Friday, August 30, 2019

अमृता प्रीतम

पता नहीं क्यों लोग शीरी फरहाद की कस्मे खाते है। मोहब्बत में लैला मजनू की सदाएँ  देते है। अमृता की  मोहब्बत भी तो है।तड़प की मोहब्बत,कसक की मोहब्बत,बिना किसी शिकवे की मोहब्बत अमृता साहिर की मोहब्बत ,लिखावट और जज़्बात की मोहब्बत,सूफियाना और शायराना मोहब्बत।

अमृता ने लिखा एक बार दिल्ली में दुनिया भर के राइटर्स का सेमिनार हो रहा था ,उसमे साहिर और हमें भी  बैज दिए गए। मगर शरारतन या कहे मोहब्बत की वजह से साहिर ने मेरा और मैंने  साहिर के नाम का बैज लगा लिया। स्टेज पर एक जनाब आए और माफ़ी मांगते हुए कहा "अरे अमृता जी गलती से आपको गलत बैज दे दिया गया है...अभी सही करवाते है" इतने में तपाक से साहिर ने जवाब दिया "गलती आपसे हुई थी मगर हमने सही कर ली है आप इत्मीनान रखिये"।कितनी शिद्दत की मोहब्बत थी।रूहों की मोहब्बत नामो से खेल रही थी।

अमृता उस रात के ज़िक्र में कभी कुछ न लिख सकी जिस रात साहिर ने दुनिया को अलविदा कहा था। अमृता को रात २ बजे बुल्गारिया में खबर मिली की साहिर इस दुनिया से कूच कर गए। वह पूरी रात फोन के पास बैठी रोती रही। अमृता ने एक जगह कहा भी " हमें लगता है ख़ुदा से गलती हो गई। उस दिन हमने जो बैज बदले थे। उन्ही नामो का धोखा फरिश्तों को हो गया।अमृता उस रात के बाद हर रात साहिर के ख्यालो में जागती रही।

जब साहिर की मौत की खबर अखबारों में छपी तो आपको पता है एक बड़े अख़बार ने क्या किया। अमृता की बड़ी सी तस्वीर पहले पेज पर छापी उसमे अमृता की आँखे आंसुओं से भरी हुई थी और हेडलाईन थी साहिर……… साहिर.......साहिर…………

सच कहें अमृता के होने से ही मेरे नज़दीक़ साहिर,इमरोज़  का होना है।मैं ने साहिर को अमृता से ही समझा है।उनकी आँख में ही झाँककर इमरोज़ को देखा है।मुझसे तो अमृता रोज़ ही मिलती ही हैं, आज सुबह भी मुस्कुरा कर चाय दे रहीं हैं,कलम भी पकड़ा गईं,चेहरे पर पड़ी सिलवटों में अमृता ने अपना जन्मदिन ही छिपा दिया,सुबह से खुश हैं की हम जन्मदिन भूले नही इसबार। उनकी पकड़ाई कलम से मेरी दुनिया का यह सबसे अज़ीम अल्फ़ाज़ फूट चुका है... अमृता अमृता अमृता अमृता अमृता...

Wednesday, August 28, 2019

समाज के लिए रो नही करो

एक योद्धा युद्ध से नही घबराता । एक डॉक्टर मरीज़ों की लम्बी लाइन देखकर नही घबराता । एक शिक्षक सवाल पूछते बच्चों की भीड़ से भागता नही है । एक दानवीर अपने सामने फैले हाथों को देख डिप्रेशन में नही जाता । एक मजदूर ईंटो का ढेर देख पैर नही पीछे करता । जानते हैं, क्यों,क्योंकि इनको जो काम करना है, वह करना है । इन्हें अपने पूरे दिन में जितना हो सके वह काम करके खत्म करना ही है ।

