Saturday, December 30, 2017

मन्थरा गैंग

वह पहलवान रोज़ कसरत करता था।खूब वर्जिश करता,बदन में तेल चुपड़ता।उसका भारी भरकम बदन इधर उधर से बेखबर खूबसूरती से बढ़ रहा था।उसी के पड़ोस में एक दुबला पतला,उस पहलवान का चौथाई से भी कम एक इंसान था,वह भी कसरत करता था।ग़रीबी में तेल तो नही चुपड़ सकता था तो पहलवान से बचा हुआ तेल अपने इकहरे बदन पर मलता।कभी कभी अकड़ के वह दुबला इंसान पहलवान को अपने बदन की गांठो को दिखा देता था।पहलवान उसे देख मुस्कुरा देता।एक दूसरे से हल्के फुल्के मज़ाक के साथ दोनों ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे।

तभी पहलवान से मन्थरा टाइप पूरा गिरोह मिलता है।मन्थरा गैंग पहले भी आता था मगर पहलवान उन्हें अपनी चौखट भी नही चढ़ने देता था।आज शाम उसने इनको बैठने दिया।उसे उसी शाम मन्थरा गैंग समझाता है यह जो दुबला पतला इंसान है, यह तुम्हे कल पटकने की तैयारी कर रहा है।तुम जो मासूम से उसके साथ खड़े होकर मुस्कुरा रहे हो,यह इंसान तुम्हारी मुस्कान छीन लेगा।तुम क्या,तुम्हारी सन्तानो को भी नेस्तनाबूद कर देगा।यह तुम जिसे दुबला समझते हो,यह अंदर से तेज़ाब हैं।तुम ज़रा से चूके तो यह तुम्हे नोच नोच खा जाएँगे।

अगली सुबह रोज़ से अलग थी।पहलवान को देख जैसे ही वह दुबला इंसान मुस्कुराया,पहलवान उसपर झपट पड़ा।कमबख्त मुझसे लड़ने की तैयारी कर रहे हो।मुझपर हाथ डालने की तैयारी है।पहलवान ने उस दुबले पतले इंसान के उस हर अंग को खींचकर खोल दिया,जो हड्डियों के सहारे एक दूसरे से फंसे थे।वह इंसान कहता रहा,भाई किसने कहा की हम आपसे लड़ना चाहते हैं, हम तो सदियों से साथ थे,खाने से टूट रहे थे,मेरी पहली लड़ाई तो भूख से थी दोस्त,तुम कहाँ से आ गए।कहते कहते दुबले इंसान ने आखरी साँस ली।उधर पहलवान अपनी बाँह फुलाए, शाकाहारी से माँसाहारी हो गया।इस बार माँस जानवर का नही,इंसान का खाया गया...मन्थरा गैंग ठहाके मारकर हँसा, आज उसने फिर एक इंसान को लाश और दूसरे इंसान को ख़ूनी बना लिया था,मिशन जारी है...

Friday, December 29, 2017

अजीब शय

वह अजीब शय थीं।उसने इंसान को इंसान से तो डराया ही।उसे जानवर,कीड़ो मकौड़ों से भी डराया।जब उसका बस नही चला तो उसने उन्हें पेड़ो से डराया।फिर हवाओं से डराया।फिर नदियों से डराया।फिर आग से डराया।अब तो इंसानों का ही एक बड़ा तबका ग़ुलाम बन चुका था उस शय का,उसने अंतिम अस्त्र चला और उसे ग्रहों से भी डरा दिया।

जाओ अब साल दर साल किस किस डर को खत्म करोगे,वह शय कभी न खत्म होने वाले वक़्त के लिए तुम पर हुक़ूमत कर रही और तुम्हे इसका एहसास भी नही।कभी गौर करना अगर इतने डर के बावजूद दिमाग काम करे,की वह कौन सी शय है जिसने तुम्हे शनि,ब्रहस्पति जैसे ग्रहों के फेर में ऐसा उलझाया की तुम पृथ्वी के लिए कीड़ा बन गए और वह मालिक।जो नही बने गुलाम वह प्रोसेस में हैं,देखो कब तक

