Tuesday, December 1, 2015

जिसे हम घर कहते है।

चार इंच की ईटों से  ऐब  ढकने वाली जगह को हम घर  कहते है।जिन दीवारो को आप घर समझते है वो आपके सारे गंदे खयालो की गवाह है। लोग घर में खुशिया,हिफाज़त और न जाने क्या क्या तलाशते हैं जबकि हमें तो ये खुशियो को कैद करने वाली जगह लगती है। आप ज़िन्दगी के बहुत से जशन इन चार दीवारो में मना  लेते है। उम्दा से उम्दा रौशनी,खुशबु और ज़ायके ये चार इंच की कमज़ोर दिवार लांघ नहीं पाते है।
अब रही बात हिफाज़त की तो अक्सर लोगो को घर से ज़्यादा सेफ जगह कोई और नहीं लगती। इसीलिए हर शाम वो हफ्ते खफ्ते इस कैद में भागे हुए आते है। ये वही हिफाज़त की जगह है जहाँ औरते मारी जाती है ,बूढ़े सताए जाते है और बच्चो का इस्तेमाल हो रहा होता है। मगर कुछ बाहर नहीं आता है। सारे गुनाहो पर घर नाम की शराफत की जो चादर पड़ी रहती है। हमें तो हर घर से सिसकती हुई रूहो की आवाज़ आती है। 
घर वो जगह है जिसे मै दावे के साथ कह सकता हूँ की यहाँ भगवन नहीं होते। तभी तो एक शराबी छनकती बोतले लिए सीधे घर आता है। कभी आपने उसे बोतले मंदिर या मस्जिद ले जाते देखा है। उसे अच्छे से पता है की यहाँ ईश्वर कभी भी झांक नहीं पाएगा। उसकी दीवारे ईश्वर की आँखों पर पर्दा डाल जो देती हैं। 
जब जब घर सोचता हूँ तो अकेलेपन का एह्सास होता है। पूरी खूबसूरत दुनिया अपने से भागति हुई लगती है। बेहतरीन दोस्तों को बिछड़ने वाली जगह लगा घर। काश यह घर न होते तो बता दे आपके बहुत से झगडे भी न होते। मेरी खुशिया कभी चार दीवारो में  नहीं खुश होंगी । मेरे आंसुओ का रंग सब देखे। हमारे बीच झूठ का पर्दा न हो। हम जैसे है वैसे दिखे। और ऐसा होने में सबसे बड़ी रुकावट है जिसे हम घर कहते है। 
  

Wednesday, October 14, 2015

हां मै सेकॅलर हूं !

हां मै सेकॅलर हूं,कोई भी रोये मुझे तो सिर्फ आंसू दिखते है,उन आसूंओ के रंग नही | जब कोई परेशान होता हैं तो उसकी परेशानी दिखती है सोच नही | तड़प उठता हूं रोते हुए बच्चो और सिसकती हुई औरतों के लियें । मचल उठता हूं मायूस नौजवानो को देखकर | जितना जी में आये गाली दे लों मगर यह सेकूलरिज्म कभी भी एक रंग में नही रंगेगा । मेरे मां बांप ने मोहब्बत की वह घूटी दी है, जिसमें एक मजहब और एक सोच का कोई जायका नही। मेरी परवरिश खालिश हिन्दुस्तानी है,जो कभी किसी का मुंह न काला करेगी और न ही अपनी जबान गन्दी । तुमने सेकुलरिज्म को सियासती चश्में से देखा और तंग सोच से समझाा इसिलिये तो तुम्हे हिन्दुस्तान के बेहतरीन रंगों खुश्बुओ और जायको से महरुम होना पड़ा । हमें पता है इस खुबसूरती को कभी न पाओगे, तो खीजों गें चिल्लाओगें और अपने वजुद से लड़ोगें । क्यूंकि तुम्हारा खमीर सेकूलर है। और तुम बन कुछ और रहे हो ।