अब आते हैं समाज सेवकों पर,सुधारकों पर,एक्टिविस्ट पर,यह मीटिंग करते हैं । एक दूसरे को घने होते अंधेरे के बारे में बता बताकर रुदाली बनते हैं । वह बड़ा एक्टिविस्ट जो ज़्यादा जल्दी घना अंधेरा महसूस करले और ज़्यादा भयँकर तरीके से बता पाए । अंधेरा बढ़ता रहता है और यह और बकते रहते हैं । फासिस्ट जैसे शब्द हवा में उछलते हैं, तानाशाही के तार बार बार छेड़े जाते हैं । लम्बी लम्बी तक़रीरें होती है मगर नही होता है, तो काम ।
हम सबको इतना समझना चाहिए जितना ज्यादा ज़ुल्म होगा,उतना ज्यादा हमारा काम बढ़ जाएगा । हमे रोना कम और काम ज़्यादा करना होगा । लोकतंत्र खतरे में है, जैसे नदी बाढ़ में खतरे के निशान से ऊपर बह रही कि सूचनाएं नही देनी होंगी । हमे बाढ़ रोकने या आ चुकी बाढ़ से खतरे और नुकसान को कम करने में लगना होगा । अब हम।यह तो नही करेंगे कि नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही,इसिपर ही संगोष्ठी करें,चर्चा करें और यही पर दिन रात एक करदें ।

जिसको लगता है कि वाक़ई देश समाज मे चीजें बदतर हो रहीं । भीड़ बेकाबू हो रही,सरकार का निज़ाम डोल रहा है,पुलिस की पकड़ अपराधियों पर ढीली हो रही,विरोध की आवाजों को दबाया जा रहा,तो संगठित होकर काम कीजिये । हरकत में बरकत है, बोलने से एक वक्त के बाद केवल ध्वनि प्रदूषण ही हाथ आएगा ।

माहौल और बदलते लोगों को देखकर डिप्रेशन में नही जाना है । क्योंकि इस माहौल में डिप्रेशन में आना सबसे आसान है, सबसे मुश्किल है इस माहौल को बदलना । मंचो या सेमिनार हाल में बोलने की जगह,जो जहाँ है वहाँ बात करे । घर,परिवार,दोस्त,संस्थान,क्योंकि इंसान यहीं हैं, जिन्हें सुधरना है ।

जिन्हें लगता है अभी बुरा हुआ ही क्या है, तो वह बुरा होने के अपने मानक लेकर चुपचाप बैठे,जब उनके स्तर का बुरा दिखने लगेगा तब वह अपनी सेवाएँ दे दें,तब तक चादर तान कर सोएँ । समाज मे प्रेम,एकता और सहयोग की भावना को बढ़ाने में लगिये । यही वह सूत्र हैं, जिससे हम देश पर आए कोई भी सामाजिक,राजनैतिक या आर्थिक संकट का मुकाबला कर पाएँगे । ऐसे समय मे जो एकता को तोड़ने का कोई भी कुत्सित प्रयास करे,वही समाज का सबसे बड़ा दुश्मन है ।

परेशान मत होइए,डिप्रेशन में मत आइये,रक दूसरे को कोसिए मत,एक दूसरे के पिछले कामो के कपड़े मत उतारिये,बस एक होइए । हम सब मिलकर,काम करके,चीजों को बेहतर करने का प्रयास कर सकते हैं, हमारे हाथ मे यही है, यही कीजिये,बस । काम कीजिये,जो भी आता है, वह कीजिये,बस लक्ष्य एक रहे, प्रेम,एकता,बन्धुता,अहिंसा,धैर्य...यही धर्म है, यही कर्म है...

Saturday, August 24, 2019

जन्मष्टमी

अल्फ़ाज़ में पिरो दूँ,तो यह नामुमकिन है।संगीत में उतार दूँ, तो यह भी नही हो सकता।खूबसूरत रँगो से उनका अक़्स उतार दूँ,तो यह भी बस से बाहर है।ज़मीन पर प्रचलित हर कला का सहारा ले भी लूँ फिर भी कुछ न कुछ छुट ही जाएगा।

मेरे कान्हा में इतना कुछ है जिसको समेट पाना कला से बाहर है।मैं उनके मोर मुकुट को छूता हूँ तो चक्र छुट जाता है।गोपियों संग मुस्कुराहट को पकड़ता हूँ तो सारथी कृष्ण दूर चले जाते हैं।मक्खन से डूबे कान्हा के हाथ को देखता हूँ तो द्रोपदी के पास खड़े कृष्ण धुन्धला जाते हैं।सुदामा के लिए एकटक खड़े कान्हा को अपनाता हूँ तो अर्जुन को ललकारते कृष्ण बच के निकल जाते हैं।राजा केशव की आराधना पकड़ता हूँ तो कुरुक्षेत्र में लेटे कर्ण की परीक्षा लेने वाले कृष्ण दूर चले जाते हैं।

