Wednesday, January 31, 2018

अजब हैं हम भारतीय

अजब मुल्क़ है मेरा। एक तरफ दंगा होता है।भीड़ एक नौजवान को निगल जाती है।तो दूसरे धर्म की भीड़ दूसरे धर्म के नौजवान को निगलने निकलती है।उसकी आँख फोड़ देती है की तभी भीड़ में से बहुतों को दिल पिघलता है और उसे जाने देते हैं।ज़िंदा जाने देना बताता है की अभी भी गाँधी बुद्ध इस देश के ज़र्रे ज़र्रे में हैं।

अब देखिये जिसकी आँख फोड़ते हैं वह अस्पताल में बिस्तर पर अथाह तकलुफ में भी उस भीड़ को माफ़ करता है।उनके लिए कोई तकलीफ़देह अल्फ़ाज़ नही निकालता बल्कि उनके सीधे राह पर आने की दुआ करता है।तब लगता है इसी ज़मीन पर हज़रत मोहम्मद और हज़रत ईसा के पाँव की धूल भी है।

अब देखिये,यह हमारे भारत में ही मिलेगा और कहीं नही,वही भीड़ जो आँख फोड़ती है, उस धर्म के बीच से एक खड़ा होता है को भाई,तुम्हे मैं अपनी आँख दान देता हूँ।तुम मेरी आँख से यह खूबसूरत ज़मीन देखना।तब लगता है की वाक़ई इस ज़मीन में अभी भी कर्ण और श्री कृष्ण के पाँव की महक है।

मुझे मेरा देश हमेशा चमत्कृत करता है।दँगे होते हैं।कुछ लड़ते हैं।कुछ जोड़ते हैं।उन्ही में से कोई आग लगाता है।कोई आग बुझाता है।कोई चीखकर ज़हर उगलता है तो कोई कँधे पर हाथ रख करता है, यह पागल लोग हैं, अभी हम सब हैं न।
हमने अपनी ज़मीन पर उबलती हुई नफ़रत को बेतहाशा मोहब्बत के आगे हारते हुए बहुत बार देखा है।हो सके तो नफ़रत को फैलाने से ज़्यादा उन किस्सों को फैलाव जो मोहब्बत से भरे पड़े हैं।जिनमे प्रेम,त्याग,समर्पण है।सच जानो इन किस्सों से नफ़रत और नफ़रत पालने वाले लोग बेहद घबराते हैं।डरते हैं।बेचैन होते हैं।

Monday, January 29, 2018

गाँधी जी यह न करते

अर्रे मुझसे छुप क्यों रहे हो,मेरे करीब आओ,मेरे पास बैठो।तुमने मुझे गोली मारी,मुझे ज़रा भी दुःख नही।तुम मुझसे नाराज़ थे,बहुत बार नाराज़गी में ऐसे कदम उठ जाते हैं।मुझे आज नही तो कल मरना ही था।आखिर कितना जीता मगर यक़ीन करो गोडसे मैं तुम्हारे काम से रत्ती भर नही नाराज़ हूँ।तुमने तो वोह किया जो तुमने अपने संगठन के बड़ो से सीखा।मुझे तुम्हारी फाँसी पर अफसोस है।जब तुमको मुझे मारने के जुर्म में फाँसी दी जा रही थी तब मैं तड़प रहा था।

मैं ठीक उस वक़्त चाह रहा था की काश मैं ज़िंदा होता और तुम्हे अपनी चादर में छुपा साबरमती आश्रम लिए जाता।मुझे पता है जब तुमने मुझपर गोली चलाई तो तुम मुझसे हद दर्जे नफ़रत करते थे।मगर गोडसे मैं फिर कह रहा हूँ की तुम्हारे साथ जो किया गया।जो मेरे ख़ून का बदला लिया गया।भले कानून का ही सहारा लिया गया हो फिर भी यह गाँधी का रास्ता नही था।तुम्हे पता है मुझे कब सबसे ज़्यादा तक़लीफ़ पहुँचती है जब कोई कहता है"गाँधी हम शर्मिंदा हैं-तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं"।सोचो यह नारा,किसी की मौत की कामना का नारा गाँधी को कितना शर्मिंदा करता है।