Tuesday, October 13, 2015

यह शहर है अनशन का


पिछले कई सालों से शहर में अनशन  की भरमार सी हो गई है।षहर का कोई भी छोटा-बड़ा पार्क नही बचा होगा जहां अनशनोत्सव नही मनाया गया होगा। कोई चैराहा नही बचा होगा जहां देश में परिर्वतन लाने के नारे ना लगे होंगे। धरना तो हम सभी कर जन्मसिद्ध अधिकार है।  पापा नाॅनवेज नही खाने देते तो हम धरना देने लगते हैं कि यह हमारे अधिकारो का हनन है। टीचर नम्बर नहीं देती तो उनपर तुष्टीकरण का लेबल लगाकर चैराहों पर सर पटकते फिरते हैं।
अपना तो सारा ज्ञान ही धरनोत्सव और अनशनोत्सव से आया है तभी तो यह तुर्रा है की दुनिया के किसी भी मसले पर अपने आसमानी ख्यालों की उल्टी करनें लगते हैं। यहां अनशन का भी अलग ट्रेंड है गिने चुने एक जैसे लोग बड़ी-बड़ी दाढ़ी घिसा सा कुर्ता और ज़बान एक्सप्रेस ट्रेन जैसी बेचारे स्टेज की शोभा बढ़ाते हैं।  कुछ वही पुरानी मोटी-मोटी औरते जिनको शोपीस की तरह बैठाने के लिए खास मिन्नतें की जाती हैं और वह ना नुकार कर आखिर धम्म से स्टेज पर बैठ जाती हैं।
और हाॅं धरना स्थल भरने का टेण्डर भी कुछ अतिउत्साही युवकों को दिया जाता है।  उन्हे खास हिदायत दी जाती है कि अपने चाचा के लड़के को भी कह देना उसका अच्छा लिंक है दस पन्द्रह लोग तो ले ही आयेगा।चिल्लम चिल्ली करके धरने का कोरम पूरा किया जाता है।हॅंा एक बात तो और इस धरने में पोस्टर पर बड़ा-बड़ा लाल रंग से छपा होता है‘’विशाल धरना‘‘जबकि बैनर के नीचे वही दो चार घिसे पिटे लोग 23 नम्बर चाय पी रहे होते हैं।
खैर अपना क्या हमें भी शहर के एकाध लोगों नें ताड़ लिया। उनकी पार की नज़रों ने ंहमे राह चलते आसपास के लोगों के कोहनी मारते देख लिया उन्हे लगा यह बन्दा तो उनके काम का है। फौरन ही हमें एक दुबले से लड़के नें एक अनशन पर इन्वाइट कर लिया। हम भी पहुंच गए अनशनकारियों की जन्नत यानि विधान सभा के सामने। एक पिद्दी से नेता या कहें एक्टिविस्ट रुस के शासन पर अपनी ज्ञान की उल्टियां कर रहे थे जबकि उन्हे अपने घर के पास मेनहाल के खुले ढक्कनों की जानकारी भी नही है। इतने में इस विशाल धरने के फाउण्डर मुंह निपोड़कर आए ‘‘आ गए आप। आइये बैठिए अभी आपका नाम पुकरवाते हैं।‘‘अरे वाह मन में ख्याल आ रहा था कि हमें भी लोग सुनना चाहते हैं।लेकिन बोलें काहे पर अनशन किस बात पर  है पता ही नहीं है।स्टेज पर विराजमान हस्तियों से पूछा तो जवाब .बस यूं हीं......’’हमें लगा यूंही काहे। मैं सोचता रहा और देखता रहा एक तरफ ’’’यूंही चिल्ला रहे हैं और दूसरी तरफ नवाबों के शहर की आवाम इस जाम से परेशान पसीना बहा रही है।दो चार घण्टे के बाद जब सारे धरनावलम्बी उल्टियां कर चुके तब धरने का आधिकारिक समापन किया गया। हाॅं बीच बीच में जब कोई कैमरा लेकर आ जाता तो यह अपनी पोजि़शन ज़रुर सुधारने लगते हैं। मुंह पर एैसी त्योरियां देते हैं जैसे सारे जहान को सुधारने का इकलौता टेण्डर भगवान नें इन्हीं को दिया है।
हर अनशन से लौटने के बाद यह सोचता हूं वहां गया क्यों था? क्या यह धरना ज़रुरी था? क्या वाकई इन्हें जनता का समर्थन प्राप्त है और इन सवालों का जवाब हमारी किसी भी किताब में नहीं मिलता। हाॅं इसका जवाब तहज़ीब के शहर की आवाम के पास है।

