हर कोशिश की शैतान नें एक मासूम इंसान को बहकाने की,लालच दी,ङराया,धमकाया ,समझाया मगर वह मासूम उसकी किसी भी कोशिश से नही फसा।,आख़िर में झल्ला कर उसने कहा यार मेरा एक़ मामूली सा काम करोगे,मासूम ने हांमी भर दी और पूछा क्या करना है।झट से शैतान ने कहा ये लो शीरा और इसे बस सामने जुम्मन की दुकान पर लगा दो।उसने ऐसा ही किया एक बूँद शीरा लगा दिया और पूछा इससे क्या होगा।तो शैतान ने कहा चलो दूर बैठ के तमाशा देखते हैं,कुछ देर बाद शीरे पर एक मक्खी आकर बैठ गयी।मक्खी देख छिपकली उसे खाने आ गयी।छिपकली पर एक बिल्ली लपकी,बिल्ली देख पास टहेल रहे शुक्ला जी का कुत्ता उस परटूट पडा।
जुम्मन ने कुत्ता देख गाली गलौज के साथ शुक्ला जी का कॉलर पकड लिया।यह बात दूर तक फैल गयी की एक मुसलमान ने हमारे पूजनीय शुक्ला जी पर हाथ उठाया, फिर क्या था पूरा शहर आग के हवाले हो गया,दोनो तरफ के सैकडो मासूम मार दिये गये,शैतान ठाहाके मारकर हसा और वो मासूम बेचारा उगली पर लगा शीरा देखता रह गया,शायद आप इतने मासूम नहीं।संभल जाइये ।मुल्क की बेहतरी के लगिए।अपना दिमाग खुला रखिए ताकि कोई आपसे शीरा ना लगवा सके ।आइये पूरी समझदारी से मुल्क को मज़बूत तरक्की के रास्ते पर ले जाएँ बिना बहके।ताकि हिंदुस्तान हमेशा खिलखिलाकर हँसता रहे।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Sunday, July 31, 2016
शीरा.....
मानव भक्षक
करीब साल भर पहले कुछ लोग इंसान का क़त्ल करते हैं।वजह गाय।लोग गऊ रक्षक।इंसान के ख़ून का टीका गाय को।लगाया जाता है।मैं गाय के कान में पूँछता हूँ की हे माता क्या यह गऊ रक्षक हैं।तब वोह सुर्ख़ होकर कहती है की नही वह मानव भक्षक हैं।मेरे रक्षक नही।उसी दिन मैं इस शब्द को गढ़ता हूँ।धीरे धीरे मेरा यह लफ्ज़ मेरी गऊ माता को सही साबित कर देता है।
Friday, July 29, 2016
नँगी
उसकी शलवार से ख़ून टपक रहा था।रिस रिस कर ज़मीन पर एक ख़ून की धार सी करीब डेढ़ मीटर की बन गई थी।शलवार के पायंचे उतर कर पैर के पंजो में फंसे थे।शरीफ महल्ले का मामला था तो लोगो ने एक तहमद ऊपर के जिस्म में डालकर इज़्ज़त ढक ली थी।उसका सीना इतना फैल चुका था की लग ही नही रहा था औरत का है।पूरा तहमद जिस्म पर सपाट सा पड़ा था।चेहरा खुला था,आँखे भी पूरी खुली थीं।किसी ने उसे बन्द करने की ज़हमत नही की।खुली आँखों में रात के नंगेपन को साफ़ तरह देखा जा सकता था।मैं खड़ा देखता रहा।हल्का हल्का सुनने में आया की गई बारिश की रात कोई चार लड़के इसे यहीं छोड़ गए थे।उसका एक हाथ तहमद से बाहर था।गोरा था काफी।करीब जाने पर उन गोरे हाथों में नाखुनो के निशान दिखे ,जिनपर ख़ून जमकर काला पड़ गया था।जब गौर से बिना शिकन वाला माथा देखा तो अंदाज़ा हो गया की करीब चौदह या पन्द्रह साल की रही होगी,बेचारी।कुछ लोग अफसोस कर रहे थे तो कुछ बेहद गुस्सा।मैं सोच रहा था कौन कमबख्त लोग रहे होंगे जिन्होंने इसकी यह हालत कर दी।हालत क्या,मार ही डाला।बार बार उसकी हरी और पीले फूल वाली शलवार दिख रही थी।आँखे हटती फिर टिकती।सभी का यही हाल था।