Wednesday, November 21, 2018

धर्म हथियार है क्या

ईश्वर ने हमे सींघ नही दी । उसने हमे लम्बे लम्बे दांत नही दिए जिससे हम कुछ चीड़ फाड़ सकें । उसने हमे चार पैर नही दिए जिससे हम तेज़ भाग सकें । उसने हमे जिस्म पर बड़े बड़े बाल नही दिए जिससे हम ठण्ड या हमलों से  बच सकें ।उसने हमे पँख नही दिए की हम उड़ सकें । उसने हमे नोकीली चोंच नही दी । उसने हमे ज़हर नही दिया की काटकर हम दो सेकण्ड में दुश्मन को मार सके ।
कितना अन्याय किया न ईश्वर ने मनुष्य के साथ । नही ईश्वर ने इन सबकी जगह हमे जानते हैं क्या दिया,धर्म ।
धर्म ने सींघों की कमी पूरी की,दाँतो की कमी पूरी की,पंखो और बालों की कमी पूरी की । अब आप धर्म से किसी को चीड़फाड़ सकते हैं । चाहे तो यही धर्म से किसी की सुरक्षा कर सकते हैं, चाहे हत्या । जैसे जानवर अपनी सींघ से सुरक्षा करे या पगलाया हुआ दूसरे को मारता फिरे ।

धर्म आपको भेड़ भी बनाता है और भेड़िया भी ।कबूतर भी बनाता है और शिकरा भी । केचुआ भी बनाता है और साँप भी । यह धर्म एक अचूक अस्त्र है, जो मानव को मिला,जिसने उसकी हर कमज़ोरी को मज़बूती में बदल दिया और मज़बूती को मजबूरी में बदल दिया ।

जब सींघ, दांत, बाल और दूसरे शक्ति के प्रयाय बढ़ रहें हों तो विधान ही इन्हें रोकता है ।यह विधान ही तो धर्म है । बस इसे चलाने और समझने का दिमाग़ चाहिए । जिस तरह सावधानी हटी तो चील एक झपटा मारकर आँख निकाल ले जाएगी उसी तरह सावधानी हटी तो धर्म एक झटके में आपकी नाक उड़ा ले जाएगा । यह रुकता है, अच्छे दिमाग़ से । यह संवरता है शानदार दिमाग़ से ।
मनुष्य अपने दिमाग़ से खूँखार जानवरों को भी पालतू बना लेता है । यदि वह धर्म का सही इस्तेमाल करे तो सब बेहतर रहे । ज़रा से चूका नही की यही धर्म मनुष्यता को नष्ट भी कर देगा ।

ईश्वर ने जानवरों को जो ताक़त दी,कभी कभी वही ताक़त उनकी मृत्यु का कारण बनती है । इसी तरह मनुष्य को धर्म की एक ताक़त दी,तो कमज़ोर दिमाग़ यह ताक़त लेने लायक ही नही बने और इसी से विध्वंस शुरू कर दिया । जब आपके अंदर का धर्म बिगड़ जाता है या उसमे केमिकल लोचा हो जाता है तो आप विध्वंस के प्रयाय बन जाते हैं ।मानव जाति के संघारक बन जाते हैं । जैसे ही यह सही होता है, आप मानवता और प्रेम को पोषित करने लग जाते हैं और यही धरती आनन्द का प्रयाय बन जाती है । अब तय करना यह है की आप धर्म रूपी अपने पंखो से ऊँचे आसमान में उड़ते हैं या ज़मीन में किसी की आँख फोड़ने की फ़िराक़ में घिनौने पेड़ की शाखा में बैठते हैं ।

मोहम्मद साहब

जो यह कहते हैं की हज़रत मोहम्मद को खुद में उतारो,उनकी बताई बातों को दिल से लगाओ ।उनके दिखाए रास्ते पर चलो ।उनके किये कामो को अपने उसूल बनाओ ।वो भी अच्छे से जानते हैं की यह आसान नही है ।
पैग़म्बर मोहम्मद की ज़िन्दगी को खुद में उतारना इतना ही कठिन है जितना पानी में मिटटी घोलना ।जब तुम्हे लगेगा की मिटटी घुल गई,तो ज़रा से वक्फे के बाद वह तलहटी में बैठ जाएगी और पानी फिर ऊपर मुस्कुराता रहेगा ।

