Friday, March 31, 2017

अपना बनाम सबका

मैंने देखा है की जब कोई अपने बच्चे का गू धोता या उठाता है तब वह अछूत नही होता है।उसी जगह जब कोई सब घरों का गू उठाता है तो अछूत हो जाता है।कोई अपना टॉयलेट धोकर घर में अछूत नही होता तो कोई सबके घरों का टॉयलेट धोकर अछूत हो जाता है।यही नही जो औरत अपने किसी एक से सेक्स करती है तो वोह चरित्रवान होती है जबकि जो सबसे वही काम करती है तो चरित्रहीन कहलाती है।यहाँ तक अपने घर से पैसे चुराने वाला चोर नही कहलाता बल्कि हर घर से चुराने वाला चोर कहलाता है।घर में माँ को पीटने वाला गुंडा नही कहलाता बल्कि हर एक को पीटने वाला गुंडा कहलाता है।यहाँ तक हमे वोह नौकर,वोह व्यक्ति पसन्द आते हैं जो सिर्फ हमारे काम आए, जो सबकी मदद करते हैं वोह हमारे दिलों से दूर रहते हैं।यह तो रही एक बात।

जब मैं यह सोच रहा था तो मैं समाज की सोच को महसूस कर रहा था।यह समाज अपने,व्यक्तिगत अपने लिए,हर चीज़ को अपनाता चाहता है।जैसे ही वोह चीज़ सबकी होती है,वैसे ही वोह समाज के लिए अछूत हो जाती है।यह बात बिल्कुल भी गहरी नही है।अपने इर्द गिर्द झाँक कर देखिये समाज की चाल खुद बखुद आपके हाथ आ जाएँगी।
अब ज़रा इन सब उदाहरणों से उस चीज़ को पकड़ने की कोशिश करें जो मैं कहना चाह रहा हूँ।वोह यह है की समाज हर उस व्यक्ति को नकार देगा जो सबका होगा।हर उसके पीछे से हट जाएगा जो सबके दिलों की बैसाखी है।यह समाज हर उसके पीछे खड़ा मिलेगा जिससे उसे व्यक्तिगत फायदा है क्योंकि सबका फायदा उससे देखा नही जा सकता।इसीलिए देखिये हर आने वाले कल मे वोह ही मज़बूत हो रहा है जो सिर्फ एक के काम आ रहा हो।जो सबकी बात करेगा वोह अकेला ही रह जाएगा।

हो सकता है हम गलत हों मगर अपने समाज की नब्ज़ पर हाथ रखकर कुछ ऐसे ही महसूस किया।मैं यह कभी नही कहता की मेरा लिखा ही अंतिम सच है।हो सकता है यह पूरा गलत हो मगर हम अपने समाज पर नज़र तो रख ही सकते हैं।उसके मनोविज्ञान को समझ सकते हैं।इतना समझ लें समाज में आई एक एक ऐंठन की भी ढेरो वजहें होती है।समाज का आजका रूप कल के चले फावड़ों और कुदालों और तमाम बातों से ही निकल कर आता है।वैसे समाज का हर बदलता रूप हमारे चरित्र में कहीं न कहीं नज़र आने ही लगता है।

गाँधी जब तक हमारी अपनी आज़ादी के लिए थे तब तक वोह हमारे हीरो थे।जैसे ही वोह सबके हुए,हमारे किसी काम के नही रहे।यह जो सबके होना है न बड़े जिगरे का काम है।यह सब जानते हुए की हम अछूत हैं, हम नकार दिए जाएँगे,तब भी समाज की फ़िक्र करना ,समाज के लिए खड़े रहना वाक़ई ऐतिहासिक और हिम्मत वाला काम है।अब जिन्हें आसान रास्ता चुनना है और अपने को हमेशा स्वीकार्य ही बनाए रखना है वोह सिर्फ अपनी थालियों की फ़िक्र करें और खुश रहें।जिन्हें हर तरह की आलोचना,तिरस्कार,अस्वीकार्यता के बावजूद ज़िंदा रहना है वोह सबकी थालियों की फ़िक्र करें।यह समाज उन्हें अपनाए या न अपनाए मगर उन्हें खड़े होकर हर एक को अपनाना होगा।उन्हें गले लगाना होगा।अपनी कूव्वत के हिसाब से अपना किरदार तय करिये और निकल जाइये।

