Tuesday, May 31, 2016

शरारत

किसी पत्थर को लात मत मारो हो सकता है कोई अहिल्या अपने राम की ठोकर का इंतज़ार कर रही हो।यह ख्याल तब आया जब स्कूल से घर पैदल जाते हुए दिल को बहलाने के लिए हम एक पत्थर के टुकड़े को मारते मारते घर लाते थे।इत्तेफ़ाकन एक दिन ज़मीन में गड़े पत्थर पर ठोकर मार दी।पैर में ज़बरदस्त चोट पहुँची एकाएक अहिल्या वाला किस्सा याद आ गया की कैसे वह सैकड़ो वर्ष राम जी ठोकर की बाट जोहती पत्थर बनी रही।पत्थर में अहिल्या का मायूस मासूम चेहरा दिखने लगा।लगा जैसे यह पैर पत्थर पर नही किसी श्रापित महिला पर पड़ गया हो और बदले में उसने उस मगरूर पैर को उसकी औक़ात दिखा दी हो।अंगूठे से बहते खून ने बता दिया की राम कितने महान थे और हम कितने बेईमान।दिल तबसे हर पत्थर के लिए नरम हो गया।सोचने लगा,यह तो अहिल्या जैसी महान औरत के किस्से थे जो बाहर आ गए।उस दौर में और भी औरतों को हो सकता है ऐसे अभिशाप दिए गए हों।हो सकता है किसी के पति ने ज़्यादा सख्त शॉप दिया हो की यह आज भी पत्थर हों।बेचारी आज भी पत्थर बनी हुई हैं।ख़ामोशी से किसी युग पुरुष की ठोकर की बाँट जोह रही हैं।बेचारी।खैर दिल है वह कहीं भी जा सकता है।दिमाग है कुछ भी सोच सकता है।बस मुझे अहिल्या को सोचकर तरस आया और इन पत्थरों को ठोकर मारना बन्द।वैसे यह अपने आप  को बहलाने के लिए किस्सा दिमाग ने खुद गढ़ डाला वरना ठोकर खाने से चोट बहुत तगड़ी आई थी।खून निकलने लगा था।मगर अपनी हर बुरी हरकत को तो सद्कार्य में बदलना था तो दिल ने पत्थर में अहिल्या देख ली।कमबख्त दिल कितना फरेबी होता है।इस दिल में इतनी स्क्रिप्ट पैदा हो जाती हैं की यह गोश्त का लोथड़ा पूरी एक नावेल बन जाता है।किसी दिन इस दिल को थियेटर के स्टेज पर लेजाकर पटक देंगे,सारी ड्रामेबाज़ी वही दिन बाहर आ जाएगी।©

