Wednesday, May 31, 2017

हरबर्ट मारक्यूज़ की क्राँति

हरबर्ट मारक्यूज़ क्राँति को लेकर बहुत कुछ लिख चुके हैं।जनता से असन्तोष को भी शब्द दे चुके मगर उन्हें लगता है कोई भी अन्याय के खिलाफ केवल युवाओं द्वारा ही अब बदलाव हो सकता है।मुझे नही लगता मारक्यूज़ ने साठ के दशक में सारी ज़िम्मेदारी क्यों युवाओं पर डालकर बड़ी आबादी को सरका दिया।अमेरिका को ध्यान में रखकर हो सकता है उनकी"वन डाइमेंशिनल मैन" बहुत हद तक खरी उतरे।वोह ऐसे युवाओं को देख रहे थे जो धर्म,जाति के विरुद्ध अपने भविष्य के लिए सामूहिक रूप से क्राँति करेंगे,जो कोई दूसरा वर्ग नही कर सकता।

खैर मारक्यूज़ की हमारे आँगन में ज़रूरत ही क्या है।हमारे युवा बहुत समझदार हैं।उसे नौकरी,भविष्य से क्या लेना देना।नौकरी वादों में निकलती है और अखबारों में भर जाती है।भविष्य तो जब तोता बता दे तो काहे की मेहनत।मुझे यह क्राँति शब्द ही खटकने लगा है।बेचारे कितने युवा इस क्राँति की बाट जोहते जोहते शून्य हो गए।

मैं कहता हूँ कोई भी चीज़ के प्रति तब तक असन्तोष नही पनप सकता जब तक केवल दो वर्ग सीधे न रह जाए।उच्च वर्ग की सत्ता के विरुद्ध निम्न वर्ग खड़ा होता आया है मगर हमने इससे निपटने के लिए एक बहुत बड़ी ढाल बना रखी है।उसे कहते हैं मध्यम वर्ग।यह वर्ग हर तरह के असन्तोष और खुशहाली को सोखकर बढ़ता ही जा रहा है।भारत में तब तक अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध कोई नही लड़ सकता जब तक यह वर्ग है।छोटी छोटी क्राँति को बड़ी क्राँति को कहा नही जा सकता।

हाँ तो बात कर रहे थे युवाओं की,देखिये बहक गए,जैसे युवा बहक जाते हैं।ऐसा नही है की युवा किसी काम के नही।इधर पिछले दिनों जितना कुछ हुआ है उसमे युवाओं का बड़ा हाथ है।हर दँगे को उठाकर देख लीजिये,युवा ही तो जोश से लबरेज़ दिखेगा।ट्रॉलिंग में भी तो युवा ही है।मारक्यूज़ कहते हैं युवा क्राँति करेंगे,वैज्ञानिक सोच के लिए,हम कहते हैं आजकल धार्मिक सोच से निपटने के बाद मौका मिल जाए तो डार्विन,न्यूटन को भी देख लेंगे।मारक्यूज़ खुद सर पीट लेते या अपनी किताब के पन्ने फाड़कर नाव बनाकर पानी में चलाते अगर एक बार यहाँ झाँक लेते।
यहाँ हर धर्म का युवा धर्म की ध्वजा लिए उसी को गुड़ और राब बनाने में लगा है।हाँ कभी कभी जोश मारता है जैसे निर्भया केस में मारा था।इण्डिया अगेंस्ट करप्शन में जोश में था।मगर इतना समझ लो जब कोई आंदोलन फैशन बनेगा तभी हमारा युवा बाहर निकलेगा।

रोज़गार गिर रहा है, काहे की चिंता।अपराध बढ़ रहे हैं, तो क्या करें।बच्चियों के बलात्कार हो रहें,तो क्या अब रोज़ रोज़ निर्भया जैसे निकलें।अब नही निकलेंगे।सुक़ून की रोटी खाने दो क्राँति कपूर।खैर मारक्यूज़ को पढ़कर लगा की इनकी क्राँति तो न हो पाएगी।बल्कि यह होते तो इनके हाथ काटने की क्राँति बड़ी आसानी से हो जाती।हमारे युवा तलवार चलाने में बड़े माहिर हैं मिस्टर मारक्यूज़।बराबर से हाथ की पाँच उँगलियों को तीन और दो में बाँटना जानते हैं।

