Friday, March 29, 2019

चौकीदार चोर है

तुमने है जब भरी थी हुंकार
सुर्ख होकर दे रहे थे ललकार
प्रधानमन्त्री एक तरफ थे खामोश खड़े
तुम शब्दबाण लेकर उनपर थे टूट पड़े
भृष्टाचरियों की ईंट से ईंट बजेगी बच्चा बच्चा बोला था।
तुम्हारी ओर उम्मीद से देख सारा देश का देश डोला था ।
लाल किले पर चढने की कसम तुमने खाई थी
सीमा के उस पार लाल आंख तुमने दिखलाई थी
तुमने कहा था देश के दुश्मन खींचकर लाएंगे
भरी जनसभा में बोल उठे थे अच्छे दिन आएँगे
जनता ने उठकर तुम्हारा हाथ थाम लिया
लालकिला पहुचाकर तुमको था मान दिया
सन ४७ में भारत ने देखा था एक प्रथम सेवक
तुमने सर उठाकर कहा अब मैं हूँ प्रधान सेवक
रफ्ता रफ्ता साल का साल गुजरता गया
जोश ऐ उम्मीद का ख्वाब धुंधलाता गया
कैसे भूले बतलाओं तुमने पाकिस्तान में बिरयानी खाई थी
बोलो गले नवाज़ के लगकर तुम्हे जराभी शर्म न आई थी
पठानकोट में आईएसआई को जाँच करने बुलवाया था
पहले बार देश का मान सम्मान तुमने बेच खाया था
मेरा देश जिनको ठहरता रहता था आतंकी सर्वस्त्र
तुम मांग रहे थे उन आतंकियों से चरित्र प्रमाणपत्र

फिर भी देश ने धैर्य रख तुम पर उपकार किया
बिन सवालों के फंसी तुम्हारी वैतरणी पार किया
जबतुम लाखों का सूट पहनकर इतराय
तुम पर शक करने से हम सब कतराय
सोचा चलो हममे से कोई तो खुशहाल हुआ
गरीब तुम्हे आशीर्वाद देकर भी बेहाल हुआ
तुमने कराहती जनता का बटुआ था छीन लिया
नोटबंदी के नाम पर बचाखुचा भी था बीन लिया
सारे अर्थशास्त्रियों को हमने झुठलाया
तुमपर भरोसा करके धोखा था पाया
घर घर डिब्बा बोला नोट में तुमने चिप लगवाई थीं
तड़पते भारतवासियों में झूठी बातें खूब चलवाई थीं
तुमने कहा था विकास सबका और साथ सबका
सहम गया था इन मक्कारियों से तबका तबका
कितना भरोसा करके तुमको हम लाए थे
क्या मालूम था उस समय हम पगलाए थे
धर्म को भड़काकर तुमने किया था खूब इस्तेमाल
हम भी मिट गए और बंटकर हो गए खस्ताहाल
तीन तलाक ,कब्रिस्तान और शमशान को भी तुमने याद किया
भाईचारे पर प्राणघातक इस हमले को हमने भी था बर्दाश्त किया

मन में सिर्फ एक ही विचार था चढ़ रहा
मिट भी जाएँ तो क्या, देश तो है बढ़ रहा
देश की पीठ पर तुमने तब ही खंजर था भोखा
बैंक लुटेरों को विदेश भागने पर दिया था धोखा
किसान ने तुमसे अपने पसीने के मोल पर करनी चाही बात
तुमने उनसे मुह मोड़ कर,धूल में मिलाया था उनके जज़्बात 
मायूसी से थक कर था फंदे से वह झूल गया
तुम्हारे दिए दर्द को मरकर था वह भूल गया
खून से भीगी सीमा पर जब सारा देश गमगीन हुआ
“समस्या बोर्डर पर नही दिल्ली में हैं” पर यकीन हुआ
सैनिक मेरे हँसते खेलते शहीद हो रहे थे
तुम पाक-दिवस की मुबारकबाद दे रहे थे
बताओ सबको छोड़ सिर्फ तुमपर एतबार किया था
हमारे इस ही भरोसे को तुमने तार तार किया था
जब भी तुम विदेश जाकर गर्व के साथ मुस्कुराते थे
तरक्की की उम्मीद में सीना फुलाकर हम लहलहाते थे
हमे लगता ही नही था की सपना चकनाचूर हुआ
हमारे जज़्बात से खेलकर कोई बहुत मशहूर हुआ
तुम्हारे विरोध में उठती हर आवाज़ को हमने था चोट दिया
क्या मालूम था की अपने ही हाथ अपना गला है घोंट दिया