तुम्हारे लिए तो इतना ही पैमाना काफ़ी है की जब तुम तस्लीमा नसरीन,सलमान खुर्शीद और फ़्रांस के कार्टूनिस्ट की क़लम की सियाही से बेचैन न हो,उनके किये को उनकी सोच समझ माफ़ कर दो,किसी के भड़काने पर बारूद का ढेर मत बन जाओ,जब ऐसा करलोगे तो हज़रत मोहम्मद के पीछे पाओगे ।
जब तुम बाथरूम में हो और एक ज़रूरत से ज़्यादा पानी मत बहाओ,तुम्हे बेवजह बहते पानी को देख दर्द हो,तब तुम उनके रास्ते पर होगे । किसी बच्चे जिसके माँ बाप न हों उसके सामने अपने बच्चों को बहुत दुलार प्यार मत करो की बच्चा अपने माँ बाप की मोहब्बत को बेक़रार हो जाए,तब तुम उनके पीछे होगे ।

फल खाकर छिलके ऐसी जगह मत डालो जिससे कोई को इसके न मिल पाने की ख्वाहिश जगे,जब तुममें यह संवेदना होगी,तब तुम उनके रास्ते पर होगे । पड़ोस में अगर कोई भूखा है और तुम्हारा पेट भर रहा है, तो तुम हज़रत मोहम्मद के रास्ते से कबके हट चुके हो ।

बीमार को तुम देखने नही जाते,इंसान के मिलने पर उसकी खैरियत नही पूछते,बाजार में बैठकर सिर्फ अपने फायदे की फ़िक्र करते हो,दूसरे की अमानत में खयानत करते हो,बेटे को बेटी से ज़्यादा पढ़ाते हो,बेटी को अपनी कमाई में हिस्सा नही देते,बेटियों से ऊँची आवाज़ में बात करते हो,औरत से सख़्त लहजा इस्तेमाल करते हो,बूढ़े तुमसे बात करने,पूछने या कुछ भी कहने में डरते हों तो यक़ीन जानो तुम हज़रत मोहम्मद के जलाए चराग़ की रौशनी के बावजूद एक अँधेरा हो  ।

अगर तुम्हारे लफ़्ज़ किसी के दिल को दुखाते हैं । तुम्हारा होना गरीब मज़लूम को दर्द देता है । तुम ज़ुल्म के हिमायती हो ।तुम नौकर और खुद के खाने और पहनने में फ़र्क़ करते हो ,तो चाहे तुम जुलुस निकालो और चाहे सुबहों से शाम मस्जिद में सजदे में पड़े रहो । बावजूद इसके तुम हमारे हज़रत मोहम्मद की नज़र से अलग रास्ते पर हो। । जिन्हें लगता है की रसूल को वाक़ई ज़िन्दगी में उतारा जाना चाहिए,वह कुछ भले न करें मगर शुरुआत वह तक़लीफ़ पहुँचाने वाले अल्फ़ाज़ से किनारा करके कर सकते हैं ।मोहब्बत है तो मोहम्मद हैं, वरना कुछ भी नही..

Tuesday, November 20, 2018

हज़रत मोहम्मद

जब लड़कियो को ज़िंदा ज़मीन में गाड़ दिया जाता था।जब औरतों को हर हुक़ूक़ से महरूम रखा जाता था।इल्म से मायूस थी ज़मीन।जिहालत का बोलबाला था।इंसानी रिश्ते रोज़ टूट और बिखर रहे थे।नफरत आसमान छू रही थी।इंसान इंसान को ही गुलाम बना रहा था।बेइंसाफी और बेईमानी तख्तों पर बैठ मज़लूमो पर हँस रही थी।तब वह रौशनी बन कर आए।उन्होंने इंसान को इंसान बनाया।लड़कियो को ज़िन्दगी और इज़्ज़त की वकालत की।गुलाम को मालिक की सफ में बराबर खड़ा कर दिया।बेइंसाफी और बेईमानी का गला घोटा।भाई को भाई की मोहब्बत दी।इंसानियत को आसमान तक बुलंदी पर लेकर गए।वह थे हज़रत मोहम्मद।

