Monday, December 9, 2019

मुसलमानों रुक जाओ

हाँ तो मुसलमान भाइयों और बहनों,उन लोगों को जी भर कर देख लो जो अपनी छवि बनाने के लिए कभी कहा करते थे,सबका साथ-सबका विकास,अब तुम इस नारे से भी निकल गए हो । अब तुम्हारा धर्म ही नागरिकता की बेड़ियां बनने जा रहा है । देख लो गौर से क्योंकि जब सच्चर कमेटी तुम्हारे घर की फटी चादरों का हाल कह रही थी,तब भी तुमने फिक्र नही की उसपर ।

प्यारे भाइयों,घबराना बिल्कुल भी नही,क्योंकि अगर घबराकर मायूस हुए,तो अपने रसूल को शर्मिंदा करोगे । बस हिम्मत से अपने को ठीक करो,क्योंकि तुमको सुधारने के लिए,मज़बूत करने के लिए, भारत के हर धर्म और जाति के लोग जी जान से लगे हैं ।।तुम यह मत समझना कि इस बर्बर भीड़ में तुम अकेले हो,तुम्हारे साथ करोणों हाथ आज भी हैं ।

हो सकता है देश के प्रधानमंत्री का दिल बहुत छोटा हो गया हो,हो सकता है देश के गृहमंत्री के मन मे ईश्वर ने इतनी जगह ही न दी हो कि वह दूसरे के भले के बारे में सोच सके,इससे मत घबराना क्योंकि इसी देश के बाकी सभी प्रधानमंत्री ने अपनी सोच इतनी नीचे नही गिराई थी,वह वाक़ई सबके साथ थे,उन के किये कामों की कद्र करो और खुद को निखारो ।

अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो और राजनैतिक चेतना लाओ । देखो मैं बार बार कहता हूँ कि कोई चाहे कितनी ही अच्छी अच्छी बातें कर ले,चाहे कितना ही जोशीला बोल ले अगर वह एक धर्म की राजनीति कर रहा है, तो वह छलावा है । इस जाल में मत फसना क्योंकि तुम्हारे पुरखे भी इस जाल में नही फँसे थे । जिन्ना भी जोशीली और तीखी बातें करता था मगर मौलाना आज़ाद जानते थे,एक आंख से ज़्यादा नही देखा जा सकता,उन्होंने जिन्ना के रास्ते से अलग वह रास्ता चुना जो सबका था ।

नेहरू और पटेल भी थे,तब भी सावरकर एंड कम्पनी एक धर्म की बात करती थी,नेहरू ने इनसे अलग सबके लिए देश का रास्ता चुना । तो देखो हम सबको मानने वालों में से है, इसलिए भड़काऊ,कट्टर और इकहरे धर्म की राजनीति के झांसे में मत आना । बस खुद को तैयार करो,इस मिट्टी की सेवा के लिए ।

यह NRC या CAB हम लोग लड़कर झेल लेंगे । यह हमारे काम हैं, कानूनी या सामाजिक या राजनैतिक हर तरीके से हम इसका मुकाबला करेंगे । भीड़ भले ही इसे पास कर दे मगर भरोसा रखना,तुममे से एक भी को तुम्हारी माटी से दूर नही जाने देंगे,बस तुम विचलित हुए बिना,बिना मायूसी के अपने कामो में मेहनत करो,पढ़ो,खूब सीखो,खूब बढ़ो ।

हमे पता है तुम तुम्हारे धर्म की वजह से निशाने पर हो,तो इसी को अपनी मजबूती बना लो । कठिन वक़्त खुद को गढ़ने का होता है । मोहम्मद साहब से सीखो की कठिन वक़्त में खुद के पेट मे पत्थर बांधकर भी भूख को रोका जाता है । महीनों के खानों में सालों काट दिए जाते हैं । जलती हुई रेत में नँगे पाँव बैठकर बेहतरीन मुस्तक़बिल भी बुना जा सकता है ।

तुम यह एनआरसी सीएबी जैसी साजिशों से घबराना मत,कोई कुछ नही कर सकता है तुम्हारा,क्योंकि पूरे देश का हर वर्ग तुम्हारे साथ खड़ा है । संसद से सड़क तक तुम्हारे लिए हम हर धर्म के लोगों को लड़ते देख रहें हैं, इसलिए परेशान मत होना ।

बस पढ़ो,काम करो,सीखो और राजनैतिक चेतना रखो । हर उस हाथ को मज़बूत करो जो दूसरे धर्म के साथ तुम्हे भी बराबर खड़ा किये हैं । गांव गांव,कस्बे कस्बे निकलकर बस बच्चों से कहो कि पढ़ें,जो पढ़ा सकते हैं, वह पढ़ाएं, जो काम सिखा सकते हैं, वह काम सिखाएँ,जो लीडरशिप दे सकते हैं, वह लीडर बने मगर सारे ही कब सबके साथ होने चाहिए,इसका दायरा भी सिर्फ मुसलमान तक मत रखना,क्योंकि कमज़ोर दलित,कमज़ोर पिछड़े,परेशान औरतें और खुले दिमाग के गरीब सवर्ण,सब भी तुम्हारी लाइन के हैं, इन सबको भी मज़बूत करो,इनके भी हाथ कलम थमाओ ।

हम मौलाना आज़ाद और रफी अहमद क़िदवई को मानने वालों में से है तो रास्ता भी इनका ही चुनेंगे, हर एक के साथ देश को बढ़ाने में लगेंगे । तुम कमज़ोर मत पड़ना,मायूस मत होना,यह बाँटने वाले तटपंजूहे नेता आएँगे और चले जाएँगे, रह जाएँगी हमारी सभ्यताएं । मुसलमान भाइयों इस मुश्किल वक़्त में किसी हिन्दू भाई के लिए दिल मे मैल मत लाना,वह भी इस सँविधान विरोधी नागरिकता संशोधन बिल 2019 के खिलाफ हैं मगर वह भी हमारी आपकी तरह संसद में कमज़ोर हैं । वह लड़ रहे,तो उनका साथ दो,उनको कमज़ोर और ज़लील मत करो । हमे यह हरगिज़ याद दिलाने की ज़रूरत नही की 57 में हमने क्या किया,47 में क्या किया,हमने तो हर वक़्त अपनी मिट्टी के ख़ातिर अपना खून दिया । यह सभी जानते हैं, तभी तो हम एक दूसरे से मोहब्बत करते हैं ।

हम सब विरोध कर रहें,आप सब भी जितना मुमकिन हो विरोध कीजिये मगर देश के बहुसंख्यको के प्रति को दुर्भाव मत लाइये, क्योंकि डलहौजी के भक्तों की करतूतों से यह भी शर्मिंदा हैं । आप और हम अबकी बार मौका आए तो इन अंग्रेज़ों के तिलचट्टो को वापिस इनकी सीलनभरी दराज़ों में भेज देंगे, बस मज़बूत रहिए और हिम्मत रखिये । विरोध तो हो रहा,पूरा नार्थ ईस्ट सुलग रहा,कश्मीर पहले ही बदतर है,बाकी सारी हिंदी बेल्ट भी तैयार है, हम लड़ेंगे,इनके अंत तक लड़ेंगे । इस हम में हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई बौद्ध सब शामिल हैं । हम सब हैं तो देश है, इनमे से एक भी नही,तो कुछ भी नही । इसलिए परेशान मत होइए और खड़े होइए । राजनैतिक समझ और चेतना रखिये । यह बिल जहां से सर पर थोपा जाएगा,वहीं से हटाया भी जाएगा,बस इसकी गिरह बांध लें ।


सोनिया गाँधी

यूहीं नफरत नही करते हैं,डलहौजी मित्र, दक्षिणपंथी,छोटी सोच वाले, इस महिला से,14 मार्च 1998 कैसे भूलेंगे यह लोग ।  जब इनके सिर पर वह महिला कृष्ण के चक्र समान बैठ गई थी । उस कुर्सी पर जिस कुर्सी की ताकत लोगों को लगता था कि खत्म हो गई है,काँग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी । उस कुर्सी पर जिस कुर्सी से दुनिया की सबसे बड़ी सल्तनत निपट गई थी मगर वह कमज़ोर होने लगी,लोगों को लगता था,बेचारी कमज़ोर औरत क्या ही करेगी । साल दो साल में थककर हारकर निपट जाएगी ।

यह महिला इन्हें ख्वाबों में डराती है, क्योंकि इन्हें पता है कि इस देश में अगर खुलकर मनमानी का राज करना है, तो इस परिवार की उस आख़री महिला को बच्चों समेत राजनैतिक रूप से मिटा दो,जो लौह महिला के स्पर्श और सानिध्य में ढली है ।

आज वह बूढ़ी लगती हैं मगर सोचो उस दौर के सबसे उच्चकोटि के वक़्ता,कवि,ब्राह्मण कुल के युग पुरुष और मातृभाषा हिन्दी के महारथी को अपनी टूटी फूटी हिन्दी से इस महिला ने  मात दी । 98 में जब कुर्सी पर बैठीं, तो किसने सोचा था कि हम सत्ता में लौटेंगे मगर वह औरत कुछ सालों में ही नागफनी के जंगल से सत्ता खींचकर उस आंगन तक ले आई,जिसमे लेटे लोग अपनी विरासत के जा चुकने का ग़म मना रहे थे ।

पूरा देश एक सुर में उस महिला को देश के शीर्ष पद पर देखना चाह रहा था,मगर उसने नकार दिया । "कुर्सी" जिसके लिए कौन से प्रपंच हमारी भूमि पर नही किये गए,उसे नकार दिया । जिन्हें लगता है यह चाल थी,वह मूर्ख लोग हैं । जाएँ और किसी से भी पूछें कि तुम प्रधानमंत्री बनना पसन्द करोगे या बैकडोर से राज करोगे । उत्तर पा जाओगे,मूर्ख भी नही मिलेगा जो नकार दे,प्रधान,सरपंच तक तो यह फार्मूला काम करता है मगर प्रधानमंत्री जैसा पद अच्छे अच्छे फिसल कर गिरेंगे । हमने तो इस पद की लालच में बूढ़ों को दुत्कार कर किनारे होते देखा है, हाथ जोड़े बेबस खड़े देखा है, इसलिए जानते हैं कुर्सी से मुँह मोड़ना दुनिया का सबसे बड़े त्याग में से एक है ।

दक्षिणपंथी यूहीं इस महिला से नही चिढ़ते हैं, उनके चिढ़ने के कारण हैं । इस महिला ने प्रधानमंत्री भी उसे बनाया जिसके धर्म के लोगों को दो दशक पहले कठघरे में रखकर उत्पात मचाया गया था । सोचिए बीस साल में,सिर्फ बीस साल में देश का वह प्रधानमंत्री बन गया,जिसे बीस साल पहले उसके धर्म की वजह से मार डाला जाता । एक धर्म जो दहशत में था,उसका प्रधानमंत्री, यह सोच पाना ही कुछ लोगों की छोटी सोच से मुमकिन नही ।

यह महिला काल बनकर आई दक्षिणपंथियों के लिए और उनके सबसे बड़े संगठनकर्ता कथित लौह पुरुष में ज़ंग लगाकर निकल गई । दस साल उस काँग्रेस को प्रधानमंत्री दे गई,जो 98 में मरने के कगार पर थी ।

हाँ वह बीमार पड़ी,खूब बीमार पड़ी और पकड़ ढीली हुई । जैसे ही पकड़ ढीली हुई,विरोधियों को सांस मिल गई । उसने घर से बाहर निकले पाँव समेटे और इधर एक चेहरा उभरा । वह महिला दर्द में उलझी की उसपर बेतरतीब वार हुए । सब एक साथ मिलकर उसपर टूट पड़े,उसके वंश पर टूट पड़े । अच्छे बुरे सब एक साथ मिलकर उसे घेरने लगे, तरह तरह वेषधर उसको मिटाने निकले,वह डंटकर मुकाबला करती,मगर हार गई,अपनो से ही हार गई । 

