शांति शांति है । मुझे बदसूरत तस्वीरें नही पसन्द,इसलिए मुँह मोड़कर मीर का फातिहा पढ़ना ही बेहतर है । वैसे भी मुर्दों पर क्या ही फ़र्क़ पड़ता है हालात का,मीर पर से रेलगाड़ी गुज़ारो, या मुझपर से यह नफरत भरे हालात,कोई फर्क नही पड़ता ।

चलो मीर का याद करें और विश्व शांति दिवस में शांति खोजें,न मिले तो लेकर आएँ । क्योंकि आज नही तो कल, शांति ही लाई जाएगी । क्योंकि शांति ही संसार को चलाएगी और कोई इस पहिये को वक़्ती रोक सकता है मगर सिर्फ वक़्ती क्योंकि संसार नही रुकता है....

मुझे बेचना न आया

एक दोस्त ने कहा कि हफ़ीज़ तुममे बिल्कुल भी मार्केटिंग स्किल नही है । मैं हँसा और बोला तुम्हे मेरी खूबी क्या पता ।
मैं रेगिस्तान में भयँकर प्यासे किसी सौदागर को पानी,नरेंद्र मोदी के प्रेम में तड़पते हुए भक्त को नमो की जीवनी,पोर्न एडिक्ट को सनी लियोनी की बिल्कुल नई सीरीज़, किसी मुसंघी को शरई हुक़ूमत कैसे आए वाली किताब,संघी को हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के मंत्र,सचिन तेंदुलकर को मंगल ग्रह में पहुँचने पर बैट, पेले को सालों फुटबॉल न देख पाने पर फुटबॉल, सर में पलते जुओं से परेशान किसी को कंघी भी बेच पाने का हुनर मुझमे रत्ती भर नही है ।

मैं दुनिया का वह बन्दा हूँ जो कुछ भी, किसी को बेच नही सकता । मार्केटिंग में तो हमे लगता है कोई हमसे पहले कंघे,ब्रश और चूहे मार दवा बिक़वाए, हमे तो लगता है, चूहे मार हमे खुद खानी पड़ेगी तब भी हमसे यह भी नही बिकेगी ।

जब मुझे कोई अपनी किताब,अपने प्रोडक्ट या अपने आप को ही बेचता हुआ दिखाई देता है, तो मैं शर्म सेगहरे गड्ढे में गड़ जाता हूँ। मुझे मार्केटिंग में उस्ताद यह बन्दे देखकर बेहद खुशी होती है । प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर हमे भी यह गुड़ दे दो,वरना गुड़ गोबर तो सब है ही....

मार्केटिंग,इसकी जय बोलो,जिसे ना आई,उसे कौन जाना,जिसे आई, उसके सिवा किसे जाना गया । मैं एक यह गुर सीखना चाहता तो हूँ मगर अपनी कंचे से छोटी बुद्धि देख रूक जाता हूँ,एक गुरु का इंतेज़ार है, जो हमे बेचना सिखा दे...वरना हम बांटते ही रहेंगे,क्योंकि बाँटना ही आया है, रेवड़ी,खुटिया, जलेबी और विचार सब बांट देंगे,बिना झगड़े और पक्षपात के,बस बेच नही पाते,न खुद को,न खुद का...बेचना एक महत्वपूर्ण,महान गुड़ है, जिस दिन आ गया,उस दिन हम हम नही रहेंगे...

Wednesday, September 18, 2019

एनआरसी,कश्मीर और गाँधी

11 सितम्बर 1906 का दिन था । जोहान्सबर्ग के इम्पीरियल थियेटर में करीब 3000 लोगों की भीड़ थी । यह सभा गाँधी जी ने बुलाई थी । 22 अगस्त 1906 के "ट्रांसवाल गवर्नमेंट गजट" में एक अध्यादेश का मसविदा छपा ,जो विधानसभा में पेश किया जाने वाला था । गाँधी जी ने सोचा यदि यह स्वीकृत हो गया तो दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों का सर्वनाश हो जाएगा । इस प्रस्तावित अध्यादेश के अनुसार सभी भारतीय पुरुष,महिलाओं और आठ साल से ऊपर के बच्चों के लिए ज़रूरी था कि वह अधिकारियों के रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करवाएँ ,उंगलियों के निशान दें,एक प्रमाणपत्र प्राप्त करें,जिसे हमेशा अपने साथ रखें ।