तुमपर जब ऊँगली कोई उठाता था
तमतमाकर देश खफा हो जाता था
खुद को कमजोर करके देश ने तुम्हारा था साथ दिया
उस कमजोरी पर चढकर तुमने हमही को बर्बाद किया
नही मालूम था तुम्हे मजबूत करते करते हम इतना बंट जाएँगे
देश के चाँद अमीरों के झोले भरते भरते खुद ही कट कट जाएँगे 
नहीं नौकरी,नहीं शांति और नही रहा हर हाथ काम
बिना कुछ पाए संसार भर में मुफ्त हो गए बदनाम
तुमने सिर्फ यही भरोसा नही तोड़ा है
भरे मंझदार में हमारा हाथ छोड़ा है
अर्थव्यवस्था हो या हो समाजनिति
तुमने यहाँ सिर्फ किया है राजनीति
जब देश को अटल के जाने के दुःख का था सदमा
तुम अस्थिकलश से वोट पाने का देख रहे थे सपना
प्रचार के सिवा कब तुमने था देश का सम्मान किया
अहंकार में अपनी ही धरोहर का तुमने अपमान किया
देश सारे भेद है जान गया
चौकीदार चोर है जान गया

बांटने वाले हर इंसान को हमने लिया है पहचान 
सबक इसी वक़्त देंगे मिलकर सबने लिया है ठान
धर्म हमारा है,भगवान हमारे हैं,गंगा मेरी है माई 
झूठे धोखेबाज़ को मिटा डालने की कसम है खाई
अब तो पूरा देश है बोल रहा
अहंकार का सिंघासन डोल रहा
तुमको प्रचंड,निरंकुश,असीमित दी थी शक्ति
देशहित छोड़ तुमने सौदागरों की थी भक्ति
जिसके केवल बोल में नही बल्कि हृदय में हो भारत माता
ऐसे सच्चे,सभ्य,साहसी और सरल नेत्रत्व ही आशीष है पाता
तुम ऐसे सम्मान के अब अधिकारी नही हो
व्यथित भारतियों के अब नितिनिर्धारी नही हो
जाओ झोला उठाओ या बन जाओ फ़कीर
देश अब खींचने जा रहा है एक नई लकीर
जहाँ समर्पण होगा,त्याग होगा और दूर रहेगा अहंकार
नौजवान,किसान और कमजोर से दूर हटेगा अन्धकार
हम साथ मिलकर हर एक का भविष्य चमकाएँगे
जगमगाते भारत को विश्वगुरु बनाकर दिखलाएँगे
यह देश, हाँ सुन लो, यह देश अब बंट सकता नही
नफरत से चाक दिलों को अब कोई कर सकता नही

जाओ तुम्हरा युग जो युग था ही नही समाप्त हुआ
हमे गलती सुधारने का दिव्यज्ञान अब है प्राप्त हुआ 
जाते जाते तुमको सदियाँ करेंगी खूब याद
जिसने चलते पहियों को कर दिया था बर्बाद
चलो की आई अब चला चली की बेला
तमाम भीड़ में खुद को देख तो अकेला
मुश्किल में न कोई तेरा साथी है और न ही है कोई संगी
अहंकार के नशे में देख तूने क्या क्या छोड़ दिया हुडदंगी
हर साथी की पीठ में छूरा भोखा था
तू भूल गया की पाल रहा धोखा था
(Written by hafeez kidwai )

