Thursday, August 31, 2017

राही मासूम

इसे पढ़कर बेचैनी होगी,जैसे गई रात बेचैनी में गुज़री।मेरे पास ज़्यादतर के पोस्टल एड्रेस थे मगर एक नही था।तमाम दोस्त,रिश्तेदार,हिन्दू,मुस्लिम,ठाकुर,पण्डित,दलित,अगड़े,पिछड़े,अपने,पराए सबके पोस्टल एड्रेस थे मगर नही था तो हिंदुस्तान का।मेरा हिंदुस्तान जिसकी पहचान ख़ालिस हिन्दोस्तानी हो।जिसमे मज़हब,ज़ात,रँग न हो।तड़प कर मुझे उस शख्स की याद आ गई,जो ज़िन्दगी भर बेचैन बेचैन हमारे हिंदुस्तान का पोस्टल एड्रेस को ढूंढता हुआ पता नही कहाँ चला गया।उसकी याद में जैसे ही लिखने की सोचा की गुज़री रात का चाँद आँखों के सामने आ गया।मेरी नज़र धुन्धला गई।ऐसे में उनके ही लफ़्ज़ मेरी ज़ुबां पर तैरते रहे,आज बहुत से लोग इस ज़मीन से दूर ईद मना रहे होंगे,तो चाँद उन्हें ऐसे ही तो लगरहा होगा......

"हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चाँद
अपनी रात की छत पर, कितना तनहा होगा चाँद
रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम में जाकर, अटका होगा चाँद
चाँद बिना हर दिन यूँ बीता, जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चाँद।।"

यह अल्फ़ाज़ उनके हैं जिसने दिल पर हाथ रखा तो वोह लफ्ज़ निकाले की दुनिया देखती रही।जिसने आँख में आँख डाल कर वोह लिख दिया जिसे हम सोच भी नही पाए।भारत का कोई भी शख्स बचा होगा जिसने उसके क़लम को महसूस न किया हो।नीम का पेड़,आधा गांव, दिल एक सादा कागज, ओस की बूंद, हिम्मत जौनपुरी, कटरा बी आर्ज़ू, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद, सीन ७५,छोटे आदमी की बड़ी कहानी,लिखने वाले कलम के मज़बूत स्तम्भ की बात कर रहा हूँ।अब भी नही समझे।अर्रे वही जिनके लिखे लफ्ज़ घर घर में दोहराये या कहें पूजे जाते थे।महाभारत के डायलॉग लिखने वाले ग़ाज़ीपुर,यूपी के छोटे से गाँव गंगौली में पैदा हुआ राही मासूम रज़ा की बात कर रहा हूँ।मैं राही पर लिखने को तैयार बैठा था मगर क्या करूँ,उनमे उलझता ही चला गया।अपनी मामूली सी कलम में राही को उतारने की कोशिश करनी चाही,मगर लगा यह तो बेईमानी है।जब आपसे राही की बात करूँ तो राही केही अल्फाज़ो के साथ करूँ ताकि आप उन्हें महसूस कर सकिये।राही के इन अल्फाज़ो में सौंधी खुशबु और दिल में चुभी टीस को महसूस कीजिये...

"क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए
क्‍या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए।
हम भी कैसे दीवाने हैं किन लोगों में बैठे हैं
जान पे खेलके जब सच बोलें तब झूठे कहलाए।
इतने शोर में दिल से बातें करना है नामुमकिन
जाने क्‍या बातें करते हैं आपस में हमसाए।।
हम भी हैं बनवास में लेकिन राम नहीं हैं राही
आए अब समझाकर हमको कोई घर ले जाए ।।
क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए ।"

अगर बोर न हो रहे हों।तबियत ऊब न रही हो तो इन अल्फाज़ो में छुपे राही को भी लपक लीजिये।इन्हें इसकी सिलवटों में ढूंढ लीजिए।साथ ही देखिये हमारे राही ने कौन सी राह बनाई है।उस राह में कौन फूल है।कौन कांटा है।कौन उस राह को रोक रहा तो कौन उस राह को बना रहा।....

"मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
लेकिन मेरा लावारिस दिल
अब जिस की जंबील में कोई ख़्वाब
कोई ताबीर नहीं है
मुस्तकबिल की रोशन रोशन
एक भी तस्वीर नहीं है
बोल ए इंसान, ये दिल, ये मेरा दिल
ये लावारिस, ये शर्मिन्दा शर्मिन्दा दिल
आख़िर किसके नाम का निकला
मस्जिद तो अल्लाह की ठहरी
मंदिर राम का निकला
बन्दा किसके काम का निकला
ये मेरा दिल है
या मेरे ख़्वाबों का मकतल
चारों तरफ बस ख़ून और आँसू, चीख़ें, शोले
घायल गुड़िया
खुली हुई मुर्दा आँखों से कुछ दरवाज़े
ख़ून में लिथड़े कमसिन कुरते
एक पाँव की ज़ख़्मी चप्पल
जगह-जगह से मसकी साड़ी
शर्मिन्दा नंगी शलवारें
दीवारों से चिपकी बिंदी
सहमी चूड़ी
दरवाज़ों की ओट में आवेजों की कबरें
ए अल्लाह, ए रहीम, करीम, ये मेरी अमानत
ए श्रीराम, रघुपति राघव, ए मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम
ये आपकी दौलत आप सम्हालें
मैं बेबस हूँ
आग और ख़ून के इस दलदल में
मेरी तो आवाज़ के पाँव धँसे जाते हैं।"

ऐ राही,मेरे राही मासूम रज़ा मुझे माफ़ करना,आपके साथ अपने अल्फ़ाज़ को जोड़ने की गुस्ताखी की है।आज आपकी सालगिरह पर मैं करूँ तो क्या करूँ।चाह रहा हूँ की पूरा का पूरा आपको पढ़ डाले।चाहत है आप पर सब लिख डाले।राही मैं महाभारत के संजय की तरह आपकी पूरी कहानी कह देना चाहता हूँ मगर आप विशाल हैं, विराट हैं और हाँ मैं कोई राही तो नही की इतनी विशालता को इतने आसान लफ़्ज़ों में उतार लूँ।बस राही हमेशा की तरह राह में साथ रहना।ताकि आपकी समझ से और अपनी आँखों से खूबसूरत भारत देख और जी पाऊँ।राही के मन का भारत बना पाऊँ....

अमृता

आज  अक्खां  वारिस शाह ,कितो कब्रा  वियो नू........पंजाबी में सूफियाना कलाम। पंजाबी को शायद ही किसी ने अमृता प्रीतम से ज़्यादा मोहब्बत की हो। सैकड़ो कहानी,कविताय ,उपन्यास लिखने वाली अमृता ने जो कुछ भी किया टूटकर किया। लिखा तो टूटकर,गुनगुनाया तो टूटकर और मोहब्बत की तो टूटकर। 

पता नहीं क्यों लोग शीरी फरहाद की कस्मे कहते है। मोहब्बत में लैला मजनू की सदाएँ  देते है। अमृता की  मोहब्बत भी तो है।तड़प की मोहब्बत,कसक की मोहब्बत,बिना  शिकवे की मोहब्बत अमृता साहिर की मोहब्बत ,पंजाबी उर्दू की मोहब्बत ,लिखावट और जज़्बात की मोहब्बत,सूफियाना और शायराना मोहब्बत।

अमृता ने लिखा एक बार दिल्ली में दुनिया भर के राइटर्स का सेमिनार हो रहा था ,उसमे साहिर और हमें भी  बैज दिए गए। मगर शरारतन या कहे मोहब्बत की वजह से साहिर ने मेरा और मैंने  साहिर के नाम का बैज लगा लिया। स्टेज पर एक जनाब आए और माफ़ी मांगते हुए कहा "अरे अमृता जी गलती से आपको गलत बैज दे दिया गया है...अभी सही करवाते है" इतने में तपाक से साहिर ने जवाब दिया "गलती आपसे हुई थी मगर हमने सही कर ली है आप इत्मीनान  रखिये"।कितनी शिद्दत की मोहब्बत थी।रूहों की मोहब्बत नामो से खेल रही थी।