आओ मेरे पास आओ मैं तुम्हारे पाँव के काँटों को निकाल दूँ।तुम्हे जो तक़लीफ़ मुझे खत्म करने के बाद मिली,मेरी नज़र में नही मिलनी चाहिए थी।गोडसे अगर मुमकिन होता की मैं ज़िंदा हो सकता तो तुम मान लो मैं तुम्हारे हाथ से तमंचा लेकर चरखा पकड़ा देता।भले ही तुम फिर मुझे गोली मार देते।मैं फिर उठकर तुमसे कहता यह सारे लोग मेरे अपने हैं।तुम फिर चाहे गोली मार देते

गोडसे ने गाँधी जी से अपनी रोई हुई,भरी आँखों से कहा की क्या आपने मुझे माफ़ कर दिया।तब वोह बोले,हम नाराज़ ही कब थे।हाँ नाराज़गी तुम्हारी सोच से थी।तुम्हारे दिल में उठती नफ़रत से थी।किसी को अपना न समझने से नाराज़गी थी।अगर हो सके तो यहाँ से अपने लोगों के लिए प्रार्थना करो की वोह नफ़रत से दूर रहें।

आओ तुम्हे यहाँ हर उससे मिलवाता हूँ जिसे किसी न किसी ने अपनी सोच के खिलाफ चलते शहीद कर दिया है।देखो भगत सिंह भी तुमसे नाराज़ नही हैं।मान लो हम सबकी लड़ाई तुमसे या किसी इंसान से नही थी,हम तो नफ़रत वाली सोच के खिलाफ थे।इंसान को इंसान का गुलाम बनाने के खिलाफ थे।खैर छोड़ो और सुकून से यहाँ रहो।
गोडसे रोता हुआ उनके पाँव में झुका जैसे आजके ही दिन भीड़ के सामने वोह गाँधी के कदमों में झुका था।मगर जब सर उठाया तो उसकी आँखे रो रोकर लाल हो चुकी थीं और गाँधी उसके सर पर हाथ रखकर कह रहे थे,नफरत को जीत लो तो सुक़ून मिलेगा।तुम्हारी बेचैनी दूर होगी।उसने रोते हुए कहा"महात्मा गाँधी"

Sunday, January 28, 2018

खिरकानी और अबु सईद

चलो शिकार करते हैं

मनोज और मुनीर बड़े दिनों बाद मिलते हैं।जँगल की ओर जाते हुए तय होता है चलो शिकार करने चला जाए,तफ़रीह आएगी।
मुनीर कहता है यार अब जानवरों के शिकार में मज़ा भी नही आता और रिस्क भी बहुत है, कब इनके चक्कर में बवाल हो जाए।
मनोज कहता है हाँ यार,अब तो मछली का शिकार भी कहाँ रहा,न तालाब हैं और न नदियों में पानी,झीलें तो हमारी मुस्कुराहट सी हों गई,हमेशा के लिए ग़ायब।

फिर दोनों रुकते हैं, सोचते हैं और आँखों में बचपन में वही शिकार वाली चमक दौड़ जाती है।दोनों साथ बोलते हैं-चलो यार इस शिकार में बड़ा मज़ा आएगा,न रिस्क न कोई झँझट, बल्कि और लोग भी बढ़ते जाएँगे,तफ़रीह आएगी,जुलूस निकलेंगे,सब लोग मिलकर शिकार करेंगे,चलो दोस्त हिन्दू और मुसलमान का शिकार किया जाए।
दोनों का शरीर जँगल से शहर की तरफ मुड़ जाता है और आत्मा जँगल की ओर...

