Friday, April 19, 2019

सच्चर साहब

जिनका साया सर पर था,तो दिल मे डर ही नही आता,लगता कोई भी जगह किसी भी मुद्दे पर लड़ लेंगे,सम्भालने के लिए वह तो हैं ना...यह साया जो सिर्फ मेरे सर पर नही था,बल्कि हज़ारों लोगों के सर पर था,पिछले साल आजके ही रोज़ एक झटके में हट गया ।

मैंने ज़िन्दगी में अपनी आख़री सांस तक इतना सक्रिय इंसान कम ही देखे । कितनी यादें हैं, कितने किस्से हैं मगर हर एक मे उनका जूझना ही तो है ।

जस्टिस राजेन्द्र सच्चर,जिनके पिता जी पंजाब के मुख्यमंत्री रहे और जो खुद दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और मुसलमानों के हालात जानने को बनी मशहूर सच्चर कमेटी...यही नही बल्कि पूरे देशभर में घूम घूमकर तमाम मुद्दों पर सरकार से टकरा जाना तो उन्ही से सीखा..समाजवादी विचारधारा में डूबे एक आदर्श गांधीवादी और सादी ज़िन्दगी जीने वाली शख्सियत ज़माने की मशाल रही है। खुदाई खिदमतगार से बेइंतिहा मोहब्बत करते और हमेशा बढ़चढ़कर उसमे हिस्सा लेते,सरपरस्ती करते । उन्हें हम सबसे एक ही तो उम्मीद थी कि हम इंसानियत के लिए आख़री तक जूझेंगे । एक ही तो मन्त्र दिया हमेशा की सच्चाई और इंसाफ के लिए मर मिट जाओ मगर झुकना मत...

आज पुण्यतिथि है सच्चर साहब की,उनके जैसा ज़मीनी और नरम दिल के साथ सच्ची खरी ज़ुबान के एक्टिविस्ट कम रहे । इस दौर में जब बहुतों की ज़रूरत थी,तब सब एक एक करके अलविदा कह गए । सच्चर साहब जैसे लोग एक युग होते हैं, उनका जाना एक युग का जाना था ।मुझे खुशी है कि जस्टिस सच्चर जैसे लोग ऐसी खेप बना गए जो अगले पचास साल तक तो संघर्ष करेंगे,हमे इस संख्या को बढ़ाना ही होगा ।
हमेशा दिल के सबसे ऊंचे हिस्से में जस्टिस सच्चर रहेंगे...क्योंकि आगे का रास्ता हम उन्ही की दिखाई रौशनी से देखते हैं, देखते रहेंगे ।

Tuesday, April 16, 2019

महावीर

जब हम ज़बान,ज़ायके और ज़िन्दगी की गिरह सुलझा रहे थे।हर चीज़ के बनने बिगड़ने में प्रयोग कर रहे थे।जब इंसान और जानवर के दरमियानी फासला कम था।तब उसने एहसास कराया की हम इंसान हैं।उसने बताया दो हाथ और पैरों का सिर्फ यह काम नही है की खाना और खाना।हमे अपने इर्द गिर्द हर चीज़ के लिए जीना होगा।हम ख़ुदा की बनाई हर शय की हिफाज़त और ख़िदमत के लिए हैं।

उसने ज़बरदस्त राजसी ज़िन्दगी को ठुकराया।जंगलों में टहला, भूख और प्यास में उस ताकत का एहसास किया जिसने हमारी रूहों को बनाया।ज़मीन में बिछे काँटों ने तलवों में चुभकर दिल की गाँठे खोल दी।हर वक़्त शहज़ादे की तरह हिफ़ाज़ती दस्ते से घिरा वोह जब जँगल का रुख कर गया तो उसके इर्द गिर्द जानवर थे।बातें करने के लिए पेड़ थे।एक सन्नाटा था जो सभ्यता में शोर पैदा करने को बेताब था।राजसी लाव लश्कर तो सब छोड़ते हैं उसने तो तन के कपड़े तक को उतारकर प्रकृति से प्रकृति जैसा बनकर दिखा दिया।

