Thursday, November 16, 2017

सूफी सरमद

"हाँ तो कर दो न सर कलम।जब मेरा सर धड़ से जुदा होकर ज़मीन पर गिरेगा तब देखना,हाँ तब भी देखना सरमद मुस्कुरा रहा होगा।उसकी मुस्कान तुम्हारे आलमगीर के दिल में जलते गुरूर के चराग़ को बुझा देगी।"
सरमद को सर कलम करने से पहले उसका गुनाह बताया गया की सरमद के जिस्म पर एक भी कपड़ा नही रहता है।वोह नंगा घूमता है।आलमगीर के कई बार मना करने के बावजूद सरमद ने शर्मगाह पर एक बालिश्त का कपड़ा भी नही ढका।यह कुदरत के कानून के खिलाफ है जिसको ध्यान में रखकर सरमद को सज़ाए मौत दी जाती है।

सरमद मुस्कुराता हुआ कहता है कुदरत का कानून।जाओ अपने छोटे से दिल वाले बड़े आलमगीर से कहना की कुदरत का कानून सरमद ने नही तुम सबने तोड़ा है।तुम्हारे नंगे पैदा हुआ बादशाह ने अपने तन पर मखमल का टुकड़ा डाल कर कुदरत का कानून तोड़ा है।तुमने इंसानों के लिबास में फ़र्क करके कुदरत का कानून तोड़ा है।देर न करो ऐ मेंरे प्यारे जल्लाद।कहीं तुम्हारा दिल सरमद की बातों में लिपट कर नरम होता न चला जाए।

तुम्हे तुम्हारे ही आलमगीर से तुम्हारी खुद की ज़िन्दगी छीन लेने का फरमान न मिल जाए।मेरा सर कलम कर दो।
एक झटके में मशहूर सूफ़ी सरमद का सर ज़मीन पर पहुँच गया।इस तरह आलमगीर ने अपने सबसे बड़े दुश्मन,कुदरत के कानून को दरकाने वाले,सरमद को सज़ाए मौत देकर ईश्वर की सत्ता की रक्षा की।इतिहास सरमद,आलमगीर और हमारी नज़रों में हमेशा उलझा रहेगा।हमेशा धर्म और ईश्वर की रक्षा चुटकी भर दिल वाले इंसान करते रहेंगे...

Tuesday, November 14, 2017

बिरसा मुंडा

बेहद खूबसूरत स्कूल है,इतना आकर्षक और विशाल की उसकी कल्पनाएँ मन में हिलोरे पैदा कर रही हैं।इंग्लिश ऐसी की वारे जाऊँ।यहीं स्कूल की दहलीज़ से खूबसूरत चमकता हुआ सुनहरा भविष्य दिख रहा है।आने वाला कल जिसमे मेरी टेबल पर ब्रेड एंड बटर के साथ इंग्लिश का रुतबेदार अख़बार होगा।चार नौकर होंगे जो मुँह से निकले लफ़्ज़ को ऐसे लपकेंगे जैसे उनकी किस्मत बदलने वाली हो।यह सब किसे नही अच्छा लगता होगा।यह कल्पनाएं किसे नही ललचाएँगी।मगर जो इन सबको एक झटके में तोड़ दे।

जो सुनहरे स्कूल की शक्ल से मुँह फेर ले।जो बटर एंड ब्रेड से हाथ हटाकर धनुष थाम ले।जो अपनी भूख में दूसरों की भूख की तड़प देखे।जिसका भरा हुआ पेट,अपनों की ख़ाली थाली के तसव्वुर भर से बेचैन कर दे।जिसके गले में बिलखते बच्चों को देखकर निवाले फंसने लगे।जो अपने कमज़ोर,परेशान,बेसहारा,पिछड़े लोगों की सेवा करते करते 24 साल की मामूली उम्र में ही उस पूरे समुदाय का भगवान बन जाए।वही तो है, जिसपर आज लिखा जाएगा।जिसपर कल भी लिखा जाएगा।