अमृता उस रात के ज़िक्र में कभी कुछ न लिख सकी जिस रात साहिर ने दुनिया को अलविदा कहा था। अमृता को रात २ बजे बुल्गारिया में खबर मिली की साहिर इस दुनिया से कूच गए। वह पूरी रात फोन के पास बैठी रोती  रही। अमृता ने एक जगह कहा भी " हमें लगता है खुद से गलती हो गई। उस दिन हमने जो बैज बदले थे। उन्ही नामो का धोखा हो गया फरिश्तो को। अमृता उस रात के बाद हर रात साहिर के ख्यालो में  जागती रही।

जब साहिर की मौत की खबर अखबारों में छपी तो आपको पता है एक बड़े अख़बार ने क्या किया। अमृता की बड़ी सी तस्वीर पहले पेज पर छापी उसमे अमृता की आँखे आंसुओं से भरी हुई थी और हेडलाईन थी सहिर……… साहिर.......सहिर…………

सच कहें तो मुझे मेरे इर्द गिर्द साहिर या इमरोज़ से अपनी अमृता ज़्यादा करीब लगती हैं।अमृता के होने से ही मेरे नज़दीक़ इनका होना है।मैं ने साहिर को अमृता से ही समझा है।उनकी आँख में ही झाँककर इमरोज़ को देखा है।मुझसे तो अमृता रोज़ ही मिलती ही हैं, आज भी मुस्कुरा कर चाय दे रहीं थी,चेहरे पर पड़ी सिलवटों में अमृता ने अपना जन्मदिन ही छिपा दिया,सुबह से नाराज़ थीं की हमने याद भी नही किया।मगर वह भूल रही थी की सुबह से कुछ लिखा भी तो नही,सिवाए अमृता अमृता अमृता अमृता अमृता के....

Wednesday, August 30, 2017

बच्चे मर रहे हैं, तो क्या

बच्चे वोट नही देते इसलिए उनकी फ़िक्र की ही क्यों जाए।रही बात बच्चों के अभिभावकों की तो यह भी नया नही है की कई सालों से मरते बच्चों के ही अभिभावक उन्हें चुनते आए हैं तो भला फ़िक्र क्यों की जाए।
"बच्चे पैदा करके लोग समझते हैं की उसे सरकार पाले।"बहुत लोग कहेंगे की इसमें गलत क्या कहा है।कुछ भी तो नहीं।बस एक बार यह बयान मुँह बदल कर देखिये।यह इनके अलावा किसी दूसरी पार्टी के नेता ने कहा होता तो आप हम जामा नोच डालते।याद है कुछ शिवराज पाटिल।जिन्हें सिर्फ दिनभर में चार बार कपड़े बदलने पर बर्खास्त होना पड़ा था।

वह मुर्ख सरकारे थीं शायद जो आपकी फ़र्ज़ी संवेदनशीलता पर अपने गृह मंत्री का इस्तीफा ले लेती थीं।वह महा मुर्ख थीं जो रेलवे के हादसे पर कुछ ही दिन पहले बने रेलवे मंत्री को बर्खास्त कर देती थीं।खैर मुझे भी कोई फ़र्क नही पड़ता,गोरखपुर में बच्चों के मरने का अफसोस बेहद है।दिल डूबा डूबा रहता है मगर क्या करें,वहीं के लोग ही तो इनको दशको से चुनते आए हैं।आज भी चुना है।कल भी चुनेंगे इसे आप लोकतान्त्रिक गुलामी भी कह सकते हैं।

