http://epaper.navbharattimes.com/details/5942-31537426-1.html
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, December 24, 2018
Sunday, December 23, 2018
जन्मदिन ईसा
कल हम कृष्ण की उँगली पकड़े हुए चले जा रहे थे।मेरे कृष्ण को सहारे की नही बस साथ की ज़रूरत है।जो दिल की धड़कन को सुने और महसूस कर सके।रास्ते में गंगा पड़ी।उनके इशारे को समझते हुए हमने एक काँसे में गंगा को समेट लिया।गंगा ने मुस्कुराते हुए इशारों में कहा की यह दो चार क़तरे नही हैं, यही तो पूरी गंगा है।मैं लपक कर फिर कृष्ण के पीछे हो लिया।पता नही वोह किधर जा रहे थे,बस दिल कह रहा था की उनके पीछे चलते रहो।
चलते चलते कब मिटटी से रेत,रेत से पहाड़ आ गए पता भी नही चला।एक पहाड़ की चोटी पर पहुँच कृष्ण ने पूछा अच्छा बताओ,किसी अपने को मैं अपनी कौन सी चीज़ दूँ,जो उसे भी ख़ुशी दे और मुझे भी।मैं भी बिना रुके बोला,बाँसुरी।।वोह मुस्कुरा दिया।
हम फिर एक गुफा में दाखिल हुए।उसमे एक टाट के टुकड़े पर कोई लेटा हुआ था।हल्के सफेद और काले से लम्बे लम्बे बालों ने कन्धों को ढक रखा था।अचानक हम दोनों के आने से पास में खड़ी भेड़ मिमयाई।वोह शख्स उठ गए मैंने देखा कृष्ण थोड़ा सा ही झुके थे की उन्होंने लपक कर कृष्ण को गले लगा लिया।मैं दूर खड़ा देख रहा था कृष्ण मिलकर रो रहे थे।लग रहा था अरसे बाद जिस्म रूह से मिला है।इस क़द्र मोहब्बत,दोनों सिसकियों से रोए जा रहे थे।कृष्ण ने मुझसे कहा गंगाजल दो।मैंने देखा जो जल मेरे हाथों में है वह हूबहु कृष्ण और उनके उस दोस्त की आँखों में है।कृष्ण ने वोह जल उनको दे दिया।
फिर आँखे पोछकर कमर से बाँसुरी निकालकर मुस्कुराते हुए कृष्ण ने उनके हाथ में रखी और अपना मोरपंख निकालकर उनके बालों में फंसा दिया।फिर कहा जब मैं अपनी भूमि से चला तो समझ न आया क्या ले चलूँ।फिर दिल ने कहा गंगा की शीतलता इस कड़ी चट्टान में आपके पाँव को सुकून देगी।यह बाँसुरी आपको मेरे करीब रखेगी।यह मोरपंख हमारी मुलाकात की पहचान बनेगा।
मैं तब चौका जब मेरे कृष्ण ने उनको ईसा कहा।और कहा की आपके जन्मदिन पर मैं और क्या लाता।सब कुछ तो आपका ही है।ईसा मुस्कुराते हुए बोले।हे कृष्ण तुम हो तो हम हैं।हम हैं तो तुम हो।यह लो मेरी चादर,यह तुम्हे बाँसुरी की कमी नही लगने देगी और अपनी चादर कृष्ण को उढ़ा दी।कृष्ण, जब मैं जन्माष्ठमी में आया था तब तुमने यहाँ आने का जो वादा किया था,वोह पूरा किया।मेरे पास तुम्हारी तरह गाय का मक्खन नही है मगर भेड़ का दूध है।लो पियो।