वही रसूल जो हातिम ताई की बेटियो को देख तख्त से खड़े हो जाते थे।जिन्होंने अपनी बेटी की हमेशा इज़्ज़त की और पहली बार बेटियो को बाप की जायदाद में एक बड़ा हिस्सा फ़र्ज़ किया।यह वही हज़रत मोहम्मद हैं जिनपर कूड़ा फेंका जाता था।रास्ते में काँटे बिछा दिए जाते थे फिर भी बिना उफ़्फ़ किये हर फर्द को गले लगाया।जिसने दुनिया को जिहालत से निकाला उन हज़रत मोहम्मद को याद कर लें।अफसोस होता है की हर तरह के उदाहरण देने वालों ने भी हज़रत मोहम्मद को नही पढ़ा।उन्हें आप इस्लाम,पैगम्बर से अलग हट कर तो पढ़ ही सकते हैं।देखिये उनमे और इन मुसलमानो में कितना फ़र्क है।यही फ़र्क आपको श्री राम और उनको मानने वालों में मिलेगा।हज़रत मोहम्मद को पढ़ना और ज़िन्दगी में उतारना एक बड़ा कदम है।जो कमज़ोर ज़हन से मुमकिन नही है।

दोस्ती,रिश्ते,गरीब,हक़,फ़र्ज़,पानी,पहाड़,ज़मीन,बड़े,बच्चे,बूढ़े,औरत,कमज़ोर,लाज़ार,खानपान,इल्म,मेहनत,मज़दूर सब पर निगाह रखने वाले हज़रत मोहम्मद की ज़िन्दगी को पढ़ लीजिये।देख लीजिये।परख लीजिये।जैसे हर आदर्श को अपनाते हैं वैसे ही हज़रत मोहम्मद को भी देखिये । उनकी ज़िन्दगी में गुँथी फिलॉसफी को समझिये क्योंकि एक बार यह डोर पकड़ ली तो काफ़ी कुछ हाथ आ जाएगा ।जो पैग़म्बर मानकर हज़रत मोहम्मद को बस रट रहें हैं उनसे इतर,उनकी ज़िन्दगी की बारीक़ी में झाँकिये आपको वह सूत्र मिलेगा जो शिखर पर ले जा सकेगा...

Sunday, November 18, 2018

अना फ़ना

कभी कंचे देखें हैं । चिकने,गोल और चमकीले मगर इनमे दोष होता है ।अना का दोष ।यह कंचे कभी एक दूसरे को सहयोग करके ऊँचा पहाड़ नही बन सकते हैं । यह फिसल कर बिखर जाएँगे,यह फिसलन इनकी अना है, जो दूसरे कंचे को बर्दाश्त नही कर सकती,उसका वज़न नही उठा सकती ।

वहीं ऊबड़ खाबड़ पत्थर के टुकड़े हों या चौकोर गिट्टियां या मिटटी का ढेर ।यह एक दूसरे को पकड़ कर ऊँचा पहाड़ बना सकते हैं जानते हैं क्यों,क्योंकि इनमे अना नही है ।यह एक दूसरे का वज़न उठा सकते हैं और मिलकर ऊँचा हों सकते हैं ।

अगर तुममें अना है तो तुम कंचे ही हो,अकेले अकेले चमको और गोल गोल घूमते हुए अपने जैसे दूसरे कंचो से लड़कर,मारकर,जीतने का जश्न मनाओ ।

अगर तुम अपनी अना को मिटा दो,तो हर एक को जोड़कर,पहाड़ जैसी सभ्यता हो,या संगठन हो दोनों को ऊँचाइयों पर ले जाओगे ।

Thursday, November 8, 2018

Monday, November 5, 2018

दीपावली

दीपावली के दीपक जलाने से पहले आजके नवभारत टाइम्स में स्पीकिंग ट्री पढ़िए । मानिये या न मानिये जानना तो ज़रूरी है....

