Sunday, May 31, 2020

गंगा दशहरा

भगीरथ ने मां गंगा के पाँव पकड़े और पहाड़ से मैदान तक उन्हें लेकर आए । मां गंगा ने प्यास और भूख से तड़पते लोगों को अपने आँचल में ले लिया और अपने बच्चों में बिना फर्क के हर एक कि ख्वाहिशें पूरी की । जिसे अनाज चाहिए था,उसे अपने हुनर से अनाज सौंपा, जिसे प्यास थी,उसके गले तो ताज़गी बख्शी । पेड़ पौधे,चिड़िया,जानवर,कीड़े मकोड़े और इन सबके सामने खड़े इंसान को मां गंगा ने ज़िन्दगी दी,सब जी उठे,सब बढ़ चले ।

आज गंगा जी कैसी हैं, यह किसी से छिपा नही है । आज गंगा दशहरा है, यानि गंगा जी के समतल भूमि  पर आने का शुभ दिवस । राजा भगीरथ जब उन्हें लेकर आए थे,तभी से आजतक यह बात तो तय थी कि गंगा जी की ज़िम्मेदारी शासक की थी और जिसकी ज़िम्मेदारी शासक ले,उसकी सेवा करने का कर्तव्य जनता का था मगर अफसोस शासक और जनता दोनों ने अपनी ज़िम्मेदारी ऐसे नही निभाई की गंगा जी मुस्कुराती हुई बह सकें । गंगा जी ने अपनी ज़िम्मेदारी से मुँह नही मोड़ा,राजा भगीरथ से जो वादा किया,आजतक निभा रही ।

गंगा जी को नज़रंदाज़ करके आप अपनी मिट्टी से जुड़ाव को कमज़ोर करेंगे । राही मासूम रज़ा अपनी तीन माँ होने का ज़िक्र करते हैं, उनमें से पहली मां गंगा जी हैं । शिव हों या राम,बुद्ध हों या महावीर,तुलसी हों या कबीर, अकबर हों या अशोक, खुसरू हों या जायसी,शेरशाह हों या हुमायूँ,गाँधी हों या नेहरू सबको जिस एक आँचल ने समेटा है, वह हैं गंगा जी । शिव जी की जटा से धरती के सबसे कमज़ोर व्यक्ति तक जिसने अपनी पहुँच बनाई,वह हैं गंगा जी ।

आज गंगा दशहरा की बधाई और साथ मे यह कि गंगा जी से सीख सको तो सीखो,गंगा जी ने अपने खूबियों को किसी एक धर्म,किसी एक जाति,किसी एक लिंग,किसी एक जीव तक ही बांधे नही रखा,बल्कि हर एक के लिए बाहें खोल दीं इसीलिए तो वह मां गंगा हो गईं ।

किसी ने सूरज को गंगा जी का जल चढ़ाया तो किसी ने उसी जल में वज़ू करके नमाज़ पढ़ी,बताइए इससे पवित्र जल और क्या हो सकता है । गंगा जी किसी एक कि नही हैं, सबकी हैं,सबकी ज़िम्मेदारी भी है कि उनके आँचल में हमारी कमियों की छींटे ऐसे न लग जाएं कि उनको बहने में तक़लीफ़ हो । वह बच्चे सबसे बुरे होते हैं, जिनसे उनकी माँ तक़लीफ़ पाए और वह बच्चे बुरे बच्चों से भी बुरे बच्चे होते हैं, जो अपनी माँ के दुःख दूर करने की जगह आपस मे लड़ें ।

गंगा जी हमे मिलकर रहने का आशीर्वाद दें । गंगा जी धरती की तमाम गन्दगी बहा ले जा रहीं ऐसे ही हमारे मन की गंदगी को भी बहा ले जाएं । गंगा जी हमारे मन और आत्मा को इतना निर्मल कर दें कि उसमे नफ़रत,सम्प्रदायिकता,अलगाव,हिंसा जैसे कीटाणु पैदा ही न हो सकें ।

वह व्यक्ति गंगा जी को मां कैसे कहेगा,जिसका दिल क्षेत्र,लिंग और धर्म मे बंटा हुआ है, गंगा जी का असली पुत्र तो वही होगा जो गंगा जी की तरह बिना फर्क सबके लिए प्रेम रखे,सबकी सेवा करे और सबके काम आए । मां गंगा ने कभी अपने आशीर्वाद से मुँह नही मोड़ा,हमें भी अपने कर्तव्यों से मुँह नही मोड़ना चाहिए,चाहे मिट जाएँ । बिना कोई अन्तर किये हर धर्म,जाति, वर्ग,क्षेत्र की सेवा करते हुए मिट भी जाएँ,तो क्या है, मां गंगा के सच्चे पुत्र तो बने जाएँगे । गंगा दशहरा हमे याद दिलाने का दिन है कि अपने हृदय को गंगा जी जैसा विशाल और निर्मल कर लो ताकि उसमे हर बुराई बह जाए और अच्छाइयाँ पनप उठें,जैसे भगीरथ प्रयास के बाद फसल और इंसान मुस्कुराए थे...
#hashtag #हैशटैग

Friday, May 29, 2020

आर्थिक मदद या फ्रॉड

अच्छा जो अब हम कहने जा रहे उसे बड़े ध्यान से पढ़ें,क्योंकि बिना जाने भविष्य में उठाए गए आपके कदम के आप ही जिम्मेदार होंगे ।
आप अपने इर्द गिर्द देखिये,कोई भी ऐसा व्यक्ति जिससे आपके मिलने जुलने के सम्बंध नही हैं, जिससे फोन पर बात तक नही होती,वह अचानक आपको अपनी परेशानी बताकर अगर आर्थिक मदद माँगता है, तो सतर्क हो जाइए । जो भी आपसे मदद की गुहार लगाए उसकी मदद से पहले उससे दूसरे माध्यमों से बात कर लें,अब क्योंकि मदद के नाम पर ऑनलाइन ठगी बहुत बढ़ गई है, तो खूब ख्याल रखिये ।

आप मेरे कितने ही क़रीबी हों,एक बात ध्यान रखिएगा की हम आर्थिक मदद कभी नही माँगते हैं । हमारे घर और संगठन दोनों जगह की एक ही ट्रेनिंग है कि कहीं भी हाथ मत फैला दो,इसलिए अगर हमारे नाम से कोई मैसेज आर्थिक मदद का मिले तो प्लीज़ उसे मेरा मत मानियेगा,तुरन्त रिपोर्ट कीजिये या उसे सार्वजनिक कर दीजिएगा क्योंकि इनबॉक्स में बतियाने, मदद माँगने और दूसरी किसी भी तफरीह की मेरी आदत नही है ।

यह बताना इसलिए जरूरी है कि हम हों या कोई दूसरा,सबके काम लोग देख रहें । अब अगर मेरे नाम से कोई मदद मांगे तो सबको लगता है कि कर देनी चाहिए, जबकि हम जैसों की माँग को ज़्यादा सवालिया नज़रों से देखना चाहिए की न कोई बात होती है और न ही कोई बहुत घरेलू सम्बन्ध हैं, तब काहे हफ़ीज़ भाई पैसे माँगने बैठ गए ।

हमारे नामपर इनबॉक्स में मांगी गई आर्थिक मदद को बिल्कुल नज़रंदाज़ करें और हो सके तो ज़िम्मेदार लोगों सहित हमे भी सूचना दीजिये । यही नही हर एक जो भी आपसे आर्थिक मदद मांगे,इमोशन में डूबने की ज़रूरत नही है, पहले थोड़ा ठहर जाएँ ।

आप पहले उस व्यक्ति से बात कीजिये या उसके बहुत नजदीकियों से पूछिए,जब तक मदद माँगने वाले कि सच्चाई न पता चले मदद मत कीजिये क्योंकि इससे दोहरा नुकसान है,एक तो जिस व्यक्ति की मदद कर रहें,वह ही इस फ्रॉड से अनजान हैं, दूसरा यह कि आपका आर्थिक नुकसान भी हो रहा और ज़रूरतमंद तक कुछ पहुँच भी नही रहा ।

एक हाथ से दो,दूसरे हाथ को पता न चले,यह थ्योरी भौतिक रूप में हो सकती है । ऑनलाइन माँगों में आपको सतर्कता बरतनी ही पड़ेगी । आप हमें ही नही बल्कि हर किसी को,जो भी आपसे आर्थिक मदद मांगे,उसकी पहले जाँच कीजिये, जांच के बाद जो समझ आए वह कीजिये मगर बिना परखे रुपये मत भेजिएगा ।

पैसे भेजने से पहले वाली मदद कीजिये,अगर सामने वाला पैसों के चक्कर मे ही पड़ा है तो तुरन्त हट लीजिये और शिकायत भी कीजिये । आजकल बेरोज़गारी बढ़ी है, खासकर पढ़े लिखे वर्ग के लड़के अपने खर्चे निकालने में असमर्थ हैं, वह ही यह हरकते कर रहे हैं, नज़र बनाए रखिये,अपने घर के उन बच्चों पर भी नज़र रखिये जो बिना कुछ काम किये पैसे खर्च कर रहे हैं, क्योंकि धन का स्त्रोत न पता हो तो बहुत कुछ काले घेरे में आ जाता है ।
सावधान रहिए,ठगी से बचे रहिए,मदद कीजिये मगर जाँच परख कर और हमारी मदद की इनबॉक्स की माँग को पूरी तरह नज़रंदाज़ कीजिये क्योंकि जैसे आरबीआई फोन पर कोई जानकारी नही माँगता वैसे ही हम सोशल मीडिया या वह जिससे मेरे खाने पीने के सम्बंध नही हैं, आर्थिक मदद नही माँगते हैं, ध्यान रखिएगा,सावधानी हटने पर हुए नुकसान के आप खुद ज़िम्मेदार होंगे,इसलिए सतर्क रहिए....
#hashtag #हैशटैग

Wednesday, May 27, 2020

नेहरू बेरूत

यह बेरूत,लेबनान की तस्वीरें हैं, सन साठ की,नेहरू को बेरूत की यूनिवर्सिटी में सुनने की ललक देखिये,यूनिवर्सिटी हॉल में जगह नही मिलने के बावजूद स्टूडेंट खिड़कियों में लटके सुन रहे हैं....
नेहरू बेरूत में क्या बोले यह महत्वपूर्ण नही था,बल्कि सबसे महत्वपूर्ण था कि वह बेरूत में क्या नही बोले ?

