Friday, September 30, 2016

शैलपुत्री,नवरात्र

हे शिव तुम्हे पता है की पिता जी ने एक बहुत बड़ा यज्ञ रखा है।हमे नही बुलाया।सती अपने पति शिव को अपने पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ में न बुलाए जाने पर ग़म में थीं।सती ने शिव से पूछा की चलो हो सकता बुलाना भूल गए हों,तो हमे जाना चाहिए की नही।शिव मना कर देते हैं।सती के दिल को करार नही आता।माँ,बाप,बहनो से मिलने की तड़पन सती को बेचैन कर देती है।उन्हें शिव का इनकार तोड़ देता है।इस क़दर ख्वाहिश को देख शिव जाने को राज़ी हो जाते हैं।सती की एक एक मुस्कान शिव के लिए ख़ुशी थी।
दोनों साथ पिता प्रजापति दक्ष के यहाँ जाते हैं।मगर वहाँ तो माहौल ही उल्टा।कोई सीधे मुँह बात ही नही कर रहा।दक्ष ने शिव से मुँह फेर रखा।नाराज़गी की इन्तेहाँ की बेटी सती पर भी कोई ध्यान नहीं।बहनें बोली बोलने में लगीं,शिव का मज़ाक उड़ाया जाने लगा।सती से पति शिव की उछलती इज़्ज़त देखि न गई।एक बेटी बाप का क्या करती।एक बहन दूसरी बहन को क्या जवाब देती।सती चाहती तो सबको एक झटके में खत्म कर देती।मगर नहीं, उसने अपने आप को खत्म कर लिया।अपने आप को भस्म कर डाला।शिव अपनी सती का यह हाल देख नही सके और एक झटके में दक्ष के सारे अमले जमले को खत्म करके सती के गम में डूब गए।
सती ने योगाग्नि से ख़ुद को खत्म कर लिया।अपने तप से शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में अगलाजन्म लिया।इस बार वे “शैलपुत्री”के नाम से मशहूर हुईं।
शिव की मोहब्बत में इतनी ताक़त थी की सती फिर से उनके साथ रहीं।इस नयी ज़िन्दगी में भी वोह शिव की पत्नि बनीं।यही शैलपुत्री ज़मीन के सभी चरिंद, परिन्द,शजर के लिए हिम्मत बनीं।लोगों ने उन्हें पूजा।उनकी मूर्तियाँ जँगल,जानवर,इंसान सबकी हिफाज़त की पहचान बनी।इन्ही शैलपुत्री की पूजा से ताक़त,सब्र,हिम्मत,मोहब्बत,बुराई के ख़ात्मे, अच्छाई के जश्न के त्यौहार नवरात्र की शुरआत होती है।
मैं यह नही कह रहा की हर कहानियों को मानो, उनपर अँधा एतबार करो।मेरा सिर्फ इतना मानना है की जो भी धागा तुम्हे जोड़ सके,उसे पकड़ो।जो भी डोर तुम्हारे सबके दिलों को थाम सके,उसे मज़बूत करो।अपने इर्द गिर्द रह रहे हर इंसान की खुशियों में वजह ढूँढो, उन्हें महसूस करो और उसे सेलिब्रेट करो।उनके गम को देखो,मायूसी को पकड़ो और सहारा दो।कोई भी त्यौहार बेवजह नही है।कोई भी लोग बेवजह नही हैं।किसी की भी संस्कृति फ़िज़ूल नही है।हर एक में मोहब्बत है।उसे ज़िंदा रखो।आज से नवरात्र शुरू हो रहे हैं।शैलपुत्री हम सबको एक साथ मुस्कुराता हुआ देखना चाहेंगी।न की अपनों का ख़ून बहाते।अगर अपनों का ख़ून बहाना होता तो सती की कहानी कुछ और होती।नवरात्र की शुरआत दूसरी होती।आज पहले दिन से सीखिये और मोहब्बत को फ़िज़ाओं में घोल दीजिये। ©