Monday, December 25, 2017

दिलों का बंटवारा

सन् 47,जब देश बटा।हिन्दू और मुस्लिम दो जिस्म से दो ज़मीन के टुकड़ों में तब्दील होने लगे।तब हिंदुस्तान से पाकिस्तान जाती हुई भीड़ को एक शख्स की आवाज़ ने रोक लिया।वह जामा मस्जिद के दरवाज़े की टेक लगाकर जाते हुए लोगों को रोक रहा था और लोग उसी जगह रुक भी गए।वह खूबसूरत दिलों की भीड़ थी जिसने अपना नेता मौलाना आज़ाद जैसा चुना था।

सन् 2017 न देश नही बंटा है, दिल बंटे हैं।अब कोई नही है जो बंटे दिल को एक करे।जो एक कर रहा है, उसे गरियाया जा रहा।जो दिल जोड़ने की बात कर रहा वह दिलों का कांटा बना हुआ है।जो दिलों को बाँट रहा,वह दिलों पर राज कर रहा है।
हमारे पुरखे ज़मीन बंटने के बावजूद एक साथ मिलजुलकर तमाम तरक्कियों के रास्ते पार करते चले गए।अब जब ज़मीन का कोई हिस्सा बंट भी नही रहा तो हम एक दूसरे के दिलों को रौंदते हुए रोज़ नीचे गिरते चले जा रहें हैं।

यक़ीन जानो आज मौलाना आज़ाद जैसी शख्सियत होती तो यह उतावली भीड़ उन्हें धक्का देकर आगे बढ़ जाती।उनके पुरखों को ऐसी गालियों से नवाजती की उनकी कब्रें और धँस जाती।क्या हिन्दू क्या मुसलमान दोनों ने अपना स्तर इस हद तक गिरा लिया है की कोई सूरत सम्भलने की नज़र भी नही आ रही।किसी भी हिस्से को ज़रा भी तक़लीफ़ होती है तो वह सामने वाले हिस्से की तो बुराई करता ही है, साथ ही अपने यहाँ मौजूद अमन की बात करने वालों को भी ज़लील करता है।बड़े अच्छे तो मौलाना आज़ाद जैसे लोग जो उस दौर में होकर गुज़र गए।

अब तो हम ऐसे वक़्त में जी रहें हैं की खुद को ही अमन के लिए रोके रखें,तो ही बहुत है।अब लड़ाई अंदर बाहर हर तरफ है।एक तरफ सामने भीड़ पागल होती जा रही है तो दूसरी तरफ इधर खड़े लोग अपने ही लोगों के कुर्ते नोच रहें हैं की काहे वह अमन की बात कर रहें हैं।
इस दौर में भी जो सबको साथ लेकर चल रहा।जो सबकी आवाज़ सुन रहा।जो सबके लिए बेचैन है।जो सबको सुक़ून से देखना चाहता है।वह वाक़ई बीज है, जो आज नही तो कल दरख्त बनेगा।बाकि सब खर पतवार हैं, जो आज उगी हैं, तक़लीफ़ पहुचाएंगी मगर खत्म भी हो जाएँगी।मुल्क़ करवट लेगा,यक़ीन है

Sunday, December 24, 2017

क्रिसमस

सर पर कांटों का ताज और जिस्म सूली पर।आखों से कतरा कतरा बहता खून और जबान से लोगों को माफ़ करते  हुए लफ्ज़ ।जिसनें ताउम्र हरी घास का तिनका नही तोङा।ज़मीन पर पाँव रखकर उसकी गर्मी खुद में उतारकर वोह कुछ हड्डियाँ मुस्कुराती रही।पता था की कोई अपना ही उनके ख़ून का सौदा करेगा,फिर भी उसे अपनी महफ़िल में रुस्वा न किया।नँगे बदन जब अवाम का लीडर क्रूस खींचता हुआ काँटों पर जा रहा था तो उसकी नज़र झुकी नही थी।लोगो की भरी हुई आँखों में दर्द तो था मगर हिम्मत नही थी उसे थाम लें।वोह ख़ून से लथपथ सिर्फ इनकी माफ़ी की दुआएँ करता हुआ बढ़ा जा रहा था।वह यकीनन मसीह हैं ।मेरे ईसा हैं ।