                                                        हफीज़ किदवई
                                                       

वन ज़ीरो नाइन ज़ीरो


‘‘चलो जाओ बाहर जाकर खेलकर आओ...‘‘ एक गूँजती हुई आवाज बाथरूम की ओर से आयी। ये थीं नबील की अम्मी। नहाने के बाद तौलिये से गालों को झाड़ते हुए बड़बड़़ा रही थीं, ‘‘आज तो संडे है, सारे जहान के लड़के खेल रहे हैं, पता नही कब यह कमबख्त बड़ा होगा। बाहर जाता ही नहीं।‘‘ उधर नबील था जैसे उसे कुछ सुनाई ही नही दे रहा था। दोनो कानों का इस्तेमाल वह बाखूबी जान चुका था। बड़ी बहन भी टीवी का रिमोट हाथ में लिए चीख रही थी, ‘‘बस अम्मी रहने दें, इसे होम सीकनेस है। बाहर जाएगा तो पहाड़ टूट पड़ेगा। कामचोर।‘‘ हालाॅकि वह कामचोर नही है यह सभी जानते हैं क्योंकि स्कूल के गठ्ठर भर होमवर्क के बाद भी वह अम्मी-अब्बू क पैर अबाये बिना नही सोता और हाँ घर का सारा घरेलू सामान भी तो बाज़ार से वही ही लाता है। यहां तक अप्पी को उसकी सहेली के घर वह ही तो छोड़ने जाता है। मगर हां यह सारे काम तो बड़ी सादगी से सर झुकाए हुए किया करता है।
पूरा घर आजिज़ था कि हमारा बच्चा इतना सीधा क्यों है ? यहां तक तो बड़ी फूफी तो उसके मुँह पर ही कह जाती थीं, ‘‘आजकल तो सीधा मतलब बेवकूफ है वरना जब लड़कियों के पैर घर में नही टिकते तो लड़कों के क्या कहने।‘‘ फिर बातों बातों में बहलाती थी, ‘‘ अरे हमारा नबील थोड़ा सीधा ही तो है, बेचारा वक़्त के साथ बड़ा नही हुआ। हमारे क़फील का तो घर काटने का ेदौड़ता है।‘‘ कफील नबील का फुफेरा भाई है। नबील से साल भर छोटा। उसका मन वाकई घर में नही लगता। स्कूल‘-कोचिंग के बाद अगर वो गोमती किनारे मटर गश्ती न करे तो जैसे उसका दिन हुआ ही नही। शाम को मरीन ड्राइव, अम्बेडकर पार्क की हवा न लगे तो मुरझा जाए बेचारा। जबकि नबील को यह सारे नाम अखबार से पता चले हैं।
इंटर फाइनल एग्ज़ाम से पहले नबील के स्कूल में पैरेंट-टीचर मीटिंग थी। उसके अम्मी-अब्बू को भी जाना था। स्कूल पहुॅचते ही सामने से नबील के फिजिक्स के टीचर गुरूमुख सर टकरा गये। उन्हे पहचानते हुए बोले, ‘‘ आदब-आदाब, आप नबील के पैरेंट हैं शयाद ? ‘‘उन्होंने एक साथ कहा, ‘‘जी‘‘ वह बोले, ‘‘अरे आपका बेटा बहुत तेज है, फिजिक्स में ज़रूर टाॅप करेगा, ‘‘अम्मी-अब्बू का सीना चैड़ा हो गया, वह फिर आगे बोले, ‘‘मगर घोड़ा दब्बू है, किताबों के बाहर की दुनियाॅ उसे नही पता, यह कमी आगे परेशान करेगी उसे, मेरी मानिये उसे घर से बाहर भेजा कीजिए ताकि थोड़ा सोशल बन सके वो, वैसे तो बेहद प्यारा बच्चा है। अम्मी-अब्बू ने शुक्रिया अदा करते हुए उनकी हिदायत पर अमल का भरोंसा दिलाया। सारे स्टाफ ने नबील की पढ़ाई की खूब तारीफ़ की मगर सभी ने उसकी उस कमी का भी जि़क्र किया जो पहले ही गुरूमुख सर बता चुके थ। रास्ते भर वह सोचते रहे कि उनकी परवरिश में क्या कमी रही जो नबील इतना सीधा हो गया कि दुनियाँ की नज़र में बेवकूफ हो गया। जबकि सबजेक्ट पर उसकी पकड़ क़ाबिले तारीफ है। आखि़र अब्बा ने फै़सला किया की आज ही डायनिंग टेबल पर उससे उसकी परेशानी पूछेंगे।
शाम में अम्मी-अब्बू-अप्पी और नबील खाना खा रहे थे। नबील सर झुकाए चुपचाप खाने में मशगूल था। जहाँ सब बिरयानी का लुत्फ़ ले रहे थे वही नबील सब्जी-रोटी के मज़े ले रहा था क्योंकि उसे नाॅनवेज पसंद नही था। ‘‘ नबील यह सब क्या है ?‘‘ डायनिंग के सन्नाटे को एक भारी आवाज़ ने तोड़ा, अब्बा बोल रहे थे, ‘‘तुम आखिर किस प्लैनेंट से आये हो नबील ? न मुर्गा-मछली खाओं, न बाहर घूमने जाओ, ना दोस्त न अहबाब...आखिर है क्या...?‘‘ कुछ देर बाद नबील के मुॅह ने हरकत की, ‘‘कुछ भी तो नही।‘‘ ‘‘नही, कुछ तो है, क्या प्राबल्म है नबील हमे बताओ‘‘ अब्बा ने हमदर्दी से पूछा।, ‘‘अरे कुछ भी तो नहीं।‘‘, नबील ने झल्लाकर जवाब दिया। खै़र इन्ही फिक्रों, बहस-मुबाहसों के बाद खाना ख़त्म हुआ। सब अपने-अपने कमरों में पहॅच गये। अम्मी ख़ास परेशान थीं, ‘‘पता नही हमारे बच्चे को क्या हुआ है न कोई फरमाइश, न कोई शरारत न दोस्त न कोई शौक सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई। अपने आप में खोया रहता है।...क़ही कोई लड़की का तो चक्कर नहीं ?,‘‘,‘‘ चलो अच्छा से जाओ लड़की-वड़की नही वो उसका मिजाज़ ही है एैसा।‘‘ अब्बा ने अम्मी को समझाया।
