Wednesday, October 24, 2018

साहिर

हम अजब पागल से लोग हैं । किसी मेले में खड़ा बच्चा जैसे सारे खिलौने ले लेना चाहता है, सारी मिठाई खा लेना चाहता है, सारे झूले झूल लेना चाहता है, मगर यह सिर्फ चाहता है वह,कर नही पाता ।दिल मसोस कर दो खिलौनों,एक मिठाई और दो झूलों पर बैठकर वह कहता है उसने मेला घूम लिया ।उसने पूरा मेला अपनी आँखों में समेट लिया । हम सब भी तो ऐसे ही हैं, रोज़ उन नामो को समेटते हैं जो हमारे बीच से चले गए,उनका ज़िक्र करते हैं, उन्हें याद करते हैं मगर कोई न कोई छूट ही जाता है और दिल नुचा नुचा सा रह जाता है ।कल रफ़ी अहमद क़िदवई को याद किया तो सरहाने मन्ना डे आ गए,रात गुज़रते गुज़रते पैतयाने गिरिजा देवी भी आकर बैठ गई । सामने कैप्टन लक्ष्मी सहगल भी खड़ी थीं ।

सोचा चलो एक मसेहरी पर यह चारों सही मगर रात और गहराती गई जैसे ही चुपके से सुबह दस्तक देती की साहिर आ गए।साहिर के हिस्से का दर्द भी तो उसी मसेहरी पर बैठना है।अगर यह सब एक ही साल में आगे पीछे गुज़रते तो दिल तो फट ही पड़ता । साहिर की सिगरेट का धुआँ सुबह सुबह मुँह पर लगा और मैं चीखकर बोला साहिर,मैं अमृता नही हूँ,प्लीज़ सुबह सुबह मेरे फेफड़ों पर अपने शौक़ की चादर मत उढ़ाओ । सिगरेट का धुआँ छटा तो देखा साहिर अपने साथ अमृता को भी तो लाए हैं । जैसे उँगलियों में उँगलियाँ फंसाएं ग़ज़ल कहानी की शक्ल में मेरे दरवाज़े पर खड़ी है।

अमृता ने लिखा है एक बार दिल्ली में दुनियाभर के राइटर्स का सेमिनार हो रहा था ,उसमे हम और साहिर भी थे। साहिर और हमें भी अपने अपने नामों के बैज दिए गए। मगर शरारतन या कहे मोहब्बत की वजह से साहिर ने मेरा और मेरे साहिर के नाम का बैज लगा लिया। स्टेज पर एक जनाब आए और माफ़ी मांगते हुए कहा "अरे अमृता जी गलती से आपको गलत बैज दे दिया गया है...अभी सही करवाते है" इतने में तपाक से साहिर ने जवाब दिया " गलती आपसे हुई थी मगर हमने सही कर ली है आप इत्मीनान रखें।

अमृता उस रात के ज़िक्र में कभी कुछ न लिख सकी जिस रात साहिर ने दुनिया को अलविदा कहा था,यानि आज । अमृता को रात 2 बजे बुल्गारिया में खबर मिली की साहिर इस दुनिया से कूच कर गए। वह पूरी रात फोन के पास बैठी रोती  रही। अमृता ने एक जगह कहा भी " हमें लगता है ख़ुदा से गलती हो गई। उस दिन हमने जो बैज बदले थे।फरिश्तों को उन्ही नामो का धोखा हो गया।
जब साहिर की मौत की खबर अखबारों में छपी तो एक बड़े अख़बार ने क्या किया। अमृता की बड़ी सी तस्वीर पहले पेज पर छापी उसमे अमृता की आँखे आंसुओं से भरी हुई थी और हेडलाईन थी साहिर………। साहिर.......साहिर…………