Thursday, March 30, 2017

कुछ तो बेहतर कर जाओ

कभी फुर्सत मिले तो अपने शहर के सबसे पुराने कब्रिस्तान टहल आइयेगा।इसलिए नही की इसकी बाउण्ड्री किसने बनवाई बल्कि यह देखने की यह कब्रिस्तान इस क़दर खामोश क्यों हैं।पुराने में इसलिए जाने को कह रहें हैं की इसमें वोह लोग दफ़न है जो किसी ज़माने में काबलियत की मिसाल रहें हैं।इनमे वोह भी दफ़न हैं जिनके लिखे पर हज़ारों ने पीएचडी की है।इसमें अकेले सन्नाटे में वोह भी दफ़न हैं जिनके पीछे लाखों की भीड़ रहती थी।जब इन कब्रिस्तानों में जाएँगे तो हो सकता है पाँव के नीचे उस वक़्त के क़ाज़ी या मुफ़्ती ही लेटे हों।क्या पता इस ज़मीन में कौन कौन हस्ती मिट्टी बन गई।

अब तो सवाल ज़हन में आएगा की सबको मरना है और ऐसे ही खत्म हो जाना है।इन कब्रों में आने वाली नस्लें जानेगी भी नही की कौन दफ़न है।इन्ही कब्रों में ज़िन्दगी भर मर्दों से पर्दा करने वाली औरतों की कब्र पर कब किसी मर्द की कब्र बन गई कौन जानता है भला।कब्रिस्तान में मिटटी के नीचे सब एक जैसे दफ़न हैं।कहीं अल्लामा दफ़न हैं तो बगल में तांगे वाला दफ़न है।किसी और मोलवी दफ़न हैं तो ठीक उनके पैतयाने उस वक़्त की मशहूर तवायफ दफ़न है।है न कितना खूबसूरत कब्रिस्तान,जो सबको एक न एक दिन एक जैसा कर देगा।

अब सोचिये वोह क्या है जो ज़िंदा रहता है।कब्रिस्तान में तो सब मर खप गए मगर बाहर ज़िंदा कौन रह गया है।अगर मजाज़ कुछ गज मिटटी में दफ़न हो जाते तो किताबों में क्या उनका भूत ज़िंदा है।मीर की कब्र कब की सिटी स्टेशन के नीचे आकर अपने ऊपर रेलवे के इंजन की गुनगुनाहट को सुन खत्म हो गई तो पन्नों में जो मीर ज़िंदा है वोह कौन है।कबीर को माटी खत्म न कर पाई।हज़ारों कब्रों को कोई नही जानता की कौन हैं इसमें मगर उसमे से ही लेटे हुए हसरत मोहानी की ग़ज़ल"चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है" में भला कौन ज़िंदा है।मनो मिटटी में दबे अब्दुल कलाम और अबुल कलाम और मौलाना आज़ाद को कहाँ यह कब्रिस्तान खत्म कर पाए।

कहना सिर्फ इतना भर है की सच है मौत तो आनी ही है।यह भी सच है इसी मिटटी में वजूद खत्म हो जाना है जिसमे सुकरात और अरस्तू का हुआ है।मगर हाँ मगर हमारे काम हमे ज़िंदा रखेंगे।हमारी इंसानियत के लिए की गई कोशिशें कोई भी कब्रिस्तान खत्म नही कर पाएगा।हमारी मोहब्बत हमे हमेशा ज़िंदा रखेगी।हो सके तो इन पुराने कब्रिस्तानों में उन कब्रो को ढूंढियेगा जिनके नाम आपको बचपन से याद हों।कब्र तो आपको न ही मिले मगर इतना तो यक़ीन है उस फर्द की शख्सियत हमेशा आपमें और हममे ज़िंदा रहेगी।अपने आप को मोहब्बत से पैबस्त करदो वरना बदन तो वैसे भी सड़कर खत्म हो ही जाएगा।ज़िंदा रहते तो अपने दिल ओ दिमाग को मत सड़ाओ।मोहब्बत पैदा करो ताकि आने वाली नस्ले सुक़ून की ज़िन्दगी जी सकें।