ओह गॉड,यह सब मैं क्या लिख गया।मेरा काम तो यह लिखना है, यहाँ सब शाँति शाँति है... मुझे तो बच्चों की मौत से ज़्यादा फूलों की रस चूसती तितली पर लिखना है।मुझे राजनीति नही करनी होगी,मुझे तो शबरी के झूठे बेर के निशान ढूंढकर लिखने चाहिए।हाँ तो बच्चों स्वर्ग में तो मिल नही पाएँगे क्योंकि हम लोगों ने यहाँ तुम्हारे लिए नरक बना रखा है।नफ़रत के ड्रम के ड्रम भर रखें हैं।तो भला ऊपर तुम हमारे लिए क्या ख़ाक स्वर्ग के दरवाज़े खोलने दोगे।जब हम सब बड़े लोग,जिन्होंने तुम्हारी मौत को चुनने वालों को चुना था,नरक जा रहे होंगे,तो रोते हुए तुम ईश्वर से यह मत कहना की मेरे माँ बाप को जन्नत में भेज दें।

यक़ीन जानो ऊपर से नीचे तक शर्म से गड़ जाएँगे,हम सब।दूसरों का पता नही,मैं खुद दौड़कर नरक की आग में कूद जाऊँगा,जहाँ तुम्हारी मासूम सूरत नज़र न आए।तुम्हारी चीखें सुनाई न दें।तुम्हारे दर्द से तड़पते बदन दिखाई न दें।जन्नत में अगर पहुँचे तो सारी उम्र नज़रे झुका झुका कर रहना पड़ेगा,वह भी बच्चों से,यह कहाँ हमे मंज़ूर,हम तुम्हे पाल भले नही सकते मगर मार तो सकते हैं।मारने से सरकार को कोई नही रोक सकता,यही तो उसे आता है....

Tuesday, August 29, 2017

ऐनी,इस्मत,फ़िराक़,ध्यानचंद और मैं

अगस्त बीत रहा है या कहें बीत चुका है।लोग कहीं बच्चों,कहीं बाढ़ तो कही रेलवे की तरफ देख अगस्त को कोस रहे हैं।मैं क्या कहूँ,मैं तो एक कमरे में बैठा हूँ।बिलकुल चौकोर कमरे में,जिसकी हर दीवार बिल्कुल बराबर है, संग सफ़ेद दीवारों के बीच में फर्श पर बैठा हूँ।फर्श धँस सा रहा है, लगता है मिटटी नरम हो रही है।मेरे इर्द गिर्द कुछ तस्वीरें बिखरी पड़ी हैं।

मैं एकटक उन तस्वीरों में ऐनी आपा को देखे जा रहा हूँ।चश्मा और घुंघराले बालों में गालों की झुर्रियां इब्ने सफी के नावेल की सफ सी लग रहीं हैं, जितना पढ़ो,उतना गहरा।अच्छा तो तुम ऐनी आपा को नही जाने,वही आग का दरिया वाली कुर्रतुल एन हैदर।अगस्त ने हमसे मेरी ऐनी आपा को भी तो वापिस लिया था।उनकी ज़िन्दगी में कितना दर्द था,मैं बार बार तस्वीर में वह दर्द ढूंढ रहा हूँ और वह उसमे मुस्कुराकर सब छुपा ले रहीं हैं।

दूसरी तरफ जो तस्वीर पड़ी है वोह लिहाफ वाली आपा की है।मेरी इस्मत आपा की,वह भी एकटक देख रहीं हैं जैसे अभी मेरे चेहरे पर पड़ा नक़ाब खींचकर उतार देंगी।जैसे लिहाफ उतारा था।इस्मत चुगताई भी तो अगस्त से जुड़ी हैं।ऐनी आपा इस महीने गई तो इस्मत आपा इसी महीने आई, ग़म और ख़ुशी को बैलेंस कर दिया दोनों ने,इस्मत हमे देख देख मंटो के जुमले उछाल रहीं हैं।

यह जो पीछे तस्वीर पड़ी है।यह वही गोरखपुर की है जहाँ बच्चे ख़ामोशी से परेड करते हुए जन्नत जा रहें हैं।हर जाता हुआ बच्चा इतनी बेहतरीन उर्दू की नज़्म पढ़ते जा रहें की जन्नत खुद नीचे उतर आना चाहती हैं।जन्नत के सरदार बच्चों की मासूमियत और दिमागी बुखार के बावजूद इतनी बेहतरीन जहनियत की वजह से चीख़ रहें हैं, यह फ़िराक़ की ज़मीन से आए हैं।यह फ़िराक़ की फसल हैं।देखो गोरखपुर से फ़िराक के तराने को पढ़ते यह बच्चों की टोली आ रही है।फ़िराक़ भी तो अगस्त से जुड़े हैं।