हर तरफ बिखरे घने जँगल में रुई से मुलायम बदन को बरगद की खाल सा सख़्त कर लिया।मुझे हैरत है की जब हमसे एक मामूली से रुमाल का मोह नही छूटता,पंखे की ज़द से हम बाहर नही जाना चाहते,कुछ हो न हो रौशनी को तो हम नही ही छोड़ सकते।तब कैसे उसने एक झटके में सब ऐसे उतार फेका जैसे वोह उसे क़ैद कर रहा हो।उसने ज़िन्दगी को इतना तपाया की उसका जिस्म कुंदन हो गया।

ईसा मसीह से 599 साल पहले उसने दुनिया को एक विचार दिया।ऋषभ देव से चली सीढ़ियों में 24वें नम्बर पर उसने रौशनी दिखाई।वैशाली में त्रिशला और सिद्धार्थ के आँगन में वह वर्धमान पैदा हुआ।जिसने अपनी ज़बरदस्त वैचारिक ताकत से और तप त्याग से दुनिया के सामने महावीर स्वामी नाम दिया।अहिंसा,सत्य, अपरिग्रह,अचौर्य और ब्रह्मचर्य के वह पाँच नियम दिए जिनके सामने ज़माना झुक गया।जँगल ने नगरों को जीने का सलीक़ा दिया।

मैं महावीर स्वामी की जूझने,समझने,प्रयोग,तप,त्याग को देखता हूँ,सोचता हूँ हज़ारों साल पहले यह कैसे मुमकिन था,लोगों को,आदिवासियों को इंसानियत से कैसे जोड़ा उन्होंने।आज सब कुछ है मगर हम चाह कर भी इंसान को इंसान होने का एहसास नही करा पा रहे हैं।जानते हैं क्यों,क्योंकि हममे महावीर का रत्ती भर भी सच,लगन, त्याग,समर्पण नही है।आइये आज महावीर जयंती में महावीर को याद करने की जगह उन्हें ज़िन्दगी में उतारे।जिनके दिल में वाक़ई महावीर होंगे,या जो महावीर को समझते होंगे,उनके दिल से सबसे पहले नफ़रत अलविदा कह जाएगी,फिर दिखावा,शान शौकत जाएगी।यह हरगिज़ नही चलेगा की तन के तो कपड़े उतार दिए मगर मन संकीर्णता,हिँसा,बदले और लालच से ग्रस्त हो।मेरे महावीर मन ही को तो देखेंगे..

Monday, April 15, 2019

चार्ली चैप्लिन

इस तस्वीर को पहचान लीजिये।यह वोह चेहरा है जो हमे सम्भालने के लिए कहीं छुप गया ।हमारे ज़ख्मो पर मरहम रखता रखता गुम हो गया ।हमे हमारे मतलब का चेहरा याद रह गया।इनसे सीखें की कैसे तलवार उठाए बिना,चीखें चिल्लाए बिना भी अपने अंदर छुपे हुनर से बड़ी से बड़ी सल्तनत को जवाब दिया जा सकता है।महसूस कीजिये कैसे किसी दर्द में डूबे दिल को मुस्कान की छाँव में लाया जा सकता है।जब ज़ुल्म इन्तेहा कर जाए तब यह एक रास्ता बनाते हैं।जब इंसानियत टुकड़ो टुकड़ों में बट जाए तब इनके जैसे किरदार खुद को मिटाकर टूटे दिलों को जज़्बात से जोड़ते हैं।

यहाँ तक हमे हमारे ग़म भुलाने के लिए इन्होंने जो चेहरा अपने खूबसूरत चेहरे पर ओढ़ लिया,मैं सोच कर हैरान हूँ की यह किस तक़लीफ़ से गुज़रे होंगे।उस चेहरे को अपनाना जिस चेहरे के विरुद्ध ही लड़ाई हो,बड़े जिगरे का काम है। उस मुखौटे को ओढ़ लेना,जिससे नफरत ही नफरत ही,कितना जिगरे का काम है ।जब आईने में अपनी सूरत देखते होंगे तो किस क़द्र दिल रोता होगा,मगर हर आँसू की ज़ब्त करके वह हमारे डूबे हुए दिलों को पार लगाते हैं ।