Wednesday, March 29, 2017

उठो खुद जूझो

जब अख़बार अपना रस खो दें।टीवी आपके अन्दर कोई शोर न पैदा करें।रेडियों की आवाज़ सिर्फ कान तक जाए।तब ठहर जाइयेगा।सोचिये की आखिर क्या था जो बासी हो गया।वोह कौन चीज़ थी जो सड़ गई।मुझे नही लगता की हमे इनकी ज़रूरत है।यह अख़बार मेनहॉल का ढक्कन खुला और स्तुतिगान ही लिखें तो बेहतर।यह टीवी स्वर्ग की सीढ़ी और शबरी के बेर ढूंढे यही सही है।मुझे इनसे ज़रा भी उम्मीद नही।
मुझे तो अब यह अख़बार कॉपी पर कवर चढ़ाने लायक भी नही लगते।मैं तो इतना मानता हूँ की सूचना की ज़बरदस्ती पैदा की गई भूख ने हमे खूँखार बना दिया है।मुझे हैरत है जब डॉक्टर भ्रष्ट होता है तब तो वोह किसी एक समय किसी एक की मौत का कारण बनता है।जब इंजीनियर भ्रष्ट होता है तो वोह एक समय में सैकड़ों की मौत का कारण बनता है मगर जब पत्रकार भ्रष्ट होता है तब वह एक पूरी सभ्यता की मौत का कारण बनता है।
अब तो यह वक़्त आ गया है की हमारी ज़िन्दगी में इनकी ज़रूरत ही खत्म हो गई है।यह सिर्फ चटखारे के लायक बचे हैं।इन्होंने अपने किरदारों को भरे बाजार बोलियाँ लगाकर बेच दिया है अब इनसे वापसी की उम्मीद बेईमानी नज़र आती है।
मैं तो कहता हूँ देश के लिए हर उस चीज़,हर उस व्यक्ति हर उस विचार पर हाथ रखा जाए,जो हमे गर्त में ले जा रहा है।मैं भी नही चाहता अब यह मिशन की तरह काम करें,अब यह खुला मण्डियों वाला व्यापार ही करें तो बेहतर है।अब इतना साफ़ है मेरी नज़र में की देश को अगर हमे आगे बढ़ाना है।उसे खूबसूरत बनाना है।उसे चमकते आसमान तक ऊँचा ले जाना है।उसके बच्चों की मुस्कान की खिलखिलाहट को बनाए रखना है तो वोह रास्ता हमारे दिल से आपके दिल का होगा।यह सब करने में अब हमे किसी मीडिया की ज़रूरत नही।देश के निर्माण के योगदान से मीडिया बहुत दूर जा चुकी है।अब वोह सिर्फ और सिर्फ अपनी क़ीमत की वजह से ज़िंदा है क्योंकि उसकी आत्मा खत्म हो चुकी है।
अब देश एक दिल से दूसरे दिल तक सफ़र करके धीरे धीरे आगे बढ़ेगा।उसे तेज़ी से आगे बढ़ाने के साधन में घुन लग चुका है।इसलिए मुल्क़ की मुस्कान बनाने वाले लोग ज़्यादा मेहनत और धैर्य से आगे बढ़ें।यह हमारा देश है जो मोहब्बत को खूब खाद पानी देता आया है,देता रहेगा।मज़बूत होकर खड़े हो,इस देश को रीढ़ वाले लोगों की बेहद ज़रूरत है।

Monday, March 13, 2017

14 मार्च

एक तरफ मार्क्स खड़े हैं तो दूसरी तरफ आइंस्टीन।तीसरी और लांस नायक कर्मवीर सिंह है तो चौथी ओर जय नारायण व्यास।इनके साथ बीच में हैं आमिर खान।मार्क्स,कर्मवीर और नारायण व्यास आजके दिन यह ज़मीन छोड़ कर गए थे अनंत की ओर तो उसी अनंत से आइंस्टीन और आमिर इधर ज़मीन पर अपने हुनर के रँग बिखेरने आए थे।
मार्क्स को कौन नही जानता,हर देश में उनके आर्थिक,सामाजिक और दार्शनिक विचारों से प्रभावित इंसान मिल जाएगा।दूर भारत के गाँव में अकेले पलँग पर पड़ा कोई व्यक्ति जब उसे अंदर से खंगालो तो मार्क्स उसमे कहीं छुपे आराम कर रहें होंगे।यह हैं मार्क्स जो भूगोल को ध्वस्त करके मानव मात्र में घुल गए।