इतने हस्सास की उनका रत्ती भर भी मुझमें आ जाए तो मै सारा दर्द  सह लू ।इंसान बन जाऊँ वही इंसान जो दर्द को महसूस कर सके ,जो दर्द  दूर कर सके।जो इंसान में फर्क ना करे।मै पूरे दावे से कहूंगा की इस पूरी कायनात में मेरे ईसा जैसा दिल किसी का नहीं ।रेत हो या घास या जंगल या पहाड़ आज भी उनकी खासियत ज़बानों पर है।फेस्टिवल तो खूब सेलिब्रेट होंगे मगर इनमे क्या ईसा होंगे।करोणों की भीड़ में मेरे ईसा का दिल होगा जो हर मज़लूम के लिए तड़पे।क्रिसमस ट्री के कंगूरों की चमक में मेरे ईसा के दिल की रौशनी होगी जो मायूस आँखों के आँसू सुखाकर मुस्कान भर दे।

मैं कह सकता हूँ जहाँ जहाँ दिल मासूम,मोहब्बत और ख़िदमत होगी वहाँ मेरे ईसा सफेद चादर ओढ़े भेड़ के संग मुस्कुराते हुए खड़े मिलेंगे।जो इंसानों पर सख्ती करेगा,वहाँ मेरे ईसा रोते हुए उसकी नादानी को दूर करने की दुआ करेंगे।मेरे ईसा मेरे इर्द गिर्द हमेशा रहते हैं।जब जब मै कमज़ोर हुआ और दिल मायूस हुआ मेरे ईसा ने मुझे पहाड़ जैसा मजबूत किया मगर मोम जैसी नर्मी के साथ।  ईसा नें  मुझें हमेशा अपना दिल मासूम करने की सलाह दी।जिसपर अमल ही ईसा के नज़दीक़ पहुँचना है।आज रौशनी,संगीत और केक में ईसा को खूब याद किया जाएगा बस एक बार अपने दिल के किवाड़ भी नरमी से खोल दीजियेगा ताकि ईसा उसमे दाखिल हो सकें और तब तक रह सकें जब तक अंदर मोहब्बत रहे...

Friday, December 22, 2017

बीएल जोशी

"अब क्या लड़के की जान ही ले लोगे"
यह लफ़्ज़ कानों में हमेशा गूँजते रहे।यह उनके थे जिनको कभी दूर से देखते थे मगर उनकी ज़बान बनने का जब मौका मिला तो ऐसी हमदर्दी की उम्मीद नही थी।मगर उनकी हद दर्जे कड़क मीठी आवाज़ ने बहुत कुछ आसान कर दिया।
यूपी के गवर्नर बी एल जोशी थे,जिनके बेहद करीब रहकर देखा था की वह ज़िन्दगी कैसी होती है जो कभी बचपन में मोटी लाल बोरा को देख दिमाग में कौंधी थी।

आज जब बीएल जोशी नही रहें हैं तो कितना कुछ याद आ रहा।मेरी ज़िन्दगी के उन पहले अहम् लोग जो ख़ामोशी से आए और बिना हलचल किये सब कुछ बदल कर चले गए।मेरे सामने शायर वसीम बरेलवी का उनपर तंज और ऊपर से जोशी साहब का मुस्कुराता हुआ अंदाज़,अभी भी याद है।

हमने अपने दरमिया भले पर्दे न रखे हों,मगर अपने चारो ओर पर्दे ज़रूर डाल रखे थे,जो आज दफ़न हो गए।गवर्नर हॉउस की सफ़ेद दीवारों में बेलौस मोहब्बत से भरे,ऊँची नाक के साथ झनकती आवाज़ के मालिक जोशी साहब नही रहे,यह कल से सुन रहे हैं।यक़ीन नही होता,फिर यक़ीन हो भी रहा।जब अब अपने पास उन्हें पाते हैं।अब सब छोड़कर,सारा लिहाज़ किनारे रखकर,सारी नफासत नज़ाकत और उन दीवारों के ऊँचे कानून को लाँघकर अब हम साथ चाय पी सकते हैं।आइये बीएल जोशी साहब,दुनिया आपको नमन करेगी और हम आपको अल्फ़ाज़ देंगे,आप गुनगुनाते रहिये,यहीं...