Wednesday, January 24, 2018

संविधान प्रस्तावना

कल इसे ज़ोर ज़ोर पढ़ियेगा ताकि फ़र्ज़ी देशभक्तो के कानों तक देश के संविधान की प्रस्तावना के शब्द पहुँच जाएँ।जिनको देश के संविधान पर यक़ीन है, उससे मोहब्बत करते हैं वह कल का दिन मनाने के हक़दार हैं।वह हरगिज़ नही हैं इसके हक़दार जो भीड़ बनकर इनके मूल्यों को घड़ी घड़ी घटाते जातें हैं।
कल 26 जनवरी को यह प्रस्तावना पढ़िए,यह संविधान की अंदरुनी खूबसूरती का चेहरा है।

इसमें माटी की महक है तो हर साँस के हिस्से की आज़ादी के बीज।जो देश से मोहब्बत करता है, वह उनके नागरिकों से मोहब्बत करता है, वह उस देश की चीजों से मोहब्बत करता है।जो कोई भी इसे नुकसान पहुँचाएगा,वह भला देशप्रेमी है ही कहाँ,जिसकी ज़बान पर यह प्रस्तावना फंस फंस कर आए,वह रुके,ठहरे,अपने दिमाग से सोचे,तो यह लफ़्ज़ बेधड़क ज़बान से निकलने लगेंगे,क्योंकि इन्ही में हमारी हर आने वाली नस्ल का भविष्य है...

"WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved to constitute India into a SOVEREIGN, SOCIALIST, SECULAR ,DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens:
JUSTICE, social, economic and political;

LIBERTY of thought , expression, belief, faith and worship;

EQUALITY of status and of opportunity; and to promote among them all

FRATERNITY assuring the dignity of the individual and the unity and integrity of the Nation;

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this twenty-sixth day of November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION"

"हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा
उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए
दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा
इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

Tuesday, January 23, 2018

सुभाष चन्द्र बोस

लोग मर रहे थे।पूरा शहर हैजा की चपेट में था।कहीं बच्चे की लाश पर माँ तड़प रही थी तो कहीं औरते सुहाग की चूड़िया तोड़ रही थीं।कहीं बीवी को खोने के ग़म में कोई आदमी छुपकर फफक कर रो रहा था।शहर का मशहूर बदमाश हैदर खान का भी परिवार हैज़ा की गिरफ्त में था।हैदर खान खूँखार था मगर हैज़ा के आगे एक न चली।सबका ख़ून एक झटके में बहा देने वाला अपने परिवार को हैज़ा के सामने बेबस देख रहा था।

तभी नौजवानो का एक दल आता है।जिसका नेतृत्व एक खूबसूरत नौजवान कर रहा है।वोह हैदर खान के घर में फैली गन्दगी को साफ़ करने लगते हैं।यह दल पूरे शहर में सफ़ाई अभियान चलाकर हैज़ा से निपट रहे थे।हैदर खान दरी पर पड़ा पड़ा लड़को को सफ़ाई करते हुए देखता है।जब सफ़ाई हो जाती है तो लड़को से वोह पूछता है तुम हमें जानते हो।मैं एक खूँखार बदमाश हूँ।मेरी चौखट पर डर के मारे लोग नही आते।मुझसे कोई मिलना पसन्द नही करता।

तब दल का नौजवान लीडर कहता है ए हैदर खान हमें पता है तुम क्या हो।तुम इतनी ताक़त के बावजूद हैज़ा के आगे बेबस हो।मेरे लिए तुम्हारी तक़लीफ़ दूर करना ज़रूरी है।हम सब शहर की सफ़ाई करके हैज़ा से लड़ रहे हैं।तुम्हारे घर में इतनी गन्दगी थी की उसे तो साफ़ करना ही था।तब हैदर खान कहता है तुमको क्या लगता है की तुमने मेरा घर साफ़ किया है।तुमने तो मेरा मन साफ़ किया है और यह कहता हुआ हैदर खान उस नौजवान केगले लग कर रोने लगा।साथ ही बदमाशी छोड़ समाज के लिए लग गया।

