पता नहीं क्यों लोग शीरी फरहाद की कस्मे खाते है। मोहब्बत में लैला मजनू की सदाएँ देते है। अमृता की मोहब्बत भी तो है।तड़प की मोहब्बत,कसक की मोहब्बत,बिना किसी शिकवे की मोहब्बत अमृता साहिर की मोहब्बत ,लिखावट और जज़्बात की मोहब्बत,सूफियाना और शायराना मोहब्बत।
अमृता ने लिखा एक बार दिल्ली में दुनिया भर के राइटर्स का सेमिनार हो रहा था ,उसमे साहिर और हमें भी बैज दिए गए। मगर शरारतन या कहे मोहब्बत की वजह से साहिर ने मेरा और मैंने साहिर के नाम का बैज लगा लिया। स्टेज पर एक जनाब आए और माफ़ी मांगते हुए कहा "अरे अमृता जी गलती से आपको गलत बैज दे दिया गया है...अभी सही करवाते है" इतने में तपाक से साहिर ने जवाब दिया "गलती आपसे हुई थी मगर हमने सही कर ली है आप इत्मीनान रखिये"।कितनी शिद्दत की मोहब्बत थी।रूहों की मोहब्बत नामो से खेल रही थी।
अमृता उस रात के ज़िक्र में कभी कुछ न लिख सकी जिस रात साहिर ने दुनिया को अलविदा कहा था। अमृता को रात २ बजे बुल्गारिया में खबर मिली की साहिर इस दुनिया से कूच कर गए। वह पूरी रात फोन के पास बैठी रोती रही। अमृता ने एक जगह कहा भी " हमें लगता है ख़ुदा से गलती हो गई। उस दिन हमने जो बैज बदले थे। उन्ही नामो का धोखा फरिश्तों को हो गया।अमृता उस रात के बाद हर रात साहिर के ख्यालो में जागती रही।
जब साहिर की मौत की खबर अखबारों में छपी तो आपको पता है एक बड़े अख़बार ने क्या किया। अमृता की बड़ी सी तस्वीर पहले पेज पर छापी उसमे अमृता की आँखे आंसुओं से भरी हुई थी और हेडलाईन थी साहिर……… साहिर.......साहिर…………
सच कहें अमृता के होने से ही मेरे नज़दीक़ साहिर,इमरोज़ का होना है।मैं ने साहिर को अमृता से ही समझा है।उनकी आँख में ही झाँककर इमरोज़ को देखा है।मुझसे तो अमृता रोज़ ही मिलती ही हैं, आज सुबह भी मुस्कुरा कर चाय दे रहीं हैं,कलम भी पकड़ा गईं,चेहरे पर पड़ी सिलवटों में अमृता ने अपना जन्मदिन ही छिपा दिया,सुबह से खुश हैं की हम जन्मदिन भूले नही इसबार। उनकी पकड़ाई कलम से मेरी दुनिया का यह सबसे अज़ीम अल्फ़ाज़ फूट चुका है... अमृता अमृता अमृता अमृता अमृता...