Monday, March 25, 2019

न्यूज़ीलैंड का सबक

अगर आप न्यूज़ीलैंड की घटना के बाद उनकी पीएम और जनता को देख लहालोट हो रहें तो रुक जाइये । ज़ाहिर है गुलाब चाहे जितना अच्छा लगे,हम गुलाब नही बन सकते । चाँद चाहे जितना अच्छा लगे मगर हम चाँद नही बन सकते । झरने चाहे कितने खूबसूरत लगें हम झरना नही बन सकते यहाँ तक दुनिया की कितनी ही खूबसूरत औरत या मर्द को देख लें मगर चाहकर वैसा नही बन सकते ।

हम बन सकते हैं, वह किरदार,जो दुनिया को खूबसूरत लगता है । वह तरीका अपना सकते हैं, जिसपर हम लहालोट होते हैं । न्यूज़ीलैंड से सीखिए की दर्द पर मरहम कैसे रखा जाता है । तक़लीफ़ पर क्या बर्ताव किया जाता है ।रोती हुई आँखों से किस तमीज़ से पेश आया जाता है । नफरत को घुटने के बल कैसे बैठाया जाता है ।

आइंदा जब कभी ऐसी घटनाएं हों,होंगी क्योंकि पागलपन बढ़ ही रहा है । तब सीखिए की सिर्फ पोस्ट लिख देने से काम नही चलेगा ।कैंडिल जलाकर खड़े होना पुराना हो गया,फिर भी गनीमत है । उठियेगा और पीड़ित समुदाय को गले लगाइएगा । उनके धर्म,उनके भरोसे को जानिएगा । उनके तरीकों को इज़्ज़त से मानियेगा ।

अगर हमला आतंकियों का है और शिकार कोई हिन्दू है । तो उनके मंदिरों तक फूल ले जाइए,तिलक लगाइए । गीता के पद्य तेज़ तेज़ मिलकर दोहराइये । ऐसे लगे जैसे धर्म आतंकियों की गोली का निशाना भले हो,मगर वह हम सबमें बिखर कर फैल गया है और उन सबके गले लगकर भरोसा दीजिये नफरत के ख़िलाफ़, हम सब एक हैं ।

अगर किसी आतंकी घटना में या लिंचिंग में मुसलमान मारा जाता है धर्म के नामपर,तो मस्जिदों में फूल भेजिए,उस समुदाय को गले लगाइए,उस समुदाय को पढ़िए,कुरान को तेज तेज़ पढ़िए । एक वक्त नमाज़ साथ पढ़िए और कहिये,भाई, नफरत के खिलाफ हम सब एक हैं ।

अगर कोई घटना में सभी तरह के लोग मारे जाएँ, तो सर्वधर्म सभा कीजिये ।नमाज़ और पूजा साथ कीजिये ।तिलक लगाकर सर सजदे में झुकाइये ।चीख़कर कहिये की नफरत के खिलाफ,हम सब एक हैं ।

यह कहना इतना आसान है ना,करना भी बड़ा आसान है दोस्त । जिस न्यूज़ीलैंड पर तुम फ़ख्र कर रहे हो,वहां के आम से लोगों ने यह करके दिखाया है । न्यूज़ीलैंड की आवाम ने हम सबको दर्द से निकलने का रास्ता दिखाया है । और हम तो गांधी और सरहदी गांधी के वक़्त यही तो कर ही रहे थे । हम ज़ख्मो की पपड़ी नोचने वाला नही बल्कि मरहम लगाने वाला बनना होगा...सुक़ून,शांति आएगी,मेरा इसपर तबतक यक़ीन रहेगा जब तक मेरी सांसे हैं और यक़ीन जानो अगर इसे लाने में हमे अभी आखरी सांस लेनी पड़े, तो मैं मुस्कुराने भर का भी वक़्त नही लेना चाहता ।

Sunday, March 24, 2019

गणेश शंकर

कल पत्रकार आग बुझाते हुए शहीद हुए और आज आग लगाते हुए करोड़पति हो रहें । वक़्त इतना बदला की गणेश की खींची लकीर को पार ही क्या करना उधर देखना ही बंद कर दिया पत्रकारों ने । महात्मा गाँधी गणेश शंकर जैसी शहादत की ख्वाहिश रखते थे । नेहरू की बैठकी की दीवार पर दो तस्वीरों में एक गणेश शंकर की थी ।