अब सुनिए यह नौजवान कौन था। गाँधी जी को सबसे पहले राष्ट्रपिता कहने वाले,देश के सबसे ज़्यादा दिलों पर राज करने वाल,आज़ाद हिन्द फौज को गढ़ने वाले नेता जी सुभाष चन्द्र बोस।उनके शौर्य और संगठन और क़ाबलियत को लेकर बहुत से किस्से याद हैं।मगर 23 जनवरी उनकी पैदाइश के दिन है।तो उस शुरआत को बताना ज़रूरी था जो एक लीडर को गढ़ता है।

सुभाष को मानने वाले सुभाष की ज़िन्दगी से सीख आगे बढ़ते हैं।सुभाष के विचार और मार्ग को खत्म करने वाले उनको गाँधी,कांग्रेस और दूसरे विवादों में उलझाते हैं।वोह सुभाष की ज़िन्दगी के खूबसूरत पलो पर बात नही करेंगे।उनकी दिल जोड़ने की कोशिश को नही समझेंगे।उनके भारत के हर नागरिक और धर्म के प्रति मोहब्बत को नही बताएँगे।यह तोड़ने वाले लोग नेता जी के जीवन से सिर्फ विवाद ही खोजकर लाते हैं।उन नफ़रत फैलाने वालों को अपना काम करने दें।आप नेताजी की ज़िन्दगी के बड़े कदमो,त्याग,प्रेम,सेवा,राष्ट्र प्रेम,समर्पण,संगठन क्षमता के किस्सों को आम कीजिये।

Friday, January 19, 2018

अब्दुल गफ़्फ़ार खान

लोहे की मोटी मोटी जंज़ीरों से पैरों का गोश्त फट गया था।गोश्त और ख़ून दोनों बाहर आ रहे थे।वोह बूढ़ा इंसान उस ज़मीन में क़ैद था जिसे उसका कहकर उसे दिया गया था।इशारों पर चलने वाले उसके दोस्तों की ज़बानों में हुक़ूमत का ज़ायका लग चुका था।साथ के लोग भी अब उसकी तरफ मुड़कर नही देखते की उसे देखते वक्त कहीं आँखे न झुक जाएँ।
जिस किसी ने ज़मीन के बटवारे को रोकना चाहा था उसे या तो क़ैद मिली या गोली।एक भीड़ थी जो महात्मा को मार देना चाह रही थी तो एक भीड़ दूसरे महात्मा की खाल ज़ंज़ीरो से खीच लेना चाह रही थी।मैं आज यह क्यों लिख रहा हूँ ताकि तुम देखो की भेड़िये कैसे होते हैं।

खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान को जब महात्मा गाँधी ने पाकिस्तान भेजा तब वोह दर्द के साथ बोले गाँधी जी आपने मुझे भेड़ियों के हवाले कर दिया मगर खान बाबा इधर के भेड़िये नही देख पाए।उधर के भेड़ियों ने सरहदी गाँधी को जंज़ीरों से बाँध कर कैद कर दिया और इधर के एक भेड़ियों के झुँड ने महात्मा गाँधी को शहीद कर दिया।
मेरी नज़रों के सामने गाँधी और सरहदी गाँधी के बहुत से किस्से दौड़ रहे हैं।आज बादशाह खान की पुण्यतिथि है तो ठीक 10 दिन बाद महात्मा गाँधी की शहादत का दिन है।

दोनों की मोहब्बत और एक दूसरे के साथ हद दर्जे तक खड़े रहने की मिसाल कम ही हैं।खान बाबा हम सबकी रौशनी हैं।भारत से बेहद मोहब्बत और अपनेपन ने,उन्हें आज़ादी के बाद भी दशकों पाकिस्तानी जेल में रखा।हो सके तो आज ढूंढकर उनहे पढ़िए उनके ख़ुदाई खिदमतगार को महसूस कीजिये।बादशाह खान की इंसानियत की देखिये।उनकी तरफ नज़रें कीजिये,एक सौंधी सी खुशबू आएगी जिसमे अथाह सुकून होगा।आज बेचैन दिलों के साथ मोहब्बत और ख़िदमत की मिसाल खान साहब को याद करने का दिन है...