फिलस्तीन होते हुए जब वह बेरूत उतरे तो उनके भाषण से सभी मंत्रमुग्ध थे और उनकी तारीफों के किस्से आम होने लगे । जब नेहरू भारत लौटे और उन्होंने इस दौरे की बातें संसद में रखी,जैसा वह हमेशा करते कि हर विदेश यात्रा का पूरा ब्यौरा सभी सांसदो को संसद भवन में देते । यहीं उन्होंने खुलासा किया कि जब वह भारतीय एयरफोर्स के जहाज़ से जा थे थे तो इज़राइल के दो लड़ाकू विमान ने उनके जहाज़ को गिराने की कोशिश की,वह भी यह जानकर की इसमे भारत के प्रधानमंत्री मौजूद हैं ।

संसद में नेहरू जी से पूछा गया कि जब इतनी महत्वपूर्ण घटना घटी और आपपर जानकर इज़राइल ने हमला किया,तो आपने बेरूत में इस बात को क्यों नही उठाया,वहां इस करतूत की भत्सर्ना क्यों नही की,तब नेहरू बोले ।

इज़राइल हमे मारना नही चाहता था,बस चाहता था कि हम वह बात जो कहने निकले हैं, वह न कहें और सारी बातें हम पर हुए हमले के शोर में गुम हो जाएँ । इसलिए हमने खुद पर हुए दुस्साहसिक हमले का ज़िक्र बेरूत में नही किया और वहाँ वही बातें कहीं,जो करना महत्वपूर्ण था । आप सांसदों को हर सच मालूम होना चाहिए इसलिए यह बताया ।

यहाँ कितना कुछ सीखा जा सकता है कि आपकी बात महत्वपूर्ण है या आपका जेल जाना,आपका लक्ष्य महत्वपूर्ण है या आपकी चर्चा,इनमे से जितना आप समझ सकेंगे,उतना ही नेहरू को जान पाएँगे, बाकी रही लोकप्रियता तो सत्तरह साल आखरी साँस तक हमारे पुरखों ने उन्हें चुनकर बैठाया था और आज जब वह चले गए,तब करोणों घरों में खाना नही पक्का था,आँखे नम थीं ,इसके लिए किसी वट्सएप फॉरवर्ड या ट्रोल लेहड़ी की ज़रूरत नही है, दुनिया उन्हें ऐसे ही सुनती थी जैसे बेरूत के युवा सुन रहे हैं...
#hashtag #हैशटैग

Tuesday, May 26, 2020

पण्डित जी

जब दो टुकड़ों में देश मिला,वोह इसका रोना नही रोए। रियासतो का झगड़ा मिला,वोह इसका रोना भी नही रोए।शुरुआत में ही महात्मा का साथ छूटा,वोह इस ज़बरदस्त झटके के बावजूद भी मायूस होकर नही बैठे। बहुत से बनने वाले अपनो ने जी भर कोसा,इसपर भी उन्होंने रोना नही रोया।दुनिया ने शक से देखा,उन्होंने उफ़्फ़ तक नाकि।

मज़हबी रँग से उनपर कीचड़ फेका गया,वोह इसपर भी पलट कर जवाब देने नही मुड़े। तमाम दूसरे विचारपंथियों ने उनमे अपने आप को ना देखकरकर खूब आलोचना की।उन्होंने तब भी इनमे से किसी एक को भी देशद्रोही या अपने रास्ते का कांटा नही कहा।बहुतों ने उनकी जड़ो में दही डालने का काम किया,उन्होंने उन्हें भी साथ रखकर दुनिया के सामने लोकतन्त्र  और धर्मनिरपेक्षता की वह मिसाल रखी जिसे आज भी कोई तोड़ नही पाया।

17 साल देश के शीर्ष पद पर रहे मगर कभी अपने आलोचको को नही दबाया।अडिग अपने काम करते ही रहे।देश की हर उस चीज़ जिसपर तुम फ़ख्र कर सकते हो,उसकी बुनियाद रखी।देश की भुजाओं को जिसने हर दिशा में फैला दिया।जिसकी छाँव में सब धर्म,सब विचार फलते फूलते रहे,उन्होंने किसी को जबरन नही रोका,ऐसी ही आज़ादी का तो ख्वाब बुना गया था। वह आधुनिक तो थे ही मगर उनमे ज़बरदस्त आध्यात्म भी था जो आपको नही दिखेगा।उनकी ज़िन्दगी के तमाम रँग बिखरे पड़े हैं, हर एक अपने मतलब का रँग लिए मतवाला फिरता है। वह आगे देखना चाहते थे मगर पिछली सँस्कृति की अच्छी बातों को सहेजना भी चाहते थे । उनकी दूरदृष्टि जितनी शानदार थी,उतनी ही निकट दृष्टि भी श्रेष्ठ थी ।

आपने तो उन्हें कुछ खास किताबो से जाना जिसपर उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कभी रोक नही लगाई,जमकर अपनी आलोचना करने के मौके दिए।मैं मानता हूँ की गलतियां हुईं होंगी।निर्माण के मार्ग पर बहुत बार गलतियाँ होती हैं मगर इसका मतलब यह नही की वोह व्यक्ति पूरा गलत है।हो सकता है एक बेहतर मुल्क़ की तस्वीर बनाते में आपके धर्म को चोट पहुँची हो मगर उससे ज़्यादा ज़रूरी उन्होंने इस मुल्क को हर जतन से एक किया। आज जो पाकिस्तान और हमारे भारत मे बड़ा फ़र्क है, जिसे आपको छोड़ पूरी दुनिया महसूस करती है।वह यह है की पाकिस्तान को नेहरू जैसा व्यक्तित्त्व नही मिला। वोह देश अस्थिर और असफल है।नेहरू ने हमे स्थिर किया और प्रगति की दिशा दी।

हाँ अगर दिल ज़रा से भी प्रेम को जगह देता हो आपका तो देश के इस पहले प्रधानमंत्री को इज़्ज़त से याद कर लेंगे देशभक्ति कम नही पड़ जाएगी।मुझे भी लगता है जिसका कट्टर हिन्दू हों या कट्टर मुस्लिम अगर जमकर विरोध करें,तो वोह ही सही है ।नेहरू हिन्दू मुस्लिम की कट्टर सोच के सामने खड़ी एक बड़ी शक्ति थे । नेहरू में छिपी हर तरह की समझ को समझना मामूली बात नही है।नेहरू चन्द पन्नों के मोहताज नही।जो खुद मोटी मोटी किताबों को लिख गया हो उन्हें समझने के लिए समझ चाहिए । आज ही के रोज़ आपने एक कामयाब तारीख़ बना कर आखरी साँस ली थी।

आज नेहरू की पुण्यतिथि है, हमे पता है उन्हें याद करने में बहुतों की साँस फूलने लगेगी।हर वोह व्यक्ति उन्हें याद करने में कतराएगा जो आपने धर्म के तो करीब है मगर देश से दूर है।नेहरू जब तक हम हैं तब तक भले अकेले आपको याद करें,करते रहेंगे।मेरे देश के निर्माता आप ही हैं।कोई इसका चाहकर,जितना रूप बदलने की कोशिश करे,ज़र्रे ज़र्रे में पड़ी नेहरू की छाप को खत्म करने में उनके मुँह से ख़ून आ जाएगा,मगर वोह यह बिल्कुल भी मिटा नही पाएँगे। दुनिया के तमाम देशों के महान नेताओं को दोस्त बनाने वाले,सलाह देने वाले,फ़िक्र को सुनने वाले और प्रधानमंत्री रहते हुए किसी गरीब के हाथ अपने गिरहबान तक पहुँचने देने वाले नेहरू को नमन । आपने जो किया है, वह याद किया जाएगा,जो जोभी करेगा उसे आने वाली नस्लें वैसे ही याद करेंगी । पण्डित जवाहर लाल नेहरू एक अमर चरित्र है । हमारे घर के पुरखे महान थे जो उन्होंने पण्डित जी को उनकी आखरी साँस तक उस कुर्सी पर बैठाए रखा,जो भारत का निर्माण कर रही थी,आधुनिक भारत का ऐसा चरित्र जिससे दुनिया बेपनाह मोहब्बत करती थी,जो हर एक का दोस्त था,जो बच्चों से बूढ़ों तक कि जमात में बेधड़क चला जाता था,आज ही के रोज़ हमारी मिट्टी में मिल गया,हमारे पानी मे घुल गया और आजतक हमारी हवाओं में तैर रहा है, वह अमर चरित्र.....
#हैशटैग #hashtag

पण्डित नेहरू

जब दो टुकड़ों में देश मिला,वोह इसका रोना नही रोए। रियासतो का झगड़ा मिला,वोह इसका रोना भी नही रोए।शुरुआत में ही महात्मा का साथ छूटा,वोह इस ज़बरदस्त झटके के बावजूद भी मायूस होकर नही बैठे। बहुत से बनने वाले अपनो ने जी भर कोसा,इसपर भी उन्होंने रोना नही रोया।दुनिया ने शक से देखा,उन्होंने उफ़्फ़ तक नाकि।

