Tuesday, October 31, 2017

मौसम गुलाबी नही है

वक़्त तेज़ी से बदल रहा है।हमारी ज़िन्दगी में जाड़ा दाखिल हो रहा है।न आहिस्ता और न ही तेज़,बस वह आ रहा है।न दबे पाँव और न ही शोर करते हुए,बस वह आ रहा है।उसे तो आना ही है क्योंकि ज़मीन में दफ़न बहुत से बीजों में ज़िन्दगी जो फूटनी है।
मुझे लगा मौसम का यह गुलाबीपन हमारे लिए आया है।मेरे कंधो पर रखे सर के लिए आया है।फैले हुए बदन को सिमट जाने के लिए आया है मगर नही,वह तो किसी और के लिए आया है।

यह जाड़ा हम इंसानों के लिए नही बल्कि ज़मीन में बोए बीज के लिए आया है।ठण्ड में ठिठकती मिटटी में कोपल फोड़ने के लिए आया है।यह तो पत्तो को हल्के हल्के नहलाने आया है।यह तो खेत में मिटटी की रेत से झाँक रही हल्की हरी हरी उम्मीदों को दरख्त बनाने आया है।
ख्वामखा हम इनके आने में शब्द पिरोते,यह भी तो किसान के लिए आया है।

ईश्वर की भेजी यह ठण्ड की शाल भी तो निर्माण की है।हम मोहब्बत के गीत गाएंगे और कोई खेत में खड़ा हमारे गाते रहने के लिए इसी ठण्ड को लपेट फावड़ा चलाएगा।है न अजीब,एक ही मौसम एक के लिए गुलाबी है तो एक के लिए निर्माण का उद्घोष...ठण्ड सिर्फ उन बीजों के लिए आई है, जिनमे सृष्टि के निर्माण का विस्तार होना है,बाकि सब तो रौशनी के पतंगे हैं....

Monday, October 30, 2017

इन्दिरा

तेरह साल की मामूली सी उम्र में "बाल चरखा संघ"बनाया।बचपन में ही कुछ था,जो लोगो को दिख रहा था।दिल्ली में 47 के दंगो में वोह कूद गई।गाँधी के कहने पर उसने दंगो में लोगो की ख़िदमत करना अपना मकसद बना लिया।हमसे कई बार होता है किसी की बुराई करते करते हम इतने बुरे हो जाते हैं की उसकी अच्छाइयों को भी नज़रअंदाज़ कर जाते हैं।
इंदिरा गाँधी ने सारी ज़िन्दगी काम किया।सारी ज़िन्दगी मुल्क़ के लिए जी।इंदिरा ने एक के बाद एक भारत के बाहर अपने कदम बढ़ाए।उनके कदमो से दूसरे मुल्कों में भारत की धाक पहुँची।

अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, बर्मा, चीन, नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में वोह पहुंची। उन्होंने  फ्रांस, जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य, जर्मनी के संघीय गणराज्य, गुयाना, हंगरी, ईरान, इराक और इटली जैसे देशों का आधिकारिक दौरा किया।अल्जीरिया, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया बेल्जियम, ब्राजील, बुल्गारिया, कनाडा, चिली, चेकोस्लोवाकिया, बोलीविया और मिस्र जैसे बहुत से देशों का दौरा किया।वह इंडोनेशिया, जापान, जमैका, केन्या, मलेशिया, मॉरिशस, मेक्सिको, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, नाइजीरिया, ओमान, पोलैंड, रोमानिया, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, सीरिया, स्वीडन, तंजानिया, थाईलैंड,त्रिनिदाद और टोबैगो, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, अमेरिका, सोवियत संघ, उरुग्वे, वेनेजुएला, यूगोस्लाविया, जाम्बिया और जिम्बाब्वे जैसे कई यूरोपीय अमेरिकी और एशियाई देशों के दौरे पर गई।उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भी अपने कदम रखे।