अगस्त में कुर्रतुल एन हैदर,इस्मत चुगताई,ध्यानचंद और फ़िराक़ गोरखपुरी से जुड़े दिन हैं।इनमे से किसी को नही देखा सिवाए कुर्रतुल एन हैदर के,यानि ऐनी आपा के,उनके बहुत से किस्से याद हैं।अगस्त बीतता रहा और हम ऐनी आपा को ही याद करते रहे मगर लिख नही सके।हमे लगा ऐनी आपा की ज़िन्दगी का दर्द अगस्त महीने में पैबस्त हो गया है।हर तरफ दर्द में बिखरे जिस्म हैं।हर जिस्म में ऐनी आपा हैं।नही लिख सका, वह बातें जो देखि थीं।नही कह सकता वह सब,जो ऐनी आपा छोड़ गईं।

खैर जाते जाते आप सबको एक साथ याद किया है।कितना कँजूस और असंवेदनशील हैं हम।थोड़े से लफ़्ज़ में बच्चों समेत आप सबको समेट दिया,क्या करें,बिना ख़ून की ज़मीन कम ही बची है।हर तरफ तो मौत बिखरी पड़ी है।सब आपसे मिलने को बेचैन हैं, तभी तो जल्दी जल्दी जा रहें हैं।हम जब तक नही जा रहें,तब तक यहीं,इसी कमरे में बतयाते रहिये।फ़िराक़ की नज़्म के माइने इस्मत बताएंगी,इस्मत की जली कुटी बातें कुर्रतुल और कुर्रतुल के लिए मैं हूँ न...

Monday, August 28, 2017

रेलवे प्रभु की

यात्रीगण ध्यान दें रेलवे लाइन के पास मत खड़े हों,बेंच पर ही बैठे रहें,ट्रेन खुद पटरी छोड़कर बेंच तक आ सकती है तो आप ज़हमत मत कीजिये।यात्रीगण रेलवे ट्रैक पर केले और आम या किसी फल के छिलके मत फेंके ट्रेन फिसल सकती है।आपकी एक गलती,सैकड़ों लोगों की मौत रेलवे को हल्का सा परेशान कर सकती है।

हाँ जिन यात्रियों के ज़ुकाम हो वह कृपा करके रेलवे ट्रैक से दूर रहें,उनकी छींक से ट्रेन का ध्यानभंग हो सकता है और वह पलट सकती है।शरारती किस्म के यात्रियों को रेलवे की अंतिम चेतावनी की वह चलती ट्रेन में लंगड़ी न लगाए,ट्रेन लुढ़क सकती है।आपकी शरारत सैकड़ों मौतों पर रेलवे को हल्के से परेशानी में डाल सकती है।

जिनके घर रेलवे लाइन के किनारे हों वह ट्रेन की लम्बाई के अनुपात में ट्रैक से दूर घर शिफ्ट करलें।क्योंकि अक्सर पैंट्री कार में खाना कम पड़ने पर चलती ट्रेन आपके किचन तक आ सकती है।आखिर रेलवे को यात्रियों को भूखों तो मारना नहीं है।

इन सबसे इतर जिनके घर का कोई व्यक्ति रेलवे में सफ़र करने जा रहा हो,उससे कहिये की सारे खानदान से मिलकर जाए।बच्चों,भाइयों के गले लग कर जाए।बाँहों पर इमाम ज़ामिन बांध दीजिये।ऐसे विदा कीजिये जैसे वह एवरेस्ट की चढ़ाई पर जा रहा हो,पता नही क्या हो,फिर भी लौट आने की उम्मीद ही रहे।पूरा घर स्टेशन के आधा किलोमीटर दूर तक छोड़ने आना चाहिए।एक्साइटेड होकर स्टेशन के ज़्यादा करीब मत चले जाइयेगा वरना पूरे परिवार को ढेर भर यात्री समझकर कोई भी ट्रेन उधर आ सकती है और आप सबका ट्रेन के अंदर की जगह नीचे आना रेलवे को हल्के से परेशान कर सकता है।