Wednesday, December 20, 2017

मुर्दा होता समाज

मुर्दा सर से पाँव तक एक जैसा ठंडा होता है।उसको एक जैसा ही पूरा कफ़न पहनाया जाता है।गौर से देखना तुम्हारे सामने पड़ी लाश  एक जैसी चीज़ से ही तो ढकी है।उसमे से रँग नदारद है।लाल और हरा, नीला और काला ग़ायब है।क्योंकि सबको पता है यह जो अब ज़मीन में सड़ने जा रहा है, या लड़कियों में भुनने जा रहा है,इसे अब रँगो की ज़रूरत नही,इसे अब विभिन्नता की ज़रूरत नही।

ठीक वैसे ही जो समाज खुद को एक रँग,एक तरीके में ढकेल रहा है, उसे मालूम है वह समाज मुर्दा होने जा रहा है।उसके बाशिंदे घरों के अंदर सड़ने जा रहे हैं।शुरुआत दिमाग सड़ने से हो चुकी है।

जाओ एक रँग,एक सोच,एक धर्म,एक झण्डे के साथ मुर्दा बनने की तैयारी करो।लोग कन्धा देने को जुट चुके हैं।अब बस रँगो की लालच में,ज़माने की अलग अलग खुशबू की महक में अपने जिस्म से उठती कपूर की गन्ध को भूलकर उठ मत बैठना।

अब तुम बस सड़ ही जाओ,फुर्सत मिले।सड़े हुए दिमाग में दूसरी खुशबू भी तो बदबू ही लगेगी।जिस भी ज़मीन के टुकड़े को खुद को गू बनाना हो,वह दाल चावल रोटी सब्ज़ी के वजूद को अगली सुबह एक ही रँग,एक ही बदबू,एक ही जगह देख सकता है।इसलिए कहते हैं सबको अपनाओ,हर मज़े,हर रँग को करीब रखो ताकि बाग़ लगो नाकि शौचालय,गुलदस्ता लगो नाकि मुर्दा।

Tuesday, December 19, 2017

धर्म सत्ता शाँति

मुझे नही पता,मैं जानना चाहता हूँ क्या वाक़ई पृथ्वी पर कोई ऐसा धर्म आया है जिसने शासन सत्ता न सम्भाली हो।या अपने उद्भव के शीर्ष पर सत्ता को न रखा हो।या बिना शासन के फैला फला फूला हो।
देखिये हर लड़ाई का एक दायरा धर्म की शॉल में आकर सिमटता ही है।दुनिया में बहुत सी मशहूर लड़ाई की कोख में धर्म ही तो छिपा हुआ था।जिसे बचाने या बढ़ाने के लिए युद्ध होते रहे।
धर्म के एक आध्यात्मिक हिस्से को हटा दें तो दूसरा हिस्सा शासन ही तो है।उसके लोग जैसे ही आध्यात्म की चारपाई से पाँव समेटते हैं, खुद को जँग के मैदान में खड़े पाते हैं।जहाँ लड़ना,जूझना,जीतना पड़ता है।वरना धर्म जँग के इसी मैदान में दूसरे धर्म के सामने सिसक सिसक कर कमज़ोर हो जाएगा।

जीतने हारने का यह चक्र तब तक चलता रहेगा जब तक पृथ्वी घूमती रहेगी।मेरी बात इतनी सी सुन ले की यह जो साँसे मिली हुई बोरा भर वज़न के बदन में गूँथी ज़िन्दगी है, यही सब कुछ है।जो होना है इसी में होना है।इस ज़िन्दगी में चाहे बादशाह बन लो चाहे गुलाम।बाद्शाह का मतलब सिर्फ सर के मुकुट से नही है बल्कि उस ज़िन्दगी से है जो कभी सर झुकाकर गुलाम नही बनेगी।हिम्मत करके हर उसको संगठित होना चाहिए जिसको लगता है उसपर दूसरे ज़ुल्म कर रहे हैं।उस वक़्त तक विरोध कीजिये जब तक या तो ज़ुल्मी खत्म न हो जाए या आप खुद।

धर्म के किसी भी रूप को ढोइये मगर ईमानदारी से,धर्म में बहुत कुछ छिपा है।
पन्ने पलट कर देखिये की धर्म को हमेशा सत्ता की ज़रूरत पड़ती रही है।इसलिए सियासी समझ को तवज्जो दीजिये।विज्ञान से ताक़त लीजिये।दोस्त दुश्मन पहचानने में कम वक़्त लीजिये।बहुत दूर तक देखने की दिमाग में क्षमता पैदा कीजिये और अपने लिए उस लीडर को चुनिए जो आपको नाज़ुक मौके पर पैर समेटने की सीख दे पाए और उस दिन के लिए हिम्मत पैदा कर पाए,जब आप हक़ के लिए ज़िन्दगी मौत से लड़ रहें हों।