बोर्ड के एग्ज़ाम मे तो नबील ने घर में कफर््यू लगा रखा था। घर का एक कोना जहां वहा पढ़ता था वहां जनवरी से ही कब्रिस्तान की सी नीम खोमोशी तारी थी। पूरा घर शादियों के इस सीज़न में पार्टियों में मसरूफ़ था और नबील किताबों में। अपनी-अपनी लज़्जत थी दोनो अपनी जगह खुश थे। हालाकि नबील के हम उम्रों ने उसका नाम रख रखा था, ‘‘चोंग‘‘। फिर भी नबील का कभी उन सब से सामना होता ही न था इसलिए उन्हें कभी चिढ़ाने का मौका नही मिला। रफ्ता-रफ्ता एग्ज़ाम ख़त्म हुए छुट्टियां आ गयीं। सारे खानदान यहां तक कालोनी भर के लड़के एैसे भागे इन छुट्टियों में जैसे शिकारी के हाथ से चिडि़या मगर नबील के लिए तो सबकुछ एक जैसा था। अप्पी ने चिढ़ाते हुए कहा, ‘‘बेटा सुधर जाओ, दोस्त नही बन रहे तो कम से कम एक आंध गर्लफ्रेन्ड बना लो। वर्ना रोने वाला कंधा भी नही मिलेगा।‘‘ हमेशा की तरह नबील ने कोई जवाब नहीं दिया। हां मगर वह अब ख़ाली वक्त में कम्प्यूटर गेम ज़रूर खेलने लगा था। वही उसका शगल था। उसके जब दोस्त ही नही थे तो गर्लफ्रेन्ड तो रहने ही दो। उसे तो वैसे भी लड़कियों से चिढ़ ही थी।पता नही क्या थ। आखिर रिज़्ाल्ट आ गया और बोर्ड एग्ज़ाम में नबील ने टाॅप किया। पूरा स्कूल-शहर उसकी कामयाबी में जश्न मनाने टूट पड़ा। हाॅ आज पूरे साल भर बाद उसके चेहरे पर मुस्कान थी।  अम्मी-अब्बू भी बार-बार कैमरे के सामने अपनी जान के टुकड़े को चूम रहे थे। हालाकि नबील बेहद शर्मीला है वो कैमरे के सामने आना ही नही चाहता था। लेनि प्रेस वालों के आगे उसकी एक न चली।
शहर के बड़े-बड़े चैराहों पर उसके स्कूल ने नबील की बड़ी-बड़ी तस्वीर लगवाई अब उससे उसका टाॅरगेट पूछा जा रहा था जो वह बचपन में ही तय कर चुका था, ‘‘डा0 नबीलन‘‘ वहा एक न्यूरोसर्जन बनना चाहता था। पन्द्रहियों मुबारक बाद चली। फिर वह पढ़ायी मे जुट गया। इतने में सीपीएमटी का रिज़ल्ट आ गया। वहां भी नबील के नाम का ही जलवा था। अब्बा बेहद खुश होकर बोले, ‘‘हमारे नबील को कोई कुछ भी कहे, उसने पूरे ख़ानदान का सर ऊँचा कर दिया। अब तो बाजी की ज़बान से भी लफ़्ज़ नही फूटते, वर्ना हर वक्त कफील ये , कफ़ील वो अब तो सांप सूघं गया। ‘‘ अम्मी तो बार-बार शुक्र ही अदा करती खुदा का। अब नबील को बाहर जाना था। सबको फिक्र थी जो लड़का घर से  बाहर न हो वह दूसरे शहर में क्या करेगा। यह फिक्र थी बड़ी सभी नबील को समझाते, ‘‘बेटा अब तुम्हे बाहर पढ़ने जाना होगा थोड़ा सोशल बनों। हर जगह अम्मी-अब्बू नही जा सकते। अब तो बड़े बनो।‘‘ हमेशा की तरह नबील के पास इन बातों के जवाब नही थे। आखिर तंग आकर एक शाम अब्बू ने कहा, ‘‘नबील, यह लो कैमरा और जाओ गोमती नगर, हमे बैहतरीन फुटेज लाकर दो।‘‘ नबील ने कहा, ‘‘अब्बा अब आपको इनका क्या काम है, हम नही जाएंगे। ‘‘ नही तुम्हे जाना ही पड़ेगा‘‘ अम्मी ने भी ज़ोर डाला, ‘‘कब तक चलेगा एैसा, गोमतीनगर कोई दूर नही है और इंदिरा नगर से तो मिला ही हुआ है।‘‘ खै़र सबकी चिल्लाहर के आगे उसकी एक न चली और अप्पी ने जल्दी से उसे स्कूटी की चाभी उछाल कर दी, ‘‘ लो चाभी और रफूचक्कर हो जाओ। पता नही अब्बू हमसे क्यों नही कहते है वर्ना हम तो दुनिया की सैर पर लिकन जाएं, जाओ बच्चू जाओ वैसे भी दस-पन्द्रह दिन के महेमान हो शहर में फिर पता नही लखनऊ की शाम नसीब भी हो।‘‘ और मुस्कुराता हुआ नबील ढलते हुए सूरज के साथ निकल गया।
