Thursday, April 30, 2020

महिपाल और कोरोनाकाल

हम नही जानते कि हममें और इनमे रिश्ता क्या है । जब ज़माना इनपर फ़ख़्र से मुस्कुराता है, तो इतनी दूर बैठे हुए,हमारे दिल मे तरावट पहुँचती है । लगता है मेरी ही तो बात हो रही है, इनके पाँव में हम खुद को देखने की कोशिश करते हैं । यह सब नौजवान हैं, सब वैसे ही मुश्किलों का सामना कर रहें,जैसे देश के सभी नौजवान कर रहें मगर यह हालात से लड़ने वाले जुझारू लोग हैं । आज जब कोरोना और लोकडाउन ने हमारी जिंदगियों की खुशियां लॉक कर दी हैं, तब यह नौजवान हैं जो अपनी अथाह से कुछ चेहरों पर मुस्कान लाने के लिए उनकी भूख का इंतज़ाम कर रहे हैं ।

यह महिपाल सारस्वत हैं, पेशे से वक़ील हैं और दिल धड़कता है समाज के लिए,खुदाई ख़िदमतगार महिपाल सारस्वत और दीपक शर्मा के यह सभी साथी लूणकरणसर,बीकानेर,राजस्थान में मार्च से ही ज़रूरतमंदों को राशन मुहैया करा रहे हैं । मैं इनमे शामिल बहुत से लोगों को नही जानता हूँ मगर इनके दिलो की धड़कन और प्राणी मात्र की सेवा की ललक को महसूस कर सकता हूँ ।

इनके हाथ जब मदद को उठते हैं, तो उनमें धर्म,जाति, वर्ग का फ़र्क़ नही होता है । यह सच्चे मददगार हर ज़रूरतमन्द तक पहुँचते हैं । यह करोणों खर्च नही कर सकते मगर अपना सर्वस्त्र लगाकर मददगार बन सकते हैं ।

इनकी राशन किट में सामान के साथ इनकी।मोहब्बत गुँथी हुई है, इसमे संवेदनाएं हैं । मैं महिपाल सारस्वत को व्यक्तिगत जानता हूँ । खुद को हमेशा खुशकिस्मत मानता हूँ कि मुझे इस दुनिया मे एक ऐसा शख्स जानता है, जिसका दिल मोम का है और शरीर लोहे का,जिसकी आवाज़ आसमान तक गूंज उठती है मगर रहम इतना कि कॉकरोच भी न मरे,जो राजनीति की तमाम गुत्थियों को सुलझा सकता है मगर मदमस्त गाँव में ज़िम्मेदारियों का निर्वहन कर रहा है । जो कभी अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे नही हटा,जिसे कोई समाज सेवा से डिगा भी नही पाया ।

दीपक शर्मा समेत,हर एक साथी को देखिये,यह सब नौजवान हैं । वही नौजवान,जिनपर हम अक्सर लापरवाह होने के आरोप मढ़ते हैं । हम कहते हैं कि युवा बिल्कुल भी ज़िम्मेदार नही जबकि आज इस मुश्किल घड़ी में युवा ही हैं, जो हिम्मत करके ख़िदमत कर रहे हैं । पूरे देश मे युवाओं की टोली की टोली हैं जो घर घर राशन पहुँचा रही हैं । इन युवाओं के सामने सर झुकाने को दिल करता है ।

मैं गया हूँ लूणकरणसर और एक से एक मेहनती और मोहब्बत से लबरेज़ दिलों को देखा है । यक़ीन होता है कि मां बाप और रिश्तेदार एक दिन फ़ख़्र से कहेंगे कि उनके आँगन में यह शख्सियतें पैदा हुई थीं । यह सब अपने अपने घरों का नाम संसार मे रोशन कर रहे हैं । आज यह सब दुनिया की उस फेहरिस्त में शामिल हो चुके हैं, जो कोरोना महामारी में इंसानियत की खिदमत में लगी है ।
आप सब इनको आशीष दीजिये,दुआएँ दीजिये,प्रार्थना कीजिये कि यह नौजवान और मज़बूत हों,इनके नेतृत्व में हमारे घरों के बच्चे भी सेवा सीखें और हम सब मिलकर कोरोना को भी मिटा सकें और भूख और दूसरी ज़रूरतों को भी पूरा कर सके । यह ही हैं सशक्त भारत की असली तस्वीर,नाज़ है साथियों आपपर, नाज़ है खुदाई ख़िदमतगार पर,नाज़ है लूणकरणसर के हर सेवार्थी पर,आप सबको सलाम दोस्तों...
#hashatg #हैशटैग

Wednesday, April 29, 2020

इरफान खान

करोणों लोग इरफान की मौत पर ग़मज़दा हैं मगर हमे तो वह बीस पच्चीस ट्टपंजुहे ही दिख रहे हैं, जो खुश हो रहें ।।असल मे हम भी उन लोगों को ढूंढते हैं, जो हमारे गम में शामिल न हों और खुशी मनाए । हम उन करोणों लोगों की तरफ से मुँह फेर लेते हैं, जो आँसू बहा रहे हैं ।

ज़रा एकबार अपनी लिस्ट देखिये,अपने दोस्तों की संख्या देखिये की उसमे खुश होने वाले अधिक हैं या गम करने वाले अधिक है, हर हाल में ग़मज़दा लोग बहुत हैं और टटपंजुहे खुशी मनाने वाले गिनती के लोग हैं । सबकी वाल पर वही एक आध बेगैरत के स्क्रीन शॉट टहल रहे हैं, उन्हें करोणों लोग वह नही दिख रहे हैं, जो बेहद अफसोस कर रहे हैं ।

हम बार बार कहते हैं, गटर पर अपना वक़्त बर्बाद मत करो । 130 करोण में मुश्किल से लाख से भी कम गटर छाप मानसिकता के लोग होंगे,उनकी बात ही क्यों करों,गन्दे नाले रहेंगे और बहेंगे,वह भी समाज का हिस्सा हैं, हम बेहतर लोगों की बात करें न ।

और हाँ तुम्हे चीख कर कहना होगा कि जो मौत पर हँसे, वह मुसलमान नही है । जो मृत्यु में अवसर तलाशे वह हिन्दू नही है । इनकी मज़बूती यह है कि यह हिन्दू और मुसलमान की ढाल लिए फिरते हैं, जबकि यह ही अधर्मी हैं । मेरी नज़र में यह ही न मुसलमान हैं और न ही हिन्दू हैं, क्योंकि दोनों बनने के लिए इंसान बनना पड़ता है और यह इंसानियत से खारिज कीड़े मकोड़े भर हैं, इनपर अपना वक़्त बर्बाद मत करो ।

आज मुझे जितना ग़म है, उतना ही सुक़ून है कि दुनिया भर के करोणों लोग इरफान की कला से मोहब्बत करते हुए,बेहद गमगीन हैं । मेरे लिए यह लोग उदाहरण हैं, मैं इन भीगी आंखों की बात करूँगा । मैं इनके टूटे दिलों की आहट महसूस करूँगा । मैं इनके साथ गम में शरीक होकर खड़ा होऊँगा । उनकी बात ही क्या करनी जो इंसान ही नही बन पाए । इरफान ने जता दिया कि इंसानियत से भरा दिल हो और सच्ची योग्यता हो तो ज़माना सर झुका देता है ।

गटर पर ढक्कन डालें और सफर तय करें,जिसे इरफान हमारे लिए अधूरा छोड़ गए,इंसानियत का सफर,मोहब्बत का सफर,संघर्ष का सफ़र...
#hashtag #हैशटैग

Tuesday, April 28, 2020

अखिलेश यादव और कोरोना फाइट

अगर आँख और समझ दोनों आपके पास हैं, तो सच्चाई कभी भी आपसे छिप नही सकती है । लॉकडाउन और कोरोनाकाल में जिस एक कर्मचारी समूह पर सबसे अधिक काम पड़ा है,वह है पुलिस । पुलिस लोगों को रोकने,खाना पहुचाने, मरीज़ लाने, दवा ले जाने समेत हर मोर्चे पर लगी हुई है । जब भी कोई विभाग मुस्तैदी से काम करता है तो उसकी तारीफ भी होनी चाहिए और उसे आधुनिक बनाने वालों की भी तारीफ होनी चाहिए ।

यही पुलिस थी जिसके पास अच्छी गाड़ियां नही थीं, लोगों तक थाने पहुँचने और सीयूजी नम्बरो के सिवा बहुत कम पहुँच थी पुलिस तक,पुलिस का आपस मे कोर्डिनेशन बेहद पिछड़े दर्जे का था । तभी यूपी को एक दूरंदेश मुख्यमंत्री मिला ।

मुख्यमंत्री ने सबसे पहले पुलिस को आधुनिक बनाने की पहल की और देश का सबसे महत्वपूर्ण "डायल 100" जो अब डायल 112 कर दिया गया है, ज़मीन पर उतारा गया । लखनऊ में इस आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित इमारत की नींव पड़ी और हम सबके देखते देखते यह बनकर खड़ा हो गया । इसे चलाए रखने के लिए पुलिसकर्मियों को आधुनिक गाड़ियां दी गईं,जिसमे इंटरनेट से लैस वह लाइव लोकेशन के साथ ज़रूरतमंद तक पहुँच सकते थे । बेहतरीन बाइक्स दी गईं,बढ़िया फोन दिए गए और शानदार ट्रेनिंग दी गई ।

पूरे उत्तर प्रदेश पुलिस का आलीशान पुलिस हेडक्वार्टर बनाया गया । जहाँ से आज मुश्किल घड़ी को आसान बनाया जा रहा है । पुलिस हेडक्वार्टर का ऑफिस देखकर आपको एहसास होगा कि आप यूरोप के किसी देश में हैं, इतना विकसित है यह । यह सारी चीज़ें वही पूरी कर सकता था,जिसकी आंखों में प्रदेश को अग्रणी प्रदेश बनाने के सपने हों,इसे अखिलेश यादव ने पूरा किया ।

आज जो पुलिस इतनी सहूलियत से कॉर्डिनेट कर पा रही है, उसकी बुनियाद इस सोच में है । लोहिया अस्पताल और लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान तो अपनी उपयोगिता सिद्ध ही कर चुके हैं । सैकड़ों काम हैं समाजवादी सरकार के जिसका लाभ हमे आज मिल रहा है । सबने उनके लैपटॉप का मज़ाक उड़ाया,आज जब ऑनलाइन क्लास करवानी पड़ रही,तब हमें समझ आ रही उपयोगिता । यही दूरंदेश लीडर की पहचान होती है, जो मुसीबतों से पहले व्यवस्था कर लेते हैं ।