Thursday, September 29, 2016

हड्डी

यह जो जिस्म है,ज़रा ग़ौर से देखिये इसे।इसमें अलग अलग खाल है।खाल के नीचे गोश्त है।गोश्त में नसें हैं।नसों में ख़ून है।ख़ून में अब हम नही घुसते,वरना पूरी विज्ञान लिख जाएगी।इस ख़ून,नस और गोश्त के ख़मीर के नीचे हड्डी हैं।जब मेरी नज़र हड्डी को देखती हैं तो रुक जाती हैं।सोचता हूँ की क्या इन हड्डियों की ज़रूरत थी।बिना हड्डी के बदन को देखते हैं तो सिर्फ गोश्त की गठरी दिखती है।यानि पूरा जिस्म बिना हड्डी के खड़ा भी नही हो सकता।जब मैं और गौर से देखता हूँ तो हड्डियाँ मुझे अनुशासन की निशानी लगती हैं।हाँ यह हड्डियाँ हमारे जिस्म पर अनुशासन हैं।गोश्त कहीं से भी मुड़ सकता है मगर हड्डी नही।हड्डी उतना ही मुड़ेगी जितना जिस्म के लिए ज़रूरी है।उससे ज़्यादा मोड़ने पर टूट जाएगी।चटख जाएगी।मैं जब इंसान की रीढ़ को देखता हूँ तो लगता है की टुकड़ो टुकड़ों में भी हम काफ़ी झुक सकते हैं मगर सीधी दिशा में,दिशा के उलटे होते ही वोह टूटने लगती है।मुझे लगता है की थोड़ा अनुशासन हड्डी की तरह ही है जो ज़रूरी है।जो हमे खड़ा रखता है।जो हमे समेट लेता है।जो हमे एक सुन्दर आकृति देता है।इसलिए जिस्म की तरह ज़िन्दगी में भी अनुशासन ज़रूरी है।थोड़ा अनुशासन ज़रूर रखिये।अपने पर और अपनों पर।जिस्म की तरह मुल्क़ को भी उस हड्डी की ज़रूरत है।यह अनुशासन हमे हमारे रहन सहन में दिखना चाहिए।जैसे बदन आपका है और हड्डी आपकी,वैसे ही मुल्क़ आपका है और अनुशासन भी आपका।जैसे चाहिए मुल्क़ की तामीर कीजिये।समाज बनाइये।सब आप पर ही है।अपने रास्ते और रास्ते के नियम और अनुशासन को तय करके आगे बढ़िए।बस आगे बढ़ जाइये।खूब आगे।©

Wednesday, September 28, 2016

गोमती नदी

हाहाहाहा कैसी बचकानी हरकते हैं तुम्हारी।तुम आज मुझे गन्दी और नापाक कह रहे हो।तुम मुझे छूने से भी बच रहे हो।डर रहे होगे कहीं बीमार ना पड़ जाओ।तुम्हे पता हैं तुम्हारे दादा नहीं नहीं परदादा या उनके भी दादा मेरी कितनी इज़्ज़त करते थे।जब भी मेरे पास आते तो मै भी पूरे ख़ुलूस से उन्हें समेट लेती थीं।इस मोहब्बत से उन्हें चाहती थी की उनके अंदर बाहर दोनों की गन्दगी मुझमे घुल जाती और वो निकलते तो पाक और शफ्फाक।मैं सदियों से तुम्हारी खिदमत करती आ रही हूँ।आज़ाद बेलौस मोहब्बत के साथ और तुम आज मुझे छूने से भी घबराते हो।हैरत है।मालूम है मुझमें वो पहले सी ताज़गी नहीं मगर ये तो मेरे बस में नहीं था।तुम्हे पता है तुम मुझसे दूर क्या हुए मुझे लोगो ने ऐसे जकड़ दिया जैसे मैं आवारा थी।मुझे संगेमरमर में चुनवाने की साजिशे चल रही हैं और तुम मदमस्त बेफिक्र मेरे ही सामने बैठे चाय पि रहे हो।अपने पुरखो की लाज रख लो मुझे ऐसे तो न चुनवाओ।जब तुम गंदे से आते थे तो मै तुम्हे नहलाती थी।आज मैं गन्दी हूँ तो तुम मुह मोड़ रहे हो।तुम्हारे मैलेपन में मेरी गलती नाथी लेकिन मेरे मैलेपन में तुम्हारा ही हाथ है।मुझे पता है मैं ही चुनवाई जाउंगी क्योंकि मै एक औरत हूँ और तुम आदमी बनकर मुस्कुराना।ठहाके मरकर चाय से खेलना।तब भूल जाना अपनी गोमती को।गोमती नदी को।गोमा मैया को।यूँ ही किनारे बैठे मुझे कंक्रीट में सिसकने देना।जाओ ऐ बेवफा।।।।।।।।।मैं एक टक आंसुओ के साथ गोमती नदी को देखता रहा और वो यूँ ही शिकायत करती रही।।अंतराष्ट्रीय नदी दिवस पर मैं गोमती के पाँव पकड़ कर दिनभर रोना चाहता हूँ,चाहता हूँ की मेरे आँसू तुम्हे खट्टा कर दें गोमा।।हम,गोमती और चाय।।।तीनो बेवफा।।।।जाने कब धोखा देंगे एक दूसरे को।।