करमवीर सिंह को लोग कम जानते होंगे।कश्मीर पर चीखने वाले बहुत लोग मिल जाएँगे मगर वोह यह नही जानेंगे की इस रियासत को हाथों से खिसकते खिसकते रोकने में किन किन का हाथ था।पढ़ाई में बेहद कमज़ोर और शरारत में अव्वल करमवीर को जब घर वाले खेती में लगा देना चाहते थे तब ही उसने सब पाबन्दी छोड़ फ़ौज़ का रुख किया और कई युद्धों में माटी के लिए लड़े।कश्मीर उनमे से सबसे बड़ा मसला है जिसमे करमवीर ने कमान सम्भाली।
अब आजके ही दिन गुज़रे जयनारायण व्यास को देखिये पहला इंसान जिसने जागीरदारी प्रथा को खत्म करने की बात की।काँग्रेस के ऐसे नेता जिनके पीछे अथाह हुजूम।राजस्थान के मुख्यमंत्री बनते ही देश को बुनने का काम शुरू।मुझे अफ़सोस है की इन बनाने वाले लोगों को एक ही तराज़ू में तौलकर सब कुछ भुला दिया गया।

मैं आइंस्टीन के किस्से में हाथ नही डालूँगा क्योंकि उनपर खूब लिखा पढ़ा गया है।रबीन्द्रनाथ टैगोर का उनसे मिलना और वोह बातचीत किस हद तक लिखी जा चुकी है पढ़ी जा चुकी है।आइंस्टीन का संघर्ष और उनकी दुनिया की दें को कौन भुला पाएगा।गाँधी पर आइंस्टीन का जवाब ही तो मुझे गाँधी की तरफ और बढ़ जाने को कहता है।अब रही बात आमिर खान की तो वोह आपके सामने हैं।उनकी कला को चाहे नकारिये या तारीफ़ करिये यह आपके किरदार का मसला है।

मेरा इन सबको छूने भर का सिर्फ इतना मकसद है की तारीख़ के ही सहारे सही कम से कम उन लोगों को जान लीजिये जो मुल्की की नीव रख रहे थे तो कुछ दुनिया की ज़िन्दगी आसान कर रहे थे।इनके होने से दुनिया खूबसूरत बन रही थी।इनके जाने से दुनिया ने अपने प्रेमियों को खोया।ज़रूरी नही की आप हर एक को मानिये मगर हर एक की दुनिया को दी गई चीजों के लिए नज़रअंदाज़ नही कर सकते।इनमे से कोई तालाब है तो कोई नदी तो कोई समन्दर मगर हर एक की समाज को बराबर ज़रूरत है।
मुझे सीमा के लिए करमवीर चाहियें,ज़िन्दगी आसान करने के लिए आइंस्टीन तो ज़िन्दगी को दिशा देने के लिए मार्क्स,उस दिशा को ज़मीन पर उतारने के लिए जयनारायण व्यास और इस ज़िन्दगी में रस के लिए आमिर खान।तभी तो ज़िन्दगी खुशनुमा बनेगी जब सब तरह के रँग होंगे।जब सब तरह का मज़ा होगा।यही तो दुनिया है आज उन सबको याद करलें।यह हमारे अपने हैं।

Saturday, March 11, 2017

होली

ज़ाहिर है दो दिन देश रँग में रँगा रहेगा।यह वोह वक़्त है जब गरीब अमीर सबके चेहरों पर रँग होगा।मैं सोचता हूँ की यह जो होली है यह इस क़दर एक जैसी है की सबको बराबर कर देती है।अमीर गरीब में रँग की गुणवत्ता को लेकर फ़र्क़ हो सकता है मगर रँगो का फ़र्क़ नही होता।वही हरा, लाल पीला उनके चेहरों को एकसा रँगता है।

