Saturday, June 30, 2018

बिधान बाबू

मामूली उम्र में माँ ने साथ छोड़ दिया,वह माँ जो उन्हें हर मुश्किल से बचाए बस आगे बढ़ने के ख्वाब दिखा रही थी।छोटे भाई बहनो की ज़िम्मेदारी और माँ के ख्वाब आपस में टकराकर उसे कमज़ोर करते मगर वह इनसे जूझता रहा।पैसों की तंगी से जूझती पढ़ाई और देश पर छाया गुलामी का अँधियारा उन्हें चैन से नही बैठने दे रहा था,फिर भी वह पढ़ते गए।एक वक़्त के बाद लगा की पहले खुद को इतना क़ाबिल करलें की देश उनसे फायदा उठा सके।हुआ भी यही,देश विदेश में अपने दम पर पढ़कर वह आवाम की ख़िदमत में लग गए।

देशबन्धु चितरंजनदास भी उनके कँधे से कँधे लगकर देश की आज़ादी की लड़ाई समझते रहे।सुभाष चन्द्र बोस ने भी उनसे मिलकर एक किरण उन्हें थमाई।आखिर वह महात्मा गाँधी तक जा पहुँचे और जवाहरलाल नेहरू का हाथ पकड़ कर आज़ादी की अलख जगाते हुए बंगाल में खड़े हो गए।एक ऐसा इंसान जिसके खड़े होने से बंगाल खड़ा होता था,आज ही के दिन उसके लेटने से बंगाल लेट गया था।उसके जाने पर सिसक सिसक कर बंगाल रोया था।वह ऐसी शख्सियत थे जो बंटवारे में दिलों को जोड़ते रहे।उनका दिल पूरे भारत के दिल को जोड़ रहा था।जो इंसान और इंसान के बीच मोहब्बत और इंसानियत के बीज ही बोता रहा।

जब मुल्क़ आज़ाद हुआ तो उन्हें मंत्रालय में जगह दी जाने लगी।बड़ी विनम्रता से उन्होंने मना कर दिया और कहा मुझे मेरे देश की जनता की सेवा हमारे अपने क्षेत्र से करने दें।वह पढ़ाने में लग गए।जो उनका ख्वाब था की यह देश अपने पाँव पर खड़ा होकर सीना तानकर चले।ख़ामोशी से बंगाल में इतना बड़ा स्वतन्त्रता सेनानी पढ़ाने चला गया मगर गाँधी तो ज़िंदा थे।उन्हें एक एक इंसान के क़द और अहमियत का बड़ा अंदाज़ा था।बंगाल की उथल पुथल से पहले ही नेहरू को भेजकर उन्हें बंगाल का मुख्यमंत्री बनवाने पर राज़ी कर लिया।इस तरह बिधान चन्द्र राय का वजूद इतिहास में दर्ज हुआ।

वह ऐसी शख्सियत जिसका दिल बेहद विशाल,मिजाज़ नरम और ख़िदमत का अटूट जज़्बा।ताज्जुब है प्रकृति ने उन्हें आज ही के दिन पैदा किया और आज ही के दिन अपने पास बुला लिया।एक ऐसा इंसान जिसका होना इस मुल्क़ के लिए ज़रूरी था।बिधान चन्द्र राय को पढ़ा जाना चाहिए।काँग्रेस के इस महान नेता ने बंगाल को बहुत गहरी नीव दी साथ ही देश को शिक्षा और स्वास्थ्य में अमिट पहचान।वह व्यक्ति जो आज़ादी की लड़ाई भी लड़ता और रात तक लोगों के दर्द भी दूर करता।मैं बार बार कहता हूँ यह देश बिधान चन्द्र राय जैसे मोहब्बत से भरे हुए इंसानों के ख़ून पसीने की नीव पर खड़ा हुआ है।हो सके तो भारत रत्न बिधान बाबू को उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि,जो आज ही हैं थोड़ा सा याद करलें।इस देश की बुनियाद और फ़ख्र दोनों ही हैं बिधान चन्द्र राय और उनके जैसे समाज सेवी,राजनीतिज्ञ,स्वतन्त्रता सेनानी।।अपने काम से मुल्क़ की धड़कन सुधारने वाले बिधान बाबू की याद में ही आज भारत में डॉक्टर्स डे मनाया जाता है।।।।।।।