क़तरा क़तरा अवध

कुशाग्र ने पापा को देखते ही कहा।छुट्टियाँ हो गई मुझे बाहर घूमने जाना है।मनजीत ने सलीक़े से समझाया बेटा कहीं बाहर जाने से अच्छा है पहले अपने शहर को जान लो।लखनऊ खुद में अथाह खूबसूरती समेटे है, पहले वह देख लो तब बाहर घूमने जाना।चलो आज शाम में तुम्हे कैसरबाग के महलों में ले चलते हैं।अच्छा पापा,लेकिन वह तो अक्सर देखते रहते हैं।पहले तुम उन्हें बाहर से देखते थे आज हम तुम्हें अंदर से दिखाएंगे,जिससे तुम उस दौर की रूह महसूस कर सको।शाम हुई दोनों बाप बेटे इंदिरानगर से सीधे कैसरबाग पहुँच गए।रास्ते भर तरह तरह की बातें और कुशाग्र के सवाल।आई टी कालेज,हनुमान मन्दिर होते हुए वह सीधे सआदत खान के मकबरे पर पहुँचे।पार्क में बैठकर मनजीत ने कुशाग्र को इमारतों के इतिहास के बारे में बताने लगे।कुशाग्र को भी दिलचस्पी आ रही थी की तभी उसने एक पुरानी इमारत की मरम्मत देख पूछा पापा यह कौन सा महल है और इसको क्यों तोड़ रहे हैं।बेटा इसे तोड़ नही रहे हैं बना रहे हैं, सही कर रहे हैं।अच्छा क्यों सही कर रहे हैं और कौन कर रहा है।यह जो तुम्हे खण्डहर नुमा महल दिख रहे हैं यह कभी ठहाकों से आबाद रहते थे।नवाब यही पर अपनी सल्तनत को ऊंचाई पर ले जा रहे थे।शुक्र करो की मौजूदा सरकार ने कैसरबाग हैरिटेज ज़ोन बना दिया।करोड़ो रूपये हमारी विरासत को बचाने के लिए खर्च किये जा रहे हैं।यह इमारते अब सम्भल जाएंगी साथ ही नवाबो के किस्से भी सम्भल जाएँगे।अगर इनकी मरम्मत न की जाती तो तुम्हारे बड़े होने तक इनका वजूद ही खत्म हो जाता।अच्छा पापा कुछ तो बताइये नवाब के बारे में।चलो ठीक है मैं तुम्हे नवाब नसीरुद्दीन की जवानी का एक किस्सा सुनाता हूँ।
"हमेशा की तरह बादशाह नसीरुद्दीन अपने बेगम मलिका ए ज़मानी के महल दोपहर में दाखिल हुए।बेगम ने ख़ूब प्यार उंडेलते हुए कहा,नवाब साहब कहिये आपकी क्या ख़िदमत की जाए।नवाब नसीरुद्दीन ने प्यास का इशारा किया।एक इशारे पर एक बाँदी थाल में गिलास लेकर हाज़िर हुई।नवाब ने बड़ी गौर से उस बाँदी को देखा और कहा"आज से पहले तो तुम्हे नही देखा,नई हो क्या"जवाब में बाँदी ने हाँ में सर हिला दिया।नवाब साहब को तफ़रीह सूझी और गिलास का बचा पानी बाँदी पर छिड़क दिया।बदले में बाँदी ने थाल में गिरा पानी नवाब साहब पर उलट दिया।नवाब गुस्से में लाल पीले हो गए और बोले एक बाँदी की यह हिम्मत की नवाब से गुस्ताखी।तभी बाँदी बोली"जब दो हम उम्र लोग तफ़रीह करते हैं तो लिहाज़ नही किया जाता और ना ही बुरा माना जाता है।"नवाब को जवाब भा जाता है।खैर बाँदी को उसकी गुस्ताखी की सज़ा मलिका ए ज़मानी देती हैं और उसे महल से निकाल दिया जाता है।अब जब भी नवाब आते तो बाँदी का ज़िक्र छेड़ देते,यह बात मलिका को नागवार गुज़रती।आखिरकार अपने वज़ीर की मदद से नवाब साहब बाँदी को बुलवा लेते हैं।निकाह करके अपनी बेगम बना लेते हैं बाँदी को नाम दिया जाता है कुदसिया बेगम।कुदसिया बेगम बड़े नेक दिल की थी जल्द ही नवाब साहब के दिल ओ ज़हन पर कब्ज़ा कर गई।गोमती किनारे खड़े बेगम कुदसिया चाँद निहार रही थीं।पूर्णिमा का चाँद पानी से टकराकर बेगम कुदसिया पर बिखर रहा था।इस ज़बरदस्त खूबसूरती पर न्योछावर होकर नवाब उस रात ही कुदसिया बेगम को मलिका ए ज़मानी बना देते हैं और उन्हें ख़िताब देते हैं मलिका आफाक कुदसिया सुल्तान मरियम बानो बेगम साहिबा मलिका ए ज़मानी।नई बेगम का जलवा अवध में बोलने लगा मगर यह ज़्यादा दिन नही चला।नवाब साहब ने बेगम कुदसिया महल के लिए कोठी दर्शन विलास बनाई।उसी में कुदसिया महल को नवाब साहब की नाराज़गी का पता चला।किसी ने नवाब साहब के कान भर दिए थे की कुदसिया बेगम किसी और मर्द को चाहती हैं।नवाब साहब गुस्से में उनसे दूर चले गए।कुदसिया बेगम ने मन मसोसकर ज़हर खा लिया।जब नवाब साहब को पता चला तो वह नंगे पैर भागे हुए अपनी महबूब बेगम के पास आए और उनका सर अपने पैरो पर रख रोने लगे।तभी भीगी आँखों और लरज़ती ज़बान से कुदसिया महल ने नवाब नसीरुद्दीन से कहा"मेरे हमसफ़र,मेरे मालिक,मेरी आपसे पहली शर्त थी की आप मुझे शक की नज़र से नही देखेंगे।जिसे हज़रत ने तोड़ दिया।मैंने निकाह की रात अर्ज़ किया था की आपकी नज़र बदलते ही मेरी हस्ती मिट जाएगी।जब मालूम हुआ हुज़ूर की नज़र फिर गई तो मैंने अपना क़ौल निभाया।आपकी कुदसिया सिर्फ आपकी थी।यह कोठी दर्शन विलास हमारी पाकीज़गी की गवाह रहेगी।इसके हर दर ओ दीवार हमारी मोहब्बत के गवाह होंगे।"कहते कहते कुदसिया महल खत्म हो गई।कुछ अरसे बाद ही नवाब नसीरुद्दीन को भी ज़हर दे दिया गया।दोनों आज भी इरादत नगर की कर्बला में साथ साथ दफ़न हैं।
कुशाग्र का दिल बैठ सा रहा था।बोला पापा इन इमारतों का संवरना वाक़ई ज़रूरी है।अगर आज यह न होती तो हम एक खूबसूरत दास्तान को न सुन पाते।अच्छा हुआ सरकार हैरिटेज की तरफ ध्यान दे रही है।इन इमारतों पर जो नई रौशनी बिखर रही है वह अवध,कैसरबाग और नवाबो की दस्तानो को हमेशा ज़िंदा रखेंगे।आप पापा सही कहते हैं हर इमारत अपनी कहानियो में ज़िंदा रहती है।अब से छुट्टियों भर रोज़ शाम आपके साथ इनको देखूंगा।महसूस करूँगा।थैंक यू पापा।

