कोई मुसलमान भाई अगर परेशान हो तो हमें बताइये,इस ज़ुल्म की हुक़ूमत में भाई हम लोगों को मुत्तहिद रहना चाहिए,कोई तक़लीफ़ में हो तो बताइए,अल्लाह के शुक्र से हम इस क़ाबिल हैं कि उसकी मदद कर सकते हैं । एक।मुसलमान भाई हमसे कह रहे थे,उनकी बात में बड़ी अपनाइयत और क़ौम को लेकर संजीदगी के साथ फ़िक्रमन्दी भी शामिल थी ।हमने उनसे कहा ठीक है, बताते हैं आपको,कुछ लोगों को दरकार है ।
मेरे एक दोस्त हिन्दू भी हैं और वर्तमान राजनीति को स्वर्णयुग की तरह देखते हैं । इसे एक बहुत मज़बूत हुक़ूमत समझते हैं,बाहुबली टाइप मगर उन्हें भी हिन्दू भाइयों की बड़ी फिक्र रहती है । कहते हैं भाई आप तो जानते हैं किस मुश्किल से हम संगठित हुए है । यदि एक न हुए होते तो बिखर जाते । बेचारे भंडारे वगैरह चलाते रहते हैं, एक दिन कहें कोरोनाकाल में की भाई आप तो इतने समाजसेवी हैं, यदि कोई हिन्दू व्यक्ति कमज़ोर और परेशान दिखे,मदद की आवश्यकता हो तो किसी से मत कहिए, सीधे हमें बताइये,हमने भी उनसे हामी भर दी ।
अब देखिए,जो ऊपर मुसलमान भाई की फिक्र में दुबले हुए जा रहे थे,हमने उनसे उनके सगे भाई की मदद करने को कहा,उनका सगा भाई रोज़गर छूटने पर पैसों से कमज़ोर हो गया था,आप यकीन जानिए कौम की फिक्र में दुबलाते उस शख्स ने अपने सगे भाई की मदद नही की और हमें बहाने बनाकर चलता कर दिया ।
जो दूसरे थे,हिंदुओं के लिए उनका रक्त उछाल मार रहा था । उनसे उनके ही धर्म के एक पड़ोसी की मदद करने को कहा,तो पलटी मार गए, यही नही अपनी बहन की ससुराल में बीस किलों आटा देने में सारा धर्म का प्रेम सड़क पर आ गया क्योंकि बहन की ससुराल से उनकी बनती नही थी और पड़ोसी की खुशी उनसे बर्दाश्त नही होती थी ।
यह सच्चाई है, जो मज़हब/धर्म के नामपर झंडे लेकर चीखते चिल्लाते हैं, लोगों को डराते हैं, इकट्ठे करने की अपील करते हैं,इनमें से कोई भी अपने भाई,अपनी बहन,अपने रिश्तेदार,अपने पड़ोसी के काम नही आते,बल्कि उनसे जलते हैं, उनकी तरक्की से कुढ़ते हैं, जानते हैं क्यों,क्योंकि इनमें नफ़रत का बीज है, जो सबसे पहले अपनो को किनारे करता है, फिर समाज को बांटने चलता है । यह समाज को परिवार कभी बना ही नही सकते क्योंकि इनमें प्रेम कम और नफरत अधिक होती है ।
गाँधी का पूरा परिवार आश्रम में रह रहा था,नेहरू का पूरा परिवार आज़ादी की लड़ाई में शामिल था,भगत सिंह और सुभाष के घर के लोग संघर्ष के साथी थे,क्योंकि इनमें जोड़ने की सलाहियत थीं,जो भी मज़हब/धर्म के नामपर लोगों को बटोरेगा,वह सौ फीसद राजनीति ही कर रहा होगा । एक बार इनसे पूछो की तुम अपने भाई के कितना काम आए,क्या वह तुम्हारे धर्म का नही है ।।एक बार पूछो की पड़ोसी के घर कितनी मोहब्बत से गए हो,क्या वह तुम्हारे मज़हब का नही है ।
मैं तो हर धर्म/मज़हब के ठेकेदार को देखता हूँ,तो जानता हूँ कि यह शुद्ध राजनैतिक बहाना है लोगों को अपनी तरफ लाने का,एक भीड़ है, जो अपने दिमाग को गिरवी रख चुकी है, चली जाएगी इनकीं तरफ,बिना यह सोचे कि जो आज हमें इकट्ठे करके वोट करने को कह रहा है, वह मेरी तरक्की से चिढ़ेगा और जब कोई नही होगा,तो हमपर ही अपने ज़ुल्म को दोहराएगा । जाओ पूरी दुनिया देख लो,धर्म/मज़हब के नाम पर सत्ता पाए लोग अपने ही धर्म/मज़हब के लोगों का कितना खून पी रहे हैं, अगर यह तुम्हे आकर्षित करता है, तो तुम्हे तुम्हारी बर्बादी मुबारक,हम तो हमेशा हर तरह की कट्टरता के खिलाफ खड़े मिलेंगे, जब तक तुम्हारा कोई भाई हमें अपने धर्म/मज़हब को बचाने के नाम पर पीट पीट कर मार न डाले...
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