मेरी बात हर धर्म के लिए है।धर्म से शासन हासिल करना और चलाना सीखिये।यह केवल माध्यम भर है।जिसका शासन होगा,उसके यहाँ खुशहाली होगी।वह खुशहाली उसके ईश्वर को ही तो मज़बूत करेगी।सत्ता के लिए संघर्ष करो,आज नही तो कल मिलेगी वरना दूसरा रास्ता है यह धर्म की चादर को तहा कर बक्से में डाल दो और सिर्फ इंसानियत का लबादा ओढ़ निकल जाओ,नफे-नुकसान से बहुत दूर,सिर्फ मोहब्बत के लिए।जिसमे किसी की भी जीत हार की न ख़ुशी हो न ग़म हो,हो तो सिर्फ सेवा,सेवा और सेवा...जो बेहद कठिन तो है मगर मुमकिन है।

Monday, December 18, 2017

300 राहुल मोदी

बहुतों को यह तस्वीर उस फ़िल्म की दहलीज़ तक ले जाएगी जिन्होंने पिछले तीन महीनों उधेड़ बुन में गुज़ारे हैं।देश को हर छटे महीने जँग का मैदान बनते देखा है।अपने बेहतरीन लीडरों की ज़बानों से उगलती आग देखी है।यह तस्वीर कल के परिणाम से बहुत हद तक मिलती जुलती प्रतीत हुई।स्पार्टन और ज़रख्सीज़ जैसी टकराहट दोहराते देखा।
अब चुनाव,चुनाव रह ही कहाँ गए जहाँ नियम,नियत की बात की जाए।अब तो जँग के इस मैदान में या तो आपकी तलवार में धार हो या मज़बूत ढाल हो,तभी टिके रह सकते हैं।जब एक शक्तिशाली बादशाह से कोई कमज़ोर सेना भिड़ती है तो उसकी हार की भविष्यवाणी बच्चे भी कर सकते हैं।मगर जब वही सेना दाँतो में खटास ला दे तो वह काफी दिन तक याद किया जाता है।ज़रख्सीज़ ने भले 300 स्पार्टन्स को ज़मीदोज़ कर दिया हो मगर इतिहास ने उन स्पार्टन्स को ही सुनहरे अक्षर दिए हैं।खैर वह तो कहीं और की बात हुई।आप अपने चबूतरे पर लौट आइये।मुझे प्रधानमंत्री को देख यह ख़ुशी होती है की वह अंत तक जूझते हैं।जँग के मैदान में वह निर्मम और क्रूर होते हैं जैसे एक शक्तिशाली राजा को होना चाहिए।जँग के मैदान में मुरव्वत बेईमानी है और दाँव पेच पर ऊँगली उठाना कामचोरी है।अगर उनसे मुकाबला करना होगा तो आपको यातो उनसे ज़्यादा निर्मम और क्रूर होना होगा या फिर इसके ठीक विपरीत सौम्य,सरल होना होगा।जिन्हें लगता है यह चुनाव अब वैसे नही रहे जैसे पहले होते थे,वह गर्दन पलट कर देखें उनके इर्द गिर्द पहले सा रहा ही क्या है।वक़्त के साथ क़दम ताल बढ़ाएँ।जँग उसी दौर के हथियार से जीती जाती है, जिस दौर की हो।
प्रधानमन्त्री से सीखा जा सकता है की जीतना कितना महत्वपूर्ण है और इसके लिए किस हद तक जाया जा सकता है।राहुल गाँधी बेहतरीन ढाल बन चुके हैं।उन्होंने हर उस वार को बर्दाश्त कर लिया जो उनपर हुआ,अब बस हथियार चलाने की देरी है।आशा है एक बेहतरीन लड़ाई फिर होगी।मैं नैतिक स्तर विस्तर कुछ नही मानता।लचकदार हाथ में तलवार नही थमाई जाती।जब आप मैदान में हों तो खुलकर खिलकर मैदान में हों,यही रणक्षेत्र कहता है।दोनों दलों को बेहतरीन संघर्ष के लिए बधाई।एक मरकर जीता है तो दूसरा मारकर,जीत दोनों योद्धाओं की हुई है।