यह सब इसलिए क्योंकि प्रभु के कहने पर यमराज एन्ड कम्पनी दुनिया की सबसे विशाल,सबसे विराट,सबसे लम्बे,सबसे ऊँचे,सबसे गहरे,सबसे भयंकर,सबसे निर्मल,सबसे आध्यात्मिक,सबसे सुंदर,सबसे मज़बूत,बहुत सारे सबसे रेलवे ट्रैक पर पलथी मारकर बैठ गए हैं।यात्रीगण ध्यान दें,पर बिलकुल ध्यान न दें,ध्यान लगाएं बस।।रेलवे उनके अंतिम सफ़र में मुस्कान के साथ है.....

Wednesday, August 23, 2017

दिल ही तो कब्र है

बड़ी चहक के साथ आईना देखने का मन हुआ।सोचा की चलो आज अपने जिस्म को खुद देखूँ तो की इसमें क्या क्या खूबसूरती टकी हुई है।अपने ज़िंदा जिस्म को जीभर देखने की भी ललक अलग ही होती है, कुछ तो ऐसे होंगे जिन्होंने कभी अपने पूरे जिस्म को नही देखा होगा।उन्हें तो यह भी नही पता होगा की खाल कहाँ पर गहरे रँग में है और कहाँ हल्के रँग में,कहाँ सख़्त है और कहाँ मुलायम।यूँहीं तो मैं नही कहता की  जिस्म को देखो और यह जानने की कोशिश करो की तुम कितना कम जानते हो।जो अपने जिस्म को ही नही जानता, पहचानता ,वह क्या किसी दूसरे को जानेगा,पहचानेगा।

खैर मैं अपने ज़िंदा जिस्म को खड़ा आईने के सामने देख रहा था,रह रह मुस्कुराहट आ जा रही थी की एकदम से अपने जिस्म में ही मुर्दा दिखने लगा।गौर से देखा तो गुलाबी परत चढ़ाए मेरा दिल अपने अंदर कितने मुर्दा जिस्म दफ़न किये है एक के बाद एक दिखने लगे।मेरी आँखे खुलती ही चली जा रही थीं इस क़दर मुर्दा लोगों को देख देख कर।

सोच में पड़ गया की हमारे ताज़ा ज़िंदा जिस्म में किस क़दर मुर्दा लोग दफ़न हैं।पता नही लोग क्यों कहते हैं की इंसान कब्रिस्तान में दफ़न होता है।श्मशान में जलाया जाता है।नदी में बहा दिया जाता है।यक़ीन करो,सब मेरे दिल में दफ़न हैं।मेरे दिल की गर्मी उनकी चिताओं की धधक है।दिल पर बिखरा पानी जो आँसुओं से कभी कभी निकल कर बाहर आ जाता है वह उन नदियों का पानी है, जिसमे लाश बह रहीं हैं।मैं बचपन से याद कर रहा हूँ की किस क़दर इंसान के लोथड़े मेरे ज़हन में दफ़न हैं।समन्दर किनारे लहरों में उलटे पड़े बच्चों की लाश दफ़न है।बाढ़ में बहती हर लाश मेरे ही दिल में तो दफ़न है।

केदारनाथ में कही दूर बह गए मेरे दोस्त राजीव सरन की लाश किसी को नही मिली,जबकि वह भी यहीं मेरे सीने में दफ़न है।कुछ लोग कहते हैं की एक एक कब्र से सत्तर सत्तर हज़ार मुर्दे निकलेंगे।हमे तो लगता है मेरी ही कब्र से अकेले एक कम सत्तर हज़ार निकलेंगे।सब तो सीने में दफ़न हैं।आईने में आँख से ज़्यादा सीना हो तो चमक रहा है, बिलकुल शीशे की तरह,तभी तो साफ़ सब साफ़ नज़र आ रहा है, एक दिन तुम भी इसी सीने में कहीं शॉल ओढ़े बैठे होगे,दोस्त....