वैसे इतना भी बुरा नही है।हमारे बहुत से युवा बहुत बेहतर काम कर रहे हैं।बस सधे हुए तरीके से आगे बढ़ने के लिए खूब पढ़ लीजिये।ताकि जो चिराग लेकर चले हो वोह लाखों चिराग में बदल सके।यह अकेले अकेले नायकत्व को बड़ी आसानी से खत्म किया जा सकता है।मारक्यूज़,फेनिन सब बैठे हैं, इंतज़ार में कब कोई उनकी सैकड़ों पेज की किताब से अपने सुनहरे भविष्य की चाभी ढूंढेगा।फुर्सत न हो तो हमारे पास आ जाओ,चाय पिलाओ,हम सब बता देंगे।कमबख्त चाय ने भी बड़ी क्रांतियों को घुलनशील बना दिया है।

Tuesday, May 30, 2017

सब्र रखो

आसमान ज़बरदस्त सुर्ख़ हो रहा था।सुर्खी कालेपन की हद तक बढ़ती ही जा रही थी।बहुत लोगों के इकट्ठे होने का एहसास हो रहा था।करीब से देखा तो एक बड़ी ग़मगीन महफ़िल जमा थी।दूर से उनके पाँव उनके ही आँसुओं से भीगे मालूम पड़ रहे की अचानक कोई सुर्ख़ लबादा ओढ़े हुए लम्बा सा क़द और मज़बूत बदन का साया दाख़िल हुआ, चेहरा ज़बरदस्त सूजा और आँखे महीनों की रोई मालूम पड़ती थी।ग़ौर से देखा तो गौतम बुद्ध थे।

पलके झुकाए सिसकते हुए सामने किसी से बात कर रहे "मै बेहद शर्मिंदा हूँ हमारे मानने वाले हमारी इज़्ज़त तार-तार कर रहे हैं, इंसान को इंसान से ऐसी नफ़रत की भूखे प्यासे समन्दर में भेड़ बकरियों की तरह निकाल दिया।मेरा दिल फट पड़ा देखकर।" सामने मुहम्मद साहब थे,बुद्ध को समझाते हुए बोले "एै बुद्ध मत रो, पता नहीं हमसे क्या कमी रह गई कि अपनी ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा भी इन्हें समझा न सके,आप ही अकेले नही हैं, मेरे मानने वाले जब किसी का भी ख़ून बहाते हैं तो लगता है जैसे मेरे दिल को पाँव रखकर मसल दिया हो।मेरी आँखे तड़प कर ख़ून के आँसू से तर हो जाती हैं।"

इतने में ईसा ने बात काटते हुए कहा "तुम दोनों को पता है राम भी बेहद मायूस हैं,उधर बैठे हैं सर झुकाए।बहुत कहा की अरे हम एक दूसरे को समझतें हैं।आइये हम तो मिल लें, तो राम शर्मिंदगी के में कह रहे थे की "मेरी पलके ही नही उठ रहीं।मैं कैसे बुद्ध और मोहम्मद के सामने खड़े होकर बात करूँगा।मेरा ह्रदय तो विशाल था मगर मेरे मानने वालों ने उसे इतना संकुचित कर दिया की उसमे अब मैं रह ही नही गया।आप सब तो फिर भी बच जा रहे,यहाँ तो मेरा नाम लेकर ही मेरी सीख को तार तार किया जा रहा है।"