जब आपके पास आधुनिक उपकरण हों,बेहतरीन मुख्यालय हों,बढ़िया गाड़ियां हों,आधुनिक ट्रेनिंग पाया स्टाफ हो,तब कोई भी व्यक्ति उनसे बेहतरीन काम ले सकता है । हमे पुलिस पर गर्व है कि वह इतनी मुश्किल हालात में अपने कर्तव्य को निभा रही है । अखिलेश यादव होते तो यकीनन हर पुलिसकर्मी के पास कोरोना से सुरक्षा के भी आला दर्जे के इंतज़ाम हो चुके होते,क्योंकि हम उन्हें समझते हैं । वह अपनी ज़िम्मेदारी और दूरदर्शी सोच से समझौता नही करते हैं ।

अखिलेश यादव के कामों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि क्या क्या लिखें,हम तो बस दो ही बातों पर ध्यान खींच रहे कि डायल हंड्रेड और पुलिस हेडक्वार्टर पर ही नज़र दौड़ा लें और सोचें कि अगर यह न होते तो क्या हालात होते हमारे । अखिलेश यादव का शुक्रिया की उन्होंने यह जनता के काम की चीजें अपने पहले ही वक़्त में दे दीं और पुलिस को भी सैल्यूट की उसने इन आधुनिक चीजों का सबसे मुश्किल दौर में बेहतरीन इस्तेमाल किया है । हम सब कोरोना से बचेंगे भी और बढ़ेंगे भी,पुलिस और डॉक्टर्स,पैरा मेडिकल स्टाफ और नर्स,विद्युत और जल निगम,सफाई कर्मी और नगर निगम के सभी लोगों का शुक्रिया जो इस मुश्किल घड़ी में बराबर से अपनी सेवाएं देते रहे ।
अखिलेश यादव से तो आँख फेरना मुमकिन है मगर उनके कामों से आँख फेरना नामुमकिन है । यह समझ तो आएगा ही जिस दिन आप आंख और समझ का इस्तेमाल अपने आप करना सीख लेंगे ।
#hashtag #हैशटैग

Sunday, April 26, 2020

मस्जिद और कोरोना

जो भी अब से पहले सालों में कभी भी रमज़ान में जामा मस्जिद,दिल्ली गया है, वह उसकी उन दिनों की रौनक़ को भूल नही सकता ,दिन रात ज़बरदस्त भीड़ । मगर अब देखिए,एक सन्नाटा पसरा है । वह मस्जिद जो कभी खामोश नही रही,हर हलचल की गवाह बनी,हर आंधी का सामना किया,बंटवारे में बाहर होकर भागते हुए लोगों के लिए छत बनी तो कभी इमरजेंसी में अपनी सीढ़ियों से चीखकर लोकतंत्र की बहाली की दुआएँ करती,आज बिल्कुल खामोश खड़ी है ।

क्या यह खामोशी फ़िज़ूल है, हरगिज़ नही,यह खामोशी गवाह की जब हम दुनिया की एक भयँकर बीमारी कोरोना से जूझ रहे थे,तब रमज़ान में आबाद रहने वाली यह मस्जिद अपने सबसे भरे दिनों में खुद को खाली रखकर फिर एक योद्धा बनी खड़ी है । इसकी खाली सीढ़ियां, सन्नाटे से भरे बरामदे गवाह हैं कि कोरोना में कितना बड़ा त्याग किया है जामा मस्जिद ने,उसमें जाने वालों ने आज एक मिसाल कायम की है ।

आज भारत के हर धर्म ने अपने अपने स्तर पर कोरोना के लिए ज़बर्दस्त मुकाबला किया ।।प्राचीन मंदिरों ने दरवाज़े बन्द किये,मस्जिद और मज़ारों ने  अपने दर ओ दीवार वीरान कर लिए,गिरजाघर और गुरुद्वारों ने खुद को समेट लिया,सबने मिलकर मुकाबला किया मगर कुछ लोगों को मुट्ठीभर ही लोग दिखाई देते हैं, जिनको वह चीख चीख कर बताते हैं कि देखिये इन धार्मिक लोगों को,लॉकडाउन तोड़ दे रहें । 

130 करोण की आबादी हैं हम,कुछ लोग होंगे जो गम्भीरता नही समझ रहें,कुछ हैं जो धर्म की आड़ लेकर निकल रहे होंगे मगर आप देखिए,एक बहुत बड़ी आबादी खुद को क़ैद किये हैं । महीनों से क़ैद,क्या इसकी कोई अहमियत नही है ।

क्या जामा मस्जिद की खाली सीढ़ियों की कोई अहमियत नही है । हमारा और दूसरों का घरों में महीनों से बन्द रहना कोई अहम काम नही है क्या,कुछ लोग होंगे जो गलती कर रहें मगर क्यों हम सबको कठघरे में खड़ा करते हैं । क्यों नही हम आँख खोलकर उनको देखते हैं, जो जूझ रहे हैं ।

मेरा सर श्रद्धा से झुक जाता है मुसलमानों के सामने,जब उनकी खाली मस्जिदें देखता हूँ,तराबी के लिए उनको भागते हुए नही देखता,अफ्तार को घरों तक सीमित करते देखता हूँ,जो तीन जुमे की नमाज़ न पढ़ने पर खुद को मुसलमान नही मानते थे,उन्हें एक के बाद एक जुमा घर पर पढ़ते हुए देखता हूँ तो दिल उनके पाँव में झुका चला जाता है ।

नवरात्र,बैसाखी,सब तो गुज़रते देखा,कन्या पूजन को यूँ सन्नाटे में बीतते देखा,मंदिरों की घण्टियों को खामोश टँगी देखा,शाम को लगने वाली श्रद्धालुओं की क़तारों को खत्म होते देखा, बताओं इनके सम्मान में झुकूँ या न झुकूँ ।

हम फिर कह रहे कि कुछ मुट्ठीभर लोग गलतियाँ करते होंगे मगर आप मक्खी तो मत बनिये की ढूंढकर सिर्फ गन्दगी पर बैठिए । सिर्फ कमियों को उछालिये और असंख्य लोगों की कुर्बानी भुला दीजिये । मधुमक्खी बनिये,ढूंढकर अच्छी चीजों पर बैठें,उनका ज़िक्र करें और शहद बनाए ।

तब्लीगीयों को कितना कोसा गया,जेहादी,आतंकवादी न जाने क्या क्या नही कहा लोगों ने मगर अब कोई उनके प्लाज़्मा दान करने को,खून देने को नही देखता है । सैकड़ों तब्लीगी अपना खून और प्लाज़्मा दे रहें,कोरोना मरीजों को ठीक करने के लिए मगर यह हमें नज़र नही आएगा क्योंकि हम मक्खी हो चुके हैं ।

हम मानते हैं गलतियाँ होती हैं, इंसान ही हैं, हम सब,गलतियाँ होंगी अगर गलती नही करेंगे तो देवता हो जाएँगे । अगर हम वाक़ई इंसान हैं, तो हमे गलतियाँ भुलाकर उनकी अच्छाइयों को भी देखना चाहिए ।

रमज़ान में जामा मस्जिद की खामोशी और अधिक पवित्रता का एहसास दे रही है, तमाम मंदिरों में पसरा सन्नाटा और आध्यात्मिकता का बोध करवा रहा है । यह सारा त्याग याद रखे जाने लायक है और इसका सम्मान भी करना चाहिए । यह बता रहें कि हम अंदर से बहुत अंदर से आज भी एक ही हैं, मानवता के लिए एक हैं ।
#hashtag #हैशटैग

Friday, April 24, 2020

इंसान और कोरोना

अभी दो तीन दिन पहले लखनऊ में अपोलो हॉस्पिटल जाना हुआ था । पूरे एक महीने बाद घर से बाहर कदम रखा,रास्ते मे दो तीन जगह पुलिस मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी कर रही थी । रास्ते भर हम खाली सड़कें,सूने पार्क और सन्नाटे में डूबे रिवर्ट फ्रंट और मुँह बाए खड़े होटल्स को देखते रहे । उन स्कूलों पर भी नज़र गई जिनके बाहर से निकलना दुश्वार रहता था,इतनी भीड़ होती थी मगर अब सन्नाटा ।

सब कुछ पहले जैसा ही था,बस नही रह गए तो लोग । यानि सब है बस बहार नही है, यह बहार ही तो इंसान हैं । जो सड़के गुलज़ार थीं, जो पार्क चहकते थे,जो होटल दमकते थे,जो स्कूली इमारतें बात करती थीं, सब खामोश थीं, जानते हैं क्यों,क्योंकि इनमें अब इंसान ही नही रह गए,यानि इनकी आत्मा नहो रही ।

जब अपने शहर की इंसानों से खाली तस्वीर को देखिये,तब सोचिए कि इंसान कितना जरूरी है । बिना इंसान के सब बेजान है, बेरौनक है । पृथ्वी बाकी ग्रहों से इसी लिए सुंदर है क्योंकि इसमें इंसान के पाँव टिकते हैं ।

जब आप इंसान से उसके धर्म,जाति या क्षेत्र के आधार पर नफरत करते हैं और चाहते हैं यह सब खत्म हो जाए,तब आप अपने अंदर बाहर ऐसे ही सन्नाटे को तो दावत दे रहे होते है । सोचिए इंसान कोरोना से घरों में कैद है, सड़के,पार्क,ऑफिस उस इंसान की आहट पाने को बेचैन है, जो सालभर उनके सीने पर मूंग दलता है । होटल,पार्क,स्कूल सब मुँह लटकाए एक अदद इंसान को देखने को बेताब हैं, क्योंकि वह जानते हैं, उनकी रौनक तो इंसान से ही है । इसपर भी बहुत से मूर्ख इंसान की अहमियत नही समझ रहें और घर बैठे अपनी तरह न दिखने वाले इंसानों पर ज़हर उगलने को बेताब बैठे हैं । यह मूर्ख ही हैं, जो सामने दिख रहे सन्नाटे में भी अपने लिए सन्नाटे की भीख माँग रहे हैं ।

सब कुछ इंसान बिना फीका है, इस अहम सन्देश को समझिये और इंसान को बनाए रखने पर काम कीजिये । मैं ज़िन्दगी भर अपने शहर लखनऊ पर तारी बेबसी,मायूसी और बेरौनक आँखे नही भूल पाऊँगा क्योंकि हमने अपने शहर को बहुत चहकते,मुस्कुराते और ठहाके मारकर लोटपोट होते देखा है । मुझसे उसकी इंसानों से खाली बेचारगी नही देखी गई,आँसू भर आए आँखों में की क्या अब भी लोग नही समझेंगे की बहुरंगी इंसान कितने ज़रूरी हैं । मुझे इंसानों से खाली इमारतों,सड़को,स्कूलों की तस्वीरें कचोटती हैं । मुझे तो भीड़ भाड़ से भड़ी सड़कें ज़्यादा आकर्षित करती हैं, क्योंकि उनमें मेरे जैसे असंख्य इंसान चल रहे होते हैं ।