Monday, May 30, 2016

संघर्ष पथ

वह यूपी के मामूली से गाँव में,बेहद मामूली परिवार में पैदा हुई।बाप बेटे चाहते थे,एक के बाद एक तीन लड़कियो के बाद छ लड़के पैदा हुए जिनमे वह सभी लड़को से बड़ी थी।दिल्ली के इन्द्रपुरी की झुग्गी झोपड़ी में नौ भाई बहनों मे पली बढ़ी।दिमागी सीलन,पिछड़ेपन,सामाजी तौर पर अछूत दँश को सहते हुए लड़की होना किसी गुनाह से कम नहीं था।वही लड़की को एक धुन थी की आईएएस बनकर अपने समाज को आगे बढ़ाना है।वह सब दूर करना है जो उसने झेला है।वह आईएएस नही बन सकी।बीएड के बाद साधारण टीचर रहकर लॉ में एडमिशन ले लिया ताकि अपनों के लिए लड़ पाए।वह तमाम मुश्किलो से लड़ी।हर एक गलत को जवाब दिया।यहां तक उस दौर के वरिष्ठं नेता राजनारायण को उनकी ही सभा में उसने अपने तीखे सवालों से खामोश कर दिया।इतना सख्त विरोध किया उस मामूली सी लड़की ने की राजनारायण वापिस जाओ के नारे से हाल गूँज गया।उसी निर्माण काल में एक गुरु ने उसे गुन सिखाया।वह IAS बनकर सिस्टम के पेंच की जगह पूरा सिस्टम ही बन गई।डाकघर में नौकरी करने वाले जिस बाप ने नौ बच्चों में लड़को के मुकाबले लड़कियो को नकारा, उसकी इस बेटी ने इतिहास रच दिया।संसद की चौखट पर जब उसके पसीने की बदबू से एलीट महिलाओ ने नाक पर रुमाल धर कर उसे नीचा दिखाया।तब उसने सियासत और समझ की वह खुशबू बिखेरी की एलीट क्लास ध्वस्त हो गया।उसका उगना और छा जाना हमारे लोकतन्त्र का जादू ही था।मैं बात कर रहा हूँ मायावती की।उनके संघर्ष की।कभी ना टूटने वाली जीवटता की।सीखे वह लोग जिन्हें समाज को आगे बढ़ाना है।दो चोटी धरकर मायावती ने किसी ज़माने में पैदल और साईकिल से चलकर अगड़ो से जूझकर मिसाल रखी थी।कमज़ोर के गले की आवाज़ बनकर वह मुल्क़ में गूँजी थी।आज फ़ख्र से हाथ हिलाती माया के पीछे वह संघर्ष है जो ज़्यादा बाहर नही आया।माया का बचपन वह था जिसका उसने कभी चीख चीख कर ढिंढोरा नही पीटा।मेहनत से देश के सबसे बड़े स्टेट की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठकर दिखा दिया।मैं राजनीती की जगह लीडरशिप पर बात कर रहा हूँ।लीडरशिप पैदा करना एक बड़ी कला है।बतौर लीडर मायावती के संघर्ष और विकास की दास्तान इतिहास के सुनहरे वरखों में दर्ज हो चुकी है।आगे बढ़िए।इनसे संघर्ष सीखिये।संगठन की कला सीखिये,कभी कमज़ोर होने का एहसास मत पालिए।तमाम कमियों को दरकिनार कर अच्छी चीज़ों को उतारिये।इनकी गलतियों से बचिए और खूबसूरत लीडरशिप दुनिया के सामने रखिये।©