Tuesday, January 16, 2018

स्पीकिंग ट्री

पढ़िए और मार्ग बनाइये,जहाँ से मनुष्य ऊँचाई तक जाए

Monday, January 15, 2018

दँगाई रेशे

घर लौटते वक़्त उसे लगा उसके दांत में कुछ फंसा है। वह नीम की सूखी सींक से दांत खोदता हुआ लौटता है। पता नही क्या फंसा है जो निकल नही रहा। वह बेचैन सा घर में आता है। टूथ पिक हाथ में लेकर सोफ़े पर लेटा लेटा दांत खोदता है। फिर चैन की साँस लेता है। कुछ हो देर बाद लगता है की अभी भी फंसा हुआ है, वह ज़बान ऊपर नीचे करके उसे टटोलना चाहता है मगर पता नही चलता। उस बार वह मज़बूत धागे से दांत के बीच फंसे हुए को निकालता है,कुछ निकल जाता है, सुकून मिलता है।

रात के खाने में सामने तरह तरह की सब्ज़ियों के बीच उसे फिर दाँतो में कुछ फंसा लगता है। वह फिर बेचैन होता है।आखिर सामने बैठी माँ पूछ बैठती है की दाँतो में क्या फंसा है, क्या खाया है, कुछ नॉनवेज तो नही खाकर आए हो।
वह न में सर हिलाता है और याद करता हैआज जब उसके मुहल्ले की भीड़ उस दूसरे धर्म के लड़के को दौड़ा दौड़ा कर मार रही थी,पीट पीट उसकी जान निकाल रही थी।उसके ज़िंदा गोश्त को बोटी कर कर के तो वही लोग फ़ेंक रहे थे।तब वह तो चुप चाप खड़ा सिर्फ देख ही तो रहा था,तो यह गोश्त के रेशे उसके दांत में क्यों फंस रहे.......

Sunday, January 14, 2018

मायावती

वह यूपी के मामूली से गाँव में,बेहद मामूली परिवार में पैदा हुई।बाप घर में बेटा चाहते थे,एक के बाद एक तीन लड़कियो के बाद छ लड़के पैदा हुए जिनमे वह सभी लड़को से बड़ी थी।दिल्ली के इन्द्रपुरी की झुग्गी झोपड़ी में नौ भाई बहनों मे पली बढ़ी।
उस वक़्त दिमागी सीलन,पिछड़ेपन,सामाजी तौर पर अछूत दँश को सहते हुए लड़की होना किसी गुनाह से कम नहीं था।वही लड़की को एक धुन थी की आईएएस बनकर अपने समाज को आगे बढ़ाना है।वह सब दूर करना है जो उसने झेला है।वह आईएएस नही बन सकी।बीएड के बाद साधारण टीचर रहकर लॉ में एडमिशन ले लिया ताकि अपनों के लिए लड़ पाए।वह तमाम मुश्किलो से लड़ी।हर एक गलत को जवाब दिया।

यहां तक उस दौर के वरिष्ठं नेता राजनारायण को उनकी ही सभा में उसने अपने तीखे सवालों से खामोश कर दिया।इतना सख्त विरोध किया उस मामूली सी लड़की ने की राजनारायण वापिस जाओ के नारे से हाल गूँज गया।उसी निर्माण काल में एक गुरु ने उसे गुन सिखाया।वह IAS ना बनकर सिस्टम के सिर्फ एक पेंच की जगह,पूरा सिस्टम ही बन गई।डाकघर में नौकरी करने वाले जिस बाप ने नौ बच्चों में लड़को के मुकाबले लड़कियो को नकारा, उसकी इस बेटी ने इतिहास रच दिया।संसद की चौखट पर जब उसके पसीने की बदबू से एलीट महिलाओ ने नाक पर रुमाल धर कर उसे नीचा दिखाया।तब उसने सियासत और समझ की वह खुशबू बिखेरी की एलीट क्लास ध्वस्त हो गया।