ईश्वर से प्रार्थना की कोरोना संकट जल्द से जल्द खत्म हो । हमारे वैज्ञानिक इसका तोड़ निकाल लें और हम एक बार फिर रिक्शों पर लदे बच्चों को रोते हस्ते स्कूल जाते देख पाएँ । लॉकडाउन में भी जो इंसान की अहमियत न समझ सकें उसके अंदर तो इंसानियत वैसे भी संदिग्ध है । सभी इंसानों से मोहब्बत करना सीख लीजिये वरना बहुत अकेले रह जाएँगे, इतना अकेले की बहते हुए आँसू देखने वाला भी कोई नही होगा,आँसू पोछना तो दूर की बात...
#hashtag #हैशटैग

Monday, April 20, 2020

लिंचिंग के विरुद्ध उपवास

भीड़ कह रही थी कि मरियम दुष्चरित्र हैं, मगर 6 महीने का बच्चा ईसा भीड़ के विरुद्ध अपनी माँ की पवित्रता की गवाही देता है, जिससे न्याय स्थापित होता है ।

भीड़ गवाही दे रही थी कि यूसुफ गुनहगार हैं और ज़ुलैख़ा पीड़ित हैं मगर एक यूसुफ की पीठ के फटे कपड़े भीड़ को गलत ठहराकर बताते हैं कि ज़ुलैख़ा गलत थीं, यूसुफ निर्दोष और यहीं भीड़ से हटकर न्याय स्थापित होता है ।

देवदत्त के तीर से ज़ख़्मी परिंदे पर भीड़ देवदत्त के साथ खड़ी कह रही थी कि मारने वाले का इस परिंदे पर हक़ है, मगर एक सिद्धार्थ की दयालुता और सत्यता पर राजा शुद्धोधन कहते हैं कि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा है, भीड़ के विरुद्ध यहाँ न्याय स्थापित होता है ।

सुकरात की बात को गलत ठहराकर वह भीड़ ही थी,जो ज़हर का प्याला दे रही थी । उस एक सुकरात ने मरकर यह बतला दिया कि उस दिन वह भीड़ गलत थी और सही था,अकेला खड़ा सुकरात ।

कौरव की भीड़ ही द्रौपदी को भरी राजसभा रुसवा कर रही थी कि एक कृष्ण ही उस भीड़ के विरुद्ध द्रौपदी की रक्षा करके न्याय स्थापित करते हैं ।

अफ़्रीका में भीड़ ही थी जो गाँधी को खट्टे सेब के पेड़ पर फाँसी पर लटकाना
 चाहती थी,मगर वह एक व्यक्ति गाँधी ही था जिसने सच का साथ देकर न्याय को स्थापित किया ।

जानते हैं यह क्यों कह रहें हैं, क्योंकि जान लीजिए भीड़ हमेशा सही नही होती है । भीड़ बहुमत तो दे सकती है मगर न्याय नही दे सकती है । भीड़ हत्या को सही तो ठहरा सकती है मगर न्याय नही कर सकती है । भीड़ कभी भी धर्म स्थापित नही कर सकती,हाँ अधर्म की स्थापना भीड़ से ही होती है । भीड़ वह होती है, जिसमे सर तो असंख्य हों मगर मस्तिष्क सिर्फ एक हो,भुजाएँ तो असंख्य हों मगर उनके इस्तेमाल केवल एक हो,ऐसी भीड़ से हमेशा बचो,जो तुम्हे सोचने समझने की शक्ति छीन ले ।

इधर फिर एक भीड़ ने फैसला किया और तीन निर्दोष को अपनी उत्तेजना,मूर्खता और हिंसा की बलि चढ़ा दिया । हम इस हिंसक भीड़ के विरुद्ध और उन निर्दोष आत्माओं के सम्मान में आज उपवास पर रहेंगे । आज मेरा उपवास मेरी प्रतिज्ञा भी है कि चाहे असंख्य लोग गलत और झूठ बात के साथ खड़े हों जाएँ, हम अकेले ही सही मगर सत्य के साथ खड़े रहेंगे,भले मार दिए जाएं,यह हमारे पूर्वजों की हमे सीख है । आज उपवास में हम माँग करेंगे कि ऐसी भीड़ के खिलाफ कठोर कानून बने ताकि फिर कोई भीड़ किसी इंसान को अपने हाथों में कानून लेकर मिटाने न निकल सके । मेरा हिंसक भीड़ के विरुद्ध आज का उपवास उन तीनों मृतक आत्मा की मेरी तरफ से श्रद्धांजलि है ।
#hashtag #हैशटैग

Wednesday, April 15, 2020

चार्ली चैप्लिन

पहली तस्वीर को पहचान लीजिये। यह वोह चेहरा है जो हैरान परेशान लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने में कहीं छुप गया ।हमारे ज़ख्मो पर मरहम रखता रखता गुम हो गया ।हमे हमारे मतलब का चेहरा याद रह गया।इनसे सीखें की कैसे तलवार उठाए बिना,चीखें चिल्लाए बिना भी अपने अंदर छुपे हुनर से बड़ी से बड़ी सल्तनत को जवाब दिया जा सकता है। महसूस कीजिये कैसे किसी दर्द में डूबे दिल को मुस्कान की छाँव में लाया जा सकता है।जब ज़ुल्म इन्तेहा कर जाए तब वह एक रास्ता बनाते हैं। जब इंसानियत टुकड़ो टुकड़ों में बट जाए तब उनके जैसे किरदार खुद को मिटाकर टूटे दिलों को जज़्बात से जोड़ते हैं।

यहाँ तक हमे हमारे ग़म भुलाने के लिए इन्होंने जो चेहरा अपने खूबसूरत चेहरे पर ओढ़ लिया,मैं सोच कर हैरान हूँ की वह किस तक़लीफ़ से गुज़रे होंगे। उस चेहरे को अपनाना जिस चेहरे के विरुद्ध ही लड़ाई हो,बड़े जिगरे का काम है। उस मुखौटे को ओढ़ लेना,जिससे नफरत ही नफरत हो,कितना जिगरे का काम है ।जब आईने में अपनी सूरत देखते होंगे तो किस क़द्र दिल रोता होगा,मगर हर आँसू को ज़ब्त करके वह हमारे डूबे हुए दिलों को पार लगाते हैं ।

सबसे बड़ी बात तब और अब में है,उस वक़्त उनका जो दुश्मन था उसके मुकाबले का खूँखार आज कोई भी नही है मगर आज मैं अपने विरोधी का चेहरा तो छोड़िये नाम लेकर भी मज़ाक कर दूँ,तो टुकड़े टुकड़े कर दिया जाऊँ। कल जब वह मज़ाक करता था, तो जनता उनमे अपने दर्द देखती थी, आज दुनिया के किसी भी कोने में नेता का विरोध कीजिये तो आपके साथ कम लोग ही खड़े होंगे ।हाँ अगर कहीं  किसी दिमागी पिछड़े हुए देश में आपने उनके नेताओं की अक्षमता,क्रूरता,धूर्तता पर सवाल किये तो कहिये भीड़ आपको खींचकर ही मार डाले।पकड़ कर सलाखों में डाल दिया जाए।

आज 16 अप्रैल को अपने चार्ली चेपलिन के जन्मदिन पर याद कर लीजिये। मेरे तो इर्द गिर्द वही हैं,हो सके तो उनके उन किस्सों को याद कीजिये जिसमे वोह युद्ध के विरुद्ध या युद्ध में लोगों को मायूस न होने के रास्ते बुन रहे थे। आज एक बार फिर दुनियाभर में गुस्से और बदले की आग से भरे हुए लोग उभर आए हैं, आज फिर चार्ली बेहद अहम् हो गए हैं।हिटलर के विरुद्ध चार्ली चैप्लिन के विरोध का तरीका भी जानना,बताना और पढ़ाना चाहिए ।

यह भी देखिए चार्ली चैप्लिन भारत के किस शख्स के सामने सर झुकाने को तैयार थे,वह कौन भारतीय था जिसके लिए चार्ली चैप्लिन का दिल मोहब्बत से भर उठता था,जिसका किरदार चार्ली को रास्ता दिखाता था । जिससे मिलने में दुनिया के मशहूर एक्टर के चेहरे पर पसीना था कि।पता नही वह मिले भी या न और मिले तो क्या कहें । जब वह उनसे मिले तो माहौल ने इतना अपनापन ओढ़ लिया कि चार्ली ने सवाल किया कि आप मशीनों के खिलाफ क्यों हैं, उधर से जो उत्तर आया, उसे खुद खोजकर जानिए,क्योंकि उसने ही चार्ली को आगे का रास्ता दिखाया । चार्ली जिनको देख भर पाना चाहते थे ज़ाहिर है, वह एक ही महान आत्मा थी हिंदुस्तान की,मोहनदास करम चंद गांधी महात्मा गांधी । चार्ली और नेहरू की मुलाकात भी अहम है मगर इतना जानिए दुनिया की बड़ी शख्सियतें हमेशा एक दूसरे की इज़्ज़त करती थीं,जो अब नही रहीं,अब बड़े भव्य भव्य चमकदार झमकदार छोटे छोटे दिल के लोग ज़्यादा रह गए हैं,ऐसे में चार्ली को याद करना और ज़रूरी हो जाता है । आज जन्मदिन है, ढूंढिए,देखिये,पढ़िए और अपना रास्ता खुद बनाइये ।
#हैशटैग #hashtag

Sunday, April 12, 2020

जलियांवाला बाग

कुछ लोग थे जो चाहते थे की उनकी हर साँस पर पहरा न बैठाया जाए । चाहते थे की उन्हें उनके मुल्क में सरकार जब चाहे बिना वजह गिरफ्तार करने के घिनौने मंसूबे छोड़ दे । वह जानते थे की जिस दिन उनकी साँस पर पहरा बैठा दिया जाएगा उस दिन आज़ादी का ख्वाब चकनाचूर हो जाएगा । बिना वजह गिरफ्तारितयों को अगर मंजूरी मिल जाएगी तो शासक ज़ुल्म की इंतहा कर देगा । निरंकुशता चरम पर होगी,यह कोई एक वर्ग नही,कोई एक धर्म ने बल्कि पूरा भारत सोच रहा था,वह भारत जो अपने अधिकारों के प्रति जाग गया था,जिसे केवल कर्तव्य की नींद की गोली देकर अब सुलाया नही जा सकता था ।