हम तमाम दर्द,तमाम कमियों,तमाम अधूरी रह गई इच्छाओ के बाद भी अपने साथ साथ दूसरों के चेहरों पर मुस्कान लाने की परम्परा बनाए रखने वाले लोग हैं.पूरे साल हमारी जिंदगी में तमाम तकलीफे भले ही रही हों, आनंद का एक ही पल काफी है,हमे उल्लासित करने के लिए.पूरा देश ही नही वरन संसार के दूसरे देशों में भी हम सब दीपोत्सव मनाने जा रहें है.एक ऐसा त्यौहार जिसकी रौशनी से यह पृथ्वी जगमगा उठेगी.एक ऐसा माहौल जो हर हृदय पर असर ज़रूर डालेगा की वह अपने हृदय का अँधेरा मिटाता है या और ज़्यादा बढ़ाता है.

जब दीवाली शुरू होगी तो जिज्ञासु मानवमन जरुर पूछेगा की आखिर यह उत्सव क्यों ? आखिर वह कौन सी वजह है जो हम अपने घर और आंगन को रौशनी से भर दें.तब वह पन्ने पलटकर भगवान कृष्ण के साथ सत्यभामा का वह रूप देखेंगे जिनकी आज जरूरत है.दीवाली की शुरुआत में ही वह जानेंगे की नरकासुर कौन था .वह उस अपराध को भी जानेंगे जो नरकासुर ने किया था. सोलह हज़ार लड़कियों को कैद में रखने वाला नरकासुर सत्यभामा के साथ खड़े कृष्ण के हाथ जब मृत्यु पाता है तब महिलाऐं ख़ुशी से झूम उठती हैं और कृष्ण के उन सबों के साथ लौटने पर दिए जलाती हैं.घर में खुशबु महकाती हैं ताकि कृष्ण के माथे पर लगे नरकासुर के खून की दुर्गन्ध मिट जाए.

यह बात जानना और ज़रूरी है की महिलाओं के प्रति हमारा नजरिया क्या हो.वह कौन सा अपराध है जो सबसे बड़ा अपराध है.नरकासुर के अत्यचार की सीमा नही थी मगर जैसे ही उसने महिलाओं पर हाथ डाला उसकी मृत्यु की तारीख उभर कर सामने आ गई.आज जब “मीटू कैम्पेन” चल रही है.महिलाऐं जिन्हें हमने बोलने नही दिया,वह अपना दर्द उभार रहीं हैं. उनको हमारे साथ की जरूरत है. सबको पता है की अब कृष्ण नही है जो दिलों का हाल जान ले और सत्यभामा का हाथ थाम कर महिलाओं पर ज़ुल्म करने वाले पर सुदर्शन चक्र चला दें.ऐसे में कृष्ण के स्थापित अध्याय ही काम आएँगे.ऐसे में उनकी शिक्षाएं ही रास्ता दिखाएंगी.

यह जो त्यौहार हैं,यह खुद बताते हैं की देखो हममे कितना इतिहास गुंथा है.मुझमे लिपटे हुए उस अध्यात्म को पकड़ो जो संसार में खुशिया लाए.यह भी दीवाली हमेशा की तरह आएगी और चली जाएगी.कुछ लोग होंगे जिनके घर दो तीन दिन रौशनी रहेगी और कुछ लोग होंगे जिनके हृदय हमेशा के लिए रोशन हो जाएँगे.जिनके हृदय में प्रकाश पहुच गया समझो मेरे कृष्ण वहां पहुच गए. अब कृष्ण को तो सब ही अपने हृदय में लाना चाहते हैं,तो भला कृष्ण हर हृदय में क्यों जाएँ.तब कृष्ण ने चुना जो हृदय महिलाओं के दर्द पर तडपेगा,कृष्ण वहां जाएँगे.जो महिलाओं पर होते हुए अत्यचार पर व्याकुल होकर रोकेगा,कृष्ण वहां होंगे.