यह गिनती सिर्फ इसलिए है की उस वक़्त वोह कितनी तेज़ कदम बढ़ा रही थीं।मुल्क़ के लिए जी रही थीं।कुछ कदम गलत हो सकते हैं।उसकी सज़ा उनकी ही ज़िन्दगी में उन्हें मिल गई।कुछ को लगा यह सज़ा कम है तो उनकी ज़िन्दगी ही उनसे छीन ली गई।यह नेहरू परिवार की पहली शहादत थी या कहें शहादत की नीव थी।
इंदिरा को अपने हर कदम का बखूबी अंदाज़ा था।इंदिरा ने मुल्क़ तो टूटने से बचा लिया था मगर खुद को बचाने को तनिक भी फिक्रमन्द नहीं थी।उनमे नफ़रत भी नही थी।नफ़रत अगर होती तो उनके अंगरक्षक कब के बदल जाते।

इंदिरा के दामन में जो भी दाग़ हैं।उन दागो में कहीं साम्प्रदायिकता नही है।कहीं पर नफ़रत नही है।इंदिरा इन सब चीज़ों से आज़ाद थीं।इंदिरा के व्यक्तित्व पर लगातार ऊँगली भी उठी और सराहना भी हुई।लिखने को कितना कुछ लिख सकते हैं उनकी शखसियत पर मगर वक़्त उनको ज़िन्दगी में उतारने का है। आज उनकी शहादत के मौके पर हम उनकी मेहनत,जज़्बे,मोहब्बत और पूरी समर्पित ज़िन्दगी को सलाम करते हैं।
देश की सबसे सशक्त,निडर,प्रधानमन्त्री इंदिरा की बहुमुखी प्रतिभाओं और पूरी ज़िन्दगी मुल्क़ के लिए लगा देने को दिल से सलाम।

Wednesday, October 25, 2017

छठ पर्व

यूँ हल्की सी सर्द सुबहों और नदी का ठंडा पानी।सूरज की संतरी शक्ल और हमारा नदी में डूबा आधा जिस्म।आँखे बेताब उस सूरज को क़ैद करने के लिए जो हफ्ते भर पहले आँखों को चौंधया रहा था।हाथ नदी के पूरे पानी को समेट लेने के लिए  बेचैन।हल्के हल्के होंटो से झरते गीत।बाँस का सूप,फूँस की डलिया, गुड़ गन्ने का रस और चावल गेहूँ से बना देसी ज़ायका।कुल मिलाकर ख़ालिस हिंदुस्तानी नब्ज़।न मज़हब के रोड़े,न ज़ात की फ़िक्रें,न पुरोहितों के नखरे,न पहुँच से बाहर के देवी देवता।
यही तो छठ है।हमारा आपका छठ।

रामराज्य शुरू होने का छठ।सीता का राम के राजतिलक लगाने का छठ।कर्ण की तपस्या का छठ।द्रोपदी के ताप का छठ।राजा प्रियेवद, महर्षि कश्यप,मालिनी और देवसेना का छठ।गंगा का यमुना के पानी को खुशबू देने का छठ।दो दिलों को जोड़ने का छठ।दो रूहों को रूहों से मिलने का छठ।यह सादे से किसानो,हमारे जैसे आम से लोगों,मज़दूरों का वोह खूबसूरत त्यौहार है जिसकी सौंधी सी खुशबू मगरूर दिल महसूस नही कर सकते हैं।
मेरा मुल्क़ मामूली सी चीज़ों में खुशियाँ ढूँढने वाला रहा है।हमने अपनी नदियों को,अपने खाने को,अपने हिस्से के सूरज को,अपनी जोड़ने वाली संस्कृति को अपने टूटे फूटे अल्फ़ाज़ों में समेट कर, लोकगीत गढ़े हैं।उन गीतों में हमारी रूहें हैं।उन गीतों में मेरा भारत है।

