Wednesday, December 23, 2020

राज़

राज़ एक ऐसी चीज़ है, जो मुँह से निकलने के बाद राज़ नही रह जाता है । 

इसे ऐसे समझें कि अगर कोई बहुत राज़ की बात आपके सीने में दफ़न है, और आपने उसे किसी अपने बहुत राज़दार को बताया तो वह राज़ नही रह जाएगा ।

यूँ समझिये की आपने अपना एक राज़ अपनी सबसे करीबी और राज़दार बीवी को बताया । आपको लगता है कि वह आपकी राज़दार है, उसका भी तो कोई राज़दार होगा,उसने वह बात अपनी माँ को बताई । उसकी माँ ने यह राज़ अपने राज़दार पति को बताई । पति ने यह राज़ अपने राज़दार जिगरी दोस्त को बताई । जिगरी दोस्त ने यह राज़ अपनी इकलौती बेटी को बताया । उस बेटी ने अपने राज़दार ब्वॉयफ्रेंड को बताया । ब्वॉयफ्रेंड ने यह राज़ अपनी दूसरी गर्लफ्रेंड को बताया । उस लड़की ने अपनी माँ को बताया । उसकी माँ ने कामवाली को बताया और कामवाली ने अपने राज़दारों को बताया ।

इस तरह एक राज़ की बात पूरी दुनिया घूम आई । आपको क्या लगता है, इनमें से कौन गलत है, कोई भी नही,सिवाए पहले आदमी के कोई भी गलती पर नही है ।

हम सबको यह मानना चाहिए की जो हमारा राज़दार है, उसका भी कोई उतना ही राज़दार होगा । आप बिलकुल बराबर से कोई विश्वास नही कर सकते कि आप का विश्वास जिसपर 70 प्रतिशत हो उसका आपपर भी 70 प्रतिशत ही हो । यह कम ज़्यादा हो सकता है मगर कभी बराबर नही हो सकता ।

इसलिए कहा जाता है, मुँह से निकली बात राज़ नही रहती । मेरी भी बात गिरह बाँध ले जो बात दफ़न रखना चाहते हैं, उसे सीने में दफ़न कर लें,कोई भी हो मगर दफ़न चीज़ ज़िन्दा न करें,दफ़न चीज़ ज़िन्दा होगी तो तबाही ही लाएगी और अपने राज़दार ख़ुद बनिये...
#हैशटैग #hashtag

Wednesday, December 9, 2020

मंगलेश डबराल

गुज़री रात एक कवि हमारे बीच से उठकर चले गए और चली गई वह व्यवस्था जो रोज़ बिगड़ी हुई व्यवस्था को टोकना जानती थी । गुज़री रात एक लेखक हमारे बीच से चले गए और चले गए वह ख्वाब जो बेचैन रातों का सहारा थे । गुज़री रात एक विचारक हमारे बीच से उठकर चले गए और चली गई वह चिंता की लकीरें भी जो भविष्य की बर्बादी के लक्षण सामने रख दिया करती थीं ।

गुज़री रात हमसे रूठकर एक एक्टिविस्ट चले गए और चले गए वह कदम जो हर नाइंसाफी पर खुद बखुद बढ़ आया करते थे । गुज़री रात हमारी आवाज़ चली गई और चली गई हमारी वह खूबी जिसपर कमज़ोर को भरोसा था कि वह उसके दर्द को आवाज़ देगा । क्या वाकई गुज़री रात एक कवि,एक लेखक,एक विचारक,एक एक्टिविस्ट,एक मुखर वक्ता चला गया या गुज़री रात एक व्यवस्था गुज़र गई,जिसको हम फलता फूलता देखना चाहते थे ।

मंगलेश डबराल जी का जाना हम सबके लिए एक ऐसा दर्द है, जिसको आज नही तो कल मिलना था मगर हम कभी भी यह दर्द सहने को तैयार नही थे । हमारे सरों से धीरे धीरे वह हाथ हट रहे हैं, जो अचानक हमारी अल्हड़ता,चंचलता,मासूमियत को पीछे छोड़कर ज़िम्मेदारी का एहसास करा रहे हैं । हम मंगलेश जी के साथ के कितने किस्से सुना सकते हैं मगर सच पूछिए काम की तो उनकी नसीहतें हैं, जो हमें इंसान से संवेदनशील इंसान बनाने की प्रक्रिया है । 

पलट कर देखिएगा कितने लिखने वाले हैं, जिनके आँख बंद करते ही सन्नाटा होते दिखाई दे । लेखक जिसे पढ़ने वाले कम बचे हैं, उस दौर में लेखक का गुज़रना लोगों को अपने घरों के किसी बुज़ुर्ग का जाना महसूस हो तो यह उस लेखक की वह कमाई है, जो हर एक कमाना चाहेगा । 

मंगलेश जी की तमाम यादों और किस्सों संग बस इतना सा वादा पूरा हो जाए,तो उनके स्पर्श का मान रह जाए कि अन्याय और चुप नही रहेंगे....क्या कहें जब घर खाली हो रहा हो,रोएँ या घर को बचाने के लिए खड़े हों,मंगलेश जी रोने की जगह खड़े होने की नसीहत हमें दे चुके हैं, वही सही है, दुःख में टूटेंगे नही बल्कि दुःखों को दूर करेंगे सर....
#hashtag #हैशटैग