जब उसपर हमले शुरू हुए,तो अपने उसके ही पीछे दुबक गए । कोई नही आया सीना खोलकर की मुझ पर वार करो,मैं मरने को तैयार हूँ । उसने खुद को समेटा, नए खून को आगे किया । वह जान गई कि उसका वक़्त पूरा हुआ,अब वह लड़ें जिन्हें इस विचार को आगे बढ़ाना है । जइन्हें जैसी भी हो,बची खुची गाँधी की विरासत को ताक़त देना है, वह सम्भालें ।

हट गई,जैसे तमाम बार हट जाती थीं । बिना कोई ज़ोर लगाए हट गईं और उसकी पार्टी फिर वहीं पहुँच गई,जहाँ से चली थी,निराशा के अथाह समन्दर में डूब गई ।

जब सब बिखरने लगा,तो फिर उसने ज़िद छोड़ी । उसको याद आया कि उसकी आखरी सांस तक लौह महिला से किया वायदा निभाना है । महात्मा के विचारों के दल को दलदल से निकालना है । जो औरत प्रधानमंत्री का पद त्याग चुकी थी,वह सबसे कमज़ोर वक़्त में अपनी जिद छोड़ वापिस कमान संभालने निकल पड़ी,साथ मे ही निकल पड़ी ऊर्जा और एक के बाद एक कदम सूरज के नज़दीक़ बढ़ने लगा ।

पूरा गिरोह इस औरत से डरता है, क्योंकि उन्हें उसमें, अपने पूर्वजों के, दुश्मन पूर्वजों की पूरी खेप दिखाई पड़ती है । वह उसमें गाँधी से राजीव तक की छाप देख,दहलते हैं । वह उसको नीचा दिखाना चाहते हैं, उसे बर्बाद कर डालना चाहते हैं मगर यह सच है, भारत की त्यागी बहू से भला कौन जीता है । 

एक बहु ने अपने बाल खोले थे,दुनिया का सबसे बड़ा युद्ध हुआ और पूरा पथभृष्ट राजतंत्र नष्ट हो गया,जो सुई की नोक के बराबर भूमि नही देना चाहते थे,तहस नहस हो गए । बहु जब अन्याय के विरुद्ध कदम उठाती है, तो बड़े से बड़े महल दरक जाते हैं । आज ताक़त में खड़ी बाँटने वाली ताकते इस बहु से ही डरते हैं, जिसे वह बहु स्वीकार नही कर पाते ।

अंतिम सत्य जानलो,दुनिया मे बड़े से बड़े निज़ाम में चाभी बहु के हाथ सौंपी जाती है, बहु ने अगर उस चाभी की लाज समझ ली तो दुनिया की कोई ताक़त उससे ज़बरन ताला खुलवा नही सकती,क्योंकि नई नस्ल को सँस्कृति परम्पराओं के साथ आगे के लिए तैयार करना बहु की ज़िम्मेदारी होती है,उस बहु से ही तो यह सब डरते हैं ।

जब से वह उस कुर्सी पर लौटी है, तमाम कुर्सियाँ डगमगाने लगी है । विद्रोह के स्वर उठने लगे हैं । डरे हुए विपक्षी भयभीत होकर उसके सिपाहियों को छीन रहें हैं क्योंकि उन्हें वह दिख रहा है, जो उनके पूर्वजों को दिखा करता था । वह जानते हैं, जब तक यह महिला है, तब तक उनको रोज़ नई तरकीब आज़मानी होगी । वह एक त्यागी बहु है, जिसकी काट पीले पन्नो में नही है । यह यक़ीन करो,वह फिर नागफनी के जंगल में नँगे पांव निकल पड़ी है । लौटेगी तो फिर दरककर गिरेंगे कथित शूरवीर । असली चाणक्य ने भी बहु की महिमा,साहस और आवश्यकता समझी थी,नकली चाणक्य तो बहु के पाँव में काटें बो रहें,कीचड़ उछाल रहें,सब लौटेगा,सूद समेत लौटेगा  । डरो,डरकर उसपर वार करो,जितना तेज़ उछलोगे उतना नीचे जाओगे । हर एक जिसने उसके साय से परहेज़ किया,सबको उसकी चौखट छूनी पड़ी है ।

1998 से 2019 तक देख डालो,उस महिला का लोहा मान लोगे । देखो उसकी हर चाल हैरत है, जिनके पुरखे उसपर हमले करते थे,उनके बच्चे उससे ढाल माँग रहे हैं ।

सर पर आँचल धरे पूरी उम्र काट दी हमारे देश की चौखट पर । अब फिर सक्रिय हुईं की सत्ता में खलबली मच गई । जब जब देश के संविधान की मूल आत्मा की बात होगी,तब यह महिला उसके सबसे नज़दीक़,सबसे अधिक मजबूती से खड़ी दिखाई देंगी क्योंकि वह हमारा भरोसा हैं ।

सोनिया गाँधी पर जितने चाहे सवाल दाग दो मगर उनकी मेहनत,रणनीति और सौम्यता से विपक्ष को घुटने के बल बैठाना लम्बे वक़्त तक याद किया जाएगा । सबसे लंबे वक्त तक काँग्रेस अध्यक्ष पद पर बैठकर,सबसे कमजोर वक़्त में भी दसयों साल सत्ता दिलवा पाना आसान नही है । सोनिया गाँधी के बेहतर चीज़ है, सही वक्त पर सही निर्णय । देश के इतिहास में सोनिया गांधी की राजनीति बहुत ऊंचा स्थान रखेगी,क्योंकि बिना नीचे गिरे, बिना बदला लिए,बिना गन्दी बात बोले भी राजनीति में शिखर छुआ जा सकता है ।

एक आखरी बात की जिन माँ बेटे से इतनी तक़लीफ़ है, जिनको यह बाँटने वाले डलहौजी के वफ़ादार कमज़ोर और बेकार समझते हैं, वह जानते हैं कि उनके लिए काल है यह माँ,क्योंकि उनको पता है नफरत,हिंसा,झूठ,अत्याचार,लालच का विकल्प प्रेम,अहिंसा,संवेदना और त्याग,जो इस वक़्त सोनिया के दामन में टँके हैं । सोनिया गांधी को जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाएं, उनके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की वह यह आखरी विनाशकारी हाथों को भी उनके स्थान पर भेज दें । सोनिया बहुत कर चुकी हैं, फिर भी अभी उन्हें सड़क पर खड़े,लोकतंत्र के लिए लड़ते देख ऊर्जा आती है कि जब तक ऐसे लीडर हैं, हमे निराश नही होना चाहिए । सोनिया हमारा भरोसा हैं, रहेंगी,आपको बहुत बहुत मुबारकबाद ।


सच्चा बालक

तुम्हारे पास क्या है? कड़ककर डाकू नें एक बच्चे से पूछा ।मासूम से बच्चे नें अपने गिरोह को लुटते पिटते साथियों को देखा और कहा यह थोड़ी सी अशर्फ़ी हैं ।डाकू नें झपट्टा मारकर अशर्फियाँ लेली और फिर खौफ़नाक आवाज़ में पूछा और क्या है ? बच्चे नें उसकी आंखों में आंखें डाल कर,रोते बिलखते साथियों को देख बिना डरे सहमे कहा कि मेरी सदरी में भी कुछ और अशर्फियाँ हैं अम्मी नें डाकुओं से इन्हें बचाने के लिए हमारी सदरी में छुपा कर सिल दीं थीं।

डाकू नें हैरत से बच्चे पर नज़र डाली और पूछा।अगर तुम सदरी की अशर्फियों के बारे में ना बताते तो हम कभी ना जान पाते।हममे से कोई तुम्हारी सदरी उतार कर हरगिज़ न देखता । तुम्हे हमसे डर नहीं लगा।तुमने अशर्फियों के बारे में हमे क्यों बता दिया ।
तब मासूम सा बच्चा चहक कर बोल उठा मेरी अम्मी ने कहा था कभी भी झूठ मत बोलना । हर हालात में सच को मज़बूती से पकड़े रखना । मै अपनी अम्मी का कहा नही टाल सकता था। इसलिए वह बोल दिया जो सच था ।डाकू की आंखें भर आईं।शर्म से सर झुक गया, घुटनों के बल बैठ आंसुओं के साथ उस नन्हे बच्चे से माफी मांगने लगा।वही मासूम बच्चा आगे चलकर अब्दुल क़ादिर जीलानी के नाम से महान सूफ़ी सन्त बना।

कभी यह किस्सा कोर्स की किताबों में "सच्चा बालक"  के नाम से पढ़ा था मगर अब नहीं है।अब किताबों में बांटने वाले किस्सों की भरमार है,बिना सिर पैर की लन्तरानियां हैं मगर ऐसे किस्से ग़ायब हो गए।इन्हें थोड़ा सा याद करने में कुछ चला नही जाएगा बल्कि हां इतना ज़रूर हो जाएगा कि हम माँ का कहना शायद मानने लग जाएँ।
शायद बिना डरे और घबराए सच बोलने की हिम्मत आ जाए ।
सच्चे बालक ही एक खुशबूदार मुस्कुराती दुनिया बना सकते हैं ।हम सब ऐसा बनकर खुशहाल हिंदुस्तान बनाए जो दुनिया को खूबसूरत राह दिखाए।जो सच कहने से न डरे।जो माँ की दिखाई राह से दूसरों की माँ की मुश्किलें दूर करे।जो एक माँ के आँचल की छाँव में दूसरी माँओं के लिए फूल चुने।आज ग्यारहवीं है,अब्दुल क़ादिर जीलानी का दिन।सच्चे बालक का दिन।मेरी ज़िन्दगी में बचपन में ही गहरी छाप छोड़ने वाले सच्चे बालक का दिन ।

एक चीज़ फिर कहता हूँ वह इंसान समझदार हैं जो चाहे किसी भी तरह अपने बुज़ुर्गों को याद करते हों,याद तो करते हैं । ग्यारहीं है आज,ज़ाहिर है दिलों को बाँटने वालों और नफ़रत को बढ़ाने वालों के लिए एक और मौके का दिन है । फ़िरक़ा परस्ती की मशाल लेकर तमाम सतही बातें करने का भी दिन है । इन सबसे अलग अब्दुल क़ादिर जीलानी की ज़िन्दगी को देखिये और इल्म केलिए अपने को तैयार कीजिये । उनकी ज़िन्दगी को रौशनी बनाइये और आजके दिन अपने बच्चों को ज़रूर बताईये की कौन थे अब्दुल क़ादिर जीलानी । जिस चैप्टर को वक़्त का बादशाह तंग नज़र होकर हटा दे,उस चैप्टर को याद करके बच्चों को सुना जाइये । सच्चा बालक घर घर पहुँचा दें ताकि दुनिया को संवारने वाले लाखों सच्चे बालक पैदा हो सकें...