जब नदी में आधा डूबकर हम सूरज को सलाम कर रहे होते हैं, तब हमारे दिल की जो धड़कन होती है, वही तो भारत है।इस छठ को महसूस कीजिये।इसमें छुपी कहानियों को देखिये।इस त्यौहार में मिलने वाले गंगा जमुनी दिल को पढ़िए।तब ही तो भारत की रूह को छू पाएँगे।
आओ इस छठ पर क़सम ले की हम दिलों को इतना बड़ा कर देंगे,जहाँ नफ़रत गुम जाएगी।मेरे राम के रामराज्य की शुरआत का यह जो छठ है, उसके होने को मोहब्बत से सींच देंगे।जैसे ही हम नदी में नारंगी सूरज के सामने डुबकी लगाएँगे,तो यक़ीनन सारी नफ़रत उस खुशबूदार पानी में धूल जाएगी।बस एक ही दुआ,छठ पूजा हमारे दिलों में रौशनी भरे।

Tuesday, October 24, 2017

साहिर साहिर

हम अजब पागल से लोग हैं।एक ऐसे बच्चे जो अपने कुर्ते के छोटे से दामन में तमाम कंचे समेट लेना चाहता है मगर एक न एक कंचा उस दामन को छोड़ बाहर निकल जाता रहता और बच्चा सबको समेटने की नाकामयाब कोशिश करता रहता है।हम सब भी तो ऐसे ही हैं, रोज़ उन नामो को समेटते हैं जो हमारे बीच से चले गए,उनका ज़िक्र करते हैं, उन्हें याद करते हैं मगर कोई न कोई छूट ही जाता है और दिल का मुँह खुला रह जाता है।कल रफ़ी अहमद क़िदवई को याद किया तो सरहाने मन्ना डे आ गए,रात गुज़रते गुज़रते पैतयाने गिरिजा देवी भी आकर बैठ गई।

सोचा चलो एक मसेहरी पर यह तीन सही मगर रात और गहराती और सुबह दस्तक देती की साहिर आ गए।साहिर के हिस्से का दर्द भी तो उसी मसेहरी पर बैठना है।अगर यह सब एक ही साल में आगे पीछे गुज़रते तो दिल तो फट ही पड़ता।साहिर अपने साथ अमृता को भी तो लाए हैं।उँगलियों में उँगलियाँ फंसाएं ग़ज़ल कहानी की शक्ल में मेरे दरवाज़े पर खड़ी है।

अमृता ने लिखा है एक बार दिल्ली में दुनियाभर के राइटर्स का सेमिनार हो रहा था ,उसमे हम और साहिर भी थे। साहिर और हमें भी अपने अपने नामों के बैज दिए गए। मगर शरारतन या कहे मोहब्बत की वजह से साहिर ने मेरा और मेरे साहिर के नाम का बैज लगा लिया। स्टेज पर एक जनाब आए और माफ़ी मांगते हुए कहा "अरे अमृता जी गलती से आपको गलत बैज दे दिया गया है...अभी सही करवाते है" इतने में तपाक से साहिर ने जवाब दिया " गलती आपसे हुई थी मगर हमने सही कर ली है आप इत्मीनान रखें।

अमृता आज ही की उस रात के ज़िक्र में कभी कुछ न लिख सकी जिस रात साहिर ने दुनिया को अलविदा कहा था। अमृता को रात २ बजे बुल्गारिया में खबर मिली की साहिर इस दुनिया से कूच कर गए। वह पूरी रात फोन के पास बैठी रोती  रही। अमृता ने एक जगह कहा भी " हमें लगता है ख़ुदा से गलती हो गई। उस दिन हमने जो बैज बदले थे।फरिश्तों को उन्ही नामो का धोखा हो गया।
जब साहिर की मौत की खबर अखबारों में छपी तो एक बड़े अख़बार ने क्या किया। अमृता की बड़ी सी तस्वीर पहले पेज पर छापी उसमे अमृता की आँखे आंसुओं से भरी हुई थी और हेडलाईन थी साहिर………। साहिर.......साहिर…………

Sunday, October 22, 2017

तस्वीर फॉरवर्ड

फेसबुक पर उसके बेटे ने एक तस्वीर साझा की,किसी को भी यह बच्चा मिला हो तो फौरन इस पते पर बताएँ।बेचारा अपने माँ बाप से बिछड़ गया है और कश्मीरी गेट बस स्टैण्ड पर पाया गया है।बच्चा बेहद रो रहा है और बार बार माँ माँ कहता हुआ बेहोश हो रहा।आप सब इस बच्चे को उनके माँ बाप से मिलाकर नेक काम करें और जितना हो सके इसे आगे फॉरवर्ड करें।