Sunday, May 29, 2016

वह हमसाये

घर के मुखिया की एक बड़ी कमज़ोरी है की वह जल्दी जल्दी अपने नौकर चाकर नही बदलते।उन्हें हद दर्जे लगाओ सा हो जाता है उनसे।दूधवाला जितना चाहे पानी मिलाए फिर भी उसे बदलना अच्छा नही लगता।अख़बार चाहे जितनी देर में लाए उससे शिकयत के सिवा कुछ नही।कामवाली चाहे जितने बर्तन तोड़े  मगर उसे बदलने को दिल नही करता।सफाईवाला चाहे हर चौथे दिन छुट्टी करे पर उसे बदलना ठीक नही लगता।यहाँ तक हम लोग सिलेंडर डिलीवर करने वाले से फ्रेंडली होकर चाहते हैं वही आए सिलेंडर देने।इलेक्ट्रीशियन,प्लम्बर,पेंटर,सब्जीवाला,नाई हम सब अपने पुराने वाले ही इस्तेमाल करते हैं जो हमारे लिए किसी रिश्तेदार की तरह हो जाते हैं।बावर्ची तो ताउम्र साथ रहता है।ज़ायका चाहे अच्छा हो या बुरा वह एक नमक के साथ हम सबके लिए अपनी उम्र काट देता है।पता नही वह कौन सी साइकोलॉजी है जो नौकरों के साथ खड़ी हो जाती है।अक्सर घरों में शिकायते होती हैं नौकर चाकर को लेकर,उनको बदलने के फरमान भी होते हैं फिर भी मुखिया इन्हें अनसुना कर तमाम कमी पेशियों के बावजूद अपने पुराने कामवालो को नही बदलते।बदलना भी नही चाहिए।एक आत्मिक रिश्ता सा हो जाता है उनसे।हमने तो बचपन से ही एक धोबी को देखा,वह प्रेस करते में जितने चाहे कपड़े जलाए उसे बदलने की कभी कोशिश नही की गई।हमारे बावर्ची तो हम सबको इस हद तक डॉट सकते थे जैसे बाबाजान हो।जो घर का ज़िम्मेदार होता है वह इनकी वफ़ादारी पर घर के किसी भी सदस्य के मुकाबले इन पर ज़्यादा भरोसा करता है।वैसे हो सके तो अपने पुराने लोगों पर एतबार कीजिये।उनकी गलतियों को थोड़ा नज़रअंदाज़ करिये।यह एक पूरा ज़माना होते हैं जो आपके साथ बड़े हो रहे होते हैं।आपको देखकर अपने बच्चों के बढ़ने  के ख्वाब संजो रहे होते हैं।यह अपनी कालोनियो में आपका ही रूप धर कर अपनी ज़िन्दगी को संवार रहे होते हैं।इसीलिए कह रहे हैं इस खामोश सफ़र को मत रोकिये।गलतियों,कमियों के बावजूद एक ज़िम्मेदार की तरह इन्हें माफ़ कर अपने साथ रखिये।एक दिन इन्ही में से कोई पन्ना धाय बनकर आपके परिवार को शायद रौशनी दे जाए।अपने साथ इन्हें भी बूढ़ा होते देखिये।बुढ़ापे में यह ही आपके दिल के साथी होंगे।महसूस कीजिये बस।©

