जिनका साया सर पर था,तो दिल मे डर ही नही आता,लगता कोई भी जगह किसी भी मुद्दे पर लड़ लेंगे,सम्भालने के लिए वह तो हैं ना...यह साया जो सिर्फ मेरे सर पर नही था,बल्कि हज़ारों लोगों के सर पर था,पिछले साल आजके ही रोज़ एक झटके में हट गया ।
मैंने ज़िन्दगी में अपनी आख़री सांस तक इतना सक्रिय इंसान कम ही देखे । कितनी यादें हैं, कितने किस्से हैं मगर हर एक मे उनका जूझना ही तो है ।
जस्टिस राजेन्द्र सच्चर,जिनके पिता जी पंजाब के मुख्यमंत्री रहे और जो खुद दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और मुसलमानों के हालात जानने को बनी मशहूर सच्चर कमेटी...यही नही बल्कि पूरे देशभर में घूम घूमकर तमाम मुद्दों पर सरकार से टकरा जाना तो उन्ही से सीखा..समाजवादी विचारधारा में डूबे एक आदर्श गांधीवादी और सादी ज़िन्दगी जीने वाली शख्सियत ज़माने की मशाल रही है। खुदाई खिदमतगार से बेइंतिहा मोहब्बत करते और हमेशा बढ़चढ़कर उसमे हिस्सा लेते,सरपरस्ती करते । उन्हें हम सबसे एक ही तो उम्मीद थी कि हम इंसानियत के लिए आख़री तक जूझेंगे । एक ही तो मन्त्र दिया हमेशा की सच्चाई और इंसाफ के लिए मर मिट जाओ मगर झुकना मत...
आज पुण्यतिथि है सच्चर साहब की,उनके जैसा ज़मीनी और नरम दिल के साथ सच्ची खरी ज़ुबान के एक्टिविस्ट कम रहे । इस दौर में जब बहुतों की ज़रूरत थी,तब सब एक एक करके अलविदा कह गए । सच्चर साहब जैसे लोग एक युग होते हैं, उनका जाना एक युग का जाना था ।मुझे खुशी है कि जस्टिस सच्चर जैसे लोग ऐसी खेप बना गए जो अगले पचास साल तक तो संघर्ष करेंगे,हमे इस संख्या को बढ़ाना ही होगा ।
हमेशा दिल के सबसे ऊंचे हिस्से में जस्टिस सच्चर रहेंगे...क्योंकि आगे का रास्ता हम उन्ही की दिखाई रौशनी से देखते हैं, देखते रहेंगे ।