Friday, November 22, 2019

शौकत आज़मी

गर्म हवा और उमराव जान जैसी मशहूर फिल्मों की अदाकारा शौकत आज़मी एक पीढ़ी का चेहरा थीं । थियेटर जिनकी धड़कन था,जिन्होंने इप्टा और प्रोग्रेसिव राइटर एसोशिएशन की खूबसूरती बुनी थी ।

जिनकी थाप से शबाना आज़मी और बाबा आज़मी जैसे टैलेंटेड हीरे निखरे । जिन्होंने कैफ़ी के साथ मुश्किल से मुश्किल वक़्त काटकर बेहतरीन सूरज निकाला । जो सचमे कैफ़ी की नज़्म,"उठ मेरी जान,साथ चलना है तुझे" को जीकर दिखा दिया ।

छोड़ गईं यह दुनिया और साथ ही छोड़ गईं यादों की रहगुज़र । शौक़त आज़मी जिन्होंने साथ कैफ़ी का चुना और अपनी ज़िंदगी अपने हाथ से लिखी । उसके हर उतार चढ़ाव की मालकिन । अपने बच्चों के दिलों में काम के लिए जूझना और जूझकर भी संवेदनाओं को ज़िंदा रखना,दोनो का अद्भुत काढ़ा पिलाया । एक तरफ कैफ़ी का पहाड़ जैसा वजूद तो दूसरी तरफ अपनी समन्दर जैसी आकृति उकेरने वाली एक अनूठी शख्सियत शौकत आज़मी से सीखना होगा,हर उसे,जिसे लगता है कि कपड़ों के कुछ टुकड़ों से शामियाने भी बनाए जा सकते हैं । कम में बहुत बनाना और बहुत में भी कम की अहमियत समझना ।

कुछ ही लोग हैं जिनको ज़िन्दगी भर दिल के सबसे खूबसूरत हिस्से में रख पाया हूँ,उनमें शौकत आज़मी हैं । लखनऊ में बिताए उनके पलों को पढ़ा है, उनके सफर को जिया है । अब वह नही हैं, लग रहा पूरा एक दौर खींचकर हटा दिया गया है । थियेटर औरफिल्मो की दुनिया का एक बड़ा हिस्सा सूना हुआ है । शौकत आज़मी दर्जनों फ़िल्म के ज़रिए तो सामने रहेंगी मगर अब कैफ़ी और मैं की खूबसूरत आवाज़ कैफ़ी से जा मिलेगी । उस कैफ़ी से जिसे उन्होंने खुद चुना था,जो सालों पहले बिछड़ गए ।

शौकत आज़मी बहुत याद आएँगी । कलाकार हमेशा ज़िन्दा रहता है अपने किरदारों में,आप भी हमेशा मिलेंगी,जब जब याद आएगी,याद की रहगुज़र मिला देगी आपसे । जल्द मिलते हैं, यहां बेहतर लोग कम हो रहें,तो जहां बढ़ रहें, वही चलते हैं, आपके पीछे पीछे...
नोट:- फ़ोटो में कैफ़ी, शबाना और शौकत आज़मी हैं । एक दूसरे की ज़िंदगी से इतना गुँथे हुए की बिना सबके किसी एक का ज़िक्र ही अधूरा है । 

Thursday, November 21, 2019

ज़मीर बेचकर अमीर होना

लड़का अपने बाप पर चीख़ रहा । बाप ज़िन्दगी के सत्तर बसन्त बिताकर पलँग पर लेटा लेटा सुन रहा । धूप गुनगुनी है, लड़के की आवाज़ ऊँची होती जा रही कि आपने मेरे लिए किया ही क्या है आजतक । बाप जो पैरालाइसिस का मरीज़ है, पलँग पर अकड़ा पड़ा है, सुन तो रहा मगर कहे तो क्या कहे,लड़का के पांव में अब बाप का जूता छोटा पड़ने लगा है, तो कहने को रह ही क्या जाता ।

लड़के ने घर के 6 कमरे किराए पर उठा दिए हैं । दो मकान बेच चुका है । 16 बीघा जमीन बेच चुका है । मगर चीख़ चीख़ कह रहा कि बाप ने किया ही क्या है । गांव के बुज़ुर्ग बाप की उस मेहनत को जानते हैं, जब गांव में एक झोपड़ी से उसने सफर शुरू किया था । बर्तन के नामपर एक कड़ाही और एक करछुल था । मगर यह बुज़ुर्ग खामोश हैं क्योंकि जानते हैं, फालिज में अकड़ा हुआ बाप तो अब कब्रिस्तान जाएगा, रहना तो लड़के के साथ ही है और कोई क्यों बेढब  नशेड़ी गंजेड़ी झूठे नौजवान के मुँह लगे ।

लड़का घर के तांबे,पीतल,स्टील सबके बर्तन बेच चुका है । अब उसे बूढ़े के नीचे बिछी दरी और मसेहरी बेचनी है । वह दरी खींचता हुआ चीख़ रहा कि मेरे बाप ने मेरे साथ किया ही क्या है, सब उसकी हां में हाँ मिला रहें ।

एक बूढ़ा बोला कि रुक जाओ,इतना सब कुछ बेच चुके हो,क्या यह तुम्हारे बाप ने नही बनाया था । ज़मीन क्या हवा में आई थी । बर्तन क्या प्रसाद में मिले थे । कमरे क्या ज़मीन पर लकीर खींचने से बन गए थे । अबे मूर्ख,यह सब जो बेचा जा रहा है, वही तो बनाया गया था । जब बना ही नही होगा,तो बिकेगा क्या । हमे समझ आ गया तुम्हारे बाप महान थे,तुम ही कामचोर निकम्मे हो ।

बूढ़ा पूरी बात बोल पाता कि लड़ने ने खींचकर पत्थर उसके सर पर मारा,बूढ़ा वहीं लुढ़क गया,गांव वालों ने कहा ठीक किया,तुम्हारे बाप और इस बूढ़े ने किया ही क्या है और लड़का हंसते हुए पड़ोस की झोपड़ी और दो बीघा ज़मीन का सौदा भी कर आया ।जो साथ खड़े हैं, न समझ हैं, वह भी बिकेंगे,पूरा गांव बिकेगा,क्योंकि बेचने की लत, ज़मीर बेचकर अमीर होने से शुरू होती है और अनवरत चलती रहती है ।

Monday, November 18, 2019

हिटलर

घुप धुएँ में एक काया उभरी,धुएँ में कुछ समझ न आया । धुँधलके में स्पष्ट कुछ दिखाई नही दिया,फिर भी कुछ लोगों ने कहा वह काया नही, हिटलर हैं ।

बहुत से लोग अनसुना करके धुएँ में क़रीब गए । वह लोगों की पहली अवधारणा के खिलाफ थे । धुएँ को चीरकर बतलाना चाहते थे कि वह हिटलर नही है, क्योंकि उसके पास से उन्हें दाता की गंध आ रही है । वह चले फिर भी गहरा ही धुआँ था,आधी दूरी तय करने पर इन लोगों में से कुछ ने हड़बड़ाकर कहा हां हां यह हिटलर ही है । वह सही कह रहे थे,यह हिटलर ही है ।

कुछ लोगों ने इनकी भी आँखों पर शक किया और घने अंधेरे में आगे बढ़ना तय किया । वह नही चाहते थे कि किसी शक और शुबहे की आड़ में वह बेहतरीन,मज़बूत और जोशीले तने खड़े उस इंसान से किनारा कर लें,जो उन्हें मुश्किल से निकालेगा, क्योंकि उसके तन से उठी जोशीली गन्ध उन्हें घुप अंधेरे में खींचे चली जा रही थी । जब काया बिल्कुल क़रीब आ गई,धुआँ बीच से छँट गया, सब स्पष्ट दिखने लगा,तो लोग बोले हां यह हिटलर ही है, हमे पहले ही मान लेना था,वह हिटलर ही था । गन्ध दुर्गंध की धोखा था,हमे मान लेना चाहिए था साथियों यह हिटलर ही था । 

दो चार ने अपनी आँखों पर भी विश्वास नही किया,दूसरों की आँखों पर भी विश्वास नही किया और कहा हम छूकर देखेंगे । कुछ कुछ प्रतीत भले हो मगर यह हिटलर नही हो सकता । हम महसूस करके देखेंगे, वह बिल्कुल नज़दीक़ गए । काया के कॉलर पर टके सितारों को छूने को हाथ बढ़ाया । काया ने उनके गले पकड़कर हवा में लटका दिया । काया का सीना इन लोगों को हवा में  टांगते फूलकर चौड़ा होता चला गया । वह लोग,जिनकी आँखे बड़ी होकर बाहर उभर आई थीं,ज़बान बाहर निकल कर लटकने लगी ,सांस लेने की आखरी कोशिश की और तड़पते हुए बोलना चाहे मगर नही बोल सके,क्योंकि काया ने उन्हें हिटलर कहने भर का भी वक़्त नही दिया....

Friday, November 15, 2019

गाँव ऐसा ही है

आप चमचमाती गाड़ी लीजिये,भले ही उसमें किसी को मत बैठाइए, गाँव वाले आपकी तारीफ के पुल बांधेंगे । अब बड़ा हवेली नुमा घर बना लीजिए,भले ही उसमें किसी को घुसने मत दीजिये,आपके रिश्तेदार  आपके किस्से सुनाएंगे अपने बच्चों को । आपकी चमक,आपकी दौलत,आपकी शोहरत गांव वालों और रिश्तेदारों और नज़दीकियों को आकर्षित करती है । आप उनसे सीधे मुँह बात मत कीजिये मगर वह आपके टेढ़े मुँह की तारीफ़ की झड़ियाँ लगा देंगे ।

वहीं आपका घर कच्चा हो,गाड़ी के नाम पर बस कोई गाड़ी हो,खाने भर की दौलत हो,फिर भी आप दिन रात अपने गाँव वालों,रिश्तेदारों,नज़दीकियों की मदद करते रहें । आपकी कोई कदर नही होगी । कहिये तो देर सवेर दुत्कार दिए जाएं । आपकी सेवाओं के किस्से अपने बच्चों को सुनाकर उन्हें कोई बिगाड़ेगा नही । कोई परिवार नही चाहेगा उनका बच्चा आपसा बनें ।

गणितज्ञ वशिष्ट नारायण जी हों या कैफ़ी आज़मी,किसका गांव वालों ने स्वागत किया है । यह अगर बाहर रहते,चमकते रहते,तो इनके किस्से इनके गांव में घर घर कहे जा रहे होते मगर नही,यह गांव लौट आए माटी के प्यार में और माटी हो गए ।

मुझे न समाज से शिकायत है और न ही कोई उम्मीद है । अपना काम करते जाओ और करते करते मर जाओ । यही हम सबकी किस्मत है । कोई नही याद करता सेवा करने वालों को,कोई नही चाहता उनका बच्चा चमकती ज़िन्दगी छोड़कर दूसरे का मददगार बने । हमे भगवान राम चाहियें मगर मन्दिर में या तो पड़ोस में,अपने घर मे नही,जो सौतली मां के वचन की भी लाज रखे ।

हम एक समाज के रूप में बस समाज हैं । अच्छे बुरे को क्या ही कहें । जो समाज नेहरू के पहाड़ जैसे कामों को झुठला दे,उस समाज मे बस एक ही सूत्र है, काम करो,काम करते हुए मर जाए,पहाड़ से रेत बनकर किसी के पैरों के नीचे दबकर खत्म हो जाओ,बस । पलकों पर बैठाने की बारी आएगी तो एक से एक हल्के लोग भी इनकी पलकों पर बैठकर महान हो जाएँगे । वशिष्ट नारायण जी हो या जब्बार भाई,तिश्ना आलमी हों या प्रोफेसर जीडी अग्रवाल,सबको यूहीं मर जाना है, हमे और आपको भी....

Tuesday, November 12, 2019

jnu jnu

होना तो यह चाहिए था कि jnu जैसी व्यवस्था सब यूनिवर्सिटी की होती मगर हो यह रहा कि सब यूनिवर्सिटी की तरह jnu को भी तबाह किया जा रहा है । बाकी जगह लोग jnu से जूझने की ट्रेनिंग लेते हैं, तो क्यों न इसको ही बर्बाद कर दिया जाए,जो विरोध को स्वर देता है 

फ़ीस बढ़ा दी,दूसरी कटौती कर दी गई,क्यों,क्योंकि वह चुभती हैं । आंखों में चुभती है । मन मे चुभती है । jnu तो हर तानाशाही हृदय में एक फाँस की तरह चुभती है । हर पढ़े लिखे जाहिल को चुभती है । हर मन के छोटे और गन्दे दिल को चुभती है । jnu को ढहा देने को हर वह दिल छलांग मारता है, जिसे इंसान को मार डालने में ज़रा भी तक़लीफ़ नही होती है ।

इस मौके पर जब jnu को बर्बाद करने की कोशिशें हो रही हैं । हम jnu के साथ हैं । जो निर्लज्ज निकम्मे फीस बढ़ाने का समर्थन कर रहें हैं, वह सब्ज़ी के मोलतोल में उम्र काटते और ऊपर से मुफ्त धनिया लेने वाले अपने पूर्वजों को देख लें,तब बात करें ।
देश का सभ्य और समझदार नागरिक तो माँग यह करता कि jnu जैसी फीस,जैसी शिक्षा,जैसी सुविधाएँ देश की दूसरी यूनिवर्सिटी में भी मिले । अक्लमंद गले के फंदे खोलना सीखते हैं और मुर्ख उसे खोलने के चक्कर मे फंदा कसते चले जाते हैं । इस वक़्त jnu पर सरकार का समर्थन वही मूर्ख की तरह हरकत है, जो फंदा खोलते खोलते उसी में कसकर मर जाएगा ।

अभी वक़्त है, jnu के साथ खड़ें हों,ताकि आपके साथ खड़े रहने वाले ज़िन्दा रह सकें । मेरा समर्थन jnu के साथ है, मेरा पूरा विरोध निर्लज्जता से  बढ़ाई गई फीस को लेकर है...