Friday, December 15, 2017

आत्ममुग्धता

एक घर था। नही एक बच्चा था।नही बल्कि एक घर में बच्चा था।उस बच्चे के घर दरवाज़े के सामने नालियाँ थीं,जिन्हें पार करने की उसे सख़्त मनाही थी।वह घर के अंदर ही लेटा हुआ छत और दीवारों को देख लिखता रहा।दुनिया की सबसे खूबसूरत दीवार मेरी है।दुनिया की सबसे बड़ी छत मेरी है।दुनिया की सबसे खूबसूरत ज़मीन मेरा फर्श है।वक़्त बीतता रहा,उसके बच्चे हुए,वह भी नाली के पार नही गए।उन्होंने भी कहा दुनिया मेंसबसे समझदार मेरा बाप था।

दुनिया का सबसे क़ाबिल शख्स मैं हूँ।दुनिया के सबसे अच्छे खाने मेरे किचन के हैं।मेरी बहन सबसे पारसा है।मेरा भाई सबसे महान है।हमारे ही हाथों में सब कुछ है।जो हैं हम ही तो हैं, सर्वश्रेष्ठ।इस तरह उस घर में दुनिया सिमटती रही।

इत्तेफ़ाक़ से कई पुश्तों बाद उस घर के एक आध बच्चों ने नाली पार की और घर लौटकर कहा,नही भाई,दुनिया में हमारी छतों से भी बड़ी छते हैं।
हमारे किचन से अलग खाने भी हैं दुनिया में।हमारी दीवारों से ऊँची दीवार भी मौजूद हैं।दादा परदादा से भी अकलमन्द दूसरी गली के लोग हैं।हमारे भाई बहनो की तरह ज़्यादातर घर में लोग हैं।हमारे सिवा भी और लोग भी श्रेष्ठ हैं
इतना कहना भर था की घर में कोहराम मच गया।जिन नालियों को पार करना मना था,उन नालियों में घर के ही लोगों का ख़ून बहने लगा।देखो कब तक बहता है।

Friday, December 8, 2017

सोनिया गाँधी और रुक़य्या बेग़म

आजका दिन इन दो नामो की वजह से बड़ा खास है।सोनिया गाँधी न परिचय की मोहताज हैं और न यह बताने की हिंदुस्तान की अवाम उन्हें किस क़दर मोहब्बत करती है।सोनिया गाँधी ने राजीव की आँख से जो भारत देखा था उनके जाने के बावजूद उसे अपने सीने से लगा रखा।अपने बच्चों में इंसानियत और दूसरों की इज़्ज़त और जज़्बात की तरबियत दी जो रोज़ ज़ाहिर हो रही।मुझे ख़ुशी है की मुल्क़ को सोनिया ने और सोनिया को मुल्क़ ने बड़ी खूबसूरती से अपनाया।हर दुःख की खड़ी में दोनों साथ रहे।जब सोनिया का साथ राजीव से छूटा तो पूरे देश ने सोनिया को मोहब्बत से लबरेज़ कर दिया।जब मुल्क़ को बेहतर नेतृत्व चाहिए था तो सोनिया ने भी दहलीज़ लांघी।लिखने को काफी है मगर आज सोनिया गाँधी को उनके जन्मदिन पर खूब बधाई।उनके स्वास्थ्य की चिंता है, वह ठीक रहें अभी उनकी बेहद ज़रूरत है।

अब दूसरी महिला हैं रुक़य्या बेगम।दुर्भाग्य से अब पूछियेगा की कौन रुक़य्या।रुक़य्या सखावत हुसैन।बंगाल की रूह रुक़य्या।अबरोध बासिनी लिखने वाली रुक़य्या।जो हमेशा मज़हब की शाल ओढ़कर,मज़हब के आडम्बर,ज़ंज़ीर से उलझती हुई रास्ते बनाती रही।वोह रुक़य्या जिसे सुनने वालों की तादात तब तक बढ़ती ही रही जब तक उसे भुला नही दिया गया।
आजही के दिन 1880 को उन्होंने दुनिया में पहली साँस ली थी और आजकी ही सुबह 1932 में रुक़य्या बेगम ने अपनी आखरी साँस भी ली थी।मैं जब तुम्हे स्त्री विमर्श पर बहस करते देखता हूँ तो खुश होता हूँ की चलो तुम उनकी आवाज़ तो बन रहे हो।मगर दोस्त थोड़ी देर बाद तुम्हे ख़ाली पाता हूँ।जानते हो क्यों।क्योंकि तुमने खुद को कभी खाद पानी दिया ही नही।तुम्हे उन औरतों को पढ़ना होगा।