Tuesday, August 22, 2017

धर्म या देश

बड़ी सीधी सी बात है।दो रास्ते हैं धर्म या देश।धर्म को जनसख्या की ज़रूरत है देश को ढंग के नागरिक की चाह है।धर्म को बेतहाशा भीड़ चाहिए ताकि कटने मरने के बाद भी दो चार तो धर्म का झण्डा उठाने वाले रह जाए।देश को तरक्की मेहनत करने वाले और साथ लेकर चलने वाली सोच के नागरिक चाहिए।धर्म को घर घर बच्चों का ढेर और औरत को चूल्हे या बिस्तर पर चाहिए।देश को कम बच्चे और औरत को समान अधिकार के साथ पसन्द न पसन्द का अधिकार देना है।

अब देखिये आप कितने धार्मिक हैं।कितने देशप्रेमी हैं।दूसरों की गलतियों,कमियों को देखकर,अपने में वही कमियां,वही गलतियां भर लेने से आप धार्मिक ही हो सकते हैं देश प्रेमी तो नही।अभी तय किया जाना ज़रूरी है की हमारे लिए देश पहले है या धर्म।इन दो विकल्पों में ही तौलिये और चीज़ें बहकाएँगी।किसी की राय मत लीजिये।किसी से मत पूछिये।बस उठकर यह देखिये की आपका आजका कदम धर्म के लिए उठेगा या देश के लिए।आपका लीडर धार्मिक प्रचारक होगा या राष्ट्र को आगे ले जाएगा।आपका नेता धर्म की चाशनी लपेटेगा या मुल्क़ की बात करेगा।उसके राष्ट्रवाद के साथ यदि धर्म जुड़ा है तो वह क्षदम राष्ट्रवाद है।उनसे दूर रहो जो देश की बात करते करते अपने धर्म की चादर उढ़ाकर बेवक़ूफ़ बनाकर खुद मौज करते हैं।किसी वाद, किसी सोच,पार्टी,संगठन की तरफ मुँह मत कीजिये बस देखिये आजतक के आपके कदमो ने धर्म को सींचा है या देश को।बंटे हुए दिल,टुकड़ा टुकड़ा सोंच,ख़ून खराबे के बीच धर्म खूब फलता फूलता है मगर इसमें देश मायूस हो जाता है, वह पिछड़ जाता है।

यहाँ धर्म से किसी खास धर्म का ज़िक्र नही है, हर उस धर्म का ज़िक्र है जिसे लगता है की वह संकट में है।कोई धर्म तब तक संकट में नही हो सकता जबतक उसका ईश्वर कमज़ोर नही हो जाता।तो आपको और हमको उस ईश्वर की कमज़ोरी अगर दिखने लगे तो भाई उठा लो तलवार,निकाल लो त्रिशूल और कह दो कुपोषण से प्रभावित ईश्वर के लिए मैं ख़ून बहाउंगा।अगर यक़ीन है की ईश्वर कमज़ोर नही हो सकता तो सारे ड्रामे छोड़कर देश के लिए लगो।ईमानदार बनो ताकि देश में दीमक न लगे।सहयोग करो ताकि देश मज़बूत हो।मिलकर रहो ताकि दुश्मन को तुम्हारी एकता से डर लगे।मोहब्बत से रहो ताकि दुनिया तुम्हे मोहब्बत से देखे।

बच्चों की भीड़ लगाकर एक कमज़ोर देश के कन्धों पर भोंदा सा धर्म सिर्फ ठहाके लगा सकता है और कुछ नही।विकल्प  दो हैं अभी भी की हमे देश आगे ले जाना है या धर्म।जिन्हें लगे की हमने उनके ही धर्म को टारगेट किया है तो वह मान लें की हाँ किया है।शीशा देखें की वह कट्टर धार्मिक हैं या राष्ट्रप्रेमी।देश पर धर्म की शॉल डालकर तरक्की के रास्ते बन्द करना तो और भी बड़ी बेवक़ूफ़ी है।धर्म से खुद का चरित्र सुधारिये और मोहब्बत से देश को संवारिए।बिना छींटाकशी,तंज,झगड़े,बहस, के बिनातय कीजिये की कदम किस ओर जाएँगे।