मैं त्योहारों में छुपे भारत को देखता हूँ,इनके मन को टटोलता हूँ।देखिये हम रोज़ की जद्दोजहद में भी अपनी खुशियों के दिन गढ़ लेते हैं।फसलें हमारे त्यौहार तय करती हैं।मौसम उनपर असर डालते हैं।मुझे इससे ज़्यादा प्राकृतिक और क्या लगेगा की हर एक ख़ुशी प्राकृतिक की करवट बदलने पर टिकी हुई है।यह त्यौहार मौसमो के स्वागत और अलविदा की निशानी तो हैं ही साथ ही कितना कुछ समेटे हैं।

अक्सर लोग होलिका जलाने पर प्रश्न उठाते हैं।वोह यह नही सोचते की सिर्फ औरत हो जाने से गलत कामो पर पर्दा नही डाला जा सकता है।उन्हें होलिका का ग़म है मगर उस बच्चे का नही जिसे वोह आग में लेकर बैठती है।मैं इन कहानियों की सच्चाई में नही जाता बस इतना भर की जो गलत होगा वोह चाहे औरत हो या आदमी या थर्ड जेंडर,गलत तो गलत ही कहलाएगा।उसे लैंगिक लाभ नही दिया जा सकता।खैर इस पर आप हमारी जमकर आलोचना कर सकते हैं मगर मेरे लिए सब बराबर हैं मैं इनके पाप और पुण्य में लैंगिक भेद नही करता।

आज जो लोगों के बंटने और कट्टरता को बढ़ने की बात कर रहे हैं।वह देखें की क्या उनका चरित्र ऐसा है की लोग उन्हें अपनाए।आप त्योहारों में हैप्पी होली कहकर दिलों के करीब नही जा सकते।उसमे शामिल होईये।रँग की छींटे कब सिवइयों में घुल केक तैयार करने लगेंगी पता भी नही चलेगा।दूसरों के त्योहारों,पसन्द न पसन्द पर नाक भौं चढ़ाकर आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं की वोह लपक कर आपको गले लगाएगा।

मैं जब होली को देखता हूँ तो मुझे लगता है आखिर यह त्यौहार हैं जो आंदोलन की तरह सदियों से चले आ रहे हैं।इनसे जुड़ी कहानियाँ आज भी ज़िंदा हैं।यह रँगो में उस चरित्र को महसूस कीजिये जो आज ख़ुशी में सब रँगो को समेट लेना चाहता है।मैंने होली में कभी किसी को किसी भी रँग से परहेज़ करते नही देखा,बल्कि जितना ज़्यादा रँग उतनी मदमस्त होली।यानि आपमें जितने रँग होंगे वही तो त्यौहार होगा।वही तो प्रसन्नता का शीर्ष होगा।

त्योहारों में कमियां निकालने की जगह उनका हिस्सा बनकर खुद की कमियाँ दूर की जाएँ तो बेहतर है।उन खुशियों को महसूस कीजिये जो हमारी मुश्किल भरी ज़िन्दगी में ओस भरती हैं।मुस्कुरा लीजिये ताकि चेहरे पर नमी बनी रहे।रँगो की इस खूबसूरत फ़िज़ाओं में सबको मुबारकबाद।हर त्यौहार हमारा है और हर हम हर त्यौहार के हैं।मज़े कीजिये,आज से रँग है।