अचानक मेरे आँसुओं से निकले शोर से दोनों ने गर्दन मोड़ी।मेरे मोटे से आँसू देख दोनों मुस्कुरा दिए।मेरे कृष्ण ने मुझे भेड़ का दूध दिया,तभी ईसा ने उसमे गंगा के दो क़तरे डाल दिए।और कहा,लो हो गया मुक़म्मल।
मैं कृष्ण की ऊँगली पकड़े इंसान बना,लौट आया।अभी भी बाँसुरी की अवाज़ मेरे पीछे है और कृष्ण की उँगलियों की गरमी मेरे साथ।ईसा के टाट की धूल कृष्ण के मोरपंख की तरह चेहरे पर बिखरी पड़ी है।
Saturday, December 22, 2018
डरना मना है
ज़मीदार खुद तो लम्बे तगड़े लठैत कोठी पर पाले था । मैं सोचता हूँ की आखिर ज़मींदार को क़िस्से डर, वह तो अपने ही गाँव में है । अपने गाँव में भला कोई डरता है, भला कोई लठैत रखता है । ज़मींदार भी तो उस दिन मुल्हे के इतना कहने से भड़क गया था,जब मुल्हे ने कहा,साहब गाँव में अँधेरा है, रौशनी लगवा दें । बच्चे डर जाते हैं इस फैलते हुए अँधेरे को देखकर ।
अँधेरे पर सवाल उठा मुल्हे ने अपनी जलती हुई मढ़ैय्या देखी, टूटते बर्तन देखे, चीखते बच्चे देखे,मुल्हे पर हर पड़ने वाली लाठी आवाज़ करती हुई कहती,साले,अँधेरे से डरत है । हम गाँव वालों के बीच डरत है । हमारे बच्चे तो हैं नहीं की सिर्फ तुम्हार बच्चे अँधेरे से डरत हैं । हर लाठी से मुल्हे की पीठ पर छूटते लाल निशान तमाम गाँव को अँधेरे से प्यार करना सिखा देते हैं,उन्हें रौशनी चुभती है । वह रौशनी की बात से चीख़ उठते हैं क्योंकि ज़मींदारों ने बताया है की अँधेरा उनकी शाँति के ही लिए है ।
मुल्हे पर हर उठने वाला हाथ खुद के घर में चिराग़ भी रखता है, डरने वाले बच्चे भी रखता है मगर ज़ुबान नही रखता । अगर वह नही डरते तो चार दीवारी क्यों बनाते हैं, लॉकर क्यों रखते हैं, वह डरते हैं, सबसे ज़्यादा मुल्हे की आवाज़ से डरते हैं जानते हैं यह मुल्हे नही बोल रहा है बल्कि बहुत देर से जागा ज़मीर बोल रहा है, वह ज़मीर जो अँधेरे में मंगलू के डरते बच्चों की उन चीख़ों से नही जागा था,वह ज़मीर जो मंगलू की झोपड़ी जलाकर गाँव के अँधेरे के डर को दूर करते वक़्त सो रहा था और हाँ उधर ज़मींदार अपने आँगन में और ज़्यादा तेज़ रौशनी करवा देता है क्योंकि छोटे ज़मींदार झींगुर की आवाज़ से ज़मींदारिन की गोद में दुबक जाते हैं । दुबकना डर नही है न...ज़मींदार के यहाँ डरा नही दुबका जाता है ।
Thursday, December 20, 2018
तरतीब तोड़ दो