उन्हें याद रखना होगा।उनके काम को परखना होगा।उनके बनाए रास्तों को साफ़ करना होगा,जो तुमसे पहले इतना कर गईं हैं जितना तुम सोच भी नही सकते।
हर आवाज़ उठाने से पहले,अपने से पहले आवाज़ उठाने वालों को देखो,उनकी कमियों,मज़बूतियों,तरीकों को देखो।सब कुछ बेहतर बन जाएगा।तंज और फ़िकरा कसने से कभी रास्ते नही बनते,यह याद रखना।

उठो और कमसेकम आजके दिन रुक़य्या सखावत हुसैन को पढ़ो उनकी अबरोध बासिनी को पढ़ो।मोतीचूर,पदमार्ग और सुल्ताना के ख्वाब को पढ़ो,देखो दिमाग की तहे खोलती यह कैसे उस दौर में ज़मीन पर टिकी।जब न मिले तो उनसे पूछो जिन्होंने इन्हें पढ़ा है।तब डट कर कुरीतियों,आडम्बरो से मुकाबला करो।हर लड़ाई लड़ने से पहले उस लड़ाई को लड़े जाने के पुराने तरीकों को मालूम करना ही अक्लमंदी है।उन महिलाओं को पढ़िए,खोजिए जिन्होंने सदियों पहले दहलीज़ से निकलकर ज़माने की तरक्की के दरवाज़े खोल दिए थे।सोनिया को जन्मदिन की बधाई और रुक़य्या बेगम को नमन।

Thursday, December 7, 2017

गुस्सा मत हों घटनाओ पर

ज़ाहिर है जो हो रहा वह बुरा है, बेहद बुरा।हालात तकलीफ़देह इसलिए नही है की किसी को ज़िंदा जला दिया जा रहा या पीट पीट कर मार डाला जा रहा।हालात सिर्फ इसलिए तकलीफ़देह हैं की बहुत से लोगों को यह अब सही लगने लगा है।मैं इनसे न बात करना चाहता हूँ न ही यह मेरे तवज्जे के लायक लोग हैं।क्योंकि यह सब इंसानियत से ख़ारिज भीड़ भर हैं।मेरी फ़िक्र उनके लिए है जो ऐसी घटनाओ पर विचलित हो जाते हैं।जो कल से यह वीडियो देख नींद को कोसो मीलो दूर दौड़ा आए हैं।वह लोग जिनको किसी की भी हत्या तक़लीफ़ देती है।मेरी फ़िक्र उनके लिए है।

आप सब लोग खुद को मज़बूत रखिये और कभी भी किसी भी परिस्थिति में अपने मन को हिँसा के विरुद्ध हिँसा के लिए मत तैयार होने दीजियेगा।आदर्श स्थिति कहती है की ऐसे गन्दी जहनियत के लोगों को भी माफ़ कर दिया जाए मगर हम सब इंसान ही तो हैं।हम थोड़ा यह समझे की आखिर वीडियो बनाकर ही घटना को क्यों अंजाम दिया जा रहा,ताकि ज़्यादा से ज़्यादा दहशत फैले।यही काम तो आइसिस भी करता था।ताकि वह दो के सर काटे और दो करोण लोग उसका वीडियो देख आग बबूल होकर रिएक्ट करें या दहशत में उसके सामने सर झुका लें।मैं फिर कह रहा यह एक संगठित अपराध है, इसलिए हमारी तरफ से समझदारी की और ज़्यादा ज़रूरत है।