Friday, June 22, 2018

धर्म नशा ही तो है

यह क्या मीर बगल में जानमाज़ दबाए,सर झुकाए चले जा रहें हैं।कल तक तो बड़ी बड़ी बातें कर रहे थे की धर्म यह है, वह है, वाहियात चीज़ है, बेड़ियाँ हैं अल्लम् गल्लम्।मीर को तेज़ी से मस्जिद की तरफ जाते देख पण्डित विद्याधर मन ही मन कुढ़ रहे थे।आखिर अपने मज़बूत साथी को यूँ अल्लाह मियाँ के सामने टूटता देख उनसे देखा नही गया।मस्जिद की सीढ़ियाँ चढ़ते मीर को आवाज़ दी विद्याधर ने,मीर रुक जाओ,यह कौन सा गुनाह करने जा रहे हो।

मीर ठिठक कर रुक गए,विद्याधर ने नज़दीक़ जाकर मीर के कानों में अपना कलमा पढ़ा "ऐ मीर,धर्म एक अफीम है।"मीर के हाथ से जानमाज़ और तस्बीह छूट गई।तस्बीह सीढ़ियों पर टूट कर बिखर गई,एक मोती यहाँ तो एक वहाँ।कायदे से गुंथे सौ मोती, बेकायदे से सौ तरफ बिखर गए।मीर खामोश सीढ़ियों पर बैठ गए बगल में विद्याधर भी।

मीर ने विद्याधर का हाथ अपने हाथ में लिया और बोले।धर्म एक अफीम है।विद्याधर ने हाँ में सर हिलाया।मीर बोले यानि धर्म एक नशा है,विद्याधर ने हाँ कहा।मीर फिर बोले यानि नशा बुरा चीज़ है।विद्याधर हाँ में सर हिलाए।फिर मीर ने कहा तो कल रात हम तुम जो शराब की बोतलों के साथ लुढ़क रहे थे वह क्या है।अगर बीती रात शराब का नशा जायज़ है विद्याधर तो आज सुबह की नमाज़ का नशा भी जायज़ है।विद्याधर तुम्हे पता है की मार्क्स बड़े चालाक थे।अगर वह अफीम का नशा कर रहे होते तो धर्म को कभी अफीम नही बताते बल्कि कोकीन बताते।कोकीन का नशा करते तो धर्म को हीरोइन बताते।अगर चाय का नशा करते तो धर्म को पुरानी शराब बताते।

विद्याधर मुँह खोले हैरत से मीर को देख रहे थे।मीर ने वापिस सारे मोती बीने,जानमाज़ उठाई और कहा जिस दिन हर नशे से दूर हो जाना उस दिन धर्म के नशे से भी दूरी रखना।हम आज रात भी शराब पियेंगे और सुबह यहाँ सीढ़ियों पर भी मिलेंगे।नशा हर तरह का बुरा है साथी।अब जब नशा छूटेगा तो सारा छूटेगा।अफीम,शराब,सिगरेट सब वरना सब तरह का नशा मीर को चलाता रहेगा।

विद्याधर ने मायूसी से मीर को जाते हुए देखा और लौटते में दो बोतल शराब की लीं और बड़बड़ाता हुआ कहा जाओ,देखते हैं किस नशे में ज़्यादा मज़ा है।रास्ते में गुड़हल के पेड़ से एक ताज़ा गुड़हल का फूल तोड़ता हुआ विद्याधर आगे बढ़ता है।दो क़दम बाद फूल को कान्हा के मन्दिर की तरफ उछालता हुआ कहता है, यहलो रख लो,जब तक मैं नशे में हूँ,तब तक तुम भी हो,जैसे मीर का ख़ुदा है।तुम मनाओ की हमारा नशा न उतरे,हम दोहरे चरित्र से बाहर न आ जाएँ।