दिल कहता है की बांसुरी पर होंट रख मस्जिद में बैठ जाओ और वहीं अपने कान्हा से बतयाओ । मंदिर में बैठ नमाज़ पढ़ो । चर्च में बैठकर गुरु नानक के पांव पर सर रख लेट जाओ और गुरुद्वारे में बाइबिल को इतनी बार दोहराओ की ज़बान पहले से चढ़ी मजहब की लज़्ज़त खो दे । गौतम के साथ बैठकर सुजाता की मुश्किल हल की जाएँ,चलो उठो महावीर पर एक शाल तो डाल आएँ,कितनी ठंड है । पता है मेरी यह हर सोच पागलपन ही तो है ।
मैं चाहता हूँ की तरतीब टूटें और आप चाहते हैं की तरतीब चलती रहें। आप तरतीब से एक दुसरे के पीछे चलती चीटियों से सीखना चाहते हैं और हम इधर उधर बिखरी चीटियों से बात करना चाहते हैं । हमे स्कुल में बच्चों की एक के पीछे एक खड़े होकर लगी लाइन किसी शैतान की शरारत लगती है । जो बच्चों के बिखर जाने वाले दिल और असमान तक उड़ जाने वाले दिमाग को बाँधकर एक परेड के मैदान में खड़ा कर देता है । कितना अच्छा हो यह बिखरे बिखरे एक दूसरे से लड़ते झगड़ते,चुटकियाँ और बाल नोचते,एक दूसरे पर मिटटी और घांस फेकते हुए प्रार्थना करते । यह ऐसी प्रार्थना है जिसे ईश्वर पसंद करता मगर शैतान ने इन्हें एक रेखा में हाथ जोड़कर,सर झुकाकर,रटे हुए शब्दों को दोहरवा कर खड़ा कर दिया है ठीक वैसे ही जैसे अनारकली अकबर के दरबार में खड़ी सलीम के इश्क़ की सज़ा पाने को बेताब थी ।
यह मेरा पागलपन है,मुझे पता है सदियों से जिन आँखों को जो भी दिखाया गया है वह ही उनका सच है । वह कभी नही मानेंगी की अनुशासनहीन औलाद भी माँ बाप की उतनी ही मोहब्बत दिल में रखता है जितनी की सादतमंद औलाद । यह तरतीब के पीछे पगलाई दुनिया कभी नही मानेगी की लापरवाह बच्चे बड़े मोहब्बती हुआ करते है । यह कभी नहीं जान पाएगी की खुदा के सामने सजदे में झुका सर असल में कान्हा के कंधे पर रखा हुआ सर भी हो सकता है । पता नही कब वह दौर आएगा जब बदतमीज़ के दिल में छिपी तमीज दिखाई देगी । बदमाश के दिल में धड़कती मासूमियत कोई चेहरा पहनकर सामने उतरेगी ।
यह कब जानेंगे की हर अंगुलिमाल इंतज़ार कर रहा है किसी बुद्ध का । यह कब जानेंगे की खड्ग सिंह के बगैर बाबा भारती अधूरे हैं । यह कब जानेंगे की रावण की मौत के बाद राम की आँखों में उलटे भीतर बहते आंसू कौन थे । मोहम्मद की राह में कांटे बिछाने वालों की मोहम्मद के आने की बेकरारी और बेसब्री को भला कौन दिल समझेगा । यह एक पागलपन है,जो हमारी बनाई तरतीब से अलग चलेगा वह पागल ही तो कहलाएगा । वह यह भूल रहें की जो आज तरतीब है,उसे जो लेकर आया था,कल वह भी पागल कहलाया था । आज जो इससे हटेगा,वह भी पागल कहलाएगा,मगर एक दिन इस पागलपन के सामने सब सर झुक जाएँगे और तुम देखना मस्जिद से राम,मन्दिर से मोहम्मद,चर्च से नानक,गुरूद्वारे से जीसस,और सुजाता संग बुद्ध मुस्कराते हुए निकल जाएँगे...