रफ़ी अहमद क़िदवई

लखनऊ और कानपुर से होते हुए वह दिल्ली आए । हमेशा की तरह मसेहरी पर लेट गए और उनके इर्द गिर्द कुर्सियों पर लोग बैठ गए । यह हमेशा का दस्तूर था की जब वह हों तो उनके दोस्त,रिश्तेदार और कांग्रेसजन उनके इर्द गिर्द बैठे रहते थे । आज 24 अक्टूबर की सुबह भी वह ऐसे ही सफेद चादर पर बैठे थे मगर इस बार उनके इर्द गिर्द दोस्तों के साथ एक डाक्टर भी बैठे थे,जो बार बार ताकीद कर रहे थे आज आप बिस्तर से उठियेगा नही रफ़ी साहब ।
उधर एक गाड़ी रफी साहब के घर के सामने आकर रुकी । सुभद्रा जोशी दिल्ली कांग्रेस की एक बड़ी मीटिंग जो रफ़ी साहब के ही लिए रखी गई थी,उसमे ले जाने आ गई । सुभद्रा जोशी को जरा भी अंदाज़ा नही था की डाक्टर ने उन्हें बिस्तर से उठने को मना किया है और आसपास बैठे किसी की हिम्मत भी नही हुई की रफ़ी साहब को उनके किये वादे को तोड़ने को कहे । कुछ दिन पहले दिल्ली से लखनऊ जाते वक़्त वह सुभद्रा जोशी से कह कर गए थे की वह लौटकर उनकी 24 अक्तूबर की मीटिंग में जाएँगे । सुभद्रा जोशी ने भी कहा था की अगर उनकी तबियत ठीक नही हुई तो मीटिंग कैंसिल कर दी जाएग । उस रोज़ जब सुभद्रा जोशी ने रफी साहब से पूछा की आपकी तबियत कैसी है तो वह बोले एकदम ठीक है मगर सुभद्रा, तुम तो वक़्त से पहले आ गई,तुमने तो मीटिंग का टाइम दूसरा बताया था । सुभद्रा जोशी बोली की हाँ गलती हो गई मीटिंग का वक़्त थोड़ा पहले दे दिया गया ।

खैर उन्होंने घड़ी उठाई,शेरवानी पहनी और टोपी लगाई  और सुभद्रा जोशी के साथ कार में बैठ गए । उनके इर्द गिर्द बैठे हर एक ने उन्हें जाता देखा मगर किसी ने हिम्मत करके रोकने की गुस्ताखी नही की । कार मीटिंग की तरफ जाती रही और वह कार का शीशा खोलकर ताज़ी हवा लेने के लिए बाहर झाँकने लगे दूसरी तरफ सुभद्रा जोशी बैठी इत्मिनान में थी की आज आख़िर वह दिन आ गया,जब उन्होंने ऐसी मीटिंग रफ़ी साहब के लिए रखी है जिसका शोर वह महीनों से मचाए थीं । सुभद्रा ने उनका स्टेज नेहरू जी के स्टेज की तरह भारी तैयार करवाया था । हमेशा खुद बहुत तेज़ गाड़ी  चलाने वाले रफ़ी साहब ने ड्राइवर से कहा भाई कुछ तेज़ गाड़ी चलाओ सुभद्रा के लोग इंतज़ार कर रहे होंगे और वह मुस्कुरा दीं ।

रफी साहब कार से उतर कर स्टेज पर पहुचे तो लोगों में जोश आ गया और रफ़ी अहमद क़िदवई जिंदाबाद के नारे गूँजने लगे । किसी तरह लोगों के जोश को कम करके रफ़ी साहब ने बोलना शुरू किया,भाइयों और बहनों,तभी एक खांसी आई । कुछ और बोले और खांसी आई । चेहरा लाल हो गया और खाँसी तेज़ होती गई । तो नीचे से आवाज़ आई रफी साहब आप आराम कर लीजिये आपकी तबियत ठीक नही लग रही । कुछ कार्यकर्ता उनको मदद देने के लिए पहुचे उन्होंने रोक दिया । वह दो चार अलफ़ाज़ बोलकर नीचे उतरने लगे तो सीढियों पर किसी ने सहारा दिया । उन्होंने उससे कहा हटो,मैं खुद चल लूँगा । वह आकर कार में बैठे और उन्हें अस्पताल ले चलने को किसी ने कहा मगर वह बोले घर चलो, तेज़ी से घर की तरफ बढे । किसी ने कार से उतारने के लिए मदद का हाथ बढ़ाया उन्होंने झटक कर कहा,मैं खुद चल लूँगा ।