Tuesday, September 27, 2016

भगत सिंह

"साथियों स्वाभाविक है जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए। मैं इसे छिपाना नहीं चाहता हूं, लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं कि कैंद होकर या पाबंद होकर न रहूं। मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। क्रांतिकारी दलों के आदर्शों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है, इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में मैं इससे ऊंचा नहीं हो सकता था। मेरे हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ने की सूरत में देश की माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह की उम्मीद करेंगी। इससे आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना नामुमकिन हो जाएगा। आजकल मुझे खुद पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है। कामना है कि यह और नजदीक हो जाए"
यह लफ़्ज़ हमारे नही भगत सिंह के हैं।उनकी हर ख्वाहिश पर ठहरिये,सोचिये तब बढ़िए।मुल्क़ को मुल्क़ से मोहब्बत करने वाले नौजवान चाहिए।अपने नागरिकों से मोहब्बत करने वाले नागरिक चाहियें।अगर आपके दिलों में अपने ही लोगो के लिए नफ़रत है तो आप भगत सिंह को मत याद कीजिये।फ़र्ज़ी ज़बान को तक़लीफ़ मत दीजिये।अगर आपके दिल बँटे हुए हैं तो भगत सिंह आपके लिए नही हैं।भगत सिंह का जन्मदिन वोह मनाएँ जो उनके विचारों, कामों, ज़िन्दगी में से कुछ भी अपनी ज़िन्दगी में उतार पाए।भगत सिंह उनके हरगिज़ अपने नही हैं जो नफ़रत में सने हुए हैं।मेरे भगत सिंह का हर लफ़्ज़ सिर्फ मुल्क़ और उसके खूबसूरत दिलों के लोगों के लिए था।आखरी वक़्त भी वोह उन्ही के लिए तड़प रहा था।भगत सिंह अपने जन्मदिन पर हर उस दिल को ताज़गी,मज़बूती और हौसला देना जो आपके देखे ख्वाबो को कहीं न कहीं छू रहे हैं, कर रहे हैं।यह आपकी,हमारी,देश की रूहें हैं। ©