एक ही वक़्त में राधा की मुस्कान में मुस्कुराते कनहैया दिखते हैं तो कंस से जूझते कृष्ण बिछड़ जाते हैं।मैं अपने कान्हा को पूरा का पूरा समेटना चाहता हूँ मगर वह मुठ्ठी में बन्द रेत की तरह धीरे धीरे निकल जाते हैं।मैं मीरा के शब्द पकड़ता हूँ।सूर की डोर तो रसख़ान की गलियाँ देखता हूँ मगर मेरे कान्हा मेरे हाथों से हर बार निकल जाते हैं।मैं उनकी मुस्कान में डूब जाना चाहता हूँ।मैं भरम में हूँ की वोह एक कृष्णा हैं।मैं उस एक चेहरे में अपने हर तरह के चेहरे को देखता हूँ।मुझे कान्हा का चेहरा एक खूबसूरत धोखा प्रतीत होता है।वोह तो पानी है,जैसे देखो,वैसे कान्हा।सबके लिए सबके कान्हा।

मैं उनकी बाँसुरी में फंसी उंगलियो को देखता हूँ तो ज़मीन पर टिके अँगूठे को,पूरा का पूरा भरम।दुनिया को मुस्कुराने की वजहें कान्हा से ज़्यादा किसने दी हैं।मेरे कान्हा एक मासूम बच्चे से एक अनुभवी बुज़ुर्ग तक सबके दोस्त हैं।मुझे पता है मैं लिखता रहूँ,तो लिखता रहूँगा मगर कान्हा को समेट नही पाउँगा।आओ कान्हा इन।अल्फाज़ो को छोड़,आज मेरे साथ बैठो।मैं रोऊँ और तुम खड़े मुस्कुराओ।तुम्हारी मुस्कुराहट में मेरी हर परेशानी का हल है।

बस तुम यूँही मेरे साथ,हमेशा की तरह,हमदम रहो।मेरे कान्हा। मैं तुम्हे वृंदावन से बहुत दूर यहाँ बेचैनी से याद कर रहा हूँ,बस एक प्रार्थना,इस पूरे भारत को कुरुक्षेत्र बनने से बचा लो क्योकि अब कान्हा तुम दोबारा तो नही आओगे इस ज़मीन को हरी भरी उपजाऊ करने। इसमे प्रेम भरने,मेरे कान्हा हमारी नफ़रत पर अपनी मुस्कान की सील लगा दो।चाहकर भी नफ़रत उस मुस्कान में दबकर दम तोड़ दे।मेरे कान्हा।आओ आज दिनभर साथ रहें,बड़े दिन बाद मिले हो।कहीं जाने नही दूँगा आज। जन्मष्टमी की अगली सुबह शायर हैदर अल्वी के इस शेर के सहारे बस यही तो मांगना है...

।। मुझे अपनी निगाहों के पास रहने दे।।
।। तू कृष्ण है तो मुझे सूरदास रहने दें ।।

धरती की जन्नत

बड़े,ऊँचे, हवेली नुमा घरों में एक कमरा होता था,जिन्नात का कमरा । होता था या बना दिया जाता था,यह तो जिन्नात ही जानें ।
उस कमरें में इंसानों का जाना मना होता,उसके बारे में कुछ भी दरयाफ्त करना मना होता,कुछ जगह तो उसका ज़िक्र करना भी मना होता ।

ऐसे घरों में रहने वाले मिट गए,घर की दीवारें चिटख गईं, भारी भरकम छते भी ढह गईं और सबके साथ जिन्नातो वाला कमरा भी गिर गया । सब मैदान हो गया ।
वह जिन्नातो वाले कमरें की दीवारें किसी ज़ुल्म को खुद में दबाएं थीं । या उनमें उन घरों की करतूतें चूने में छिपी थीं । या उनकी छतों में झूलती चमगादड़ों की आवाज़ कहती थी कि यही वह मिट्टी है, जो तड़प कर इस घर को ढहा देने की दुआ मांग रही है । एक दिन ईश्वर का दिल पसीजा और उस जिन्नातो की कोठरी की मिट्टी की दुआ सुनकर सब मिट्टी में मिला दिया ।