मज़हबी रँग से उनपर कीचड़ फेका गया,वोह इसपर भी पलट कर जवाब देने नही मुड़े। तमाम दूसरे विचारपंथियों ने उनमे अपने आप को ना देखकरकर खूब आलोचना की।उन्होंने तब भी इनमे से किसी एक को भी देशद्रोही या अपने रास्ते का कांटा नही कहा।बहुतों ने उनकी जड़ो में दही डालने का काम किया,उन्होंने उन्हें भी साथ रखकर दुनिया के सामने लोकतन्त्र  और धर्मनिरपेक्षता की वह मिसाल रखी जिसे आज भी कोई तोड़ नही पाया।

17 साल देश के शीर्ष पद पर रहे मगर कभी अपने आलोचको को नही दबाया।अडिग अपने काम करते ही रहे।देश की हर उस चीज़ जिसपर तुम फ़ख्र कर सकते हो,उसकी बुनियाद रखी।देश की भुजाओं को जिसने हर दिशा में फैला दिया।जिसकी छाँव में सब धर्म,सब विचार फलते फूलते रहे,उन्होंने किसी को जबरन नही रोका,ऐसी ही आज़ादी का तो ख्वाब बुना गया था। वह आधुनिक तो थे ही मगर उनमे ज़बरदस्त आध्यात्म भी था जो आपको नही दिखेगा।उनकी ज़िन्दगी के तमाम रँग बिखरे पड़े हैं, हर एक अपने मतलब का रँग लिए मतवाला फिरता है। वह आगे देखना चाहते थे मगर पिछली सँस्कृति की अच्छी बातों को सहेजना भी चाहते थे । उनकी दूरदृष्टि जितनी शानदार थी,उतनी ही निकट दृष्टि भी श्रेष्ठ थी ।

आपने तो उन्हें कुछ खास किताबो से जाना जिसपर उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कभी रोक नही लगाई,जमकर अपनी आलोचना करने के मौके दिए।मैं मानता हूँ की गलतियां हुईं होंगी।निर्माण के मार्ग पर बहुत बार गलतियाँ होती हैं मगर इसका मतलब यह नही की वोह व्यक्ति पूरा गलत है।हो सकता है एक बेहतर मुल्क़ की तस्वीर बनाते में आपके धर्म को चोट पहुँची हो मगर उससे ज़्यादा ज़रूरी उन्होंने इस मुल्क को हर जतन से एक किया। आज जो पाकिस्तान और हमारे भारत मे बड़ा फ़र्क है, जिसे आपको छोड़ पूरी दुनिया महसूस करती है।वह यह है की पाकिस्तान को नेहरू जैसा व्यक्तित्त्व नही मिला। वोह देश अस्थिर और असफल है।नेहरू ने हमे स्थिर किया और प्रगति की दिशा दी।

हाँ अगर दिल ज़रा से भी प्रेम को जगह देता हो आपका तो देश के इस पहले प्रधानमंत्री को इज़्ज़त से याद कर लेंगे देशभक्ति कम नही पड़ जाएगी।मुझे भी लगता है जिसका कट्टर हिन्दू हों या कट्टर मुस्लिम अगर जमकर विरोध करें,तो वोह ही सही है ।नेहरू हिन्दू मुस्लिम की कट्टर सोच के सामने खड़ी एक बड़ी शक्ति थे । नेहरू में छिपी हर तरह की समझ को समझना मामूली बात नही है।नेहरू चन्द पन्नों के मोहताज नही।जो खुद मोटी मोटी किताबों को लिख गया हो उन्हें समझने के लिए समझ चाहिए । आज ही के रोज़ आपने एक कामयाब तारीख़ बना कर आखरी साँस ली थी।

आज नेहरू की पुण्यतिथि है, हमे पता है उन्हें याद करने में बहुतों की साँस फूलने लगेगी।हर वोह व्यक्ति उन्हें याद करने में कतराएगा जो आपने धर्म के तो करीब है मगर देश से दूर है।नेहरू जब तक हम हैं तब तक भले अकेले आपको याद करें,करते रहेंगे।मेरे देश के निर्माता आप ही हैं।कोई इसका चाहकर,जितना रूप बदलने की कोशिश करे,ज़र्रे ज़र्रे में पड़ी नेहरू की छाप को खत्म करने में उनके मुँह से ख़ून आ जाएगा,मगर वोह यह बिल्कुल भी मिटा नही पाएँगे। दुनिया के तमाम देशों के महान नेताओं को दोस्त बनाने वाले,सलाह देने वाले,फ़िक्र को सुनने वाले और प्रधानमंत्री रहते हुए किसी गरीब के हाथ अपने गिरहबान तक पहुँचने देने वाले नेहरू को नमन । आपने जो किया है, वह याद किया जाएगा,जो जोभी करेगा उसे आने वाली नस्लें वैसे ही याद करेंगी । पण्डित जवाहर लाल नेहरू एक अमर चरित्र है । हमारे घर के पुरखे महान थे जो उन्होंने पण्डित जी को उनकी आखरी साँस तक उस कुर्सी पर बैठाए रखा,जो भारत का निर्माण कर रही थी,आधुनिक भारत का ऐसा चरित्र जिससे दुनिया बेपनाह मोहब्बत करती थी,जो हर एक का दोस्त था,जो बच्चों से बूढ़ों तक कि जमात में बेधड़क चला जाता था,आज ही के रोज़ हमारी मिट्टी में मिल गया,हमारे पानी मे घुल गया और आजतक हमारी हवाओं में तैर रहा है, वह अमर चरित्र.....
#हैशटैग #hashtag

Monday, May 25, 2020

कुलसुम सयानी

17 साल की उम्र में जिसने मुल्क़ की आज़ादी के ख्वाब को अपनी आँखों में संजोया और सब कुछ छोड़ गाँधी जी के पाँव के पीछे अपने पाँव बढ़ा दिए।एक लड़की जिसके जज़्बे के आगे अंग्रेज़ों को तो झुकना था,लीगियों को भी झुक जाना पड़ा।उन्हें दोहरी लड़ाई लड़नी थी।एक अंग्रेज़ों को बाहर निकालने की दूसरी मुस्लिम लीग के पृथक्करण के विरुद्ध।गाँधी जी का इस तेज़ तर्रार महिला पर हाथ था तो इस महिला का का हाथ समाज की नब्ज़ पर था।अपने दम पर गुजरात में रहने वाली यह अंग्रेज़ों को तो धूल चटा ही गईं साथ आने वाले भारत की बुनयाद भी रख गईं।

यह वोह पहली महिला थीं जिसने गुजरात भर में घूम घूम कर स्कूल खोले,शिक्षा का प्रचार किया।लड़कियों की पढ़ाई पर इतना ज़ोर दिया की कांग्रेस के कार्यालयों में क्लास चलने लगी।जब आज़ादी के वक़्त मुस्लिम लीग ने लोगों को भड़काने का काम किया तो इन्होंने शिक्षा का ऐसा आंदोलन खड़ा कर दिया की उसके सामने सब बौने हो गए।आज़ादी की इस महत्वपूर्ण साथी ने देश आज़ाद होने पर कुछ भी नही लिया।ख़ामोशी से तालीम के छोटे छोटे चिराग जलाती हुई चली गईं।हममे से किसी को उन्हें याद करने की भी फुर्सत नही।हमारे मुल्क़ के ढाँचे में ऐसे लाखों चेहरे दफ़न हो गए,जिन्हें शायद हमे याद रखना था।

काँग्रेस के "जन जागरण"अभियान को इन्होंने ही सबसे सफल बनाया।जब सब तरफ मायूसी थी।तब "रहबर" नाम से एक प्रौढ़ शिक्षा का अभियान चलाया जो बेहद सफल हुआ।उस दौर में उनके इतना प्रौढ़ शिक्षा पर किसी ने काम नही किया।दसयों किताबें लिखी मगर अब वोह ज़िक्र से ही बाहर हैं।

यह महिला हैं कुलसूम सयानी।आज उनकी पुण्यतिथि है।हो सके तो मुल्क़ की नीव रखने वाले हर हाथ को ढूंढकर महसूस कीजिये।वैसे लोग कुलसूम आपा को भले ही न जानते हों मगर उनके बेटे रेडियो की मशहूर आवाज़ अमीन सयानी को ज़्यादातर जानते ही होंगे।उनसे पहले ताउम्र जूझने वाली कुलसूम सयानी को याद कर लीजिये।नीचे तस्वीर में कुलसूम आपा अपने बड़े बेटे हमीद सयानी के साथ और जो लड़का है वोह है अमीन सयानी।।।।
#हैशटैग #hashtag

Sunday, May 24, 2020

ईद कोरोना

ज़िन्दगी में दोबारा अब ऐसी ईद मत आए, बस,यही दुआ । हालांकि ईद ही क्या,ऐसे मनहूस दिन भी अब कभी लौटकर न आएँ ।

हम घूर कोरोना को रहे हैं कि चलो तुमको तो बर्दाश्त कर ही रहे हैं, अपनी बिरादरी से दूसरे भाइयों बहनों को हमारी ख़िदमत में अब मत भेजना,वरना,वरना क्या कर ही लेंगे,सिवाए खुद को तमाम तहों में छिपाने के सिवा...कोरोनाकाल में कोरोनासिवाई ही मिली बेचारे वह लोग भी नही मिले जिनके निकले हुए पेट से ही ईद मिल लिया करते थे । वह बिजली के तार से भी दुबली हड्डियों से भी ईद नही मिले,जिनसे मिलकर उनकी हड्डियाँ चुभ जाती थीं । उनसे भी ईद नही मिले जिनके पसीने से हमारे कपड़े पर धब्बे पड़ जाया करते थे,उनसे भी ईद नही मिल सके जिनके पास से जन्नत की हूरों को रिझाने के इत्र ऐसे लगे होते थे कि तीन धुलाई के बाद भी महक दम नही तोड़ती थी ।

उन कंजूसों से भी ईद नही मिले, जो चमगादड़ से भी बुरी शक्ल बनाकर ईदी ढकेल दिया करते थे,कोरोना इन पर ही गया है शक्ल ओ सूरत में । हम तो उनसे भी इस बार ईद नही मिल पाए जिनकी दी हुई ईदी से पूरे महीने की चाय के खर्चे निकल जाया करते थे । मनहूस कोरोना ने पूरी ज़िंदगी के मज़े किरकिरे कर दिए ।