Saturday, May 28, 2016

वास्तविक हिंदुत्व

हिंदुत्व क्या है।एक दृष्टि है।संसार को देखने की दृष्टि।जीने की दृष्टि।मैं सोचता हूँ वह कौन सा धर्म है जिसने सबको जगह दी।जिसने इस्लाम में भी अपना भाई खोजा और ईसाई में भी अपने को देखा।मुझे यह जो हथियारों का प्रशिक्षण लेने वालो की तस्वीरें दिखती हैं तो सोचता हूँ की क्या यह हिंदुत्व है।आग उगलती ज़बानो को देखता हूँ तब सोचता हूँ की क्या यह हिंदुत्व है।तब दिल कहता है हरगिज़ नही।हिंदुत्व तो कोमल दिल में फूटा बरगद का कोपल है।जो मोहब्बत और अपने पन से एक दिन बरगद बन कर छाँव देगा।दिल कहता है जब ISIS इस्लाम नही,हिरोशिमा में ईसाईयत नही तो दोस्त इन ज़हर से भरे लोगो में भी हिंदुत्व नहीं।हिंदुत्व कृष्ण की मोहब्बत में है।राम की मर्यादा में है।रामानुजन में है, जगदीश बोस में है, विनोबा और टैगोर में है।मेरा हिंदुत्व का दर्शन गाँधी और विवेकानंद में है।दयानन्द,चार्वाक और पतंजलि में है हिंदुत्व।हिंदुत्व वासुधैव कुटुंबकम में है।मैंने करीब से देखा है गुजरात दंगो के वक़्त शर्मिंदा अपने हिन्दू दोस्तों को।महीनो उनकी नम आँखों को देखा है।मोमबत्ती लिए गाँधी प्रतिमा पर खड़े देखा है।राहत का सामान जल्दी जल्दी भेजते देखा है।मुझे याद है उन दिनों मैं तो खाना खा लेता था मगर मेरा अज़ीज़ ब्राह्मण दोस्त हफ़्तों बिना खाए रहा,मेरे लिए वह हिंदुत्व है।मेरे वह दोस्त हिंदुत्व के असली सिपाही हैं जो दिल मोम सा नरम और मोहब्बत से लबरेज़ रखते हैं।वह दोस्त जिनसे मैं हिंदुत्व को सीख पाया,महसूस कर पाया वह है मेरे लिए हिंदुत्व के ध्वजवाहक।वही सच्चे हिन्दू हैं, वही हिंदुत्व की रौशनी है।मेरे लिए आतंकी,आक्रांता,विध्वंसक,दंगाई कभी हिन्दू नही हो सकता।उनके मुँह से जब हिंदुत्व सुनता हूँ तो हँसी आ जाती है इनके मामूली दिमाग पर।जब वह ज़हर से बुझी नफ़रत की बाते करते दिखते हैं तो इनका और आतंकियों का एक ही धर्म दीखता है।अगर यह वास्तविक हिंदुत्व को पहचान पाते तो आज इनकी ज़बानें नरम होती।दिल हर एक की इज़्ज़त करता।दुनिया इनकी खुशबू से मतवाली होकर सलाम करती।खैर मैं अपने हिंदुत्व में खुश हूँ।मैं इसकी व्यापक दृष्टि से खुश हूँ।कभी मौका लगे तो संकीर्णता छोड़कर इस मोहब्बत से लबरेज़ हिंदुत्व को महसूस कीजिये।दूसरों की ज़बानों से सुना हिंदुत्व उतना ही सतही है जितना दिल से महसूस किया हुआ सच्चा है।आइये उस हिंदुत्व को हवा पानी दें जो युगों से सबको गले लगाता रहा है।©