ज़ाहिर है यह रौलट एक्ट की कहानी थी,जिसके खिलाफ महात्मा गाँधी अपने साथियों संग जूझ रहे थे । इसी कड़ी में उनके अहम साथी और आज़ादी की लड़ाई के तमाम हीरो में से एक डा सैफुद्दीन किचलू और डा सतपाल गिरफ्तार कर लिए गए । इन्हें गिरफ्तार करके कहाँ रखा गया किसी को पता नही,अजब बेचैनी का माहौल । स्वर्ण मन्दिर के पास ही एक जगह इसका विरोध रखा गया । लोग अपने लीडर्स की रिहाई और काले कानून को तोड़ डालने के लिए इकट्ठे होने लगे । उस जगह का नाम था जलियाँवाला बाग़ 

करीब बीस पच्चीस हज़ार लोग जलियाँवाला बाग़  में इकट्ठे हुए और उनकी मांग थी की बिना शर्त डा सैफुद्दीन किचलू को रिहा किया जाए । दिनभर चले इस धरने को रोकने के लिए ब्रिगेडियर डायर को भेजा गया  ।जब शाम हो चली तो डायर सैनिक लेकर जलियाँवाला बाग़  की तरफ चल पड़ा । यह ऐसी जगह थीं जहाँ से निकलने का एक ही रास्ता था । वहीं उसी रास्ते पर फ़ोर्स लगाकर अन्धाधुन गोलियां चलवा दीं । देखते ही देखते पूरा मैदान लाशो में बदल गया ।  हम यह नही कहेंगे की तुम इसे सोचकर दर्द से चीखने लगो ।न कहेंगे की बहुत अफ़सोस करो । बस इतना कहेंगे की जलियाँवाला बाग़  को भूलो मत । देश लम्बे वक़्त से जो मांग कर रहा था की अँगरेज़ उससे जलियांवाला बाग के लिए माफ़ी मांगे । आखिर ब्रिटेन ने देश से जलियाँवाला बाग़ कांड के लिए माफ़ी मांग ली । कैमरून 2013 में ही इसकी भत्सर्ना लिखकर गए थे,जिससे उनके माफी मांगने का रास्ता बना ।

अब सोचिये की जो लोग शहीद हुए थे उस दौर में,वह भी किसके लिए,हमारी आज़ादी और डा सैफुद्दीन के लिए । एक मैदान के अंदर उन्होंने शहादत तो चुनी मगर धर्म के नामपर बँटना  नही चुना । लाशो में बिखर जाना तो पड़ा मगर दिल ओ दिमाग से एक होना चुना । वह जो जलियाँवाला बाग़ में खून बहा था वह हिन्दू,सिख,मुसलमान का नही था ,असली भारत का खून था । जिससे तड़पकर पूरा देश एक हुआ था । हम कितने बेगैरत लोग हैं जो जरा जरा से फायदे और बहकावे में आकर आपस मे बंटने लगते हैं । वह कितने घिनौने और देशद्रोही लोग हैं जो हिन्दू और मुसलमान को नफरत में बाँटकर अपने लिए चमकता रास्ता बनाते हैं । हम क्यों नही कहते की हम डा किचलू और डा सत्यपाल के लोग हैं । जलियाँवाला बाग़ में शहीद हुए खून की उपज हैं हम भारतीय । 

आजका दिन याद रखो या भूल भी जाओ मगर यह हमेशा याद रखना जो भी,हाँ जोभी हिन्दू और मुसलमानों को बाँटने की बात करे,वह जनरल डायर के लोग हैं । जो भी अली और बजरंगबली में फर्क करके आपस मे नफरत करके चलने को कहे वह डलहौजी के लोग हैं । जो भी केवल हिन्दुओं को कोसे या केवल मुसलमानों को कोसे वह सांडर्स के लोग हैं । कुल मिलकर यह वही लोग हैं जो आज़ाद भारत का ख्वाब नही देखते थे,बल्कि गुलाम भारत का ही ख्वाब देखते थे । बस फर्क इतना था की देश इनके हाथ का गुलाम बन जाए, इनका यह ख्वाब इस देश के संविधान ने चकनाचूर कर दिया ।

जलियाँवाला बाग़ सामने रखो और हमेशा सतर्क रहो । पता नही कब कौन जनरल डायर बनकर साथ मिलजुलकर प्रेम से चलने वालों को लाश का ढेर बना दे । जलियाँवाला बाग़ में हुए हर शहीद के सामने सर झुकाकर कहता हूँ की आपके ही रक्त से उपजे हुए आजाद भारत का नागरिक हूँ । अपनी आखरी साँस तक आपके दिए एकता,प्रेम,न्याय,भाईचारा और सहिष्णुता जैसे मूल्यों की रक्षा करूंगा । सभी शहीदों को नमन,अपनी शहादत हमारे लिए एकजुट रहने की मशाल है, जो सदा जलती रहेगी
#हैशटैग #hashtag

Saturday, April 11, 2020

ईस्टर

और ईसा मसीह दोबारा जीवित हो गए । परसों ही तो सबने उन्हें क्रॉस पर झूलते देखा था । हाथों में धँसी कीलें और सर पर लगे कांटो के मुकुट में झूलते सर को देख सब धुंधला गया जब ईसा आज जीवित हो गए । यह तो तय ही था कि उन्हें आना था । तमाम दर्द और रुसवाई के बाद ही तो नया जीवन शुरू होता है, यह भी तो एक संदेश हमारे बीच आना था ।

ईसा मसीह ने ज़िन्दगी में सेवा का मंत्र फूक दिया और कहा मानव की सेवा ईश्वर की सेवा है । जिसके दिलों में ईसा थे,उसके जिस्म सेवा के लिए झुक गए । जिसको जो रास्ता नज़र आया उसने उससे मानवता की सेवा शुरू कर दी । ज्ञान,विज्ञान,संस्कृति,राजनीति हर दरवाज़े मानव की सेवा के लिए खुलने लगे । ईसा का संदेश संसार मे गूंज गया ।

जब शुक्रवार को उनके जिस्म में कीलें ठोकी जा रहीं थी किसने सोचा था, वह शरीर जिसको दर्दनाक मौत दे दी गई हो,उसमें पले विचार पुनः जीवित हो जाएंगे । रविवार को जब ईसा ने आँख खोल दी तो ईस्टर का जन्म हुआ । सब तरफ खुशियां दौड़ गईं । हर एक को लगा कि ईसा अब हमेशा उनके बीच रहेंगे,वह अमर हो चुके,अब हमेशा हम सबका ख्याल रखेंगे,हिफाज़त करेंगे,ख़िदमत करेंगे ।

ईसा ने उन तीन दिनों में वह मन्त्र दे दिए जिससे वह मानव जाति के रहते जीवित रहने का रास्ता दे गए । एक विचार दे गए,वह जानते थे शरीर आते जाते रहेंगे,विचार नही मरेंगे । सेवा के विचार को उन्होंने जब दिया,तो हर एक मे खुद बंट गए । जिसके हृदय में सेवा होगी उसमे ईसा होंगे ।

ईस्टर मनाइए,समझिए । हर धर्म को समझना चाहिए,उसके मर्म को समझना चाहिए । जो एक झटके में अपने धर्म के सिवा सब नकार देते हैं,वह नकारे लोग हैं । यह अपने दिमाग को मेहनत करने नही देना चाहते । उनका दिमाग सुस्त और काहिल है । हर धर्म के त्योहार जानो,क्योंकि यह उस धर्म की खिड़कियाँ हैं । इससे धर्म की खूबसूरती दिखती है ।ईस्टर मनाओ और हर एक कि सेवा के लिए दरवाज़े और दिल खोल दो । इस मुश्किल भरे हालात में भी सारी दुनिया  को हैप्पी ईस्टर ,कोरोना के बाद हम नए संसार मे प्रवेश करेंगे,उम्मीद कीजिये,नया संसार सहयोग और प्रेम पर हो,क्योंकि तभी मानव सभ्यताएँ बढ़ती हैं अन्यथा नष्ट हो जाती हैं ।
ईस्टर सन्देश है कि आने वाली सुबह खूबसूरत ही होगी बशर्ते दिलों में प्रेम,सेवा,सहयोग,संवेदना और त्याग का भाव हो,आप सबको यह गुण मिलें और ईस्टर में ईसा का आशीर्वाद पूरी मानव सभ्यता पर रहे...
#हैशटैग #hashtag

Friday, April 10, 2020

कस्तूरबा

इस जगत में गाँधी जैसी वैचारिक आंधी पर जिसने काबू पाया,वह हैं केवल कस्तूरबा । गाँधी को अपनी प्रतिज्ञा से जिसने एक इंच भी इस संसार मे खिसकाया है, वह हैं केवल कस्तूरबा । जो इकहरा शरीर दुनिया की सबसे बड़ी हुक़ूमत ब्रिटेन की महारानी के सामने भी अपने उसूल पर टिका रहा,वह लरज़ा भी तो केवल कस्तूरबा के आगे ।  गांधी के बनने की साक्षी,उनके अन्तर्द्वन्द को देखने की साक्षी,उनकी गलतियों को बर्दाश्त करने वाली और अच्छाइयों पर रीझ जाने वाली काया का नाम है, कस्तूरबा ।

आज कस्तूरबा का जन्मदिन है,गाँधी होते तो घर मे लगे फूल पत्तियों से और कुछ मीठा बनाकर कस्तूरबा को रिझाते,शरारत करते कि तुम्हारा बुढ़ापा और जन्मदिन,कस्तूरबा मीठा खाने को लपकती तो कहते,देखो कितने लोग आज भी भूखे हैं, कस्तूरबा मुँह मोड़ लेती,गांधी फिर लपक कर उन्हें खिलाते,यह मोहब्बत ऐसी मोहब्बत थी,जो दुनिया के महापुरुषों में कम ही देखने को मिलती है ।

गाँधी अपनी कस्तूरबा को बराबर बैठाना चाहते थे,कस्तूरबा थीं कि हमेशा सीख सिख कर बराबरी पर बैठ जाती,जहाँ गांधी अनिर्णय की स्थिति में होते,वहां कस्तूरबा गांधी को निर्णय पर ले आती ।

बच्चों को पालना,उनके दर्द को सहना,उनकी पढ़ाई और उन्नति की फिक्र साथ ही गांधी की अनिश्चित ज़िन्दगी से तालमेल बैठाना और आज़ादी की लड़ाई भी लड़ना,जेल जाना और साथियों की फिक्र भी करना,जैसे गांधी बनना असम्भव है, ठीक वैसे ही आज कस्तूरबा बन पाना भी असम्भव ही है ।

