Thursday, January 28, 2021

अच्छे दिन

एक बार एक नवाब अपने वज़ीरों के साथ नदी पार कर रहे थे । नदी में भयँकर भूचाल आया हुआ था । पानी कभी ऊपर होता, कभी नीचे,नाव हिलती डुलती रहती । नाव में नवाब का एक ग़ुलाम भी था । 

नाव के सभी सवार सतर्क तो थे मगर अपने कामों में भी लगे थे । नदी की बेचैनी तो दिख रही थी मगर नवाब साहब भी शतरंज में लगे हुए थे । मगर नदी के विकराल रूप से डरकर गुलाम बार बार चीख रहा था,रो रहा था,परेशान हो रहा था,जिससे सबके कामों में व्यधान हो रहा था ।

जब गुलाम के फैनहे पन की अति हो गई,तब वज़ीर नवाब से बोला,हुज़ूर कहिए तो इसे चुप कराएं, नवाब ने पंकज त्रिपाठी की तरह अपनी भौं और पलको से इशारा कर दिया । वज़ीर ने पलक झपकते ही गुलाम को नदी में फेंक दिया ।

आठ दस गोते लगाने के बाद ग़ुलाम को बालों से खींचकर वापिस नाव पर ले आए,अब वह नाव के एक किनारे चुपचाप बैठा था । शांत । सयंम और ठहरा हुआ,नवाब को हैरत हुई,तो फिर सवालिया भौं उचकाई...

वज़ीर बोला, हुज़ूर असल में इसने नदी के बुरे रूप को महसूस ही नही किया था,यह डूबना जानता ही नही था,तभी जब नाव में सुक़ून से बैठा था,तो उसे वह ही बुरा वक्त लग रहा था । जब इसे असली बुरे दिन का एहसास हो गया,तो नाव पर बैठे रहने की अहमियत इसे समझ आई ।अक्सर जो अच्छे वक़्त में रोया करते हैं, उन्हें बुरे वक्त का मज़ा ही नही पता होता है, हुज़ूर ।

यह कहानी आज भी सही है, मनमोहन सिंह के वक़्त रोने चिल्लाने वाले भी विकराल नदी में फेंक दिए गए हैं । जहां उनके आँसू पर लोग हंसते हैं, तक़लीफ़ पर भरे पेट से मज़ाक उड़ाते हैं, बस अफसोस यह है कि इनको वापिस नाव पर लाने वाला वज़ीर नही है, वज़ीर है, मगर यह आज भी उसके हाथ पर भरोसा नही कर रहे, उसे पकड़ कर बदतरीन वक़्त से निकलने की कोशिश नही कर रहे....अभी तो हर एक कि बारी आनी है, नफ़रत से खड़ी इमारतें सिर्फ अशांति ही ला सकती हैं, अक्लमंदी इसी में है कि वापिस नाव में बैठ जाओ,उससे पहले की डूबने की नौबत आए...
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Monday, January 25, 2021

26 जनवरी

आज का दिन तो दुनिया देख रही है, की क्या होता है, गण और क्या होता है तंत्र और क्या होता है गणतंत्र । सरकार की ज़िद ने दुनिया के बड़े लोकतंत्र के उन रूप को भी आज बाहर कर दिया जो धुँधला गए थे । आज किसान अपनी परेड के साथ यह एहसास दिलाने में कामयाब होंगे कि सच्चा लोकतंत्र अपने अधिकारों के लिए जागरूक जनता से ही फलता फूलता है । जनता को गणतंत्र की महत्ता और अपनी आज़ाद सांस के लिए जूझने का जज़्बा सिखाने वाले हमारे पूर्वज आज बहुत खुश होंगे,क्योंकि उन्हें खुशी होगी कि अन्याय,अधर्म,हिंसा और अहंकार के विरुद्ध हमारे लोग सिर्फ अंग्रेजों से लड़ना ही नही जानते,बल्कि हर उससे जूझना जानते हैं,जो इनके पैरोकार हैं ।

ख़ैर आज कोई मामूली दिन नहीं है।यह वही दिन है जब एक देश नें  दुनिया के सामने कहा मै धर्म निरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र हूँ।मै अपने सभी नागरिकों को बराबर के अधिकार देता हूँ ।जो हमारी सामाजिक कड़ी में पिछड़ गए उन्हे अपने प्रयास से बराबर लाने की मेहनत करूँगा ।