सबसे बड़ी बात तब और अब में उस वक़्त उनका जो दुश्मन था उसके मुकाबले का खूँखार आज कोई भी नही है मगर आज मैं अपने विरोधी का चेहरा तो छोड़िये नाम लेकर भी मज़ाक कर दूँ तो टुकड़े टुकड़े कर दिया जाऊँ। कल जब वह मज़ाक करता था तो जनता उनमे अपने दर्द देखती थी आज दुनिया के किसी भी कोने में नेता का विरोध कीजिये तो आपके साथ कम लोग ही खड़े होंगे ।हाँ अगर कुछ दिमागी पिछड़े हुए देश में आपने उनके नेताओं की अक्षमता,क्रूरता,धूर्तता पर सवाल किये तो कहिये भीड़ आपको खींचकर ही मार डाले।पकड़ कर सलाखों में डाल दिया जाए।

आज 16 अप्रैल को अपने चार्ली चेपलिन के जन्मदिन पर याद कर लीजिये।मेरे तो इर्द गिर्द वही हैं,हो सके तो उनके उन किस्सों को याद कीजिये जिसमे वोह युद्ध के विरुद्ध या युद्ध में लोगों को मायूस न होने के रास्ते बुन रहे थे।आज एक बार फिर दुनियाभर में गुस्से और बदले की आग से भरे हुए लोग उभर आए हैं, आज फिर चार्ली बेहद अहम् हो गए हैं।हिटलर के विरुद्ध चार्ली चैप्लिन के विरोध का तरीका भी जानना,बताना और पढ़ाना चाहिए...यह भी देखिए चार्ली चैप्लिन भारत के किस शख्स के सामने सर झुकाने को तैयार थे,वह कौन भारतीय था जिसके लिए चार्ली चैप्लिन का दिल मोहब्बत से भर उठता था,जिसका किरदार चार्ली को रास्ता दिखाता था,ज़ाहिर है, वह एक ही महान आत्मा थी हिंदुस्तान की,मोहनदास करम चंद गांधी महात्मा गांधी....

Sunday, April 14, 2019

एकता

मैं विरासत के पन्ने नही खोलूंगा की उसको पलट कर बताऊँ, मेरे बाप दादा हिन्दू मुसलमान एकता के बड़े पैरोकार थे । मैं अपने गुज़र चुके लीडर के बोल दोहराकर नही कहूँगा की वह हिन्दू मुसलमान एकता चाहते थे ।मैं राजा,महाराजा, नवाबों के किस्से सुनाकर भी नही कहूँगा की देखो उन्होंने हिन्दू मुसलमान को एक करने के लिए क्या क्या जतन किया ।

मैं कबीर,रहीम,रसखान,जायसी,खुसरू,तुलसी के दोहे की डोर पकड़ कर तुम्हारी गर्दन पर नही कसूंगा की यह भी हिन्दू मुसलमान की एकता के लिए पल पल जागते रहे । मैं तो रामकृष्ण,विवेकानन्द,साईं, हाजी वारिस,निज़ामुद्दीन,बुल्ले शाह की चौखट की भी दुहाई नही दूंगा हिन्दू मुसलमान एकता के लिए ।

मैं सिर्फ इतना कहूँगा जो मैं हूँ,उसे खुद ही हिन्दू मुसलमान का एका पसन्द है । आजका वक़्त हमारा है, अगर हम एक रह गए तो बहुत लंबी लकीर खिंचने वाली है, वरना पिछली भी लकीर मिट ही जाएगी । मैं आज कहता हूं कि दुनिया के सबसे खूबसूरत वह दोस्त हैं जिनमे एक मुसलमान एक हिन्दू है । तुम यक़ीन जानो होली के रंग में डूबे मुसलमान से ज़्यादा कोई भी खूबसूरत तस्वीर मेरे दिल में नही पहुँचती । रोज़े में जब कोई हिन्दू सहरी के लिए मुसलमान को जगाता है, यह आवाज़ ही तो दुनिया की सबसे मधुर आवाज़ है ।जब कोई मुसलमान बड़े मंगल पर शर्बत बाँटता है, तो वह हाथ ही तो चूमने लायक हैं और जब कोई हिन्दू मोहर्रम में ग़म के साथ खड़ा होकर शर्बत के गिलास उठाता है, वह ही तो सबसे खूबसूरत पल होता है । वैसे तो यह बड़ा आम सा है । मगर हमे खुद नही पता जो आम है, वही खास है ।