ईसा सब तरफ होकर लौटे,हमारी महफ़िल में बैठे सभी यहाँ तक मूसा भी आज आपस में आँखे नहीं मिला पा रहे।गुरु नानक,महावीर,दाऊद सब अलग अलग बैठे हैं।उनके दिल है की तड़प कर एक दूसरे को गले लगा लें मगर क्या करें जब पाँव के नीचे अपनों को देखते हैं तो ठिठक जा रहें हैं।मै ख़ुद इस हद तक शर्मिंदा हूँ कि इस महफ़िल में बैठने कि ताकत नहीं जुटा पा रहा हूँ। कहाँ जाऊँ? ज़मीन हमारी हो न सकी, आसमान हमें रास न आया।वोह हमे ज़बानों से हाथ तक ही तो ला सके,दिल में नही उतार पाए।दिल ही तो हमारा घर था जहाँ से हम बेघर हैं।

तभी तेज़ रोशनी की चमक के साथ ज़बरदस्त आवाज़ आई"तुम लोग मायूस मत हो, तुमने जो सबक दिया वो मेरा सबक था, न मै मिट सकता हूँ , न मेरा सबक, मेरे बहुत से ख़िदमतग़ार अभी भी ज़मीन पर मौजूद हैं, वो ख़ुद मिट जाएंगे मगर इंसानियत का परचम बुलंद रखेंगे,मैं इन सेवको को इस धरती पर कभी खत्म नही होने दूँगा।लाख बुरे पर मेरा यह एक सेवक भारी होगा।वोह मिट जाएगा मगर तुम्हारे सबक से पीछे नही हटेगा।तुम देखना उसका ह्रदय तुम्हारे जितना ही विशाल होगा।जो सबकुछ बर्दाश्त करते हुए इस ज़मीन को सुंदर बनाने के लिए अंत तक लगा रहेगा।बस तुम सब्र रखो""

Monday, May 29, 2017

नौकर चाकर

घर के मुखिया की एक बड़ी कमज़ोरी है की वह जल्दी जल्दी अपने नौकर चाकर नही बदलते।उन्हें हद दर्जे लगाओ सा हो जाता है उनसे।दूधवाला जितना चाहे पानी मिलाए फिर भी उसे बदलना अच्छा नही लगता।अख़बार चाहे जितनी देर में लाए उससे शिकयत के सिवा कुछ नही।कामवाली चाहे जितने बर्तन तोड़े  मगर उसे बदलने को दिल नही करता।सफाईवाला चाहे हर चौथे दिन छुट्टी करे पर उसे बदलना ठीक नही लगता।यहाँ तक हम लोग सिलेंडर डिलीवर करने वाले से फ्रेंडली होकर चाहते हैं वही आए सिलेंडर देने।

इलेक्ट्रीशियन,प्लम्बर,पेंटर,सब्जीवाला,नाई हम सब अपने पुराने वाले ही इस्तेमाल करते हैं जो हमारे लिए किसी रिश्तेदार की तरह हो जाते हैं।बावर्ची तो ताउम्र साथ रहता है।ज़ायका चाहे अच्छा हो या बुरा वह एक नमक के साथ हम सबके लिए अपनी उम्र काट देता है।पता नही वह कौन सी साइकोलॉजी है जो नौकरों के साथ खड़ी हो जाती है।अक्सर घरों में शिकायते होती हैं नौकर चाकर को लेकर।उनको बदलने के फरमान भी होते हैं फिर भी मुखिया इन्हें अनसुना कर तमाम कमी पेशियों के बावजूद अपने पुराने कामवालो को नही बदलते।बदलना भी नही चाहिए।

एक आत्मिक रिश्ता सा हो जाता है उनसे।हमने तो बचपन से ही एक धोबी को देखा,वह प्रेस करते में जितने चाहे कपड़े जलाए उसे बदलने की कभी कोशिश नही की गई।हमारे बावर्ची तो हम सबको इस हद तक डॉट सकते थे जैसे बाबाजान हो।जो घर का ज़िम्मेदार होता है वह इनकी वफ़ादारी पर घर के किसी भी सदस्य के मुकाबले ज़्यादा भरोसा करता है।वैसे हो सके तो अपने पुराने लोगों पर एतबार कीजिये।उनकी गलतियों को थोड़ा नज़रअंदाज़ करिये।यह एक पूरा ज़माना होते हैं जो आपके साथ बड़े हो रहे होते हैं।