Sunday, November 10, 2019

मौलाना आज़ाद

अगर आपको सिर्फ मुसलमान होने के लिए याद किया जाए तो यह आपकी तौहीन है।अगर आपको मुसलमान सिर्फ अपना समझकर याद करें तो यह आपपर ज़ुल्म है।आपकी सोच इतनी गहरी थी की उसमे सब समा जाएँ।आपका इल्म इतना गहरा था जिसके सामने जाहिलियत खुद बखुद दम तोड़ दे।आज जिस इल्म की इमारत पर हम इतराते नही फिरते उसकी नीव आपने रखी।

आज ही 11 नवम्बर को जब ज़मीन पर आपके कदम पड़े तो किसने सोचा था की यह इंसान नही बल्कि अनमोल मोतियों को गूँथने वाला धागा है।जिसकी ज़िन्दगी लोगो को जोड़ने में खर्च होगी।किसने सोचा था जो बेटा अपनी माँ को 11 साल की उम्र में ही खो देगा,वह मदरसों के चबूतरों पर बैठ कर एक दिन दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत में इल्म का झण्डा बुलन्द करेगा।किसने सोचा था मदरसों की काई से लिपटी दीवारों में वोह अरबी,फ़ारसी,इंग्लिश,हिंदी,उर्दू का नायाब शरबत बनेगा।भला किसने ख्वाब में भी यह सोचा होगा की बहारों से महरूम कोई लड़का पत्रकारिता,लेखन,एक्टिविज्म,पॉलिटिक्स,समाज सेवा,लीडरशिप में सबसे ऊँचा परचम थामेगा।

कौन देख रहा था की मुल्क़ में सबसे पहले काँग्रेस का, सबसे कम उम्र का प्रेसिडेंट यह ही चुना जाएगा।किसी ने सोचा भी नही था की बंटवारे में अपनी ज़मीन को रोते हुए छोड़ते लोगो को किसी के लफ़्ज़ ऐसे बाँध लेंगे, की जो जहाँ रहा वही रुक गया।
वह मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे ,जिनकी आज पैदाइश है।यह भारत जैसा महान देश है जिसने उन्हें अपना पहला शिक्षा मंत्री चुना।यह मौलाना आज़ाद की महानता थी की उन्होंने इस माटी में ही अपनी हर साँसों को जिया निखारा और खूबसूरती से रुखसत हो गए 

आज़ादी की लड़ाई का बहुत मज़बूत स्तम्भ मौलाना आज़ाद ही तो जो नेहरू के कंधे पर हाथ रखकर कह सके कि चलो अब बिना थके,बिना रुके,बिना देरी के देश की हर ज़रूरत को पूरा करते हुए निर्माण में लगा जाए । गाँधी के ख्वाबों के संस्थान खड़े किए जाएं,शिक्षा का सर्वोच्च छुआ जाए ।

 आज जब लोग अपने छोटे छोटे घर बनाते हैं, उसपर फौरन अपने नाम अपने पूर्वजों के नाम के पत्थर टांक देते हैं कि दुनिया देखे उन्होंने कितना खूबसूरत घर बनाया है, वही लोग आज़ादी की लड़ाई और देश बनाने वाले नामों को सुनकर कान आंख बंद करके चुपके से सरक जाने का हुनर रखते हैं । यह सच्चाई रहती दुनिया तक नही बदलेगी की भारत की आज़ादी में किसने किसने अपना सब कुछ लुटा दिया,मिटा दिया । मौलाना आज़ाद तो वह शख्स थे,जो जेल में रहकर अपनी पत्नी की मौत की खबर सुनकर भी अंग्रेज़ों से यह गुज़ारिश भी नही करने गए कि आखरी बार उन्हें बीवी को देखना है । सब कहते रहे मगर उसूल का पाबंद यह शख्स अड़ गया कि नही,हरगिज़ नही,अपने निजी कार्यों के लिए हम अंग्रेज़ों से कोई छूट नही लेंगे और जेल की सलाखों के पीछे ही वह दर्दनाक वक़्त अकेले काटा । मौलाना आज़ाद आप हमारे मुल्क को बनाने वाले हाथों में से थे,आपके हाथ पकड़ कर अब बस रोने को दिल चाहता है,खूब रोने को,इकलौते आप हैं जिनका हाथ पकड़कर आज अपनी बेबसी और अकेलेपन को जकड़कर बहुत रोने का दिल करता है......


Saturday, November 9, 2019

हज़रत मोहम्मद

जब लड़कियो को ज़िंदा ज़मीन में गाड़ दिया जाता था।जब औरतों को हर हुक़ूक़ से महरूम रखा जाता था।इल्म से मायूस थी वह ज़मीन। जिहालत का ही बोलबाला था। इंसानी रिश्ते रोज़ टूट और बिखर रहे थे।आपसी नफरत आसमान छू रही थी। इंसान इंसान को ही गुलाम बना रहा था। उन गुलामों को मेले में खरीदकर,उनकी जिंदगियां दूसरे की चौखट पर बांध दी जाती थीं । जहाँ मौत तक उन्हें जानवरों की तरह अपने जैसे इंसानों की खिदमत करना था । बेइंसाफी और बेईमानी तख्तों पर बैठ मज़लूमो पर हँस रही थी।तब वह रौशनी बन कर आए

उन्होंने इंसान को इंसान बनाया। लड़कियो की ज़िन्दगी की बात की,उन्हें बराबरी पर लाने की पुरज़ोर कोशिश की और उनकी इज़्ज़त व अज़मत की वकालत की। गुलाम को मालिक के साथ  बराबर में खड़ा कर दिया। बेइंसाफी और बेईमानी का गला घोटा।भाई को भाई की मोहब्बत दी।इंसानियत को आसमान तक बुलंदी पर लेकर गए। हर एक से लरज़कर, झुककर,उसकी इज़्ज़त करके सही बात पर कायल करते हुए अपना कारवाँ बनाया ।वह थे हज़रत मोहम्मद।

वही रसूल जो हातिम ताई के खानदान की बेटियो को देख तख्त से खड़े हो जाते थे। जिन्होंने अपनी खुद की बेटी की हमेशा इज़्ज़त की और पहली बार बेटियो को बाप की जायदाद में एक बड़ा हिस्सा फ़र्ज़ किया। यह वही हज़रत मोहम्मद हैं जिनपर कूड़ा फेंका जाता था।रास्ते में काँटे बिछा दिए जाते थे फिर भी बिना उफ़्फ़ किये हर फर्द को गले लगाया। कूड़ा फेंकने वाली की इज़्ज़त की और अपना बना लिया । कांटे डालने वालों की ज़िंदगी के कांटे चुनने लगे और फिर एक दिन उनके भी दिल हज़रत मोहम्मद के सामने नरम पड़ गए । जिसने दुनिया को जिहालत से निकाला उन हज़रत मोहम्मद को याद कर लें। हज़ारों साल पहले जिन्होंने पानी की फिक्र करते हुए कहा कि झरने के किनारे बैठे हो,तब भी पानी बर्बाद मत करना,बताइए कौन था जो उस वक़्त पानी की फिक्र कर रहा था । अफसोस होता है की दुनिया के नाम पेश करके उदाहरण देने वालों ने भी हज़रत मोहम्मद को नही पढ़ा। न उनपर बात ही कि,न उन्हें जाना ही ।

समाजवाद और तमाम विचार बहुत बाद में आए,हज़रत मोहम्मद ने उस वक़्त कह दिया कि अमीर गरीब के बीच कमाई का अंतर बहुत नही होना चाहिए,काम कोई भी कोई करे मगर हैं सब भाई, बराबर,किसी का किसी पर ज़ोर नही । व्यापार में एक चुटकी भर लाभ लो,यह नही की अनजान को बेवक़ूफ़ बनाकर लूट लो । घर मे इकट्ठा न करो चीज़ें, अनाज वगैरह,पड़ोस में कोई भूखा सोया,तो तुम्हारे पेट का अनाज हराम है । अनाथ बच्चों के सामने अपने बच्चों को इतना लाड न करो कि उन्हें अपने माँ बाप याद आए । फल के छिलके बाहर मत फेको की किसी को कसक हो कि यह खरीद नही सका । बताइए उस दौर में इससे बढ़कर मानवता की कौन सी लकीर थीं ।उन्हें आप इस्लाम,पैगम्बर से अलग हट कर तो पढ़ ही सकते हैं।देखिये उनमे और इन मुसलमानो में कितना फ़र्क है।हज़रत मोहम्मद को पढ़ना और ज़िन्दगी में उतारना एक बड़ा कदम है।जो कमज़ोर अक़्ल वालों के लिए मुमकिन नही है।

दोस्ती,रिश्ते,गरीब,हक़,फ़र्ज़,पानी,पहाड़,ज़मीन,बड़े,बच्चे,बूढ़े,औरत,कमज़ोर,लाज़ार,खानपान,इल्म,मेहनत,मज़दूर सब पर  बारीक़ से बारीक़ निगाह रखने वाले हज़रत मोहम्मद की ज़िन्दगी को पढ़ लीजिये।देख लीजिये।परख लीजिये।जैसे हर आदर्श को अपनाते हैं वैसे ही हज़रत मोहम्मद को भी देखिये और अपनाइये ।

 उनकी ज़िन्दगी में गुँथी फिलॉसफी को समझिये क्योंकि एक बार यह डोर पकड़ ली तो काफ़ी कुछ हाथ आ जाएगा ।जो पैग़म्बर मानकर हज़रत मोहम्मद को बस रट रहें हैं उनसे इतर,उनकी ज़िन्दगी की बारीक़ी में झाँकिये आपको वह सूत्र मिलेगा जो शिखर पर ले जा सकेगा...

Thursday, November 7, 2019

मैं कौन हूँ

हफ़ीज़ क़िदवई कौन हैं?

उत्तर -बर्फ़ का खंजर हैं ,नही नही सूफ़ी सन्त हैं,अरे नही 
दोहरे चरित्र की ओढ़न हैं । शायद यह भी नही,वह
सच्चे सीधे सरल इंसान हैं ।
कोई कहता मक्कार और चालक है । किसी ने कहा क़ाबिल हैं, कोई चीखा की सिफर हैं । कोई ने मनचला कहा,तो कोई बोला शातिर ।

किसी ने औरत से नाम जोड़ा तो किसी ने आदमी से,कोई बोला हँसमुख हैं, तो एक बोला गुस्सैल हैं । एक आवाज़ आई कि घमंडी हैं, तो दूसरा बोला बड़ा ही आम सा इंसान है । कोई ने साधू देखा उसमे तो कोई उसमें ख़लीहर हठी इंसान देख भाग आया । एक ने कहा लेखक है तो दूसरा बोला निरा जाहिल है । एक ने कहा वह बोलता अच्छा है तो दूसरा बोला वह क्या ही बोलता है, बकवास । उत्तर में तो यह भी आया कि वह प्रेमी है, तो एक उत्तर आया फ़रेबी है, दिलों को फ़रेब में फँसाकर निकल जाने वाला निर्दयी है । एक ने कहा चालाक लीडर है तो दूसरे ने कहा बेवक़ूफ़ आत्ममुग्ध बैल है । एक ने कहा बेशक़ीमती है तो दूसरे ने कहा फ़िज़ूल है ।

 हिन्दू ने कहा मुसलमान है तो मुसलमान बोला हिन्दू है हफ़ीज़ । नास्तिक ने कहा आस्तिक है, आस्तिक ने कहा नास्तिक है हफ़ीज़ । एक ही तो सवाल आया था कि कौन है हफ़ीज़ क़िदवई ।
फिर किसी बूढ़ी अनुभवी लरज़ती हुई आवाज़ ने कहा कहीं वह आईना तो नही और फिर दौड़ गई खामोशी...