सभापति द्वारा करवाई शुरू किए जाने से पहले ही थियेटर का आर्केस्ट्रा, बालकनी और गैलरी खचाखच भर गए थे । चार भाषाओं में क्रोध भरे भाषणों ने भड़क उठने वाले श्रोताओं को आवेग के ऊंचे दर्जे तक थर्रा दिया था । तब सेठ हाजी जी ने गाँधी जी द्वारा तैयार किया प्रस्ताव पढ़ा,जिसमें मांग की गई थी रजिस्टर में नाम दर्ज करवाने वाले कानून की अवज्ञा की जाए ।

इसके बाद गाँधी जी बोले । पहले तो उन्होंने लोगों को चेतावनी दी, फिर उन्हें उत्तेजित करने का प्रयत्न किया । उन्होंने कहा," सरकार ने भलमनसाहत की सारी बुद्धि को तिलांजलि दे दी है ।...लेकिन मैं हिम्मत और निश्चय के साथ घोषित करता हूँ कि जबतक अपनी प्रतिज्ञा पर सच्चाई के साथ डटे रहने वाले मुट्ठीभर लोग भी रहेंगे ,तबतक संघर्ष का एक ही अंत हो सकता है-वह है विजय"

यह क्यों लिखा आज,क्योंकि जो गाँधी को मानते हैं, वह ही गाँधी को नही मानते हैं । देश मे कश्मीर और असम की एनआरसी काफी है समझने के लिए की जो गाँधी के होने का दावा करते हैं, वह भी उनसे बहुत दूर है । गाँधी उन कानूनों को नही मानते,जिनसे ज़िन्दगी क़ैदख़ाने की जैसी हो जाए । भारत से कोसों दूर दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की आज़ादी का संघर्ष निडर होकर किया था । ऊपर लिखी इम्पीरियल थियेटर की घटना के बाद गाँधी जेल गए,एक नही तीन बार,यंत्रणाएँ सही मगर घुटने नही टेके,न इसमे डरे की दक्षिण अफ्रीका में सरकार क्या सोचती हैं, बहुसंख्यक क्या सोचते हैं, अल्पसंख्यक क्या करते हैं । सच के साथ निडरता से खड़े हुए ।

सही बात तो यह है जैसे अफ्रीका में एक सभा के दौरान बहुत बड़ा लोहे का कड़ाहा आग पर रखा गया,उसमे तेल खौलाया गया और उसी तेल में हज़ारों लोगों ने अपने रजिस्ट्रेशन के प्रमाणपत्र डालकर भस्म कर दिए और जेल का रास्ता चुना । वैसे ही भारत में एक यज्ञ कुंड बनाया जाए और एनआरसी को उसमें डालकर भस्म किया जाए,यह करने पर जेल जाना पड़े,तो सहर्ष जेल जाया जाए, क्योंकि नफरत फैलाने और लोगों को आपस मे बाँटने वाली ताकतों के खिलाफ जेल जाना देशद्रोह नही बल्कि देशप्रेम है । जो देश से प्रेम करेगा,वह बाँटने वाली हर ताक़त के विरुद्ध ही होगा ।

जिन्हें एनआरसी और कश्मीर में सिर्फ मुसलमान नज़र आ रहें,वह अक़्ल के अंधे लोग हैं । इन दोनों जगह मानवता फसी हुई है । एक बार कल्पना करिएगा की अगर गलती से ही सही आपके घर के पांच लोगों में एक का नाम एनआरसी में ना आए, तो सोचिए क्या बीतेगा आपपर,यह होगा,ज़रूर होगा,क्योंकि इस काम को अंजाम देने वाले वही हैं, जो वोटरलिस्ट बनाते हैं, राशनकार्ड बनाते हैं, जनगणना करते हैं, आप सब जानते हैं, इनमे कितनी गलतियाँ होती हैं । एनआरसी में तो एक गलती नागरिकता ही गवा बैठेगी ।