जो अपने हृदय के अंदर का नरकासुर मारेगा उसके हृदय में कृष्ण का दीप जलेगा.
राम एक अहंकार को तोड़कर लौटते हैं तो कृष्ण एक अत्यचारी का दमन करके लौटते है.तब ही जनता इनके पांव के नीचे बिछ जाती है और रौशनी से इस धरती को नहला देती है.अब जरा गौर से देखिये अगर आपके होने से किसी पर अत्याचार हो.अगर आपका कोई भी अहंकार किसी को नीचा दिखाए.अगर आप के खड़े होने से कोई भयभीत हो,आपकी परछाई से कोई महिला सिसकियाँ ले,आपके होने से बूढ़े दुबकने लग जाएँ तो समझ लीजिये आपके हाथ में जो दीप है वह दीप नहीं बल्कि आग है. दीप तो वह होता है जो अँधेरे को हटाए . सच और झूठ का फर्क दिखाए. धर्म और अधर्म का अंतर उभारे. इस दीपावली ऐसे ही दीप जलाइए जो मन का सारा विकार हटाकर हमे इन्सान बना दे.

Sunday, November 4, 2018

लूटतंत्र

सच पूछिये तो हमे ही समझ नही थी ।वह बार बार कहते की फलाने ने सत्तर साल लूटा और हम इसमें छिपी टीस ही नही पहचान पाते थे । उन्होंने सत्तर साल के किसी भी काम को ज़बान पर लाने की गलती नही की और सिर्फ लूट लूट ही कहते रहे ।

तब भी हमारा ध्यान नही गया और हम इन कर्णप्रिय रसपूर्ण वक्तव्यों में मन्त्रमुग्ध होकर नाचते रहे । अब दिख रहा उनका लक्ष्य क्या था,लूट । वह सत्तर साल की लूट को ही लक्ष्य मान रहे थे और पाँच सालों में उसे पूरा कर लेना चाहते थे ।उन्होंने सत्तार सालों में किसी काम से मुकाबला नही किया सिवाए लूट के और बहुत हद तक पछाड़ भी दिया ।
जब पी साईनाथ ने कहा की प्रधानमन्त्री फ़सल बीमा योजना ,रॉफेल से बड़ा घोटाला है तो दिल बैठ गया । पुराने बहुत से बयान पलटे तो देखा वह तो हर ब्यान में लूट का ही ज़िक्र कर रहें । तब सर पीट लिया की भय्या उनकी नज़र बुरे ही कामो पर थी,उनका लक्ष्य भी तो वही था ।भरम में तो हम थे ।

सत्तर साल में बने एक भी यूनिवर्सिटी के जैसी कोई यूनिवर्सिटी नही खोली,कोई बैंक नही खोला,कोई संस्थान नही बनाई हाँ मुकाबला ज़रूर किया,अपने लक्ष्य को पा लिया । मुझे पी साईनाथ की रिपोर्ट ने झकझोड़ दिया क्योंकि देश में दो चार ही लोग हैं जिनपर हम यक़ीन करते हैं । यक़ीन इसलिए क्योंकि उन्हें भीतर बाहर से जानते हैं ।यक़ीन इसलिए क्योंकि उनकी आत्मा और अपनी आत्मा को एक ही रास्ते से चली देखते हैं ।

यही भला है की हमसे कोई यह नही पूछता की जब सत्तर साल लूट मची थी,तब तुम कहाँ थे । कोई कमअक्ल अगर यह पूछ भी ले तो हम यही कहेंगे जब बाबर भूमि कब्ज़ा रहा था तब तुम कहा थे ।जब अशोक लाखों को मार रहा था तब तुम कहाँ थे ।जब वही अशोक हथियार छोड़ ज्ञान बाँट रहा था तब ही मुट्ठी भर ले लेते,तब कहाँ थे,जो यहाँ मूर्खता का मुकुट लगा मटक रहे हो । ख़ैर जो है तो हइये है,हमे पता है लूट कभी हमारा मुद्दा होती ही नही क्योंकि लूट का सबसे बड़ा तन्त्र ही हमारी कमज़ोरी है, धर्म ।।