Tuesday, November 5, 2019

मोहम्मद साहब

बहस चलेगी की जुलूस निकलना सही है या नही,ईद ए मिलादुन्नबी दस तारीख़ को है । कोई इसे मानेगा कोई नही मानेगा,दोनो ही बातों से फ़र्क़ नही पड़ता । फ़र्क़ तो पड़ता है कि कौन पैगम्बर मोहम्मद साहब की बात मानेगा । अच्छे अच्छे लोग देंखे हैं, उनकी ज़ुबान और ज़हनियत देखी है, अपने रसूल के किरदार से कोसो मीलों दूर ठीक उल्टा किरदार लिए,रसूल के नाम पर ही आपस मे लड़ते फिरते हैं ।

जो यह कहते हैं की हज़रत मोहम्मद को खुद में उतारो,उनकी बताई बातों को दिल से लगाओ ।उनके दिखाए रास्ते पर चलो ।उनके किये कामो को अपने उसूल बनाओ ।वो भी अच्छे से जानते हैं की यह आसान नही है । वह कह तो रहें हैं मगर ज़रा ज़रा सी मुख़्तलिफ़ बातों से भिनक जाते हैं ।

पैग़म्बर मोहम्मद की ज़िन्दगी को खुद में उतारना इतना ही कठिन है जितना पानी में मिटटी घोलना । जब तुम्हे लगेगा की मिटटी घुल गई,तो ज़रा से वक्फे के बाद वह तलहटी में बैठ जाएगी और पानी फिर ऊपर मुस्कुराता रहेगा । यह आसान भी ऐसा है जैसे किसी बच्चे को देख चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ जाना ।

तुम्हारे लिए तो इतना ही पैमाना काफ़ी है की जब तुम तस्लीमा नसरीन,सलमान खुर्शीद और फ़्रांस के कार्टूनिस्ट की क़लम की सियाही से बेचैन न हो,उनके किये को उनकी सोच समझ माफ़ कर दो,किसी के भड़काने पर बारूद का ढेर मत बन जाओ,जब ऐसा करलोगे तो हज़रत मोहम्मद के पीछे पाओगे ।

जब तुम बाथरूम में हो और एक ज़रूरत से ज़्यादा पानी मत बहाओ,तुम्हे बेवजह बहते पानी को देख दर्द हो,तब तुम उनके रास्ते पर होगे । किसी बच्चे जिसके माँ बाप न हों उसके सामने अपने बच्चों को बहुत दुलार प्यार मत करो की बच्चा अपने माँ बाप की मोहब्बत को बेक़रार हो जाए,तब तुम उनके पीछे होगे ।

फल खाकर छिलके ऐसी जगह मत डालो जिससे कोई को इसके न मिल पाने की ख्वाहिश जगे,जब तुममें यह संवेदना होगी,तब तुम उनके रास्ते पर होगे । पड़ोस में अगर कोई भूखा है और तुम्हारा पेट भर रहा है, तो तुम हज़रत मोहम्मद के रास्ते से कबके हट चुके हो ।
बीमार को तुम देखने नही जाते,इंसान के मिलने पर उसकी खैरियत नही पूछते,बाजार में बैठकर सिर्फ अपने फायदे की फ़िक्र करते हो,दूसरे की अमानत में खयानत करते हो,बेटे को बेटी से ज़्यादा पढ़ाते हो,बेटी को अपनी कमाई में हिस्सा नही देते,बेटियों से ऊँची आवाज़ में बात करते हो,औरत से सख़्त लहजा इस्तेमाल करते हो,बूढ़े तुमसे बात करने,पूछने या कुछ भी कहने में डरते हों तो यक़ीन जानो तुम हज़रत मोहम्मद के जलाए चराग़ की रौशनी के बावजूद एक अँधेरा हो  ।

अगर तुम्हारे लफ़्ज़ किसी के दिल को दुखाते हैं । तुम्हारा होना गरीब मज़लूम को दर्द देता है । तुम ज़ुल्म के हिमायती हो ।तुम नौकर और खुद के खाने और पहनने में फ़र्क़ करते हो ,तो चाहे तुम जुलुस निकालो और चाहे सुबहों से शाम मस्जिद में सजदे में पड़े रहो । बावजूद इसके तुम हज़रत मोहम्मद साहब की नज़र से अलग रास्ते पर हो। जिन्हें लगता है की रसूल को वाक़ई ज़िन्दगी में उतारा जाना चाहिए,वह कुछ भले न करें मगर शुरुआत वह तक़लीफ़ पहुँचाने वाले अल्फ़ाज़ से किनारा करके कर सकते हैं ।मोहब्बत है तो मोहम्मद हैं, वरना कुछ भी नही...

Monday, November 4, 2019

प्रयावरण लखनऊ

लखनऊ में एक है लोहिया पार्क और एक है जनेश्वर मिश्र पार्क । वैसे तो और भी पार्क हैं मगर यह दो पार्क लखनऊ के फेफड़े हैं । भर भर कर इसमें पेड़ लगवाए गए,ताकि लखनऊ वासी भर भर के सांस ले सकें ।
वैसे तो यहाँ पूरे शहर में साइकिल पथ भी होता था मगर बदली सियासी आँखों में चुभ गया और उखड़वा फेका गया । कहा गया पैसे की बर्बादी है । मान लिया कि बर्बादी थी,पर आपने कौन सा आबाद करने वाला काम किया । आज जब लखनऊ शहर और सूरज एक दूसरे से मिलने को तड़प रहें हैं, तब ख्याल आया होगा कि साइकिल पथ क्यों था ।बड़े- बड़े पेड़ तो हर एक हुकूमत ने कटवाए मगर कुछ ने उनको कटवाने का प्रायश्चित किया तो कुछ ने भोंडेपन से हँस कर काम चलाया । यह दोनों पार्क हर आने वाले वक्त और ज़रूरी होते जाएँगे । 

वैसे यह अजीब शहर है । मुझे यह शहर बिल्कुल पसन्द नही मगर मैं इससे बेइंतेहा मोहब्बत करता हूँ । पसन्द इसलिए नही क्योंकि इसको जिसने सँवारा उसको इसने तख्त से उतारा है । प्यार इसलिए है क्योंकि इसकी मिट्टी में पहली सांस ली थी,यही शहर ने मेरे माथे पर अपनी मोहर लगाई थी,जो ताउम्र साथ रहेगी । यही वह शहर है जो मेरे साथ साथ चलता रहा,अच्छे बुरे सब हालात में ।

आज जब दम घोटू माहौल है । हवा भी हमारे मिजाज़ सी बदतर हुई जा रही है । ज़हर जो हमारे दिमागों में भरा था अब हवा में फैल चुका है । फिर भी यह शहर उन शख्सियतों की तारीफ़ में दो लफ्ज़ नही खर्चा करता, जो उनको लोहिया-जनेश्वर पार्क जैसे फेफड़े दे गए हैं ।

हम तो इस वक़्त राजनीति से उकता चुके हैं । यही क्या कम भला है कि अभी तक इस धुंध को किसी ने लपक कर "पॉल्यूशन जेहाद" नही कहा अगर ऐसा कोई कह देता तो शायद "एंटी पॉल्यूशन स्क्वाएड" ही नज़र आने लगता मगर ख़ैर, ऐसा कुछ है नही,बस धुआँ धुआँ है ।

पर्यावरण,प्रदूषण,ग्लोबल वार्मिंग, जंगल,ज़मीन यह सब हमारे विषय ही नही हैं । अभी हफ्ते भर में हम बढ़िया से किसी और डुगडुगी पर नाच रहे होंगे । अभी तो बहुचर्चित सुप्रीम कोर्ट का अयोध्या पर फैसला आना है, बस तब ही तक यह स्मॉग स्मॉग खेल लें,उसके बाद तो हवा में हवा ही नही रह जाएगी सिवाए नारेबाज़ीयों के,क्या कहें ।

लखनऊ हो या कोई और शहर,अगर उसे जो चाहिए,उसकी जगह कुछ और दिया जाता रहे,तो यही हश्र होता है । आपको मेरी बातों पर मिर्ची लगे तो लगे,आँख में तो मिर्ची पर्यावरण ने घोल ही दी है । अभी कहते हैं, धर्म जाति से अपनी राजनीति मत तय करो । राजनीति काम से तय करो,जो एक ईंट भी नही रखते,वह क्या जाने निर्माण क्या होता है ।

जाइये और लोहिया पार्क-जनेश्वर पार्क में टहलकर अपने फेफड़ो को ज़िन्दगी दें । चल सकें तो मेरे साथ आइये और धर्म,जाति, हिंसा,भड़काउपन और बाँटने वाली राजनीति से हटकर निर्माण का रास्ता खोलें । जहाँ हवा आपके फेफड़ो को भी सही रखे और दिमाग को भी, ईश्वर से प्रार्थना की यह दिन और न खिंचे,जल्द से जल्द पर्यावरण सुधरे और हम सब निर्बाध ऑक्सीजन ले सकें,जिसमे मिलावट न हो । अब ईश्वर हर वह हाथ मज़बूत करे, जिससे देश समेत हमारे शहर लखनऊ की हवा,पानी और दिमाग भी शुद्ध रहे ।

Sunday, November 3, 2019

धर्म की खूबी कर्म में लाओ

मैं हिन्दुओं से अक्सर पूछता हूँ की तुम्हारे धर्म की अच्छाइयां क्या क्या हैं । वह वाक़ई बहुत प्रसन्न होकर गर्व के साथ अच्छाइयां बताते हैं । मुझे अच्छा लगता है, यह सब सुनकर ।

मैं मुसलमानों से पूछता हूँ कि तुम्हारे पैग़म्बर और तुम्हारे मज़हब में क्या क्या खूबियाँ हैं । मुसलमान भी मेरे दिल मे इस्लाम को लेकर कोई कसर न रह जाए,इसका ध्यान रखते हैं,खूब खूबियाँ बतलाते हैं, मुझे सुनकर सुक़ून मिलता है, खुशी होती है ।

मगर मैं जैसे ही हिंदुओं से यह पूछता हूँ कि जो धर्म की अच्छाई तुमने बताई है उनमें से तुममे खुद में कितनी हैं, तो उनकी आँखों मे मेरे लिए गड़न पैदा हो जाती है । यही मैं मुसलमानों से भी पूछता हूँ कि इस्लाम और रसूल की खूबियों में से तुममे कितनी हैं भाई,तो उनकी आँख में भी मैं चुभने लगता हूँ ।

सच तो है कि मैं इनकी आँखों मे गड़ना या चुभना नही चाहता हूँ, मैं तो बस यह चाहता हूँ जिसको मान रहे हो,उसकी ही मान लो,प्रेम करो ,त्याग को अपनाओ,
समर्पण को दिल मे जगह दो और सरलता को लक्ष्य रखो और मानवता के काम आओ । अब बताओ भला किस धर्म ने इसके खिलाफ शिक्षित किया है, जो भी इनके खिलाफ है, वह धर्म ही कहाँ है, वह तो धर्म के नाम का झांसा है और झांसे में अक्लमंद इंसान फँसा नही करते,मूर्खो की बात और है ।

धर्म के जिस हिस्से को सुनाकर तुम दूसरों को प्रभावित करना चाहते हो,श्रेष्ठ बनना चाहते हो,उस अच्छाई को खुद में उतार लो,मेरा यक़ीन करो,तुम्हे देखकर हर एक प्रभावित होगा । मोहम्मद साहब की ज़िंदगी के किस्से मत गाओ,उन्हें खुद में उतारो, भगवान और अवतारों की कथा मत सुनाओ उन्हें कर्म में उतारो,लोग तुम्हारे साथ तुम्हारे धर्म का सम्मान करेंगे,यह सम्मान प्रेम से होगा,किसी के डर से नही...