तुम सब भगवान लोग मिले हुए हो।तुमने साजिश से मीर को तोड़ा है, अब मुझे भी तोड़ लिया।मैं खुद से वादा करता हूँ जिस दिन सारा नशा छोड़ दूँगा उस दिन तुम्हारे धर्म के नशे का आखरी दिन होगा।खैर घबराओ नही,अभी मेरा लीवर दो सौ लीटर शराब और सोख सकता है।तब तक तुम धूब बत्ती में मॉक्स लगाकर मीर के ख़ुदा के साथ हमे बोतलों के साथ लुढ़कता पुढकता देखो।गुड बाय।रेड सैल्यूट कान्हा।

Thursday, June 21, 2018

दँगाई मत बनो

कभी कागज़ में बारूद भरने वालों को देखा है ।देखिये,जो पटाखे बनाते हैं, सरकार भी उन्हें आबादी से दूर रहने को कहती है ।अक्सर खबरें पढ़ते होंगे की फला जगह घर में बम बनाते समय विस्फोट हुआ और कुछ लोग मर गए ।यह एक सिद्ध बात है, विस्फोटक चीज़ कहीं भी हो फटेगी ही और उसका नुकसान उसी के इर्दगिर्द होगा ।

अब दंगाइयों और भीड़ बनके हत्यारों को देखिये ।यह अभी तो दूसरो के लिए तैयार किया जा रहा विस्फोटक रोबोट हैं लेकिन यक़ीन जानो किसी न किसी रोज़ यह आपके आँगन में भी फटेंगे ।यही दँगाई और हत्यारे जो कभी भी आपकी एक हल्की सी असहमती पर आपको कुचल डालेंगे ।यह वही बम हैं, जिसे सिर्फ फटना आता है, जगह भले कोई भी हो ।
इन्हें अपने बीच से दूर कर दीजिये,यह हर आबादी केलिए खतरा हैं ।जिसके मुँह में मानव रक्त लग गया,वह उसके स्वाद के लिए कहीं भी,किसी को भी खत्म कर देगा और रक्त,हिन्दू मुसलमान नही होता ।

एक बार इन दंगाइयों और आतंकियों के घर में झाँक कर देखिये,इनसे इनके ही माता पिता आजिज़ होते हैं ।हम तो सैकड़ों को जानते हैं जो रोज़ अपनी माँ को लातों से मारते हैं और बाप को लाठियों से और दिनभर धर्म बचाने का ठेका लिए शाम को ठेके पर लुढ़के मिलते हैं ।यह भीड़ ,जिसे आज आपका मौन समर्थन है ।जिसे गाहे बगाहे आपने ही दूसरों को सबक़ सिखाने के लिए चुना है ।यह सौ फीसद तय है की एक न एक दिन आपकी तरफ पलटेगी ।तब आपकी कमज़ोर होती चार दीवारें दरक कर गिरेंगी जिसमे दबकर मरना तय है ।

एक नज़र दुनिया के हर हिस्से पर दौड़ा लीजिये ।जिसने भी अपने यहाँ के नागरिकों में फ़र्क करके उन्हें मिटाने के लिए अलग से हत्यारे गिरोह पाले,वह सारे देश तबाह हैं, बर्बाद हैं ।जिन्हें लगता है की यह भीड़ उन्होंने नही चुनी,वह तो मासूम हैं,तो एक बार इस गिरोह की राजनैतिक डोर अपने हाथ में फंसी राजनैतिक डोर को देखें ।दोनों ज़रा सी दूरी पर एक ही जगह मिलती हैं ।
आप जानते हैं दुनिया का सबसे मूर्ख परिवार कौन है ।वह नही जो नासमझी की हरकते कर रहें बल्कि वह,जिनके परिवार के विचार की वजह से उनके बच्चे दँगाई,हत्यारे और आतँकी बन रहें हैं, यह परिवार पृथ्वी के सबसे मूर्ख परिवार हैं ।हाँ अगर आप अपने घर में हत्यारों को संरक्षण दे रहें हैं तो यह भी सच है की आप अपने ही आँगन में बलात्कारी,डाकू,राक्षसी कर्म करने वालों को पाल रहें हैं ।यह सारे अपराध मानव हत्या के इर्द गिर्द मसाला ही तो हैं ।यह भीड़,सोचिये जब आपके घर का कुछ भी पसन्द करेगी तो आपके न चाहते हुए भी उसे छीन लेगी और आप आसमान ताकते रहेंगे ।