बिल्कुल भी पढ़ी लिखी नही,अंग्रेज़ी क्या,हिंदी ही नही आती,साउथ अफ्रीका अकेले दो छोटे बच्चों के साथ चल दीं, अपने गांधी के बुलावे पर,इतना लंबा सफ़र, बच्चे और बात करने की समस्या,उसपर भी जब जहाज़ रुका तो गाँधी लेने नही आ सके,मिले हुए पते को ढूंढकर उनतक पहुँची,फिर गांधी का ऐसा सहारा बनी की दुनिया ने पहला गांधी आश्रम देखा । महात्मा गाँधी के हर आश्रम की वह जान थीं, चाहे फीनिक्स आश्रम हो,चाहे साबरमती,चाहे चंपारण,चाहे सेवाग्राम । सबकी रूह,सबका आध्यात्म कस्तूरबा ही थीं । पोरबंदर और राजकोट से गाँधी के साथ चली कस्तूरबा ज़िन्दगी के हर उतार चढ़ाव देखती आगा खां पैलेस में अपने गाँधी के सामने ही आखरी सांस लेकर संसार से विदा हो गईं । गांधी रोए,कस्तूरबा को नहलाया और उसी आगा खां जेल में थोड़ी सी लकड़ियों पर सुला कर शरीर को उसके अंतिम गंतव्य तक पहुँचाया । कस्तूरबा चली गईं और दुनिया की नज़र में समूर्ण गाँधी, अपनी नज़र में अधूरे रह गए ।

आज बा का जन्मदिन है । किस्सों की भरमार है, उनका हर कदम एक किस्सा था,एक सबक था । जो सन्देश जीवनभर कस्तूरबा ने दिया,वह था,जज़्बा,पढ़ाई लिखाई भले न हो,स्वस्थ शरीर भले न हो,परिवार का सुख भले न हो,दौलत भले न हो,अच्छा खाना भले न हो,कपड़े भले न हो,मगर प्रेम और स्नेह के साथ दिल मे जज़्बा हो कुछ करने का तो पहाड़ भी दरक जाते हैं । कस्तूरबा ने यह करके दिखलाया । आज होना तो यह चाहिए बा के सामने श्रद्धा और कृतज्ञता से झुक जाना चाहिए,मगर लोगों को मालूम तो हो,उन्हें बताइए ताकि अपनी बा के साथ साथ महान कस्तूरबा को नमन तो कह सके,सलाम बा ।
#hashtag #हैशटैग

Thursday, April 9, 2020

रामकृष्ण द्विवेदी जी और क्रांति कुमार जी

दो मित्र, दो कॉंग्रेसी, दो मुखर व्यक्तित्व, दो योद्धा और एक साझा इतिहास । बाएं ओर रामकृष्ण द्विवेदी जी हैं और दाई तरफ क्रांति कुमार जी । ताउम्र दोनों साथ रहे,चप्पलें घिस डाली काँग्रेस को जिलाए रखने में,अभी साल भी नही हुआ,गुज़री सर्दियों में क्रांति कुमार जी इस मित्र को अकेले छोड़ गए थे । मित्र रामकृष्ण जी को कहां विरह बर्दाश्त,आज वह भी इस ठहरी हुई दुनिया को छोड़कर अपने मित्र से जा मिले । चार पाँच महीने में दोनों मित्र अनन्त की ओर चले गए और रह गईं केवल यादें ।

रामकृष्ण द्विवेदी जी का जाना एक भरे पूरे इतिहास का गुज़र जाना है । जिसने भी पुरानी कांग्रेस के पर्दे उठाए हैं, उसमें कुर्सी पर बैठे रामकृष्ण जी ज़रूर दिखाई दिए होंगे । बिना उनके काँग्रेस की दो सफे भी लिखना मुश्किल होंगी ।

मेरे लिए कष्टकारी था जब पिछले दिनों काँग्रेस ने उन्हें निष्कासन का पत्र थमाया,रामकृष्ण जी के लिए तो पीड़ा थी ही मगर खैर हुआ कि राष्ट्रीय शीर्ष नेतृत्व के दबाव में मृत्यु से पहले उनका निष्कासन खत्म किया गया और ससम्मान अपने बुजुर्ग को अपनी चौखट पर आखरी सांस लेने दिया गया ।

मेरी बातें अधूरी रह गईं । Surendra S Rajput जी से किये वादे भरभरा के ढह गए । रामकृष्ण जी और क्रांति जी से दर्ज करने वाली इतिहास की बातें उनकी आखरी सांस के साथ ठहर गईं । जीवन भर अफसोस रहेगा कि इतिहास जो लिखा जा सकता था,उसे लिखने से हम चूक गए । रामकृष्ण जी का जाना मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है कि हम जिये हुए इतिहास से समृद्ध हो सकते थे,मगर गरीब ही रह गए । काँग्रेस और उसके नए लोग पलट कर देखें कि इतने शानदार जीवन के तमाम उतार चढ़ाओ के साथी अच्छे बुरे वक्त में साथ तो खड़े थे,अब नही रहे । इनकी ज़ुबान साफ और खरी थी मगर वफ़ादारी इनमे इतनी पैबस्त थी कि आखरी सांस तक अपनी चौखट पर ही बैठे ।
कुछ संस्मरण हैं, जो लिखेंगे,कभी न कभी कह देंगे मगर एक वृहद बातचीत,दर्ज होने वाला इतिहास लिखने से रह गया,इसका मलाल ताउम्र रहेगा । श्रद्धांजलि लिखते हुए उंगली और मन दोनों कांप रहें,मगर क्या कहे,बस रामकृष्ण द्विवेदी जी,नमन,ॐ शांति !
#hashtag #हैशटैग

Monday, April 6, 2020

टीवी ही नही हर जगह से दूर रहो

मेरे एक जानने वाले थे,वह घर मे टीवी नही लगाए थे । कहते थे टीवी देखना गुनाह है मगर महंगे फोन रखे थे,उसमे गाने,वीडियो वगैरह देखा करते थे । अब कौन बताए कि इसी पर मुहावरा है, गुड़ खाएँ, गुलगुले से परहेज़ । यह मूर्खता ही तो है ।

ख़ैर इस बात से इशारा करना यह था कि जितने लोग भी इस दंगाई मीडिया और फ़सादी प्रचारकों से आजिज़ हैं । वह अक्सर कहा करते हैं कि वह न्यूज़ चैनल नही देखते मगर सिफत देखिये,इन न्यूज़ चैनल की कोई ख़बर उनकी आँखों से ओझल भी नही होती । अरे यह टीवी पर न देखने और सोशल मीडिया पर आंखे फाड़ फाड़ कर देखना उपरोक्त उदाहरण जैसा ही है ।

न्यूज़ नही देखते मतलब नही देखते । अंजना,अभिसार,सुधीर,रजत,रुबिका,पुष्पेंद्र जैसे प्रचारक क्या कर रहें,आपको मालूम ही नही होना चाहिए । किसने आपसे कहा कि आपको सब जानकारी मालूम होनी चाहिए । हमें गटर की जानकारी की आवश्यकता ही नही है, जिसे हो वह गटर में कूदे या कूदने का पैसा पाता हो,आपको मीडिया जैसे गटर की जानकारी रखने की क्या ज़रूरत है ।

मगर नही,आपको ट्विटर पर उन्हें पढ़ना है, फेसबुक पर उनको ढूंढना है, यूट्यूब पर उनके वीडियो देखने हैं फिर दिनभर गरियाना है । अरे यार जिसको देखना ही नही है, उसकी बात में वक़्त क्यों बर्बाद कर रहे हैं । उन्हें गंदगी,नफरत फैलाने के अलावा कुछ नही आता । वह बार आपको बतलाते हैं कि देखो जब हमारे पास हिन्दू मुसलमान एजेंडा नही होता है, तो हम खलिहार अंताक्षरी खेलते हैं ।

इनको मत देखिये,कहीं मत देखिये,इनपर बात भी मत कीजिये समझिये समाज की ऐसी गंदगी है यह जिसपर जितना बात की जाएगी,वह उतना फैलेगी । अपने परिवार,अपने भाई बहन,गरीब गुरबाओं,कमज़ोरों, परेशानहाल लोगों की तरफ दिमाग लगिये,उनकी मदद कीजिये । न हो सके तो अच्छी किताबें पढ़िए । दुनिया के बेहतरीन इंटरविव सुनिए,साइंस की स्टोरी पढ़िए,नए रिसर्च जानिए,जो नही आता है उसे सीखिए मगर ईश्वर के लिए उस तरफ से हट जाइये,जिधर से खर्च होने के सिवा हासिल कुछ न हो ।

मीडिया में अगर बहुत दिलचस्पी है, तो कुछ लोग बेहतर काम कर रहें,उनको पढ़िए । तमाम अखबारों के सम्पादक हैं,पत्रकार हैं उनको पढ़िए,सुनिए,उनकी बात कीजिये । इससे अच्छा मौका भले क्या होगा उन रिपोर्टर को पढ़ने समझने का जो ईमानदारी से पत्रकारिता कर रहे हैं । मैं बीसों ऐसे पत्रकारों के नाम गिना सकता हूँ जो वाकई ऐतिहासिक काम कर रहे हैं, उनको देखिये ।

पी साईनाथ तो एक नाम है, सैकड़ों हैं, खोजिए,उनपर बात कीजिये । कहाँ इन फ़ालतू लोगों पर ध्यान लगाए हैं । जिन्हें टीवी से ख़ुराक़ लेनी है, लेने दीजिये । उन्हें हम लोग किसी भी हाल में रोक नहीं पाएँगे ।वह सब मिटाकर लौटेंगे,उनकी फिक्र छोड़ दें,अपने ऊपर काम कीजिये । गुड़ और गुलगुले दोनों से परहेज़ कीजिये,जिन्हें टीवी पर नही देखना चाहते,उन्हें सोशल मीडिया पर भी मत देखिये और न ही उनकी बात कीजिये ।

जो हालात होंगे,उनसे निबटा जाएगा । बस अपने ऊपर मेहनत कीजिये । इस मीडिया से न हारने की ज़रूरत है न जीतने की,अपनी बात कहना सीखिए,उसमे दम और तर्क और सत्यता के साथ शोध बढ़ाइए । जिन्हें मीडिया पर तफरीह करनी हैं, वह करें,चलाएं शब्दबाण,इसका हासिल भी कुछ नही होगा । उनसे हटिये और अपनी कहानी लिखिए । जब कोई आप पर कलम न चलाए, तो खुद को ऐसी कहानी बना दो की ज़माना उसे बैठकर लिखे ।

अगर इस बात पर यकीन है कि हर नफरत आखिर में हारती ही है, तो उधर से मुँह फेरकर अच्छे कामो में लगो,उन्हें एजेंडा चलाने दो तुम आखरी सांस तक बेहतर काम करो । वह समाज बांटे या न बांटे तुम समाज को जोड़ते चलो । अपना लक्ष्य तय करो और उसे पाने में लगो । किसी स्टुपिड बॉक्स में बैठे स्टुपिड से खुद के लिए लक्ष्य मत लो । अपने मुल्क में मोहब्बत फैलाओ और जितना हो सके ज़रूरतमंद के काम आओ । 
#hashtag #हैशटैग