Tuesday, December 18, 2018
सच्चा बालक
तुम्हारे पास क्या है? कड़ककर डाकू नें एक बच्चे से पूछा ।मासूम से बच्चे नें अपने गिरोह को लुटते पिटते साथियों को देखा और कहा यह थोड़ी सी अशर्फ़ी हैं ।डाकू नें झपट्टा मारकर अशर्फियाँ लेली और फिर खौफ़नाक आवाज़ में पूछा और क्या है ? बच्चे नें उसकी आंखों में आंखें डाल कर,रोते बिलखते साथियों को देख बिना डरे सहमे कहा कि मेरी सदरी में भी कुछ और अशर्फियाँ हैं अम्मी नें डाकुओं से इन्हें बचाने के लिए हमारी सदरी में छुपा कर सिल दीं थीं।
डाकू नें हैरत से बच्चे पर नज़र डाली और पूछा।अगर तुम सदरी की अशर्फियों के बारे में ना बताते तो हम कभी ना जान पाते।हममे से कोई तुम्हारी सदरी उतार कर हरगिज़ न देखता । तुम्हे हमसे डर नहीं लगा।तुमने अशर्फियों के बारे में हमे क्यों बता दिया ।
तब मासूम सा बच्चा चहक कर बोल उठा मेरी अम्मी ने कहा था कभी भी झूठ मत बोलना । हर हालात में सच को मज़बूती से पकड़े रखना । मै अपनी अम्मी का कहा नही टाल सकता था। इसलिए वह बोल दिया जो सच था ।डाकू की आंखें भर आईं।शर्म से सर झुक गया, घुटनों के बल बैठ आंसुओं के साथ उस नन्हे बच्चे से माफी मांगने लगा।वही मासूम बच्चा आगे चलकर अब्दुल क़ादिर जीलानी के नाम से महान सूफ़ी सन्त बना।
कभी यह किस्सा कोर्स की किताबों में "सच्चा बालक" के नाम से पढ़ा था मगर अब नहीं है।अब किताबों में बांटने वाले किस्सों की भरमार है,बिना सिर पैर की लन्तरानियां हैं मगर ऐसे किस्से ग़ायब हो गए।इन्हें थोड़ा सा याद करने में कुछ चला नही जाएगा बल्कि हां इतना ज़रूर हो जाएगा कि हम माँ का कहना शायद मानने लग जाएँ।
शायद बिना डरे और घबराए सच बोलने की हिम्मत आ जाए ।
सच्चे बालक ही एक खुशबूदार मुस्कुराती दुनिया बना सकते हैं ।हम सब ऐसा बनकर खुशहाल हिंदुस्तान बनाए जो दुनिया को खूबसूरत राह दिखाए।जो सच कहने से न डरे।जो माँ की दिखाई राह से दूसरों की माँ की मुश्किलें दूर करे।जो एक माँ के आँचल की छाँव में दूसरी माँओं के लिए फूल चुने।आज ग्यारहवीं है,अब्दुल क़ादिर जीलानी का दिन।सच्चे बालक का दिन।मेरी ज़िन्दगी में बचपन में ही गहरी छाप छोड़ने वाले सच्चे बालक का दिन ।
एक चीज़ फिर कहता हूँ वह इंसान समझदार हैं जो चाहे किसी भी तरह अपने बुज़ुर्गों को याद करते हों,याद तो करते हैं । ग्यारहीं है आज,ज़ाहिर है दिलों को बाँटने वालों और नफ़रत को बढ़ाने वालों के लिए एक और मौके का दिन है । फ़िरक़ा परस्ती की मशाल लेकर तमाम सतही बातें करने का भी दिन है । इन सबसे अलग अब्दुल क़ादिर जीलानी की ज़िन्दगी को देखिये और इल्म केलिए अपने को तैयार कीजिये । उनकी ज़िन्दगी को रौशनी बनाइये और आजके दिन अपने बच्चों को ज़रूर बताईये की कौन थे अब्दुल क़ादिर जीलानी । जिस चैप्टर को वक़्त का बादशाह तंग नज़र होकर हटा दे,उस चैप्टर को याद करके बच्चों को सुना जाइये । सच्चा बालक घर घर पहुँचा दें ताकि दुनिया को संवारने वाले लाखों सच्चे बालक पैदा हो सकें....