हम सब एक सी सोच वाले मिलकर साथ आएँ।अपने बीच इस नफ़रत से उपजी दूसरी नफ़रत को बढ़ने से रोकें।नए बच्चों को इसके रिएक्शन से बचाएँ।मुझे तक़लीफ़ है जब मैं इस वीडियो को देखने वालों की आँख में उबला गुस्सा देखता हूँ।हम सबको इसे काबू करना होगा।हम कुछ झुण्ड भर इंसानों जैसे गिरोह को खूँखार जानवर बनते देख रहें हैं, यह हमारी ज़िन्दगी का बुरा दौर है।अब हम सबको अपनी प्राथमिकताएं तय करके आपसी प्रेम के लिए ही केवल काम करना होगा,भले ही वह दो चार लोग हों।
यह जितनी नफ़रत फैलाएँ ज़माने में उससे ज़्यादा मोहब्बत घोल दें हवा में,किसी न किसी को आखरी में झुकना ही होगा।हम मोहब्बत करने वाले लोग,नफ़रत को न दिल में आने देंगे और न यूँ सामने नाचने देंगे,उसे खत्म ही होना होगा दोस्त।
डरो मत,गुस्सा मत हो,विचलित मत हो,धैर्य रखो,प्रेम नफ़रत का दम घोट देगा।यह सिर्फ बातें नही हैं, दिल को तैयार करें बस...

Monday, December 4, 2017

मजाज़

"छुप गए वो साज़-ए-हस्ती छेड़ कर
अब तो बस आवाज़ ही आवाज़ है।।"
गुज़री ठण्डी रात लखनऊ के लिए हमेशा के लिए के लिए ठण्डी हो जाएगी भला किसने सोचा था।हर एक कल रात उनके कंपकपाते होंटो से झड़ते शेर पर वाह वाह ही तो कर रहा था।हर फ़न पर दिल ओ जान से न्योछावर होने वाला शहर गहरी रात में ही तो अपनी बेरुखी का रँग दिखाता रहा है।
वह रात भला कैसे भूले जिसकी सुबह उजड़ी हुई हो।कल की रात खुले आसमान के नीचे, हमारी माटी का कीट्स दम तोड़ रहा था।

उनका हर एक कद्रदान अपने कम्बल में जा चुका था,अब उनके पास शायद सुनाने को नही बचा था,वरना फ़नकारों का भूखा यह शहर यूँ उनका दामन न छोड़ता।
असरारुल हक़ मजाज़ उर्फ़ मजाज़ लखनवी के हिस्से के लखनऊ ने ही तो कल की ठण्डी रात में सड़क किनारे मजाज़ को ऐसी गहरी नींद सुलाई की मजाज़ कभी नही जागे।आज मजाज़ के गुज़रे अरसा हो गया।उनकी कब्र पर फूल तो छोड़िये,झाँकने की भी कम फुर्सत है।
अच्छा हुआ मजाज़ को कम उम्र मिली।44 की उम्र में ही इस क़दर ज़हनी तक़लीफ़ सह ली,अपने इर्द गिर्द खड़े इंसानों को हिन्दू मुसलमान होकर ख़ून बहाते देख उनका दिमाग भी तो कई बार साथ चुका था और ज़िंदा रहते तो तक़लीफ़ ही तो होती और अगर आज होते तो रोज़ मरते।

मजाज़ की मौत,मजाज़ के लिए आज़ादी ही तो थी,वह आज़ादी जो आज मजाज़ को हमारे जैसे चाहने वाले रोज़ चाहते हैं।जब हिन्दू मुस्लिम के नाम पर दिलों को बंटता देखते हैं तो लगता है मेरे दिल को कोई अपने नुकीले नाखूनों से खुरच रहा हो और कमबख्त दिल रुकने का नाम भी नही ले रहा।जब जब मजाज़ से जुड़ा कुछ भी नज़र के सामने से दौड़ता है तो दिल में एक टीस सी उभर आती है।अजब दर्द होता है, काश मजाज़ जाते जाते उस हर दिल को भी लिए जाते जिसमे संवेदनाएँ हों...

मजाज़ आज कब्र में सुक़ून में हों या न हों मगर हमारे दिल में बड़े बेचैन से बैठे हैं।ऐ मजाज़ या तो मेरे दिल की आहट रोक दो या फिर अपनी बेचैनी,यूँ दिल में मजाज़ और धड़कन साथ साथ झेली नही जाती।याद तो रोज़ ही आती है।आज यौम ए वफ़ात में यह याद हल्की नमकीन पानी में भीगी हुई है दोस्त मजाज़।