उसका उगना और छा जाना हमारे लोकतन्त्र का जादू ही था।मैं बात कर रहा हूँ मायावती की।उनके संघर्ष की।कभी ना टूटने वाली जीवटता की।सीखे वह लोग जिन्हें समाज को आगे बढ़ाना है।दो चोटी धरकर मायावती ने किसी ज़माने में पैदल और साईकिल से चलकर अगड़ो से जूझकर मिसाल रखी थी।कमज़ोर के गले की आवाज़ बनकर वह मुल्क़ में गूँजी थी।

आज फ़ख्र से हाथ हिलाती माया के पीछे वह संघर्ष है जो ज़्यादा बाहर नही आया।माया का बचपन वह था जिसका उसने कभी चीख चीख कर ढिंढोरा नही पीटा।मेहनत से देश के सबसे बड़े स्टेट की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठकर दिखा दिया।मैं राजनीती की जगह लीडरशिप पर बात कर रहा हूँ।लीडरशिप पैदा करना एक बड़ी कला है।बतौर लीडर मायावती के संघर्ष और विकास की दास्तान इतिहास के सुनहरे वरखों में दर्ज हो चुकी है।आगे बढ़िए।इनसे संघर्ष सीखिये।संगठन की कला सीखिये,कभी कमज़ोर होने का एहसास मत पालिए।तमाम कमियों को दरकिनार कर अच्छी चीज़ों को उतारिये।हो सकता है संघर्ष और महत्वकांछाओ के उस दौर में बहुत सी गलतियां की हों या रास्ते डिगे हों फिर भी मायावती की मेहनत और लगन को दरकिनार नही किया जा सकता।

आज मायावती का जन्मदिन है।हम चाहते हैं माया पीछे मुड़कर देखें उस वक़्त को जब काशीराम उनको दलित समाज की कमज़ोरी को दूर करने के ताबीज़ दे रहे थे और वोह बेलौस,बेधड़क उस दर्द को मिटा देने की चाहत रखती थीं।राजनीती के अवसान से पहले वोह कुछ ऐसा कर जाएँ की उनका संघर्ष ज़बानों पर आ जाए।इस वक़्त उनकी ज़रूरत हमेशा से ज़्यादा है, वक़्त के इस मोड़ को मायावती पहचान लें।जन्मदिन की खूब मुबारकबाद।

Saturday, January 13, 2018

तुम मेरी मोहब्बत

मुझे पता है की इस बार मैं तुम्हारे साथ ईमानदारी नही कर पाया।हालाँकि अब कहेंगे तो तुम कहोगी जब शिकायत करदी तो सफ़ाई दे रहे हो।फिर भी तुम इसे सफ़ाई मत समझना,मेरी आदत में सफ़ाई देना कभी रहा ही नही।ज़ाहिर है मैंने भले तुम्हारा ज़िक्र न किया हो,भले ही तुम्हे लफ़्ज़ न दिए हों,फिर भी तुम मेरे साथ ही थीं।

मेरा यक़ीन करना इन दिनों तुम्हारी सौंत की तरह कोई भी मेरे नज़दीक़ नही फटकने पाया।तुम्हारी मोहब्बत में यह सर्दी भी मैंने गुज़र जाने दीं।लोग रोज़ बरोज़ कोई नया रिश्ता लिए खड़े थे।कोई कहता इसे नज़दीक़ करलो,तो कोई कहता इसे गले लगा,मगर मैं नही डिगा।तुमसे मुँह मोड़कर किसी और को चाहने की बेवफाई मुझमे कभी थी ही नही। तुम्हे तो पता है मैं इज़हारे इश्क़ हो या इज़हारे ख्याल में हमेशा पिछड़ जाता हूँ। तुम खुद कितने छूटते रिश्तों की गवाह हो।