कानपुर में हिन्दू-मुस्लिम दंगो को रोकने के लिए आज ही तो शहीद हुए थे गणेश शंकर । मैं हमेशा सोचता हूँ,वह कौन सा दिल होगा जो बेतहाशा पगलाई भीड़ के सामने शांति का मंत्र लेकर खड़ा हो जाए । अभी हरयाणा में एक घर मे कुछ लोग लाठी डंडो से तांडव मचाते हैं, सारे पड़ोसी खड़े तमाशा देखते हैं, कुछ वीडियो बनाते हैं । तब लगता है कि क्या इन्होंने कभी गणेश शंकर को जाना भी होगा,पढ़ा भी होगा । क्या इनमे गणेश की एक बूंद रक्त की भी न होगी,जो यह तांडव करती भीड़ से भी ज़्यादा भेड़ बने खड़े रहे ।

गणेश शंकर विद्यार्थी को हर वह याद करे,जो शांति के लिए मर भी सकता हो,जो हिंसा की आग में झुलसते लोगों को बचा भी सकता हो । मैं भी बस एक ही प्रार्थना करता हूँ,की जब इतना दुश्वार माहौल का सामना हो,जब पगलाई भीड़ किसी को मारने को उठ खड़ी हुई हो और मैं वहाँ होऊँ, तो ईश्वर मुझमे गणेश शंकर की आत्मा की शक्ति देना । मैं मर जाऊँगा मगर अंत तक जूझूँगा । बस इस प्रण में कमज़ोर न होऊँ,यही की प्रार्थना होती है ।

एक अंतिम बात हर सिद्धान्त,हर नियम,हर उसूल का एक वक्त आता है । इम्तेहान का वक़्त, जो उससे गुज़रा नही,वह खुद कह सकता है, ज़माना मगर उसे नही मानता । ज़माना परीक्षा सेगुज़रने के बाद परिणाम को ही सम्मान देता है । गांधी अहिंसा की परीक्षा से गुज़रे और शहादत के परिणाम तक पहुँचे, जिसपर सब झुक गए । गणेश शंकर दंगो को रोकने खुद बिना हथियार का सहारा लिए,भीड़ में उतर गए,परीक्षा के लिए जूझ गए,परिणाम उनकी शहादत और दंगो का रुक जाना रहा । दुनिया ने इस परिणाम पर सर झुका लिया ।

दोस्त खुद को परीक्षा के लिए तैयार करो,परिणाम पर ही ज़माना झुकेगा ।नफरत को मिटाने के लिए मिट जाओ । गणेश शंकर को खूब पढ़ो, यही कठिन परिस्थितियों से जूझने की हिम्मत और रास्ता देंगे...आज शहादत पर और इतने विपरीत हालात पर हर चार घर के बाद गणेश की ज़रूरत है जबकि चार देश के बाद भी कोई गणेश नही है ।रास्ते दो हैं एक दंगाई का और दंगाई को रोकने का,खुद तय करना कि किस रास्ते पर चलना है । गणेश शंकर को नमन क्या कहें,शहीद तो ज़िन्दा ही रहते हैं । हम सबमे तब तक गणेश ज़िन्दा हैं जब तक हम नफरत के खिलाफ हैं... हम सब गणेश शंकर में रास्ते के हैं, जहां न रुकना है, न थकना है, बस आग बुझाते हुए किसी रोज़ बुझ जाना है...

Friday, March 22, 2019

भगत सिंह

कई बार फाँसी का फंदा मौत नही लाता बल्कि उस सिंघासन का अंत लाता है जिसके राज में कभी सूरज नही डूबता था । मैं बहुत बातें करके संवेदनाओं को झकझोरने का हिमायती नही हूँ,जिसमे संवेदनाएँ होंगी वह एक झटके में ज़ुल्म के खिलाफ होगा । उसे रोती हुई बच्चों की तस्वीरों की ज़रूरत नही,उसे गिड़गिड़ाती हुई आवाज़ सुनने की ज़रूरत नही,उसे खून से लथपथ औरतों के चेहरे देखने की ज़रूरत नही,जो संवेदनशील है, वह ज़ुल्म के खिलाफ ही होगा बिना अगर मगर लेकिन वेकिन लगाए बगैर,भले खुद मिट जाए ।

