Tuesday, January 31, 2017

माँ सरस्वती

माँ शारदे,माँ वाग्देवी,माँ भारती, माँ वागीश्वरी।सब नामो से उत्तम और पहचाना हुआ नाम माँ सरस्वती।कला,ज्ञान की देवी।हम सबकी कलम की रूह।लफ्ज़ की रूह।सोचने समझने लिखने पढ़ने सबकी रोशनी हैं माँ सरस्वती।एक तस्वीर जो सफेद सारी और वीणा की दिमाग में इस मासूमियत से बैठी है।वह हमे लिखावट में पाकीज़गी का एहसास कराती है।
कितना दुःख पहुँचता होगा माँ सरस्वती को जब लोग खून खराबे,दिलों को बाँटने,नफरत फैलाने वाले अल्फ़ाज़ लिखते होंगे।जिस लिखे से इंसानियत रो दे सोचिये क्या गुज़रती होगी माँ सरस्वती पर।जब ज्ञान वाले जिस्मो को नोचने और घरो को जलाने की बाते करते होंगे तब ज्ञान की देवी कितना टूट जाती होगी।जब तुम अपनी कलम से किसी के खून की दास्तान लिखते होंगे तब माँ सरस्वती की सफेद सारी पर भी खून की छींटे आती होंगी।वो सौम्य और उज्जवल मुख वाली मेरी माँ तुमको देख कर मायूस हो जाती है।
मैंने देखा है जब तुम कालेज,यूनिवर्सिटी,स्कूल में नफरत के पाठ पढ़ा रहे होते हो तब वो सौम्य चेहरा सफ़ेद बर्फ सा हो जाता है।ज़रा भी इज़्ज़त है माँ सरस्वती की तो आओ आज से अभी से दिल जोड़ने वाला लिखे और पढ़ाए।नफरत की जगह मोहब्बत की बातों को आगे बढ़ाए।तुम देखना मै गवाह हूँ की माँ सरस्वती हमारी मोहब्बत की बातों से एक ऐसी मुस्कान बिखेरेंगी जिससे मानवता खिलखिला उठेगी।
ज्ञान को निर्माण में लगाओ विनाश में नहीं।माँ सरस्वती हम सब को खामोश देख रहीं हैं।बसन्त पंचमी की पीली सुबह अगर माँ सरस्वती की सफ़ेद छाँव में गुज़ारोगे तो सुकून मिलेगा।मोहब्बत से दूसरों को थामोगे तो ख़ुशी होगी।तुम्हारी क़लम,जिसमे माँ सरस्वती खुद उतर आती हैं उससे वोह लिखो जो माँ सरस्वती के दामन की खुशबू हो।वोह अल्फ़ाज़ बुनो जिसमे माँ सरस्वती झलकें।नफ़रत और फूट लिखकर किस माँ के करीब जाओगे।माँ सरस्वती हमारी लिखावट में रहें, इस प्रयत्न में जब लफ़्ज़ फूटेंगे तो उसकी खुशबू ज़माना महसूस करेगा।यही तो बसन्त की छटा है।