बाप ने एक ज़ोरदार हाथ मारा लड़के के सिर पर,कमीने तुम भी लग गए।यह मेरे बचपन की तस्वीर है।गलती से एक दिन बिना बताए फूफी के यहाँ रुक गया और चचाजान ने फ़ोटो सोशल मीडिया पर डाल दी।तब से यह तस्वीर जान अज़ाब बनी हुई है।माँ बाप भी मर गए,मैं भी मरने वाला हूँ मगर यह तस्वीर आजतक टहल रही है।कितनी बार तो स्कूल से पकड़ कर लोग हमे हमारे घर पर छोड़ आए हैं।

हम कहते रहे मैं ग़ायब नही हूँ मगर नेकी का भूत सवार हो तो भला कौन सुनता है।यह कहो की दाढ़ी मूँछे निकल आई तो बच गए।लोग पहचान नही पाते थे मगर अभी भी यह तस्वीर घूमती टहलती हमारे ही पास सौकड़ों बार आ चुकी है।एक फ़ोटो फॉरवर्ड करके अगर जन्नत की श्योरिटी मिल रही हो तो काहे न फ़ोटो टहले।यही गनीमत है की इस नेकी के बदले कहो हूर का दावा नही किया गया वरना तो कहर ही था...

Thursday, October 19, 2017

गद्दाफी

वह खड़े होकर जब महल में चीखता था,तो आवाम डर जाती थी।उसके मुँह से निकला हर जायज़ नाजायज़ फैसला कानून बन जाता और अवाम उसे पलके झुका कर मान लेती।यह अवाम भी अजब चीज़ है जब पलकों पर बिठा लेती है तो हर बात पर सर झुका लेती है।पलकों पर बैठने वाला सर पर बैठकर मगरुरियत से उसी अवाम को तहस नहस करने लगता है।यह ताक़त का नशा होता है।हर उसमे यह ताक़त का नशा आ जाता है जो हल्के मिजाज़ का होता है।

यह भी सच है जब यही अवाम पलके बन्द करती है तो ऊपर बैठा इंसान,जो खुद को ख़ुदा समझने लगता है।एक झटके में अवाम के पाँव के नीचे आ जाता है।यही तो हुआ मुअम्मर गद्दाफी के साथ,याद कीजिये आजके ही दिन,अपने ही लोगों के पाँव के नीचे दम तोड़ा था।वह अवाम आज उसे दौड़ा दौड़ा कर मार रही थी,जो कल तक उसके हर अल्फ़ाज़ को कानून समझती थी।

वैसे गद्दाफी के मौत के बाद भी भले लीबिया सम्भला न हो,भले और बुरे हालात में चला गया हो फिर भी उसने अपने घमण्डी,बेकाबू,बेलगाम बादशाह को अपने पाँव के नीचे कुचलकर मार डाला।

दुनिया में हर उस व्यक्ति को गद्दाफी से सीखना चाहिए,जो करोणों दिलों में राज करता हो।अगर उसमे घमण्ड आया,घमण्ड में जनता पर ही अनाप शनाप फैसलों से अत्याचार शुरू हुआ,महलों के हज़ारों पकवान की खुशबू, झोपड़ी में हफ्तों से भूखे बच्चों की नाक में जाने लगे और उसके समर्थक अत्याचार के शिखर पर खड़े होकर ठहाके लगाएं,तो यक़ीनन वह बादशाह पलकों से गिरने ही वाला है।
और हाँ यह समझ लो,यह अवाम एक भीड़ है, जो भाग रही है, इसके सामने एक बार गिरे नही की कुचल कर मर ही जाओगे।इसलिए हर बादशाह को अपनी अवाम के धैर्य का इतना इम्तेहान नही लेना चाहिए की अवाम का डर और मोहब्बत दोनों ही खत्म हो जाए।