Monday, September 26, 2016

ओहो भगत की सालगिरह है

आपकी उम्र वहीं ठहर गई जहाँ आपने आखरी साँस ली।मैं चाहता था की आप बूढ़े होते।जब आप बूढ़े होते तो बहुत सी वोह चीज़ें पैदा होती जो हमे लम्बे रास्ते दिखाते।आपका बुढ़ापा बहुत से सवालों का मुकम्मल जवाब होता।आपकी ज़िन्दगी से ज़बरदस्ती पैदा किये गए सवालों के जवाब आपसे बेहतर कौन दे सकता था।यक़ीन मानिये ज़िन्दगी के एक बड़े हिस्से से आप आजतक निकल ही नही पा रहें या कहें हम निकालना नही चाह रहे।मैं जब जब आपके लिखे शब्दों पर अपनी ऊँगली फेरता हूँ तो मुझे लगता है की आप मेरी ऊँगली पकड़ कर हमे पढ़वा रहे हैं।मैं रोज़ आपके विचारों से टकराता हूँ मगर रोज़ हारता हूँ।हाँ एक बात,मोटी से मोटी किताब मैं आपकी ज़िद में पढ़ जाता,क्योकि मुझे आप किताब लिए दिखते,तो दिल कहता की वोह होते तो तुमसे पहले यह किताब पढ़कर खत्म कर डालते।आपसे लिखने का सबक मिला,की ज़िन्दगी पता नही कितनी दूर जाए,मगर दिमाग से उतरे शब्द हमे मरने नही देंगे।सबसे बड़ी चीज़ गलत के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिये आप ही हमारी रीढ़ हैं।यह सच है की मैं बहुत बार आपकी मुखालफत करता हूँ,क्योंकि यह भी तो आपसे ही सीखा है।मैं आपके बुढ़ापे तक के सफ़र को देख रहा हूँ।मेरी कल्पनाओं में भगत सिंह वोह नही हैं जो एक कच्ची उम्र में शहीद हो गए।मेरी कल्पनाओं में हल्की मूँछो और हैट लगाए चमकता हुआ नौजवान भगत सिंह नही हैं।मेरी कल्पना में सफेद बालों और गहरी आँखों वाला भगत सिंह है।मेरी कल्पनाओं में संविधान पर मज़बूत पकड़ और देश का साँचा ढालता हुआ वोह भगत सिंह है जिसके माथे पर रेखाएँ गहरी हैं।मेरा भगत सिंह बूढ़ा हो रहा है वक़्त के साथ,मगर रोज़ मुल्क़ के लिए नए विचार रख रहा है।मेरा भगत सिंह एक उम्र पर ठहरा हुआ नही है, वोह उम्र का सैकड़ा पार करके आजभी बिना सहारे,हमे सहारा दे रहा है।मैं जब आपसे बात करता हूँ तो अक्सर आप ठहर के बोलते हैं, मेरे दोस्त भगत सिंह,आपका यूँ ठहरना बता रहा की आपके शब्दों की गहराई ने अब जिस्म पर विजय पा ली है।मेरे अनुभवी भगत सिंह देश ही नही दुनियाँ का फ्रेम गढ़ रहे हैं।मैं देखता हूँ की आपकी कमर भले झुक रही है मगर गरीब,कमज़ोर,परेशान के लिए आप कुछ मज़बूत बुन रहे हैं।मैंने देखा है आपने खूबसूरत,मुलायम गद्दों पर बैठने से इनकार कर दिया है।आप बुढ़ापे में भी वही खाट पर बैठे हैं जैसे नौजवान बड़े बालों वाला भगत बैठा हुआ है।मुस्कान और फ़िक्र आज भी एक सी हैं।झुर्रियों ने विचारों की गहराई को और बढ़ा दिया है।मैं आपको लेकर इतनी कल्पनाओं में हूँ की मुझे समझ नही आता की भगत सिंह आज हैं भी की नहीं।हैं तो किस तरह हैं,कैसे दिमागों को रूप दे रहे हैं।मैं आपकी अनंत कल्पनाओं में भी एक चीज़ साफ़ देख पा रहा हूँ मुल्क़ और इंसानियत।भगत सिंह चाहे नौजवान रहें या बूढ़े हो जाए,इन दो चीजों से तो कभी भी मुँह न मोड़ते।मै जिस्म में नही उलझता मगर रूह में न उलझूँ यह हो नही सकता।आपकी रूह,यानि आपके विचार लगातार दिमाग को कुरेदते हैं।उसमे पड़ी गुलथियों को खोलते हैं।तब मुझे लगने लगता है की आप क्या चाहते थे और हम किधर जा रहें हैं।अपने जन्मदिन पर भगत सिंह हाँ आप मेरे दोस्त,एक तो वादा करो की ऐसे ही हमेशा साथ रहोगे।हमारी उम्र के साथ तुम भी बढ़ना।जब उम्र ज़िन्दगी और सोच पर असर करने लगे,तो उस वक़्त का साथ देना,हर उम्र की रौशनी बनकर।©