हम तो हर चीज़ से अनजान बड़े हो रहे थे । दिल अली की तरफ झुकता था तो कभी बजरंगबली की तरफ । हमे क्या पता था कि इनमें से एक चुनना है ।हम राम पर लपकते थे और मोहम्मद पर जान छिड़कते थे क्या पता था कि इनमें से एक चुनना है । कान्हा के दीवाने थे तो मूसा के किस्से ज़बान पर थे,क्या पता था इनमे से एक चुनना है । हमे तो हर अच्छी चीज लुभाती थी । भगवान के हम बच्चे ही तो थे,जो हर भगवान को ले लेना चाहते थे क्या पता था कि कोई डन्डी लेकर उंगलियां तोड़ देगा अगर हमने एक से ज़्यादा चुन लिया ।

हिन्दू मुसलमान अगर यह एक नही हो सकते तो यकीन जानो ज़मीन पर और कोई एक रह ही नही सकता । जो इन्हें तोड़कर रखना चाहता है, वह सिर्फ और सिर्फ हुक़ूमत का लालची है । बहुत आए और दफ़न हो गए इसको तोड़ने वाले,डलहौजी तक को तो हम सब मिलकर निगल चुके हैं । पूरी ब्रिटेन की हुक़ूमत को अपने चबूतरे पर पानी पिलाया है । हम टूटे तब ही हैं, जब हमारे बीच से किसी ने गद्दारी की है । एक बार गद्दारी की तो मुल्क टूटा अब फिर कोई अली बजरंगबली के तान छेड़ रहा है, उसकी कोशिश दिल बांटने की है ।

ऐसे गद्दारों पर नज़र रखिये,यही हैं जो दिलों को फाड़कर,ख्वाबो को चकनाचूर करके सिर्फ हुक़ूमत की फसल काटना चाहते हैं । सम्भल जाओ उससे पहले की पिछड़ जाओ । हर नफरत फैलाने वाले को मिटा दो जब वक़्त मिले, यह शूल है,जिसे गुखरू बनते देर नही लगेगी । आओ और अपने आजके वक़्त को साथ चलकर तय करें ।दिलों के मैल को धो दो और एक दूसरे की तमाम कमियों को नज़रंदाज़ करके आने वाले कल का सितारा बुलन्द करो । भारत का स्वर्णिम भविष्य हिन्दू मुसलमान की एकता में गुंथा है ।जो इसे पाना चाहता है, एक हो,जो रोकना चाहता है, वह तोड़ने के मिशन में लगा रहे ।

Friday, April 12, 2019

जलियांवाला बाग

साल तो यही था 19 ही मगर 1919 और तारीख भी यही थी । कुछ लोग थे जो चाहते थे की उनकी हर साँस पर पहरा न बैठाया जाए । चाहते थे की उन्हें उनके मुल्क में सरकार जब चाहे बिना वजह बताए गिरफ्तार करने के मंसूबे छोड़ दे । वह जानते थे की जिस दिन उनकी साँस पर पहरा बैठा दिया जाएगा उस दिन आज़ादी का ख्वाब चकनाचूर हो जाएगा ।

ज़ाहिर है यह रौलट एक्ट की कहानी थी,जिसके खिलाफ महात्मा गाँधी अपने साथियों संग जूझ रहे थे । इसी कड़ी में उनके अहम साथी और आज़ादी की लड़ाई के तमाम हीरो में से एक डा सैफुद्दीन किचलू और डा सतपाल गिरफ्तार कर लिए गए । इन्हें गिरफ्तार करके कहाँ रखा गया किसी को पता नही,अजब बेचैनी का माहौल । स्वर्ण मन्दिर के पास ही एक जगह इसका विरोध रखा गया । उस जगह का नाम था जलियाँवाला बाग़