सुबह से काफी देर मैं यही देखता रहा।ख़ून खौल भी रहा और जम भी रहा।मन सोच सोच के परेशान की कौन लड़की थी।इसके परिवार पर क्या असर होगा।माँ तो इसकी टूट ही जाएगी।बाप तो ज़मीन में धँस ही जाएगा।अगर भाई हुए तो तड़प कर रह जाएँगे।तहमद से हल्का झलकता पेट देख लगता बेचारी पता नही किस खूबसूरत,नाज़ों से पली खानदान की है।तभी हवा में नाम तैरा।किसी ने बताया तबस्सुम।क्या तबस्सुम।ओहो।फ़ालतू वक़्त बर्बाद कर दिया। कोई मेरे मज़हब की तो थी नही।ज़िंदा होती तो बच्चे ही पैदा करती या कहें दुश्मन।पहले बता देते की मेरे मज़हब की नही है तो वक़्त न बर्बाद होता।चलो चाय पिया जाए।सुबह से फ़ालतू में कुछ खाया भी नहीं।आज ऑफिस में बड़ा काम है।चलो हटो।रास्ता दो।©
Thursday, July 28, 2016
आशिकी अष्ठम
इमामबाड़े के सामने वाला गुलाब पार्क था,जहाँ तुम मिलने आई थीं।मैंने हाथ पकड़ तुम्हे हरी घाँस पर बिठाया था की तुम चिल्लाई,की कीचड़ में बिठा दिया।तुम्हे नही याद होगा की उस दिन आधे घण्टे हम तुम गुलाब पार्क बनाम सीसीडी पर लड़ते रहे।जब मैंने कहा की सीसीडी में कितनी देर बैठ पाते,बड़ी मुश्किल से सबसे सस्ती वाली 144 रूपये की दो कप कॉफी पीते और आधा घण्टा ही गुज़ार पाते।यहाँ पार्क में मौज से चाहे जै घण्टे बैठो।तब तुमने पास में लगे गुलाब का कांटा मेरे घुसाते हुए कहा था,कँजूस।मगर तुम मुस्कुरा दी थीं।फिर हमारी दोस्ती की पींगे आगे बढ़ती की तुम सवालो का टोकरा लेकर बैठ गईं।वह भी इस्लाम पर।हमे लगा की हमारे सामने लड़की नही कोई फ़रिश्ताइन बैठी है।हम गुलाब पार्क में नही बल्कि कब्र में हैं, इतने सवाल।इस्लाम पर मेरी समझ को जितना तुमने खंगाला होगा इतना तो पनामा पेपर्स वालों ने भी नही खंगाला होगा।तुमने पूरे छः कलमे मुझसे सुने जिनमे से दो मैं सुना पाया,जो कभी अम्मी ने भी नही सुने होंगे।इस्लाम के पाँच फ़र्ज़ भी पूछे जो अब्बा ने कभी नही पूछे।मैं नही बता पाया तो मेरी शर्मिंदा नज़रें,बारिश से भीगी घाँस में फंसे कीड़े को देखने लगी थी।जब मैंने कहा मैं इत्र नही डियोड्रेंट लगाता हूँ तो तुमने पँचर टायर सी शक्ल बनाकर मुझे घूरा था।तुमने भुट्टा खाते हुए हमसे पूछा था की अच्छा कुरान को तो मानते होंगे।तब मैं पूरी ईमानदारी से बोला था की उतना ही मानता हूँ जितने के माइने समझ आते हैं।तुमने अपना आधा खाया भुट्टा मेरी सफ़ेद शर्ट पर मारते हुए सड़क पर फेका और कहा था जाओ घुसो,काफ़िर।मैं नही मिलती अनाप शनाप लोगों से।मैं हैरत से एक पाक पाबन्द लड़की को इतनी वाहियात ज़बान के साथ बर्दाश्त कर रहा था।मगर जैसे ही मैं झुका और मेरा पर्स जेब से फिसल कर गिरा की तुम फिसल गई।दो दो एटीएम कार्ड जब तुम्हारे पैरों पर बिखरे तो तुमने झट से उठाया और कहा चलो खैर रहने दो,तुम्हारा ईमान तुम जानो,हमे क्या।हम तो तुम्हारे साथ खुश हैं।मैं पछुआ ठण्डी हवाओ में अंदर से सुर्ख़ हो रहा था।तभी मैंने तुम्हे नकार दिया की जाओ और कोई इत्र वाला ढूंढ लो।काहे से की तुम्हे प्यार तो करना नही है,तुम्हे तो जन्नत का बन्दोबस्त करना है।दफ़ा हो जाओ।मुझे तो सख्त नफ़रत आ रही है।जाते जाते सुन लो वह एटीएम भी मेरे नही थे।मैं गुलाब हूँ मनीप्लान्ट नहीं।दफ़ा हो जाओ नही तो कांटा चुभो दूँगा।तुम्हे तो मैं चुटकी भर भी याद नही करता।©