Friday, November 2, 2018

एक दर्द

मुझे लगता है मेरा दिल मटकी में पकने वाला गोश्त का टुकड़ा है ।जो मिटटी की सौंधी खुशबू के साथ पल पल पक रहा है । मटकी अंगारों पर रखी धीरे धीरे गर्म हो रही और मेरे दिल से धीरे धीरे पानी बाहर आ रहा । लोग इस पानी और आग में जली मिटटी और गोश्त की खुशबू सूँघ मदहोश हो जाएँगे । एक रोज़ मेरा दिल पक जाएगा और लज़्ज़त के भूखे लोग उसके रेशे रेशे को खींचकर निगल जाएँगे ।

यही तो इश्क़ का वह मकाम है जहाँ से ऊंचाई हार जाती है ।जहाँ से ग़म दम तोड़ देता है ।जहाँ से खुशियाँ अपने अंदर से खुशियाँ खत्म कर देती हैं ।यह कैफ़ियत सदियों में एक आध बार एक आध जिस्म में होती है । जब वह जिस्म अपने नज़दीक़ बैठी रूह से कहता है की मैं जिन्हें जानता हूँ ,वह तुम्हे जानते हैं ।तुम उन्हें नही जानते,जो तुम्हे जानते हैं । तुम हमे जानते हो,जो तुम दोनों को जानता हैं । इस जानने में मिटेगा हर एक मगर पहले वह तहस नहस होगा जो सब जानता है ।

ख़ैर दिल भीना भीना हांडी गोश्त बनने को तैयार है और रूह रत्ती भर भी बेचैन नही । किसी ने बहुत पहले पूछा था की सबसे बेमुरव्वत कौन,तो बिना पल गवाए कहा था,रूह । जब शरीर कमज़ोर होगा तो यह छोड़ देगी,जब ज़ख़्मी होगा साथ छोड़ देगी,जब दर्द होगा तो इसे भगाओ,यह बेहिस सी नज़दीक़ ही बैठी रहेगी । जब चीखकर कहो की मेरे बदन से निकल जाओ,तो यह चिमट कर कहेगी अभी नही,अभी तो तुम्हारे सब्र से काँपते हुए होंट देखने हैं ।अभी सुर्ख़ डोरियों के गुच्छे में बदलती तुम्हारी आसुंओं से तर आँख देखनी है । सच पूछो कमबख्त रूह बड़ी बेमुरव्वत है । मैं लिख रहा हूँ,वह नाख़ून से भुनते होए गोश्त की खाल नोच रही है ।

यह क्या है । यह क्यों लिखा । कहना क्या चाहते हो ।बस यही की तुम समझो जो तुम्हारा सौदा कर चुके हैं, उनकी गोद में तुम नन्हे बच्चे सा मुस्कुरा रहे हो । तुम जो कभी अकेले हो तो कभी भीड़ में हो,कभी खुद को क़ौम में जोड़ते हो तो कभी मज़हब में जोड़ते हो,तुम समझो जो लिखा नही जा सकता ।तुम महसूस करो जो बोला नही जा सकता । बताओ की तुम्हे कैसे बताऊँ की हर जागती आँख जाग नही रही होती और सोती आँख सो नही रही होती । बताओ की कैसे बताऊँ की दिमाग़ की कौन सी नस दबाऊँ जो तुम्हे रात में पर्दे के पीछे मिलते हाथों का हाल दिख सके । बताओ की कैसे बताऊँ जो कँधे पर हाथ है तुम्हारे मोहब्बत और हिफाज़त का,उसी हाथ की आस्तीन में खन्जर है,जिसपर तुम्हारा नाम नक़्श है । यह एक फ़लसफ़ा है, समझो तो पार,वरना डूबना तय है ।डूबने से पहले मटकी में पकते मेरे गोश्त की लज़्ज़त लेते जाना और जो ज़ायका आए वह यहाँ कहते हुए डूबना.....