मैं चाहता हूँ कि जो भी कानून मानवता के विरुद्ध हो,जिससे आज़ादी घटे,जो हमारे संविधान के दिये अधिकारों का अतिक्रमण करे, उस कानून को दक्षिण अफ्रीका के उसी कड़ाहे में तलकर भस्म करके,घर की जगह जेल चुनो । महात्मा गाँधी ने हमे स्वतंत्र, नैतिक,मानवीय,सच्चा इंसान बनने का हर रास्ता दिखाया है, उसपर चलकर,कष्ट सहकर, उसे नष्ट करके दिखाया है । गाँधी के मानने वालों, हम उनसे नही कह रहे,जो गांधी को वाट्सएप यूनिवर्सिटी के प्रोपेगण्डा से जाने हैं, हम उनसे ही कह रहें, जो गांधी के संघर्ष को जानते और मानते हैं, वह अब चुप मत रहें । जेल की सलाखें इतनी सख्त नही हैं, जितनी धर्म छोड़कर अधर्म में लिपटी सुंदर दीवारों में कैद सच्चे हिंदुस्तानी की आत्मा का चुप रहना । विरोध करें उससे पहले की फिर गुलाम बना दिये जाएँ....

कश्मीर और राजनीति

कश्मीर में 15-20 दिन पहले भी कर्फ्यू हटाया जा सकता था,तमाम चीज़े सामान्य की जा सकती थीं । कश्मीर में विरोध प्रदर्शन तो होते ही,यह चाहे आप 5 साल बाद भी हटाइये,विरोध तो होगा ही,पूरे देश मे कोई भी राज्य के साथ ऐसा किया जाता,तो वह भी विरोध करता ही । ज़बरदस्ती के हर काम का विरोध तो होता ही है, कुछ वक़्त, तो वहाँ भी होता,इसमे नया कुछ भी नही ।

मगर हां मगर सुनिए,अगर वह इस कर्फ्यू और वास्तविक इमरजेंसी को 15-20 दिन पहले हटाते तो,उसका विरोध होकर अब तक सामान्य हो चुका होता । कश्मीर छोड़कर यह अबतक शेष भारत मे इश्यू ही न रहता मगर वोट की बारिश सूंघ लेने वाले लोगों के लिए यह इतना सामान्य नही है । वह यह कर्फ्यू और  बन्द के हर तरीके करीब 25 से 30 दिन और खीचेंगे ।

अक्टूबर के आख़री तक कर्फ्यू हटाया जाएगा ताकि कश्मीर में भयँकर विरोध प्रदर्शन हों और यह एक बार भयँकर गर्मागर्म मुद्दा बनकर हरियाणा,झारखंड और महाराष्ट्र की वैतरणी पार लगाए ।

ज़ाहिर है जब कर्फ्यू हटेगा,तो विरोध प्रदर्शन तो होंगे ही,उसमे कुछ बयान उछलेंगे । हर बयान जो कश्मीर के समर्थन में होगा,वह पूरे देश के विरोध में दिखाया जाएगा । टुकड़े टुकड़े गैंग टाइप खेल चलेगा । मीडिया, काँग्रेस को,भले ही कांग्रेस कोई भी स्टैंड ले,देश विरोधी आवाज़ बनाकर गर्मागर्म परोसेगा और कांग्रेस के विरुद्ध सैलाब की तरह वोट गिरेंगे ।

ज़ाहिर है इस वक़्त देश मे घोर राजनैतिक व्यक्ति शक्तिशाली रूप से विराजमान हैं । उनका हर कदम राजनीति से ही प्रेरित है । यह बात हर एक वोटर जानता है मगर दिल से मजबूर हैं । राजनीति के लिए अगर एक पूरा प्रदेश चारा बन जाए तोभी क्या,उन्हें मंजूर है ।

जब मैं यह कह रहा हूँ,तब समझ लो मैं सौ फीसद राजनीतिक सोच रखकर कह रहा हूँ । मैं कश्मीर को पूरे देश की राजनीति के लिए चारा बनते देख रहा हूँ । लाखों लोगों की कैद जिंदगियां,लाखों वोटों में बदलते देख रहा हूँ । यहाँ संवेदना की बात बेईमानी है, हमे मत सिखायेगा की सरकार राजनीति नही कर रही है । कोई मूर्ख ही कहेगा कि यह सत्ता पाने से प्रेरित एक घोर राजनैतिक कदम नही है ।

कश्मीर तो तीन राज्यों में रोजगार,भ्र्ष्टाचार, व्यभिचार,कानून व्यवस्था और डूबते अर्थतंत्र की वैतरणी पार लगाएगा । कश्मीर जितना तड़पेगा,उतना वोट बरसेगा,वह भी खुशी खुशी,क्योंकि हम सबने दूसरे के दुखों पर खुशियां मनाना सीख लिया है । याद है, नोटबन्दी में लाइन लगे,हैरान परेशान,मरते हुए लोग,फंदे पर लटकते हुए किसान,फटे कपड़ों में मिली लड़कियों की लाशें ,अस्पतालों में मरते हुए बच्चे,सब के बावजूद हमने पूरे गर्व से चुना है,चुनेंगे क्योंकि हम देश नही,देश के लोग नही बल्कि धर्म बचाने निकले आधुनिक नौजवानों की भीड़ हैं....