उसी मसेहरी के बिस्तर पर वह आकर खड़े हुए जहाँ से सुबह निकले थे,तो फिर किसी ने सहारा दिया तो वह फिर बोले हटो और घड़ी हाथ में लेकर वक़्त देखा और कहा हटो,वक़्त हो गया और उसी सफ़ेद चादर पर धम्म से लेट गए । जहाँ से उन्हें कोई नही उठा सका । हर एक की मदद करने वाले हाथ बिना किसी की मदद लिए हमेशा के लिए मसेहरी के दोनों ओर फैल गए । सुभद्रा दौड़ी दौड़ी पीछे आई उनसे लड़कर यह कहने की जब तबियत ठीक नही थी तो वह क्यों गए,मगर सुभद्रा जोशी को पहली और आखरी बार लड़ने का भी मौका रफी अहमद किदवई ने नही दिया...यह जनाज़ा मसौली जाने से पहले दिल्ली का है जहाँ हज़ारों लोग उन्हें आख़री विदाई देने आए ।उनके जनाज़े को मसौली ले जाने की ज़िम्मेदारी लाल बहादुर शास्त्री को दी गई ।जो पूरे रास्ते रोते रहे और कहते रहे रफ़ी साहब उठिये,देखिये लोग आपको देखना चाहते हैं, एक बार सिर्फ एक बार देखना चाहते हैं.......

शायद पुश्तैनी असर था की हमारे दस्तरख्वानो पर कोई भी आकर बैठकर खाने लगता और कोई उससे पूछता भी नही की वह कौन है । जो होता,जितना होता उसमे सब खाकर खुश रहते ।
रफ़ी अहमद किदवई जब दिल्ली में होते तो उनकी खाने की मेज़ पर कोई भी आकर बैठ जाता और उसके सामने प्लेट रख दी जाती बिना यह जाने की वह कौन है । कहाँ से आया है । घर में किसी की भी हिम्मत नही होती की वह यह पूछ ले की तुम कौन हो,क्योंकि पता नही वह रफी साहब का कितना अपना हो । किसी की तफ्तीश उन्हें वैसे भी पसन्द नही थी ।
खाने की मेज़ पर ही उनसे मदद मांगी जाती या कोई काम होता जिसे वह पूरी कर देते । एक रोज़ उनके आने से पहले एक शख्स आकर उनकी मेज़ पर बैठ गया । कोई ने उसे पहले कभी नही देखा था । उसके सामने प्लेट रख दी गई । उसने एक पर्ची निकाल कर रफी साहब की प्लेट के नीचे दबा दी । रफ़ी साहब आए और उन्होंने सबको एक नज़र देखा,सलाम दुआ हुई,फिर वह खाना खाने लगे । प्लेट के नीचे पर्ची देखकर उठाई और पढ़ी । पढने के बाद अपने प्राइवेट सेक्रेटरी को दी और कहा यह आज अभी पूरा हो जाना चाहिए । हाँ पूरे महीने की शेविंग का सामान लाकर देना,एक बार का नही ।उन्होंने सर उठाकर उन लोगो की तरफ भी नही देखा जिनमे से किसी एक ने यह पर्ची रखी थी । चुपचाप बिना यह जाने की वह कौन है,कहाँ से आया है,हिन्दू है या मुसलमान है । औरत है या आदमी है । कांग्रेसी है या कोई और है ।बस सर झुकाकर उसकी मदद करदी और खाना खाकर उठ गए । उन्होंने अपने पुरखों से सीखा था की मदद करते वक़्त आँख मत उठाना की मदद लेने वाले की आँख में शर्म आ जाए । वह अजीब घर थे,जिनकी चौखट पर कभी कुछ कम नही पड़ता था ।

अलीगढ़ पढ़ने के दौरान अपनी फ़ीस से दूसरे साथियों की फीस जमा कर दिया और खुद का नाम कट गया । इतनी ख़िदमत,इतनी मोहब्बत और इस क़दर मदद करके वह दिलों में बाक़ी रह गए ।तस्वीर में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद अन्तिम दर्शन करते और दूसरा वह भाषण जो राष्ट्रपति वीवी गिरी ने उनकी जयंती पर दिया..मेरी आज कोशिश रही की यौम ए वफ़ात पर कुछ लिख दें,कुछ ज़िक्र करें ।हमारे बस में इतना भर ही है बाकि किरदार में ढालना है......