Wednesday, July 27, 2016
गऊ माँ
मैं गौ हत्या का इस पूरे जीवन में समर्थन नही कर सकता मगर इसका अर्थ यह नही की उसके विरुद्ध गुंडों बदमाशो का समर्थन करने लग जाऊँ।जब मुझसे गाय का ख़ून नही देखा जाता तो मानव का ख़ून कैसे बर्दाश्त करूँ।यह तो मेरी गऊ माता पर भी ज़ुल्म है।जो गऊ हत्या के विरुद्ध मानव हत्या को सही ठहरा रहे हैं, वह राक्षस हैं,देशद्रोही हैं।मैं इन मानव भक्षक की तरह देशद्रोही तो हूँ नही की कानून को ताक पर रखकर संविधान को बन्दकर दूँ।आप इतना समझ लीजिये आपकी लाखों करोणों दलीलें मुझे इंसान के विरुद्ध हिँसा का समर्थन करने को मनवा नही सकती।मुझसे सवाल से पहले अपने ख़ून से भीगे मुँह को आईने में देखिएगा।हमसे तब सवाल करियेगा जब हमारी ही तरह इस जीवन में कभी मानव हिँसा का समर्थन न किया हो।मैं आज वाक़ई गाय के पास जाना चाहता हूँ।बल्कि जाऊँगा।आज मैं गऊ माता से पूछूँगा की क्या आप वाक़ई एक माँ हैं या संसद भवन वाली माँ हैं।आपको वाक़ई हर बेटे से मोहब्बत है या कुछ खास बेटों से है।मैं अपनी,हाँ अपनी, गऊ माता से लड़ूं,झगडू या शिकायत करूँ आप हमे फ़र्ज़ी दलीले देने मत आइयेगा।आज मैं माँ से शिकायत करूँगा की जब तुम्हे एक तरह के बेटे मार रहे हैं और दूसरे तरह के बेटे उन बेटों को मार रहे हैं,तो तुम्हे यह अपने आँगन की खूनी लड़ाई कैसी लगती है।मेरी बात मान लो माँ,अब यह पृथ्वी छोड़ दो।जब माँ किसी घर को तहस नहस होने का कारण बन जाए,तो माँ के लिए घर की चौखट छोड़ देना ही बेहतर है।एक माँ ही होती है, जो अपने अच्छे या बुरे,दोनों तरह के बेटों का ख़ून नही बर्दाश्त कर सकती।राक्षस उसके बेटों को मारकर माँ का दिल चीर रहे हैं।माँ तुम अब चली जाओ,यह मनहूस ज़मीन छोड़कर।मुझे तुम्हारी काली बड़ी बड़ी आँखों से बहता आँसू मजबूर कर रहा है।हाँ या तब तक रुक जाओ जब तक इस बेटे की भी लाश न देख लो।मैं इस हाहाकार से तंग आ गया हूँ।हर तरफ जँगल राज है और माता तुम जँगल की नही,इंसानो के बीच रहने की आदि हो।आओ हम और तुम चलें,कहीं दूर चले,जहाँ इंसान हों।जहाँ जँगली इंसान न हों।माँ आपका और हमारा वक़्त पूरा हो चुका है।यह नही समझेंगे की जिसके हर हिस्से को,ईश्वर ने इंसान के लिए पालने वाला बनाया हो,वही को यह मानव संघार की वजह बना रहे हैं।चलो माँ,प्लीज़ अब और ख़ून तुम्हारे नाम पर बर्दाश्त नही हो रहा।अपना दामन ख़ूनी करने से पहले यह रक्तभूमि छोड़ दो माँ।यह जो तुम्हे घमण्ड के नशे में, माँ कह कह कर ख़ून बहा रहे हैं, यह तुम्हे इंसानो का ख़ून चाटने पर मजबूर कर देंगे।तुम मामूली चोटों को चाटकर सही तो कर सकती हो माँ,मगर कटी गर्दन को तुम नही जोड़ पाओगी।वैसे भी तुम्हारी साफ़ ज़बान पर ख़ून नही देखा जा सकता।माँ इन नालायक़ बेटों के साथ जीने से बेहतर है मर जाना।चलो वैसे भी यह अब धर्मभूमि रही ही नहीं।यहाँ राक्षस हर मौत पर ठहाके लगाकर हँस रहे हैं।राक्षस कुल के राज में देवतुल्य माँ का प्रवास ही बेहतर विकल्प है।अब मैं तुम्हारे काले जिस्म पर लाल ख़ून की छींटे नही देखना चाहता।चलो,यह पृथ्वी छोड़ने का वक़्त निकट आ गया माँ।चलो दूर,जहाँ इंसान रहते हों।चलो,अब चल दो।©