Sunday, January 29, 2017

गाँधी

अर्रे मुझसे छुप क्यों रहे हो,मेरे करीब आओ,मेरे पास बैठो।तुमने मुझे गोली मारी,मुझे ज़रा भी दुःख नही।तुम मुझसे नाराज़ थे,बहुत बार नाराज़गी में ऐसे कदम उठ जाते हैं।मुझे आज नही तो कल मरना ही था।आखिर कितना जीता मगर यक़ीन करो गोडसे मैं तुम्हारे काम से रत्ती भर नही नाराज़ हूँ।तुमने तो वोह किया जो तुमने अपने संगठन के बड़ो से सीखा।मुझे तुम्हारी फाँसी पर अफसोस है।जब तुमको मुझे मारने के जुर्म में फाँसी दी जा रही थी तब मैं तड़प रहा था।
मैं ठीक उस वक़्त चाह रहा था की काश मैं ज़िंदा होता और तुम्हे अपनी चादर में छुपा साबरमती आश्रम लिए जाता।मुझे पता है जब तुमने मुझपर गोली चलाई तो तुम मुझसे हद दर्जे नफ़रत करते थे।मगर गोडसे मैं फिर कह रहा हूँ की तुम्हारे साथ जो किया गया।जो मेरे ख़ून का बदला लिया गया।भले कानून का ही सहारा लिया गया हो फिर भी यह गाँधी का रास्ता नही था।तुम्हे पता है मुझे कब सबसे ज़्यादा तक़लीफ़ पहुँचती है जब कोई कहता है"गाँधी हम शर्मिंदा हैं-तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं"।सोचो यह नारा,किसी की मौत की कामना का नारा गाँधी को कितना शर्मिंदा करता है।
आओ मेरे पास आओ मैं तुम्हारे पाँव के काँटों को निकाल दूँ।तुम्हे जो तक़लीफ़ मुझे खत्म करने के बाद मिली,मेरी नज़र में नही मिलनी चाहिए थी।गोडसे अगर मुमकिन होता की मैं ज़िंदा हो सकता तो तुम मान लो मैं तुम्हारे हाथ से तमंचा लेकर चरखा पकड़ा देता।भले ही तुम फिर मुझे गोली मार देते।मैं फिर उठकर तुमसे कहता यह सारे लोग मेरे अपने हैं।तुम फिर चाहे गोली मार देते
गोडसे ने गाँधी जी से अपनी रोई हुई,भरी आँखों से कहा की क्या आपने मुझे माफ़ कर दिया।तब वोह बोले,हम नाराज़ ही कब थे।हाँ नाराज़गी तुम्हारी सोच से थी।तुम्हारे दिल में उठती नफ़रत से थी।किसी को अपना न समझने से नाराज़गी थी।अगर हो सके तो यहाँ से अपने लोगों के लिए प्रार्थना करो की वोह नफ़रत से दूर रहें।
आओ तुम्हे यहाँ हर उससे मिलवाता हूँ जिसे किसी न किसी ने अपनी सोच के खिलाफ चलते शहीद कर दिया है।देखो भगत सिंह भी तुमसे नाराज़ नही हैं।मान लो हम सबकी लड़ाई तुमसे या किसी इंसान से नही थी,हम तो नफ़रत वाली सोच के खिलाफ थे।इंसान को इंसान का गुलाम बनाने के खिलाफ थे।खैर छोड़ो और सुकून से यहाँ रहो।
गोडसे रोता हुआ उनके पाँव में झुका जैसे आजके ही दिन भीड़ के सामने वोह गाँधी के कदमों में झुका था।मगर जब सर उठाया तो उसकी आँखे रो रोकर लाल हो चुकी थीं और गाँधी उसके सर पर हाथ रखकर कह रहे थे,नफरत को जीत लो तो सुक़ून मिलेगा।तुम्हारी बेचैनी दूर होगी।उसने रोते हुए कहा"महात्मा गाँधी"