यह वही दिन है जब दुनिया नें सबसे बड़े,सबसे महान संविधान के दर्शन किए । यह वही पवित्र किताब है जिसने किसान,चाय वाला,अखबार वाला सबको देश के शीर्ष पद पर पहुंचने की ताकत दी। जिसने हर सांस लेते इंसान को,जिसे अपने अच्छे बुरे को गढ़ने की समझ आ गई हो, उसे अपना मुस्तक़बिल चुनने के लिए वोट देने का अधिकार दिया ।

हमने दुनिया को दिखा दिया एक से एक योग्य को शीर्ष पर लाकर।यह कोई हंसी खेल नहीं था,जिन्हें आप सुबह शाम कोसते हैं उन्होने आपको बोलने की आज ही आज़ादी दी थी।वह मीडिया जो गुलामी में सिसकती थी आज ही आज़ाद हुई थी।यह वही दिन था जब दुनिया नें महात्मा के ख्वाबों के भारत के दर्शन किए थे। 

सबने मिलकर मोहब्बत से भारत नाम पर मोहर लगाई थी।हो सकता है आपको कोई हिटलर जैसा तानाशाह पसंद आता हो,हो सकता है आपका धर्म इसमें थोड़ा पिछड़ गया हो,हो सकता है आपकी विचारधारा इससे कुंठित हुई हो फिर भी हमारे गणतंत्र नें इससे बहुत ऊपर उठ कर सबको थामा है।इतना मान लीजिए सच्चा देशप्रेमी वही है जो अपने देश के मूल्यों,संविधान में सच्ची आस्था रखता हो ।

हमारे संविधान की आत्मा धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र है।इसके इतर सारी बातें बेइमानी हैं। हम सबको संविधान की प्रस्तावना को कंठस्त कर लेना चाहिए । अपने देश से मोहब्बत कीजिए,उसे आज़ाद करने में अपना सबकुछ लुटा देने वालों की बिना किसी पूर्वग्रह के इज़्ज़त कीजिये और किसी भी हाल में अपने संविधान को मानने के लिए तैयार रहिए।आज का दिन बेहद बड़ा है,उसकी अहमियत समझिए ।पार्टी,धर्म ,संगठन ,विचारधारा से ऊपर उठ कर आप सबको महान गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएँ ।आइये मोहब्बत के साथ मिलकर अपने महान देश को खुशहाली तरक्की की तरफ ले जाएँ ।
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Friday, January 22, 2021

सुभाष बाबू

लोग मर रहे थे।पूरा शहर हैजा की चपेट में था।कहीं बच्चे की लाश पर माँ तड़प रही थी तो कहीं औरते सुहाग की चूड़िया तोड़ रही थीं।कहीं बीवी को खोने के ग़म में कोई आदमी छुपकर फफक कर रो रहा था।शहर का मशहूर बदमाश हैदर खान का भी परिवार हैज़ा की गिरफ्त में था।हैदर खान खूँखार था मगर हैज़ा के आगे एक न चली।सबका ख़ून एक झटके में बहा देने वाला अपने परिवार को हैज़ा के सामने बेबस देख रहा था।

तभी नौजवानो का एक दल आता है।जिसका नेतृत्व एक खूबसूरत नौजवान कर रहा है।वोह हैदर खान के घर में फैली गन्दगी को साफ़ करने लगते हैं।यह दल पूरे शहर में सफ़ाई अभियान चलाकर हैज़ा से निपट रहे थे।हैदर खान दरी पर पड़ा पड़ा लड़को को सफ़ाई करते हुए देखता है।जब सफ़ाई हो जाती है तो लड़को से वोह पूछता है तुम हमें जानते हो।मैं एक खूँखार बदमाश हूँ।मेरी चौखट पर डर के मारे लोग नही आते।मुझसे कोई मिलना पसन्द नही करता।

तब दल का नौजवान लीडर कहता है ए हैदर खान हमें पता है तुम क्या हो।तुम इतनी ताक़त के बावजूद हैज़ा के आगे बेबस हो।मेरे लिए तुम्हारी तक़लीफ़ दूर करना ज़रूरी है।हम सब शहर की सफ़ाई करके हैज़ा से लड़ रहे हैं।तुम्हारे घर में इतनी गन्दगी थी की उसे तो साफ़ करना ही था।तब हैदर खान कहता है तुमको क्या लगता है की तुमने मेरा घर साफ़ किया है।तुमने तो मेरा मन साफ़ किया है और यह कहता हुआ हैदर खान उस नौजवान केगले लग कर रोने लगा।साथ ही बदमाशी छोड़ समाज के लिए लग गया।