Friday, May 27, 2016

रूमी

किसी ने पूछा की क्या दरवेश या सूफ़ी कभी कभी कोई गुनाह भी कर सकते हैं।बिलकुल अगर वह भूख के बगैर एक लुकमा भी खाते हैं, तो ज़रूर कर सकते हैं।सूफ़ी के लिए बिना भूख खाना बड़ा गुनाह है।यह जवाब रूमी का था।वही जो अफगानिस्तान में बल्ख़ि, ईरान में मौलवी,तुर्की में मौलाना और हिंदुस्तान में रूमी कहलाए।मुहम्मद जलालुद्दीन रूमी।वही रूमी जिनके वालिद ने गुज़रे हुए दौर को कानून की सबसे एतबार वाली किताब किताबुल मआरिफ़ दिया था।कहते हैं रूमी की मसनविया इस किताब के बेअदब नक़ल थीं।बल्ख़,बगदाद,मक्का,दमिश्क में टहलते हुए रूमी ने अथाह इल्म हासिल किया।रूह में इल्म की इसकदर बेचैनी थी की कहीं सुकून नही था।आखिर में अनातोलिया के मरकज़ कोन्या में रूमी ने पड़ाव डाला।रूमी ने हर तरह के इल्म को सीखा, परखा फिर सिखाया।एक सुनार की हथौड़ी और पटड़े की आवाज़ ने रूमी को ऐसा मोहा की इस मामूली सी धुन पर भी रूमी बोल उठे
ज़रकोबी की दुकान से एक खज़ाना मिला नायाब,
अजब सूरत अजब माएगी,क्या बात।क्या बात।।
रूमी ने हर उस चीज़ को मसनवी में ढाला जिसे उन्होंने महसूस किया।सबसे पहली मसनवी की किताब भी रूमी के हाथों लिखी गई।उम्र ने अगर और वफ़ा किया होता तो रूमी ने ज़मीन से आसमान तक सब पर मसनवी लिख डाली होती।वो जो फ़क़ीर था वही उस दौर में इल्म का बादशाह था।मसनवी का सुल्तान था।यह रूमी का ही दिल था जिसने उस्ताद,दोस्त,शागिर्द सबको मोहब्बत से समेटा।हर एक के गुज़रने पर ज़िन्दगी का ज़ायका बदला।रूमी ने इल्म की वह चादर फैलाई जिसकी रौशनी अफगान से तुर्की तक एक हो गई।हिन्द की सरहद में भी रूमी का कलाम दाखिल हो गया।मोहब्बत के लिए सरहद छोटी पड़ गई और ज़माने ने रूमी को रुमानियत में ढाल उसके एहसास को जी लिया।थोड़ा सा वक़्त हो तो सूफ़िज़्म को पढ़ लीजिये।दिल में नरमी हो तो रूमी को अपना लीजिये।ज़माने को खूबसूरत बनाना हो तो सूफियाना हो जाइये।मैं जब रूमी को देखता हूँ।जी देखता हूँ तो शक में आ जाता हूँ की कोई कैसे इतना लिख पढ़ सकता है।कोशिश करता हूँ मगर रूमी की चौखट तक भी नही पहुँचता।इल्म के समन्दर का किनारा छूने की कोशिश ताउम्र करता रहूँगा।बस रूमी तुम यूँहीं मेरी नज़रों के सामने रहना।बस ऐसे ही मुस्कुराते रहना।
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Thursday, May 26, 2016