Wednesday, December 12, 2018
Saturday, December 8, 2018
सोनिया और रुक़य्या
आजका दिन इन दो नामो की वजह से बड़ा खास है।सोनिया गाँधी न परिचय की मोहताज हैं और न यह बताने की हिंदुस्तान की अवाम उन्हें किस क़दर मोहब्बत करती है।सोनिया गाँधी ने राजीव की आँख से जो भारत देखा था उनके जाने के बावजूद उसे अपने सीने से लगा रखा।अपने बच्चों में इंसानियत और दूसरों की इज़्ज़त और जज़्बात की तरबियत दी जो रोज़ ज़ाहिर हो रही।मुझे ख़ुशी है की मुल्क़ को सोनिया ने और सोनिया को मुल्क़ ने बड़ी खूबसूरती से अपनाया।हर दुःख की खड़ी में दोनों साथ रहे।जब सोनिया का साथ राजीव से छूटा तो पूरे देश ने सोनिया को मोहब्बत से लबरेज़ कर दिया।जब मुल्क़ को बेहतर नेतृत्व चाहिए था तो सोनिया ने भी दहलीज़ लांघी।लिखने को काफी है मगर आज सोनिया गाँधी को उनके जन्मदिन पर खूब बधाई।उनके स्वास्थ्य की चिंता है, वह ठीक रहें अभी उनकी बेहद ज़रूरत है।
अब दूसरी महिला हैं रुक़य्या बेगम।दुर्भाग्य से अब पूछियेगा की कौन रुक़य्या।रुक़य्या सखावत हुसैन।बंगाल की रूह रुक़य्या।अबरोध बासिनी लिखने वाली रुक़य्या।जो हमेशा मज़हब की शाल ओढ़कर,मज़हब के आडम्बर,ज़ंज़ीर से उलझती हुई रास्ते बनाती रही।वोह रुक़य्या जिसे सुनने वालों की तादात तब तक बढ़ती ही रही जब तक उसे भुला नही दिया गया।
आजही के दिन 1880 को उन्होंने दुनिया में पहली साँस ली थी और आजकी ही सुबह 1932 में रुक़य्या बेगम ने अपनी आखरी साँस भी ली थी।मैं जब तुम्हे स्त्री विमर्श पर बहस करते देखता हूँ तो खुश होता हूँ की चलो तुम उनकी आवाज़ तो बन रहे हो।मगर दोस्त थोड़ी देर बाद तुम्हे ख़ाली पाता हूँ।जानते हो क्यों।क्योंकि तुमने खुद को कभी खाद पानी दिया ही नही।तुम्हे उन औरतों को पढ़ना होगा।
उठो और कमसेकम आजके दिन रुक़य्या सखावत हुसैन को पढ़ो उनकी अबरोध बासिनी को पढ़ो।मोतीचूर,पदमार्ग और सुल्ताना के ख्वाब को पढ़ो,देखो दिमाग की तहे खोलती यह कैसे उस दौर में ज़मीन पर टिकी।जब न मिले तो उनसे पूछो जिन्होंने इन्हें पढ़ा है।तब डट कर कुरीतियों,आडम्बरो से मुकाबला करो।हर लड़ाई लड़ने से पहले उस लड़ाई को लड़े जाने के पुराने तरीकों को मालूम करना ही अक्लमंदी है।उन महिलाओं को पढ़िए,खोजिए जिन्होंने सदियों पहले दहलीज़ से निकलकर ज़माने की तरक्की के दरवाज़े खोल दिए थे।सोनिया को जन्मदिन की बधाई और रुक़य्या बेगम को नमन।
मजाज़
उसे मृत्यु दिख रही थी । वह उसके आकर्षण में चला जा रहा था । मृत्यु का आकर्षण उन गहरी आँखों में साफ़ देखा जा सकता । वह कभी तेज़ तो कभी आहिस्ता मृत्यु की ओर बढ़ता रहा । चलते चलते रास्ते में पर्चे उड़ाता जा रहा था । कोई पर्चा आँसू से भीगा था तो कोई मुस्कुराहट से हवा में तैर गया । किसी के हाथ आया तो कोई बोला यह तो ग़ज़लें हैं, किसी ने कहा यह तो नग़मे हैं ।
वह मृत्यु के आकर्षण में क्या क्या हीरे अपनी जेब से बिखेरता जा रहा था उसे खुद खबर नही । किसी ने कहा वह गरीब है, मतवाला है, बेचारा है, आवारा है । वह इससे भी बेख़बर मृत्यु के होंटो की लरज़त की लज़्ज़त में बस चला जा रहा था । वह जान गया था स्वादों में सर्वोत्तम स्वाद मृत्यु का है, जो सबसे अंत में मिलना है ।
उसने मृत्यु की भीनी भीनी खुशबु पहले ही पा ली थी,वह मृत्यु के आलिंगन में बस चलता जा रहा था । दोनों बाहें फैलाए वह मृत्यु को ललचाई हुई नज़रों के साथ भींच कर गले लगा लेने को आमादा था । उसी रास्ते पर उसकी कुछ पसीने की बूँद गिरी,कुछ हवा उसे छूकर गुज़रीं,कोई मुस्कुराहट आँख से भीगी हुई मुँह के बल कागज़ पर गिरी । ज़माने ने उसे नाम दिया आहंग ।
वह जो मृत्यु के आकर्षण में दुनिया का सबसे आकर्षक इंसान था,वह जा मिला उस इंतज़ार करती बेचैन मृत्यु से और एक बिजली की चमक सर्द रात में दौड़ पड़ी,जिसे चीखकर लोगों ने कहा...ओह मजाज़...मृत्यु मजाज़ को पाकर सुहागन हुई....एक ज़िन्दगी जो मृत्योत्सव हो गई,वह मजाज़ जिसकी चलती साँसे ज़माने में बिखरी रहीं और उखड़ी साँसों ने कसकर ज़माने को बाँध लिया और वह वक़्त कहलाया मजाज़ लखनवी का दौर...