Tuesday, July 26, 2016
कलाम
कितना वक़्त गुज़र गया।यही 27 जुलाई थी की आप एक झटके में हमे छोड़ गए।आज मैं दिल से कमज़ोर हो गया हूँ।आँखे तो पहले ही बेजान हो चुकी हैं।आपको टूटकर याद कर रहा हूँ।कई जगह आपपर बोलने के लिए बुलाया गया है।मुझे नही पता की मैं आप पर बोल पाउँगा।जब आपसे मिला था तो यक़ीन नही था की उन यादों को इतनी बार लिखना कहना पड़ेगा।मेरे पास कुछ नही है की मैं आप पर बड़े बड़े प्रोग्राम कर पाऊँ।मैं सिसक कर रहा जा रहा हूँ की आज मेरे सबकुछ की पुण्यतिथि है मगर मैं खुद उसको याद नही कर पा रहा हूँ।गुज़री रात आपके तस्वीर के साथ गुज़री थी।इतनी बार उसपर हाथ फेरा था की उंगलियो को आपके उलझे बाल महसूस होने लगे थे।मैं पिछले कई दिन से आपसे मिलता रहा हूँ।आपकी छोटी छोटी आँखे मुझे बड़ा परेशान करती हैं।जब मैं कहता हूँ की कुछ नही हो सकता हैं तब आप सख्त हो जाते हैं।मुझे कामचोर कह कर डाँटते हैं।मैं फिर खड़ा हो जाता हूँ।कलाम साहब,नही नही मेरे कलाम,आज आपको सब याद करेंगे।इस याद के सिलसिले में मुझ गरीब की याद बड़ी मामूली सी,फीकी सी है।लेकिन हमे पता है आप सारा लावलश्कर छोड़कर मेरी यादों में ही आएँगे।डॉक्टर साहब मैं कह नही सकता आप महसूस तो कर ही रहे होंगे की हमे क्या चाहिए।आपके जाने के बाद हम सब बेहद अकेले हो गए हैं।इस अकेलेपन ने हमे अक्खड़ और बदतमीज़ बना दिया है।आज जब आप मेरे पास आइयेगा तो हमे बताइयेगा दिल मासूम कैसे होता है।हमे मिज़ाइल नही जाननी, हमे बताइयेगा मोहब्बत कैसे होती है।हमे उड़ने की नही पहले चलने की ट्रेनिंग दीजियेगा।आपका के 2020 भारत का सपना धुन्धला न हो इसलिए हम सब लाइन लगाएं खड़े हैं।इन खड़े लोगों को एक साथ मोहब्बत से खड़े होने की दुआ दीजिये कलाम।कलाम मैं, हाँ मैं, बिलकुल अकेला,टुटा हुआ हूँ।बस एक आप हैं जो ऊपर से मुझे जोड़े हुए हैं।आखरी बात या तो वापिस आ जाइये नही तो हमे बुला लीजिये।मुझपर 27 जुलाई कयामत की तरह गुज़रती है।मैं बर्दाश्त नही कर पाता हूँ यह दिन।मेरे कलाम।©
Monday, July 25, 2016
सुर्ख़ छींटे
अब बिखरे ख़ून की तस्वीरों से मन रत्ती भर विचलित नही होता।रोते बिलखते ज़ख़्मी बच्चों की तस्वीरें भी अब बुरी नही लगती।ख़ून से लथे पथे जिस्मों को देखकर रत्तीभर दिल पर फ़र्क नही पड़ता।वह बचपन था जब ऊँगली का हल्का सा ख़ून देखकर दिनभर का खाना छुट जाता था।किसी की पीठ पर बने छड़ियों के निशान को देख उस रात सो नही पाता था।अब कटे हाथ,उलटे पड़े नँगे जिस्म,मिटटी में लथड़े मरे जिस्म पर भिनभिनाती मक्खियों से अब फ़र्क़ नही पड़ता।अब सच बताए किसी के लिए कोई एहसास नही लगता।जिस दिन से समझदार हो गया उस दिन से संवेदना,दर्द,एहसास,सब खत्म हो गया जैसे आपका हो गया है।