Saturday, September 24, 2016

सुधारक बनाम सेवक

आजके मेरे लफ्ज़ सिर्फ उनके लिए है जिनके लिए समाज कुछ है।जिसके लिए उन्हें जीना है।उनके लिए सिर्फ दो लफ़्ज़ हैं सुधार या सेवा।सेवा को हमेशा सराहा गया जबकि सुधार को गालियाँ मिली।हर आदमी सेवा चाहता है मगर सुधरना नही।जो नए नए लोग थोक के भाव में समाज की फ़िक्र कर रहे हैं, वोह अपनी कूव्वत के हिसाब से अपने रास्ते तय कर लें।अगर हल्के मिजाज़ के हों,वक़्ती मेहनती हों और कमज़ोर दिल के हों साथ ही खुद के शौक़ भी न मारने हों तो वोह समाज सेवा का कुछ वक़्त रास्ता अपना लें।
रोटी,कम्बल,किताबें,दवा,रिक्शे,कपड़े,खाना,शरबत बाँटे।यह भी बेहद अहम् है जो दूसरे नही कर रहे हैं।आप उन सबसे बेहतर हैं जो घर में मगरमच्छ की तरह लेटे हैं।उनसे भी बेहतर हैं जो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने लिए ज़िंदा हैं।
अब बात आती है समाज सुधारक की,तो बड़े गौर से सुनो।यह रास्ता बेहद कठिन,पथरीला और उबड़ खाबड़ है।यह भी गारन्टी नही की तुम्हारे सामने सुबह होगी या तुम्हारे जैसी सैकड़ों नस्ल के खत्म होने के बाद सुबह आएगी।इस रास्ते में तुम्हारा ही समाज तुम्हे रत्ती भर मोहलत नही देगा।तुम्हारे कपड़े फाड़े जाएँगे,कालिख़ पोती जाएगी,समाज अपने दिमाग से मिलते हुए जानवर पर तुम्हे बैठाएगा और तुम पर ठहाके मारकर हँसेगा।
इसलिए कह रहा हूँ समाज सेवा को पकड़ो उसमे वाहवाही भी मिलेगी और अख़बार के चिकने पन्नों पर सुंदर तस्वीर भी छपेगी मगर भूलकर भी समाज सुधारक मत बनना।हाँ अगर तुम्हे रात में नींद न आए।तुम्हे सन्नाटे में मासूमो की चीखें सुनाई दें।तुम्हे चमकदार फर्श और ऐसी में घुटन लगे।तुम्हे समाज में लगी गाँठे चुभें।तुम्हे दिल की दरारे दूर से दिखने लगे।तुम्हे भगवान की चौखट पर अमीर गरीब का फ़र्क दिखने लगे।तुम्हे मस्जिद में अमीर का रौब और गरीब की सिकुड़न दिखने लगे।तुम्हे मज़हब किसी मज़लूम के लिए फंदा दिखने लगे।तुम्हे लड़की के मन की चिटखन दिखने लगे तो उठना और शीशा देखना।अपना बदन देखना।अपनी ताक़त देखना।सबसे पहले तुमसे तुम्हारी ही ड्योढ़ी लड़ेगी।अगर उससे लड़ने की हिम्मत हो तो निकल जाना सुधारने।टूटकर बिखर जाना समाज में।अपने को भूल जाना एक दिन यह ज़माना तुम्हे याद करेगा।
मेरी आवाज़ सुनों।समाज सेवक बनोगे तो लोग तुम्हारे सामने ईनाम और शोहरत से नवाजेंगे,मगर ज़्यादा याद नही रखेंगे।हाँ अगर समाज सुधारक बनोगे तो इस ज़िन्दगी में तो पता नही मगर हमेशा याद किये जाओगे।जैसे बहुत से नाम तुम्हे आजभी याद होंगे।अपने रास्ते जल्द तय करो।यह दोनों रस्ते आम नही हैं।दोनों के लिए दिल,ईश्वर अपने हाथ से बनाता है।तुम भीड़ का हिस्सा नही हो,क्योकि तुम्हारे दिल में खुशबू है।तुम्हे ज़रा भी दूसरे की फ़िक्र है तो यक़ीनन तुम स्पेशल हो।बस देर किये बिना अपने रास्ते तय करो। ©