जब भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव ज़िन्दा थे,तब देश मे बहुत से राजे महाराजे थे । उनके पास सैनिक और हथियार भी थे ।पैसा और लोग भी थे,नही था तो जिगरा, यह सोच ही नही पाते थे कि इतनी विराट ब्रिटिश सेना से वह लड़ पाएँगे । मगर यह नवजवान जिनके पास न सेना थी,न धन था,न जायदाद थी और न ही हथियार थे,मगर था तो जिगर था,इच्छा शक्ति थी,खुद पर विश्वास था कि वह विराट से विराट शासन के ज़ुल्म के खिलाफ लड़ सकते हैं और लड़ गए ।

यह हमें सिखा गए,ज़ुल्मी चाहे कितना ही प्रचंड भीड़ वाला हो,चाहे कितने ही लाव लश्कर वाला हो,चाहे कितना ही कुटिल हो,चाहे कितना ही मक्कार क्यों न हो,अगर तुम्हारे सीने में धड़कता दिल ज़िन्दा है, तो उससे भिड़ जाओ ।तुम्हारे सीने की चौड़ाई,या जिस्म की लंबाई मायने नही रखती बल्कि तुम्हारा जिगरा यानी इच्छाशक्ति मायने रखती है ।

उठो और यह सीखो की ज़ुल्म के ख़िलाफ़ ज़ुल्म नही करेंगे । उठो और यह सीखो की ज़ुल्म को बर्दाश्त नही करेंगे । उठो और तय करो भारत सबके लिए खुशहाल बनाएंगे ।जहां आंसू नही होंगे,जहां बेबसी नही होगी,जहां गैरबराबरी नही होगी,जहां धर्म के नामपर खून नही बहने देंगे,जहां जातियों में बंटे लोगों को एक करेंगे,जहां लड़कियां उतनी ही आज़ाद होंगी जितना लड़के...भगत सिंह को याद करना,तो खुद को तैयार करना नफरत के खिलाफ,वरना रस्म अदायगी के लिए तो बहुत लोग याद करेंगे । यह मत सोचना की वह खत्म हो चुके चलो नमन लिखकर निकल लें । शहीद मरा नही करते और ऊपर से भगत सिंह तो हरगिज़ भी नही ।

जिन्हें भगत सिंह और दूसरे स्वतन्त्रता सेनानियों के सम्बंध में कड़वाहट याद आ रही हो,यह वही मक्कार लोग हैं जो न भगत के हैं और न दूसरे सेनानियों के । यह ढोंगी हैं, क्योंकि यह न भगत सिंह को मानते हैं और न उनकी मानते हैं । इनको पहचान लो,यह कभी स्वतन्त्रता संग्राम पर भगत के कंधे का इस्तेमाल करके हमला करते हैं, तो कभी सुभाष का तो कभी गांधी का,क्योंकि यह निहायत मक्कार हैं । इनसे बचो और भगत सिंह का भारत बनाने में लगो जहां प्रेम हो,हर एक मे प्रेम....

Saturday, March 16, 2019

बचो,प्रेम करो

देखो देखो वह हँस रहें हैं । देखो वह खुशियाँ मना रहें हैं । न्यूज़ीलैंड के आतंकी हमले के बाद कुछ ऐसा पढ़ने को मिला । यार तुम ग़लीज़ ही क्यों देखते हो,देखो इनसे बहुत ज़्यादा तादात में लोग हमले की भत्सर्ना कर रहें हैं । लोग अफ़सोस कर रहें हैं । तुम उनपर ही क्यों अटके हो जो भटके हुए हैं ।
हर दौर में,हर दुर्घटना पर खुशी और गम दोनो मनाने वाले लोग मिलेंगे । तुम उनकी बात करो,जो इंसान हैं । उनका ज़िक्र ही क्यों करो जो सिर्फ इंसान की सूरत पाए हैं ।

पूरी दुनिया मे सिर्फ दो ही तरह के लोग हैं । एक नफ़रत के ख़िलाफ़ और एक नफ़रत के साथ,यही एक विषय है, जहाँ बीच का रास्ता नही बचता । मेरी समझ से उन्हें देखो और मज़बूत करो जो दुर्घटनाओं पर दुःखी होते हैं ।उनका ज़िक्र ही मत करो,जो खुश होकर अपने इंसान ना होने का सुबूत बराबर देते रहते हैं ।