कितना खूबसूरत दृश्य है न दूर गोरे गोरे गालों पर ख़ून की छींटे।हैं न।काश काश यह हमारे आपके घर तक आ जाए ताकि करीब से इतने सुंदर दृश्य को देख पाएँ।दूर से ख़ून के धब्बे अच्छे नही लगते जब यह खूबसूरती आपके सफेद कपड़ो पर आ जाए तो आपको बहते ख़ून के पक्के धब्बे महसूस हों।आपको क्या लगता है यह ख़ून आपकी तश्तरियों में नही आएगा।किसी गफ़लत में मत रहिये ख़ून गाढ़ा भले ही होए मगर बहता बहुत तेज़ बहता है।ख़ून बड़ी तेज़ी से बड़ी से बड़ी आबादी को अपनी ज़द में ले लेता है।अरे वह नमूने तो और खूबसूरत लगेंगे जिनसे दुकानों पर टँगा गोश्त का टुकड़ा नही देखा जाता।जब उनकी गलियो से ख़ून बहेगा तो वह देखेंगे और मुस्कुराएंगे की यह मेरा ख़ून थोड़े है।यह तो अधर्मियों का ख़ून है, जिसे बह ही जाना चाहिए।जिसने जिसने ख़ून को त्यौहार की तरह मनाया है वह इसके हिस्सा बनेंगे ही।इतना तो मान ही लो हज़ारों की तादात में जब ख़ून बहता है तो उसमे कुछ ही गुनहगार होते हैं बाकि सब बेगुनाह।उन बेगुनाहो का ख़ून हमारी चाय की प्यालियों में रँग ज़रूर लाएगा।बेशर्मी से गेंहूँ के साथ घुन पिसने वाला मुहावरा मत देना क्योकि तुम्हारी नज़र में वह मौते घुन होंगी मेरी नज़र में वह मौत थी ,सिर्फ मौत।मैं तुम्हारी थालियों में ख़ून और गोश्त के टुकड़े को देख पा रहा हूँ।झूठ मत बोलना,तुम्हे ख़ून का मज़ा लग गया है।तुम्हारी ज़बान ने औरतों, बच्चों,आदमियो की उधेड़ती खाल और जिस्म के कच्चे लाल टुकड़ो का मज़ा ले लिया है।इनकार मत करना तुम्हारी हर मौत पर खुँशिया साबित कर चुकी हैं की तुम कितने मासूम हो।मेरी तो अब किसी भी ख़ून से कोई संवेदना नही।न कोई दर्द।न कोई तड़प क्योंकि मैंने अपने करीब के लोगों को लाशों पर ठहाके लगाते देखा है।यह लोग हर धर्म,हर जाति के हैं।यह हर रँग के झंडे के नीचे के लोग हैं जो अपने विपरीत के ख़ून पर ठहाके लगा रहे हैं।यह पूरी पृथ्वी के लोग हैं इन्हें ज़मीन के किसी एक हिस्से से जोड़ना बेईमानी होगी।मुझे पता है मेरे असनवेदनशीलता अभी उन लोगों को ज़रूर बुरी लगेगी जो पूरी संवेदनशीलता से ख़ून की तरफदारी करते रहे हैं।हमे अला फला दिन की याद दिलाएंगे।मुझे ख़ुशी है की यह ख़ून पर मुस्कुराते,तालियाँ बजाते,जश्न मनाते मेरे अपने हैं, जिन्होंने मेरी कमज़ोरी,मेरी संवेदना को मार डाला है।जिनकी सूरत इस ख़ून खराबे वाले दृश्य से मिल जाएगी वह अभी मुझ पर बरस उठेगा।उसके बरसने से अब मैं नही डरता क्योकि मेरी संवेदना पहले ही मर चुकी है।यह अभी आएँगे और अपने बहाए ख़ून का मौन समर्थन मुझसे भी मांगेगे।अभी यहाँ इतिहास,भूगोल,धर्म,राष्ट्र के नाम पर यह मुझे ललकारेंगे और मैं मरे हुए दिल और लुटी पिटी रूह के साथ इनका समर्थन करूँगा।तुम सही हो,तुम जो कर रहे हो वह सही है।तुम जो करोगे वह सही होगा।मेरा मुर्दा दिल कह रहा है तुम धर्म मार्ग पर हो,मेरा तुमको शत् प्रतिशत समर्थन है।©
Sunday, July 24, 2016
आतँक के खिलाफ