करीब बीस पच्चीस हज़ार लोग जलियाँवाला बाग़  में इकट्ठे हुए और उनकी मांग थी की बिना शर्त डा सैफुद्दीन किचलू को रिहा किया जाए । दिनभर चले इस धरने को रोकने के लिए ब्रिगेडियर डायर को भेजा गया  ।जब शाम हो चली तो डायर सैनिक लेकर जलियाँवाला बाग़  की तरफ चल पड़ा । यह ऐसी जगह थीं जहाँ से निकलने का एक ही रास्ता था । वहीं उसी रास्ते पर फ़ोर्स लगाकर अन्धाधुन गोलियां चलवा दीं । देखते ही देखते पूरा मैदान लाशो में बदल गया । हम यह नही कहेंगे की तुम इसे सोचकर दर्द से चीखने लगो ।न कहेंगे की बहुत अफ़सोस करो । बस इतना कहेंगे की जलियाँवाला बाग़  को भूलो मत । देश जो लम्बे वक़्त से मांग कर रहा था की अँगरेज़ उससे माफ़ी मांगे । आखिर ब्रिटेन ने देश से जलियाँवाला बाग़ कांड के लिए माफ़ी मांग ली । कैमरून 2013 में ही इसकी भत्सर्ना लिखकर गए थे,जिससे उनके माफी मांगने का रास्ता बना ।

अब सोचिये की लोग शहीद हुए थे उस दौर में,वह भी किसके लिए,हमारी आज़ादी और डा सैफुद्दीन के लिए । एक मैदान के अंदर उन्होंने शहादत तो चुनी मगर बँटना  नही चुना । लाशो में बिखर जाना तो पड़ा मगर दिल ओ दिमाग से एक होना चुना । वह जो जलियाँवाला बाग़ में खून बहा था वह हिन्दू,सिख,मुसलमान का नही था ,भारत का था । जिससे तड़पकर पूरा देश एक हुआ था । हम कितने बेगैरत लोग हैं जो जरा जरा से फायदे और बहकावे में आकर आपस मे बंटने लगते हैं । वह कितने घिनौने और देशद्रोही लोग हैं जो हिन्दू और मुसलमान को बाँटकर अपने लिए रास्ता बनाते हैं । हम क्यों नही कहते की हम डा किचलू और डा सत्यपाल के लोग हैं । जलियाँवाला बाग़ में शहीद हुए खून की उपज हैं हम भारतीय ।

आजका दिन याद रखो या भूल भी जाओ मगर यह हमेशा याद रखना जो भी,हाँ जोभी हिन्दू और मुसलमानों को बाँटने की बात करे,वह जनरल डायर के लोग हैं । जो भी अली और बजरंगबली में फर्क करके चलने को कहे वह डलहौजी के लोग हैं । जो भी केवल हिन्दुओं को कोसे या केवल मुसलमानों को कोसे वह सांडर्स के लोग हैं । कुल मिलकर यह वही लोग हैं जो आज़ाद भारत का ख्वाब नही देखते थे,बल्कि गुलाम  भारत का ही ख्वाब देखते थे । बस फर्क इतना था की देश इनके हाथ का गुलाम बन जाए,जिसका ख्वाब इस देश के संविधान ने चकनाचूर कर दिया ।

जलियाँवाला बाग़ सामने रखो और हमेशा सतर्क रहो । पता नही कब कौन जनरल डायर बनकर साथ मिलजुलकर चलने वालों को लाश बना दे । जलियाँवाला बाग़ में हुए हर शहीद के सामने सर झुकाकर कहता हूँ की आपके ही रक्त से उपजे हुए आजाद भारत का नागरिक हूँ । अपनी आखरी साँस तक आपके दिए एकता,न्याय,भाईचारा और सहिष्णुता जैसे मूल्यों की रक्षा करूंगा ।