आपको ही देखकर यह अपने बच्चों के बढ़ने के ख्वाब संजो रहे होते हैं।यह अपनी कालोनियो,मोहल्लो में बिल्कुल आपका ही रूप धर कर अपनी ज़िन्दगी को संवार रहे होते हैं।आपसे सीखकर अपनी आने वाली जेनरेशन को तिनका तिनका संवार रहे होते हैं।इसीलिए कह रहे हैं इस खामोश सफ़र को मत रोकिये।गलतियों,कमियों के बावजूद एक ज़िम्मेदार की तरह इन्हें माफ़ कर अपने साथ रखिये।कोई भी नौकर हो,उसे पुराना होने दीजिये।इतना पुराना की नौकर से वोह एक मुँहबोले रिश्ते में बदल जाए।एक दिन इन्ही में से कोई पन्ना धाय बनकर आपके परिवार को शायद रौशनी दे जाए।अपने साथ इन्हें भी बूढ़ा होते देखिये।बुढ़ापे में यह ही आपके दिल के साथी होंगे।न यक़ीन होतो पुराने किसी नौकर को घर पर आने पर,अपने बाप दादाओं के किस्से चाव से सुनते हुए किसी बड़े को देख लो।क्या खूबसूरत मौका होता है।यादों की एक गिरह घर का मुखिया खोल रहा होता है तो दूसरी गिरह वोह नौकर।

यह लफ़्ज़ पुराने हैं मगर आज जब हमारे एक पुराने सेवक बफाती की याद हो आई,जब उनके बेटे ने एक एल्बम दिखाया जिसमे हम उनकी गोद में थे।उनका बेटा इंजीनियर और हम निठल्ले लेखक।वोह तस्वीर लिए खड़ा रहा और हम बफाती बाबा को याद करते रुहासे हो गए।एक साथ जहाँगीर, जहाँगीर की दुल्हन,झिमिया समेत सबकी यादें ताज़ा हो गईं।यह वोह थे जो कितने बहानो, किस्सों से हमे ज़्यादा रोटी खिला दिया करते थे।अब लगता है की कल को जब हम कहते हैं की हमारा घर चहकता था,उसकी चहकन,खिलखिलाहट यह ही थे।हम तो आजभी हैं मगर हमारी दीवारें सीलन मायूसी से भरी हमारे जाने का इंतज़ार कर रही हैं।यह सब हमारे आँगन में आखरी साँस तक रहे।घर के बड़े कहते हैं की चाहे सब छोड़ देना मगर इनको नही......

Sunday, May 28, 2017

माहवारी

एक बारह तेरह साल की लड़की की माँ मर गई।पूरे परिवार में वोह,उसका बाप और भाई ही रह गए।माँ जो सबकी ज़रूरत थी,उस परिवार पर पहाड़ की तरह यह दुर्घटना घटी।हर एक ग़म में था।सब तरफ सब लोग उस लड़की को लेकर ज़्यादा ग़मज़दा थे।सबकी एक ही फ़िक्र की यह लड़की अब अपनी ज़रूरते किसे बताएगी।यह लड़की आने वाले वक़्त में अकेले माँ के कैसे जियेगी।कोई कहता बेचारी अब अपनी खास ज़रूरते किसे बताएगी,बाप भाई को तो बताएगी नही।

मैं सोचता रहता की आखिर वोह क्या खास ज़रूरत है जो एक बेटी बाप से नही बता सकती।वोह आखिर ऐसा क्या है जो बहन भाई से नही कह सकती।दिमाग यूँहीं उलझा रहता की बेचारी लड़किया कुछ चीज़ें हर किसी से नही कह सकती।मुझे वाक़ई नही समझ आता था की यह सगे रिश्तों में किस बात का पर्दा।छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के बीच काम करके लम्बे अरसे बाद पता चला की लड़कियों की दिक्कत क्या है।मैं तो हैरत में था की आदिवासियों की लड़कियों से लेकर हमारे घर की लड़कियों तक सब एक जैसी हैं।वोह आपस में कहीं मेल नही खाती मगर इसपर तो सब एक जैसी हैं।