एक धमाका और बहुत सी साँसे थम गई।जमींन का कोई हिस्सा नही बचा जहाँ तुमने ख़ून नही बहाया।मैं वाक़ई नही समझ पा रहा हूँ की तुम क्या चाहते हो।दुनिया से आबादी खत्म करने का टेंडर तुम्हे तुम्हारे ख़ुदा ने दिया है या यह तुम्हारी खुद की उपज है।मैं लोगों के जिस्म के टुकड़े देखता हूँ फिर तुम्हे देखना चाहता हूँ।देख कर यह कोशिश करना चाहता हूँ की शैतान की शक्ल कैसी होती है।यक़ीनन तुमको शैतान कहना, शैतान को भी बेइज़्ज़त करना है।लोग आतँक के धर्म को ढूंढ रहे हैं जो तुम्हारे नामों से सौ फीसद ज़ाहिर होता है।मैं यह नही कहूँगा की इस्लाम का आतँक से कोई लेना देना नही।या यह भी नही कहूँगा की आतँक का किसी धर्म से कोई लेना देना नही।बिलकुल तुम अपने एक मज़हब के साथ वजूद रखते हो।मैं आतँक में फ़र्क नही करता।अब मैं बात करता हूँ की तुम्हे रोका कैसे जाए।पहला आसान तरीका है की तुम्हे पलक झपकते ही मौत के घाट उतार दिया जाए।मगर यह टिकाऊ नही है।ज़रूरत है जिस्म को मारने की जगह तुम्हारी सोच को मारा जाए।जिस दिन सोच मर जाएगी उस दिन आतँक का उत्पादन खुद बखुद खत्म हो जाएगा।अब यह उत्पादन रोका कैसे जाए।यह सवाल इतना आसान नही है।यह मेहनत का लम्बा रास्ता है।जिसपर धैर्य के बिना नही चला जा सकता।मैं आतँक को समूल नष्ट करने का विचार और युक्ति रखता हूँ मगर यह वाक़ई वक़्त लेगा।इस वक़्त में लाखों और जिंदगियां खत्म हो जाएँगी।।बहुत बार जज़्बात से हम लम्बे रास्ते बन्द कर देते हैं।मैं भी ख़ून देखता हूँ।तड़पता हूँ।चेहरा सुर्ख़ लाल हो जाता है।जी चाहता है की अब नही मगर फिर कहता है दिल,ठहर कर सोचो।शैतान को शैतान बन कर कभी खत्म नही किया जा सकता।शैतान को खत्म करने के लिए भगवान बनना पड़ता है।अब आप कहेंगे यह असम्भव है।मैं कहूँगा हरगिज़ नही।जब शैतान बनना सम्भव है तो भगवान बनना भी सम्भव है।ख़ून,जिस्म के लोथड़े,तड़पती ज़िन्दगी को देख कर विचलित होइए मगर ध्यान से।अपने गुस्से को पालिए ताकि निशाना सही दिशा में लगे।त्वरित जवाब पागलपन की निशानी है।इससे आतंकियो को ख़ुशी मिलती है।मैं विस्तृत से इसे खत्म करने की सोच रखता हूँ मगर आपको परेशान देख मैं भी परेशान हो जाता हूँ।आपकी भीगी आँखे हमे कमज़ोर करती हैं।मैं अपने घर की लाशों पर नही टूटा मगर आपके दिल की नमी हमे तोड़ देती है।मेरे घर में जिस्म के टुकड़े सफेद कपड़े में भरकर आए मगर मैंने दिशा नही बदली मगर आपका यूँ तड़पना मुझे धुन्धला करता है।मैं हर आतँकी हमले के बाद बेहद कमज़ोर हो जाता हूँ।खाना छुट जाता है।घर में अकेला बन्द खुद से सवाल करता हूँ की यह कैसी रुकेगा।कब रुकेगा यह तो पता है।यह तब रुकेगा जब हमारा इलाज का सिद्धान्त कारगर होगा।क्रिया की प्रतिक्रिया कभी शांत न होने वाली क्रिया है।इसको रोकने का काम करना होगा।आज मैं आतँक के विरुद्ध और कारगर रास्ते की तलाश में हूँ तब तक आप इसे जैसे चाहे नष्ट करने में लगे रहें।हो सकता है मैं थोड़ा गलत हूँ या पूरा गलत हूँ,मुझे नही पता।बस मैं किसी भी हाल में इस आतँक खत्म करने के लिए लगा हूँ।वक़्त लगेगा मगर हर निर्माण का वक़्त लम्बा और कष्टकारी है।मुझे धैर्य से सधे हुए,ईमानदार साथ की ज़रूरत है।वह सब एक हों,रास्ता यक़ीनन निकलेगा।©