रफ़ी अहमद किदवई यूँ तो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक बड़ा जाना पहचाना हुआ नाम हैं.उनकी उससे बड़ी पहचान पार्टी लाइन और तमाम सीमाओं से परे जाकर लोगों की मदद करने की रही है.उनपर अपने विरोधियों की मदद करने के खूब आरोप लगे मगर उन्होंने कभी इसे कम नही होने दिया क्योंकि उनकी नज़र में मानवता पार्टी और बंधन से ऊपर की चीज़ है.उनकी इसी खासियत का जवाहरलाल नेहरु बेहद सम्मान भी करते थे मगर एक बार उनके मदद करने  से ऐसा हुआ की पूरी पार्टी ही विचलित हो गई.खुद नेहरु जी भी बेहद परेशान हो गए.
हुआ यह की रफ़ी साहब ने अपनी पार्टी कांग्रेस के खिलाफ निर्दलीय उम्मीदवार गोविन्द सहाय जी की आर्थिक मदद कर दी. गोविन्द जी खुद नेहरु जी के बेहद करीबी रहें हैं.किसी कारणवश यह आजाद ख्याल गोविन्द सहाय जी कांग्रेस के ही खिलाफ चुनाव लड़ गए.रफ़ी साहब से उनकी अच्छी दोस्ती थी. चुनाव की तैयारी के लिए उन्होंने रफ़ी साहब से मदद मांगी जिसको पूरा करने का वादा रफी साहब ने कर लिया.उनकी आर्थिक मदद की भी मगर यह मदद कांग्रेस के अन्दर एक भूचाल ले आया.अमूमन रफ़ी साहब के किसी कदम में ऊँगली न उठाने वाले जवाहरलाल नेहरु भी पार्टी के दबाव में आकर रफ़ी साहब को तलब कर बैठे.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की इस महत्वपूर्ण मीटिंग में रफ़ी साहब पर आरोप लगा की उन्होंने पार्टी लाइन के विरुद्ध जाकर एक उम्मीदवार की मदद की है,जो कांग्रेस को हरा सकने के लिए खड़ा है.जवाहरलाल जी ने रफ़ी साहब से पूछा. राफी साहब भी इस स्थिति की गंभीरता को समझते हुए बोले,मुझे बेहद अफ़सोस है.मैं बेहद शर्मिंदा हूँ.बाकी नेतागड़ रफ़ी साहब के इस अपराधबोध पर खुद की विजय मानकर मंद मंद मुस्कुराए.रफ़ी असाह्ब ने आगे कहा की,”मैं माफ़ी मांगता हूँ गोविन्द सहाय जी से की जितनी मदद का मैंने उनसे वादा किया था,उतनी मदद मैं उनकी कर नही पाया.आइन्दा से पूरी मदद करने की कोशिश करूँगा.यह कहकर रफ़ी साहब बैठ गए और जवाहरलाल नेहरु खूब मुस्कुराए क्योंकि रफी साहब के दिल को एक वह ही तो समझते थे.यह किरदार था हमारे पूर्वजों का,जिसे हमे सीखकर दोस्त हो या दुश्मन हर एक की मदद करने के लिए आगे आना चाहिए.

Tuesday, October 23, 2018

दर्शन

"संसार एक उद्यान है, जिसकी सिंचाईं राज्य से होती है । राज्य एक शक्ति है जिसपर धर्म का जीवन मरण आधारित है । धर्म एक राजनीती है, जिसकी बागडोर  बादशाह के हाथ में है । बादशाह उस व्यवस्था के लिए उत्तरदायी है जो सेना की सहायता पर निर्भर है । सेना उन सहायकों के समूह का नाम है जिनका पालन पोषण धन द्वारा होता है । धन वह कर है जो प्रजा से एकत्र किया जाता है । प्रजा उन लोगों के समूह को कहते हैं जो न्याय के आधार पर जीवित रहता है । न्याय वह उत्तम वस्तु है जो संसार के अस्तित्व का कारण है ।"

सिर्रुल असरार में अरस्तू ने यह आठ वाक्यों का गोला बना दिया और इसी में दर्शन और राजनीती के ऐसे टाँके लगाए जिसकी कढ़ाई देख आने वाली नस्लें पलकें ही झुकाती रहीं । इस गोले का कौन सा वाक्य सिरा है और कौन अंत, पता नही,कहाँ से शुरू और कहाँ ख़त्म ।बस इतना पता है की सर्वोश्रेष्ठ शासन वह है जो न्याय कर सके । न्याय,जो प्रकृति या ईश्वर ने किया है ।मैं हर उस शासन को शासन ही नही मानता जहाँ शासक अन्याय करे ।
वैसे मैं दिन रात लगा हूँ की अरस्तू,अल मिस्क काफ़ूर,अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद,अबु जाफ़र मुहम्मद बिन जरीर अत्तबरी, मुहम्मद बिन उमर अल वाकेदी ,अली बिन हुसैन अल मसऊदी, ह्य्यान बिन खलफ़,अब्दुर्रहमान इब्ने खलदून,अफ़लातून और सुकरात की खोलकर फिर से बांधी गिरह खुल जाएँ ।ज़माना ज़माने की नब्ज़ पकड़ना सीख जाए ।वह जान जाए की आज़ादी,ख़ुराक और इंसाफ किसी भी इंसान के इंसानी पहचान की पहली शर्त है, जिसे कोई दूसरा इंसान खत्म नही कर सकता बल्कि इसे पूरा करने में मदद ही कर सकता है, तभी वह इंसान हुआ ।ख़ैर आपका भेजा क्या चाटना ऊपर के आठ वाक्यों में खुद को जहाँ चाहे फिट करें,आपकी मर्ज़ी...