मुझे तो उनसे भी सख़्त परहेज़ है जो सोशल मीडिया पर भीड़ बनकर किसी को भी घेरकर उसके अकाउंट को बन्द करवाते हैं ।कम्पनियों के खिलाफ मुहीम चलाकर उन्हें झुकने पर मजबूर करते हैं ।यह भी एक भीड़ है, जो सोशल मीडिया पर इकट्ठे होकर एक अकाउंट या एक प्रोडक्ट या एक कम्पनी की लिंचिंग करती है ।अगर इस भीड़ को भी,ज़मीन पर लिंचिंग करती भीड़ जितनी ताक़त मिल गई,तो यह भी अपने विपरीत विचारों को जान से मारने में कसर नही छोड़ेगी ।

मैं फिर कह रहा हूँ,भीड़ मत बनो ।अगर ईश्वर ने तुम्हे दिमाग़ दिया है तो अपना वजूद कायम करो ।धर्म वर्म हज़ारों सालों से हैं, हज़ारो साल रहेंगे भी,उन्हें कोई खत्म नही कर सकता ।नही रहेंगे तो सिर्फ आप और हम ।इसलिए जितना हो सके उतना उपजाऊ माहौल बनाकर मरो ।जिसमे हमारे बीज जैसे बच्चे,उम्दा दरख़्त बनकर आने वाली नस्लों को छाँव दे सके ।एक बार यह ज़रूर सोचिये की हमारे आँगन में,हमारे अड़ोस पड़ोस में,हमारे इलाके में कोई विस्फोटक विचार तो नही पनप रहा ।वह हमारे आँगन में फटे की उससे पहले उसपर शीतल जल डालकर सम्भाल लीजिये वरना सारा बागबान तहस नहस हो जाएगा ।आज किसी और की लाशें घसीटी जा रहीं कल आपकी लाश घसीटने वाले भी नह रह जाएँगे ।उठकर अपने घर को सम्भाल लें,यह देश ही हमारा घर है ।जिसमे सुक़ून लाना हर घरवासी का कर्तव्य है ।

Wednesday, June 20, 2018

कान्हा और नन्दी

नंदी खामोश खड़े कान्हा को देख रहे थे ।बड़ी बड़ी आँखों से आसूँ बून्द बून्द बनकर ज़मीन पर गिरते,जैसे ही आँसू ज़मीन पर गिरते,ज़मीन ने छन्न सी आवाज़ आती ।जैसे किसी जलते हुए तवे पर किसी ने पानी छिड़क दिया हो ।कान्हा से नन्दी की यह मायूस सूरत देखी नही जा रही थी ।बाँसुरी को कमर में लगा वह नन्दी के सर पर हाथ फेरते हुए कहते हैं,"नन्दी,क्या बात है जो इतने बेचैन हो"
नन्दी ने कान्हा के हाथों पर अपनी ज़ुबान फेरते हुए कहा,आपसे छुपा ही क्या है ।आपको मेरे ही क्या,सबके दिलों का हाल पता है।

कान्हा मुस्कुराए और बोले मुझे मालूम है मगर तुम यूँ रो मत,तुम तो मानव की ख़ुशी के लिए ख़ुद को मिटा देने वाला जीव हो ।भला तुम अपने कुल के जीवों के नामपर पृथ्वी पर होने वाली मानव की हत्या कैसे बर्दाश्त कर सकते हो ।तुम्हारा आजका दर्द मेरे लिए भी पहाड़ जैसा है ।
नन्दी ने कहा,जब आप उस गाय की टेक लगाए बाँसुरी बजा रहे थे,तो मैं अपने भोले भाले शिव को उनके ध्यान से बिना जगाए आपके पास आ गया, की कहीं मेरे आँसू मेरे शिव ने देख लिए तो यह धरती फट पड़ेगी ।हे कान्हा बाँसुरी से ऐसा संगीत निकालिये की आपको मानने वालों के दिल नरम हो जाएँ ।वह वैसे ही हो जाएँ जैसे होने का उनका आवरण है ।वह मानव को हमारे और आपकी भक्त गायों के नामपर क़त्लेआम न करें।
कान्हा मुस्कुराए,नादान नन्दी,भला असुर हृदय,जिसको रक्त का स्वाद लग गया हो,उसे तुम्हारे प्रेम के अर्थ समझ भी आएँगे।आकाश से पाताल तक सबको पता है निर्दोष की हत्या की क्षमा कहीं भी नही है ।