वह सिवाईंयां और मटर भी बड़ी मिस कर रहे हैं, जो मुँह में जाते ही गड़ जाया करती थी,उनकी बेचारी सिवइयों ने दूध घी की शक्ल देखे बिना शक्कर में रगड़ रगड़ कर आत्महत्या की हुई होती थी और उनकी मटर तो पानी मे कंकर की तरह तैरा करती,बताओ यह ज़ायका भी छीन लिया मनहूस कोरोना ने । वह सिवाईंयां भी याद आ रहीं जिन्हें खाने को मुर्दे ज़िन्दा होने की दुआ करते कि काश एक रेशे का ही ज़ायका मिल जाता ।

 ज़िन्दगी की सारी खटास मिठास को खत्म करके बदबख़्त कोरोना ने बकठा कर दिया है । अच्छे बुरे सब दिन मिटाकर खाली खाली दिन पकड़ा दिए हैं । फिर भी मायूस क्या होना,यह कोरोना न होता,तो कौन बड़े अच्छे दिन आने वाले थे,चीख चीख सबके कागज़ ही बनवा रहे होते,खुद को मिट्टी का लाल साबित करने में लाल पीले हो रहे होते,आखिर कोई हम सब इंसानों को सुक़ून से तो देखना नही चाहता था ।

जैसी भी है, जिसकी भी है, यही ईद है और यही सच्चाई है, सच्चाई से क्या मुँह मोड़ना । मीठी सिवइयों के साथ बेहद फीकी ईद मुबारक ।

आप सभी को और आपके सभी लोगों को तहेदिल से ईद मुबारक💐💐💐
#hashtag #हैशटैग

Thursday, May 21, 2020

गामा

गामा बचपन में हमारे लिए एक क़िस्सा भर थे। गामा पहलवान हमारे यहाँ मुहावरे की तरह इस्तेमाल होते।जैसे माइकल जेक्सन,हिटलर यह नाम से ज़्यादा मुहावरे हो चुके थे। किसी को थिरकते देखा तो कहा बहुत माइकल जैक्सन मत बनो,किसी को हुक्म चलाते देखा,तो कहा हिटलर हो गए हो क्या,वैसे ही कोई ताक़त दिखाता तो उसे हम लोग कह देते,देखो बड़े गामा बन रहे हैं । गामा हमारी ज़ुबानों पर थे बिना यह जाने की वह हैं क्या,मुझे कुश्ती नही पसन्द मगर यह याद है जब नानीअम्मी ने कहा की गामा ने बंटवारे के वक़्त खुद पाकिस्तान में खड़े होकर बहुत से हिन्दुओ की जान बचाई और अपने खर्चे से हिंदुस्तान भेजा।

यहाँ तक एक परिवार के लिए अपनी कुश्ती का सामान गिरवी रख दिया।अपनी चादरें  घर बार छोड़कर जाने वाली औरतों को ओढ़ने को देदी। गामा ने कहा था की काश हमारा जिस्म और बड़ा होता तो उसकी नाप के कपड़े बड़े होते,जो ज़्यादा लोगों के काम आते। अपने घर का अनाज तक जाने वालों को देकर खुद हफ़्तों कुछ नही खाया।महीनो दिन रात अपनी गली की रखवाली करता रहा यह दुनिया का मशहूर पहलवान गामा।

गामा ने कहा रखा था कि उसकी गली के हिंदुओं को कोई हाथ भी लगाएगा तो उसे गामा से भिड़ना होगा,गामा महीनों अपनी गली की रखवाली करते रहे,दुनिया का मशहूर पहलवान अपनी गली में दंगाइयों से हिफाज़त करने को रात रात जागता रहता ।

यह किस्से सुनकर गामा के लिए दिलचस्पी पैदा हुई।वोह गामा की इसलिए इज़्ज़त करती थीं की वोह पहलवान होकर भी बड़े नरम दिल के थे । आज 22 मई उनका जन्मदिन है और कल 23 मई को गामा ने दुनिया को अलविदा कहा था। मुझे जहाँतक याद है, ज़्यादातर पुराने घरों में कभी न कभी गामा का नाम आया होगा।गामा ज़िन्दगी में कभी नही हारे।उनकी ज़िन्दगी के बहुत से किस्से सुने जो अभी वैसे ही याद हैं।उनको क्या लिखें सिवाए इसके की आपकी प्रतिभा का क्षेत्र कोई भी हो अगर उसमे मोहब्बत और नरमी उतर आए तो आप दुनिया के दिलों पर राज करेंगे....

गामा का आखरी वक़्त ग़ुरबत  में बीता, दोनों हाथ से लुटाने वाला आखरी में दिल मसोसकर रह गया । भारतीय उद्योगपति बिड़ला ने उनकी मासिक पेंशन बांध दी थी,यह भी देखिये की वह वक़्त कैसा था । अच्छे लोग अच्छे लोगों की मदद करने में सरहद के रोने नही रखते थे,दुश्मन की नज़र से नही देखते थे । जो अच्छा है, वह सबका है, जो बुरा है, वह सिर्फ अपनी भीड़ का है, यही तो बदला है कि नफरत ने हमे अच्छे दिलों में झाँकने से मुँह मोड़ना सिखा दिया है ।

हम फिर कह रहें हैं अपने सख़्त होते दिल को नरम करो,इसमें मोहब्बत पैबस्त करो,नफ़रत को अलविदा कहो, क्योंकि नफ़रत करने की हर वजह बासी फ़रेब है ।सबके लिए दिल को खोल दो ताकि ज़मीन तुम्हे देख मुस्कुराए,जैसे एक वक़्त पर गामा पर मुस्कुराती थी...गामा आपको आपके जिस्म से बड़े दिल के लिए लाखो सलाम,ज़माना हमेशा उसके सामने झुकेगा जिसने इंसानियत को बचाने के लिए खुद को दाँव पर लगाया है ।
#हैशटैग #hashtag

Wednesday, May 20, 2020

राजीव गाँधी

कपड़े उस युवा प्रधानमंत्री के हैं, जिसने वोट देने की आयु 21 साल से घटाकर 18 साल कर दी । यह जूते उनके हैं,जिसने पंचायती राज व्यवस्था स्थापित की,यह मोज़े उनके हैं, जिन्होंने शांति के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी,हर शांति के सिपाही के कपड़े ही बचते हैं, शरीर तो शांति के रास्ते मे कुर्बान होने के लिए होता है ।

हमारे यहाँ मूर्खो की एक रेहड़ी तैयार की गई है, जो दिन रात अपने पूर्व प्रधानमंत्रियों को गाली देने और कोसने में लगी रहती है । यह ट्रोल रेहड़ी कभी भी विरासत को सम्मान से देखना सीख नही पाई । जब दुनिया राजीव गाँधी को एशिया में शांति का अग्रदूत मानकर हमारी मिट्टी का सम्मान कर रही है, तब यह ट्रोल रेहड़ी अपने गौरवपूर्ण इतिहास पर कीचड़ उछालने का काम करते हैं, इनसे बड़ा मूर्ख इस धरती पर भला कौन हो सकता है ।

राजीव गाँधी से कट्टर हिन्दू और कट्टर मुसलमान दोनों चिढ़ते हैं, क्योंकि इन कट्टर लोगों की पीठ आपस मे जुड़ी होती है या यह कहें कट्टर लोगों की रीढ़ एक ही होती है, बस मुँह दो दिशाओं में होते हैं । यह राजीव को मंदिर का ताला खोलने पर कठघरे में खड़ा करते हैं तो कभी शाहबानो केस में उनके दामन पर छींटे उछालते हैं । यह अजीव विचारलोक में खोए हुए कहा करते हैं कि यह न हुआ होता,तो ऐसा होता ।

राजीव की शहादत का मोल वह तंग दिल लोग महसूस ही नही कर सकते जिनकी एक उंगली भी देश के लिए शहीद नही हुई है । वह क्या जानेंगे शांति स्थापना के लिए मौत स्वीकारना,जो खुद अशांति के गुर्गे हैं ।

मक्खी सिफ़त लोग राजीव की गलतियों पर बैठेंगे और इंसानी सिफ़त लोग राजीव की अच्छाइयों और बलिदान को स्वीकारेंगे । जगह जगह बिखरी ट्रोल रेहड़ी,जिसे यह ही नही पता कि उसके घर की ईंट किसने रखी,उसके घर मे लहलहाती फसल कैसे बढ़ी,जिस कम्प्यूटर पर वह गालियाँ बक बक कर खुश हो रहें,उसको लाने वाला कौन है,ऐसी ट्रोल रेहड़ी पर सिर्फ तरस खाया जा सकता है ।

जिसको ईश्वर ने बुद्धि दी है, जिसकी आँखे, दिमाग और ज़ुबान में ईश्वर ने सम्बन्ध दिए हैं, जो किसी वट्सएप मैसेज या सोशल मीडिया फॉरवर्ड से खुद को नही हाँकता, जो डिग्री लादे गधा नही बल्कि वास्तव में पढ़ा लिखा है, वह जानता है कि उसके देश मे किस किस पर गर्व करना चाहिए,जिसे दुनिया सम्मान दे,वह भी उसकी मौत के बाद,वह भी बिना किसी पीआर एजेंसी के इस्तेमाल किये,वह ही हमारे भारत का गर्व हैं, राजीव गाँधी हमारा गर्व हैं, उनकी शहादत को सलाम और नमन ।