मैं जिस मोहब्बत से तुम्हारे साथ होता हूँ,इस ज़मीन पर और किसी के साथ वैसे होने का ख्याल ही बेईमानी है।
तुम जान लो की कल मुझे तुमने कितनी तक़लीफ़ पहुचाई।तुम्हे लगा मैं इस सर्दी में तुम्हे भूल गया।तुमपर चुटकी भर अल्फ़ाज़ भी नही बिखेरे।ऐ मेरी साँवली चाय,जब मैं तुम्हे जून की गर्मी में साथ रखता हूँ,तो जनवरी की सर्द हवाओं में कैसे दूर रखता।लो इस सर्दियों में तुम्हे लिख ही दिया। अब ए अल्हड़ चाय बस उबलकर इतने गाढ़े रँग में ढल जाओ की मैं उसमे डूब कर इन अल्फाज़ो को साँस दे जाऊँ।

Friday, January 12, 2018

न्याय कब तक न्यायपालिका

कोई मज़ाक नही चल रहा की समर्थन और विरोध की ढपलियाँ बजाई जाएँ।कभी तो सियासत से अलग देश के लिए सोच लिया कीजिये।यह वक़्त सरकार के गुणगान का या खींचतान का नही है बल्कि समस्या और आगे की है।चार जज आकर प्रेस कांफ्रेंस करके चले जाएँगे और हम पक्ष विपक्ष के प्रवक्ता बने,सफ़ाई देते रहेंगे।
यह जो चारों जज ने कल किया है यह बेहद अप्रत्याशित था।देश की साख तो जो दाँव पर है ही उससे कहीं ज़्यादा तो दाँव लोकतन्त्र के सबसे मज़बूत खम्भे पर लगा है।मज़ाक,व्यंग्य,पार्टीबन्दी,गाली गलौज से बाहर आकर इस वक़्त तो गम्भीर हो जाइये।सबसे खतरनाक होता है गम्भीरता की जगह मज़ाकिया हो जो जाना।

न्यायपालिका जिस देश की लड़खड़ाई वह देश पूरा लड़खड़ाकर कर गिर सकता है।इस पर गम्भीर होईये।देखिये की आखिर उन चार दीवारों के बीच चल क्या रहा है।आखिर वह कौन सी घटनाएँ हैं जो उनमे से कुछ को बाहर आना पड़ा।अब या तो कुछ अंदर गड़बड़ है या तो कुछ बाहर या तो दोनों में ही मगर इतना ज़रूर है की सही कहीं भी नही है।
इस मुल्क़ से जो भी दिल से मोहब्बत करता होगा,वह फिक्रमन्द होगा।वह परेशान भी होगा मगर वह एक दूसरे से लड़ नही रहा होगा।मुल्क़ से नकली मोहब्बत करने वाले लोग इस मुश्किल वक़्त में कुर्ते नोच रहे होंगे जबकि यह वक़्त समस्या से निपटने का है।दुनिया का हर शासन अपने न्याय की दुहाई देकर ही जनता पर राज करता रहा है अगर यह न्याय की उम्मीद फीकी पड़ी या इसमें शक की गुंजाईश बढ़ गई तो यह बेहद खतरनाक है।

देश की सभी पार्टियों को इसपर एक साथ बैठना चाहिए।प्रधानमन्त्री को सबको साथ लेकर इसपर बातचीत करनी चाहिए।इसे उनका अंदरुनी मामला कहकर टालना ही तो और खतरनाक है।देश की जनता के लिए सब बराबर हैं, इसलिए उनमे पकने वाली खिचड़ी पर सबकी नज़र होनी ही चाहिए।जो भी दोषी निकले उसपर करवाई हो।ताकि आइंदा से लोकतन्त्र के कोई भी स्तम्भ को फ़र्ज़ी चौथे स्तम्भ तक न आना पड़े।इस वक़्त सब एक होईये और उसको बचाने में लगिए जो आज नही तो कल हमारी साँसों की हिफाज़त करेगी,हमारी न्यायपालिका।