Saturday, January 28, 2017

सब मिटा दो

एक माला ले लो जिसमे सब दाने तुम्हारे अपने हों।वोह जिनके दिमाग में क़ौम का भूत सवार है और वोह जो अपनी पुरातन संस्कृति के नशे में सब कुछ खत्म कर देना चाहते हैं।तुम सब लोग अपने बच्चों के हाथों से विज्ञान की किताबे छीन लो,यह बाहरी लोगों की लिखी हुई हैं, क्या ज़रूरत है इन्हें पढ़ने की।
न्यूटन की जगह नेतराम को पढ़ो और आइंस्टीन की जगह अलाउद्दीन को पढ़ो।तुम दोनों लोग जाओ घरों में,लाइब्रेरियों में या जहाँ तक जा सकते हो अपने खुद के क़ौम और धर्म के सिवा जो लिखा गया है सब खत्म कर दो।उन सामानों में आग लगा दो जो दूसरों ने बनाई और तुम इस्तेमाल करते हो।
वोह दवाएँ, वोह इलाज,वोह चीज़ें जो तुम्हारे अपनों ने नही बनाया उससे आज तत्काल पीछा छुड़ा लो।अच्छा चलो यह नही हो पाएगा तुमसे।इसे करने का जिगरा उथले थिथले लोगों में नही होता है।तो ऐसा करो इतिहास भूगोल अर्थशास्त्र को खत्म कर दो।इनमे भी विदेशियों के बहुत से हिस्से हैं।
मैं तो कहता हूँ सब छोड़ो, चलो खुद लिखो,अपने झुँड के लोगों से कहो की चलो जो बीत गया सो बीत गया।अब हम लिखेंगे सब।उठो और लिख डालो हर वोह विषय जिसपर तुम्हे संशय है।यह यूँ रोज़ एक एक लाइन पर क्या बखिया उधेड़ना।चलो पूरा झुँड लगकर हर उस विषय को लिख डाले जिसे साजिशन किनारे किया गया।पूरी ज़िम्मेदारी से तुम दोनों से कह रहा हूँ की दुनिया के सबसे ज़्यादा सताए तो तुम ही मासूम मिसकीन लोग हो।तो चलो तुम दोनों धर्म और क़ौम के नए नए सिपाहियों लाठी से पहले कलम उठाओ।
किसी को गाली देने,मारने से अच्छा है जो सच है वोह लिख डालो और पढ़ाओ मगर यक़ीन करो उसे पूरा पूरा लिखना,कट और पेस्ट करोगे तो यह बीमारी फिर बनी रहेगी।मुझसे शिकायत करने मत आना इतिहास के पन्नों पर,जब कुछ गलत लिखे तो जाओ और लिखो।वोह लिखा हुआ छपवाओ और पढवाओ।मुझे कोई फ़र्क़ नही पड़ता की तुम अपनी नस्लों को क्या पढ़ाते हो और क्या बनाते हो।यहाँ बहस करने की जगह अपने छोटो को बैठकर शाखाएँ लगाओ या तबलीग करो मगर कुछ करो जिससे भरम खत्म हो।एक न एक दिन हमारे जैसे गलत पढ़ने और पढ़ाने वाले खत्म हो ही जाएँगे तब तक तुम्हारे बीज फसल बन चुकेंगे।जाओ और उनसे अधर्मियों की हर विषय की किताब छीनकर अपनी सुंदर,पवित्र सोच की परिभाषाए पकड़ाओ।