Friday, March 10, 2017

कोई लौटा दे पुरानापन

मुझे नई चीज़ों से उलझन होती है।मज़ा पुराने सामान में आता है।जब किसी के यहाँ जाऊ तो उसके नए बर्तन में खाना हमे रोकता है।मै चाहता हूँ की वह हमे पुराने कप में चाय दे।उसमें जिसे उसने सैकड़ो बार धोया हो।अपने होंटो से लगाया हो,तब तो अपनापन है।नहाते में जब कोई मेज़बान नई तौलिया देता है तो वह जिस्म में परायापन पैदा करता है।
मुझे तो वह घिसा, पिटा तौलिया ही पसन्द है जो सैकड़ो बार उनके बदन को सुखाता रहा हो।मुझे नई चादरों में नींद नही आती।यहाँ तक नया टूथ ब्रश भी तकलीफ देता है।मुझे अपना पुराना बिखरा सा ब्रश पसन्द है।मैं जब चाहता हूँ इस ब्रश को बदलना तो विरह की वेदना से गुज़रता हूँ।चमकदार नए जूते पैरों को सही रास्ता नही दिखाते।सड़क पर जम कर घिसा जूता मेरी पहली पसन्द है।पता नही क्या शौक़ है।खैर है तो है।पुरानी पीली किताबो में तो मैं बसता हूँ।उसका हर पन्ना हमें सुकून देता है।उस किताब को मैं महसूस कर पाता हूँ।
कभी हँसी आती है,कभी रोना,मगर दोनों ही सूरत में आँसू आ जाते हैं।अब उन्हें अगर नए रुमाल से पोछू तो आँखे सुर्ख़ हो जाए इसलिए पुराना रुमाल भी मेरे शौक में शुमार है।मुझे कपड़ों की प्रेस तो बेहद चुभती है, क्रीज़ से बड़ा दम घुटता है।मुझे चमकती चमचम दीवारों से काई लगी बेदम दीवारें अपनेपन का एहसास देती हैं।खैर कुछ काम तो दूसरों के लिए करने पड़ते हैं इसलिए बहुत कुछ चाहकर नही कर पाता।हिम्मत रही तो वह भी करेंगे।
आपके नएपन में हमारा पुरानापन एक धब्बा ही तो है।फिर भी देखिये कितना पुराना लिखा हुआ भी हमे आज नया ही लग रहा है।