अब सुनिए यह नौजवान कौन था।आज़ाद हिन्द फ़ौज़ को गढ़ने वाले,गाँधी को सबसे पहले राष्ट्रपिता कहने वाले,देश के सबसे ज़्यादा दिलों पर राज करने वाले नेता जी सुभाष चन्द्र बोस।उनके शौर्य और संगठन और क़ाबलियत को लेकर बहुत से किस्से याद हैं।मगर आज उनकी पैदाइश के दिन उस शुरआत को बताना ज़रूरी था जो एक लीडर को गढ़ता है।

सुभाष को मानने वाले सुभाष की ज़िन्दगी से सीख आगे बढ़ते हैं।सुभाष के विचार और मार्ग को खत्म करने वाले उनको गाँधी,कांग्रेस और दूसरे विवादों में उलझाते हैं।वोह सुभाष की ज़िन्दगी के खूबसूरत पलो पर बात नही करेंगे।उनकी दिल जोड़ने की कोशिश को नही समझेंगे।उनके भारत के हर नागरिक और धर्म के प्रति मोहब्बत को नही बताएँगे।यह तोड़ने वाले लोग नेता जी के जीवन से सिर्फ विवाद ही खोजकर लाते हैं।उन नफ़रत फैलाने वालों को अपना काम करने दें।आप नेताजी के जन्मदिन पर उनकी ज़िन्दगी के बड़े कदमो,त्याग,प्रेम,सेवा,राष्ट्र प्रेम,समर्पण,संगठन क्षमता के किस्सों को आम कीजिये।

एकबात दिल में बैठा लीजिये,हिन्दू मुसलमान के बीच नफरत बोने वाला और आपस में नफरत करने वाला कोई भी व्यक्ति सुभाष बाबू का चाहे जितना नाम ले ले, वह उनके रास्ते का हरगिज़ नही हो सकता । नफरत और बाँटने वालों से सुभाष बाबू भी उतना ही नापसन्द करते थे,जितना गांधी और नेहरू,इसलिए यह जान लो नफरत दिल मे रखकर सुभाष बाबू को दिल मे नही ले सकते हो,ऐसा कोई भी प्रयोजन सिर्फ एक धोखा है । सुभाष बाबू को हर एकता और भाईचारे को मानने वालों की तरफ से आज याद करने का दिन है....
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फ़ैयाज़ सिद्दीक़ी

अगर आप सैकड़ों पन्नों के दर्शन को एक लाइन में उतरता देखना चाहते हैं, तो आपको इनको पढ़ना चाहिए । मैं हैरत में हूँ कि हमारे बीच इतने बेहतरीन लिखने वालों को क्यों नही खोजकर पढ़ा जाता । यह दिल्ली में रह रही एक शानदार शख्सियत
Faiyaz Siddiquie भाई हैं । इनका दिल इनकीं मुस्कुराहट सा है और लिखावट इनकीं मुस्कुराहट को अल्फ़ाज़ का जामा पहनाकर, हमारे जैसों पर असर पैदा करती है ।

ज़बरदस्त नॉलेज और कहानी गढ़ने में माहिर,साथ ही ह्यूमर की शानदार समझ रखने वाले फ़ैयाज़ भाई को जानना हमारे सबके लिए ज़रूरी है । दिल्ली में इनकीं मेहमाननवाजी ने दिल तो जीता मगर दिल पर कब्ज़ा इनके हुनर ने किया था ।

बहुत कम लोगों से खुलने वाली यह शख्सियत जिनकी दोस्त हो,उन्हें फ़ख़्र करना चाहिए । इनके मन में ऐसी ऐसी कहानियां कौंधती हैं, जिनपर सैकड़ो पन्ने लिखे जा सकते हैं । यह कहानियां तो लिखते ही हैं,शेर ओ शायरी मेंभी बराबर का दख़ल रखते हैं, ऊपर से वन लाइनर के बेताज बादशाह हैं। इनके लेखन में बिल्कुल नया दर्शन है, जो कभी कभार हमें बहुत आकर्षित करता है, दिल करता है कि काश यह हमने लिखा होता,मन कहता है, तुम ही ने तो लिखा है । अपने से अलग क्या ही देखें, जिसकी इतनी बेलौस मोहब्बत मेरी रँगत बढ़ाती हो । लिखने पढ़ने के सिवा एक बेहद ही दिलचस्प इंसान हैं । हम एक शख्सियत जो इतनी खूबियाँ रखती हो उसपर क्या ही लिखें,उनके मिज़ाज की खूबसूरती मुस्कुराहट की शक्ल में  सामने है ही....
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Thursday, January 14, 2021