हमारी पढ़ी लिखी सोसायटी और उनकी कुछ हद तक अनपढ़ सोसायटी के पुरुष भी एक जैसे ही हैं।उनके पिता और हमारे पिता समान हैं।कोयले में झुखे उनके भाई ऐसी में बैठे हमारे भाइयों जैसे ही इन विचारों से बंधे हैं।बल्कि कई जगह तो वोह हम सबसे बेहतर खुले मिजाज़ के मिले।वोह नही चाहते की उनकी लड़कियों,औरतों की इन ज़रूरतों पर बात हो।यहाँ पर हर धर्म,जाति,सम्प्रदाय सब एक हैं।कोई नही चाहता की औरतों की माहवारी पर बात हो।उनके इन खास दिनों को तवज्जो दी जाए।

मैं माहवारी के मेडिकल या शरीर विज्ञानं पर नही जाऊँगा।बस इतनी सी बात की इस टैबू को हटाइये।एक लड़की अपने बाप से माहवारी के बारे में क्यों नही कह सकती।भाई से क्यों नही बतला सकती।सेनेटरी पैड को अपराध की तरह क्यों छुपाना पड़ता है।किसी के तक़लीफ़ के वक़्त साथ की ज़रूरत होती है नाकि दुत्कारने की।हम नही कहते की आप सोफ़े पर बैठकर इसपर दिनभर चर्चा कीजिये मगर इसे इतना हल्का कर दीजिये जैसे टूथपेस्ट का घर में आना और सबका ब्रश करना।हम इनकी चर्चा नही करते और हर एक रोज़ यूज़ करता है।ऐसे ही माहवारी और उसकी ज़रूरतों को ज़िन्दगी में दाखिल करदें।कल कोई उस लड़की की तरह यह न कहे की बेचारी अब किस्से कहेगी।हर भाई,बाप,बहन,सब एक जैसे हैं।इनमे एक जैसा पर्दा है।एक जैसा खुलापन।

खैर अगर किसी भी धर्म को अगर महिलाओं ने बनाया होता तो धर्म में भी इसकी व्यवस्था होती।पुरुष तो प्रतिबन्ध लगाता ही है।सभी धर्मो ने इन दिनों पर कुछ न कुछ बंदिशे लगा रखी हैं।हो सके तो इससे पार जाइये।कुछ न भी हो तो कम से कम इसपर मज़ाक मत उड़ाइए।खुसुर फुसुर मत कीजिये।अपनी आँखों को इस हद तक बेहयायी से मत खोलिए की आपकी बहन को भी नज़रे झुका लेनी पड़ें।सबके लिए एक ऐसा माहौल बनाइये की हर एक ख़ुशी और ग़म को बिना छुपाए ज़िंदा रह सके।और हाँ यह करके हम कोई एहसान नही कर रहे होंगे।पिछली गलतियों को सुधार भर रहे होंगे।
#noshame #वह_सुर्ख़_सात_दिन #speakup

Friday, May 26, 2017

नेहरू पुण्यतिथि

वैसे इसे मत पढ़िए तो बेहतर है।आपको बड़ी तक़लीफ़ होगी।एक ऐसे शख्स को याद करके जिसे आपने हमेशा गिरोह के पन्नों में पढ़ा।खैर,जब दो टुकड़ों में देश मिला।वोह इसका रोना नही रोए।रियासतो का झगड़ा मिला।वोह इसका रोना भी नही रोए।शुरुआत में ही महात्मा का साथ छूठा।वोह इस ज़बरदस्त झटके के बावजूद भी मायूस होकर नही बैठे।अपनो ने जी भर कोसा।इसपर भी रोना नही रोया।दुनिया ने शक से देखा।उन्होंने उफ़्फ़ तक नाकि।मज़हबी रँग से उनपर कीचड़ फेका गया।वोह इसपर भी पलट कर नही मुड़े।तमाम विचार वादियों ने उनमे अपने आप को नापाकर खूब आलोचना की।उन्होंने तब भी इनमे से किसी एक को भी देशद्रोही या अपने रास्ते का कांटा नही कहा।बहुतों ने उनकी जड़ो में दही डालने का काम किया,उन्होंने उन्हें भी साथ रखकर दुनिया के सामने लोकतन्त्र  और धर्मनिरपेछता की वह मिसाल रखी जिसे आज भी कोई तोड़ नही पाया।