Thursday, April 11, 2019

रूह

"मुझे लगता है कि अब हमें अलग अलग हो जाना चाहिए"
रूह ने जिस्म से कहा और जिस्म रूह की इस फरमाइश को इकटक देखता रहा । उसने रूह से नही पूछा की जब तुम मेरे सहारे अपनी खुशबू का एहसास करवाती थीं,वह लम्हे भूल गईं ।
जिस्म ने नही कहा कहा कि ए रूह,तुम जानती हो तुम्हारे निकलते ही मैं सड़ने लगूँगा, क्या तुम उस जिस्म को सड़ने छोड़ दोगी जो कल तक तुम्हारा घर था । मुझे मालूम है लोग तुम्हारे बाद मुझे मरा हुआ कहेंगे, क्योंकि वह जानते हैं कि जो है, वह रूह है ।
जबकि हर एक को पता है, रूह जो कहना चाहती थी,वह ज़ुबान कहती थी । जो सोचना चाहती थी,वह दिमाग सोचता था । जो देखना चाहती थी,वह आंखे दिखलाती थीं । जो करना चाहती थी,वह हाथ पैर करता था । मगर एहसान फ़रामोश रूह एक झटके में यह सारे बन्धन तोड़ निकल जाएगी ।

जिस्म ने तड़प कर कहा कि रूह,ए रूह,तुम्हे लग रहा कि तुम मुझे छोड़कर जा रही हो,हरगिज़ नही,तुम मुझे मारकर जा रही हो ।मुझे देखो,सब कुछ होते हुए तुम्हे रोक नही पा रहा हूँ ।
ए रूह जाते हुए एक बात फ़िज़ाओं में उड़ाते हुए चली जाना कि जब रूह नही रहती तो जिस्म चाहे जितना खूबसूरत और तबदरुस्त हो,सड़ने लगता है । फिर वह चाहे धर्म की रूह प्रेम और त्याग हो,देश की रूह मानवता,प्रेम और सहिष्णुता हो,जैसे ही यह निकलेगी इसका जिस्म धर्म और मुल्क दोनो सड़ने लगेंगे ।

रूह हँसी और बोली,वाह रे मेरे पुराने मकान मालिक,ए जिस्म,तू मरने जा रहा है,सड़ने जा रहा है और अब भी उस जगह की फिक्र कर रहा,मानवता की बात कर रहा । अरे अपनी फिक्र कर,मैं चली....जिस्म ने आखरी आँसू पोछा और कहा,अलविदा । मैं यह तो नही कह सकता कि चल दूसरी रूह में मिलेंगे,मगर तू तो जाते हुए कहा सकती है कि चल दूसरे जिस्म में मिलेंगे । जिसे तू अलग होना कह रही,वह अलग होना नही है क्योंकि अलग होने में दोनों ज़िन्दा तो रहते हैं...चल मैं मरने जा रहा हूँ....बिना रूह के मर जाना ही बेहतर भी है..

Wednesday, April 10, 2019

शेरशाह

जिससे तुम प्रेम करो,उसपर इसे प्रकट मत होने दो,अगर तुम शासक हो । यह बात हसन अली सूर अपने बड़े बेटे को दे रहे थे । बता रहे थे तुम्हे चाहे जितना प्रेम हो,चाहे जितना इश्क़ टूटकर आए मगर बेटा इस खुशबू को ज़ाहिर मत होने देना,क्योंकि जो ज़ाहिर हो गया,तो तुम्हारे दिल की डोर तुम्हारे दिमाग से हटकर तुम्हारे प्रेमी के हाथ मे चली जाएगी,जो एक शासक के लिए आत्मघाती है ।