सर उठाकर देखिये।रोते बिलखते नेता बहुत मिल जाएँगे।गर्दन घुमाकर कर देखिये डराने वालों की कतार लगी हुई है।एक बार दिल में झाँक कर देखिये,तब दिल कहेगा की दोस्त तुम ख़ाली हो।तुम्हारे पास कोई लीडर नही,जो दिल के ख़ौफ़ को दूर करे।जो तुम्हे डराए नही बल्कि बढ़ाए।जो तुम्हारे लिए संघर्ष करते हुए सलाखों में दम तोड़ दे।दोस्त तुम्हारे पास कोई बिरसा मुंडा नही है।
आज यह सारी खूबियाँ।आदिवासी समाज को लोहा बनाने की अद्भुत कला।एक एक आदिवासी के दिल में यह डालना की तुम हो तो सब है, वरना कुछ भी नहीं।

बिरतानियों के दिल में जो ख़ौफ़ बिरसा मुंडा ने भरा वोह कौन कर सकता है।आदिवासियों को जो हिम्मत दी वोह कौन कर सकता है।अपना सुनहरा कल छोड़ संघर्ष में कुर्बान बिरसा मुंडा की आज पैदाइश है।आज उनको याद करके संघर्ष सीखने का दिन है।पूरे समाज को कैसे आगे लाए,कैसे उनकी साँसों की हिफाज़त करें,सीखने का दिन है।बिरसा मुंडा जैसी शख्सियत अब पहले से ज़्यादा ज़रूरी हैं।थोड़े थोड़े बिरसा हो जाओ दोस्तों,हम सब साथ चलकर कल का बेहतरीन भारत गढ़ेंगे।सलाम बिरसा मुंडा।