राजीव गाँधी के एक कार्यकाल की अनेक उपलब्धियों को क्या ही लिखें,जिन्होंने भी पढ़ा या इर्द गिर्द अपनी आँखों से देखा होगा,वह जानते ही होंगे । बस राजीव की वही एक गलती थी,जो राहुल में भी है और प्रियंका में भी है, भरोसा । जिसको भी साथ लिया,उसपर टूटकर भरोसा किया और उसने पलक झपकते ही पीठ में खंजर उतार दिया । इनके घर की चौखट पर बेधड़क घुस जाने वाले लोगों ने ही इनके पाँव के नीचे की ज़मीन दरकाई है, यह बात यह सब जानते हैं मगर इन्हें अच्छाई पर भी भरोसा है कि यह लालची लोग उनके किरदार को गिरा नही पाएँगे । राजीव से राहुल तक हर एक का दिल बेहद इंसानी है, इसकी क़ीमत इन्हें हर दौर में चुकानी होगी । धोखेबाज़ आते जाते रहेंगे,यह एक बड़ी नदी की तरह बहते रहेंगे ।

राजीव अपना काम करके चले गए । अपने मकसद को मर मिटे । अब नही हैं हमारे बीच,अब हमारी बारी है । हम उन्हें इज़्ज़त से याद करेंगे तो यह हमारी अच्छाई है, बुरा ही बुरा कहेंगे,तो यह हमारी बुराई है । राजीव भारत माता के सच्चे पुत्र साबित हो चुके हैं और अब कुछ भी साबित होने को नही रह गया है, जिसे जो जी चाहे वह कहे,जिसके दामन में फूल हैं, वह फूल बरसाए,जिसके दामन में कीचड़ है, वह कीचड़ ही उछाले, शहीद राजीव पर इन दोनों से फर्क नही पड़ता,फर्क तो हमे खुद,अपने किरदार से खुद पर ही पड़ता है ...
#hashtag #हैशटैग

Saturday, May 16, 2020

कामचोर

एक बहुत ही स्मार्ट ज़मींदार थे । ज़मीदारी चली गई मगर उनसे काम  ढेला भर नही होता था । नौकरी मिलती नही या करने की ख़्वाहिश भी नही रही होगी,बेचारे करते क्या,रोज़ यही सोचते कि कौन यह हज़ार रुपल्ली के लिए मेहनत करे,कुछ ऐसा करेंगे कि पांच हज़ार या पाँच लाख या पाँच करोण एक झटके में आ जाएँगे,यानी आँखों मे पाँच गुने वाले ख्वाब ही बसते थे ।

अब बिस्तर पर लेटे लेटे अपने घरेलू ख़ज़ाने को पाँच गुना बनाने के ख्वाबों में खोए रहते । घर मे अनाज और दूसरी चीज़ों की क़िल्लत होने लगी । जब उनसे पूछा जाए कि बच्चों की फीस कैसे जाएगी,खाना कैसे बनेगा । वह बाहर जाते और दो तीन दिन बाद हज़ार रुपये लाकर पटक देते ।  घर वाले उनकी स्मार्टनेस में मंत्रमुग्ध से खुश की ज़मींदार साहब उनकी ख्वाहिश एक झटके में पूरी कर देते हैं ।

चलता रहा,साल के साल गुज़रते रहे,फिर एक दिन वही रोना की सरसों का तेल नही,मिर्च नमक नही,आटा नही,अबकी खेत से कुछ आया नही,क्या करें । ज़मींदार साहब ने कहा अम्मा की तांबे वाली डेग बिकेगी अब,घरवाले सन्न, उन्हें अब समझ आया बाग,खेत या जो कुछ भी बाहर बिकने वाला था,वह बेचा जा चुका है, अब घर के बर्तन बेचे जा रहे हैं । धीरे धीरे डेग,पानदान,लगन, भगोने,गिलास,चम्मच सब बिक गए,घर वाले कंगाल अब बिकने के अलावा क्या ही उन्हें सूझे । जिन्हें वह स्मार्ट समझते थे,वह बेचने में स्मार्ट थे,सब बेच डाला पाँच गुने के फेर में,अब खाली ।

जब घर की साखू की दहलीज बेचने चले,तब घर से एक कसमसाहट सी हुई ।।अंदर से आवाज़ आई, काश कामचोरी पहचान ली होती,तो यह दिन नही देखने पड़ते । एक बार जिसे पुरखों के सामान को बेचने की लत लग जाए,तो घर की ईंट ईंट बेचकर ही निकम्मे सुक़ून पाते हैं । घर में औरत चीख रही थी कि जब कुछ न बचे,तो मियाँ बाज़ार में हमे और बच्चों को भी बेच आना, यह सुनते ही लकदक कपड़े पहने ज़मींदार की आंखों में फिर चमक दौड़ गई कि अभी यह बाकी हैं बिकने को,इससे तो पक्का पाँच गुना खज़ाना भर जाएगा और वह उनको बेचने के ग्रहक तलाशने लगा । 

उसे बेचने के लिए ग्रहक मिल जाते थे,किसी को भी कुछ भी बेचना हो,उसके ग्रहक तो आसानी से मिल ही जाएँगे । बस जिसे एक ईंट भी बनानी पड़े,ऐसे हाथ मुश्किल से मिलते हैं । बेचने वाले को मेहनत करने वाले मूर्ख नज़र आते हैं । हमेशा से वह उन्हें मूर्ख ही समझता है, जो हज़ार हज़ार रुपये के लिए अथाह मेहनत करता है । संपत्ति बेचकर तरक़्क़ी नही होती है, सम्पत्ति जोड़कर तरक्की होती है, यह बात तब तक समझ नही आएगी,जब तक बिकने से मिले भोजन का स्वाद जीभ पर लगा रहे,जिस दिन दिमाग सोचेगा की एक नई ईंट कहीं सैकड़ो पुरानी ईंट बेचकर तो नही हासिल हुई है, जब यह समझ जाएँगे, उस ज़मींदार से किनारा कर लेंगे,जो सब बेचकर स्मार्ट बनते हैं । यह माना हुआ सच है, विरासत बेचने से कभी भी तबाही के सिवा कुछ भी हाथ नही आता...
#hashtag #हैशटैग

Thursday, May 14, 2020

हज़रत अली शहादत

एक ख़न्जर से जिस जिस्म को वह ख़तम करने चला था,जिस्म तो रुखसत हुआ गया उनकी रूह दुनिया में ऐसी चमकी,ऐसी चमकी की पूरी क़ायनात ही रौशनी से भर उठी। उनमें नरमी ऐसी की मोम भी उनसे सीखे।  ताक़त इतनी की उस दौर में का सख्त तपा हुआ लोहा मुरझा जाए । मोहब्बत इतनी की ख़ुशबू आज तक महके है। इल्म इतना की लाखों किताबें एक करवट से निकलें। ख़िदमत ऐसी की दुनिया की सबसे शानदार मिसाल । दानशीलता ऐसी की खुद का खून निचोड़ कर ज़रूरतमंद में बाँट दें । इंसाफ ऐसा की तराज़ू का कांटा माशा भर भी इधर उधर न झुके । यूँ कहे हर फ़न में तारीख़ गढ़ने वाली नायाब शख़्सियत ।

 जिनकी पैदाइश का गवाह काबा और शहादत के आँसू मस्जिद ने बहाए हों  । जिनको मिटाने के लिए भी रास्ता वह चुना गया,जब उनका सर खुदा के सजदे में हो, खुदा के सामने झुके सर पर भी पीठ पर वार करके सोचा था कि उन्हें मिटा लेंगे और वह चमक कर घर घर,नस्ल नस्ल में रौशन हो गए ।।उनकी तारीफ़ में क्या कहें, उनकी खुशबू को किन लफ़्ज़ों में समेटे,वह तो हर मासूमियत में हैं। यह हैं हमारे  हज़रत अली ।

मेरा दिल जब डूबकर लड़खड़ाता है तो उसे सहारा देते हैं मेरे अली। अली ने सूफ़िज़्म की वह नीव रखी जिसकी आगोश में सारा जहाँ आ गया। जब उन्होंने मोहब्बत से बाहे फैलाई पूरी आवाम सर झुका के खड़ी हो गई। हर एक के सवाल,परेशानी,दर्द,तकलीफ़ में जिसने फाहे का काम किया वह अली थे। 
                    जब आँखों में अँधेरा और मुस्तकबिल में कालिख़ दिखी तब रौशनी का काम किया अली ने।मेरे अली ने हर दर्द में चीरा लगाया।हर तकलीफ़ में मरहम के फाहे रखे ।  इंसानियत को अपनी मोहब्बत और दूरंदेश सोच से ऐसा रास्ता दिखाया की इंसानियत की राह आसान हो गई।

 जिन्होंने हज़ारों साल पहले वह कह दिया जिसकी आज भी उतनी ही ज़रूरत है जितनी तब थी। अपने क़ातिल तक के लिए कहा की इसको सिर्फ इतनी ही सज़ा देना जितना इसका गुनाह है । सज़ा गुनाह से बढ़कर मत हो।

आज 21वीं रमज़ान उनकी शहादत का दिन है,एक कुंठित बीमार दिमाग ने उन्हें खत्म करना चाहा था। 19वी रमज़ान को पीठ पर खंजर मारा और 21वीं रमज़ान यानी आजके रोज़ हज़रत अली जिस्म से आज़ाद होकर गोशे गोशे में ज़िन्दा हो गए ।अली जिस्म से लोगों की रूह में उतर गए। आज जब हज़रत अली को याद करिए,तो सबसे पहले खुद में सब्र लाइये, हिम्मत को जगह दीजिये,सख़ावत को ज़ेवर बनाइये,इल्म में डूब जाइये और ऐसे मोती चुनिए की इंसानियत मुस्कुराए ।

 हज़रत अली से सीखिए की गरीब अमीर के फ़र्क़ बिना,मज़हब और सोच के फ़र्क़ बिना,काले गोरे के फ़र्क़ बिना,औरत आदमी के फ़र्क़ बिना इंसाफ और मदद कैसे की जाती है । दुनिया की वह नायाब मिसाल जिसने अपनी बीवी हज़रत फातिमा को बराबर से बैठाया,उनके इल्म ओ हुनर को महकने दिया,उनके किरदार पर पहरे बैठाने की जगह उसे खुलने दिया,बेपनाह मोहब्बत भी की और हौसला भी दिया । अपने बच्चों को सच्चाई के लिए मर मिटने का सबक़ देकर बड़ा किया, उनमें ख़िदमत को कूट कूट कर पैबस्त किया और ज़ुल्म के आगे झुकने की जगह तनकर खड़े होने का गुर सिखाया,उनसे सीखिए और अपने परिवार,अपने घर,अपने दोस्तों,जानने वालों को सुधारिये, सिखाइये,खुद को निखारिये,यही हज़रत अली को याद करने का सबसे बेहतर ज़रिया है...