हसन अली अपने बेटे से कहता था कि यह बात मैं पुरखों के सुने सुनाए मंत्रो की तरह तो कह ही रहा हूँ,भुगत कर भी कह रहा हूँ । तुम तो जानते हो मेरी तीसरी बीबी और तुम्हारी दूसरी सौतेली माँ से मैं किस कदर मोहब्बत करता हूँ । जो बात मैने तुम्हारी माँ से नही की वह इससे कहदी और तुम जानते हो कि वह मुझे जिधर चाहती है,उधर घुमाती हैं । मैं उसकी मोहब्बत में अपने दिमाग पर ताले लगा बैठता हूँ । उसका कहना है कि मैं तुमसे जागीरें छीन लूँ और तुम जानते हो मैं छीन लूंगा क्योंकि दिल से कमज़ोर हूँ बेटा ।

उस बेटे ने जागीर गवाने के बाद भी पिता हसन अली की इस बात को गांठ बांध लिया,हर शासक को बांध ही लेना चाहिए । जो मोहब्बत कमज़ोरी बन जाए,वह शासन को टुकड़े टुकड़े कर देती है । मोहब्बत ही है जो हारे हुए सिपाहियों को अक्सर वज़ीर बनाकर राजपाट चौपट करवाकर दम लेती है ।

मैं इश्क़ को पूजने वाला हसन अली की इस फिलॉसफी को मानू भले ही न मगर शासक या उस वर्ग जो शासन करने जा रहा से ज़रूर कहूँगा की अपने दिल और दिमाग की डोर किसी और हाथ मे मत देना । वैसे पिता पुत्र का यह ट्रेनिंग सेशन होता बड़ा लाजवाब था । जब बेटा बाप को सिखाता था कि जनता में अपने लिए मोहब्बत कैसे पैदा की जाए । जगह कैसे बनाएं उनके दिलों में ।

यह बेटा कोई और नही हिंदुस्तान का बादशाह शेरशाह अली था । दो गांवों की जागीर छिनने पर बाप की तरफ से मिली नसीहत को गिरह बांधकर उसने इतने बड़े शानदार मुल्क की हुकूमत की डोर अपने हाथ लेली ।

Tuesday, April 9, 2019

डिम्पल यादव

मुझे नही अच्छा लगता जब कोई डिम्पल जी को डिम्पल भाभी कहता है । यह भाभी शब्द ही अखरता है । भाभी एक बेहद निजी रिश्तों का शब्द है,जिनमे गरिमा,संवेदना और मातृत्व गुंथा हुआ है । यह सार्वजनिक नही होता,जैसे ही सार्वजनिक होता है, मज़ाक़ बन जाता है । मेरी नज़र में वह एक ऐसी नेता भी हैं, जिनका खुद का वजूद है । जिनमें देश की सभ्यता पैबस्त है । जिनमे वह तमाम खूबियां हैं, जो एक लीडर में होनी चाहिए । जो कम बोलती हैं मगर तार्किक और संतुलित बोलती हैं ।

देश ने कभी फ़िरोज़ गाँधी की वजह से  इंदिरा को भाभी कहने की हिम्मत नही की । मेनका गांधी को भाभी नही कहा,सोनिया गाँधी को भाभी नही बल्कि सम्मान से मैडम ही कहा । यहाँ तक राबड़ी देवी को उस दौर में भाभी नही कहा गया,बल्कि राबड़ी देवी ही कहकर संबोधित किया गया । बेगम नूरबानो हों या आज़म खान की पत्नी किसी को भाभी कहने की हिम्मत किसी ने नही की राजनीति में । यहाँ तक जसोदा बेन को भी कभी भाभी नही ही कहा गया । हेमा मालिनी हों या शबाना आज़मी इनको भी भाभी नही कहा गया बल्कि बेटी माना गया ।स्वरूप कुमारी बख्शी जी को उस ज़माने में भी बख्शी दीदी ही कहा गया ।

यह मीडिया के कुछ  मनचलों और अति उत्साही कार्यकर्ताओं के साथ ही,दूसरे गिरोह के शातिर लोगों की हरकतें हैं । ऊपर बताए हर नेता को  या तो देश की बेटी कहा गया या तो बहु मगर किसी को भाभी नही कहा गया ।