Monday, October 22, 2018

सीबीआई

पढ़ लियो अगर सही वक़्त पर नही पढ़े होगे,रट्टा मारलो, जो मज़े अलंकार में हैं वह कलाकार में नही हैं...

अनुप्रास अलंकार : अनुप्रास शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – अनु + प्रास | यहाँ पर अनु का अर्थ है- बार -बार और प्रास का अर्थ होता है – वर्ण। जब किसी वर्ण की बार – बार आवर्ती हो तब जो चमत्कार होता है उसे अनुप्रास अलंकार कहते है।

उदाहरण :सीबीआई ने सीबीआई के ऑफिस में सीबीआई अधिकारी पर छापा डाला

लाटा नुप्रास अलंकार : जहाँ शब्द और वाक्यों की आवर्ती हो तथा प्रत्येक जगह पर अर्थ भी वही पर अन्वय करने पर भिन्नता आ जाये वहाँ लाटानुप्रास अलंकार होता है। अथार्त जब एक शब्द या वाक्य खंड की आवर्ती उसी अर्थ में हो वहाँ लाटानुप्रास अलंकार होता है।

उदाहरण :सीबीआई ने सीबीआई के ऑफिस में सीबीआई ऑफिसर पर छापा डाला

यमक अलंकार : यमक शब्द का अर्थ होता है – दो। जब एक ही शब्द ज्यादा बार प्रयोग हो पर हर बार अर्थ अलग-अलग आये वहाँ पर यमक अलंकार होता है।

उदाहरण :सीबीआई ने सीबीआई के ऑफिस में सीबीआई पर छापा डाला ।

नोट : उपरोक्त उदाहरण दोनों अलंकार में इस्तेमाल हो सकता है पिछले सत्तर सालों में ऐसा कोई उदाहरण सामने नही ला पाया हिंदी जगत जहाँ अनुप्रास और यमक अलंकार साथ हों,थोड़ी मेहनत की जाए तो श्लेष अलंकार भी पलथी मारकर करीब आ सकता है ।ख़ैर यहाँ यमक इसलिए भी है की इसमें तीन जगह सीबीआई का प्रयोग हुआ है और तीनो जगह इसका अर्थ भिन्न भिन्न है ।इनमे एक सीबीआई कांग्रेस की है, एक सीबीआई भाजपा की है और एक सीबीआई कथित सांस्कृतिक संगठन विशेषज्ञ की भी है ।तीनो का अर्थ अलग है अलग है मगर मूल एक ही है अनर्थ ।

Sunday, October 21, 2018

लनतरानी

कल बहुतों ने पूछा की यह लनतरानी क्या है, तो सुनें
"मैं भागता चला जा रहा था की ओबामा टकरा गए।ओबामा की मुझसे लड़ते ही सीने की हड्डी टूट गई।टूटने की आवाज़ से आसमान चटख गया।इतने में नीचे बैठी मनिहार ने आवाज़ दी मुझे।मैं दो क़दम में ज़मीन नाप कर उस तक पहुँचा।उसकी आँखों में आँखे डालकर मैंने ट्रम्प को शक्ति दी।ट्रम्प वोह शक्ति पाकर झेलम में जैकेट पहने लेटे मगरमच्छ के मुँह को अपने हाथों से फाड़ने लगा।मगरमच्छ की यह हालत देख कोरिया का गोली लौंडा जो खुद को तानाशाह समझता है, डर गया।उसके डरने से जो पसीना निकला वोह अरब में बारिश बनकर बरसा ।
बारिश का पानी बहते हुए कब ज़िल्ले इलाही की नाक में समा गया ईश्वर ही जाने।ज़िल्ले इलाही ने चन्द्रशेखर आज़ाद से इस नाक में भर चुके पानी के बारे में पूछा,आज़ाद कड़क कर बोले यह नेहरू की गलती है । नेहरू तमतमाकर बोले की मैं जा रहा हूँ बादलों से झगड़ने और शेरवानी ऊँची करके बादलों की ओर एक क़दम बढ़ाया की बादलों में बैठे इंद्र सकपका गए और उन्होंने नीचे हिरोशिमा पर एक बम फेक दिया,बम के गिरने से सब धुँआ धुआँ हो गया,फिर धुएँ को चीरते हुए एक महामानव प्रकट हुआ,जिसका सीना असामान्य रूप से चौड़ा था,जिसका इतिहास का ज्ञान अकाट्य था,उसने मुस्कुराकर कहा यह भी बन्द,वह भी बन्द,सब बन्द,चुप करो,ऐसा पैसा,नोट सोट, कपड़े लत्ते,ख़ुशी वुशी,सुक़ून फुकुन सब बन्द"