सब बेहद खुश थे कि चलो घर से तो निकले जनाब। अम्मी खाना बनाने में लग गयी अब्बा चतुर्वेदी अंकल से मिलने चल गये। अप्पी फेसबुक पर अपने दोस्तों से जा मिली। दो-तीन घंटे बाद अब्बा लौटे और बोले, ‘‘बेगम, साहब ज़ादे की कोई ख़बर ली लौटे की नही अभी तक। ‘‘नही, अभी नही, अरे जाने भी दो, पहली बार बाहर घूमने गया है शायद अब आंखे खुल गयी हो ठहलने-घूमने दो।‘‘ अब्बा बोले ‘‘ठीक है।‘‘ रात के दस बज गये। खाने का वक्त हो गया। अब्बा अम्मी को फिक्र होने लगी कि कहाँ चला गया नबील। पहली बार महसूस हुआ उन्हें की जवान होते लड़के घर नहीं आते देर तक तब कैसा लगता है। कैसे-कैसे ख्याल आते है ? क्योंकि एैसे ख़्याल पैदा करने का नबील ने कभी मौका ही नही दिया। ग्यारह बज गये अब तो अब्बा ज़्यादा ही फिक्रमदं हो गये। ‘‘ फोन कर रहा हूॅ, फोन भी स्विच आॅफ जा रहा है।‘‘ ‘‘बड़ा लापरवाह है नबील।‘‘ वो बड़बड़ा रहे थे। अप्पी बोली, ‘‘ लापरवाह नही है अब्बा, वह आज खुलकर आज़ादी के म़जे ले रहा है, डोंट फिकर। ‘‘ जब बारह बजे तो सारे लोग फिक्र मंद हो गये।  एक तो फोन नही लग रहा ऊपर से पूछे भी तो किससे पूछें। वह तो किसी से बात तक नही करता। अब घर के सारे लोग नबील पर बड़बड़ा रहे थे। इतने में बेसिक फोन की घंटी बजी अब्बा ने उठाया,‘‘ हैलो! कौन ?उधर से पता नहीं किसका फोन था कि अब्बा के हाथ से रिसीवर गिर गया। अम्मी ने घबराकर पूछा, क्या हुआ ?‘‘
अब्बा, ‘‘ इंदिरानगर थाने से फोन था, वह बोल रहे थे नबील को उन्होंने अरेस्ट कर लिया है।‘‘ ‘‘अरे या ख़ुदा, क्या किया नबील ने।‘‘ अम्मी कहती हुई धम्म से सोफे पर बैठ गयीं। बड़ी हिम्मत बटोर कर और जेब मे ढेर सारा रूपया भरकर अब्बा ने चतुर्वेदी अंकल को फोन किया और उनके साथ ही वह थाने जा पहुॅचे। ‘‘अरे साहब। आपने मेरे बेटे को क्यों अरेस्ट किया ?‘‘ अब्बा ने थाने मे जाते ही पूछा। उधर से निहायत ही बदतमीज़ कि़स्म का थानेदार बोला, ‘‘ज्यादा सवाल नही। एक तो साॅड पैदा करके सड़क पर खुला छोड़ दिया और अब कह रहे हो क्या किया ? खुद पूछ लो।‘‘ नबील अब्बू को देखते ही रो दिया। चमकदार और खुश आॅखो से कभी उसने कोई्र जवाब नही दिया तो फिर आज वह कैसे बोल सकता था। जब आॅखे झुकी-भीगी और गला कंधा था। चतुर्वेदी अंकल ने हालात सभाले, ‘‘अरे सर उखडि़ये नहीं,क्या किया है इसने कुछ तो बताइये ?‘‘ वह गुर्राकर बोला, ‘‘ आपके शरीफ़ ज़ादे लड़कियों को छेड़ते हुए धरे गये है।‘‘  इतना सुनना था कि अब्बा सुन्न हो गये उन्हे लिटाया गया वह बराबर कहे जा रहे थे। ‘‘ यह मेरा नबील नही हो सकता है। आई कान्ट बिलीव दिस...‘‘चतुर्वेदी अंकल की सारी मिन्नते बर्बाद गयी क्योंकि इन सब बातों का खाकी वर्दी पर कभी असर हुआ ही नही जो आज होता। अब्बा की अस्पताल मे और नबील की थाने मे रात कटी। आज सब रो रहे थे। अम्मी-अब्बू-अप्पी नबील सब।
खै़र दो दिन बाद नबील को ज़मानत मिल गयी। वह अब्बू के साथ-घर लौट रहा था। आज अब्बा उससे एक भी सवाल नही कर रहे थे। गाड़ी रूकते ही वह हमेशा से ज्यादा सर झुकाए घर में एक सन्नटा पसरा था। वही नबील की पढ़ायी के वक्त कफ्र्यू जैसा सन्नाटा। हां बीच-बीच मे अम्मी फोन पर पूछने वालों को नबील के लौट आने की ख़बर दे रही थी। रात का खाना लगा। अम्मी-अब्बू ने बिना कुछ पूछे ही हालात सम्भाले और नबील को खाने के लिए आवाज़ दी। हमेशा की तरह बिना नानुकार किये बिना वह डायनिंग टेबल पर आ गया। सब खाना खा रहे थे, नबील भी सर झुकाए खाना खा रहा था कि उसकी नज़र बग़ल मे पड़े अखबार पर पड़ी। एक हेडलाइन पर उसकी नज़र ठहर गयी। ‘‘लड़की छेड़ते हुए टाॅपर गिरफ्तार ‘‘ दूसरा अख़बार उठाया‘‘ 1090 ने शोहदे को जेल पहुॅचाया‘‘ और न जाने क्या-क्या। हर निबाले पर नबील को हिचकी आ रही थी। अम्मी ने फ़ौरन अख़बार छीना और कहा,‘‘ बेटा खाना खाओ, हमे पता है तुम्हे फसाया गया है। हमें तुम पर भरोसा है।‘‘ नबील चुपचाप खाकर कमरे में चला गया और बाकी लोग अपने-अपने कमरे में। अम्मी बोल रही थी, ‘‘ देखिये न पता नही सच्चाई क्या है ? हमारे नबील से तो एैसी उम्मीद नही की वहा लड़की छेड़े। तौबा-तौबा। यह पुलिस की तो बिल्कुल तमीज़ नही आवारा लड़कियों की वजह से हमारे नबील को फंसा दिया।‘‘ अब्बा बोले, सो जाओ, एक दो दिन में नबील सच बता ही  देगा। अब तो घर आ ही गया है। आराम करो।‘‘ अगली सुबह चाय पर, ‘‘अभी तक नबील नही उठा क्या ?‘‘ अब्बा ने पूछा। ‘‘हाॅ पता नही जाओ उसे उठाओं बेचारा शार्मिदा होगा। उसे समझाओं।‘‘ अप्पी गयी जगाने को क्योंकि वह ही तो नबील को छेड़-छाड़ कर बात कर पाती थीं वरना किसी मे। इतना माद्दा न था की वह नबील से गात कर सके।