चचा सिरके में

एक थे बुढ़ऊ,अर्रे सॉरी बुढ़ऊ तो न ही कहें।हाँ ज़ईफ़ से एक थे।इतने ज़ईफ़ थे की लग रहा था मल्कुलमौत(यमराज) से उनकी उम्र की हिसाब किताब वाली फाइल गुम गई।यह मल्कुलमौत भी हद दर्जे की लापरवाह है।चचा किसी तरह मरने में नही आ रहे थे।एक आध बार लगा की यह मरेंगे तो हैं नही,हाँ बल्कि इनके पर निकल आएंगे और यह दूर हवा में उड़ जाएँगे।बकवास।पर के परपोते हो गए मगर वह न उड़े।ए के हंगल इनके सामने जवान थे जिन्हेंपूरी फ़िल्म इंडस्ट्री ने कभी जवान न देखा।एक दिन उनका ज़िक्र चला तो हमने कह दिया लगता है मियाँ सिरके में डाल दिए गए हैं।खत्म ही नही हो रहे।इतना कहना भर था की लानत मलामत का दौर शुरू हो गया।कहीं कोई मरने की बात करता है।अब कौन समाझाए मरना तो प्रकृति है, उन्हें तो मरना ही है, गम काहे का।हम सब मरेंगे तो क्या यह सोच कर रोने लग जाएँ।अरे मौत है कोई बवंडर थोड़े ही,जब आ जाएगी पैजामे की मोहरी चढ़ा कर निकल लीजियेगा।मौत को इतनी संजीदगी से लेते हैं जैसे ज़मीन के सारे मसले इन्हें ही सुलझाने हैं।अरे माँ बाप भाई बहन दोस्त और सभी को मरना है, जब मरे हल्का सा दुखिया लीजिये बस।जब मरने वाला आपको छोड़ गया तो आप भी छोड़िये ना।कुछ तो मौत की बात से इतना डरते हैं जैसे मल्कुलमौत उन्ही की ज़बान की तरफ ताक लगाए बैठी है।अरे तुम दिन रात बक्को, डरो मौत से वह जब आएगी तब आएगी अभी से काहे मिमिया रहे हो।वैसे भी टेंशन मत लें किसी के मरने के गम में कोई नही मरता।मरे हुए का मासूम सा चेहरा देखिये और हौले से मुस्कुराकर आगे बढ़िए।कितना खुश है जो निकल गया।देखो उन बुढ़ऊ अर्रे ज़ईफ़ चचा को मलकुल मौत पूछ भी नही रही।यमराज का सबसे बुरा प्रदर्शन यहीं हैं।हमे तो लगता है उनकी गुज़र चुकी बेगम कब्रिस्तान में सुकून से रहने की दुआ कर रही हैं।नेक थी इसी लिए चचा को कब्रिस्तान का टिकेट मिल नही रहा।हमे तो इतनी बेचैनी है की एक बार उन्हें मरता हुआ देख पाए।बहुत बार पान मंगवाया है भरी दोपहर में।लगता है वह सिरके में पड़े रहेंगे और हम ही सरक जाएँगे।©