#hashtag #हैशटैग

Tuesday, May 12, 2020

हसरत मोहानी

हम तो क्या भूलते उन्हें ए हसरत,
दिल से वोह भी हमे भुला न सके।।
......मगर हमने बहुत हद तक भुला दिया हसरत को। कुछ वक़्त पहले उनके जन्मदिन पर जब हम उनकी मज़ार पर थे तो हमारा शहर वहाँ से गायब था। उसे नही पता कि उसके दामन में कौन सो रहा है । "इंक़लाब ज़िंदाबाद" का नारा रोज़ चीख चीख कर बोलने वाले तो कबके उन्हें भूल चुके। कृष्ण से अथाह मोहब्बत रखने वाले हसरत को कान्हा प्रेमियों ने भी भुला दिया। आज मौलानाओं के पीछे झूमने वाले लोगों ने भी इस मौलाना के ज़िक्र से अपनी ज़ुबान को दूर रखा । मैं हसरत मोहानी की कब्र पर घन्टो रहा । नँगे पाँव उनकी मज़ार के इर्द गिर्द उनकी बुनी ग़ज़लें गुनगुनाता रहा।

पाँव में पहुँचती ठंडक ने दिमाग में तूफान सा ला दिया की हसरत क्यों खामोश लेटे हो।उठकर इस शहर से क्यों नही कह देते की तुम्हे फिर ज़रूरत है हसरत की।लखनऊ में मौलवी अनवार बाग़ और अपने पीर ओ मुर्शिद के पैतयाने लेटे हसरत मोहानी हमारे इंतज़ार में ही थे।कोई आए और कहे हसरत बहुत लेट चुके अब उठो और शहर को जगाओ। देखो बेग़म हसरत निशातुन्निसा भी अपने हाथों में लगा आटा धोकर मुल्क़ की बेचैन साँसों को थामने खड़ी हो गई हैं ।

उनका नाम सय्यद फ़ज़ल-उल-हसन और प्रचलित नाम ‘हसरत मोहानी’ था। वह लखनऊ से सटे उन्नाव के क़स्बा मोहान में पैदा हुए। उनके वालिद का नाम सय्यद अज़हर हुसैन था। हसरत मोहानी ने शुरुआती तालीम घर पर ही हासिल की और बाद कि तालीम अलीगढ़ से पूरी की।  अलीगढ़ से ही एक मैगज़ीन ‘उर्दू ए मुअल्ला’ निकाला । स्वदेशी के ज़बरदस्त पैरोकार हसरत इसके लिए जीजान से जुटे रहे । एक लेख लिखने पर वह जेल भेज दिए गए यहीं से आज़ादी की लड़ाई में जेल जाने का उनका सफर शुरू हो गया ।वह कॉंग्रेस में थे और ज़ोरदार तरीके से स्वतंत्रता की बात करते थे,पूर्ण स्वराज्य के प्रबल समर्थक हसरत ने काँग्रेस को भी छोड़ दिया था जब वह उनके पूर्ण स्वराज्य को स्वीकार नही कर पा रही थी ।। हसरत साहब कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के भी संस्थापक सदस्य भी थे। हसरत अपने आखरी वक़्त में पूरी तरह से सूफी संत वाले रँग में थे और लखनऊ में ही अपने मुर्शिद के पास एकांतवास में रहने लगे थे ।हसरत मोहानी का इंतकाल 13 मई 1951 को लखनऊ में हुआ और यहीं रक़ाबगंज के मौलवी अनवार बाग़ में सुपर्द ए ख़ाक भी किया गया।

मौलाना हसरत आज़ादी की लड़ाई की वोह शख्सियत हैं जिनके बगैर आज़ादी की बुनयाद अधूरी है।फिर कह रहे हैं इनको भूल कर, दरकिनार करके सिर्फ खोखलापन ही हाथ आएगा।इन्हें पढ़िए,सीखिये,जब समझ न आए तो पूछिये।तमाम मौलानाओं के गढ़े दायरे को देखिये मौलाना हसरत मोहानी कैसे तोड़ते हैं।

मज़हब को सुर्ख़ छींटे देकर कृष्ण से इंक़लाब तक के सफ़र को पढ़िए।एक हाथ में क़लम,दूसरे में बाँसुरी और नमाज़ के लिए झुकता हुआ सर और अंग्रेज़ों की आँखों में आँखे डालने वाली चढ़ी हुई सुर्ख़ आँखे,एक इंसान में हज़ार इंसानों की खूबी ही तो मौलाना हसरत मोहानी होना है।उनकी कलम,ज़िन्दगी,संघर्ष को जब देखेंगे सर खुद बखुद झुक जाएगा।जिन्हें उनका कुछ नही पता वह हसरत की लिखी ग़ज़ल"रात दिन आँसू बहाना याद है" सुनकर ही हसरत को याद कर सकते हैं  ।

आज उनकी पुण्यतिथि पर नवभारतटाइम्स में एकदा पढ़िए और देखिये हसरत तूफान को भी रोक सकते थे और तूफान खड़ा भी कर सकते थे । यह भी जानिए इसमे की हसरत कितने दूरंदेश थे कि ख़िलाफ़त की हलचल से निकले उस फैसले को नकार रहे थे,जिसे सब मान रहे थे । तुर्की की टूटन वह देख रहे थे और समझ रहे थे कि बुनियाद दरक चुकी है,हसरत के हर कदम को देखिये,वह आपको हर बार चकित करेंगे.....
#hashtag #हैशटैग

Sunday, May 10, 2020

हज़रत मंटो

मंटो तुम किस कदर बदतमीज़ हो। कैसी कैसी कहानिया लिखते हो। लोग चादरों में राल टपकाते हुए आँख सेंकते हैं और चादर से बाहर निकलकर तुमपर आँख लाल करते हैं । छोड़ो भी अब यह बातें,फिर भी चलो तुम लिखा करो। पढ़कर मज़ा आता है। कितना मज़ा आता है जब दिल में सैकड़ो तीर एक साथ चुभते हैं।बड़ा अच्छा लगता है जब ज़मीर पैरों से कुचला जाता है।कितना अच्छा लगता है जब नाली की खुशबु दिमाग को सड़ा देती है।अच्छा मंटो तुम्हे ठंडा गोश्त याद है, अर्रे वही जो तुमने आवारगी में लिखी थी।दोस्त सैकड़ों जाँघो पर पैर रख चुका हूँ मगर वह ज़ायका नही आया।

अब तुम हमेशा की तरह काली शलवार न लेकर बैठ जाना।तुमने तो लिखा है, हमने तो दंगों में काली,पीली,नीली,हरी सब शलवारें देखी हैं।इतनी शलवारो पर तो मंटो भी नही लिख सकता और मैं कोई मंटो तो हूँ नही।अच्छा एक बात बताओ मंटो तुमने सबपर लिखा है मगर बच्चों को क्यों छोड़ दिया।बच्चों की उतरती नेकर और हवस से मसलते बचपन को क्यों नही लिखा। क्यों नही उस बुड्ढे,एक बच्चे के गाल से जांघ तक उँगली फेरने की कहानी लिखी,राल टपकाते हुए अधेड़ की बच्चे के माथे चूम लेने भर से संतुष्ट होने के किस्से क्यों नही लिखे तुमने । बाज़ार में बिकता बचपन क्यों नही लिखा। घर घर मे नालियाँ थीं, तो घर घर मे सिसकता बचपन भी तो था मंटो,तुमने वह क्यों नही लिखा । अच्छा,तो तुम बड़े लेखक थे,तुम झुक कर बच्चों के लिए कहाँ लिख सकते थे। और नही तो क्या,आखिर मंटो ने क्या ठेका ले रखा है सब पर लिखने का।

ओए मंटो यह बताओ अगर तुम "उमराव जान अदा" लिखते तो क्या तुम्हारी उमराव वैसी ही होती जैसी हादी रुस्वा की थी।मैं सोचता रहता हूँ हादी ने उमराव को तबर्रुक़ बना दिया अगर तुम होते तो उमराव के जिस्म में सड़ रहे गोश्त को उधेड़ते।तुम बड़े चालबाज़ हो,एक जगह लिखे हो की वोह बगल में पता नही कौन सा बदबूदार पाउडर डालती थी की सारे बाल जल जाते थे,जिसकी कालिख़ उसकी बग़ल से हाथों तक उतर आई, जो ज़िन्दगी भर रही।तुमने कोठे पर बैठकर बग़ल की बदबू को महसूस किया तो हादी रुस्वा ने उमराव के बालों से उठती खसखस की खुशबू को पकड़ा।तुम लेखक लोग वाक़ई हद दर्जे चालाक होते हो।तुम्हे पता था की तुम्हारा लिखा नौजवान दिलों में पहली बार हलचल पैदा करेगा इसलिए आखरी में खींचकर झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ते हो।वैसे मंटो अगर आज तुम होते और लिख रहे होते यक़ीन जानो तुम्हारी खाल की ढपली बनाकर यह ज़माना बजा रहा होता।