एक दम से अप्पी चीखी, ‘‘अब्ब-नबील और रोने लगीं, सभी दौड़ पड़े ।नबील पंखे से लटका हुआ था। चेहरा मासूमियत और गम की गवाही दे रहा था। घर का सन्नाटा सबके रोने से चूर-चूर हुआ। अम्मी तो आज सिर्फ अपनी आॅखो से लाडले को घूर रही थीं। पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया सब ढांडस बंधा रहे थे। पुलिस के आने पर थोड़ी खामोशी आयी। पूरे कमरे की तलाशी के बाद नबील की जेब से एक ख़त निकला जिसका मज़मून कुछ यंू था-
‘‘प्यारी अम्मी जिसके पास करने के लिए बातें न हो वह क्या लिखे। आपको तो पता है हम अल्फाज़ के कितने गरीब हैं। एक ही अचीवमेंट था ‘सीधापन‘‘ वह भी तार-तार हो गया। बनना तो डाक्टर था बन गये शोहदा। अम्मी आपको हम पर यक़ीन है इस बात पर हम बेहद यक़ीनह ै। अब्बा हमेशा मेरे साथ थे उनका भरोसा हमारे साथ हमेशा है। अगर छेड़ने वाली बात सच होती तो शायद अप्पी खुश होतीं कि हमने कुछ तो किया, लेकिन आप अप्पी से कहियेगा की यहाॅ भी हमने उन्हें मायूस किया।
हमे आप सबसे कोई शिकवा नही क्योंकि आप सबने हर क़दम पर हमे सहारा दिया। लेकिन जब यह सोसाइटी आपसे सवाल करेगी तो अपके पास कोई जवाब नही होगा। जब फूफी कहेंगी कि हमारा कफ़ील चाहे जैसा हो मगर कभी जेल की हवा नही खायी। जब मुझे चुप्पा कहा जाएगा तब आपके पास उसका भी कोई जवाब नही होगा।
एक हमारी वजह से आपको सर झुकाकर शर्मिदंगी से जीना पड़ेगा। इसलिए हमारी मौत आपका जवाब होगी। कम से कम सवाल करने की हिम्मत तो कोई नही करेगा। आपसे वादा करता हूँ की अगले जनम में मिलेंगे लेकिन हम मुसलमानों में इसकी भी गुजंाइश नही। कहता की जन्नत या दोज़ख़ में मिलेंगे तो हराम मौत वालो को वहाॅ भी जगह नही मिलेगी। इसलिए बस इतना कहेंगे की आपने मेरे सत्तरह सालों को जन्नत बना दिया। हमारी जि़ंदगी पूरी हुई। हां आखरी बात कि अम्मी-अब्बू हमने आपका भरोसा नही तोड़ा है। हम वैसे ही मर रहे हैं जैसे जी रहे थे बिल्कुल पाक-साफ। रोइयेगा नही बड़ी तक़लीफ़ होगी।
खुदा हाफिज़
आपका मरहूम नबील
ख़त पढ़ते  ही सबने सर पीट लिया। सब बेचारा-बेचारा करने लगे। अम्मी-अब्बू को एैसा सदमा पहॅचा कि उन्होंने नबील की जिंदगी को अपना लिया। ‘‘ न बोलना, न मिलना बस अपने काम से काम। हां उसी दिन एक ख़त इंदिरा नगर थाने में भी आया। थानेदार की तारीफ़ करते हुए किसी लड़की का ख़त था-
‘‘नमस्कार। थाना अध्यक्ष महोदय। आपका केवल नाम सुना था कि आप बहुत एक्टिव हैं, देख भी लिया। मैं पेशे से पत्रकार हूँ। अपनी एक ख़ास रिपोर्ट जो महिला हेल्प लाइन 1090 पर केन्द्रित है, उस पर काम करना था। आपकी यह सर्विस काबिले तारीफ है। वह लड़का जिसके छेड़छाड़ करने की शिकायत मैंने की थी वह मेरी रिपोर्ट का हिस्सा था। 1090 की त्वरित कारवायी के दावे को अचानक चेक करना ज़रूरी था। इसीलिए बिना किसी पूर्व सूचना के हमने यह फोन किया और आपने झठ से उसे भूतनाथ बाजार से गिरफ्तार कर लिया।
हमें मालूम है उसे आपने छोड़ दिया होगा क्योंकि उसकी गलती के सबूत ही नहीं होंगे। क्योंकि उसने गलती की ही नही थी। खै़र अपनी रिपोर्ट को सजीव बनाने के लिए एैसा करना पड़ा। यह 1090 की माकड्रिल थी जिसमें आप खरे उतरेे। हम आपकी तत्परता की तारीफ़ का पत्र डीजीपी साहब को भी लिख चुके हैं। उम्मीद है आप खुश होंगे। हां वह बच्चा ज़रूर इसका हिस्सा बन गया लेकिन यह भी समाज को दिखाना जरूनी था कि जब बिना गलती वाले फंस सकते है तो अपराधी का क्या अंजाम होगा। उस बच्चे का हमारी शुभकामनाए और प्रार्थनाए की वह खूब तरक्की करे। आपकी तत्परता बनी रहे और 1090 एैसे ही कल्याणकारी कदम उठाती रहे।‘‘
आपकी
शुभचिंतक