Thursday, September 22, 2016

बूढ़े क्यों नही बूढ़े हो रहे

आपको हमेशा ऐसा क्यों लगता है की आपका तजुर्बा ही सही है।आपके सफ़ेद होते बाल हमेशा ही सही हों, यह तो मुमकिन नहीं।जैसे ही हम पिज़्ज़ा हाथ में लेंगे आप सत्तू की तारीफ़ के पुलिंदे बाँधने लगेंगे।हमे काली शर्ट पसन्द है तो आपको उसपर एतराज़।हमे कसे कपड़े पसन्द है तो आप ढीले कपड़ों की खूबियाँ बताएंगे।इत्तेफ़ाक़ से डर डर कर अगर बाहर खाना खाने को कह दिया तो आसमान सर पर उठा लेंगे।ख़ुद सारा दिन टीवी पर न्यूज़ देखेंगे मगर हमारी पसन्द की एक भी हॉलीवुड मूवी आपके गले नही उतरती।भय्या यह जो ढेर भर त्यौहार आपने पाले हैं,यह तो और गले की हड्डी बने हुए हैं।निव यर की पार्टी आपसे बर्दाश्त नही होती और खुद के बेसिर पैर के त्यौहार हम पर थोप दे रहे हैं।सच बताएँ यह जो बात बात में व्रत आते हैं यह तो और जीना हराम किये हैं।इनकार कर दो तो धर्म संकट में,अब इनसे कैसे पूछे की धर्म के हिसाब से इन्हें भी वानप्रस्थ या सन्यास ले लेना चाहिए,मगर नही,वोह नही होगा।
बात असल में यह नही है की आपका कहना न माना जाए,बात यह है की आखिर ऐसा क्या है की एक उम्र पर आप ज़रूरत से ज़्यादा फिक्रमन्द हो जाते हैं।क्यों आपको लगने लगता है की यह सामने खड़ा लड़का कुछ नही जानता।आप भी जवान थे।आपके पास आजभी सैकड़ों किस्से हैं बेधड़क ज़िन्दगी गुज़ारने के।शरारते आपने हमसे ज़्यादा की हैं।तो अब आप क्यों हर बात में दखल दे रहे हैं।आपके भी माँ बाप ने आपको बेफिक्र ज़िन्दगी दी,तो आप हमें क्यों मिटठू बनाने पर तुले हैं।इस फ़र्क़ को समझये,बूढ़े हुए हैं तो बूढ़े होईये।ज़रा से जस्टिन बीबर को हमने क्या सुना की आपको मुकेश और रफ़ी की तारीफ़ का मौका मिल गया।हम कैटरीना पर अटके तो आप राखी और नगमा पर।इसमें कुछ भी बुरा नही,बल्कि बुरा यह है की इस बहाने आप हमे,हमारी जेनरेशन में बुराई निकालने का कोई मौका नही छोड़ते।अपनी तरह दूसरे की भी पसन्द की इज़्ज़त करिये।जेनरेशन गैप को समझये।अब सड़क पर वोह ज़िन्दगी नही रही जो तीस साल पहले थी।न वैसे लोग हैं, तो अपनी तरह बनाकर हमे आजके लिए नमूना तो मत ही बनाइये।
हम सबको भी बूढ़ा होना ही है, मगर सच कहे हम आपसा बूढ़ा होना कभी नही चाहेंगे।हम कभी नही चाहेंगे की हमारी निगाहें नौजवानों की बेड़ियाँ बने।हमारे बोल उनकी राह के काँटे।हाँ हमे वैसे बूढ़ा होना है जिसके लफ्ज़ से सुबह सुबह लगे,जिसके होने से घर चहके।जिसकी ज़िन्दगी घर को रूहानियत दे।जिसका साया हर छोटे बड़े को बढ़ने का मौका दे।यहाँ मेरा मकसद बुढ़ों की बुराई का रत्तीभर नही है, बस इतना समझाना भर है की हमे खुली ज़िन्दगी दीजिये जैसे आपको मिली थी।
अपनी हमपर की गई मेहनत को ज़ंज़ीर मत बनाइये।हमे हमारे वक़्त के हिसाब से बड़े होने दीजिये।हम महसूस कर सकते हैं आपकी फ़िक्र को,यक़ीन मानिये आपके हर लफ्ज़ हमारे कानों में रहते हैं, दिल में रहते हैं मगर जब आप एक ही बात को बार बार करते हैं तो यह लफ्ज़ कानों में गड़ने लगते हैं।दिल में चुभने लगते हैं।जो भी हो हम सबको वक़्त के साथ अपने आप को ढाल लेना चाहिए।आप ज़िन्दगी में कभी सत्तू में पिज़्ज़ा का मज़ा नही डाल सकते और हम चाहकर सत्तू में पिज़्ज़ा का,तो यही बेहतर है जो जिसे पसन्द है वोह खाए।इससे हम सब खुश रहेंगे।सुन रहे हैं न हम सब।ख़ाली आप या मैं नही।हम सब खुश रहेंगे।©