Friday, July 22, 2016
सावन
कुछ दिख रहा है आपको।अपनी गर्दन को दूसरी तरफ मोड़िये देखिये ज़मीन ने कैसी चादर ओढ़ रखी है।पूरी धानी धानी हो रखी है।हर तरफ हरियाली उमड़ रही है।यह पता है क्या है, यह ज़मीन की टीन एज है।ज़मीन सालभर में एक पूरी उम्र जीती है, तो यह जो सावन है न यह उस उम्र की टीन एज है।इस वक़्त हर चीज़ बढ़ रही होती है एक नशे में,एक अल्हड़पन में,एक मदमस्ति में।इस वक़्त कोई भी घाँस का टुकड़ा तोड़िये तो उसमे इतना पानी होगा की नाख़ून भीग जाएँ।सावन महादेव का भी महीना है।वही जिनमे भोलापन,अल्हड़पन,प्रेम है।आप सोच रहे होंगे शिव जी के गुस्से का ज़िक्र हमने क्यों नही किया।वह इसलिए की सावन में भी भला कोई गुस्से की बात करेगा।यह मौसम तो प्रेम और हल्के डूबने वाले नशे का है।यानि प्रेम नशे का।मदमस्त प्रकृति को छू लेने का मौसम।प्रकृति का यौवन इस वक़्त सर चढ़ कर बोलता है।हरी हरी घाँस जब पैरो को छूती है तो जो गुदगुदी लगती है वह रूह को तरोताज़ा कर देती है।पछिया हवाएँ जब ठण्ड साथ लाती हैं तो टूटकर बादल बरसते हैं।मैं ज़मीन की इस टीन एज को देख पा रहा हूँ।मुरझाए से मुरझाए पेड़ को सर तानकर बात करते हुए देख पा रहा हूँ।अमरुद कच्चे ज़रूर हैं मगर रसदार हैं।ज़रा से दहलीज़ से पाँव सरकाइये तब देखिये यह सावन आपका सारा ज़हर मारकर आपमे प्रेम भर देगा।हल्की हल्की नींद और हल्के हल्के जागने में दिमाग कुछ सुकून पाता है।मिटटी सख्ती को छोड़कर मुलायम हो जाती है।वह कीचड़ की शक्ल में आपसे लिपटने को बेताब हो जाती है।इस मौसम में इंसान क्या कीड़े मकौड़ों को भी नया जीवन मिल जाता है।सावन जिस्म के उस हिस्से को तरो ताज़ा करता है जो सालभर थक कर चकनाचूर हो जाता है।इस एक महीने में प्रकृति इतनी ऊर्जा भर देती है की सालभर आप उससे जी सकें।यह जो ज़मीन ने हरी चुनरी ओढ़ी है, वह बता रही की मेरे गुस्सैल बच्चों आओ और मुझसे लिपट जाओ।यहाँ तुम्हे उस माँ का प्यार मिलेगा जिसे तुम सिर्फ ज़बान से माँ कहते हो।सावन में ज़मीन पूरे सालभर किये गए पापों के धब्बों को बहा देती है, फिर एक नई हरी कालीन बिछाती है।आओ और फिर अपनी नफ़रत और झगड़े से इसे पूरे साल ख़ून से रँग दो।मगर मैं फिर सब साफ़ करके तुम्हारे लिए सावन लाऊंगी।जिस दिन सावन आना बन्द हो जाए तब समझ लेना की प्रकृति तुमसे नाराज़ हो गई,तब तक इस नरम गरम धानी धानी घाँस में लोटो पोटो।आओ हम,तुम,इस ज़मीन के साथ उसी टीन एज में पहुँच कर, सब भूलकर,खेलें,मज़े करें, तफ़रीह करें, गाने गाए।चलो यौवन को दस्तक दें।खट खट खट खट, आओ तुम्हारा सावन आया है।©
Thursday, July 21, 2016
बेड नम्बर 23