हे नन्दी,निर्दोष मानव की हत्या उस समाज तक को दण्डित करवाएगी,जो इसपर मौन है ।तुम परेशान मत हो,मुझे पता है पृथ्वी पर धर्म के नामपर की जा रही हत्या तुम्हे विचलित कर रहीं हैं ।तुम धैर्य रखो और शिव जी के पास जाओ,अगर उन्हें यह पाप और तुम्हारे बेचैन दिल का हाल पता चला तो धरती ऐसे हिलेगी की धर्म के नामपर खड़ा हर पापी अपने लिए कम कष्ट की मृत्यु माँगेगा ।जाओ नन्दी,जब तक कान्हा है, उससे ज़्यादा गौ की सेवा और प्रेम करने वाला भला कौन है तीनो लोकों में,जाओ मैं अपनी गौओं को मानव की हत्या की वजह नही बनने दूँगा ।

मेरी गाय मेरे प्रेम और सेवा का प्रतीक हैं अगर इनके नाम से हत्याएँ होने लगेंगी तो धर्म बचेगा ही कहाँ ।कान्हा ने चीख़ कर कहा,मेरे बनाए मानव की हत्या से बड़ा अधर्म तीनों लोको में कोई है ही नही ।जिन्हें हमसे मोहब्बत है, वह अपने हाथों में हत्या का रक्त लगने न दें वरना मानव  रक्त का हर धब्बा उनको मेरे सामने पापी और अधर्मी होने का सबूत देगा,जिसका दण्ड तय है ।कान्हा की नरम से सख़्त होती आवाज़ से मेरी नींद खुल गई ।तपती दोपहरी में बरगद के नीचे लेटा मैं ख्वाब में कान्हा और बेचैन नन्दी को देख इंसान बन गया,जब जागा तो आँख में आँसू और बगल में मोर का पँख पड़ा हुआ था ....

Monday, June 18, 2018

राहुल गाँधी

एक नज़र उनकी तस्वीर पर डाली।सिर से पाँव तक मासूमियत।झूठ का कहीं कोई वजूद नही।कभी मज़ाक उड़ाने से उबर पाना तो यह सोचना की आखिर तुम्हे उसके जैसा बचपन मिला होता तो तुम कैसे होते।पड़ोस के शहर में जब कोई हादसों में मारा जाता है तो आसपास के बच्चे सहम जाते हैं।घर की चौखट पर, दुनिया को हिला देने वाली उसकी दादी को जब मारा गया तब उसके बालमन पर क्या प्रभाव पड़ा होगा।इस सबके बीच जब उसके बाप के ख़ून से लथपथ जूते उसके हाथ में रखे गए होंगे तब उसके दिल पर क्या बीती होगी।हाँ तुम मज़ाक उड़ा सकते हो,उसका जीभर मज़ाक उड़ाओ।