Wednesday, September 21, 2016

दिल को रौंदती मोहब्बत

यह मोहब्बत के किस्से हमारे दिलों को रौंद देते हैं...
"हमेशा की तरह दोपहर को बादशाह नसीरुद्दीन अपने बेगम मलिका ए ज़मानी के महल में दाखिल हुए।बेगम ने ख़ूब प्यार उंडेलते हुए कहा,नवाब साहब कहिये आपकी क्या ख़िदमत की जाए।नवाब नसीरुद्दीन ने प्यास का इशारा किया।एक इशारे पर एक बाँदी थाल में गिलास लेकर हाज़िर हुई।नवाब ने बड़ी गौर से उस बाँदी को देखा और कहा"आज से पहले तो तुम्हे नही देखा,नई हो क्या"जवाब में बाँदी ने हाँ में सर हिला दिया।नवाब साहब को तफ़रीह सूझी और गिलास का बचा पानी बाँदी पर छिड़क दिया।बदले में बाँदी ने थाल में गिरा पानी नवाब साहब पर उलट दिया।नवाब गुस्से में लाल पीले हो गए और बोले एक बाँदी की यह हिम्मत की नवाब से गुस्ताखी।तभी बाँदी बोली"जब दो हम उम्र लोग तफ़रीह करते हैं तो लिहाज़ नही किया जाता और ना ही बुरा माना जाता है।"नवाब को जवाब भा जाता है।खैर बाँदी को उसकी गुस्ताखी की सज़ा मलिका ए ज़मानी देती हैं और उसे महल से निकाल दिया जाता है।अब जब भी नवाब आते तो बाँदी का ज़िक्र छेड़ देते,यह बात मलिका को नागवार गुज़रती।आखिरकार अपने वज़ीर की मदद से नवाब साहब बाँदी को बुलवा लेते हैं।निकाह करके अपनी बेगम बना लेते हैं बाँदी को नाम दिया जाता है कुदसिया बेगम।कुदसिया बेगम बड़े नेक दिल की थी जल्द ही नवाब साहब के दिल ओ ज़हन पर कब्ज़ा कर गई।गोमती किनारे खड़े बेगम कुदसिया चाँद निहार रही थीं।पूर्णिमा का चाँद पानी से टकराकर बेगम कुदसिया पर बिखर रहा था।इस ज़बरदस्त खूबसूरती पर न्योछावर होकर नवाब उस रात ही कुदसिया बेगम को मलिका ए ज़मानी बना देते हैं और उन्हें ख़िताब देते हैं मलिका आफाक कुदसिया सुल्तान मरियम बानो बेगम साहिबा मलिका ए ज़मानी।नई बेगम का जलवा अवध में बोलने लगा मगर यह ज़्यादा दिन नही चला।नवाब साहब ने बेगम कुदसिया महल के लिए कोठी दर्शन विलास बनाई।उसी में कुदसिया महल को नवाब साहब की नाराज़गी का पता चला।किसी ने नवाब साहब के कान भर दिए थे की कुदसिया बेगम किसी और मर्द को चाहती हैं।नवाब साहब गुस्से में उनसे दूर चले गए।कुदसिया बेगम ने मन मसोसकर ज़हर खा लिया।जब नवाब साहब को पता चला तो वह नंगे पैर भागे हुए अपनी महबूब बेगम के पास आए और उनका सर अपने पैरो पर रख रोने लगे।तभी भीगी आँखों और लरज़ती ज़बान से कुदसिया महल ने नवाब नसीरुद्दीन से कहा"मेरे हमसफ़र,मेरे मालिक,मेरी आपसे पहली शर्त थी की आप मुझे शक की नज़र से नही देखेंगे।जिसे हज़रत ने तोड़ दिया।मैंने निकाह की रात अर्ज़ किया था की आपकी नज़र बदलते ही मेरी हस्ती मिट जाएगी।जब मालूम हुआ हुज़ूर की नज़र फिर गई तो मैंने अपना क़ौल निभाया।आपकी कुदसिया सिर्फ आपकी थी।यह कोठी दर्शन विलास हमारी पाकीज़गी की गवाह रहेगी।इसके हर दर ओ दीवार हमारी मोहब्बत के गवाह होंगे।"कहते कहते कुदसिया महल खत्म हो गई...©