Friday, January 27, 2017

दिमाग में राख

किताबो को आग लगा दो क्योंकि तुम्हारे दिमागों में राख भरी हुई हूँ।तुम्हे अफ़साने और हक़ीक़त का फ़र्क जब नही दिखता तो वाक़ई ख़ुदा पर शक हो जाता है।आखिर ख़ुदा ने किस ठेके पर तुम्हे बनवाया की इतनी गड़बड़ रह गई।तुम्हारे दिमागों की जगह ठेकेदार ने राख भरकर ईश्वर को धोखा दिया है।
।जूझे तो हैरत हुई की अभी तक कोई मुस्लिम समाज से खड़ा क्यों नही हुआ की सवर्ण अकबर और सलीम ने पसमांदा अनारकली के साथ अन्याय किया।किसी संगठन ने मुगले आज़म फ़िल्म की कैसेट और पोस्टर क्यों नही जलाए की इसमें पसमांदा समाज की अनारकली के साथ सलीम के सम्बंध गलत तरीके से दिखाए गए।
मूढ़ों तुम्हे क्या पता अब्दुल हलीम शरर ने अनारकली का किरदार गढ़ कर एक अफ़साना लिखा और तुम उसे अकबर के खानदान में सच की नज़र से देखने लगे।कभी किताब को पढ़ने की हैसियत से खोला होता तो पता चलता की एक लेखक जब अपने किरदार गढ़ता है तो उसमे कितनी खूबसूरती से कल्पना को सच का लिबास पहनाकर सामने रखता है जिसमे कमअक्ल लोग सच के धोके में लिपट जाते हैं।
इक दौर में मौलाना दाऊद ने चंदायन को लिख एक रौशनी दी क्या यह किसी ख्वाब से कम है।चंदायन के लफ़्ज़ की खाल अब उधेड़ो।प्रेमवन जीव निरंजन को जब शेख रिज़्कुल्लाह मुस्तकी ने लिखा तब क्या दौर रहा होगा।कोई ने उनसे खींचकर सवाल क्यों नही किये।बनने के उस दौर में सपनावती, मुग्धावती, मृगावती,मधुमालती,प्रेमवती जैसी मोहब्बत की दास्तान उकेरी गई।उस्मान,शेख नबी,कासिम शाह,नूर मुहम्मद,जान कवि,शेख निसार,शाह नजफ़ अली,ख्वाजा अहमद,शेख रहीम,कवि नासिर,अमीर खुसरु,मालिक मोहम्मद जायसी यह वह नाम हैं जिन्होंने हिन्दुस्तान की रूह को छुआ।जायसी ने तो पदमावत, अखरावट,आखिरी कलाम, महरी बाईसी यानि कहर नामा,चित्रलेखा,मस्लानामा,कन्हावत जैसी रचना करके एक शिखर बना डाला।
वही पद्मावत जिसे कल से इश्क़ ए हक़ीक़ी समझ बौराए घूम रहे हो।जाओ और जायसी को कब्र से निकालकर आग लगा दो।हम तो कहते हैं ऊपर लिखे हर नाम को ढूंढो और चौराहों पर आग लगा दो।हर उसको खत्म कर दो जिसने अपने अफसानों,कविताओं में किसी दूसरे धर्म,जाति समुदाय के नाम डाले हैं।अब्दुल हलीम शरर को अनारकली के साथ अन्याय करने के लिए पसमांदा समाज जाए और उनकी रूह के टुकड़े टुकड़े कर दे।एक काम और कर दो सब लेखकों से कह दो नाम की जगह अ ब स द इस्तेमाल किया करें न जाने कब किसकी भावनाएँ आहत हो जाए।भावनाए न होगी फूफा जी हो गई।
एक और सच जान लो तुम उठो और कव्वे गिलहरी और टपका का डर टाइप कहानियां ही पढ़ो।बहुत से बहुत सरस सलिल में राल टपकाओ।जायसी,शरर,कबीर,खुसरु समझ तो आएँगे नही तब भावनाएँ ही आहत होंगी।

Thursday, January 26, 2017

किताब

जब तुम किताबों के साथ डेट करना तो उसके गले में हाथ डालना और सुकून से किसी पेड़ की टेक लगाकर उसे सिर्फ देखते रहना।किताब तुम्हे देखकर मुस्कुराएगी।हो सकता है वोह अपने खानदान का ज़िक्र करे,कहे की वोह प्रेमचन्द की लिखी है या ग़ालिब की या मंटो की या कुर्रतुल की या इस्मत की या अमृता की या साहिर की या महादेवी की या राहुल की या मोहन की या भारती की या मिल्टन की या पाउलो की या गोर्की की लिखी है।हो सकता है वोह इन बड़े खानदानों का रौब तुम पर झाड़े तो एक बार उसे बन्द कर देना।
बड़े खानदान की एक कमज़ोरी होती है की पहली बार में वोह फ़ालतू की अकड़ लिए रहता है जैसे ही तुम उस पर से तवज्जो हटाते हो वोह बिलकुल झिझक जाता है।फिर जब तुम उसे दोबारा देखते हो तो वोह अपनी खानदानी मोहब्बत के पुरखुलूस अंदाज़ से तुम्हारे अंदर उतर जाता है।इसलिए जैसे ही तुम उस किताब को दोबारा उठाओगे वोह तुम्हे लपक कर चूम लेगी।
जब तुम पेड़ की आड़ में बैठे किताब के काले बाल पलट रहे होगे तो हो सकता है लोग तुम्हे झाँक झाँक कर देखें।यह तो इंसानी खासियत है जो मेरे पास नही वोह तुम्हारे पास कैसे,इसलिए वोह तुम्हे देखते रहेंगे।तुम जैसे जैसे उस किताब के बालों से खेलते हुए उसकी आँख में उतरने लगोगे।तुम अपने आस पास से अकेले होते चले जाओगे।अब तुम किताब के अंदर उतरने लगे हो ऐसे में बाहर क्या हो रहा किसे पता।जो किताब डेट पर तुम्हारे साथ गई है।वोह अगर तुम्हे शोर से काटकर अपने सुरों में गूँथ ले यक़ीनन वोह रिश्ता आसमानी है।
किताब के वरखों पर जब तुम उंगलिया हौले हौले फेरतो हो तो किताब को हम सिमटते हुए देखते हैं।जब तुम उसके हर्फ़ को आँखों में बसा लेते हो तो उसका सुरूर तुम्हारे चेहरे पर साफ़ दिखता है।जब डेट पर तुम्हारे बीच के पन्नों पर सर रखकर मैं लेटा होता हूँ तो माँ की एक बात बहुत याद आती है"किताबे इंसान की सबसे अच्छी दोस्त होती हैं"। तब माँ ने दोस्त कहा था आज इस उम्र में वोह दोस्त मोहब्बत में बदल गयी।"किताब इंसान की सबसे खूबसूरत मोहब्बत है।"