अभी कुछ लोग यहीं आएँगे और अपने संस्कारो का खुला प्रदर्शन करेंगे।बीस बीस रूपये पर पोस्ट पर कमाई करने वाले उसके चरित्र की धज्जिया उड़ाएंगे।लेकिन मैं कहता हूँ कुछ भी करो,मगर शुचिता से तो करो।मुझे मालूम है की इधर तुम यही कामो के लिए खासकर बेरोज़गार बनाए गए हो,तो बेरोज़गारी में गाली लिखने के पैसे मिले भला उसमे क्या बुरा है।तुम्हे सीधे तो नौकरी मिल ही नही सकती तो गाली गलौज से रोटी चल जाए इससे अच्छा क्या है।इन्हें शुक्र मनाना चाहिए की उनके घर में खाना पहुँचाने के लिए ऐसा चरित्र मिला है जो कल पलट करभी इनसे बदला नही लेगा,बल्कि इनकी फ़िक्र ही करेगा।तुम सबको उसके बड़े खूबसूरत दिल के बारे में अच्छे से पता है ।उसके ख़ून में अवाम को इस्तेमाल करना शामिल ही नही है, बल्कि इनके लिए मरना ही है।

संगीन के साए में वह बड़ा हुआ।उसके इर्द गिर्द ऐसी सख़्ती की दोस्त जैसी चीज़ ही खत्म हो गई।रिश्तेदार के नाम पर माँ और बहन की ही छाँव रह गई।उसके ना चाहते हुए भी उसे सुरक्षा घेरे में क़ैद कर दिया गया।अब ज़रा सोचना यह सब तोड़ते हुए उसे कितनी जद्दोजहद खुद में करनी पड़ी होगी।फिर भी ख़ुशी है वह जैसा है बिना मक्कारी झूठ फ़रेब वह सबके सामने है।

रही बात उसकी समझ की तो उसे समझने से पहले अपने दिमाग में जमी काई को हटाना पड़ेगा।विषयों पर उसकी पकड़ को देखना हो तो अपनी आँखों पर जमी पीत पत्रकारिता की परत हटानी ही होगी।आज उसका जन्मदिन है।बड़े बड़े जिस्म वाले मगर छोटे से दिल वाले भी उसे बधाई नही देंगे।मुझे इतना पता है वह बहुत उम्दा शख्सियत है।सच्चा है,सीधा है, जैसा है वैसा दिखता है।हमारी जनता ने उसे एक नही कई बार चुना है, वह भी मोहब्बत के साथ।

राजनीती में वैसे तो कोई स्तर रहा ही नही है, समाज ने भी अपना चरित्र खोया ही है।वह भी भीड़ की तरह चल रहा है, बुरा भला कहते हुए।खैर राहुल गाँधी को उनके जन्मदिन की हार्दिक बधाई।ईश्वर उनसे और बेहद ज़रूरी काम ले।राहुल में किसी तरह की कोई कमी नही है।मुझे ख़ुशी है की दुष्प्रचार के बावजूद उसने अपने आपा नही खोया।कहीं पर ज़बान को इतना गिरने नही दिया की शर्मिंदगी हो।ज़बरदस्त कीचड़ उछालते लोगों के बीच वह मुस्कुराता हुआ अपने काम में लगा है।ईश्वर उसकी मेहनत के साथ न्याय करेगा।फ़िलहाल राहुल गाँधी को जन्मदिन की हार्दिक हार्दिक बधाई।

Sunday, June 10, 2018

शेर और भेड़िया

एक भेड़िया था ।उससे जँगल में लोग आतंकित तो थे मगर अपने राजा शेर के भरोसे वह इत्मिनान में भी थे ।वक़्त गुज़रता गया शेर बूढ़ा होता गया और उसका कुनबा टूटता हुआ छोटा होता गया ।भेड़ियों में ज़बरदस्त एका था ।वह ख़ून करते तो साथ,गोश्त खाते तो साथ,बाहर निकलते तो साथ,शिकार दौड़ाते तो साथ,उनमे गज़ब का अनुशासन था ।

एक दिन जँगल में राजा शेर पर इलज़ाम लगा की वह सबसे ज़्यादा गोश्त खाता है, यही नही वह जँगल की सीमाओं तक भी नही जाता,ऊपर से उसकी बिरादरी के दूसरे शेर जगह जगह उसके नाम से वसूली करते हैं ।जँगल में ज़बरदस्त असन्तोष था मगर शेर उन्हें समझा नही सका की यह आरोप मनगढ़ंत हैं ।उसने एक दहाड़ मारी सब जानवर सहम गए ।तब वह मुस्कुराया की डरो मत। हम तुम्हे नुकसान नही पहुँचा सकते ।यह आख़री आवाज़ मेरे जाने की है आप सबने बहुत साल हमे अपना राजा चुना इसका शुक्रिया ।आइंदा कभी ज़रूरत लगे तो मांद में बेख़ौफ़ आ जाइयेगा और कहता हुआ शेर चला गया।