अपने घर जैसा एक देश भी है, जिसकी ज़मीन का एक टुकड़ा जन्नत जैसा दिखता था,अब जिन्नातो की कोठरी की तरह बना दिया गया है । जहां आना जाना,जिसके बातें करना,सब मना है । पूरे  देश मे कहकहे लग रहे हैं, यहां सन्नाटा है । ठीक जिन्नातो वाली कोठरी वाला सन्नाटा ।
हम सबको पता है, हम सब सन्नाटे से डरते हैं । इसलिए दूसरी दूसरी बातों पर चीख रहें हैं । एकदूसरे से लड़ रहे  हैं । एक दूसरे का मज़ाक़ उड़ा रहें हैं ताकि सब कुछ हो,बस नज़दीक़ यह सन्नाटा न आए ।

जिन्नातो की कोठरी गवाह है कि जबरन लाए गए सन्नाटे ने एक रोज़ पूरे घर मे सन्नाटा करदिया था । जिन्नातो की कोठरी ढही तो ज़रूर थी मगर साथ ही ढह गया था,भरा, पूरा,हँसता, खेलता,घर....

Thursday, August 22, 2019

जन्मष्टमी

जो मेरी आँख में आँसू लाते हैं, ऐसे आँसू जो करुणा से निकले हों । जो मेरे दिल को नरम करते हैं, ऐसी नरमी जो हर इंसान के लिए हो । जो मुझे मेरे मार्ग पर विचलित हुए बिना चलने का साहस देते हैं, वह कान्हा हैं ।

मैं मीरा नही हूँ,मैं सूर भी नही हूँ,मैं रहीम या रसखान भी तो नही हूँ । मैं अपने कान्हा को पाने वाला बेहद साधारण सा जीव हूँ, जिसमे कोई खूबी नही,कोई फ़न नही,जिसे तो यह भी नही पता कि प्रेम कैसे किया जाता है । मैं तो बस अपने फूहड़पन से कान्हा को चाहता हूँ, जैसे करोणों लोग चाहते होंगे । मेरा और कान्हा के सम्बंध असाधारण नही बल्कि बेहद साधारण है । मैं मुस्कुराता हूँ और वह मुस्कुरा देते हैं । बस ।

मैं कान्हा के जीवन का न तो सुदामा हूँ, न ही राधा हूँ, न ही रुक्मणि हूँ ,न ही बलराम हूँ और न ही अर्जुन हूँ । मैं तो बस इस पूरे ब्रह्मांड में सुई की नोक के करोणोंनवे हिस्से से भी छोटा  कान्हा का एक प्रेमी वाला हूँ ।

जिसकी कोई औकात नही,जिसकी कोई पहचान नही,जिसमे कुछ भी ऐसा नही जिसे उभारा जा सके । इसके बावजूद मेरा हृदय वह है, जिसमे कान्हा वास करते हैं । मेरे मस्तिष्क वह है, जिसे कान्हा दिशा देते हैं । मेरे पांव वह हैं, जो कान्हा के इशारे समझते हैं । मेरे हाथ वह हैं, जो कान्हा की सुनते हैं ।

मैं अपने कान्हा को,अपने अन्दर मरते दम तक जीवित रखने की लालसा में जिये जा रहा हूँ । जिस दिन मेरा मन न्याय,त्याग,समर्पण,सहयोग,प्रेम,बन्धुता से डिग गया,उस दिन मेरे अंदर से कान्हा निकल जाएंगे और रह जाएगा तो केवल एक जर्जर खंडहर नुमा शरीर ।मेरा हर कदम इस शरीर मे कान्हा को रोके रखने के लिए है । ऐसे ही कान्हा हर उस शरीर मे हैं, जिसमे प्रेम है । जहाँ नफरत है, वहां कान्हा तो क्या,कान्हा की छांव भी नही है ।

जन्माष्टमी आएँगी और जाएँगी । असली जन्म तो हृदय में होता है । कान्हा ने जिसके घर की जगह हृदय में जन्म ले लिया,समझ लो,उसे मानवता की सेवा के लिए चुन लिया । जिसके हृदय में कान्हा की किलकारी गूंजी,समझ लो वह प्रेम को फैलाने वाला चुना गया है । जिसके हृदय में कान्हा ने पाँव की पहली थाप दी,वह इस धरती को सँवारने वाला बन गया । जन्मष्टमी तो तब है जब समाज की वेदना,संवेदना और फिक्र की प्रसव पीड़ा महसूस करो और समाज को सुखी,समृद्ध और शान्ति के लिए काम करो ।

हर एक कि बराबरी के लिए उठो,अमीर गरीब,छोटा बड़ा,काला गोरा,हिन्दू मुसलमान,मज़दूर मालिक,सबके लिए बराबर से विचलित होना,सबके लिए बराबर से खड़े होना जब आ जाएगा,तब कान्हा हृदय में जन्म लेंगे,यह ऐसी जन्मष्टमी होगी,जो एक बार आएगी और सारे जन्मों का उद्धार कर जाएगी ...जन्मष्टमी की आप सबको मुबारकबाद,कान्हा आपके हृदय तक पहुँचे...