खैर छोड़ो,वैसे भी तुम अब कहाँ लिख सकते हो।तुम तो कबके मर चुके हो,मंटो मर चुका है।हाँ एक शराबी मर चुका है।वह ऐसा शराबी था जिसके मरते ही शराब ने अपना अदबी मज़ा छोड़ दिया।आज तुम्हारी सालगिरह है मंटो,तुम बेहद याद आ रहे हो।आज तुम मेरी चाय में उतर आओ मेरे दोस्त।अच्छा ठीक है आज हम और तुम एक साथ चाय पीते हैं।वाह क्या इत्तेफ़ाक़ है तुम्हारे पास शराब के पैसे नही होते और मेरे पास चाय के रूपये नही होते।चलो कोई तो दो आवारो को चाय पिला ही देगा,वैसे भी मिसकीन से हमारे चेहरे बड़े काम आते हैं।कोई न कोई तरस खा ही जाता है।लो पियो चाय,मंटो।
#hashtag #हैशटैग

Saturday, May 9, 2020

मां

अब क्या माँ पर भी लिखना होगा।कैसे लिखेंगे,क्या लिखेंगे।वह तकलीफ़ लिखें जो उनके पेट में पहली बार टांग मारने से उन्हें हुई थी।उस दर्द को लिखें जो हमारे पैदा होने में उन्होंने सहा था।यार यह बताओ उस एहसास को कैसे लिखें जब वह पहली बार मुझे देख दर्द के साथ मुस्कुराई थीं।अपने बड़े से हाथ में मेरा पूरा बदन लेकर कहा था आज से मैं तेरा साया हूँ।कैसे लिखूँ उन उंगलियो पर जिन्होंने पूरे बदन पर ऐसे मालिश की मैं आजभी सख्त पत्थरों से जूझने लायक बना।

उस दूध पर लिखने की सलाहियत मुझमे नहीं।उन निवालों पर क्या लिखा जाए जो बिना मेरे भूख भूख पुकारे मेरे मुँह में अनगिनत बार डाल दिए गए।मैं या कोई भी माँ पर कैसे लिखे।आप और हम सारे एहसास,जज़्बात,मोहब्बत सब लिख सकते हैं मगर माँ पर कलम खुद बच्चा हो जाती है।हाँ एक बात जो मैं हमेशा सोचता हूँ वह यह की मेरी माँ मेरे सामने दुनिया छोड़े नाकि उसके सामने मैं।मरना सभी को है मगर मैं नही चाहता एक माँ अपने बेटे के मरने का दर्द सहे।यह पीड़ा उसके जीवन की सबसे घातक पीड़ा है। अभी इरफान खान के मरना देखा और उसके कुछ दिन पहले उनकी माँ का मरना देखा,सुक़ून मिला कि उनकी माँ पहाड़ जैसे ग़म को उठाने से पहले रुखसत हो गई,वरना इरफान का न रहना,उनके दिल को रोज़ नोचता रहता और वह दर्द में कराहती रहती ।

हाँ मैं बेटा होकर उस दर्द को उठा लेना चाहता हूँ।मैं कोई अच्छा बेटा नही हूँ फिर भी मैं जब पैरों को दबा रहा होता हूँ तब ही दुनिया के सबसे ऊँचे शिखर को छूने का एहसास होता है।तकलीफ़ तब होती है जब देखता हूँ कोई नौजवान माँ को नासमझ समझ कर उन्हें दुत्कारता है। माँ की इज़्ज़त का जिसके दिल में एहसास हो गया वह दूसरे को नुकसान तो नही ही पहुँचा सकता। एक बात तो सच है ही कि जिसके दिल मे मां के प्रति सच्चा सम्मान होगा,वह किसी भी दूसरी औरत या मां के प्रति कड़वाहट नही रख सकेगा । जिसके दिल में मां के लिए नरमी होगी,वह दूसरों से नफरत कर ही नही पाएगा ।

मदर्स डे पर मूसा की कैफ़ियत को समझियेगा,मूसा हमेशा कोहेतूर(पहाड़) पर बेधड़क दौड़े चले जाया करते थे। एक रोज़ दौड़ते हुए पहाड़ पर जा रहे थे की एक पत्थर की ठोकर लगी और वह मुँह के बल गिर गए । तब मूसा ने आसमान की तरफ शिकायती अंदाज़ में देखा,उधर आसमान से आवाज़ आई
"ऐ मूसा अब सम्भल कर चला करो।तुम्हारे लिए दुआ करने वाले हाथ अब नही रहे।तुम्हारी माँ खत्म हो गई,अब एहतियात रखना,सम्भल कर चलना।"
 मूसा के आँसू आ गए।सोचिये वह पैगम्बर थे।हम और आप को उस माँ की कितनी ज़रूरत है।उनकी दुआओ की कितनी दरकार है।

आखरी बात,अगर अपने बच्चे से कुछ भी बात कहते या करते हुए किसी भी माँ के दिल में ख़ौफ़ या हिचकिचाहट आ जाए तो वह बड़ा बड़ा ज़ुल्मी है। मां को संकोच नही करने देने लायक माहौल बनाइये । सोचिए भगवान राम ने अपनी सौतेली माँ के भी दिल का मान रखा था,यही तो हमारा कर्तव्य है ।माँ से मोहब्बत तो ज़रूरी है ही उनकी इज़्ज़त करना तो फ़र्ज़ है।

मां चाहे नरेंद्र मोदी को हों या राहुल गाँधी की,मां चाहे आपकी हो या हमारी,मां सिर्फ मां होती हैं । जो किसी भी मां की इज़्ज़त पर कीचड़ उछालते हैं, असल में वह कीचड़ उनके अपने ही मुँह पर पड़ रहा होता है । मदर्स डे की मुबारकबाद की दुनिया की सभी माँ सुक़ून और इज़्ज़त पा सकें और उनके हिस्से का सुक़ून और इज़्ज़त खत्म करने वाले कमज़ोर पड़ जाएँ, बिखर जाएँ....

#hashtag #हैशटैग

Friday, May 8, 2020

गोपाल गोखले

आज गोपाल कृष्ण गोखले का जन्मदिन है । वह गोखले जिन्होंने गाँधी को भारत समझने का रास्ता दिखाया । जिनसे गाँधी ने बहसें भी की और सीखा भी । जब गोखले डरबन में अंग्रेज़ों से गाँधी की माँग पूरी करने की खबर,गाँधी को देते हुए भरोसा दे रहे थे कि मुश्किल दूर होंगी,तब गांधी कहते कि यह बड़े झूठे हैं, कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं, इनपर भरोसा नही कर सकते । तब गोखले कहते हैं कि अंग्रेज़ वादे से नही मुकरेंगे,गांधी चुप हो जाते हैं ।

देखते ही देखते गोखले कप गलत बता, अंग्रेज़ अपने वादे से मुकर जाते हैं और इस तरह गोखले की आँखों मे वह सितारा जन्म लेता है, जो भारत की तस्वीर बदल देता है । गोखले गाँधी को भारत बुलाते हैं और राय देते हैं कि जाओ, पूरा देश घूमो,समझो और फिर कार्ययोजना तैयार करो ।

गोखले तो गाँधी के भारत मे शुरुआती सफर में ही छोड़ जाते हैं मगर उनके सिखाए रास्ते गाँधी के लिए हमेशा पक्के रास्ते बन जाते हैं । गोखले की नज़रे पारखी थीं, एक लीडर की नज़र ही तो पारखी होनी चाहिए । ऐसे लोग पहचान लेने की कला होनी चाहिए, जो सभ्यताओं को प्रभावित करें,गोखले इसमे माहिर थे ।

गोखले ने राजनीति में गर्म खाने को ठंडा करके आहिस्ता आहिस्ता खाने का हुनर दिया । भारत से लेकर इंग्लैंड तक अपनी क्षमताओं का लोहा मनवाया । यही समझ लें जब दक्षिण अफ्रीका में भारतीय गांधी के नेतृत्व में संघर्षरत थे,तब गोखले की दक्षिण अफ्रीका यात्रा बहुत महत्व रखती है ।

एक तरफ अंग्रेज़ भारतीयों से चिढ़ रहे थे,वहीं दूसरी तरफ गोखले के आगमन पर पलके बिछाए बैठे थे ।।वह गोखले की शक्ति जानते थे,बस नही जानते थे कि गोखले की नज़र जिस महान शक्ति पर है, वह कौन है । गोखले के इर्द गिर्द रहे मगर गाँधी को नज़र में नही ला पाए और गोखले के गाँधी ने ब्रिटिश राज को खोखला कर दिया ।

नीचे एक तस्वीर है, सन 1912 की डरबन में गाँधी के साथियों के साथ गोखले हैं ।।यहीं गाँधी के कान में गोखले ने मंतर फूंका की अब देश की फिक्र करो,मुँह अपनी माटी की तरफ मोड़ो और मंतर ने असर किया । हमेशा चलते रहने वाला गांधी चल निकला और इसी के साथ दुनिया की सबसे बड़ी सल्तनत की चिट्खन भी चल निकली ।

गोपाल कृष्ण गोखले के बहुत से ऐतिहासिक काम हैं । भाईचारे पर गम्भीर काम हैं । भारतीयों के दर्द पर मरहम रखने के किस्से भरे पड़े हैं । ढूंढकर पढ़िए ।।जन्मदिन पर याद ज़रूर कीजिये मगर जानिए की काँग्रेस के यह अग्रणी नायक कितने बड़े और जुझारू राजनीतिज्ञ थे ।
विरासत यह हैं, जिन्होंने भारत की बेड़ियाँ काटने में अपनी ज़िंदगी लगाई । जिन्होंने संघर्ष की भूमि तैयार की,जिन्होंने देश से मोहब्बत करने वाले दिलों को रोशनी दिखाई,जो खुद में एक मशाल थे,ऐसी मिसाल को याद रखिये और याद करते रहिए,जिस दिन यह यादें धुंधली होंगी उस दिन आपका वजूद भी धुंधला जाएगा । सम्पूर्ण भारत गणराज्य अपने महान सुपुत्र को नमन करता है ।
#hashtag #हैशटैग