फिर जँगल ने अपने लिए भेड़ियों को चुना क्योंकि वह बहुत ज़्यादा थे,जिससे सुरक्षा का एहसास होता ।इसलिए भी चुना क्योंकि वह अनुशासित थे,साथ आते और साथ जाते।वह एक थे,एक साथ झपटता मारते थे ।जँगल के लिए एक अच्छा ख्वाब थे वह मगर धीरे धीरे जँगल भर में भेड़ियों का कुनबा फैल गया ।जिस शेर के एक आध रिश्तेदारों को जँगल बर्दाश्त नही कर सका वह भेड़ियों के पूरे परिवार को हर एक चोटी पर,हर एक तालाब पर,हर नदी के किनारे पर,हर फलदार पेड़ के नीचे बैठाकर खुश थे ।

जँगल में भेड़ियों की शिकायत बाहर ना जाए इसके लिए भी शेर की मांद के बाहर कुछ भेड़िये थे ।जँगल ने अपने लिए बेतरतीब बेहरहमी से बेज़रूरत चीड़ फाड़कर फेकने वाले को चुन लिया था ।अब जँगल में हर ओर से चीखने की तो आवाज़ आती थी मगर भेड़ियों की हुवा हुवा हुवा के आगे सब शाँत हो जाता ।

Friday, June 8, 2018

बिरसा मुंडा

आप सबने कंकर कंकर जोड़कर जिस मुल्क़ की बुनयाद धरी थी उसमे हम सब बहुत दिन ख़ुशी ख़ुशी जी लिए।जिस आज़ादी के लिए सलाखों में आज आपने आखरी साँस ली थी उसका पूरा मज़ा हम लोगों ने पिछले बहुत से सालों में ले लिया।
अब हमारा दिल भर गया है।अब आप सबकी कुर्बानियाँ पीले पन्नों में दीमक का इंतज़ार कर रही हैं।

हमने नए रास्ते चुन लिए हैं, उन रास्तों में कहीं आप नही हैं।होना भी नही चाहिए वरना आपका दम घुटेगा।खैर हम पागल,बोझिल,पुराने,फ़ालतू के लोगों की तरफ से श्रद्धांजलि।।नए लोग अपने नए हीरो को याद करेंगे । अभी हमारे जिस्म से पुराने ख़ून के क़तरे नही गए हैं, इसलिए याद आ गए।

देश के एक हिस्से के मज़दूर,आदिवासी और किसानों को एक करके अपने सुनहरे भारत के लिए जो क़ुर्बानी दी थी ।उसने इस मुल्क़ को बहुत सालों तक मिलजुलकर चलने की सलाहियत दी ।हम ही गलत थे,अपनी तरक्की के रास्तों में आपको भूलते गए और बढ़ते गए ।आज जब पता नही कहाँ पहुँच चुके हैं, तब हम सब आपस में बहुत बंटे, बिखरे हुए हैं ।हमारे दिलों में मोहब्बत दम तोड़ चुकी है ।अब एहसास होता है बिरसा,की आप सब क्या करके गए थे ।किस शिद्दत से सबके दिल जोड़कर जंज़ीरों से मुकाबला किया था ।आज यह सीने में मुट्ठी भर गोश्त का टुकड़ा,जिसे कुछ लोग दिल कहते हैं, वह आपको बेहद याद कर रहा है।

।बिरसा मुंडा को याद कीजिये और संघर्ष के रास्ते बुनिये,सुक़ून इनके ही साथ आएगा,शाँति इनकी ही चादर से बिखरेगी ।सलाम बिरसा मुंडा
(9 जून,जेल में वह आखरी साँस,हमारी खुली साँसों का रास्ता थी)

Monday, June 4, 2018