Sunday, April 5, 2020

यह नए नही हैं जननायक

देखिये प्रधानमंत्री की अपील पर लोग दीये जलाएँ या थाली बजाएँ, यह काम नए हो सकते हैं मगर तरीका नया नही है । हमारे देश मे जिस भी लीडर से जनता ने प्रेम किया है, उसकी एक आवाज़ पर अमल भी किया है, इसमें न ही नरेंद्र मोदी जी नए हैं और न ही पहले हैं, तमाम नेताओं के आह्वान पर पहले भी जनता इकट्ठा होती रही है ।खुशी है कि आज मोदी जी की आवाज़ वैसी ही कुछ कुछ जगह बना रही है ।

अविभाजित भारत में आज भी महात्मा गाँधी जैसी लोकप्रिय ताक़त नही पैदा हुई । गाँधी की आवाज़ क्या हिन्दू क्या मुसलमान,क्या पख्तून क्या बिहार,क्या बंगाल क्या मद्रास,सब तरफ एक साथ असर डालती थी ।उनकी एक आवाज़ पर लोगों ने खुशी खुशी अपने कीमती कपड़ों में आग लगाकर इसी ज़मीन पर होली खोली थी । वह तो सरकार में भी नही थे और न ही इस तरह मीडिया सोशल मीडिया था,मगर उनकी आवाज़ पर पूरा देश चल पड़ता था । हमारी जनता उनसे अथाह मोहब्बत करती थी ।

दूसरे लीडर आते हैं, आज़ाद भारत के पंडित जवाहर लाल नेहरू,जिन्होंने शुरू के ही भाषण में कहा कि इस आज़ाद हिंदुस्तान के मंदिर मस्जिद हैं, उद्योग,फैक्ट्री,बाँध, नहरें । जनता ने इन्हें मंदिर मस्जिद  मान लिया । अपने लीडर पंडित जी से मोहब्बत थी उसे,उसने उनसे नही कहा कि हमे मंदिर बनाकर दो,हमे मस्जिद बनाकर दो,उसने उनसे फैक्ट्री माँगी, उद्योग मांगें, ज़मीनें दी नहरे निकालने को,बड़े बड़े बाँध की नींव रखवाई । यह था अपने लीडर से प्रेम की उसकी बात को अपना भविष्य मान लिया और दुनिया के सामने सर उठाकर खड़ी हुई ।

फिर एक लीडर कम वक्त के लिए सामने आए,उनका नाम था लाल बहादुर शास्त्री । थोड़ा सा वक़्त और बड़ी पहचान । उन्होंने लोगों से अपील किया कि एक वक्त खाना खाएं,ताकि हमारी दूसरों पर निर्भरता न रहे । यक़ीन कीजिये,इस देश की जनता ने एक वक्त खाना खाना शुरू कर दिया । बिना मीडिया की चो चपड़,बिना सोशल मीडिया के आईटी सेल के इस लीडर की आवाज़ घर घर गई,यह थी अपने लीडर से मोहब्बत, उसके साथ खड़े होने की ललक ।

फिर आती हैं इंदिरा गाँधी । पूरे देश की आँखों मे वह तस्वीर आज भी नक़्श है, जब पाकिस्तान से युद्ध मे वह अपने ज़ेवर लिए हाथ मे खड़ी हैं । अपने सभी ज़ेवर सेना के लिए समर्पित करते अपने प्रधानमंत्री को देख,झड़ी लग गई मदद की । इंदिरा घर घर,दिल दिल मे पालथी मारकर बैठ गईं । जनता ने उनसे अथाह मोहब्बत की ।

इस बीच आते हैं एक फ़क़ीर, जिसकी पीठ पर गाँधी का थैला था । न वह कोई पद पर था,न वह कांग्रेस में थे,बस पैदल गाँव गाँव घूम रहे थे,एक ही चीज़ मांग रहे थे, जानते हैं क्या,ज़मीन । ज़मीन अमीरों से मांगकर गरीबो में देना,यानी भूदान । आप यकीन नही करेंगे,लोगों ने उनकी बात पर ज़मीनें दान दे दीं । हज़ारों एकड़ ज़मीन गांधी के आध्यात्मिक शिष्य विनोबा भावे के पैरों में डाल दीं । यह थी मोहब्बत,यह थे अपील,यह था करिश्मा,जो जनता ने किया ।

हम हमेशा जिस लीडर को भी प्रेम करते आए हैं, उसकी बातों को,उसकी अपील को दिल से भी मानते आए हैं । देखना तो यह है कि इस मोहब्बत का,इस लगाव का उस नेता ने इस्तेमाल कैसे किया है । हमसे काम कौन से लिये हैं । हमारे राष्ट्र को कितना आगे बढ़ाया है । हमारी आने वाली नस्लों के लिए सुनहरे ख्वाब की बुनियाद डाली है या नही । यह देश अपने लीडर को हमेशा सर आंखों पर बैठाता रहा है, इसमे कुछ भी नया नही है ।

वह भी तब, जब न मीडिया ऐसा था,न सोशल मीडिया था और न ही आई टी सेल थी । बस एक अपील थी और सब हाज़िर । यह दीये जलाना, थाली पीटना क्या है, लोगों ने अपने महँगे कपड़े जलाए,नरम कपड़े उतारकर खादी पहनी,मंदिर मस्जिद भूले,एक वक्त खाना छोड़ा, गहने बेचे,ज़मीनें दान की इसलिए घबराइए मत की अब यह कौन आ गया,जिसके कहने पर लोग दिन को रात और रात को दिन कह रहे हैं, मेहनत और दिमाग रखिये,आपको भी मौका मिलेगा । यह देख अतिउत्साहित भी मत होइए की यह पहली बार हो रहा है, बहुत पहले से होता आया है । हम तो उन मुट्ठी मुट्ठी भर वाले धार्मिक नेताओं की बात ही नही कर रहे जिन्होंने बोरे का टाट तक लोगों को पहनावा दिया था और लोगों ने पहना भी था ।

जिस भी लीडर से जनता प्रेम करेगी,उसकी हर बात को सर आँखों पर लेगी । यह हमारे ख़मीर में है । कोशिश कीजिये कि लोगों के दिलों में जगह बनाइये । उनसे स्नेह रखिये,उन्हें जीतने के प्रयत्न कीजिये । इनके बाद फिर कोई आएगा,जो जनता की मोहब्बत पाएगा । मुझे खुशी है कि जनता मोहब्बत से खाली नही हुई है । लीडर बनिये ।
#hashtag #हैशटैग

Saturday, April 4, 2020

किसे सुधारें

मुसलमानों से सुधरने के कहो,उनसे कहो कि अपनी कमियाँ दूर करें । अपने रसूल से सीखें कि तरक़्क़ी, इल्म और इंसानियत कैसे आती है । नई तालीम को अपनाएँ, तरह तरह की भाषाएँ सीखें,दूसरी संस्कृतियों को समझें । जब यह बात करो,तो मुसलमान काटने दौड़ते हैं कि सब हम ही सीखें । हमपर अत्याचार की हद है कि मेरी सुनवाई न सरकार में है, न कोर्ट में न समाज में, और शिकायत भी हमसे ही है । हमारी यूनिवर्सिटी तहस नहस की जाती है और आप हमको पढ़ने को कहते हो । कुछ मुसलमान मेरे मुँह से निकले लफ्ज़ को सुनकर ज़ुबान का खतना कराके हमें चुप करा देते हैं । 

हम हिंदुओं की तरफ घूमते हैं कि भाई अपने धर्म का मूल प्रेम और सहिष्णुता को खुद में कम मत होने दो । शिव जी की तरह हर जाति,धर्म,वर्ग से प्रेम करो । तुम्हारी सहिष्णुता ही संसार मे तुम्हारी पहचान है, इसकी कमी मत होने दो । खुद की कमियों को सुधारो,तुम तो कम से कम अपने अंदर नफरत को मत दहकने दो । फिर कुछ हिन्दू  काटने दौड़ पड़ते हैं कि हज़ारों साल से हम ही सहिष्णुता को ढोए । इकतरफा प्रेम हम ही दिखाएं । बड़े भाई की सारी जिम्मेदारी हम ही निभाएं । इनके सहयोग के अपेक्षा भी न करें । अब नही होगा,अब हम जाग गए हैं । आप भी चुप हो जाएं,अभी तो आपका सम्मान कर रहें,नही तो...हमारी ज़ुबान पर यहाँ भी तलवार चला दी जाती है ।

अब हम रुख करते हैं, नास्तिकों की तरफ । भाई तुम तो कम से कम दूसरों को नीचा मत समझो । हर एक को जाहिल कहने के लिए मत बिलबिलाओ । धर्म का रूप आज भले ही गलत हो मगर पहले यह एक विधान की तरह ज़रूरी था । इसने हज़ारों साल इंसान को मानवता के सूत्र में बांधे रखा है ।।दुनिया की तमाम बुराई का ठीकरा धर्म पर फोड़कर निकलना सही है । किसी धार्मिक व्यक्ति से तुम तो नफरत न ही करो,तुम तो इंसान का अपग्रेड वर्ज़न हो,तुम्हारे अंदर पुरानी बुराई तो नही होनी चाहिए । नास्तिक हम पर झपट पड़ते हैं, आ गए धर्म के वक़ील । करो वक़ालत अफ़ीम की,तुम तो अफीम को भी दवा बनाकर पेश कर दोगे । अरे यह धार्मिकों का नँगा नाच पूरे संसार ने खूब देखा है, अब हम नही देखेंगे । इनको खत्म ही होना होगा और आप,अब चुप हो जाएं,आपके शब्द ही अभी तक हमे भी उलझाएं थे,हमे तो लगता है, उनसे पहले आप जैसी ज़ुबान को खामोश करना चाहिए... यहाँ से भी हम भाग खड़े होते हैं ।