Thursday, March 9, 2017

आलेख ध्रुव जी

आपने मेकअप बॉक्स देखा होगा।उसमे काजल होता है, पाउडर,क्रीम,लिपिस्टिक वगैरह।इसमें नासमझ से नासमझ इंसान भी बता सकता है यह इंसान को खूबसूरत बनाने का सामान है।अब ज़रा कोई काजल को मुँह भर में लगा दे और उसमे रखी कैंची से आँख फोड़ दे तब क्या होगा।यही चेहरे को खूबसूरत बनाने वाली चीज़ें उसे बदसूरत बना देंगे।ठीक ऐसे ही,बिलकुल ऐसे धर्म है।धर्म का काम इंसानियत को खूबसूरत बनाना है।अब अगर कोई इसका गलत इस्तेमाल करे तो ज़ाहिर है खूबसूरती फौरन ही बदसूरती में बदल जाएगी।
अब ज़रा अपने इर्द गिर्द देखिये।धर्म के नाम पर क्या क्या हो रहा है।अभी कुछ वक़्त पहले पाकिस्तान में शाह कलन्दर की मज़ार पर कत्लेआम मचा दिया गया।सैकड़ो लोग इस सनक की भेंट चढ़ गए की वोह अधर्म कर रहे थे।नाचना और कव्वाली को अधर्म ठहराकर उन्होंने मासूम इंसानों का ख़ून बहाकर धर्म की अच्छी परिभाषा गढ़ी है।यही वोह लोग हैं जो मेकअप बॉक्स की कैंची से बाल सवारने की जगह आँखे फोड़ते हैं।ऐसे उदाहरण से हर देश भरा पड़ा है।कहीं कोई ज़मीन नही ख़ाली जहाँ धर्म की रक्षा किसी का ख़ून बहाकर नही की जा रही हो।
यह सोचने का विषय है की जो उत्थान के लिए आया था वोह पतन का कारक कैसे हो गया।जिसे इंसानों में खुशबू भरनी थी वोह सड़ाँध में कैसे बदल गया।जब यह सोचने लगेंगे तो सबसे पहले ही इसकी वजह पकड़ में आ जाएगी।एक बार इन सभी धर्मो के झंडाबरदार को देखिये।यह सब आपको बताएँगे धर्म सरलता को कहते हैं।जीवन सादा जीना चाहिए।संयम पर घण्टा भर बोलेंगे मगर जैसे ही आप इनपर ऊँगली उठाइये इनका खुद का संयम कितना क्षणभंगुर है, पता चल जाएगा।जिनके हाथ में धर्म की कमान है वोह इतने सरल हैं की आप उनसे मिल नही सकते।एक बार ईश्वर आपको आसानी से मिल जाएगा मगर यह नही।
पीछे मुड़कर देखिएगा की जिन सन्तों,सूफ़ियों ने धर्म का प्रचार किया,क्या वोह आलीशान महलों में रहते थे।या उनसे मिलने के लिए आपको जेब ढीली करनी पड़ती थी।या उनके दरबार में विशिष्ट,अतिविशिष्ट,
साधारण वर्ग निर्धारित थे।यही जड़ है, जब प्रचार ही गलत हाथों में हैं तो नुकसान तो उठाना ही होगा।इन सबके बीच भी कुछ मुट्ठीभर लोग बेहतर काम कर रहें हैं बस उन्हें सामने लाने की कोशिश करनी चाहिए।यह वोह लोग हैं जिनके मुँह से तोड़ने की बातें नही निकलती,यह तो जोड़ते हैं।
कुछ लोग खड़े होकर एक सिरे से धर्मो को ख़ारिज कर देते हैं, यह भी एक गलत पृवृत्ति है।वोह भूल जाते हैं की हमे इन्ही धर्मो ने किस क़दर संवारा है।अलग अलग बिखरे हुए लोगों को एक समूह में जोड़कर सभ्यता का निर्माण भी इन्ही धर्मो की देन है।बस गलती इतनी भर है की वक़्त के साथ जो बुराइयाँ आती जाती हैं उन्हें दूर करने की कोई व्यवस्था नही है।बस यही बुराई का लाभ उठाकर कोई कब सैकड़ों का ख़ून पी ले,कहना मुश्किल है।
पहले समाज सुधारक और धर्म सुधारक हर जगह होते थे।यह किसी के मोहताज नही थे,यह अकेले घूम घूम कर बुराइयों के विरुद्ध सचेत करते रहते थे।जिसका बड़ा असर पड़ता था समाज पर मगर अब क्या।अब तो इनकी जगह सामाजिक आलोचक और धर्म आलोचकों ने ले ली है।यह किसी भी हाल में सुधार नही चाहते,चाहें भी कैसे जब इनके विचार में धर्म टिकता ही नही है।यह आलोचना करेंगे मगर हल नही बताएँगे।यह धर्म में पड़ रहे कीड़े दिखाएंगे मगर उन्हें दूर करने नही उठेंगे।यह ऐसे लोग हैं जो धर्म की विकृतियों पर दस दस घण्टे बोल सकते हैं और इतना लिख सकते हैं की प्रगति मैदान भर जाए मगर निकल नही सकते।दो क़दम यह धार्मिक सुधार के लिए नही चलेंगे।
इसलिए कहते हैं की हर बुराई की जड़ सिर्फ एक में नही हैं।धार्मिक कट्टरता का पागलपन एक दम से बढ़ा भी नही है।यह भी तो देखिये इसे रोकने को क्या किया गया है।किसने एक अभियान के तहत धार्मिक विसंगति को दूर करने की चेष्ठा की है।दो चार जो अपने को सुधारक करकर टीवी पर दिखते हैं, वोह सिर्फ व्यंग्य और मज़ाक उड़ाने के माहिर हैं।यह लिख लीजिये किसी का भी मज़ाक उड़ाकर आप जीवन में कभी सुधार नही ला सकते ह।