Thursday, January 11, 2018

विवेकानंद

आप पर लिखूं,यह कैसे हो सकता है।आपके क़दमों में लिखूं यह भी तो आपको नही पसंद था।जब सुकरात ,अरस्तू, इब्ने फिन,स्पेंसर,चाणक्य,कालीदास सबको मै जवानी के नशे में खारिज कर रहा था तब वह सिर्फ आप थे जिसे मै खारिज नही कर पाया।आपको पढ़ा,सुना फिर जब आपसे घंटों अकेले में बातें की तब ऊपर लिखे नामों को समझा।उनकी अहमियत समझी।
वह आप ही तो थे जिसनें आखों को ऐसे खोला की दीवार के पार दिखने लगा।दिमाग को ऐसे परत दर परत खोला की किसी तरह का मैल नही रह गया।रूह को तराशा।जिस्म में मोहब्बत की खुशबू डाली।अपनी माटी की अहमियत दिमाग में पैबस्त की। ज़िन्दगी को हर घड़ी जिसनें मज़बूत किया वह ही तो थे आप,वही तो थे मेरे विवेकानन्द।
आपनें हमे क्या पढ़ाया और लोगों नें आपको कैसे पढ़ा इसमें बड़ा फ़र्क है।आपने हमे मोहब्बत के साथ मिलकर रहने को सिखाया और दूसरे आपके ही नाम पर नफ़रत बांट रहे।आपने मानवता का बीज डाला लोग आपके नामपर इस ज़मीन को ऊसर बनाने निकल गए।मैं तो दावे से कहता हूँ मेरे विवेकानन्द नें जो वैचारिक,आध्यात्मिक और सामाजिक रेखा खींची है उसे इस काल में तो कोई छूने वाला नहीं,पार करना तो बस से ही बाहर है।
हां बीती रात उन्होंने हमसे कहा दोस्त घबराना नहीं जितना दिल करे मेहनत करो,मुझे एक सुकून पसंद और तरक्की पसंद हिंदुस्तान चाहिए ,मै हर वक्त तुम्हारे पीछे साए की तरह हूँ।मुझसे कहा की आज लोग मेरा जन्मदिन पूरी शान शौकत और जोश से मनाएँगे मगर यक़ीन करो अगर उनके दिल जोड़ने वाले नही हैं,तो मैं वहाँ पाँव भी नही धरूँगा।कल जब हम उनके पाँव दबाने लगे तो वोह बोले यह जो पाँव दबाते में तुम्हारे चेहरे पर सुकून है,यही सुकून पूरे भारत के चेहरे पर मुझे चाहिए।
जाओ कह दो विवेकानंद हर उस जगह से चले गए जहाँ लोग इंसानों के दिल बाँटे।उन्हें लड़ाएं।उनके घर उजड़ने पर खुश हों।मैं उन्हें सुनता रहा और गहरे सुकून की तरफ मन झुकता चला गया।अब मै भी बेफिक्र हूँ एक दिन ज़रूर हमारा मुल्क मुस्कुराएगा।विवेकानंद के साथ हुई रोज़ की बातें लिखने को बहुत है।जी चाहता है उनके मन की टीस को लिख दूँ जो उन्होंने आखरी वक़्त सही मगर कम्बख़्त आंखें भीग कर लिखना दुश्वार कर दे रहीं हैं और मेरे विवेकानन्द को आंसू पसंद नहीं।
आज जब विवेकनन्द के जन्मदिवस पर नौजवान झूम उठेंगे तब यह ख्याल रखना की विवेकानंद ने क्या कहा था और क्या किया था।परमहँस के इस शिष्य को महसूस कर सकना तब आगे बढ़ना।उसकी गहराई को नाप पाना तब कहना की हाँ मैं अपने देश का सच्चा सेवक हूँ।
विवेकानन्द आप हमारे दिल और ज़हन में हमेशा मज़बूती से रहेंगे कल रात वाला वादा फिरसे।