Thursday, August 17, 2017

बिहार में बाढ़

बिहार में बाढ़ है।तस्वीरें लगाने वाली नही हैं।शब्दों पर वक़्त बर्बाद करने से कोई फायदा नही,बाढ़ से सब कुछ डूबता साफ़ नज़र आ रहा है।हो सके तो खुद मदद कीजिये,लोगों से करवाइये इन सबसे ज़्यादा सरकार पर दबाओ बनाइये की बाढ़ में फंसी जिंदगियां अपने परिवार के जैसी महसूस करें और मदद के लिए आगे आए।सरकार ही है जिसके पास सिस्टम और रिसोर्सेज़ दोनों हैं, बस नियत चाहिए।आज बाढ़ से हर दरकती दीवार को सहारा दे दीजिये भले कल से फिर लड़ना शुरू कर लीजियेगा।

यूपी,असम और दूसरे राज्य वाले अपनी चौखट पर उफान मारते पानी की तरफ भी नज़र डाल लें,बहुत कुछ डूब गया है और काफी कुछ डूबने वाला है।
सरकार तो इस क़दर बेहिस है की ज़रूरत के सामान की लिस्ट भी जारी नही करती,बस मुँह फाड़कर पैकेज का ऐलान होता है, जिसका काफी पर्सेंट सफ़ेद ही सफ़ेद रहकर इस जेब से उस जेब में पहुँचता है, बस परेशान लोग अपनी तबाही की बोली गीले अख़बार में पढ़कर मरते रहते हैं।आप से अपील की कोई झण्डा,बैनर या संगठन या पार्टी को मत देखिये,जहाँ कहीं भी किसी ने बाढ़ प्रभावितों के लिए राहत सामग्री के कैम्प लगाएं हैं वहाँ नीचे दी गई चीज़ों को पहुँचा दीजिये।अगर आप खुद बाढ़ प्रभावित इलाको में जा नही सकते,तो इन संस्थाओं पर भरोसा कीजिये।यही भरोसा तो तोड़ा गया है, हर एक पर ज़बरदस्ती शक पैदा किया गया है।उठिये और जो हो सके वह कीजिये...

कॉटन,डिटॉल,पट्टी
साबुन,टूथपेस्ट,ब्रश,ओडोमोस्,केरोसिन ऑयल,
तिरपाल,प्लास्टिक शीट्स
कपड़े सब तरह के,चादरें,
ड्राई फ़ूड,ब्रेड,बिस्किट्स वगैरह
चावल,दालें,चने,मोमबत्ती या रौशनी के दूसरे इंतेज़ाम,रस्सी,बर्तन या जो भी और ज़रूरत का सामान महसूस हो,इन कैम्प तक पहुँचा दीजिये।अगर डॉक्टर हैं तो तीन या चार के समूह में इनसे सम्पर्क करके कैप्म कीजिये।डॉक्टर नही भी हैं तो लोगों में पहुँचकर उनकी ख़िदमत कीजिये,उनके ज़ख्मो पर मरहम पट्टी कीजिये।

यह कठिन वक़्त हम सबको मिलकर ही काटना होगा।जहाँ आपको कैम्प या कोई संगठन न दिखाई दे,हमे बताइये।ख़ुदाई खिदमतगार दूसरे बहुत से संगठनो के साथ मिलकर ख़िदमत में लगा हुआ है।आप मदद का हाथ बढ़ाइये।बिहार समेत कई राज्यों के डूबता लोगों को हमारी ज़रूरत है।उनके साथ खड़े होईये,यही देशप्रेम,मानवता,संवेदना,समर्पण,त्याग,धैर्य सब कुछ यही है।हर साँस के साथ साँस हो हमारी.....