यह लिखा था

जिसे खोजना था,उसे पूजने लग गया । जिसे पाना था,उसे मानने लग गया । इस तरह मैं ईश्वर से बहुत दूर, ईश्वर में उलझकर भटक गया...

Sunday, August 18, 2019

बोलने नही देंगे

बात क्या करते सिवाए शांति, अहिंसा,त्याग और प्रेम के...अयोध्या में युवा सद्भावना शिविर था,जिसे अचानक शासन ने रुकवा दिया । पुलिस अधिकारियों का कहना कि आपका कार्यक्रम सही है, मंशा अच्छी है मगर इस वक़्त यह बातें ठीक नही क्योंकि देश काल की परिस्थितियां इसके अनुकूल नही ।

हमें,सन्दीप भाई, राम पुनियानी जी,अनुराग,आशीष और राजीव भाई को यहाँ सुबह से ही डिटेन कर लिया गया । लखनऊ से चले,अयोध्या की सीमा में टोल प्लाज़ा के गेस्ट हाउस में सड़क पर भारी पुलिसबल लगाकर रोक लिया गया । दिल्ली से अयोध्या पहुँचे सुयशत्रिपाठी,डॉ कुश भाई और जावेद को कैम्प से निकल जाने को कहा गया,आयोजक युगल शास्त्री को हमारे पास लेकर रोक दिया ।

लोकतंत्र पर हमला या इमरजेंसी जैसे हालात कहकर हम चीज़ें परम्परागत नही करना चाहते,आपको विचलित नही करना चाहते । प्रशासन को लगता है कि प्रेम और त्याग की बातों से शांतिभंग हो सकती है, तो हम उनका सम्मान करते हैं । हमे क्या,इस डिटेन किये जाने पर भी किताब पढ़ते रहे ।एक ही तो फिक्र,अपने देश की,उसे यहाँ बैठ सोचते रहे ।

हम तो खुदाई खिदमतगार हैं, हमे नफ़रत ही तो दूर करनी है । आज यह जो हुआ,हम अरेस्ट हुए और वापिस लखनऊ लाकर छोड़े गए,यह ठीक तो नही था । अब युवा शिविर या सद्भावना की बातें आपको डराने लगें,तो लगता है कि शासन में वाक़ई कोई कमज़ोर व्यक्ति बैठा है । हमने तो अब प्रण ही कर लिया है कि इस डर को भी शासन का निकालना है और समाज मे और मधुरता,प्रेम,त्याग,समर्पण लाने में लगना है ।

हम इसको कोई सनसनी नही बनाना चाहते,न ही यह चाहते हैं कि ऐसे हरकतों से कोई हमारे दूसरे कार्यक्रम।प्रभावित हों । हम अब और मज़बूती से पूरी प्रतिबद्धता से आगे भी युवा शिविर,युवा संवाद और यात्राएँ करते रहेंगे । न टूटेंगे न झुकेंगे,न विचलित होंगे,न भय का माहौल बनने देंगे, बस देश मे देश के हर व्यक्ति के लिए बेहतर माहौल बनाने में लगेंगे ।

आखरी बात आपसे नही बल्कि मेरे राम से है, रामजी यह पहली बार हुआ है कि हम आपकी चौखट तक आकर आप तक नही आए, सरयू का पानी छुए बगैर यह हाथ पहली बार लौटे हैं । आप हर उसको माफ कीजियेगा,जिसने यह पाप किया है । मेरी प्रार्थना है कि हमारे हृदय को विशाल तो कीजिये ही,हर उसके हृदय को भी बड़ा कीजिये,जिनका संकुचित हो रहा है । मैं न गुस्सा हूँ, न मायूस हूँ, न दुःखी हूँ, क्योंकि मुझे पता है मैं रामजी के सन्देश को फैला रहा था,जिसे वह और जगह और तरीके और सामर्थ्य से हमसे ज़रूर समाज मे फैलवाएंगे ।

यह गिरफ्तारियाँ, यह रुकावटें मेरे प्रेम के मकसद को और मज़बूत करती हैं । शासन ने जो किया,वह नही करना था,इसकी जरूरत ही नही थी मगर क्या ही कहें,बस प्रार्थना की ईश्वर इनको सद्बुद्धि दे क्योंकि यही देश के लिए ज़रूरी है । देशभर के हर साथी को सैल्यूट जो इसमे अपनी अपनी जगह से साथ देते रहे...