Tuesday, January 24, 2017

26 जनवरी

हो सके तो इसे ज़रूर पढ़ें।आज जो लिख रहें हैं यह मेरा लिखा नही है।यह वोह है जो मुझे मेरे देश से मोहब्बत करवाता है।यह वोह है जो दूसरी ज़मीन के टुकड़ो में नही है।इसकी खासियत है की इन लफ़्ज़ों ने इस माटी की सौंधी खुशबू को बरकरार रखा है।जितने भी इस माटी को नुकसान पहुँचाने वाले लोग हैं वोह किसी न किसी बहाने इसकी आत्मा में कमी निकालते हैं।चोट पहुँचाते हैं।
जो अला फलां चीजों को पढ़ाने और याद करने की बहस करते हैं वोह कभी क्यों नही कहते की देश की सर्वमान्य किताब के पहले पेज को क्यों न याद किया जाए।क्यों न स्कूलों में पढ़ाने को अनिवार्य कर दिया जाए।

कल हम सुबह अपने खूबसूरत तिरँगे के सामने इस प्रियम्बल को पढ़ेंगे और अपनाएंगे।किसी भी चीज़ से ज़्यादा यह ज़रूरी है और इसका प्रसार भी ज़रूरी है।क्योंकि यह पहला पेज ही आपके देशप्रेम की कसौटी है।जिन्हें इन अल्फ़ाज़ों से किसी न किसी तरह दिक्कत है यक़ीनन उनकी मुल्क़ से मोहब्बत में शक है।
कल इसे ज़ोर ज़ोर पढ़ियेगा ताकि फ़र्ज़ी देशभक्तो के कानों तक देश के संविधान की प्रस्तावना पहुँच जाए,जिसपर वोह नज़र भी नही डालते।हमारा संविधान हमे पूर्ण बनाता है।गणतन्त्र दिवस की आत्मा पहले पन्ने के इन सुनहरे अल्फाज़ो में है।

"WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved to constitute India into a SOVEREIGN, SOCIALIST, SECULAR ,DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens:
JUSTICE, social, economic and political;

LIBERTY of thought , expression, belief, faith and worship;

EQUALITY of status and of opportunity; and to promote among them all

FRATERNITY assuring the dignity of the individual and the unity and integrity of the Nation;

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this twenty-sixth day of November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION"

"हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा
उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए
दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा
इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"