Wednesday, May 6, 2020

बुद्ध पूर्णिमा

जब सोने की चमक महलों को रोशन कर रही थी।शुद्दोधन और महामाया कपिलवस्तु की खूबसूरती निखार रहे थे।महामाया ने जब महल से बाहर कदम रखा तो लुम्बिनी के जँगल में एक बच्चे को जन्म दिया,सिद्धार्थ। वही सिद्धार्थ जो सोलह साल की उम्र में यशोधरा की रूह बना और राहुल का साया बना।वही सिद्धार्थ जिसने शुद्दोधन से कहलवा लिया की बचाने वाला मारने वाले से बड़ा है।ईसा से 563 साल पहले पैदा होने वाला सिद्धार्थ जब दुनिया का सारा उरूज,चमक,परिवार,दोस्त,खानदान तज कर जँगल में निकला।

पैरो में काँटे चुभे,धूल,धूप, बारिश,आँधी,भूख ने तोड़ा मगर वह डिगा नही।हम और आप जब मामूली सी ख्वाहिशों को नही छोड़ पाते तब उसने ज़रूरतों को छोड़ा।जब वह लौटा तब सिद्धार्थ खत्म हो चुका था।दुनिया ने तब गौतम बुद्ध को देखा।आज बुद्ध पूर्णिमा है, मेंरे गौतम का दिन है।मुझे जिसने बताया इंसान सिर्फ इंसान है, उसमे कोई फ़र्क नही।ख़िदमत सिर्फ ख़िदमत है जो बिना फ़र्क की जाए।गौतम ने बहुत पहले सत्य, अहिँसा का वह दर्शन दिया जो लोग भूल चुके थे।बुद्ध को पूजने से ज़्यादा बुद्ध को ज़िन्दगी में उतारना होगा।ज़िन्दगी बयानबाज़ी से नही प्रयोग से बढ़ती है।बुद्ध के प्रयोग से।आइये हम सब बुद्ध से प्रयोग करना सीखा, जिससे हर इंसान की ज़िन्दगी आसान हो जाए।रूहे सुकून पा जाए।दिल की तड़पन और कसक खत्म हो जाए।

मां के प्रति समर्पण देखना हो तो गौतम की सौतेली माँ और मौसी प्रजापति गौतमी के बारे में भी जानना। एक बेटे का माँ के प्रति समर्पण पढ़ना।यह तक देखना की बुद्ध के संघ में जहाँ महिला प्रवेश भी नही कर सकती थीं। बुद्ध ने अपनी माँ की ख्वाहिश में उन नियम को ही बदल डाला।प्रजापति गौतमी वोह पहली महिला बनी जिन्होंने बुद्ध की दीक्षा ली।बुद्ध को लगा कहीं माँ की ममता में नियम इतने शिथिल न हो जाएँ की मोक्ष का मार्ग संकरा हो जाए तो थोड़ी सख्ती भी रखी।मैं जब बुद्ध को देखता हूँ तो मन एक तरफ ठहर नही पाता।एक जगह वोह माँ के लिए झुकते हैं तो दूसरी जगह मोक्ष के लिए अड़ते हैं।एक तरफ दिल में नरमी तो दूसरी तरफ अपने ही जिस्म पर सख्ती।बुद्ध को देख वर्तमान से लड़ने को बहुत कुछ मिलता है।भूतकाल से पीछा छुड़ाने का मार्ग बुद्ध का है तो भविष्य की वैज्ञानिक समझ भी तो बुद्ध की ही है।

आखिर बुद्ध में ऐसा क्या था की उनके मानने जानने और समझने वाली भूमि या देश खूब तरक्की कर गए,उन्होंने सुक़ून औरों से ज़्यादा पाया जबकि उनका सारा जीवन जहाँ बीता,जहाँ उनकी किलकारी भी गूँजी और जहाँ साधारण युवराज को भगवान बुद्ध बनते देखा, उस भूमि के लोग आपस में ही उलझे हुए बिखर रहें हैं। नफ़रतें सर चढ़कर बोल रही,सुक़ून जैसे उनसे छीन लिया गया हो । बुद्ध में बहुत सी गुत्थियां हैं जो मोहब्बत से ही खुलेंगी और रास्ता दिखाएंगी।हो सके तो अपने अंदर झाँकना।अंदर अगर प्राणी मात्र से प्रेम दिखे तो बुद्ध को याद करना वरना सब हवा हवाई बातें हैं।इंसान से मोहब्बत हो,दर्द पर मरहम बनने की ख्वाहिश हो तब बुद्ध को याद करना।बुद्ध तुमसे कह कर गए हैं की सारा प्रकाश तुम्हारे ही अंदर है।उसे महसूस करके रौशनी पैदा करो और आगे बढ़ो।दुनिया को आगे बढ़ाओ।यही तो बुद्ध है, गौतम बुद्ध।।।
#हैशटैग #hashtag

Tuesday, May 5, 2020

महिला के खिलाफ

असल में उन्हें सिखाया ही यह गया है कि अपने विरोधी का विरोध करते वक़्त सारी नँगाई को ओढ़ लो । इनको बताया गया है कि जो सँस्कार भारतीय हैं, वह ठीक नही हैं, बल्कि गन्दी ज़हनियत से बजबजाती हुई गालियाँ निकालना ही इनकी सँस्कृति है । औरत ही क्या,हर उस चीज़ पर जो इनके खिलाफ है, उसके लिए यह इतने ही गंदे हो सकते हैं असल में यह भारतीय सँस्कृति के हत्यारे हैं ।

एक महिला के ख़िलाफ़, उसकी प्रेगनेंसी के मज़ाक और उसके चरित्र पर ठहाके लगाने वाले,वही तो हैं, जो मौका पाते ही विभत्स बलात्कारी बन जाते हैं । हम अक्सर सोचते हैं कि कोई कैसे इतना नीच हो जाता है कि किसी का बलात्कार कर बैठे,तो देख लीजिए ऐसे ही लोग होते हैं यह,इन्हें पहचान लीजिये । यह हमारे घरों में बढ़िया कपड़े पहने,सोफे पर लेटे लेटे, अपनी माँ बहन के सामने हँसते खेलते,जब ऑनलाइन लकड़ियों पर गालियों की बौछार कर रहे होते हैं, तभी जान जाना चाहिए कि यह ही बलात्कारी है ।

किसी भी महिला का अपमान भारतीय सँस्कृति का अपमान है । कोई चाहे जितना चीख चीख कहे कि मैं राष्ट्रवादी हों,यदि उसके अन्दर महिलाओं के प्रति ऐसी घिनौनी भावना है, तो सौ फीसद वह राष्ट्रवादी नही राष्ट्रद्रोही है । अगर वह ट्रोल है, तो समझ लीजिए कि चंद पैसों के लिए वह समाज का क्या क्या नही बेच सकता है । जो कुछ पैसों और पद की लालच में अपनी सँस्कृति को अँधेरे में ढकेल कर गालियाँ बक्के,महिलाओं के विरुद्ध घिनौने शब्द बोले,वह इसी पद और पैसों की लालच में अपने आँगन की ईंट भी बेचने में देर नही लगाएगा ।

वक़्त तो रोज़ निकल ही रहा है, अपने घरों में नज़र रखिये,अपने दोस्तों और रिश्तेदारों पर नज़र रखिये,जानने वालों पर नज़र रखिये । इनमे से जो भी लड़कियों पर ओछी फब्तियाँ कसते दिखाई दें,लड़की चाहे इनके विरोधी ही विचार की भी क्यों ही न हो,यदि उसपर यह कोई घिनौनी बात करते हैं, जो आप आप अपनी माँ बहन के लिए नही सुन सकते,इनसे फौरन सतर्क हो जाएं । समझाने लायक हों,तो समझाइए, वरना इन्हें अपने घरों की सीढ़ियां मत चढ़ने दें,खासकर तब,जब आपके घर मे बच्चियाँ हों । जो दूर बैठी लड़की,जिसे न देखा, न जाना,न मिला,उसके लिए गन्दी गन्दी ज़ुबान इस्तेमाल कर सकता हो तो सोचिए,जो लड़की इसे सुबह शाम दिखती होगी,उसको लेकर इसके मन मे कितने घिनौने विचार चल रहे होंगे,कल्पना ही मुश्किल है ।

अपने इर्द गिर्द सोशल मीडिया पर नज़र दौड़ाए रखिये और सम्भावित अपराधियों पर नज़र रखिये । सावधानी ही बचाओ है । अपने बच्चों को सिखाइये की लड़की कोई भी हो,कितने ही विरोधी विचार की हो,कितने ही विपरीत धर्म,वर्ग,जाति की हो मगर अपनी ज़ुबान और सोच दोनों को नीचे नही गिरने देना है । 

बचा लीजिये देश को,सँस्कृति को,उन लोगों से बचा लीजिये जो इन्हें ओढ़ने का दावा तो करते हैं मगर यह भेड़िए हैं, भेड़ की खाल ओढ़े । अपने बच्चों को समझाइए की नफरत की आग में अपनी अच्छाइयों को भस्म नही किया जाता है, यहाँ तो नफरत की आग में अपनी पूरी महान सँस्कृति को भस्म करने में भीड़ आमादा है । बचिए,जितना बच सकते हैं । अपने घरों को नफरत से दूर रखकर मर्यादित आचरण निभाने की सीख दीजिये । भगवान राम हों या पैगम्बर मोहम्मद,इन्हें वह ही अपना कह सकता है, जिसके मन मे हर महिला के लिए सम्मान हो,चाहे वह कितनी ही विपरीत विचार की हो और आखरी बात,जो लोग घिनौनी बातचीत कर रहे हैं, उनसे अपने घर को बचाइए,यह आपके घरों के लिए भी ऐसे ही विचार रखते हैं, अपनी घर की रक्षा इस राक्षसी सोच से कीजिये । जो महिला का सम्मान नही कर सकता,वह दुनिया का कोई भी बड़ा से बड़ा अपराध कर सकता है, बचिए इनसे ।
#hashtag #हैशटैग