Wednesday, May 25, 2016

आशिकी पंचम

भला कोई ट्यूटर से प्यार करता है।यूँ जो तुम इश्क़ का इज़हार कर रही हो मैं इसके लिए तैयार नही था।तुम समझती क्यों नहीं।घर वाले क्या कहेंगे पढ़ाने आए थे मैथ और जोड़ घटाओ करके निकल लिए।अर्रे अब टेसुए मत बहाओ।तुम्हे पता है तुम्हारे तीन भाई,अंगद के पाँव जैसी माँ और एक आँख से टिकटिकी बाँधे बाप के बीच कैसे मोहब्बत की जाती है।महीने में चार बार प्रोजेक्ट के बहाने साइबर कैफे तक तुम्हे किस रिस्क पर ले जाता हूँ।सोचो छः महीने के ट्यूशन में आजतक प्लेस अरेंज नही कर पाया।एक तो बाहर गए नही की पूरी फ़ीस एक मुस्कुराहट पर हलाल हो जाती है।कभी समझाओ घर वालो को की होने वाले दामाद की फ़ीस बढ़ा दें मगर नही तुम तो पाओ उतनी ही फ़ीस में रात भर पढ़वाओ।बिना किसी प्लेस के जुगाड़ के हिम्मत करके ज़रा से दूर क्या निकलें घर से तुम्हे भी मरी आने लगती है।सारी इज़्ज़त वही वक़्त खतरे में पड़ती है।तब तुम्हे क्या अमरेशपुरी दिखने लगता है मुझमें।मेरे लिए तो दोहरी मार हो तुम।एक तरफ गणित जैसा सब्जेक्ट और ऊपर से सामने तुम।सवाल क्या हल होंगे,एक घण्टा शराफत से कट जाए वही क्या कम है।दिमाग तो तुम्हारी आँखों में ही उलझा रहता है।एक दर्जन हिडेन कैमरे जैसी तुम्हारे घर वालों की आँखों में एक एक समीकरण चुन चुन के बिठाना पड़ता है।ज़रा से चूके की हो गया गुणा भाग।अच्छा डरो मत कुछ तो इंतेज़ाम करते हैं।तुम्हारे लिए सब मंज़ूर।हम कैलकुलस और ट्रिगोनोमेट्रि में उसका हल ढूंढते रहे वह अपने क्लास मेट के साथ स्टेटिक्स और डायनामिक्स सीखती रही।आई थी गणित सीखने मोहब्बत सीख कर निकल ली।कमबख्त सात आठ साल छोटी क्या थी,बिलकुल बच्ची बन गई।मुँह लटका के कह दिया।सर समझिये,आप हमसे बहुत बड़े हैं।यू आर रेस्पेक्टेड।।।।निकल लो अब कोर्स की बाकि दो किताबो को क्लासमेट वाले मजनू से पढ़ लेना। रेस्पेक्टेड घण्टा। ©

Tuesday, May 24, 2016

वल्लाह यह सियासत

राजनीती में बदला नही लिया जाता बल्कि गुरुर तोड़ा जाता है।शिकस्त दी जाती है।अगर बदला लिया जाता तो बहुत से नेता जेल में होते।बहुत से सूबे से बाहर जँगल में भागे भागे फिर रहे होते।अवाम को लगता है उनका सुपर हीरो जब आएगा तो चुन चुन के बदला लेगा।वह अपने नेता में धर्मेन्द्र के खानदान को देखता है।मिथुन को देखता है।मगर उसके नेता इस पर कान भी नही धरते।यहाँ तक सबसे अपरम्परागत राजनीती में माहिर मायावती ने भी मुलायम को गेस्ट हॉउस काण्ड के लिए सज़ा नही दी।बदला नही लिया,हाँ गुरुर खूब तोड़ा।बढ़िया लगता है देख कर की यह आग उगलती ज़बाने ,दिमाग का खूब इस्तेमाल जानती है।आपस में ज़बरदस्त कूटनीति के बावजूद बदला नीति से सभी ने किनारा किया हुआ है।सबसे ताज़ा उदाहरण केजरीवाल हैं जिन्होंने शीला दीक्षित से किनारा कर इस परम्परा को आगे बढ़ाया है।ममता,जयललिता नितीश,लालू सबने इस परम्परा को सींचा है।मोदी जी भी मैडम सोनिया ही करते रहे उससे ज़्यादा कुछ नही किया।खैर यह अच्छा भी है।वैसे भी यह सबके सब मेरे लिए ज़बरदस्त इंटरटेनमेंट हैं।सबको राजनीती के मंच में देखना किसी थियेटर से कम नही है।सबको देख कर अभिनय को समझना और नम्बर देना आसान लगता है।भाँति भाँति के नेता,अलग अलग तरह के हुनर से मोहित करती है।वैसे भी हमे बदला लेने वाले पसन्द नही।हमारे देश की राजनीती आज भी गाँधी के एक आदर्श को थामे ही है,वह है बदला न लेना।मगर दूसरा रास्ता हमारी सियासत का मेड इन इण्डिया हथियार है, गुरुर तोड़ना।वैसे भी रही बात गुरुर की तो गुरुर कभी सगा नही हो सकता।इससे बेवफ़ा कोई नही।मौके पर इसका टूटना ही इसका जीवन है।मुझे भारतीय राजनीती का यह अनूठापन बहुत भाता है।सियासत से सीखिये ,उत्तेजना आपको जलाएगी और सियासत आपको जिलाएगी। ©