ख़त पढ़ने के बाद थानेदार ने भी नबील के जैसा सर झुका लिया। दोनो ख़तो ने थानेदार को खामोश कर दिया जैसे थप्पड़ ख़ाते वक्त नबील खामोश था।

लेखक-हफ़ीज किदवई

lucknow


पता नहीं इस कद्र मोहब्बत क्यों है इस मिटटी से.शायद यह ज़मीन ज़िन्दगी का फुल पॅकेज देती है .काम,दोस्ती,खान पान ,महफिले और सुकून.जी वही सुकून जो शायद ही किसी शहर के आँगन में मिले.यहाँ तो खँडहर भी रह रह कर आपकी खैरियत पूछते है .मै कोई बात बढ़ा चढ़ा कर नहीं बोल रहा.वाकई लखनऊ की गलिय आपसे ठहाका मरकर हँसते हुए बात करेंगी.बस एक बार उसकी रूह में दाखिल तो होइए.
आपको तमाम लोग मिलेंगे जो लखनऊ को नवाब और कवाब से जोड़ते हुए मिलेंगे.लखनऊ की पहचान इनसे कभी हट भी नहीं सकती .हमें तो इससे इतर देखना  और शहर की रूह में झाकना बेहद पसंद है.चौक की गलियों में घुमे और चांदी  के वरख को पीटती हुई आवाज़े कान  में न जाए तो दिल थम जाएगा.फूल वाली गली की महक अगर मदहोश न करे तो दिमाग बहका सा  जान पड़ता है.ज़रदोज़ी का वोह काम जो बालीवुड के छोटे से बड़े परदे पर दिखता है वही तो हमारे शहर की नक्काशी है.
मौलवीगंज की गलियों की रौनक है ख़ाका भरते हुए बूढ़े लोग.खाका भरते भरते ही मोहल्ले की रूमाना से फलस्तीन और सामने बैठे मुनव्वर से अमेरिका के ओबामा तक पर लम्बी जिरह महफ़िल में जान डाल देती है.अच्छा उन पानदानों का ज़िक्र क्यों न करू जो घर घर में मौजूद है.यह पानदान एक विरासत है जो हजारो रिश्तो को जोड़ने की दास्तान लपेटे है.मछली मोहाल की गलियों में पानदान रखे औरतो के जमावड़े और मसखरे अंदाज़ हर किटी पार्टी को शिकस्त दे सकते है.
पान के बाद जिस एक चीज़ ने शहर को जोड़ा है वो है चाय .चाय की महफ़िल से शायद ही कोई महरूम रहा होगा.गम से ख़ुशी तक लखनऊ की हर धड़कन को अब चाय ही जोडती है.चाय के अड्डो का इस्तेमाल इस शहर ने अच्छे से किया है.नाटको की स्क्रिप्ट हो या फिर जलसों के भाषण या किसी शायर का मिसरा ,सियासत की बाते हो या रियासत के किस्से सबकी इकलौती गवाह है लखनऊ की चायबाज़ी .ढलती शाम में एक कप चाय  हो और गंज में पड़ी बेंच ,विक्टोरियन लाईट में नम नम  ठण्ड के साथ दोस्तो का साथ.यह वो पल होगा जो ख्वाब में सोचे  हुए बेहतरीन पालो में से एक है , जब शहर  आपमें दाखिल हो रहा होता है और आप चाय और ठहाको के साथ उसमे घुल रहे होते है.
लखनऊ को जो सबसे खास बनाती है वो है यहाँ की गंगा जमुनी तहजीब.कुडिया घाट की आरती और टीलेवाली मस्जिद की आजान का मिला जुला जायका शायद ही कही मिले.गोमती नदी एक ही वक़्त में संतो के नहाने और नमाज़ के वजू की गवाह बनती है.हमारा शहर तेज़ी से हांफता भागता घबराया हुआ शहर नहीं है.सुकून से चलने वाला ,ज़िन्दगी का लुत्फ़ लेने वाला शहर है.यहाँ दिन अगर भाग दौड़ में बीतता है तो शाम रौनक से भरी बाजारों में,सेमिनारो में,ग़ज़ल या नाटको की महफ़िल में या फिर शाम की अड्डेबाजी  में.लखनऊ हर उम्र हर तबके के लोगो को पूरा खुलने,महकने और जिंदादिल रहने का भरपूर मौका देता है.यहाँ मुस्कुराने की अनगिनत वजह है बस एक बार लखनऊ को महसूस तो कीजिये .