मजाज़ जन्मदिन मुबारक

दो नाम मजाज़ और मंटो।।इनके दिलों को ज़मीन के बंटवारे ने कमज़ोर कर दिया।मजाज़ भले ही मंटो से सात आठ महीने बड़े रहें हो मगर मंटो ने मजाज़ से दस महीने पहले रुखसत होकर यह फासला भी खत्म कर दिया।सन् 55 की शुरआत मंटो को ले गई तो जाता जाता सन् 55 अपने साथ मजाज़ को भी लेते गया।
एक ने कहानियाँ बुनी तो एक ने ग़ज़लें।दोनों में एकसा दर्द।दोनों की कैफ़ियत एक सी,मसखरे इतने की ज़िन्दगी मज़ाक बन गई।अर्रे हम भी मजाज़ को याद करते करते मंटो तक चले गए।दिमाग अजब बहका है मेरा भी,यह भी नही की मजाज़ को पहले आजके दिन की पैदाइश की मुबारकबाद तो दे देते।लेकिन क्या करें,यह दोनों कच्ची उम्र की मौतों ने जितना मेरे ज़हन पर ज़ुल्म किया है,उतना किसी चीज़ से नही हुआ।
मजाज़ को रुदौली से लखनऊ,अलीगढ़,दिल्ली,बम्बई किन किन गलियों से पहचाने।जब जब गुज़रता हूँ तो लगता है की अभी मजाज़ निकल के गए हैं यहाँ से,सब बेरौनक हो रखा है।मुझे मजाज़ की नज़्मों से ज़्यादा मजाज़ की ज़िन्दगी अपनी ओर घसीटती है।जब मैं किसी अमीर शख्स की महफ़िल में अपने फ़न की नुमाइश के लिए बुलाया जाता हूँ,तो मजाज़ मेरा हाथ पकड़,मुझे रोक लेते हैं।
रोक कर कहते हैं की यह तुम्हे बेइन्तहां चाय पिलाएंगे जैसे मुझे शराब पिलाते थे।जब इनकी तबियत भर जाएगी तो तुम्हारे लिए भी सर्द रात में बाहर का दरवाज़ा खोल देंगे और तुम अपनी वाह वाह वाह वाली आवाज़ों के शोर को सुनते सुनते कहीं लेट सड़क पर लेट जाओगे और कोहरा चादर बनकर तुम्हे ढँक लेगा,जहाँ सबकी तो सुबह होगी मगर मजाज़ की नही...
मैं रुक जाता हूँ और मजाज़ से ज़िन्दगी के तमाम तजर्बे पर बात करता रहता हूँ।इतनी बात,इतनी बात की कहने को कुछ रह ही नही जाता तो दोनों चुप होकर एक दूसरे को देखने लगते हैं।उन्हें शिकवा की मैं पहले क्यों नही आया,हमे शिकवा की वह थोड़ा और क्यों नही रुके,यूँहीं,बस यूँहीं मजाज़ मेरे पास से उठकर चले जाते हैं और मेरा Happy Birthday my dear mjaz अनसुना रह जाता है... हमेशा की तरह अनसुना..

Wednesday, October 18, 2017

दीपावली

ज़मीन बेचैन थी।यह बेचैनी एक दिन की नही थी।बहुत से सालों की थी।लोगों के दिल धड़क रहे थे,कभी तेज़ तो कभी धीरे।घर घर से खुशबूदार खानों की वजह से पूरा इलाका महका हुआ था।बच्चे ख़ुशी में खेल रहे थे,उन्हें खुशियो की वजह नही पता थी।औरते रह रहकर गा रहीं थीं।उनके गानों में खनक थी।आदमी धान की फसलों के संग ठहाकों में थे।
मेरे राम अयोध्या की माटी पर पाँव रखने जा रहे थे।सरयू में उथल पुथल थी।आज सरयू खुद घी का दिया बनने को तड़प रही थी।अयोध्या की माटी का लाल आज लौट रहा था।वही लाल जिसने माटी की लाज रखी थी।जिसने माँ जैसे अल्फ़ाज़ को इज़्ज़त बख्शी थी।