Monday, November 13, 2017

काशी

काशी, यह सिर्फ एक शहर का नाम नही है।यह एक पूरी सभ्यता है।पाँच हज़ार सालों से जिसकी नीव आज भी मज़बूत खड़ी रहे,ऐसी जगह अचम्भित ही करती है।यह काशी,धरती पर हज़ारों साल से खुद में रोज़ होने वाली उथल पुथल से अलग शाँत सा गंगा किनारे खड़ा है।इसकी शाँति शिव की शाँति है।शिव में शाँति रूद्र की है।रूद्र की नगरी उनके अपने अवतार शिव के छूने भर से चमक गई।रूद्र की नगरी में शिव हैं तो शिव की नगरी में रूद्र या कहें इन दोनों की छाव ही तो काशी है।
तभी तो काशी नरेश को शिव का अँश यानि शिवांश जैसी उपाधि मिली हुई है।आप इस शहर को करीब से देखिये तो सुबह भोर में उठने वाला यह शहर और इससे सटकर सोई हुई गंगा नदी,खुद बताएँगे की वह कितना वक़्त यूँहीं बिताते रहे।आबादी आती रहीं,जाती रहीं,राजा महराज आते जाते रहे मगर यह काशी इन सबसे होते हुए बहुत आगे बढ़ गई।काशी एक ऐसा रजवाड़ा जिसकी अपनी खुद की कभी कोई सेना नही रही।जिसकी रक्षा करना दूसरे राज्यों के लिए पुण्य था,वह काशी हमेशा आज़ाद रही।जिस समय शैव और वैष्णव सम्प्रदाय आपस में लड़ कर मर मिट रहे थे,उस दौर में भी काशी ने अपने बाहें तुलसी के लिए फैलाए रखी।शैव का गढ़ काशी में बैठकर ही तो तुलसी रामचरित मानस लिखते हैं।यह काशी का ही दिल तो है जो तुलसी में खुशबू बनकर महकता है।जब जाति वाद पूरे भारत को जकड़ रहा था तब वह काशी ही तो थी जिसने रविदास को गले लगाकर सन्त रविदास बना दिया।काशी ने हर दौर में टूटते समाज को जोड़कर रखा।गंगा की तलहटी से निकली मांटी से बिखरते दिलों को जोड़ा तो अपने ही पानी से उसमे तरावट डाली।
गंगा के अगर हर घाट को देखें तो हरघाट की अपनी एक कहानी है।उस कहानी में उस घाट से जुड़ा एक इतिहास है।उस इतिहास छिपे हज़ारों किरदार हैं।यह घाट कल की तो कहानियां समेटे ही हैं बल्कि रोज़ एक नई कहानी गढ़ रहें हैं।तुलसी की रामायण से आज के साहित्य तक के कितने क़िस्से अस्सी घाट पर उतराते रहते हैं। मणिकर्णिका घाट से मुक्ति मार्ग खोलने वाला यह काशी जन्म से मृत्यु के बाद के चक्र को भी सम्भालता ही है।
पूरा काशी घूमिए तब देखिये भारत की सभी रियासतों के महल,कोठी,भवन वहाँ बिखरे पड़े हैं।हर रजवाड़े का कोई न कोई अँश काशी में मौजूद है।यह काशी जन्म,विवाह,मृत्यु,वैधव्य सबको जगह देने वाला है।देश भर से आई विधवा महिलाओं का शांतिस्थल भी तो अपना काशी ही है।
काशी एकमात्र ऐसी जगह है भारत की जिसमे पूरा भारत समाहित है।यहाँ की स्थापत्य कला में पूरे भारत की स्थापत्य कलाएँ बिखरी पड़ी हैं।यहाँ दक्षिण के मन्दिर हों या ब्राह्मण से लेकर राजस्थान,कश्मीर समेत पूरे भारत की भवन निर्माण शैली मिल जाएगी।
एक ओर जहाँ काशी में भक्ति काल के कवियों,लेखकों का जमावड़ा है तो दूसरी ओर यह घोर वामपंथी लेखकों की आरामगाह भी है।शायद ही कोई दूसरा शहर हो जहाँ मन्दिर के द्वार किसी बिस्मिल्ला खान की आवाज़ से खुलते हों।संकटमोचन मन्दिर आज भी भारत रत्न बिस्मिल्ला खान की शहनाई को नही भूला है।पता नही संकटमोचक बिस्मिल्ला को जगाते थे या संकट मोचक को बिस्मिल्ला खान उठाते,अजब रिश्तों की गवाह है यह काशी।
काशी का ज़िक्र आए और जुलाहे उससे छूट जाएँ तो यह काशी के साथ अन्याय ही तो होगा।इसी काशी की सरहद पर बैठ जब कोई जुलाहा साड़ी बुनता है तो उसे काशी ही तो पहनता है।इस काशी की बुनावट सारी दुनिया साड़ी की शक्ल में पहनती है।सनातन धर्म और संस्कृति को जीती हुई काशी खुद में बुद्ध को भी तो समेटे है।गौतम बुद्ध का ज़िक्र बिना काशी अधूरा है और काशी भी बिन उनके अधूरी है।काशी के उन प्रकाशन गृहों को भी खंगालना चाहिए जो साहित्य को जीवित करते रहे हैं।कंठस्त परम्परा से लिपियों के कागज़ में उतरने तक के हर समय को काशी ने जिया है।गुरु कुल  से लेकर काशी विद्यापीठ और काशी विश्विद्यालय तक का सफ़र भी तो काशी ने ख़ामोशी से तय किया है।भारत की प्राचीन सभ्यता का उत्कृष्ट नमूना है हमारा काशी।जिस तरह माँ गंगा हर आने जाने वालों के पाप धोकर उन्हें पवित्र करती रही हैं ठीक उसी तरह काशी हर युग को,हर शासन को,हर धर्म को,हर जाति, वर्ग,विचार को खुद में समेटकर पवित्र करता रहा है।दुनिया में सब शहर मिटते बिखरते रहे मगर यह काशी है जो सबको जोड़कर अपने मूल स्वरुप के साथ वर्तमान को जोड़ता आगे बढ़ता रहा।यह काशी एक बार देखने वाली जगह नही है, इसे बार बार देखिये,इसमें छुपी संस्कृति की परतो को महसूस कीजिये,काशी की गलियों में बिखरे संगीत,साहित्य,नृत्य सबको देखिये,यक़ीन जानिये यह काशी आपको बार बार चमत्कृत करेगी।