Tuesday, September 20, 2016

फ़र्ज़ी

एक मुँह बोले सूफ़ी थे।खूब ज्ञान की उल्टियाँ करते फिरते।उनके पास हमेशा हर तरह के सवाल का जवाब रहता था।एक दिन एक पडोसी ने उन्हें आजिज़ करने की सोची।सुबह ही उनके दरवाज़े पर पंहुचा और सलाम करते ही एक सवाल दागा।अरे सूफी साहब, गू  का मज़ा क्या होता है? सूफ़ी साहब बेचारे ग़ुस्से में लाल पीले हो गए, दरवाज़ा बन्द कर लिया।अब क्या था ,रोज़ सुबह शाम उनसे यही सवाल,बेचारे वह भागने लगे।कोई राह ना सूझे।अज़ाब जान हो गया पड़ोसी।फिर तंग आकर अपने बुज़ुर्ग उस्ताद जो बेहद सच्चे और तजुर्बेदार थे,उनके पास पहुंचे।उनसे यह परेशानी बताई।उन्होंने उस पड़ोसी को बुलवा भेजा।उस शरारती पड़ोसी का उनसे भी वही एक सवाल।बड़ी ख़ामोशी से उन्हेंने जवाब दिया।मीठा।गू  मीठा होता है।पड़ोसी कहने लगा वह कैसे?क्या आपने चखा है।बुज़ुर्ग बोले नही बस उस पर मक्खियाँ बैठी देखी हैं।जहाँ तक हमे लगता है मक्खीयाँ ज़्यादातर मीठी ही चीज़ पर बैठती हैं।अगर आप चखकर तस्दीक कर दें तो मेरा जवाब पुख़्ता हो जाए।आने वाली नस्ल को मज़ा भी पता चल जाए और आपका नाम भी मशहूर हो जाए।अब क्या था पडोसी कहाँ भाग गए पता नहीं।उस्ताद ने अपने मुँह वाले सूफी को खूब हिदायत दी।कहा काम करो।लगन से मेहनत करो सिर्फ प्रवचन नहीं वरना तुम्हारे जैसों के ही लिए यह फालतू सवालों वाली तादात खड़ी है।यह लोग रोज़ तुमसे उलटे सीधे सवाल करेंगे जिनसे किसी का कोई मतलब नहीं, मगर तुम ऐसे ही उलझे रहोगे।यह तुम जो चीखते फिरते हो,यही तुम्हारे गले की हड्डी बनता है।इसलिए बोलने से ज़्यादा काम और इबादत में लगो वही खुदा की आवाज़ है।उससे अच्छे अच्छे बदल जाएंगे।नाकि तुम्हारी गला फाड़ आवाज़ से।©