मेरे लिए दीपावली लक्षमी का आना नही है।मेरे लिए मेरे राम का आना दीपावली है।मर्यादा पुरुषोत्तम राम का आना दीपावली है।माँ के कहने पर फ़रमाबरदारी  से चौदह साल काँटों भरे जंगलो में ज़िन्दगी के अहम् हिस्से को गुज़ारने वाले का वापिस आना ही दीपावली है।माँ चाहे सगी हो या सौतेली,मगर माँ शब्द को अहमियत देने का पर्व दीपावली है।
मुझे पता है मेरे राम आज दीपको में तो होंगे मगर लोगों की लक्ष्मी की चाहत के आगे कमज़ोर होंगे।मेरे राम के तलवों में लगे काँटे पर जब अयोध्या की माटी लगेगी आज,वोह छण मेरे लिए दीपावली है।

मेरे राम के चेहरे पर जँगल की उतरी थकान को जब सरयू धोएगी,वोह है दीपावली।जब मेरे राम को उनका भाई गले से लगाकर ज़ार ज़ार रोएगा,तो वोह है दीपावली।मेरे राम का,हाँ मेरे राम का होना ही दीपावली है।सिर्फ यही एक वजह ही है की आज मेरी दीपावली है।आज मैं राम के संग अयोध्या की दहलीज़ को महसूस कर रहा हूँ।मेरी यही दीपावली है,जिससे खुश होकर मैं दीया जलाता रहा हूँ।उसकी रौशनी में सिर्फ मेरे राम ही तो रहते हैं मेरे इरगिर्द।यह दीपावली मुबारक उनको जिनके दिलों,किरदारों,ज़िन्दगी,ज़हन में हैं मेरे राम।

Tuesday, October 17, 2017

भात दे दो

यह क्या आज फिर आसमान खूब चमक रहा था।पूरा रौशनी से नहाया हुआ।हल्का हल्का सा संगीत बज रहा था।संगीत पर खूबसूरती थिरक रही थी।सभी देवतागण उसके मज़े ले रहे थे।
आसमान पर कुबेर ने दावत दी थी।ज़मीन से आसमान तक के हर मशहूर पकवान का इंतेज़ाम था।आने वाले हर मेहमान की ख्वाहिश के खाने का इंतेज़ाम किया गया था।सोने से कढ़े कपड़ों में कुबेर हर मेहमान की मेहमानवाजी कर रहे थे।

कहतें हैं की हर साल होने वाली कुबेर की इस दावत में हर धर्म के प्रतिनिधि आते हैं।दुनिया भर के हर धर्म का प्रतिनिधि इस खूबसूरत दावत का हिस्सा बनकर खुद में फूला नही समाता था।
देर रात खाने की शुरआत हुई।एक लम्बा दस्तरख्वान लगाया गया।सभी मेहमान एक साथ हँसते मज़ाक करते हुए खाने की तरफ बढ़ने लगे।खाने की खुशबू उन्हें और करीब ला रही थी।सभी धर्म के लोग मिलकर खूबसूरत दावत के मज़े ले रहे थे।

खाने की शुरुआत करने के लिए जैसे ही कुबेर ने हाथ बढ़ाया की,उन्हें दरवाज़े पर दरबान के लड़ने की आवाज़ सुनाई दी।दावत का मज़ा किरकिरा न हो इसलिए उन्होंने वहीं से आवाज़ दी,क्या बात है दरबान यह शोर काहे का।उधर से आवाज़ आई मालिक एक लड़की आपसे मिलना चाह रही है।उसे समझा रहें हैं की अभी मत जाओ,मगर मान ही नही रही,बड़ी ज़िद्दी है।
सब मेहमानो की आँख देख कुबेर को लगा,बुला लेना चाहिए,आखिर देवता ही तो हैं सब,हमे उसको सुनना चाहिए।कुबेर ने उसे भेजने को कहा।