17 साल देश के शीर्ष पद पर रहे मगर कभी अपने आलोचको को नही दबाया।अडिग अपने काम करते ही रहे।देश की हर उस चीज़ जिसपर तुम फ़ख्र कर सकते हो,उसकी बुनियाद रखी।देश की भुजाओं को जिसने हर दिशा में फैला दिया।जिसकी छाँव में सब धर्म,सब विचार फलते फूलते रहे,उन्होंने किसी को जबरन नही रोका,इसी आज़ादी का तो ख्वाब बुना था।वह आधुनिक तो थे ही मगर उनमे ज़बरदस्त आध्यात्म भी था जो आपको नही दिखेगा।उनकी ज़िन्दगी के तमाम रँग बिखरे पड़े हैं, हर एक अपने मतलब का रँग लिए मतवाला फिरता है।

आपने तो उन्हें कुछ खास किताबो से जाना जिसपर उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कभी रोक नही लगाई,जमकर अपनी आलोचना करने के मौके दिए।मैं मानता हूँ की गलतियां हुईं होंगी।निर्माण के मार्ग पर बहुत बार गलतियाँ होती हैं मगर इसका मतलब यह नही की वोह व्यक्ति पूरा गलत है।हो सकता है एक बेहतर मुल्क़ की तस्वीर बनाते में आपके धर्म को चोट पहुँची हो मगर उससे ज़्यादा ज़रूरी उन्होंने इसे एक किया।आज जो पाकिस्तान और आपमें फ़र्क है, जिसे आपको छोड़ पूरी दुनिया महसूस करती है।वह यह है की पाकिस्तान को नेहरू जैसा व्यक्तित्त्व नही मिला।वोह देश अस्थिर और असफल है।नेहरू ने हमे स्थिर किया और दिशा दी।

हाँ बात बात पर पहले पहले कहने वाले अगर देश के पहले प्रधानमंत्री को इज़्ज़त से याद कर लेंगे तो उनकी देशभक्ति कम नही पड़ जाएगी।मुझे भी लगता है जिसका कट्टर हिन्दू मुस्लिम विरोध करें,यानि वोह ही सही था।नेहरू में छिपी हर तरह की समझ को समझना मामूली बात नही है।नेहरू चन्द पन्नों के मोहताज नही।जो खुद मोटी मोटी किताबों को लिख गया हो उन्हें स्कूल के कोर्स के दो पेज से निकाल कर लोग अपनी ज़हनी कमज़ोरी और तंगनजरी के सिवा कुछ नहीं दिखाते।आज ही के रोज़ आपने एक कामयाब तारीख़ बना कर आखरी साँस ली थी।आज नेहरू की पुण्यतिथि है, हमे पता है उन्हें याद करने में बहुतों की साँस फूलने लगेगी।हर वोह व्यक्ति उन्हें याद करने में कतराएगा जो धर्म के तो करीब है मगर देश से दूर है।नेहरू जब तक हम हैं तब तक भले अकेले आपको याद करें,करते रहेंगे।मेरे देश के निर्माता आप ही हैं।कोई इसका चाहकर,जितना रूप बदलने की कोशिश करे,ज़र्रे ज़र्रे में पड़ी नेहरू की छाप को खत्म करने में उनके मुँह से ख़ून आ जाएगा,मगर वोह यह बिल्कुल भी मिटा नही पाएँगे।आज आपकी बहुत बहुत बहुत याद आती है पण्डित जवाहर लाल नेहरू।