धर्म और राजनीति

यह तो सभी समझते हैं, फ़र्क़ बस इतना है कि अगर हमारे मज़हब का लीडर मज़हब की शाल ओढ़कर सियासत कर रहा,तो वह हमारी आवाज़ है और अगर कोई दूसरे मज़हब का लीडर,अपने मज़हब की शाल ओढ़कर राजनीति कर रहा,तो वह कट्टर है ।

जिस राजनीति का शिकार बन रहे हो दोस्त,उस राजनीति की जड़े अगर अपने आँगन में जमने दोगे, तो कभी सुक़ून नही आएगा,क्योंकि ज़हर चाहे जिस थाली में रहे, ज़हर ही रहेगा,इसलिए राजनीति और लीडरशिप में कम से कम उन्हें देखो,जो सामने से धर्म की ओट लेकर आपसे वोट नही माँग रहे ।

धर्म जीने का सलीका हो सकता है मगर राजनीति की सीढ़ी नही,फिर वह दुनिया का चाहे जितना बेहतरीन वक्ता हो,कितना ही क़ाबिल इंसान हो अगर उसने अपनी सियासत में मज़हब घोला है, तो यह एक भयँकर धोखा है । हम किसी एक का नाम लिखकर इस शास्वत सत्य को एक कपड़े में समेटना नही चाहते,क्योंकि यह हर दहलीज़ के लिए सच है, कट्टरपन और नफ़रत, कभी भी सुक़ून और तरक्की नही ला सकते,इसे चाहे आज मानो या कल ।

सुक़ून और नफ़रत, आग और पानी की तरह हैं,एक साथ रह ही नही सकते,इसलिए सुक़ून और तरक्की के तलबगार हो तो खुद को मज़हबी सियासी शोरवे से अलग कर लो,वरना वैसे ही हँसे जाओगे,जैसे इन नफरती ताक़तों पर तरस खाते हुए हँसा जा रहे हैं,जो अपना सब गवाकर सिर्फ इस लिए खुश हैं, की सामने वाला तक़लीफ़ में है....
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Saturday, January 9, 2021

गांधी की वापसी

वह जनवरी ही का महीना था । वह आज की ही तारीख़ थी । वह यही ज़मीन थी,बस साल कोई और था,साल 1915...जब इस ज़मीन पर हमेशा के लिए जम जाने वाली जड़ों,जिन्हें लोग अक्सर क़दम कहते हैं, वह पड़े । इस माटी का मोहन लौट आया ।

वह ज़ंज़ीरे जो हर सांस पर कसी हुई थीं,उन्होंने उसके आने की चाप सुनी । वह दिल जो आज़ादी की झलक के लिए धड़क रहे थे, उन्हेंने उसके पाँव की धमक महसूस की । वह गोखले जो अफ्रीका में एक सूरज देख आए थे,उनके दरवाज़े पर उनकी आँखों में वह सूरज उतरते देख रहे थे,इस माटी का मोहन लौट आया था ।

आज के दिन गाँधी अफ्रीका में एक जीत चुकी लड़ाई के योद्धा बनकर अपने आँगन को सँवारने आए थे । लोग उन्हें देखना चाहते थे और वह लोगों में आज़ादी की ललक देखना चाहते थे । लोग उन्हें कुछ हल्का बहुत जानते थे और वह लोगों को कुछ हल्का बहुत जानते थे,फिर आज से एक दूसरे को समझने का सफर शुरू हुआ । दुनिया ने देखा कि वह कैसे एक दूसरे में मिल गए कि इनकीं पहचान ही जुदा नही रही,जो गाँधी थे,वह भारत हो गए और जो भारत था,ह गाँधी हो गया,मिट्टी मिट्टी से मिलकर निखर गई और सौंधी खुशबू हवा में तैर गई ।