हमे मालूम है जिसदिन डिम्पल यादव में आप देश की बेटी देखने लगेंगे नज़रिया ही बदल जाएगा । यह तरीका होता है किसी को गम्भीर बनाने का या किसी की गम्भीरता खत्म करने का,समाजवादी साथियों को इन साजिशों से बचना होगा ।

डिम्पल जी हमारे देश की बेटी हैं, जिनमे लीडरशिप की तमाम खूबियां हैं । आजतक एक भी उल्टा सीधा बयान नही । जब तमाम नेता ज़बान पर फिसल रहे हों,तब भी डिम्पल यादव ने मज़बूती से खुद को संभाले रखा ।
अगर डिम्पल भाभी हैं, तो तमाम महिला नेता जिनके पति राजनीति में हैं या थे,सबको भाभी कहना शुरू कीजिए । देखिये,आपको वह कैसा सबक सिखाएँगे । वह खुद उन्हें मैडम कहने लगते हैं, तो हर एक कहने लगता है ।

डिम्पल यादव, मेनका गाँधी,प्रियंका गांधी,राबड़ी,मीसा भारती, सुषमा स्वराज,सुमित्रा महाजन,मीरा कुमार,मायावती,ममता बनर्जी,निर्मला सीतारमण और रीता बहुगुणा जैसी ही देश की बेटी,बहन या बहु हैं ।

डिम्पल जी लीडर हैं और लीडर पर वह रिश्ते नही थोपे जाते,जिनसे गम्भीरता पर असर पड़े । डिम्पल यादव को मीडिया समेत हर कार्यकर्ता को या विरोधी को डिम्पल जी,डिम्पल यादव या समाजवादी लीडर कहकर ही सम्बोधित करना चाहिए । हम उनके विरोधी हों या समर्थक,उनकी गरिमा को सम्मान देना होगा । तमाम राजनैतिक बेटियों और बहुओं की तरह ही डिम्पल यादव इस देश की बेटी हैं । जो देश की संसद में कई बार रहकर राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं । मोदी लहर में भी उन चंद नेताओं में हैं जिन्होंने अपनी सीट बनाए रखी,जब तमाम धुरन्धर हारे,यह कम बड़ी बात नही है ।

Monday, April 8, 2019

चिकन तागे

कभी चिकन कारीगरी ग़ौर से देखिएगा । हम सबकी ज़िन्दगी इसी तरह है । ऊपर से देखने से लगेगा कि कच्चे धागों ने क्या शानदार डिज़ाइन बनाई है । इन धागों की कढ़ाई फूल पत्तियों की शक्ल में उभर कर मन मोह लेगी ।

मगर एक बार पलट कर कपड़े को देख लीजियेगा,बेतरतीब,उलझे हुए तागों के झुंड दिखाई देंगे । यही फ्लॉसफी तो पकड़कर चलने की ज़रूरत है । जो तागे एक ओर जितने उलझे हैं, वही दूसरी ओर खूबसूरत फूल पत्तियां बना रहें हैं ।

हमारी ज़िंदगियां,जो जर वक़्त मुस्कुराते चलती हैं, उसके पीछे भी बहुत से तागे उलझे हुए हैं । यह उलझना ही तो ज़िन्दगी की डिज़ाइन बनाता है, जो जितने सलीके से उलझा है, उसकी ज़िंदगी उतनी खूबसूरत दुनिया को दिखाई देगी...अक्सर कहता हूँ कि जब कभी हाथ मे कभी खूबसूरत कढ़ाई किया हुआ कपड़ा हाथ आए, उसे फ़ौरन पलट कर देखो,पीछे कढ़ाई से ठीक उलटे धागे चिपटे हुए दिखेंगे । तब सबक लेना इतनी शिद्दत से उलझे हुए होगे, तभी ज़माना तुम्हारी खूबसूरती को देखेगा ।

चिकन कढ़ाई को पलटकर देखना और तय कर लेना ज़िन्दगी ऐसी ही है ।बहुत मेहनत,तमाम जुगाड़ और मकसद पर आँख रखकर ही कोई आकृति उभारी जा सकती है । जो उलझा नही,वह सुलझा भी नही।