Friday, August 16, 2019

कश्मीर,हाउस अरेस्ट और मैं

आज 16 अगस्त दिन शुक्रवार,हम सबने फिर तय किया था कि 11 अगस्त को कश्मीर के इश्यू पर जो धरना था,उसे करना है । आज जब 5 बजे हम लोगों को कश्मीर में मानव अधिकारों के हनन पर कैंडिल जलानी थी,गांधी प्रतिमा, हज़रतगंज में धरना देना था । तो सन्दीप पांडे को उनके इंद्रानगर स्थित घर पर हाउस अरेस्ट कियागया । रिहाई मंच के शुएब साहब को भी अमीनाबाद केउनके घर मे अरेस्ट किया गया ।
हमारी सुबह ही सन्दीप भाई से बात हुई थी,उनका खास कहना था कि किसी भी हाल में हमे अरेस्ट नही होना है ,क्योंकि मेरे ज़िम्मे कल के अयोध्या के कार्यक्रम भी हैं । उनके कहने पर मैं देर रात तक गोमतीनगर में एक जगह रहा,क्योंकि अगली सुबह राम पुनियानी के साथ मुझे अयोध्या जाना है । अगर हम सब गिरफ्तार हो गए, तो हमारे लक्षित कार्य कौन करेगा । सन्दीप भाई की बात मानकर मैंने राम पुनियानी को अपने दो साथियों के साथ सुरक्षित स्थान पर भेज दिया ।

कश्मीर में हमारा मानना है कि हम सब वहां के लोगों के साथ अन्याय न होने दें,यही हमारा धर्म है । हिंसा और द्वेष से मुक्ति ही हमारा ध्येय है । शांति और सहिष्णुता ही हमारा लक्ष्य । हम सब संघर्ष करते हुए इस महान मार्ग को एक दिन पा ही लेंगे

Wednesday, August 14, 2019

स्वतंत्रता दिवस

आज खुश तो बहुत होंगे।बेहद खुश।खुश होना लाज़िमी है, यह खुली हवा में साँस और मनमर्ज़ी का कुछ भी करने की आज़ादी जो है।दुनिया के शानदार लोकतन्त्र के स्वतन्त्रता दिवस पर हमे बेहद गर्व है,ख़ुशी है। बस थोड़ा सा इस ख़ुशी की वजह भी देख लें।उन लोगों को भी देख लें जो अपना सबकुछ खत्म करके इस ख़ुशी के लिए खत्म हो गए। जो इन खुशियों को हम तक तो लाए मगर खुद नही देख सके । उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी क़ुर्बान कर दी।एक बार उनको याद कर लीजिये।जिनकी ज़बानों पर उन लीडरों के लिए अनाप शनाप लफ्ज़ आते हैं, वह वही हैं जो ज़रा सी लालच में अंग्रेज़ों के सामने घुटने के बल पर बैठ जाते थे।जो ज़रा सी सख्ती में सैकड़ो पेज की माफ़ी माँग कर खुले घूमना चाहते थे। आज़ादी तो सख्त ज़ंजीरों में बंधे हमारे लीडर्स की जीवटता से आई,जो डरे नही,झुके नही,विचलित नही हुए । जिन्होंने सबको जोड़कर एक किया ।

एक बार उठिये देखिये सलाखों में कौन कौन था।उन सलाखों में किसने माफ़ी नही माँगी।किसका पूरा परिवार जेल में था।किसका सबकुछ कुर्क हो गया था।किसको अपनी बीबी और अपने साय जैसे साथी की चिता को आग जेल में रह कर देनी पड़ी।वह कौन था जिसके भाई के टुकड़े उसके आँगन में डाल दिए गए।वह कौन था जिसका जवान बेटा फाँसी पर था।उस औरत को जानिए जिनका इकलौता बेटा अंग्रेज़ों की गोली खाया और शौहर फाँसी के तख्त पर झूला।उन्हें अपने कुल की चिंता नही थी क्या।