Friday, November 10, 2017

कलाम,हाली और कृपलानी

अगर आपको सिर्फ मुसलमान होने के लिए याद किया जाए तो यह आपकी तौहीन है।अगर आपको मुसलमान सिर्फ अपना समझकर याद करें तो यह आपपर ज़ुल्म है।आपकी सोच इतनी गहरी थी की उसमे सब समा जाएँ।आपका इल्म इतना गहरा था जिसके सामने जाहिलियत खुद बखुद दम तोड़ दे।आज जिस इल्म की इमारत पर हम इतराते नही फिरते उसकी नीव आपने रखी।

आज ही 11 नवम्बर को जब ज़मीन पर आपके कदम पड़े तो किसने सोचा था की यह इंसान नही बल्कि अनमोल मोतियों को गूँथने वाला धागा है।जिसकी ज़िन्दगी लोगो को जोड़ने में खर्च होगी।किसने सोचा था जो बेटा अपनी माँ को 11 साल की उम्र में ही खो देगा,वह मदरसों के चबूतरों पर बैठ कर एक दिन दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत में इल्म का झण्डा बुलन्द करेगा।किसने सोचा था मदरसों की काई से लिपटी दीवारों में वोह अरबी,फ़ारसी,इंग्लिश,हिंदी,उर्दू का नायाब शरबत बनेगा।भला किसने ख्वाब में भी यह सोचा होगा की बहारों से महरूम कोई लड़का पत्रकारिता,लेखन,एक्टिविज्म,पॉलिटिक्स,समाज सेवा,लीडरशिप में सबसे ऊँचा परचम थामेगा।

कौन देख रहा था की मुल्क़ में सबसे पहले काँग्रेस का, सबसे कम उम्र का प्रेसिडेंट यह ही चुना जाएगा।किसी ने सोचा भी नही था की बंटवारे में अपनी ज़मीन को रोते हुए छोड़ते लोगो को किसी के लफ़्ज़ ऐसे बाँध लेंगे, की जो जहाँ रहा वही रुक गया।
वह मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद थे ,जिनकी आज पैदाइश है।यह भारत जैसा महान देश है जिसने उन्हें अपना पहला शिक्षा मंत्री चुना।यह मौलाना आज़ाद की महानता थी की उन्होंने इस माटी में ही अपनी हर साँसों को जिया निखारा और खूबसूरती से रुखसत हो गए।यह मुल्क़ एक से एक नगीनों ने मिलकर बुना है।उन नगीनों में एक और क़ाबिल नगीना थे जेबी कृपलानी और मौलाना हाली।जो सबके दिलों में बराबर से थे।इनका भी आज जन्मदिन है।इनकी रूह ख़ालिस भारतीय थी।इनके लफ़्ज़ लोगो के लिए सबक थे।

हमे फ़ख्र है की हमारे पहले  शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद वाक़ई में ज़िन्दगी भर शिक्षित करते रहे।जेबी कृपलानी आज़ाद भारत में भी अंतिम व्यक्ति के हितो की रक्षा के लिए संघर्ष करते रहे।हाली ने भी पानीपत में दिल्ली की चौखट खींच ली।ग़ालिब के कँधे से उतरी शॉल ओढ़कर और अपने जिस्म से उठती इंसानियत की खुशबू में लबरेज़ जो लफ़्ज़ लिखे वोह ज़माने के लिए रौशनी बन गए।आजका दिन कितना खास है,तीन अलहदा शख्सियत मगर बिलकुल एक,अलग अलग फ़न के माहिर मगर फ़िक्र एक,इंसानियत।तीनो की उम्र बीत गई अपने मुल्क़ के दिलों को एक करने में,मोहब्बत को सबमें पैबस्त करने में,इसीलिए तो आजका दिन बेहद खास है।हाली,आज़ाद,कृपलानी का दिन,हम सबका दिन....