Monday, January 23, 2017

आशिक़ी बारहवीं

ठोकरों के अब्बा को खाने के बाद भी फिर बहुत तेज़ से प्यार लगा था।यह बारहवें इश्क़ का हैज़ा था।जब तुम आई तब यह कहना मुश्किल है की हमने तुम्हारी तरफ पलट कर नही देखा था।बड़ी आम सी आँखों में तुमने ग्राफ स्टाइल का काजल लगाया हुआ था।इस काजल से आँखे ज़रूरत से ज़्यादा बड़ी लग रही थीं तो एक बार देखना तो बनता था।मगर आज सच बताऊँ मैंने जब तुम्हे देखा था तो बिलकुल अंदाज़ा नहीं था की कोई बड़ी मुसीबत नाज़िल होने वाली है।
तुम इस क़दर पढ़ाकू थी यह तो बात में अंदाज़ा हुआ।मैं चुपके से तुम्हारी सीट पर सरक आया था की चलो फिज़िक्स की डेरीवेशन से अच्छा तुम्हारी आँखों में डूब जाऊँ।मगर तुम कितनी बेहिस थीं।तुम ब्लैकबोर्ड देखती रहीं और मैं तुम्हारी आँखों में घिसती हुई चॉक देखता रहा।यही मौसम था,याद हैं न जब तुम कॉलेज के गेट से ही चीख़ती आ रही थीं।
मुझे लगा आज तो तुम कुछ कह ही दोगी मगर नही आते ही तुमने न्यूटन का थर्ड ला पूछ लिया।कमबख्त न्यूटन,आइंस्टीन ने गुलाबी मौसम की बैंड बजा रखी थी।तुमने भी कोई कसर नही छोड़ी की किसी बहाने हम पढ़ लें मगर अपने आप से किये वादे पर मैं बिल्कुल नही पलटा, वही वादा की पढ़ेंगे-घण्टा।
लेकिन तुम भी यार इतना पढ़ीस कैसे थीं।जब मैंने कहा था की तुम्हारी माँ की डिलिवरी क्या कैमेस्ट्री की लैब में हुई थी क्या तब तुमने कहा था नही फिज़िक्स की लैब में।तुम्हारी माँ की प्रोफ़ेसरी हमारी मोहब्बत में बार बार आड़े आ रही थी तुम्हे हीलियम,एल्युमिनियम याद करना था और हमे तुममे शरबती आँखे ढूंढनी थीं।
किस क़दर फासले का प्यार था।यह सच था की यह मोहब्बत दूर तक जाती अगर तुम इम्तिहान में हमसे दूर न बैठती।जब पहली बार मुझे तुमसे ज़्यादा तुम्हारी पढ़ाई की ज़रूरत थीं तब कमबख्त तुम इतने छोटे दिल की निकलीं की एक भी आंसर नही बताया।हद तो तब हो गई जब ई इज़िकलटू एम सी स्क्वायर का स्क्वायर तक नही बताया और हम इ की एम सी करके आ गए।
रिज़ल्ट के बाद जब तुम सफेद कपड़ों में ज़बरदस्त परफ्यूम लगाकर,किताबों को कहीं पीछे छोड़कर,आँखों को ठंडे पानी से धोकर,होंटो पर फूल सी मुस्कान रखकर आई और आते ही कहा,डियर कैसे हो और मैंने कहा चलो निकल लो आइंस्टीन के पास,यहाँ पोलर बियर की ज़रूरत नही।तुमसे बेहतर हिलरी हैरिसन की केमिस्ट्री की बुक है।निकल लो।दफ़ा हो जाओ अब मुझे पढ़ना है।