Sunday, September 15, 2019

हाँ हम बूढ़े होंगे

मेरी पेशाब की धार दूर तक जाती है।दूसरा मेरी तुमसे दूर।तीसरा अबे मेरी देख, सबसे दूर।तीन हमउम्र अल्हड़ भाई, दोस्ती के अंदाज़ में बड़े हो रहे थे। पेशाब की धार उनके जीतने हारने का पैमाना थी।फिर थोड़े बड़े हुए तो स्कूल टेस्ट के नम्बर और मेरिट ने ले लिए।पहला मेरे नम्बर देख हिंदी में सबसे ज़्यादा,दूसरा मेरे मैथ में देख हिंदी जैसे सब्जेक्ट के मुकाबले मैथ में हाईएस्ट हैं,तीसरा अमा छोड़ो फिज़िकल में मेरे सबसे ज़्यादा हैं, फिजिकली जो मज़बूत वह ही तो शहनशाह कहलाता है।

बड़े होकर नौकरी का ग्रेड आ गया फिर बीवियों का वज़न,रँग और बीवी के ख़ौफ़ में कम्पटीशन होने लगा  । पहला कहता मैं नही डरता अपनी बीबी से,दूसरा कहता मैं तो बिल्कुल भी नही डरता,तीसरा कहता सालों मैं तो बहुत डरता हूँ,तुम भी डरते हो,तभी तो अंधेरा होने से पहले सूरज जैसी चमकती बीबी के आगे दम तोड़ने भागते हो । पचास पार करके फिर गिनतीयाँ चालू।अब यही तीनों बिस्तर पर लेटे लेटे शुगर का मुकाबला करते हैं।पहला मेरी 80 निकली, थोड़ी कम है। दूसरा मेरी 300 है सबसे ज़्यादा। चौथा यार मेरी 20 है,फिजिकली पहली बार इतने कम नम्बर आए हैं।तीनो ठहाका मारते हैं।

उनके बीच से एक पके फल की तरह अपनी खट्टी मीठी उम्र बिताकर ऊपर निकलता है, दो याद करके उसकी उम्र और हरकतों का गुणा भाग करते हैं।बिना रोए पेशाब की धार से बदपरहेज़ी तक की शिकायत करते हैं।अपने दिल में ही अंदर अंदर ख़ामोशी से धड़कन गिनकर,गिनती के दिनों को,गिनते रहते हैं।कितना अजीब है न एक ही आँगन में तरतीब से पैदा होते बच्चे बेतरतीब मरते जाते हैं।कोई पहले आया तो अभी भी बिस्तर पर ब्लड प्रेशर की मशीन के साथ अपने को ज़िंदा रखने का झाँसा दे रहा तो कोई देर में आया मगर पहले जाकर खुटका दे गया।ज़्यादा दिन ज़िंदा रहने के यही तो सज़ा है की बहुत सारे अपनों की मौत का ग़म झेलना पड़ता है।

जब मैं कोई बूढ़ा देखता हूँ तो झट से उसके बचपन में पहुँच जाता हूँ।उसके बचपन की शरारतों को कल्पना में उतारता हुआ,अपने बुढ़ापे में चला जाता हूँ।जब कोई नही होगा,तब क्या करूँगा।फिर बेफिक्र हो जाता हूँ की शुगर नापूंगा, ब्लड प्रेशर नापूंगा और हैशटैग को पढ़ता मुस्कुराता रहूँगा,उसपर के कमेंट पढूँगा और गिनूँगा की अब तक कौन कौन कम हो गया,कितने बेहतरीन कमेंट करने वाले अनंतकाल में चले गए।यही गिनते गिनते धड़कन खुद बखुद घट जाएँगी,हमेशा चलने वाला दिमाग रुक जाएगा,पलकें जो हमेशा किसी का इंतेज़ार करती रहती हैं, एक दिन इत्मिनाम से बंद हो जाएंगी और सब कुछ हो जाएगा खामोश,नीम खामोश,शाँत.....