सबसे भागकर नववामपंथी गांधीवादी जीवों के बीच गया । यह मन मे मार्क्स और ज़ुबान पर गाँधी लिए खड़े थे । इन्हें पता था कि गाँधी के नाम से जब संघ बन्द दरवाज़ा खोल सकता है, तो हम भी खोल सकते हैं । रटने लगे गाँधी गाँधी, हमे भी धोखा हुआ । हमने कहा दोस्तों गांधी की तरह चलने का वक़्त आ गया है । अहिंसा,प्रेम और सत्य हमारे अस्त्र होंगे । हम धर्म को अपने हाथ मे लेंगे । सुबह शाम ईश्वर से प्रार्थना होंगी और हमारा सूत्र होगा,दुश्मन को बर्बाद नही करना है, बल्कि जीतना है । भाई लोग हम पर भड़क उठे । यह क्या सिखा रहे हो,हमने कहा गाँधी । यह गाँधी नही चलेगा, हमारा वाला गांधी चलेगा, जो दुश्मन को काट डालेगा । जिसे हिंसा के अहिंसा ओढ़कर सिसकना नही होगा । हम कष्ट झेलेंगी नही,बल्कि दुश्मन के कष्ट के दिन शुरू होंगे । रही बात धर्म की तो यह दक्षिण पंथ की तरफ जा सकता है, इसलिए इसे हम।पसन्द नही करते और प्रार्थना तो हम केवल अपनी महबूबाओ से कर सकते हैं, ईश्वर विश्वर से नही,निकलिए आप उससे पहले आपके अंदर का गाँधी मारा जाए ।

भागकर हम कमरे में घुस गए । खुद तय किया कि दुनिया जाए भाड़ में,हमे अपने आप को सुधारना है, खुद की कमियां दूर करनी है । शीशे के सामने खड़ा मैं कह रहा था आज से खुद पर काम शुरू,खुद को सुधारेंगे हम । तभी शीशे से आवाज़ आई, आ गए चिलगोज़े । हमे अच्छे से पता था तुमसे कोई तो सुधरेगा नही,आखिर में खुद पर ही लौटोगे । अबे जब खुद पर ही लोट पोट कर लौटना था,तो कहे समाज की चिंता में सिंगल चेचिस रह गए । मेरी सुनो,यह ख्याल भी खुद से निकाल दो और पेशाब करके सो जाओ । तुम भी नही सुधरोगे,कल से फिर लग जाना वही ढपली वही राग लेकर,प्रेम,सहिष्णुता,त्याग,समर्पण,संवेदना, सत्य,सहयोग । शीशा चीखता हुआ,हम पर टूट जाता कि हम भी बिस्तर पर गिर गए,धड़ाम से....
#hashtag #हैशटैग

Friday, April 3, 2020

क़ौम से नफरत

इतिहास में एक शासक हुआ है, उसका नाम था एडोल्फ हिटलर । अपने देश का जननायक था वह,दुर्भाग्य से अपने ही देश की एक क़ौम यहूदी से नफरत करता था । यहूदी एक भरी पूरी क़ौम थी । हर क़ौम की तरह उसमें भी अच्छे और बुरे लोग थे,समझदार और बेवक़ूफ़ भी थे,बलवाई और भलमानस भी थे । यानि हर क़ौम की तरह वह भी थे ।

शासक एडोल्फ हिटलर और उसका दायाँ हाथ गोएबल्स इस यहूदी क़ौम से बेहद नफरत करते,इनकी हर गलती को राष्ट्र के लिए खतरनाक बताकर पेश की जाती । यह तरीका था आम देशवासियों की नज़रों में यहूदियों को राष्ट्रद्रोही साबित करने का,जिसको बखूबी अंजाम दिया जाता रहा ।

यहूदियों के चिंतक,विचारक पूरी क़ौम से दिन रात कहते कि भाई गलतियाँ मत करो,खुद को सुधारो मगर यहूदी कोई व्यक्ति तो थे नही,पूरी क़ौम थे । कमी कोई न कोई रह ही जाती,आखिर कितना सुधरते,मूसा तो बन न जाते । उनकी कमियों को शासक की पसन्द के अखबार और रेडियों भयँकर तरीके से पेश करते और उस देश के आम नागरिक इनसे नफरत करने लगते ।

हद तो यह थी कि दुनिया मे कहीं भी कोई यहूदी अगर किसी ईसाई से दुर्व्यवहार करता या उसे मार डालता,तो उसका बदला इस देश के यहूदियों से लिया जाता । इन यहूदियों को जाहिल,अनपढ़,पिछड़ा कहा जाता,जबकि सबको मालूम था इसी क़ौम से इसी देश मे दुनिया का सबसे बड़ा वैज्ञानिक आइंस्टीन भी है, मगर जब क़ौम पर डंडा चलता है, तो कौन आइंस्टीन कौन आम इंसान ।

यह चलता रहा,फिर एक दिन आया, जब दूर फ्रांस देश मे किसी यहूदी ने कोई वजह से किसी ईसाई का क़त्ल कर दिया और इधर यह देश अपनी आर्थिक बर्बादी की तरफ बढ़ रहा था । जनता को इस नए शासक से कुछ मिल नही रहा था । उसे लगता यह कमी भी इन यहूदियों की वजह से ही है । वह अपनी गरीबी और बर्बादी में शासक की जगह इस क़ौम को दोषी मानते । फ्रांस की घटना ने इस देश मे आग में घी का काम किया और फिर यहूदियों की अंतहीन हत्याएँ होने लगी । इन कौमी अपराध पर कोई सुनवाई नही बल्कि शाबाशी मिलती थी ।

एडोल्फ हिटलर ने यहूदियों को बड़ी बड़ी जेलों में ठूसना शुरू किया । यहाँ यह समझ लें कि इनकी हरकतों का पूरा ईसाई समुदाय समर्थन नही करता था,वह इस अन्याय के विरुद्ध थे,मगर लाचार थे,क्योंकि बड़ी आबादी शासक के साथ थी और यहूदियों से नफरत को सही ठहराती थी ।

होते होते वह दिन भी आया जब शासक ने आदेश दिया कि यहूदियों को गैस चैंबर में भेजकर मार डाला जाए । पूरी दुनिया ने औरत,आदमी,बच्चों को कतारों में लगे देखा,हर कतार गैस चैम्बर के दरवाजे तक जाती थी । जहाँ जाकर इनको मरना होता था । उस लाइन में लगे बच्चे,बूढ़े,औरत,आदमी मरने के लिए बढ़ता रहा और आम देशवासी उनपर हँसते रहे । मौत एक उत्सव में बदल गया । यहूदियों ने देखा जिन पड़ोसियों के साथ वह सालों से रह रहे थे,वह उनके मरने पर तालियाँ बजा रहे थे । लाखो यहूदी उस समय मार दिए गए । लेकिन हुआ क्या,उस देश की समस्या जस की तस बनी हुई थी । यहूदियों के मरने के बावजूद उनकी ज़िंदगी बर्बाद ही होती रही । जब तक उन्हें लगा कि उनके देश की तरक्की का रोड़ा,यहूदी हैं, वह ज़ुल्म करते रहे । अब यहूदी नही बचे थे,अब तरक्की क्यों नही हो रही । अब उन्हें एहसास हुआ कि शासक के बहकावे में उन्होंने महापाप कर डाला मगर डर और बुज़दिली ने उन्हें इतना जकड़ लिया था,की वह अपनी तक़लीफ़ ज़ुबान पर ला ही नही सकते थे ।

पूरा देश बर्बाद हो गया । शासक एडोल्फ हिटलर ने खुद के सबसे सुरक्षित महल में गोली मारकर आत्महत्या कर ली । उसके दाहिने हाथ गोएबल्स ने अपने हाथों से अपने बच्चों को सोते में ज़हर पिलाया,पत्नी को ज़हर पिलाया और खुद ज़हर पीकर आत्महत्या कर ली । एक बेहतरीन देश नफरत की आग में झुलसता हुआ इतना बर्बाद हो गया कि उसकी कल्पना नही की गई थी । यह जर्मनी था,जहां आज भी इस शासक के नामपर उनके ही नागरिक थूकते हैं क्योंकि उसने उन्हें इंसान बनने की जगह शैतान बनाने पर ज़ोर दिया था ।

उस समय के जर्मन यह मान ही नही पाते थे कि कुछ लोगों की कमियां,पूरी यहूदी क़ौम की गलतियां नही होती हैं । यह यह देख ही नही पाते थे कि जितनी गलतियां या अच्छाइयां उनमें हैं, उतनी ही उस क़ौम में भी हैं । वह पूरी यहूदी क़ौम में सिर्फ और सिर्फ अच्छाई ही देखना चाहते थे,बुराई उन्हें बर्दाश्त नही थी,यह कैसे मुमकिन है कि पूरी की पूरी क़ौम सधी और सुधरी हुई हो । दुनिया की कौन सी ऐसी क़ौम है जो सौ प्रतिशत सही हो मगर जब नफरत सर चढ़कर बोलती है तो दूसरे की एक कमी भी सौ प्रतिशत कमी दिखाई देती है । यह नफरत हमेशा अंत मे उस ही शरीर को खत्म करती है,जिसमे यह पलटी है । पूरा देश इस नफरत में हार गया,जर्मनी बर्बाद भी हुआ और दुनिया के सामने रुसवा हुआ । यहूदी आज भी हैं, खत्म तो इस जमीन से कोई नही होता, खत्म करने का विचार जिस मस्तिष्क में पलता है,केवल वही खत्म होता है । जर्मनी आज भी है, बस उस नफरती शासक को उसी जनता की अगली पुश्तों ने गाली बना दिया,अब नाम नही लेता कोई । यह बात उस देश को सब मिटाकर समझ आई कि गलतियां क़ौम की नही बल्कि व्यक्ति की होती हैं ।
#hashtag #हैशटैग

Thursday, April 2, 2020

कोरोना दीया

घर से बाहर मत जाएँ,हम आपको बताएँगे घर में ही "कोरोना दीया" बनाने का तरीका ।

सामग्री:
एक कटोरी आटा
आधा कप पानी
मुट्ठी भर रूई
तीन चम्मच तेल
एक माचिस कुछ तीलियों के साथ ।

समय :करीब दस से पन्द्रह मिनट (अपवाद:काहिलों को छोड़कर)

विधि:  सर्वप्रथम एक प्लेट में आटा ले । उसे थोड़ा थोड़ा प्लेट में फैला लें । फिर इसके बीच  में पानी डालें । अपने नरम नरम हाथों से आटा कड़ा कड़ा गूँथ लें ।  आटा पूरी कचौरी की तरह कड़ा ही गूँथना होगा । फिर इस आटे की तीन बराबर की लोई बना लीजिए । प्रत्येक लोई को खूब गोल कीजिये । फिर प्रत्येक लोई के बीच अंगूठे से गड्ढा कीजिये,गड्ढा ऐसा हो कि नीचे की तरफ आर पार न होने पाए । अब इस गड्ढे की गोलाई में एक दीवार जैसी उभर आएगी,उसे अंगूठे और उँगलियों से बराबर करके कटोरी का शेप दे दीजिए । 