sirf tum

मै कोई प्लंबर तो नहीं 
की उसके बहते आंसू रोक दू
मै कोई संगतराश तो नहीं 
की उसके वजूद को तराश दू 
मै कोई दर्जी तो नहीं 
की उसके ज़ख्मो को सिल दू 
मै कोई मोची तो नहीं
की उसके टूटे दिल को जोड़ दू 
मै कोई चित्रकार तो नहीं 
की उसके जिस्म को उकेर दू 
मै कोई फ़िल्मकार तो नहीं 
की उसको ही उभार  दू
मै कोई संगीतकार तो नहीं 
की उसके लफ्ज़ को झंकार दू 
मै कोई इतिहासकार तो नहीं 
की उसके एहसास को एक नाम दू 
मै कोई कलमकार तो नहीं 
की उसको सरस्वती का मक़ाम दू 
मै तो एक अदना सा आदिम हूँ  
कहो  तुम्हे साथ रखूं
या कहो तो बिछाड़ दू 
 

Monday, August 10, 2015

meri dost

मुझे अछे  से याद है जब मई रो रहा था तब उसने मुझे चुप करवाया था।  उसका एहसास ही हमें हमेशा ज़िंदा रखता है।  जब पहली बार दिल खोलकर मुस्कराया था तब भी वो साथ थी।  जिस दिन सबसे रूत कर जान देने चला था तब भी उसने ही रोक थंऐ हमेशा उसका कहा मानता रहा हु।  शायद ही किसी को इतना चाहा हो।  मेरे परिवार और दोस्तों ने भी उसे हमेशा हमारे साथ रखने की कोशिश कि. सबने मन की उसके बगैर मे अधूरा हु।  हमारे हर सफर,हर कामयाबी,हर न उम्मीदी में थी।    आखरी सांस लू    और हमारे हाथ में उसका साथ हो ........    तुम्हे....  बहुत याद करता हु मेरी प्यारी चाय

meri rooh

तमाम खुशियों को भेज दिया हमने दुसरो के घर. ताकि उनके कहकहों की आवाज़े हमारे कानो में रास घोल सके। हमें हर वो मुस्कान बेहतरीन लगती है जो दूसरों के होंटो पर होती है. हमें हर उस आंसू से प्यार है जो हमारी आँखों में है. हाँ अगर ये आंसू हमारी आँखों को छोड़कर किसी और आँखों में जाने लगे तो मनो कोई दर्द सा उठता है।  सीने में दर्द जिसके बाद मनो लगता है जिस्म ठंडा सा हो जाएगा।  हम मारना चाहते है जल्द ही मारना।  मगर दोस्त मारना इतना आसान तो नहीं।  जब तक दूसरों की आाँखे नाम है तब तक ये आँखे बंद होने का इलज़ाम कैसे ले।  कैसे मुह फेरे।  मरेंगे मगर एक अदद मुस्कान बिखेरने के बाद।