आज गाँधी के अफ्रीका से लौटने का दिन है । इस पवित्र मिट्टी का अपने इस बच्चे को महात्मा बनाने के सफ़र को देखिये,कैसे एक माँ अपने बच्चे को महात्मा बनाती है, यह समझने का वक़्त है । जो मुल्क गाँधी की समझ में कम आया था,जब गाँधी ने यात्रा के लिए पांव बढ़ाए, देश उनके सामने खुलता चला गया और कितना खुला की गांधी और देश मे पर्दे जैसा कुछ रह ही नही गया ।

अफ्रीका में गाँधी के नाम के झंडे गड़ चुके थे । उनपर तब ही बायोग्राफी लिखी जा चुकी थीं । अखबारों में कसीदे लिखे जा चुके थे । पहचान पहले ही जम चुकी थी मगर भारत अब भी उनका इंतेज़ार कर रहा था,जो आज के रोज़ खत्म हुआ । आज रौशनी का दिन है....गाँधी की वापसी और हमारे आगे बढ़ जाने का दिन
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Saturday, January 2, 2021

सावित्री और मोहन राकेश

वोह जब चलती थीं तो लोग उनपर गोबर फेंकते,कूड़ा फेंकते,पत्थर फेंकते,लोग उनके हौसलें को अपने मन की गंदगी से तोड़ना चाहते,मगर वोह बगल में एक अदद दूसरी साड़ी दबाए आगे बढ़ जाती। उनमें एक उम्मीद थी,यही उम्मीद और मेहनत इन पत्थरो के ज़ख्म,कूड़े और गोबर की गन्दगी से कहीं ज़्यादा बड़ी थी। उन्होंने लड़कियों का पहला स्कूल खोला,खुद पहली महिला प्रिंसिपल हुई। उन्होंने कलम उठाकर मराठा ज़मीन पर कविता उकेरी तो हिम्मत देकर खुद लड़कियों को कलम पकड़ाई। यह वोह पहली औरत है जिसके सामने हाथ में पत्थर लिए मर्द और औरते झुकती चली गईं।

आज जिनकी रखी नीव पर रौशनी डाल रहा हूँ वोह सावित्री बाई फूले हैं।उनका जन्मदिन है आज। जो लड़कियां आज़ादी की बात करती हैं, जो लड़के लड़कियों के खुले आसमान की वकालत करते हैं।वोह गहरी आँखों से सावित्री बाई फूले को देख ले,पढ़ ले और अपनी उम्मीद और ख्वाहिश को ज़मीन दें।लोग सावित्री बाई के पैरों में काँटे बो रहे थे,वोह उनकी नस्लों के पाँव के काँटे चुन रही थीं।कम से कम आज तुम सब उनपर फेंकी गई गन्दगी को महसूस तो करो,सावित्री बाई का आँचल तुम्हे महका देगा।आज उनको रोज़ से ज़्यादा याद करो।

एक तरफ सावित्री बाई की पैदाइश का जश्न है तो दूसरी तरफ मेरे दोस्त मोहन राकेश का ग़म।कोर्स की किताबों में जिन मोहन राकेश को रट रट बड़ा हुआ।पता ही नही चला की कब वोह रूह में उतर गए।भारतेन्दु के बाद मोहन राकेश ही वोह थे जिन्होंने नाटकों को ऐसे थामा की हर नाटक,हर किरदार,हर मंच पर मोहन राकेश ही रह गए।दिल्ली की सर्द सुबह जब मोहन राकेश नही उठे तो लगा किसी नाटक का कोई नायक अचानक सो गया है मगर नही आजकी वोह सुबह नाट्य जगत की शाम थी।मेरे मोहन कभी नही उठे मगर वोह हर वक़्त मेरे इर्द गिर्द रहते हैं।जब मैं थियेटर में पाँव धरता हूँ तो चुपके से वोह कहते हैं, मैं भी तुम्हारे साथ नाटक देख रहा हूँ।मैं अपने कन्धों पर उनके रखे हाथ को जी लेता हूँ।

मेरे लिए सावित्री बाई की ख़ुशी है तो मोहन राकेश का गम भी है।एक की कलम कविता में डूब लड़कियों की सुबह बुन रही थी।तो दूसरे की कलम नाटकों में उलझ कर इतिहास बना रही थी।अपने देश की सौंधी खुशबू को महसूस करना हो तो इन सबको जान लो वरना एक दिन जानने को तरसोगे की मेरी माटी क्या है।इसकी महक कैसी है।इसका रँग क्या है।इससे फूटती रौशनी कैसी है।हाँ,यही मेरा भारत है।
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