अस्पताल में अपने सीरियस मरीज़ के साथ वक़्त काटना कितना मुश्किल है।सब बाहर इंतज़ार कर रहे हैं और मरीज़ अंदर सबका इंतज़ार।यह वह वक़्त है जब पूरा परिवार एक साथ इकट्ठे होकर परेशानी का मुकाबला करने की कोशिश कर रहा है।उसी वक़्त वहीं से एक लाश को वार्ड ब्वॉय ले जा रहे हैं।उस गुज़रे हुए इंसान के साथ के लोग पीछे पीछे रोते बिलखते निकलते हैं।ऐसे में हमारे साथ के भी लोग रोने लगते हैं।मेरे अपने ऐसे रोते हैं जैसे कोई अपना निकल गया हो।इस तरह जितनी लाशें जाती हैं वह सब हमारे लोगों को रुलाती जाती हैं।इनकी चीखें, इनका सिसकना, इनकी टूटन हमें मज़हब,राज्य,जाति, दल को जाने बिना रुला देता है।जानते हैं यह कौन रुला रहा होता है।यह होती है संवेदना।जो हमे हमारे लेटे मरीज़ से जोड़कर ,उसे खोने का एहसास पैदा करती है।जाती हुई लाश हमे खोखला करके जा रही होती है।मेरे साथ मौजूद हर कोई, गुज़रती लाश पर या तो रो रहा था या आँखे चुराकर इधर उधर देख रहा था।यह एक अंजान डर होता है जो हमें रुलाता रहता है।अस्पताल हमे बहुत कुछ सिखाता है।ज़िन्दगी से लड़ना,ज़िन्दगी के लिए लड़ना दोनों चीज़ें सिखाता है।बगल के बेड पर मौजूद मरीज़ का दर्द दीखता है नाकी धर्म।डॉक्टर सिर्फ डॉक्टर दिखता हैनाकी उसमे धर्म।जब परेशानी सर पर होती है तो लड़कपन के सारे चोचले अस्पताल के गेट के बाहर रह जाते हैं।ताउम्र कट्टर से कट्टर रहा आदमी अपने मरीज़ के लिए जब ख़ून ढूंढता है तब अपनी ज़बान की बनाई सारी सीमाए तोड़ देता है।तड़पते हुए मरीज़ के लिए दुआओं के बन्धन भी टूट जाते हैं।मैं अस्पताल के एक कोने में खड़ा दूर से मायूस से इंसान को देखता हूँ।दीवार से सर लगाए अपने मरीज़ के साथ सामने वाले के लिए भी दुआ खुद बखुद निकल जाती है।पड़ोस के वार्ड में झांकता हूँ तो देखता हूँ एक हनी सिंह टाइप नौजवान किसी बूढ़े की पेशाब की थैली बदल रहा है।यह वह दृश्य था जो हमे एहसास कराता है की दर्द और ज़िम्मेदारी क्या होती है।दूसरे बेड पर बैठे उस अधेड़ को भी देखता हूँ जो शायद पत्नी पर रोज़ रौब गांठता रहा होगा मगर आज मासूम बच्चे की तरह उसके हाथ से दाल पी रहा है।यह जो अस्पताल है न यह मुझे बहुत उम्मीद देता है।यहाँ पर निकली लाश से लोग बिना कर्मकांड की परवाह किये उससे लिपट कर रो लेते हैं।
यहीं पर किसी का घर बिखरता है तो किसी का बचता है।यहीं हरे पर्दों और सफेद चादरों में पता चलता है की यह जो लेटा है यह कितना ज़रूरी इंसान है।जिसको मुँह ढके रोते हुए लोग ले जा रहे हैं, पता चलता है की यह परिवार की रीढ़ था।जो एक पल में सर कलम कर डालते हैं मेरी समझ से उन्हें अस्पताल में एक महीने सिर्फ खड़ा रखा जाए।तब वह दर्द को देख पाएँगे।एक ज़िन्दगी की अहमियत समझ पाएँगे।मैं अपने मरीज़ को अकेला छोड़ अक्सर अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठा सोचता रहता हूँ की यह क्या है जो सब जगह है मगर इस अस्पताल के गेट के अंदर नही है।नफ़रत गेट के बाहर खड़ी है और मैं अंदर खड़ा,एक दूसरे को सवालिया निशान से देख रहा हूँ।एक ही वार्ड में दँगे में ज़ख़्मी मरीज़ भी है और उसी में दँगे करने वाले की माँ भी लेटी है।है न संयोग।मैं देख पा रहा हूँ दर्द हमे कैसे जोड़ता है।तक़लीफ़ हमे कैसे संगठित करती है।चोट हमें कैसे एक करती है।मैं आजकल अस्पताल से बहुत कुछ सीख रहा हूँ।बस यही दुआ की आपको सीखने के लिए वहाँ न जाना पड़े जहाँ ज़िन्दगी का हेड-टेल सेकेंडो में हो रहा हो। ©