रुक़य्या सखावत हुसैन

ये महिला हैं रुक़य्या बेगम।दुर्भाग्य से अब पूछियेगा की कौन रुक़य्या। रुक़य्या सखावत हुसैन।बंगाल की रूह रुक़य्या।अबरोध बासिनी लिखने वाली रुक़य्या।जो हमेशा मज़हब की शाल ओढ़कर,मज़हब के आडम्बर,ज़ंज़ीर से उलझती हुई रास्ते बनाती रही।वोह रुक़य्या जिसे सुनने वालों की तादात तब तक बढ़ती ही रही जब तक उसे भुला नही दिया गया।
आजही के दिन 1880 को उन्होंने दुनिया में पहली साँस ली थी और आजकी ही सुबह 1932 में रुक़य्या बेगम ने अपनी आखरी साँस भी ली थी।मैं जब तुम्हे स्त्री विमर्श पर बहस करते देखता हूँ तो खुश होता हूँ की चलो तुम उनकी आवाज़ तो बन रहे हो।मगर दोस्त थोड़ी देर बाद तुम्हे ख़ाली पाता हूँ।जानते हो क्यों।क्योंकि तुमने खुद को कभी खाद पानी दिया ही नही।तुम्हे उन औरतों को पढ़ना होगा।

उठो और कम से कम आज के दिन रुक़य्या सखावत हुसैन को पढ़ो उनकी अबरोध बासिनी को पढ़ो।मोतीचूर,पदमार्ग और सुल्ताना के ख्वाब को पढ़ो,देखो दिमाग की तहे खोलती यह कैसे उस दौर में ज़मीन पर टिकी।जब न मिले तो उनसे पूछो जिन्होंने इन्हें पढ़ा है।तब डट कर कुरीतियों,आडम्बरो से मुकाबला करो।हर लड़ाई लड़ने से पहले उस लड़ाई को लड़े जाने के पुराने तरीकों को मालूम करना ही अक्लमंदी है।उन महिलाओं को पढ़िए,खोजिए जिन्होंने सदियों पहले दहलीज़ से निकलकर ज़माने की तरक्की के दरवाज़े खोल दिए थे। रुक़य्या बेगम को नमन।

Wednesday, December 2, 2020

इख़्वानुसफा

बेहतरीन क़ाबिल लोगो की जमात ने 900 ईसवी में इख़्वानुस्सफ़ा नाम का ग्रुप बनाया। इसके माइने थे पवित्र बिरदरी। अरब अपने इल्म के सातवें आसमान पर थे। वह रश्क भी कर सकते थे क्योकि जब यूरोप अरस्तू को खो चुका था तब अरबी ज़बान में सिसली में वह ज़िंदा थे। अरब के मामूली से मदरसों में अरस्तू और अफ़लातून पढ़े जा रहे थे,क्या ही दौर रहा होगा वह।

इख़्वानुस्सफ़ा ने एक एनसाइक्लोपीडिया तैयार की और उसमें सब कुछ उतार डाला । यहाँ तक एक बेहतर इंसान की खूबियों पर,कमियों पर लंबे लम्बे तज़किरे किये गए । एक दूसरे को समझा गया फिर जाकर उन्होंने बेहतरीन इंसान की भोगैलिक खूबियों को परखकर कहा,

 "एक बेहतरीन इन्सान वह है जो ऊचे दिमाग का इरानी मूल का हो,अरब आस्था का हो,हनफ़ी हो,शिष्टाचार में ईराकी हो,परम्परा में यहूदी,सदाचार में ईसाई,समर्पण में सीरियाई,ज्ञान में यूनानी,द्रष्टि में भारतीय और ज़िंदगी जीने में सूफ़ी।।।।

हम आज इसे माने या नकारे,हमारी मर्ज़ी मगर एक बात तो हमेशा सच रहेगी,सबसे बेहतरीन इंसान वह जिसमें तमाम तरह की खूबियां हों,जिसमे तमाम धर्मों के रंग भरे हुए हों,जिसमे तमाम भोगौलिक विशेषताओं का जमावड़ा हो,जिसकी ज़ुबान हर तरह के जायके को इज़्ज़त देना जानती हो,जिसका दिमाग संकीर्णता से ऊपर उठकर हर विचार को बराबर में बैठाकर चलना सिखाता हो,जिससे इंसानियत को ख़तरा न हो,जिसके खड़े होने से लोग जुड़ जाएँ नाकि बंट जाए ।

इख़्वानुस्सफा और सूफ़ीज़्म पर पहले भी कहते रहे हैं, समझिये इसे न कि इसको सुनकर झूमिये । दिल को बड़ा कीजिये जिसमें अलहदा अलहदा रँग अपनी खूबसूरती बिखेर सकें,कोशिश कीजिये अपनी ज़मीन के सबसे बेहतरीन इंसान बनिये,मूल को हम नही मानते मगर कर्म को मानते हैं, कर्म ही आपके मूल हैं, प्रेम को कर्म बनाइये,मूल आपका श्रेष्ठ होगा,नफरत को कर्म बनाएंगे,तो बदनाम मूल ही होगा...
#hashtag  #हैशटैग