जब लड़की उनके  बीच आई तो कुबेर ने पूछा क्या बात है बेटी,कोई समस्या।उसने हाँ में सर हिलाया और कहा भूख लगी है।खाने की खुशबू से मैं कहाँ से कहाँ टीक आ गई,पता ही नही चला।माँ की गोद में थी,एकदम से खाने की खुशबू आई और मैं चल दी।रास्ते में सब घर झाँके,सारी नदिया देखी, समन्दर देखा,महल देखे मगर कहीं खाना नही था।खुशबू के पीछे भागती भागती यहाँ तक आ गई।

कुबेर हँसे,हज़ारों तरीके का खाना सामने लगा था।बोले बेटी,यहलो,यहाँ जो भी खाना तुम्हे पसन्द आए ले लो और सब घर वालों के लिए ले जाओ।कुबेर के यहाँ भला किस चीज़ की कमी,तुम सही जगह पहुँच गई।बोलो तुम्हे क्या चाहिए।लड़की ने कहा भात,मुझे भात चाहिए,सिर्फ भात।उसके बोलते ही हर मेहमान के गले से उतरता खाना अटक गया।वह खड़ी बोले जा रही थी की मुझे भात चाहिए।कुबेर के पास हज़ार पकवान तो थे मगर वह भात नही थे जो उसे चाहिए था।वह भात भात करती रही,उसकी आवाज़ से संगीत थम गया।आसमान की रौशनी धीमी होती चली गई और सब मेहमानो की भूख मर गई।वह फिर भी कह रही थी मुझे भात चाहिए।भात भात कहती वह ज़मीन से आसमान तक आई,अब आगे जा रही है शायद भात मिल जाए,कभी,कही..

Monday, October 16, 2017

सर सय्यद

उसने किसी मुल्ला की तरह क़ौम के कसीदे नही पढ़े।किसी धर्मगुरु की तरह धर्म की रक्षा का उद्घोष नही किया।किसी पादरी की तरह जीसस का वास्ता नही दिया।किसी कथित सांस्कृतिक संगठन की तरह लाठियाँ भांजने की ट्रेनिग नही दी।किसी को झंडे और बम के साथ जन्नत भेजने का रास्ता नही दिखाया।
उसका कदम तो बड़ा खामोश था।
वोह तो सिर्फ एक ऊँचा आसमान देख रहा था।उसमे खेलते कूदते बच्चे देख रहा था।उन बच्चों की ज़िन्दगी की खुशियाँ बुन रहा था।तुमसे वोह भी देखा नही जा रहा था।तुम चाहते थे की तुम्हारे बच्चे मदरसों में तख्तिया तोड़ें।तुम्हारे बालक टाट पट्टियों पर पड़े पड़े तुम्हारी किंवन्दितियां सुने।उसने तो ह्यूम की काँग्रेस से भी किनारा कर लिया।क्योकि उसे आने वाली नस्लों के लिए चमकदार ज़िन्दगी के ख़ाके बुनने थे।तुम सबसे यह बर्दाश्त न हुआ।एक तरफ बंगाली पंडितो ने उसे अंग्रेज़ों का एजेंट घोषित किया तो दूसरी तरफ मुल्लों ने क़ौम का गद्दार।वोह यह दोनों तमगे लिए भी खुश था,क्योकि उसका मकसद नीव में बदल चूका था।
वैसे भी जब दिमाग पर पर्दा और आँख पर कट्टरता हो तो अच्छाइयां नज़र आने को रही।तुम सब जिस वक़्त अपने पीले, दीमक लगे पन्नों के कसीदे पढ़ रहे थे तब वोह तुम्हारे बच्चों के लिए स्कूल बना रहा था।जब तुम मज़हबी जंज़ीरों में जकड़े फिर रहे थे।तब वोह तुम्हारी तालीम का दरवाज़ा बना रहा था।जब तुम अपने गौरवपूर्ण इतिहास के नशे में मदमस्त ज़िन्दगी काट रहे थे तो वोह आने वाले कल का रास्ता बना रहा था।ऐसा रास्ता जिसपर चलकर तुम्हारी किस्मत पर लगी कुंडी खुल जाए।तुमने उसे जीभर ज़लील ओ ख्वार किया मगर वोह नही डिगा।
उसकी बुनियाद रखी इमारत ने देश दुनिया को वोह वोह नगीने दिए की गिनती भूल जाएँ।मैं बात कर रहा हूँ उस वक़्त के सबसे दूर की सोच रखने वाले सर सय्यद अहमद खान की।हम बात कर रहे हैं उनके ख्वाब अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की।मैं जब जब किसी अलीग को तरक्की की पहली सीढ़ी चढ़ते देखता हूँ तो सर सय्यद के लिए दुआएँ निकलती हैं।मैं सर सय्यद की मज़ार पर रखे अपने पहले क़दम को अगर लिख पाया,तो वोह मेरी सबसे नायाब क़लम होगी।
आज सर सय्यद के जन्मदिन पर मैं उस एहसास को जी रहा हूँ।मैं देख रहा हूँ की मजाज़ की ग़ज़लो की ज़मीन कैसे सर सय्यद ने बनाई।मैं महसूस कर रहा हूँ की खान अब्दुल गफ़्फ़ार के कदमों में अलीगढ़ की धूल कैसे सर सय्यद ने पहुंचाई।रफ़ी अहमद क़िदवई ने कैसे सर सय्यद के हाथों से बुनी इमारत में खुद को बुना।इस मुल्क़,इस दुनिया को हर वक़्त एक सर सय्यद चाहिए।जो हमारी आँखों पर कट्टरपन की पट्टी बाँधने ना दे।जो हमे कल उगने वाले सूरज के लिए आज तैयार करे।जो हमारी आँखों में ख्वाब पालना सिखाए।सर सय्यद ज़मीन की ज़रूरत हैं।हाँ वाक़ई ज़रूरत हैं।