Wednesday, December 5, 2018
राम
मेरे राम।।।वाकई एक ऐसा किरदार जिसनें मुझे हमेशा एक रास्ता दिखाया।जिनसे मामूली से मामूली इन्सान की अहमियत सीखी।मेरे राम नें मुझे माँ की ख्वाहिश को किसी भी हाल में पूरा करने के लिए मज़बूती से खड़ा किया।राम हमारे दिल में हैं वह ज़मीन के किसी हिस्से में क़ैद नही हो सकते।आप उनके लिए लड़िये झगड़िये जीभर ख़ून बहाईए,दिलजोई करिए मगर दावे से कह दूँ मेरे राम आपकी इन हरकतो से खुश नही होंगे।
मै अयोध्या की ज़मीन में खूब गया महसूस भी किया।नंगे पैर उस ज़मीन पर घंटो टहला।राम के पैरों की धूल को महसूस किया ।सरयू के पानी में उतर के राम से बाते भी की वह राम थे जो सरयू के पानी से भीगे चेहरे से मेरे आसूँ पहचान गए और हाँ जब मै परेशान हुआ तो मेरे राम ने कहा मत हो मायूस।
मैं जहाँ था वही हूँ और वही रहूँगा।मस्जिद भी मेरा घर थी मंदिर भी।जिसनें भी मेरा घर तोड़ा वह नासमझ थे।वह इन चार दीवारो में मुझे ढूँढ रहे थे।अगर वह वाकई मुझे चाहते तो अपने दिल में झाँकते।उन्हे मानवता दिखती।वही तो मैं था उनका राम।।।
ज़मीन का जो हो वह कोर्ट तय करेगा बस इतना याद रखे अगर दिल में राम हैं तो कोई बाबर की ताकत नही वहाँ से राम निकाल सके । विध्वंस की जगह निर्माण में अगर राम हैं, तो एक शानदार संसार उससे बनेगा । किरदार में राम हैं, तो हर कमज़ोर खुद को कमज़ोर नही समझेगा ।अगर वास्तव में तुम सबमें राम हैं, तो ज़ुल्म और अत्याचार घुटनों के बल बैठा होगा । राम दिल का खिड़की नही दरवाज़ा खोलते हैं, प्रेम और मानवता को अंदर आने के लिए,नफ़रत और घमण्ड को बाहर ले जाने के लिए । मैं ज़बानी रामभक्त नही बल्की उनको ज़िंदगी में उतारने वाला राम का प्रेमी हूँ।तुम्हारी दिलों को बाँटने वाली तकरीरें यहाँ नही चलेगी क्योंकि यह राम का सच्चा घर है।
राम का घर।हो सकता है आपको यह सिर्फ़ पोस्ट लगे।लगे तो लगे।अगर वाकई आपके भी दिल में राम होंगे तो इस कैफ़ियत को समझिएगा।मोहब्बत कीजिएगा।मानवता और मर्यादा की इज़्ज़त कीजिएगा।यही हैं मेरे राम।