धार्मिक कट्टरता लगातार बढ़ रही है इसमें कोई शक नही है।भारत समेत ज़्यादातर देश इसकी ज़द में हैं।पाकिस्तान और अरब देश अपने ही नागरिकों के ख़ून से सुर्ख़ हो चुके हैं।भारत में लगातार एक दूसरे धर्म को तिरछी निगाह से देखा जा रहा।कभी कभार तिरछी निगाह कटारी में बदल कर ख़ून भी बहा देती है।यह ख़ून खाने के पागलपन से भी शुरू हो सकता है।इन सबसे चिंता की बात तो यह है की आमजन को इनका सहयोग मिल रहा है।ख़ून बहाने वालों के माँ बाप भी उन्हें अपनाए हुए हैं, बल्कि बेहियायी से उनके साथ खड़े हुए हैं।उन्हें नही पता की उनके अपने घर में उनका बेटा कब खूंखार जानवर में बदल चुका है।
ताज्जुब तो यह है की अमरीका जैसे देश में भी यह पागलपन सर चढ़ कर बोल रहा है।देश,भाषा,खाने पीने, धर्म,रँग के आधार पर ख़ून बहाने को समाज ने मौन स्वीकृति दे रखी है।हर घटना को पिछली घटना से सही साबित किया जा रहा है।हर गुनाह को यह कहकर सही ठहराते हैं की कल भी तो यह गुनह हुआ था।अब कौन बताए जो कल गलत था वोह आज भी गलत है।जो कल अपने धर्म के लिए आपका ख़ून बहा रहे थे वोह कल गलत ही थे।उनके बदले जो आज आप ख़ून बहाएंगे वोह भी उतना ही गलत होगा।
मैं यह नही कहता की एक तरफ से सबको छाँटना शुरू कर दें मगर इतना तो हो सकता है की अपने अंदर मौजूद बुराई को धीरे धीरे तो खत्म कर सकते हैं।हमसे धर्म को अपनाते हुए इतनी गलती तो हो ही गई की यह मस्जिद मन्दिर गिरजे से निकलकर खेल के मैदान,
व्यापार,स्कूल, किचेन सब जगह पहुँच गया।सब जगह पहुँच उसने ऐसे ऐसे लोगों को बाँट दिया की हर चीज़ का मज़ा चला गया।
अभी बहुत वक़्त नही गुज़रा है अगर आप अपने बच्चों को खुशहाल ज़िन्दगी देना चाहते हैं तो ठहर जाइये।उसके मन में शुरआत में ही दूसरे धर्म के लोगों के प्रति विष न भरिये।अगर वोह ऐसा बाहर से सीख कर आए तो उसे समझाइये।यह इसलिए ज़रूरी है क्योंकि कल जब आप नही होंगे तब तक माहौल और बुरा हो चुकेगा,तब आपके बच्चों को आपके दिए माहौल में घुट घुट कर मरना होगा।इसलिए एक बार उन देशों की तरफ देख लीजिये जिनके सनकपन ने बच्चों को रेत पर उल्टा बहा दिया है।उन देशों की दीवारों से सीखिये जिनमे उनके बच्चों की ख़ाली चिपकी हुई हैं।कल अगर अपनी ही ज़मीन पर अपने बच्चों के भुनने की गंध नही सूँघनी हैं तो आज तैयारी कर लें।
हमारे नज़दीक़ भी कट्टरपन का भेड़िया आ चुका है।हमारे भी अपने लोग उस भेड़िये के दाँतो में लगे ख़ून को देख खुश होने लगे हैं।जिनको इन भेड़ियों के दाँतो में फंसे इंसानी गोश्त के रेशे विचलित करते हों,वोह उठ खड़े हों।अब वक़्त है की ज़मीन पर आइये और मुकाबला कीजिये।हमारी माटी की खूबसूरती बचाना हम सबका फ़र्ज़ है।शाह कलन्दर हो या हमारे यहाँ का कोई मन्दिर मस्जिद या हमारे अपने घर और बाजार।अगर हमे इन्हें ख़ून से रँगने से रोकना है तो इस कट्टरपन पागलपन के विरुद्ध बिना संकोच के खड़े हो जाइये।ख़ामोशी से बैठना भी तो इनको साथ देने जैसा ही अपराध है।हर उस चीज़ का विरोध कीजिये जो समाज को बाँटे।हर उसके साथ होईये जो समाज को जोड़े।यह जो धर्म है जोड़ने के ही लिए तो आए थे।इन धर्मो को तोड़ने का साधन बनने से बचाइये।यह सही है की धर्म को आपकी ज़रूरत है।धर्म को अधर्म से बचाने की ज़रूरत है।धर्म को उन हाथों से आज़ाद करवाइये जो छुपकर उसका गला घोंट रहें हैं।यह धर्म हमारी खूबसूरती बढ़ाने के लिए हैं।दिलों को मासूम करने के लिए हैं।हमारे जिस्म में खुशबू डालने के लिए हैं।इन्हें आज हमारी ज़रूरत है।यह धर्म ही समाज को फिर संवारेंगे क्योंकि और कोई रास्ता अभी तक तो नज़र नही आ रहा,हो सकता हो मगर जब वोह दिखेगा देखा जाएगा।अभी उठकर जोड़िये वरना तोड़ने वाले इतने ताक़तवर हो जाएँगे की हर तरफ सुर्ख़ रँग ही रह जाएगा।
हफ़ीज़ क़िदवई