Sunday, January 22, 2017

नेता जी

लोग मर रहे थे।पूरा शहर हैजा की चपेट में था।कहीं बच्चे की लाश पर माँ तड़प रही थी तो कहीं औरते सुहाग की चूड़िया तोड़ रही थीं।कहीं बीवी को खोने के ग़म में कोई आदमी छुपकर फफक कर रो रहा था।शहर का मशहूर बदमाश हैदर खान का भी परिवार हैज़ा की गिरफ्त में था।हैदर खान खूँखार था मगर हैज़ा के आगे एक न चली।सबका ख़ून एक झटके में बहा देने वाला अपने परिवार को हैज़ा के सामने बेबस देख रहा था।
तभी नौजवानो का एक दल आता है।जिसका नेतृत्व एक खूबसूरत नौजवान कर रहा है।वोह हैदर खान के घर में फैली गन्दगी को साफ़ करने लगते हैं।यह दल पूरे शहर में सफ़ाई अभियान चलाकर हैज़ा से निपट रहे थे।हैदर खान दरी पर पड़ा पड़ा लड़को को सफ़ाई करते हुए देखता है।जब सफ़ाई हो जाती है तो लड़को से वोह पूछता है तुम हमें जानते हो।मैं एक खूँखार बदमाश हूँ।मेरी चौखट पर डर के मारे लोग नही आते।मुझसे कोई मिलना पसन्द नही करता।
तब दल का नौजवान लीडर कहता है ए हैदर खान हमें पता है तुम क्या हो।तुम इतनी ताक़त के बावजूद हैज़ा के आगे बेबस हो।मेरे लिए तुम्हारी तक़लीफ़ दूर करना ज़रूरी है।हम सब शहर की सफ़ाई करके हैज़ा से लड़ रहे हैं।तुम्हारे घर में इतनी गन्दगी थी की उसे तो साफ़ करना ही था।तब हैदर खान कहता है तुमको क्या लगता है की तुमने मेरा घर साफ़ किया है।तुमने तो मेरा मन साफ़ किया है और यह कहता हुआ हैदर खान उस नौजवान केगले लग कर रोने लगा।साथ ही बदमाशी छोड़ समाज के लिए लग गया।
अब सुनिए यह नौजवान कौन था।आज़ाद हिन्द फ़ौज़ को गढ़ने वाले,गाँधी को सबसे पहले राष्ट्रपिता कहने वाले,देश के सबसे ज़्यादा दिलों पर राज करने वाले नेता जी सुभाष चन्द्र बोस।उनके शौर्य और संगठन और क़ाबलियत को लेकर बहुत से किस्से याद हैं।मगर आज उनकी पैदाइश के दिन उस शुरआत को बताना ज़रूरी था जो एक लीडर को गढ़ता है।
सुभाष को मानने वाले सुभाष की ज़िन्दगी से सीख आगे बढ़ते हैं।सुभाष के विचार और मार्ग को खत्म करने वाले उनको गाँधी,कांग्रेस और दूसरे विवादों में उलझाते हैं।वोह सुभाष की ज़िन्दगी के खूबसूरत पलो पर बात नही करेंगे।उनकी दिल जोड़ने की कोशिश को नही समझेंगे।उनके भारत के हर नागरिक और धर्म के प्रति मोहब्बत को नही बताएँगे।यह तोड़ने वाले लोग नेता जी के जीवन से सिर्फ विवाद ही खोजकर लाते हैं।उन नफ़रत फैलाने वालों को अपना काम करने दें।आप नेताजी के जन्मदिन पर उनकी ज़िन्दगी के बड़े कदमो,त्याग,प्रेम,सेवा,राष्ट्र प्रेम,समर्पण,संगठन क्षमता के किस्सों को आम कीजिये।

Saturday, January 21, 2017

रोशन सिंह

"ज़िंदगी जिंदा-दिली को जान, ऐ रोशन
वरना कितने ही यहाँ रोज़ फ़ना होते हैं"
इलाहबाद की नैनी जेल से जब यह शेर बाहर आया तब इसके पीछे पीछे एक जनाज़ा भी बाहर आया।उस जनाज़े को उठाने के लिए जेल के बाहर एक क़तार लगी हुई थी।लोग एक झलक अपने महबूब दोस्त को देखना चाह रहे थे।औरतें,बच्चे आदमी सब इंतज़ार कर रहे थे उस नौजवान को देखने के लिए।
जेल में इस नौजवान ने फाँसी के फंदे को खूबसूरती से चूमा था।अपनी आखरी काल कोठी को सिर्फ इसलिए प्रणाम किया की ईश्वर की दी हुई यह आखरी छत थी।अब वोह सीधे उस ईश्वर से पूछेगा की हमे तो आज़ाद कर दिया मेरी माटी को कब गुलामो से आज़ाद करोगे।शायद ईश्वर उसकी आँखों में आँखे डालकर कह दें,बस अब,आजही।
शाहजहाँपुर के इस नौजवान का नाम रोशन सिंह है।जिन्होंने आज ही जन्म लिया था।जो गाँधी के आह्वाहन पर घर बार छोड़ आंदोलन में कूद गए।भगत सिंह और दूसरे साथियों के सम्पर्क में रहकर आज़ादी के ताने बाने बुने।आखरी में गिरफ्तारी के बाद क्राँति की सबसे खूबसूरत चौखट फाँसी तक पहुँचे।इकलौता ऐसा क्रन्तिकारी जो बेहद धार्मिक होते हुए बेहद मोहब्बत से दूसरे मज़हब की खुशबू बिखेरता रहा।यह नौजवान जेल में गीता का पाठ करते हुए हर एक को मोहब्बत और भाईचारे से जोड़ने का नुस्खा बाटता रहा।
आज आप सबको ठाकुर रोशन सिंह को पढ़ना होगा।यह आज़ादी गाँधी की मज़बूत पकड़ और रोशन सिंह जैसे क्रांतिकारियों की फाँसी से उपजे बीज का परिणाम है।देखिये इन लोगों ने कैसे समाज को एक एक करके जोड़ा था।यह भी देखिये इनके दिलों में कौन सा धर्म था,जो आपके दिलों से दूर हो रहा है।वोह कौन से लोग थे जो गीता को आत्मसात करके बाइबिल और कुरान वालों को एक कर रहे थे।
अभी कह रहे हैं ढूंढिये,उन किरदारों को पढ़िए,तभी रास्ता दिखेगा वरना भरम में जीये।ठाकुर रोशन सिंह की शहादत पर सर झुक जाता है।आज आपका जन्मदिन है, सलाम की आप थे।आपके होने की वजह से आज हम हैं।कल भी रोशन सिंह रौशनी दिखाएंगे।