अब हाथ धोइये साबुन से और साफ तौलिया से पोछिये । फिर रुई लेकर उसे तीन बराबर हिस्सों में बांट लें । प्रत्येक हिस्से को दोनों हाथ की हथेलियों के गद्देदार हिस्से से आहिस्ता आहिस्ता मलकर लंबी बत्ती बना लें ।
अब यह बत्तियां उपरोक्त तीनों दीयों में डाल दें । ततपश्चात दीयों में तेल बराबर मात्रा में डाल दें । अब इन्हें बालकनी या दूसरे खुले स्थानों पर रख दें । अब आपका कोरोना दीया जलने को तैयार है ।
 अब माचिस और उसकी तीलियों को इस्तेमाल करके इन दीयों में द्रष्टिनुसार रौशनी पैदा करें और मज़े करें । 
नोट:यह विधि आपके हित के लिए ही बताई है । घर पर रहें । बाहर मत निकलें । बिना लक्ष्मण रेखा नाँघे अपना कर्तव्य पूरा करें !
धन्यवाद !
#हैशटैग #hashtag

कोरोना और मुसलमान

एक भाई इनबॉक्स में घुसकर बोले,क़िदवई साहब अब जमात पर कुछ नही लिखेंगे,तबलीग़ के कोरोना डिस्ट्रीब्यूशन पर नही कुछ कहेंगे ।
हमने कहा भाई हम यहूदी हैं ।
वह बोले यह क्या होता है ।
हमने कहा यार यह तुम्हारे सिलेबस से बाहर की चीज़ है, तुम उतना ही सीखो,जितना टीवी पर प्रचारक सिखाए ।

ख़ैर यह बात हो गई मज़ाक की मगर गम्भीर बात यह है कि मुसलमान खुद को सुधारने के मौके के मौके गवाते जा रहें । जो बड़ी गलतियाँ दिल्ली मरकज़ से हुई हैं वह माफी के काबिल नही हैं, कोई भी सक्षम सरकार इनसे खुद बखुद निपट लेगी ।

हम फिर कह रहें कि अपनी कमियों पर पर्दे मत डालिये,बल्कि उन्हें सुधारिये । उनसे सीखिए,जो समाज को बढ़ाने में लगे हैं नाकि उनसे जो सिर्फ मज़हबी बातों को ही।फैलाना चाहते हैं । जो आपसे नफरत कर रहें या आपकी हरकतों से खिन्न हैं, उनके मन को भी तो टटोलिये । अगर खुद की तरफ से कमी दिखने लगें, तो उन्हें सुधार लें ।

मैं लिखना नही चाहता हूँ क्योंकि पिछले दस साल से एक ही बात तो लिख रहें हैं कि अच्छे इंसान बनो । मोहब्बत, खुलूस,खिदमतगार बनो । जिस लड़के ने इनबॉक्स किया,उससे मैं ज़रा भी विचलित नही,न ही उसके प्रभाव में लिख रहा हूँ । 

बस हाथ जोड़कर कह रहा हूँ कि अपनी आने वाली नस्लों के लिए खुद को सुधार लो । यह बहानेबाज़ी नही चलेगी की हिन्दू ऐसे हैं, ईसाई वैसे हैं, खुद को सुधारिये । विज्ञान पढ़िए,मौलानाओं को मस्जिद तक रखिये,दुनियावी सबक उससे मत लें,जिसे दुनिया का ही इल्म नही । कट्टर सियासत और कट्टर मज़हबी सोच,दोनों से किनारा कर लीजिए ।

आज लोग आपसे नाराज़ हैं, इससे बेचैन मत हों,बल्कि शीशे के सामने खड़े होकर सोचिए,की हममें क्या कमी हैं । मीडिया प्रचारक या नफरती लोग जो भी आपके विरुद्ध फैला रहें हैं, उसे गौर से समझिये और ऐसे काम कीजिये जिससे लोग आपको माफ कर सकें ।

हमे बहुत सफाई देने किसी का पसन्द नही,बस इतना कहेंगे कि मुश्किल वक़्त तो है, कुछ मुश्किल वक़्त आपपर लाया गया,तो बहुत कुछ मुशिकल हालात आपने अपनी हरकतों से कमाया भी है । हम तो ठहरे यहूदी,मगर आपकी फिक्र है । अगर गलियाँ साफ करनी पड़ें माशरे का दिल जीतने के लिए,तो साफ कीजिये । यह सज़ा नही बल्कि इम्तेहान है । मेरी बातें बुरी लगेंगी मगर सोचिए,रास्ता कोई और है नही,ख़िदमत ही एक रास्ता है जो पहाड़ जैसे दरवाज़ों को भी खोल देती है ।

जो आपको आज भला बुरा कह रहें, उनमें से सब बुरे नही हैं और न ही नफरत करने वाले हैं । वह दिल से चाहते हैं कि आप सुधरिये और बढ़िए । जो नफरत कर रहें,वह कल भी करते थे,कल भी करेंगे मगर जो नाराज़ हैं, उन्हें मनाया जा सकता है । मना लीजिये,जैसे भी करके हो,नाराज़ लोगों को बिना अगर मगर के भरोसा दिलाइये की आप सुधार करेंगे ।खुद से वादा कीजिये कि अच्छी पढ़ाई,वैज्ञानिक सोच,जागरूक नागरिक,दिल मे प्रेम,सहिष्णुता,समर्पण,त्याग और संवेदना लाकर आने वाली नस्लों के लिए शानदार दुनिया बनाएंगे । कट्टरपन और दकियानूसी बातों से बचिए,यक़ीन करें,हमारी मिट्टी हमारे आपके लिए पहले की तरह नरम होगी....
#hashtag #हैशटैग

Wednesday, April 1, 2020

राम नवमी

तुम राम की कहानियों में इतिहास तलाशते हो और मैं युगों से चली आ रही एक डोर को तलाशता हूँ।तुम अपने लिखे इतिहास को देखो जो तुम्हारे बचपन से बुढ़ापे तक के ही सफ़र में हाँफने लगा है।अपनी लिखी कहानियों को देखो तो उनका स्वरुप भी बिगड़ चुका है।हज़ारों सालों में बहुत से सच्चे किरदार मिथक लगने ही लगेंगे।उनकी कहानियों में बहुत जोड़ घटाओ तो हो सकता है मगर इतना मान लो की हज़ारों साल से चलते आ रहे किस्से कोई तो सच की डोर थामे हैं जो आज भी ज़बान दर ज़बान आगे बढ़ रहें हैं।

मैं अयोध्या की माटी में नँगे पाँव टहला हूँ। मैं सरयू के पानी में भी उतरा हूँ।उसमें अपने राम से भी मिला हूँ।वोह राम जिनका दिल हर एक के लिए नरम है। जिनके होने से माँ का रुतबा दुनिया को पता चला। माँ की एक मांग पर सालों के दर्द को समेट जो मुस्कुराता चला गया,वोह हमारे दिल में आ ही नही पाए।हमारी ज़बान तो राम के नाम से चलती है मगर हमारे दिल उनसे ख़ाली हैं।हमारे चरित्र में राम हैं ही नहीं।मुझे सरयू में नहाते वक़्त मेरे राम का वोह शांत चेहरा याद है।जैसे कह रहें हों की तुम भी मत परेशान हो।जब तक यह सारे लोग,हमारे इंसानों में नफ़रत बोते रहेंगे, मैं सरयू से बाहर ही नही आऊँगा।

जब कोई कहता है की रामराज्य लौट आएगा या हम राम राज्य लाएँगे।तो यक़ीन जानो मैं बेतहाशा भागता हूँ की क्या मेरे राम आने वाले हैं।क्या वाक़ई कोई राम बन सकता है।मैं पूरे दावे से कह सकता हूँ की इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अब दोबारा रामराज्य नही आ सकता क्योंकि अब मेरे राम नही आएँगे। रामराज्य लाने के लिए राम बनना पड़ता है जो अब नामुमकिन है, क्यों की राम बना नही जा सकता,राम तो खुद होते हैं।

उनके इतना विशाल हृदय का कोई हो ही नही सकता।राम सिर्फ अपनी माँ के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम नही थे,बल्कि उस वक़्त की हर माँ के लिए वोह राम थे।अब कौन है जो अपनी माँ को छोड़कर दूसरे की माँ के आँचल की रखवाली करे।जिन्हें जो लगता है लगे मगर मेरे राम के रामराज्य को यूँ बदनाम मत करो।मेरे राम मेरे दिल में उतरकर सुक़ून पहुंचाते हैं।मुझसे बाते करते हैं।मेरे दिल में इकट्ठा होने वाले मैल को खत्म करते हैं।मुझसे सरयू के पानी में खड़े होकर बाते करते हैं।

मुझे मेरा ह्रदय बड़ा करने को कहते रहते हैं।सरयू के पानी में अपना वजूद खो चुके मेरे आँसुओ को पहचानकर दिल पर हाथ रखते हैं की सब सुंदर हो जाएगा।बस तूम बिना डरे,बिना घबराए हर दिल को अपनाते चले जाना।
मैं नही जानता की मैं और मेरे राम की बातचीत कोई सुन सकता है।मुझे नही पता की मेरे दिल में मौजूद राम कभी आवाज़ देंगे भी या नही।मुझे बस इतना पता है की अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के बावजूद मुझे मेरा ह्रदय नरम और सरल रखना है।

मेरे लिए ज़मीन पर मौजूद हर व्यक्ति की माँ की इज़्ज़त करना मुझे मेरे राम के नज़दीक़ ले जाएगा। मेरे राम उसके ह्रदय में कभी नही आएँगे जो धनुष से तो प्रभावित है मगर राम के चरित्र से दूर है।मेरे राम ज़बान के सच्चे,दिल के नरम और सामाजिक कर्तव्य के लिए हमेशा खड़े ऐसे चरित्र हैं, जो हज़ारों साल के बावजूद ज़मीन पर हमारे आपके बीच हैं। आज रामनवमी है, अगर दिल में मेरे राम आहट दें तो मोहब्बत से,त्याग से दूसरे दिलों को जीतने की कोशिश करना।जिनके दिल में मेरे राम होंगे वोह भौतिक व्यवस्था में बेचैन होकर नही टहलेंगे। मेरे राम तुम्हारे बने किसी भी खाँचे से दूर मेरे दिल में बैठ बतयाते ही रहेंगे।हाँ मेरे राम हर उस दिल में ही रहेंगे जिनमे मोहब्बत हो,त्याग हो,समर्पण हो,सहिष्णुता हो,संवेदना हो,बाकि लोग ताउम्र ढूंढे मेरे राम को उनको सब कुछ मिल सकता है, बस नही मिलेंगे तो मेरे राम । राम नवमी को मेरे राम के अंश खुद में लाने की प्रार्थना करो,मैं भी प्रार्थना करता हूँ कि दुनिया की कितनी ही विपरीत स्थिति आ जाए,मेरा हृदय मेरे राम से खाली न होने पाए बस...

#हैशटैग #hashtag