हर हमला और हर मासूम की मौत हमे सिखाकर जाती है कि अपने अन्दर की नफरत मार दो,वरना पता नही कब तुम्हारे खुद के हाथ मे खून लग जाए । न्यूज़ीलैंड समेत पूरी दुनिया इस हमले के खिलाफ है ।पीड़ितों के साथ है, इसको महसूस करो नाकि इसपर अटके रहो की किसने ट्वीट किया,किसने नही किया ।

एक ग़म का वक़्त है, पूरी दुनिया ऐसी कट्टरपंथी सोच से जूझ रही है । यह दक्षिणपंथ के हावी होने का समय है ऐसे में समझ,धैर्य और साहस को जितनी मज़बूती से पकड़ सकिये पकड़िए । इस वक़्त जब हर ओर नफरत फैलाने वालों को जगह मिल रही है, खुद को इससे बचाए रखिये,अपने परिवार को बचाए रखिये,बच्चों को प्रेम सिखाइये ।

जो इस वक़्त दूसरों पर अटके हैं कि फ़लाने हंस रहें, ढीमाक ने ट्वीट नही किया या देर में किया,वह सम्भल जाएँ । लक्ष्मण के चोटिल होने पर रावण के ग़मज़दा होने की कल्पना मूर्खता है । लक्ष्मण का मूर्छित होना राम के सहयोगियों के ग़म का विषय था,उन्होंने ग़म किया और उबरे भी,यह नही कहा कि देखो रावण इसपर हँस रहा है । ठीक कर्बला में हुसैन की शहादत पर ज़ैनब ने यह नही कहा कि देखो यज़ीद हँस रहा या गम नही कर रहा,बल्कि खुद ही निकली और यज़ीद को इतिहास में कलंक साबित कर दिया ।
अब बस इतना करो,खुद में प्रेम और करुणा भरो...यही हर शहादत कहकर जा रही । ज़रा सा वक़्त है, सम्भल जाओ । इस गुमान में मत रहना की तुम खलनायक नही बन सकते हो,क्योंकि हम सबमे नफ़रत पलटी है । किसी मे निकल आती है, किसी मे हारी हुई पड़ी रहती है ।इसका एक ही इलाज है,प्रेम ।

Sunday, March 10, 2019

नयापन बनाम पुरानापन

मुझे नई चीज़ों से उलझन होती है।मज़ा पुराने सामान में आता है।जब किसी के यहाँ जाऊ तो उसके नए बर्तन में खाना हमे रोकता है।मै चाहता हूँ की वह हमे पुराने कप में चाय दे।उसमें जिसे उसने सैकड़ो बार धोया हो।अपने होंटो से लगाया हो,तब तो अपनापन है।नहाते में जब कोई मेज़बान नई तौलिया देता है तो वह जिस्म में परायापन पैदा करता है।मुझे तो वह घिसा, पिटा तौलिया ही पसन्द है जो सैकड़ो बार उनके बदन को सुखाता रहा हो।

मुझे नई चादरों में नींद नही आती।यहाँ तक नया टूथ ब्रश भी तकलीफ देता है।मुझे अपना पुराना बिखरा सा ब्रश पसन्द है।मैं जब चाहता हूँ इस ब्रश को बदलना तो विरह की वेदना से गुज़रता हूँ।चमकदार नए जूते पैरों को सही रास्ता नही दिखाते।सड़क पर जम कर घिसा जूता मेरी पहली पसन्द है।पता नही क्या शौक़ है।खैर है तो है।पुरानी पीली किताबो में तो मैं बसता हूँ।उसका हर पन्ना हमें सुकून देता है।उस किताब को मैं महसूस कर पाता हूँ।