Saturday, November 2, 2019

भिखारी मीडिया

एक भिखारी था,उसकी आवाज़ बड़ी मधुर थी । किसी भी गाँव मे वह गाता हुआ जाता,तो लोग प्रेम से उसे कुछ न कुछ दे ही देते । यह दौर चलता रहा कि एक रोज़ गाँव के एक नए नए अमीर हुए व्यक्ति ने भिखारी को गाते सुना ।

वह भिखारी को पकड़कर बोला की तुम कितना कमा लेते हो,भिखारी ने कहा,सुबह से शाम में जितना भी ईश्वर प्रबन्ध कर दे । अमीर इंसान बोला,फिर भी कुछ तो गिनती होगी,भिखारी ने कहा यही पाँच छः हज़ार ।
अमीर इंसान ने भिखारी से कहा कि अगर तुम सिर्फ मेरे लिए,मेरी चौखट पर गाओ तो तुम्हे दस हज़ार मिलेंगे । भिखारी को यह प्रस्ताव भा गया,सोचा उसमें दर दर की ठोकरे खाओ,यहाँ एक ही चौखट पर दस हज़ार मिल रहें, उसने प्रस्ताव मान लिया ।

अब भिखारी जाता,तो बस उसी के दरवाज़े गाता । एक आध लोगों ने उसे बुलाने,कुछ देने की कोशिश की मगर भिखारी ने नही लिया । कई महीने गुज़र गए,दूसरी कोई चौखट उसने नही देखी,बस यहाँ इतना मिल जाता कि वह मगन रहता । गाँव वाले जबरन उसे लाना भी चाहें,तो वह न आए,उस अमीर चौखट पर उसे पूरा आनंद मिल रहा था । बहुत कहने पर वह गाँव वालों को बुरा भला कहने लगा,तो वह भी कतराकर निकलने लगे ।
सालों गुज़र गए,अब भी वह उसी दरवाज़े पर बैठा गाता रहता और अपने तय पैसे लेकर निकल जाता । एक दिन उस अमीर आदमी ने कहा,यार तुम पर हम फ़िज़ूल ही इतना पैसा बर्बाद करते हैं, अब क्योंकि पुराने हो तो हटाएँगे नही,बस तुम्हे अब से पाँच हज़ार ही मिलेंगे । भिखारी चीखा की यह क्या बदतमीज़ी है । अमीर आदमी ने खींचकर एक चांटा दिया और कहा आवाज़ नीची,चुपचाप पांच हज़ार लो और पड़े रहो ।

भिखारी खामोश हो गया,उसने पास से गुजरते दूसरे गांव वालों को देखा, उन्होंने भिखारी की तरफ ध्यान ही नही दिया । कुछ वक्त फिर गुज़रा, अमीर आदमी बोला अब से तुम्हे दरवाज़े झाड़ू पोछा भी करना होगा,कार भी साफ करनी होगी और तीन हज़ार रुपये ही मिलेंगे । भिखारी तिलमिलाकर बोला,यह तो हद दर्जे की बदतमीज़ी है । वह बोला ही था कि उसे एक लात पड़ी । अमीर आदमी ने दो जूते भी मारे और कहा कि औकात भूल रहे हो,तीन चार हज़ार के मोहताज थे,घर घर माँगते फिरते थे,औकात से ज़्यादा दे दिया,तो सर चढ़ गए । होश में रहो, इस चौखट को छोड़ने के बाद कोई तुम्हारे मुँह पर पेशाब भी नही करने आएगा,भिखमंगे,पड़े रहो ।

उस रात भिखारी को बड़ा गुस्सा आया । उसने सोचा कि हमने अपना ज़मीर थोड़े ही बेचा है । हम फिर से घर घर गाएँगे और मस्त ज़िन्दगी जिएंगे । वह चल दिया,गाता जाता,घर निकलते जाते मगर किसी घर से कोई नही निकला । उसने कई घर खटखटाए,कोई निकला तो याद दिलाकर चला गया कि तब कहाँ थे,जब हम तुम्हारे संगीत सुनना चाहते थे । तब तो तुम्हे वह चौखट प्यारी थी । तुम उस चौखट के पालतू हो चुके,अब हम सबके काम के नही हो,तुम्हारी आवाज़ बिक चुकी,बिकी हुई चीज़ें समाज मे कबाड़ बन जाती हैं, यह बाजार नही है ।

भिखारी हफ़्तों टहला,भूखा प्यासा और वापिस उस अमीर की चौखट पर बैठ गया । अमीर ने कहा अब तुम्हे पैसे नही मिलेंगे,बस दो वक्त का खाना और तुम्हे यह खटरागी गाने के साथ कुछ काम भी करना होगा,सफाई,शौचालय की सफाई और जूतों पर पोलिश और मैदान की घाँस भी निकालनी होगी ।
भिखारी की हिम्मत नही पड़ी की वह दो वक्त के खाने के इस प्रस्ताव को ठुकरा सके,उसने सर डाल दिया । उसे चौखट दिखाई दी,चौखट में खुद को बंधा देखा और सर झुकाकर गाते हुए देखा,खुद के सामने फेंकी हुई रोटी देखी और दूसरे गाँव की तरफ असंख्य दरवाज़े देखे,जो देते भले कम थे मगर प्रेम करते थे,बराबरी पर रखते और सम्मान से खेलते नही थे,यही हाल तो मीडिया का हुआ है, वह भिखारी और कौन है सिवाए मीडिया के...

Friday, November 1, 2019

छठ

यूँ हल्की सी सर्द सुबहों और नदी का ठंडा पानी।सूरज की संतरी शक्ल और हमारा नदी में डूबा आधा जिस्म।आँखे बेताब उस सूरज को क़ैद करने के लिए जो हफ्ते भर पहले आँखों को चौंधया रहा था।हाथ नदी के पूरे पानी को समेट लेने के लिए  बेचैन।हल्के हल्के होंटो से झरते गीत।बाँस का सूप,फूँस की डलिया, गुड़ गन्ने का रस और चावल गेहूँ से बना देसी ज़ायका।कुल मिलाकर ख़ालिस हिंदुस्तानी नब्ज़।न मज़हब के रोड़े,न ज़ात की फ़िक्रें,न पुरोहितों के नखरे,न पहुँच से बाहर के देवी देवता।
यही तो छठ है।हमारा आपका छठ।

रामराज्य शुरू होने का छठ।सीता का राम के राजतिलक लगाने का छठ।कर्ण की तपस्या का छठ।द्रोपदी के ताप का छठ।राजा प्रियेवद, महर्षि कश्यप,मालिनी और देवसेना का छठ।गंगा का यमुना के पानी को खुशबू देने का छठ।दो दिलों को जोड़ने का छठ।दो रूहों को रूहों से मिलने का छठ।यह सादे से किसानो,हमारे जैसे आम से लोगों,मज़दूरों का वोह खूबसूरत त्यौहार है जिसकी सौंधी सी खुशबू मगरूर दिल महसूस नही कर सकते हैं।
मेरा मुल्क़ मामूली सी चीज़ों में खुशियाँ ढूँढने वाला रहा है।हमने अपनी नदियों को,अपने खाने को,अपने हिस्से के सूरज को,अपनी जोड़ने वाली संस्कृति को अपने टूटे फूटे अल्फ़ाज़ों में समेट कर, लोकगीत गढ़े हैं।उन गीतों में हमारी रूहें हैं।उन गीतों में मेरा भारत है।

जब नदी में आधा डूबकर हम सूरज को सलाम कर रहे होते हैं, तब हमारे दिल की जो धड़कन होती है, वही तो भारत है।इस छठ को महसूस कीजिये।इसमें छुपी कहानियों को देखिये।इस त्यौहार में मिलने वाले गंगा जमुनी दिल को पढ़िए।तब ही तो भारत की रूह को छू पाएँगे।
आओ इस छठ पर क़सम ले की हम दिलों को इतना बड़ा कर देंगे,जहाँ नफ़रत गुम जाएगी।मेरे राम के रामराज्य की शुरआत का यह जो छठ है, उसके होने को मोहब्बत से सींच देंगे।जैसे ही हम नदी में नारंगी सूरज के सामने डुबकी लगाएँगे,तो यक़ीनन सारी नफ़रत उस खुशबूदार पानी में धूल जाएगी।बस एक ही दुआ,छठ हमारे देश मे प्रेम,सहिष्णुता,एकता और भाईचारे के साथ तरक्की की छटा बिखेर दे...

Thursday, October 31, 2019

बचो इनसे

प्रश्न: किससे बचकर रहें ?
उत्तर : फ़रेबी से ।
प्रश्न : फ़रेबी कौन है ?
उत्तर : अपने धर्म का कट्टर इंसान और दूसरे धर्म का सेक्युलर इंसान जिन्हें बहुत अच्छा लगता है, वही तो फ़रेबी हैं ।

Wednesday, October 30, 2019

इंदिरा

तेरह साल की मामूली सी उम्र में "बाल चरखा संघ"बनाया।बचपन में ही कुछ था,जो लोगो को दिख रहा था।दिल्ली में 47 के दंगो में वोह कूद गई।गाँधी के कहने पर उसने दंगो में लोगो की ख़िदमत करना अपना मकसद बना लिया।हमसे कई बार होता है किसी की बुराई करते करते हम इतने बुरे हो जाते हैं की उसकी अच्छाइयों को भी नज़रअंदाज़ कर जाते हैं।
इंदिरा गाँधी ने सारी ज़िन्दगी काम किया।सारी ज़िन्दगी मुल्क़ के लिए जी।इंदिरा ने एक के बाद एक भारत के बाहर अपने कदम बढ़ाए।उनके कदमो से दूसरे मुल्कों में भारत की धाक पहुँची।

अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, बर्मा, चीन, नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में वोह पहुंची। उन्होंने  फ्रांस, जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य, जर्मनी के संघीय गणराज्य, गुयाना, हंगरी, ईरान, इराक और इटली जैसे देशों का आधिकारिक दौरा किया।अल्जीरिया, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया बेल्जियम, ब्राजील, बुल्गारिया, कनाडा, चिली, चेकोस्लोवाकिया, बोलीविया और मिस्र जैसे बहुत से देशों का दौरा किया।वह इंडोनेशिया, जापान, जमैका, केन्या, मलेशिया, मॉरिशस, मेक्सिको, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, नाइजीरिया, ओमान, पोलैंड, रोमानिया, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, सीरिया, स्वीडन, तंजानिया, थाईलैंड,त्रिनिदाद और टोबैगो, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, अमेरिका, सोवियत संघ, उरुग्वे, वेनेजुएला, यूगोस्लाविया, जाम्बिया और जिम्बाब्वे जैसे कई यूरोपीय अमेरिकी और एशियाई देशों के दौरे पर गई।उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भी अपने कदम रखे।

यह गिनती सिर्फ इसलिए है की उस वक़्त वोह कितनी तेज़ कदम बढ़ा रही थीं।मुल्क़ के लिए जी रही थीं।कुछ कदम गलत हो सकते हैं।उसकी सज़ा उनकी ही ज़िन्दगी में उन्हें मिल गई।कुछ को लगा यह सज़ा कम है तो उनकी ज़िन्दगी ही उनसे छीन ली गई।यह नेहरू परिवार की पहली शहादत थी या कहें शहादत की नीव थी।
इंदिरा को अपने हर कदम का बखूबी अंदाज़ा था।इंदिरा ने मुल्क़ तो टूटने से बचा लिया था मगर खुद को बचाने को तनिक भी फिक्रमन्द नहीं थी।उनमे नफ़रत भी नही थी।नफ़रत अगर होती तो उनके अंगरक्षक कब के बदल जाते।