Thursday, May 25, 2017

कुलसूम सयानी

17 साल की उम्र में जिसने मुल्क़ की आज़ादी के ख्वाब को अपनी आँखों में संजोया और सब कुछ छोड़ गाँधी जी के पाँव के पीछे अपने पाँव बढ़ा दिए।एक लड़की जिसके जज़्बे के आगे अंग्रेज़ों को तो झुकना था,लीगियों को भी झुक जाना पड़ा।उन्हें दोहरी लड़ाई लड़नी थी।एक अंग्रेज़ों को बाहर निकालने की दूसरी मुस्लिम लीग के पृथक्करण के विरुद्ध।गाँधी जी का इस तेज़ तर्रार महिला पर हाथ था तो इस महिला का का हाथ समाज की नब्ज़ पर था।अपने दम पर गुजरात में रहने वाली यह अंग्रेज़ों को तो धूल चटा ही गईं साथ आने वाले भारत की बुनयाद भी रख गईं।
यह वोह पहली महिला थीं जिसने गुजरात भर में घूम घूम कर स्कूल खोले,शिक्षा का प्रचार किया।लड़कियों की पढ़ाई पर इतना ज़ोर दिया की कांग्रेस के कार्यालयों में क्लास चलने लगी।जब आज़ादी के वक़्त मुस्लिम लीग ने लोगों को भड़काने का काम किया तो इन्होंने शिक्षा का ऐसा आंदोलन खड़ा कर दिया की उसके सामने सब बौने हो गए।आज़ादी की इस महत्वपूर्ण साथी ने देश आज़ाद होने पर कुछ भी नही लिया।ख़ामोशी से तालीम के छोटे छोटे चिराग जलाती हुई चली गईं।हममे से किसी को उन्हें याद करने की भी फुर्सत नही।हमारे मुल्क़ के ढाँचे में ऐसे लाखों चेहरे दफ़न हो गए,जिन्हें शायद हमे याद रखना था।
"जन जागरण" यह कॉंग्रेस के अभियान को इन्होंने ही सबसे सफल बनाया।जब सब तरफ मायूसी थी।तब "रहबर" नाम से एक प्रौढ़ शिक्षा का अभियान चलाया जो बेहद सफल हुआ।उस दौर में उनके इतना प्रौढ़ शिक्षा पर किसी ने काम नही किया।दसयों किताबें लिखी मगर अब वोह ज़िक्र से ही बाहर हैं।
यह महिला हैं कुलसूम सयानी।आज उनकी पुण्यतिथि है।हो सके तो मुल्क़ की नीव रखने वाले हर हाथ को ढूंढकर महसूस कीजिये।वैसे लोग कुलसूम आपा को भले ही न जानते हों मगर उनके बेटे मशहूर रेडियो की आवाज़ अमीन सयानी को ज़्यादातर जानते ही होंगे।उनसे पहले ताउम्र जूझने वाली कुलसूम सयानी को याद कर लीजिये।नीचे तस्वीर में कुलसूम आपा अपने फ्रीडम फाईटर पति के साथ हैं और जो लड़का है वोह है अमीन सयानी।।।।

Wednesday, May 24, 2017

सच कितना सच

बहुत लोग एक ज़बान में कह देते हैं सच बोला करो।हमेशा सच बोलो।बात अच्छी भी लगती है।सच कहना ही चाहिए मगर कौन  सा सच।सम्पूर्ण सच या केवल सच।बड़ी अजीब बात है न।बहुत बार जब हम सच बोलने चलते हैं तो हमारा ही सच बाहर नही आता है, हमारे साथ जुड़े बहुतों का सच बाहर आ जाता है।