Thursday, November 1, 2018

महल खण्डहर

उसके हाथ में ताज़ा ताज़ा प्लॉट आया था।ज़मीन का सबसे शानदार टुकड़ा।उसने उसमे शानदार घर बनाने का ख्वाब देखा।झट से शहर के सबसे क़ाबिल आर्किटेक्ट से नक्शा बनवाया।वोह चाहता था,उसका घर शहर का सबसे नायाब घर हो।उसके घर में सारी सुविधाएँ हों।वोह सोचता था की उसके घर में उसके रहने वाले अपने,बेहद खूबसूरती से रहें।

घर में खूबसूरत टायल्स लगाए गए।छतों को पीयूपी से सजाया गया।नल की टोटियाँ भी हज़ारों की थीं।घर की खिड़कियाँ ऐसे खुलती थीं की सबको हवा मिले,किसी का कहीं भी दम न घुटे।सबके हिस्से में सूरज की रौशनी आए।सबके जिस्म को कुदरत की ठण्डी ठण्डी हवा लगे।
घर बनकर तैयार हो गया।शुरू शुरू में बनाने का हौंसला कुछ दिन चला।फिर जैसे जैसे लोग मरते रहे,वक़्त गुज़रता रहा।घर को संवारने का हौसला जाता रहा।कल तक एक एक नोक पलक रखने वाला अब बहती टोटियाँ पर भी ध्यान नही देता।झड़ती पीयूपी पर भी उसकी नज़रें नही ठहरती।दीवारों पर जमती काली काई भी अब उसके हौसले को नही जगाती।अब उसका दिल भर चुका है।नए बच्चे उसकी हर कोशिश पर अब सवाल कर रहें ।बहती टोटी पर कह रहें यहाँ फला ब्रांड की टोटी लगाई होती । यह दीवारों का रँग दूसरा किया होता । यह दरवाज़े इतने ज़्यादा क्यों हैं । घर बनाने वाला बूढ़ा बेचैन लेटा गिरता हुआ प्लास्टर देख रहा ।

ठीक ऐसा ही होता है एक देश।उसके बनते वक़्त बड़े हौंसले होते हैं, फ़िक्रें होती हैं, एक संविधान बनता है।संवैधानिक संस्थाएँ बनती हैं । संविधान जो सबको खुली साँस देता है।धीरे धीरे वोह बनाने वाले लोग मारते जाते हैं और देश घर की तरह पुराना होता जाता है। नए आए लोगों का इनके बनने से मतलब नही होता,उन्हें ईंट ईंट जोड़ने का एहसास ही नही होता,वह तो नया अनुभव लेना चाहते हैं, ईंट ईंट तोड़ने का अनुभव । बनाने वालों के सारे हौंसले मर चुकते हैं अब सिर्फ फिक्रमन्द लोग लेटे लेटे उसे बूढ़ा होने देते हैं।वोह लोग,जिन्हें निर्माण का न और छोटी ई की मात्रा भी नही पता।वोह घर की मोटी मोटी दीवारों पर, कव्वे के गू के साथ आए बीज से उगे, पकड़िया का पेड़ की तरह होते हैं।

जो ऊपर से ही धीरे धीरे मज़बूत होकर,चौड़ी चौड़ी दीवारों पर फैलता जाता है और एक रोज़ महलों की दीवार को भी ढहा देते हैं।इस तरह एक खूबसूरत घर खँडहर बनता है।हाँ खण्डहर।हमारे पुरखों का खण्डहर।उनके ख्वाबो का खण्डहर।उनकी उम्मीदों का खण्डहर।अब बस देखना यह है की यह शानदार घर,खण्डहर हमारे सामने होता है या हमारे बच्चों के।हमारी दीवार पर पकड़िया का पेड़ बड़ा हो चुका है। उसकी शाखाएँ घर के हर हिस्से की नीव तक पहुँच चुकी हैं । इसकी आहट हर कमरे से उठती बेचैन चीखों से मिल रही है । एक शानदार विरासत को ढहाने उस भयंकर पेड़ की शाखाएं ज़मीन में लगने लगी है....