Sunday, November 5, 2017

किताब गुलाब हम

अब तो किताब का वह पन्ना खोल दो।जिसमें तुमने मेरे दिए गुलाब को दबा रखा है।इधर बड़ा बेचैन रहा हूँ।हफ्तों से साँस अंदर से बाहर आने में पूरे बदन की मेहनत ले रही है।मुझे याद है जब ऊँचे टीले पर चढ़ते हुए जब यह गुलाब तुम्हे दिया था,तब सिर्फ फेफड़े ही साँसों को तरतीब में लगाकर,तुम्हारे सामने खड़े किये थे।अब तो हर साँस पर बदन झूल जा रहा है।
कल ही डॉक्टर से मिले थे।बोल रहे थे की साँस घुट सी रही होगी,दवा से सही हो जाएगी।अब इन नासपीटो को कौन बताए यह उखड़ती साँस दवाओं से नही सही होने वाली।

यह तो तब से घुट रही हैं जब से वह ताज़ा गुलाब प्राचीन भारतीय इतिहास की किताब में दबा हुआ है।किताब का रोज़ बढ़ता पीलापन ही तो मेरे चेहरे के गुलाबीपन को फीका कर रहा है।पता नही जाती हुई तुम वह किताब साथ ले गई हो या आजभी गुलाब के साथ वह इतिहास की किताब का इतिहास भी किसी लकड़ी की अलमारी में क़ैद है।कोई वह पन्ना उलट दे और उसमे सूख चुका गुलाब छलक कर बाहर आ जाए,उसके आते ही मेरी साँसे जिस्म से निकल कर हवा में घुल जाएँ।

यह बदन कीड़े मकौड़े की गिज़ा के लिए तैयार हो जाए।मुझे रोज़ मरते हुए लगता है की प्राचीन इतिहास की उस किताब में किसी ने मुझे इस शिद्दत से दबाकर रखा है की न वह मुझे जीने देना चाहता है और न ही मरने दे रहा...बेचैन साँसों में उलझा हुआ एक गुलाब नुमा दिल...न धड़क रहा,न रुक रहा,मर भी तो नही रहा...

Friday, November 3, 2017

नानक

मैं मोहब्बत में था,नही नही बल्कि हूँ।उनकी मोहब्बत में,क्योंकि उनके दिल की नरमी ने मेरे दिल को छुआ था।उनके अल्फ़ाज़ ने मेरी रूह पर हाथ धरे।मैं भी इंसान इंसान को बिना फ़र्क देखने लगा।मुझे लगा की चाहे रेत हो या जँगल,चाहे ज़मीन हो या समन्दर सब जगह मोहब्बत से बदलाव हो सकता है।

मैं कभी दोहों में अटका तो कभी दिल से फूटे अल्फाज़ो में गुँथा,कभी ख़िदमत में पैबस्त हो गया।मैं ज़िन्दगी के हर रँग को सिर्फ आपकी खुशबू से पहचान पाया।दावे से कहूँगा की अगर आपके मानने वालों ने आपकी ज़िन्दगी और फलसफे को छुआ होता तो आपके किरदार की ताक़त उन्हें हर जगह हर हिस्से में पहुँचा देता।
मैं सिंधु के पानी को छूना चाहता हूँ।मैं उस माटी को चूमना चाहता हूँ।मैं उन दोहों को ज़िन्दगी बना देना चाहता हूँ जो मेरे हाँ मेरे नानक के होंटो से निकले हैं।

कोई गुरु यूँहीं नही हो जाता।कोई गुरु बड़ी बड़ी पी आर एजेंसी से नही बन जाता।गुरु तो दिल से होता है।जो सबको सुनता है।गले से लगाता है।समझाता है।पुचकारता है।मनाता है।तभी तो गुरु होता है।गुरु नानक होता है।
अभी कहता हूँ आज गुरु की पैदाइश में लंगर बाटो या न बाटो,बस गुरु की ज़िन्दगी को अपनी ज़िन्दगी में उतारो।गुरु के दिल के इतनी मोहब्बत को उतारो।उतनी तक़लीफ़ को बर्दाश्त करो।गुरु के लिखे,सिर्फ गुरु के लिखे हर लफ़्ज़ को पढ़ो।समझो और ज़िन्दगी में उतारो।