चिंता थी,वह भी चाहते थे जीना।उन्हें भी ज़िन्दगी में सुकून प्यारा था।वह अपनी पीठ पर लाठी नही खाना चाहते थे।कोई आदमी अपनी बेटी और बहन और बाप को जेल में नही देखना चाहता था।यह सारे लोग बढ़िया ज़िन्दगी गुज़ार सकते थे,मगर नही गुज़ारी।क्योकि यह हमारे चेहरे पर ख़ुशी देखना चाहता थे।वही ख़ुशी जो आज हर हिंदुस्तानी के होंट पर मुस्कुरा रही है।तो एक बार उस पूरी परम्परा,संघर्ष और उस दौर की सोच को याद कर लीजिए और आज़ाद हो जाइये।

हर बुराई से आज़ादी।सम्प्रदायिकता,आतंकवाद और नफ़रत से आज़ादी।काहिली और अन्धविश्वास से आज़ादी।आइये  आज़ादी को हर उसके साथ सेलिब्रेट करें,जिनकी चौखट पर यह आज़ादी जाते जाते संकरी हो रही है।जब हर होंट पर मुस्कान होगी,तब हमारी,आपकी और हमारे पुरखों की आज़ादी होगी।पूरी दुनिया में फैले हम सब भारतीयो को स्वतन्त्रता दिवस की बधाई।अब बस एक ही प्रार्थना की यह लोकतन्त्र ऐसे ही बना और बढ़ता और फलता फूलता चले । हर एक कि आंखों में चमक और होंठ पर मुस्कान आए,जय हिन्द...

स्पीकिंग ट्री

आजके नवभारत टाइम्स में स्पीकिंग ट्री पढ़िये । कुछ चीज़ें सिर्फ पढ़ने भर की नही,बल्कि समझकर,खुदमे उतारकर,आगे वाली नस्ल में भेजने के लिए होती हैं, इन्हें ज़िम्मेदारी कहा जाता है । मूल लेख नीचे  पढ़िये,लिंक कमेंट बॉक्स में है