कल एक फ़्रांसिसी बच्चे की कहानी पढ़ रहे थे।जिसको उसका बाप पीट रहा था की सच बोला करो,उसने कुछ झूठ बोला था।वोह रो रहा था,पूरा घर उसके पीछे सच बोलने पर अड़ा था।वोह बच्चा रोते हुए अपनी एक डायरी लाता है और कहता है यह लीजिये।इसमें मेरा पूरा सच लिखा है।इसमें लिखा है की कैसे अंकल पिंटो ने मेरे मुँह में खींचकर अपना मोटा भारी लिंग डाला था।मेरी साँस रुक गई थी पापा।मैं चीखता रहा मगर क्या मैं यह सच कह सकता हूँ।वोह तो पॉलिटिशियन हैं।पापा आपने कैसे दादी से छुपाकर मुझे दो अण्डे खिलाए थे,वोह भी लिखा है।इसमें बहुत कुछ है जो मैं सच सच बाहर कहूँ तो बहुत कुछ बदल जाएगा।वह लड़का फिर मार खाता है की दफ़ा हो जाओ अपनी मनहूस डायरी लेकर।लड़का बुदबुदाता हुआ जाता है, यही सच है की सच उतनी देर अच्छा लगता है जितनी देर वोह छोटी मोटी गलतियों तक सिमित होता है।सच सुविधा के हिसाब से चलता है।

खैर कहानी लम्बी थी मगर मैं सोचने लगा की क्या वाक़ई एक इंसान का सच,दूसरे इंसान के कपड़े उतार सकता है।और अगर ऐसा है तो क्या यह सच बोला जाना चाहिए।मैं ठिठक गया की अगर कोई तवायफ अपनी चौखट पर खड़ी होकर सच बोलने लगे तो कितने घरों में दरार आ जाए।मदरसों,मठो,संघो के बच्चे अगर सच बोल दें तो दीवारें चटख जाएँ।कोई चपरासी सम्पूर्ण सच बोलने लगे तो कितने अफसरों के कपड़े तंग हो जाए।कोई नर्स अगर चीखकर सच बोलदे तो कितने डॉक्टरों की इज़्ज़त पनारे से बह जाए।

खैर मुझे भी एहसास है इसलिए सच उतना ही बोलना चाहिए जितना खुद से ताल्लुक़ हो।जो सच किसी दूसरे से जुड़ा हो,उसे इग्नोर करना ही आदर्श स्थिति है।यहाँ तक हमारे हमारे मंत्रालयों में भी कुछ चीजों को गुप्त रखा जाता है, उनके बारे में सच नही बोला जाता।सेना के लिए भी बहुत बार सच नही बोला जाता।दो देशो की कूटनीतिक सम्बन्धो पर भी सच नही बोला जाता।पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी जी के जीवन का भी सच बाहर आने नही दिया जा रहा।पता नही किस हाल में हैं, कैसे हैं, कोई सच नही बताना चाहता।

खैर आप भी सुविधा के हिसाब से सच बोला करिये।घर में अगर बहुत सच बोले तो बुआ के खिलाफ बातें,चाचा के विरुद्ध षड्यंत्र,परिवार के बहुत से प्रोपगेंडे बाहर आने का खतरा रहेगा।इसलिए अपने विवेक से उतना ही सच बोलो जितना समाज पचा पाए।समाज की पाचन क्रिया बहुत खराब है।जहाँ,जिस सच से वोह कटघरे में आने लगेगा,वहीं यह सच पागलपन के दौरे में तब्दील कर दिया जाएगा।अब देखिये यहाँ एक स्टोरी में बच्चे का लिखा सच ही बहुतों को नही पचेगा।

सच बोलना तो एकबार फिर सबको भा सकता है मगर सच सुनना तो बहुत दूर की कौड़ी है।मेरे चेहरे पर लम्बी मुस्कुराहट दौड़ जाती है जब कोई कहता है मुझे सिर्फ सच पसन्द है।मैं सिर्फ सच बोलता हूँ।जी चाहता है गुज़री रात का हाल पूछ लूँ मगर छोड़ो, भरम भी बना रहना चाहिए।यह भरम बहुतों को आदर्श इंसान बनाए हुए है।यह भरम ही तो समाज को चला रहा है।यह भरम ही तो एक तार से समाज को जोड़े है।यह सच एक भरम ही तो है।आइये चलें उतना सच बोले,जितने से आदर्शवाद का भरम बना रहे।