मेरे नानक का दिल जिस दिन तुम्हारे दिल तक पहुँच गया,तुम्हारे चेहरे में चमक आ जाएगी।तुम्हारे लफ़्ज़ दिलों को झकझोरने लगेंगे।मेरे नानक को महसूस तो करो।यह भूमि नानक की वजह से ही महकी है।नानक के लफ़्ज़ और किरदार ही इस देश की ज़रूरत है।नानक हमेशा से ज़्यादा अब ज़रूरी हैं।हम सबमें थोड़े थोड़े नानक हो जाएं तो यह माटी महक उठे।नानक सुन लो।बस आ जाओ।गुरु ग्रन्थ साहिब से निकल कर, हमे इंसान बना दो।मेरे नानक।
जगत में देखो प्रीत,
अपने ही सुखसों सब लागे,क्या दारा क्या मीत।।
नानक भव जल पारपै जो जो गावैं प्रभु के गीत।

Wednesday, November 1, 2017

खण्डहर हो जाएगा यह महल

उसके हाथ में ताज़ा ताज़ा प्लॉट आया था।ज़मीन का सबसे शानदार टुकड़ा।उसने उसमे शानदार घर बनाने का ख्वाब देखा।झट से शहर के सबसे क़ाबिल आर्किटेक्ट से नक्शा बनवाया।वोह चाहता था,उसका घर शहर का सबसे नायाब घर हो।उसके घर में सारी सुविधाएँ हों।वोह सोचता था की उसके घर में उसके रहने वाले अपने बेहद खूबसूरती से रहें।

घर में खूबसूरत टायल्स लगाए गए।छतों को पीयूपी से सजाया गया।नल की टोटियाँ भी हज़ारों की थीं।घर की खिड़कियाँ ऐसे खुलती थीं की सबको हवा मिले,किसी का कहीं भी दम न घुटे।सबके हिस्से में सूरज की रौशनी आए।सबके जिस्म को कुदरत की ठण्डी ठण्डी हवा लगे।
घर बनकर तैयार हो गया।शुरू शुरू में बनाने का हौंसला कुछ दिन चला।फिर जैसे जैसे लोग मरते रहे,वक़्त गुज़रता रहा।घर को संवारने का हौसला जाता रहा।कल तक एक एक नोक पलक रखने वाला अब बहती टोटियाँ पर भी ध्यान नही देता।झड़ती पीयूपी पर भी उसकी नज़रें नही ठहरती।दीवारों पर जमती काली काई भी अब उसके हौसले को नही जगाती।अब उसका दिल भर चुका है।

ठीक ऐसा ही होता है एक देश।उसके बनते वक़्त बड़े हौंसले होते हैं, फ़िक्रें होती हैं, एक संविधान बनता है।जो सबको खुली साँस देता है।धीरे धीरे वोह बनाने वाले लोग मारते जाते हैं और देश घर की तरह पुराना होता जाता है।सारे हौंसले मर चुकते हैं अब सिर्फ फिक्रमन्द लोग लेटे लेटे उसे बूढ़ा होने देते हैं।वोह लोग,जिन्हें निर्माण का नि भी नही पता।वोह घर की मोटी मोटी दीवारों पर, कव्वे के गू के साथ आए बीज से उगे, पकड़िया का पेड़ की तरह होते हैं।

जो धीरे धीरे मज़बूत महलों की दीवार को भी ढहा देते हैं।इस तरह एक खूबसूरत घर खँडहर बनता है।हाँ खण्डहर।हमारे पुरखों का खण्डहर।उनके ख्वाबो का खण्डहर।उनकी उम्मीदों का खण्डहर।अब बस देखना यह है की यह शानदार घर,खण्डहर हमारे सामने होता है या हमारे बच्चों के।हमारी दीवार पर पकड़िया का पेड़ बड़ा हो चुका है।अब उसकी शाखाएं ज़मीन में लगने लगी है....