जब राम ने जंगल की तरफ कदम बढ़ाए.जब बुद्ध ने वटवृक्ष के नीचे ध्यान लगाया.जब मोहम्मद ने पहाड़ पर हिरा नाम की गुफा में कदम रखे और जब ईसा ने एक भी हरी घास का तिनका न तोड़कर अहिंसा का संदेश दिया.तब आखिर वह क्या था जो वह कहना चाह रहे थे और हमसे लगातार छूटता जा रहा था.एक बार इसपर गौर से देखिये की वह जिन साधनों का प्रयोग कर रहे थे,वह हमे क्या संदेश दे रही थीं.धर्म वह नही जो बोला जाए,धर्म वह है जो समझा जाए.आध्यात्म वह नही जो दिखाया जाए,आध्यात्म तो वह है जो किया जाए.इन सबने जिस एक चीज़ को पकड़े रखा उसे कहते हैं प्रकृति .
इन्होने हमे बताया की प्रकृति की गोद में जाओ,वहीं मानवता का वह बीज जय,जिससे संसार मुस्कुरा सकता है.हम तमाम आडम्बरो में उलझते हुए इस प्रक्रति से इतना दूर हो गए की अपने रास्ता दिखाने वालों की ही नही सुनी.यह अपने हर कदम से हमे बता रहे थे की प्रकृति के करीब आओ,मुक्ति यहीं है,शांति यहीं है.जल,जंगल,जमीन की फ़िक्र करो,क्योंकि इनमे ही ईश्वर है.वह ईश्वर जो हमे और तुम्हे जीवन देता है.
प्रकृति एक ऐसी चीज़ है जिससे हम प्रेम करे या न करें,वह हमारी सेवा करेगी.प्रेम करने से यह सेवा आने वाले बच्चो तक जारी रहेगी,न करने से हमारे ही जीवन में यह सेवाएँ समाप्त हो जाएँगी. हर धर्म प्रकृति को प्रणाम करके संसार में फैला है अगर हममे वाकई धर्म है तो भला हमारे होने से प्रकृति को नुकसान कैसे हो सकता है. हमने आजतक गलती किया की धर्म को प्रकृति से अलग हटाकर देखा जबकि पूरा धर्म ही प्रकृति के इर्द गिर्द रचा बसा गया. जो भी व्यक्ति के कर्म से प्रकृति को नुकसान पहुचे वह तो अधर्म के पाले में खड़ा अधर्मी है.
अब जब पानी को लेकर हाहाकार मचा हुआ है.तब यह भी देखना जरूरी है की आध्यात्म क्या कहता है.आध्यात्म तो यहाँ तक कहता है की प्राकृतिक संसाधनों का दोहन मूल आवश्यकता से अधिक मत करो,मूल आवश्यकता केवल जीवन ही तो है.अच्छा बड़ी मामूली सी बात है की हमने अपने लिए तो धरती का सीना फोड़कर साफ़ पानी निकाल लिया मगर दुसरे जीवो के लिए क्या किया. मानव अपने लिए नल तो लगा सकता है,ट्यूबवेल लगा सकता है मगर जरा यह बताएँ की दुसरे जानवर कैसे पानी पियेंगे.ज़ाहिर है उनके लिए प्रकृति ने नदिया,पोखरे,झरने बना रखे हैं.मगर हम मानव ने इन्हें इतना जहरीला कर दिया की उससे दुसरे जीवों के जीवन का संकट सामने आ गया.वह हमारे फैलाए जहर से मरने लगे.कहाँ मानव की ज़िम्मेदारी थी की वह दुसरे जीवों के जीवन को बेहतर बनाए कहाँ उसने उनके जीवन को ही नष्ट करने का मार्ग चुन लिया. एक आध्यात्मिक व्यक्ति कभी भी दुसरे जिव के जीवन को कष्टमय नही बना सकता.इसलिए कहते हैं आम लोगों के मुकाबले आध्यात्म से भरा व्यक्ति अधिक सजग होना चाहिए. उसके अंदर प्रकृति को लेकर निस्वार्थ प्रेम होना चाहिए.एक अध्यात्मिक व्यक्ति प्रकृति का सेवक होता है.उसे जीवनभर प्रकृति की रक्षा करनी चाहिए.
हम जब आध्यात्म की बात करते हैं तो हमे लगता है की आत्मा,शांति और ध्यान की बाते ही प्रयाप्त हैं.जबकि आध्यात्म इनसे बहुत आगे का विषय है.यह सबसे पहली ज़िम्मेदारी देता है की प्रकृति को बचाओ. जल,जमीन,जंगल की सेवा हर अध्यात्मिक व्यक्ति का कर्तव्य है.जबकि होता इसका उल्टा है,आध्यात्मिक व्यक्ति इनको छोडकर हर काम करता है.हमारे सारे मार्गदर्शक प्रकृति से ऐसे प्रेम करते थे जैसे वह ही ईश्वर हो,वह ही तो ईश्वर है.बीएस हमने इसे मानना छोड़ दिया.हमारे तमाम ऋषि मुनि विद्यार्थियों से पेड़ लगवाते,उसकी सेवा करवाते,उसकी पूजा करते.क्योंकि उन्हें पता था की इनके रहने से ही पृथ्वी पर जीवन है . हमने तमाम कामो को तो अपना लिया.उसको मानना ही धर्म समझने लगे,जबकि जो धर्म था वह भूल गए.
प्रकृति की सेवा करते हुए पृथ्वी की रक्षा करना ही तो धर्म था .अभी पलट कर अपनी आत्मा के अंदर झांकिए.आत्मा हमारी किस्से तृप्त होती है.शुद्ध जल से,शुद्ध हवा से और शुद्ध विचार से. विचार तो हमारे पास हैं मगर शुद्ध हवा और शुद्ध जल पर हमने अपने कर्मो से अशुद्धता की चादर उढ़ा रखी है.उठिए और यह चादर उतार फेंकिये. प्रकृति के सेवा कीजिय.इसका अनावश्यक दोहन मत कीजिये.पेड़ लगाइए.लगे हुए पेड़ को बचाइए.यह सामाजिक कार्य बाद में है,आध्यात्मिक पहले,क्योंकि प्रकृति के रहना ही तो आत्मा का रहना है. प्राकृतिक का खुबसूरत होना आत्मा के ऊपर उठने का संकेत है.लहलहाते जंगल,झरते झरने,साफ़ बहती नदियाँ संकेत हैं की यहाँ आध्यात्म है अन्यथा कुछ भी नही.