इंदिरा के दामन पर जो भी छींटे डाली जाती हैं,उन छींटों में कहीं साम्प्रदायिकता नही है,कहीं पर नफ़रत नही है।इंदिरा इन सब चीज़ों से आज़ाद थीं।इंदिरा के व्यक्तित्व पर लगातार ऊँगली भी उठी और सराहना भी हुई।लिखने को कितना कुछ लिख सकते हैं उनकी शखसियत पर मगर वक़्त उनको ज़िन्दगी में उतारने का है। आज उनकी शहादत के मौके पर हम उनकी मेहनत,जज़्बे,मोहब्बत और पूरी समर्पित ज़िन्दगी को सलाम करते हैं।
देश की सबसे सशक्त,निडर,प्रधानमन्त्री इंदिरा की बहुमुखी प्रतिभाओं और पूरी ज़िन्दगी मुल्क़ के लिए लगा देने को दिल से सलाम।

 जिन्होंने एक नाखून तक नही कटवाया मुल्क की खिदमत में वह तो इंदिरा की शहादत से जलन रखेंगे ही मगर नागरिक,वाक़ई जो भारत गणराज्य का नागरिक है,वह अपनी बेमिसाल हिम्मती इंदिरा की इज़्ज़त करेगा । मेरा हाँ सिर्फ मेरा मानना है, इसमे कोई ज़बरदस्ती नही की इंदिरा के बाद से देश की कुर्सी पर वैसी कोई शख्सियत नही विराजी,इंदिरा बहुत अलग थीं,तमाम परतों में ढली एक मज़बूत काया...

Monday, October 28, 2019

निज़ामुद्दीन में दीवाली

इस बार हमने दीपावली अपने उस्ताद सँग मनाई । रौशनी का त्यौहार,अँधेरी ज़िन्दगी में रौशनी दिखाने वाले के साथ,यानि हज़रत निज़ामुद्दीन की दरगाह पर । तीन दिन रहे,लोगों को आते जाते देखा,उठते बैठते देखा,सोते,जागते देखा,यहाँ ही तो भारत बसता है दिखलाई देता है ।

जब कोई नफरत की बात करता है, जब कोई।दो धर्म के बीच तकरार करता है, मेरा मन करता है कि इसके सीने में मैं हाथ उतारकर,दिल निकाल लूँ और उसे साफ पानी से धोकर,उसका सारा मैल धो दूँ, फिर उसका दिल उसके सीने में पवित्र करके लगा दूँ, ताकि उसे एहसास हो कि वह इंसान है, हैवान नही,इंसान जोड़ने का नाम है, हैवान तोड़ने का नाम है ।

मैं चाहता हूँ मस्जिदों में चिराग जलें, मंदिरों में सिवई बंटे, यह तो इतना मुश्किल भी नही,बस दिल ही तो बड़ा करना है । निज़ामुद्दीन की दरगाह पर जो चिराग जलाए गए,यकीनन उससे खुदा मुस्कुराए होंगे। हमारी "लिंचिंग और हिंसा मुक्त भारत यात्रा" के यूपी के एक गाँव मे पड़ाव पर,मां काली के मंदिर में पुजारी ने फैसल भाई और यात्रियों को नमाज़ पढ़ने की जगह दी,तो यकीनन उससे भगवान प्रसन्न ही हुए होंगे । कौन ईश्वर है, जो चाहता है कि उसके मानने वालों के दिल छोटे और नफरत भरे हों,कोई तो नही...

बहुत अरसे से दिल मे एक ख्वाहिश थी कि कभी तो दीपावली अपने उस्ताद सँग मनाया जाए । हज़रत निज़ामुद्दीन और अमीर ख़ुसरो के बीच बैठकर मैं रौशनी ही तो निहारता रहा,सिर्फ यह सोचकर कि मेरे दिल का सारा अंधियारा मिट जाए और मैं भी मैं न रहकर कुछ भी न रह जाऊं । इस बार की दीपावली,जिसको मेरी आँखों ने देखा,दिल ने महसूस किया,बिल्कुल ही अलहदा दीवाली रही,सब चिराग बाहर जला रहे थे,लपक लपक,बेलौस मोहब्बत से जला रहे थे,मैं अपने अन्दर चिराग जला भी रहा था और बुझा भी,क्योकी हर बुझाने में कोई बार बार आ रहा था,उस चिराग को जलाने,उसका आना ही तो मेरा मैं से मिटकर सिफर हो जाना है.....

Saturday, October 26, 2019

एकदा

एकदा चिदम्बरम पिल्लै

स्पीकिंग ट्री

एनबीटी स्पीकिंग ट्री

जन्म की पूर्व संध्या

कल जब वह पैदा होगा,कुछ लोग जिनकी बपौती है, वह अधिकार स्वरूप उसपर दावा ठोकेंगे । कल ही वह भी उसके हाथ बेशर्मी से खींचकर अपने सर पर रख कर आशीर्वाद लेंगे,जिनके दिल मे उससे नफरत है । कल वह जन्म लेगा जिसके जनमने से पुतलीबाई संसार में जानी गई,कल वह जन्म लेगा, जिसके धरती पर पाँव रखने से करमचंद गाँधी सदियों याद किये जाएँगे । कल वही तो जन्मेगा,जिसके जन्म ने उसके मां बाप भाई बहन  पत्नी पुत्र सबके नाम दुनिया के ज़बान पर याद करवा दिए । एक ऐसा दीपक जिसने कुल को तो मशहूर किया,साथ ही धरती के उस हिस्से को भी मशहूर किया,जो वक़्त के कोहरे में कहीं छिप गया था ।

चाहे जितनी उससे नफरत कर लो या चाहे जितना उससे प्रेम करलो,दोनों ही स्थितियों में तुम दोनों उसके नज़दीक़ बराबर ही होते । दुश्मन का दोस्त और दोस्त का दोस्त,शिष्यों के गुरु और गुरुओं का गुरु,कुछ भी आसमान से लेकर नही आया था । किसी जंगल या पहाड़ पर लोगों से हटकर नही गया,बल्कि लोगों में रहकर,गलतियाँ करके,उन्हें सुधारकर उसने खुदको तपा कर,पिघला कर,चोट देकर गढ़ा था। इस धरती का ऐसा ज़ेवर,जो खुद ही धातु था,खुद ही निर्माता था और खुद ही सही गले का हार बनकर छजता था ।

कल जब वह जन्मेगा,दोस्त दुश्मन सब उसको खींचेंगे की यह मेरा है । नफरत करने वाले भी उसे देखकर खुद के दिल को ठंडक देंगे । हर एक दावा ठोकेगा की मोहन मेरा है । मोहन भला कब किसी एक का है ।

जो दर्द से तड़पते दिल को देखे,न कि उसकी चमड़ी । जो मायूस बैठे इंसान को उठाए बिना उसकी जाति देखे,जो टूटे हुए दिल को जोड़े बिना उसके धर्म देखे,जो एक गाल परथप्पड़ खाने को कहे और उससे आगे बढ़कर गोली खाए । क्या अब भी करनी और कथनी के संगम देखने को कोई और तरफ नज़र दोहराओगे ।

तुम तो एक गाल से दूसरे गाल के थप्पड़ पर बिदक जाते हो,कहते हो कि यह सम्भव नही,जबकि उसने सीने पर एक के बाद एक करके तीन गोलियाँ उतरने दीं और बदले में क्या कहा,हे राम,हे राम,हे राम ।

उसने तो करके दिखलाया । मोहन तो करके ही दिखलाते हैं । उनका दर्शन उनके कर्म में है । कल जब वह जन्मेगा,तब उसके विचारों पर बात होगी,विचारों का दोहराया जाना ही तो मोहन को मोहन बनाता है । तुम उसे अच्छा कहो या कहो बुरा,दोनो ही का वह आधार है । मोहन को श्रेष्ठता के लिए किसी आधार की आवश्यकता नही है, क्योंकि  संपूर्णता इससे परे है ।

मोहनदास करमचंद गाँधी एक न मिटने वाली लकीर है,इस लकीर को लोग अपनी अक़्ल के हिसाब से आज नही तो कल मानेंगे । जिसके पास जब अक़्ल आएगी,वह जानेंगे कि कौन था मोहन ।
कल दुनिया मोहनदास करम चंद गाँधी का पैदा होना देखेगी और महात्मा गाँधी बनने तक के सफर में खुद को जितना पाएगी,उतने में ही उल्लास मनाएगी । कोई मोहन की सफाई भर से खुश होएगा,कोई मोहन के प्रेम से तरेगा,कोई मोहन की राजनीति से इतराएगा, कोई ब्रह्मचर्य के प्रयोग में खुद को भीगा हुआ पाएगा,कोई मोहन के लेखन से आंखे दो चार करेगा,सबको अपने अपने हिस्से का मोहन कल मिल ही जाएगा । पता नही किसको सम्पूर्ण मोहनदास करम चंद गाँधी मिलेगा....

Tuesday, October 22, 2019

शासन के नियम

"संसार एक उद्यान है, जिसकी सिंचाईं राज्य से होती है । राज्य एक शक्ति है जिसपर धर्म का जीवन मरण आधारित है । धर्म एक राजनीती है, जिसकी बागडोर  बादशाह के हाथ में है । बादशाह उस व्यवस्था के लिए उत्तरदायी है जो सेना की सहायता पर निर्भर है । सेना उन सहायकों के समूह का नाम है जिनका पालन पोषण धन द्वारा होता है । धन वह कर है जो प्रजा से एकत्र किया जाता है । प्रजा उन लोगों के समूह को कहते हैं जो न्याय के आधार पर जीवित रहता है । न्याय वह उत्तम वस्तु है जो संसार के अस्तित्व का कारण है ।"

सिर्रुल असरार में अरस्तू ने यह आठ वाक्यों का गोला बना दिया और इसी में दर्शन और राजनीती के ऐसे टाँके लगाए जिसकी कढ़ाई देख आने वाली नस्लें पलकें ही झुकाती रहीं । इस गोले का कौन सा वाक्य सिरा है और कौन अंत, पता नही,कहाँ से शुरू और कहाँ ख़त्म ।बस इतना पता है की सर्वोश्रेष्ठ शासन वह है जो न्याय कर सके । न्याय,जो प्रकृति या ईश्वर ने किया है ।मैं हर उस शासन को शासन ही नही मानता जहाँ शासक अन्याय करे ।

वैसे मैं दिन रात लगा हूँ की अरस्तू,अल मिस्क काफ़ूर,अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद,अबु जाफ़र मुहम्मद बिन जरीर अत्तबरी, मुहम्मद बिन उमर अल वाकेदी ,अली बिन हुसैन अल मसऊदी, ह्य्यान बिन खलफ़,अब्दुर्रहमान इब्ने खलदून,अफ़लातून और सुकरात जैसे विचारकों  ने जो पुरानी गिरह खोलकर फिर से अपने आसान तरीके से नई गिरह बांधी,वह गिरह खुल जाएँ ।ज़माना ज़माने की नब्ज़ पकड़ना सीख जाए

वह जान जाए की आज़ादी,ख़ुराक और इंसाफ किसी भी इंसान के इंसानी पहचान की पहली शर्त है, जिसे कोई दूसरा इंसान खत्म नही कर सकता बल्कि इसे पूरा करने में मदद ही कर सकता है, तभी वह इंसान हुआ । जो इंसानियत से ख़ाली है, वह इंसान ही कहाँ और ऊपर का चक्र तो इंसानों के लिए है,एक ही सूत्र सब साथ चलो,साथ बढ़ो ...