Saturday, October 14, 2017

आखरी नौकर

एक के बाद एक खादिम दम तोड़ता रहा।कोई ने तीस साल ख़िदमत की तो कोई ने साठ साल,सब मर खप गए।कोठी का वह आखरी नौकर अपने छप्पर में लेटा मौत का इंतज़ार कर रहा था।

ज़मींदार से उसे बिना देखे रहा नही गया और कोठी से बाहर लाठी के सहारे क़दम रखा।खादिम के चबूतरे तक पहुँचते पहुँचते ज़मीदार की साँस फूलने लगी।बड़ी मुश्किल से पकड़ाकर वह उसके छप्पर तक लाए गए।खादिम ने आँखों से खुद के उठ कर सलाम न कर पाने का ग़म बहा दिया।ज़मीदार ने हाथ उठाकर लेटे रहने को कहा।

उसके सामने बैठकर उँगलियों की पोर पर चार दर्जन नौकरों को याद करते हुए ज़मीदार थक रहे थे की फलाने भी चला गया,वह भी मर गया,वह भी खत्म हो गई और फिर लेटे हुए खादिम से कहा अब हमे अकेला छोड़कर तुम भी जा रहे हो।

खादिम ने मुस्कुराकर कहा,हुज़ूर आपको भी तो जाना है।हम तो ठहरे खादिम।आपसे पहले जाकर जन्नत में आपके आने का इंतेज़ाम हम ही लोगों को तो देखना है।हमसे पहले वाले मरकर वहाँ पहुँच आपके लिए कोठी बना रहे हैं, हमे भी अब छोड़िये मालिक,तो वहाँ जाकर ज़मीन लीप दूँ,ताकि आप उसपर आहिस्ता आहिस्ता चलकर आए और चीख़ कर कहें की मेरी चाय कहाँ है गुलाम।

ज़मींदार ने उसे चुप कराया की अगर तुमसे या उन सबसे वहाँ भी काम ही लिया गया तो काहे की जन्नत।सच तो यह है की हमे पहले जाकर तुम सबों का इंतेज़ाम करना चाहिए था मगर नही,मेरी जन्नत तो यहीं थी,जब तुम साथ थे।तुम सबने मेरी ज़िन्दगी को जन्नत बना रखा था।एक एक मरकर मुझे एहसास करा रहे हो की तुम थे,तभी तो हम थे।अब तो मैं अकेलेपन की दोज़ख में तुम सबके क़िस्से ही गुनगुनाता रहूँगा धूप में लेटा लेटा..