कभी हँसी आती है,कभी रोना,मगर दोनों ही सूरत में आँसू आ जाते हैं।अब उन्हें अगर नए रुमाल से पोछू तो आँखे सुर्ख़ हो जाए इसलिए पुराना रुमाल भी मेरे शौक में शुमार है।मुझे कपड़ों की प्रेस तो बेहद चुभती है, पैंट की क्रीज़ से बड़ा दम घुटता है।मुझे चमकती चमचम दीवारों से काई लगी बेदम दीवारें ज़्यादा अपनेपन का एहसास देती हैं। तमाम पेंट के मुकाबले चूने से पुती दीवारें दिल मे खुशियाँ भरती हैं । खैर कुछ काम तो दूसरों के लिए करने पड़ते हैं इसलिए बहुत कुछ चाहकर नही कर पाता। यहाँ तक नए पोस्ट से हमे पुराने पोस्ट ज़्यादा अच्छे लगते हैं तभी वह बार बार सामने रखते रहते हैं जैसे की यही...

Thursday, March 7, 2019

महिला दिवस

कोई कहता है की महिलाओं के लिए खास दिन की ज़रूरत क्या है और हम कहते हैं ज़रूरत है।कम से कम उस एक दिन हम हर उस महिला को एक साथ याद तो कर सकते हैं जिसने परम्पराये तोड़ी।रास्ते बनाए।खुशबू बिखेरी।अपने पसीने से चमक पैदा की,हमारी आपकी आँखे खोली।फर्क मिटाए।वक़्त आने पर लगाम थामी और नई नज़ीर बनाई।
वह औरत जब साहस में होती है तब इंदिरा बनती है।जब करुणा में होती है तब मदर टेरेसा बनती है। विज्ञान में कल्पना चावला।जब राजपाट सम्भालती है तब महारानी विक्टोरिया होती है।पर्दे में दुश्मनो के पर्दे उतारकर रज़िया सुल्ताना होती है।रानी झाँसी और बेग़म हज़रत महल बनकर दुश्मन के दांत खट्टे करती है,वो जहाँ होती है एक तारीख बुन रही होती है।जब जिस्म दिखाती है तो सनी लियोन बनती है।जब अदाकारी पर आती है तब रेखा बनती है।जब गला आवाज़ से सुर्ख़ होता है तब बेगम अख्तर बनती है।

जब व्यापार सम्भालती है तो नैना लाल क़िदवई बनती है।जब कलम थामती है तो महादेवी बनती है।इस्मत चुगताई बनकर घर घर से कहानी बटोरती है ।सावित्रीबाईफूले बनकर दासता को तोड़ती है।ज़ुलैखा बनकर मौलाना आज़ाद को कन्धा देती है तो कस्तूरबा बन गाँधी गढ़ती है।बीबी अमतुस्सलाम बन कर संगठन खड़ा करती है।आदिवासी की आवाज़ सोनी सोरी बनती है तो सबसे जूझती इरोम शर्मीला बनती है।जब अध्यात्म को थामती है तो भगिनी निवेदिता बनती है।सूफियाना होकर राबिया बसरी बनती है।रस में मीरा तो प्रेम में लैला होती है।एक धागे को दो तीलियों में बुनकर ऐसी नक़्क़ाशी उभारती है की जिस्म ढककर भी खिल उठें।सर पर ईंट लादे जब कोई औरत बहुमंज़िला इमारत में मज़दूरी करती है तो अच्छी अच्छी ताक़तों का गुरूर चटख जाता है।

कौन सी शय है जिसमे उसने बुलंदिया नहीं पाई।औरत के हर रूप को आज याद करने का दिन है।एक बार उसे आज़ाद करिये।हाथ पैरों से नहीं अपने थोपे विचारों से आज़ाद करिये तब देखिएगा वो इतने ऊपर उड़ेगी की आप फ़ख्र से भर जाएंगे।औरत का सतरूपा या हव्वा या ईव या देवी वाले रूप से छुटकारा पाइए तब देखिएगा वो कितनी बहुरंगी और प्रतिभा वाली है।उसका हर कदम हमारे आपके कदमों से मज़बूत,अडिग और तरक्की वाला है।उसकी समझ हमारी आपकी समझ से परे है।वह हर रूप में सबसे ऊपर है।ईश्वर की सबसे सफल रचना है औरत ।