Friday, January 20, 2017

कट्टरपन मुबारक

यह एक आज़माया हुआ सच है।जिस ज़मीन के हिस्से को तहस नहस करना हो वहाँ किसी कट्टरपंथी को सत्ता सौंप दो।वोह खुद उपजाऊ ज़मीन को बंजर बनाकर छोड़ेगा।यक़ीन न हो तो पड़ोस के मुल्क़ से शुरू करो और जहाँ तक देख सकते हो उसके बाद भी देखते जाओ,हर तरफ रेगिस्तान में इंसानियत का ख़ून मिला दिखेगा।यह वोह ज़मीने थी जो कभी सबको साथ लेकर चलती थीं।आज खुद में सिमटी हुई लड़ रही है।
जब अमेरिका अंधाधुंध बम बरसा रहा था तब सबके दिलों में था इसका खात्मा कैसे होगा।जब इराक़ की ज़मीन से मासूम बच्चों के टुकड़े उड़ उड़ हवा में गिर रहे थे तब कौन सा दिल अमरीका के गुरूर को तोड़ने को नही सोच रहा था।
क़ुदरत का निज़ाम देखिये।जिस नियम से उसने अरब की मगरूरियत को तोड़ा ठीक वही नियम अमरीका पर लाद दिया।कट्टर शासकों ने अरब की ज़मीन की खुशबू मिटाई थी।आज वैसे ही कट्टर को अमरीका का तख्त सौंप दिया गया है।जिस जिस देश में कट्टर शासक शीर्ष पर है एक नज़र उसकी अवाम को देख लें,ख़ून के आँसू रो रही है।

हम भी सोचते थे कभी की अमरीका को कौन हराएगा,अब नज़र से धुंध हट गई।तस्वीर साफ़ दिखने लग गई।अमरीका का गुरूर तोड़ने और उसकी बची कुची खासियत को खत्म करने के लिए क़ुदरत ने उसे कट्टर शासक दे दिया।
यक़ीन न हो तो इतिहास उठाकर देखना रोम,जार,शुंग,मुगलिया सल्तनत से जहाँ तक इतिहास पढ़े हो,पलट कर दोबारा पढ़ना देखना जब जब यह कट्टरता की तरफ बढ़े हैं, तब तब सल्तनत डूबी ही हैं।वैसे एक इत्मिनान है इसके बाद निकलने वाला सूरज ज़्यादा तेज़ चमकेगा।
तारीख नोट कर लेना।हर कट्टर शासक के आने की तारीख और जाने की तारीख।देखना उन सालों में उसने कितने सेल्फ गोल किये हैं।यह भी देखना उसकी ज़बान और पैरों में कितना फ़र्क़ है।दिमाग को मत देखना,उसमे सिवाए नफ़रत के और क्या मिलेगा।अगर अपने इर्द गिर्द भी ऐसे कैरेक्टर नही दिख रहे हैं, तो क्या,इंतज़ार कीजिये कोहरे में परेशानी नज़दीक़ आने पर ही दिखती है।कोहरा छटने का इंतज़ार कीजिये।