Monday, October 21, 2019

हिटलर गांधी

जब आप हिटलर और गाँधी दोनों की परछाई ओढ़ना चाहते हैं, तो लगता है कि आपमें कुछ तो ख़ाली है, जिससे आप हर एक को भ्रम में रख रहें । हिटलर की सनक और गाँधी की धमक दोनों एक जिस्म में कहाँ रह सकती हैं । हिटलर के कपड़े और कपड़ों से खाली गाँधी की काया में से दोनो को पकड़ेंगे तो बौखल ही लगेंगे ।

गाँधी और हिटलर ऐसी दो नावें हैं, जिनकी अकेले अकेले सवारी करना ही क्या कम दुशवार है,जो ऐसी दो विपरीत नावों की एक साथ सवारी करना परम् मूर्खता ही दर्शाएगी । जो लीडर इन दोनों के गुणों को खुद में पैवस्त करेगा,वह ज़मीन का सबसे बौखल इंसान ही होगा या तो खुद को जनवाने पहचनवाने वाला कमज़र्फ इंसान ।

मैं दुनिया के तमाम लीडर देखता हूँ,वह गाँधी को ज़ुबान पर रखते हैं और हिटलर को मन में, तब लगता है कि क्या खुद का कुछ इनमें है भी,या बस खाली डब्बा ।

गाँधी की बात करना जितना आसान है, उतना ही कठिन है उनके रास्ते पर चलना । हिटलर की बात करना जितनी कठिन है, उतना ही आसान है उसके रास्ते पर चलना । यह दो विपरीत ध्रुव हैं, विपरीत नावें हैं ।

खुद में रखना है तो किसी एक का गुण रखिये,किसी एक कि तरह बनिये, कोई एक सिम्त की नाव पर चलिए,कहीं तो पहुँचियेगा । दोनों नावों की सवारी कहीं नही पहुँचाएगी, यह आज़ादी की लड़ाई के एक मज़बूत स्तम्भ साबित भी कर चुके हैं । हिटलर और गाँधी, एक साथ कहीं भी नही पहुँचेंगे । अलग अलग इनके बड़े आसमान हैं, जिस आसमान को इनकी मौत के बाद भी सम्मान मिले, उस आसमान को चुनिए ।

आपको लग रहा होगा कि मैं यह कौन सी फालतू बात लेकर बैठा हूँ,मेरा यक़ीन करो,उस आदमी को गौर से देखो जिसमें गाँधी और हिटलर दोनो की छींटे हों,वह खाली है, डब्बा है, वह तुम्हे कहीं भी नही पहुचाएगा,वह सिर्फ झांसा भर है, एक दिन मंझदार में छोड़ जाएगा,तब डूबोगे,ऐसे हर इंसान,लीडर,दोस्त,व्यवहारी से दूरी बना लो । जो विस्तार देगा,वह गाँधी है, जो संकुचित करेगा,वह हिटलर है, जो मूर्ख बनाएगा,वह दोनों को एक जिस्म में ढालेगा । फैसला आपका की आप खुद को विस्तार देंगे या संकुचित करेंगे या मूर्ख बनेंगे ।

Friday, October 18, 2019

मजाज़

आहिस्ता बोलिये,ज़िन्दगी भर जागने के बाद अब ये सोए हुए मजाज़ हैं । काश अब यहाँ बिखरा हुआ सुक़ून उस सदी की सबसे बेचैन रूह को जागते हुए मिल गया होता । मैं मजाज़ की नज़्मो से दूर वहाँ खड़ा हूँ जहाँ वह अपनी सबसे अज़ीज़ बहन सफ़िया अख्तर के हाथ पर सर रखे हुए सोए हैं ।मैं मजाज़ के उस सब्र को देख रहा हूँ जब सफ़िया आपा ने जाँनिसार अख्तर को पसन्द किया । ज़माने को मुट्ठी में करने वाला मजाज़ बहन के इस क़दम को रोक नही सका ।बस इतना कहा देख लो,जाँनिसार आँधी है ।

एक तरफ़ मजाज़ का दिल था,जिसे सब समझते थे मगर समझ कर समझना नही चाहते थे तो दूसरी तरफ़ सफ़िया थीं,जिनका दिल जाँनिसार जैसी आँधी को ज़ब्त करके भी, खामोश भाई की सरकती ज़िन्दगी देख रहीं थीं ।
आज मजाज़ की पैदाइश है, सफ़िया जानती थीं की मजाज़ को ज़ाफ़रानी रवे का हलवा और परतोंदार पराठा पसन्द है ।मजाज़ के हर शौक़ को उसका पूरा परिवार जानता है ।देर रात तांगे वाला जब मजाज़ को किसी बुझ चुकी महफ़िल से उठा कर लाएगा तो बारामदे में तकिया के नीचे उसका किराया रखने वाली मजाज़ की माँ भी जानती हैं की मजाज़ का दिल भरा है मगर जेब ख़ाली है ।

यह पाँच कब्रें हैं, यह एक दौर की अजब नक़्क़ाशी हैं । जो रिश्ते ज़िन्दगी भर एक दूसरे को समझने में उलझे रहे,वह यहाँ सुक़ून से सुलझे हुए सो रहें ।ख़ैर कितना लिखे और क्या क्या कहें,जब भी कब्र पर हाथ रखता हूँ तमाम दस्तावेज़ वरक़ दर वरक़ खुलने लगते हैं ।

मजाज़ का जन्म आजके दिन का है और मृत्यु भयँकर सर्द रात की है । ज़ाहिर है जो अक्टूबर के खूबसूरत दिल का मालिक हो,वह आती ठिठुरन को गले तो लगाएगा ही और एक दिन यह बर्फ सी ठंडक दिल की गर्मी को भी जकड़ लेगी,किसने जाना । मजाज़ नही रहे,वह तो दो दिलों की नफरत से बेचैन बेचैन घूमते फिरते,अगर आज होते तो क्या होता । जब कोई मजाज़ से पलट कर पूछ लेता की बताओ,तुम्हारी देशभक्ति क्या है, मजाज़ का जवाब इस सदी की सबसे ताक़तवर नज़्म होती,जिसके पीछे हम सब छिपकर अपनी ताकत का हुल्लड़ मचा रहे होते,मगर न अब मजाज़ हैं और हवाएं गर्म हो रहीं हैं, दिल मुर्दा....

Tuesday, October 15, 2019

रुक जाओ

आप नही पढ़ेंगे अगर हम लिखें की नौकरी जा रहीं हैं । आप ध्यान भी नही देंगे मुझपर अगर मैं कहूँ की अर्थव्यवस्था मुँह के बल गिर रही है । आप को न यह पढ़ना पसन्द है और न ही इसपर सोचना,क्योंकि आप मज़े में हैं । मज़ा भी यह कि दूसरे धर्म के छक्के छूटते दिख रहें हैं, तो चलो खींस निपोड़कर मुस्कुराया ही जाए  । दूसरों की बर्बादी के लिए सरकार चुनते हुए,खुद किस क़दर बर्बाद हो गए,आपको यह सुनना भी पसन्द नही है ।

हमारा क्या है, चाहे जितने झींगुर बोलें,चाहे जितने भेड़िये घेर लें,चाहे जितने बिज्जू बदन को नोचें,सच तो बोलना है, बोलेंगे,सच पर चलना है, चलेंगे । सच यह है कि आजतक किसी कौम, किसी जाति,किसी धर्म को मटियामेट करने का ख्याल ही मन मे नही आया,वोट तो बहुत दूर की बात है ।

पचासों इस्लामी मुल्क थे,खूब इस्लामी कट्टरपन कुछ मुल्कों के सर चढ़कर बोला, पलट कर देख लीजिए बर्बाद हो गए । ईसाई मुल्क भी देख लीजिए,जब ईसा की निंदा पर सर में कीलें ठोक दी जाती थीं,तब यह देश भी बर्बाद ही हुए,यह तरक्की पर तब आए, जब हर एक को साथ लाए । इस्लामी मुल्क जो कट्टरपन को ढोते रहे,बर्बाद हो गए । अब आपकी बारी है, धर्म सर चढ़कर बोल रहा है, बरबादियाँ दरवाज़े तक आ चुकी हैं और धर्म का नशा है कि और मदहोश कर रहा है । मकसद क्या है, बस दूसरे धर्म को जूतों की नोक पर रखना,भले ही यह करने में मुँह के बल गिरकर अपना पूरा वजूद ही बर्बाद कर दें ।

जो लोग अपनी तरक्की में किसी दूसरे को रोड़ा समझते हैं, वह मक्कार किस्म के लोग होते हैं । अभी वक़्त है, दिलों से नफरत,जलन को निकाल फेकिये,वरना बर्बाद हो जाइयेगा । एक होइए, य न भी एक होइए मगर आपस मे नफरत मत रखिये । ऐसे लोगों को नेतृत्व दीजिये,जो दिलों को न बांटता हो,जो नफरत को न बढ़ाता हो और जिसे काम करना आता हो । कट्टरपन और ताक़त का नशा दुनिया मे अच्छे अच्छे देश बर्बाद कर चुका है,सम्भल जाइये,इससे पहले की मिट जाइये । मिलकर,एक होकर, एक दूसरे का साथ देकर,खूबसूरत भारत का निर्माण करें,क्योंकि अंत मे यही शांति पर सबको लौटना है....

Monday, October 14, 2019

कलाम जन्मदिन

और एक रोज़ वह चले गए ।जैसे कोई बच्चा घाँस से हरे भरे मैदान में खेल रहा हो और फ़रिश्ते उसका हाथ पकड़ आहिस्ता आहिस्ता खेलते हुए ही दूर बहुत दूर आसमान तक लिए चले जाएँ । जहाँ से वह दिखे भले न मगर उसके क़हक़हे यहीं ज़मीन पर मौजूद गूँजते रहें ।

कलाम मेरे दोस्त,मेरे उस्ताद,मेरे मुर्शिद,मेरा इश्क़,मेरा ग़ुरूर,मेरा वजूद ऐसे ही हवा में सीढ़ियाँ चढ़ते हुए इतना ऊपर चले गए की अब बस किस्से और बातें ही यहाँ रह गईं ।

एक ऐसी शख्सियत जिसका जन्मदिन जयंती में बदलते देखा है हमने,एक ऐसी रूह जिसका किसी पर कोई ग़म,कोई बदला,कोई तक़लीफ़ बाक़ी नही । मैं कलाम को ज़िन्दगी में उतारता चाहता था,उनकी क़ाबलियत नही बल्कि सादापन,अथाह भरे होने के बावजूद ख़ालीपन, तमाम ऊँचाइयों के बाद भी ज़मीन पर मौजूद रहना ।

कलाम हाँ मैं जी या साहब लगाकर कभी अपनी खुद की रूह को ख़िताब नही करता ।कलाम के चेहरे पर बिखरी यह सफ़ेदी मुझे ख़ूब लुभाती थी,जिससे जवानी में ही बूढ़ा होने की अजीब खब्त सवार रही । ख़ैर कलाम सुबह के बाद अब ढंग की दो प्याली चाय मौजूद है और सामने ही 2020 का भारत भी नज़दीक़ है ।

आइये और चाय पीते पीते ख़ुद को इसमें ग़र्क करदें । देखते हैं यह दिलों को जोड़ने वाला साल होगा या तोड़ने का,यहीं से कलाम का युग शुरू होगा,इतना तो यक़ीन है ।प्रेम,त्याग,समर्पण,सादगी और तरक़्क़ी का युग । कलाम को मैं वैज्ञानिक से ज़्यादा एक भला इंसान मानता हूँ, वह सीधे और सरल थे,उनमें गुरु और शिष्य दोनों साथ रहे,ताउम्र,वह काम करने आए और काम करते ही हुए इस दुनिया पर अपनी मोहर लगा कर चले गए । वह मोहर मेरे दिल पर भी इतने गहरे तक धँस चुकी है कि सोने नही देती कलाम,आपकी यह मोहर कहती है कि एक दिन हम सुधरकर इंसान बन जाएँगे, तब विज्ञान मुस्कुराएगी...