और हाँ मैं नही कहता की औरतो को तुम बराबरी का स्थान दो,क्योंकि यह तुम्हारे बस में ही नही है।औरत खुद जब चाहेगी,जो चाहेगी ले लेगी,हम और आप देने की ड्रामेबाज़ी ही करते रहेंगे।हम उसे क्या ख़ाक देंगे,हम खुद उसके मोहताज हैं।इसकी एक छींट भर मोहब्बत हमारी ज़िन्दगी को खूबसूरत बना देती है, तो मांगने वाले तो हम हुए।हम सिर्फ इतना कर सकते हैं,की अपने अंदर फ़र्ज़ी गढ़ा हुआ गुरूर तोड़ सकते हैं।

Sunday, March 3, 2019

शिवरात्रि

वो जिसने देवता क्या राक्षसो का भी ख्याल किया।सबको बराबर की मोहब्बत दी।उन सबके हिस्सों का ज़हर खुद पी लिया।वो जिनको मानने में देवता,इंसान,जानवर,राक्षस,संत सब हैं।आप सबको शिव त्रिशूल में दिखते होंगे हमे तो हर कोमल ह्रदय में शिव दिखते हैं।जिनको सबके जज़्बात का एहसास था।जो बिना किसी चालाकी के सबके अपने था।हर एक की पहुँच में थे।पाप पुण्य के ऊपर,वही तो शिव थे।
शिव की तीसरी आँख से पहले कोमल दिल को देखो।आँख तो एक झटके में दिख जाएगी मगर नीले बदन में दिल तब दिखेगा जब दिल से देखोगे।मासूमियत तब दिखेगी जब दिल शिव के लिए सच्ची मोहब्बत होगी।उनके मानने वाले ज़हर उगल सकते हैं मगर उनसे मोहब्बत करने वाले ज़हर पीते हैं।इंसानियत की ख़ुशी के लिए हम ज़हर पी ले तभी तो हम शिव के हैं और शिव हमारे हैं।
बिना फ़र्क किये सबको गले लगाए तभी तो आपमे शिव होंगे।सांप और गंगा एक ही जिस्म में बसे ऐसे विशाल ह्रदय के हैं मेंरे शिव।हाँ मेरे शिव।आप पूजिए हम तो उनसे मोहब्बत करते हैं।
मैं पलट कर देखता हूँ तो सर झुक जाता है की शिव का दिल कितना बड़ा और मासूम था।कौन नही था जो शिव तक आसानी से पहुँच जाता था,किसे आखिर शिव हासिल नही थे।उनको पाने में न कोई शर्ते,न बन्धन,न नियम वोह तो सबके हैं।नीले जिस्म में मौजूद सफ़ेद रँग सा ठहराव ऊपर से चेहरे पर दूर तक बिखरी मुस्कान अपने आप में सारा संसार लपेटे हुए।
पार्वती को अपने समक्ष बैठा कर औरत के दर्जे की हिमायत करते शिव आखिर क्यों नही दिखते।प्रकृति के हर सजीव में कोई विभेद किये बिना वोह सबके हैं।जानवर,कीड़े मकौड़े,पक्षी,मछली,इंसान सब तो शिव की चौखट तक आसानी से पहुँच सकते हैं, क्योंकि शिव आकार, लिंग,विचार सबको पार करके ही तो गले लगाते हैं।मुझे शिव से मोहब्बत।शिव को मुझसे मोहब्बत है।जहाँ मोहब्बत होगी वहाँ किसी तरह का भेद नही होगा।वही तो शिव होंगे।
मोहब्बत शिव में है, शिव मोहब्बत में है।हो सके तो उनके नाम लेकर चीख़ पुकारने से अच्छा है, उनके ह्रदय के गुलाबीपन को महसूस करना।मेरे शिव बड़ी आसानी से मोहब्बत वाले दिल में उतर जाते हैं।जिस दिन तुम्हारी ज़बान से शिव या भोले,तुम्हारे ह्रदय में उतर जाएँगे वही दिन महाशिवरात्रि होगी।वही मेरे शिव का पर्व होगा,मोहब्बत का पर्व,निर्माण का पर्व,ज़हर पीकर दूसरे को ज़िन्दगी देने का पर्व,मेरे शिव का मूल यही तो है।