यह जो आज लिखा है इसको बिलकुल उल्टा सीधा मत समझयेगा की क्या लिख दिया है।यह ही लनतरानी है।कल इस शब्द को इस्तेमाल किया था।यह अवध की वोह खूबसूरत कला थी जो ताँगेवाले से लेकर ज़मींदार तक सबको आती थी।यह इतनी आम थी की घरों में जब कोई ज़्यादा झूठ बोलता या बढ़ा चढ़ा कर कुछ कहता तो उससे कह दिया जाता था की ज़्यादा लंतरानी न सुनाओ।अब तो अवध की चौखट पार करके यह अमरीका तक चली गई है।
खैर लंतरानी के मज़े लें।हम तो दिनभर लंतरानी कहने की कूव्वत रखते हैं।क्योंकि इस आर्ट को ज़िंदा रखना है।इसकी महफ़िलों को ज़िंदा रखना है।अवध के आखरी चराग़ की राख अभी हमारे माथो पर लगी हुई है।लंतरानी ज़िंदाबाद।आजकल इसके उस्ताद दुग्गल साहब की भी ज़िंदाबाद।

Friday, October 19, 2018

मृत्यु

मृत्यु चाहे कितने सन्नाटे में आए,चाहे कितने ही शोर में आए,उसके आने की आवाज़ हर एक सुन सकता है, सिवाए उसके,जिसके पास वह आ रही हो ।कभी समन्दर के शाँत पानी में आए, तो आसमान में दहकते जहाज़ में आए या मैदानों में उपजे भयंकर शोर में आए,वह आती है और एक झटके में मेरे जिस्म से गोश्त का एक टुकड़ा नोच ले जाती है । अब मुझे मृत्यु डराती नही है, विचलित नही करती हैं, मैं अब मृत्यु के आने पर चीख़ता नही हूँ,मैं रोता नही हूँ,मैं हँसता भी नही हूँ,अब जब यह आती है तो मैं पत्थर हो जाता हूँ ।
तब तक पत्थर हो जाता हूँ जब तक मनुष्य इस आई हुई मृत्यु के तमाम बहाने बनाकर,एक दूसरे को कोसकर,एक दूसरे के लिए मृत्यु का रेड कार्पेट बिछाकर सो नही जाते,तब तक मैं पत्थर रहता हूँ ।

मेरी आँख से निकले आँसू को आँख के कोर से निकली गर्मी सुखा देती है ।वह जैसे ही कहती है, तुम अब तो बह निकले,तुम तब क्यों नही बहे थे,आँसू सिमटकर भाँप बनकर बिना बहे ग़ायब हो जाते हैं ।
मृत्यु ने मेरे आँसुओं से रिश्ता तोड़ लिया है ।मेरे ही क्यों,हर एक के आँसुओं से रिश्ता तोड़ लिया है ।अब आँसू वहीं आते हैं, जहाँ उनका खुद का कोई मृत्यु की गोद में जा रहा होता है ।मृत्यु ने इंसानों को बाँटकर चैन की साँस ली है ।अब उसे पता है की उसके आने जाने पर भीड़ नही आएगी ।अब कोई सावित्री मृत्यु का पीछा कर सत्यवान के प्राण नही ले जा सकती ।सावित्री के पीछे खड़ी उसे ताक़त देती भीड़ धर्म,जाति, विचार में इतना बंट चुकी है की अब मृत्यु किसी भी सत्यवान को जब चाहे खींच ले जाए,सिवाए सावित्री के कौन दो क़तरे आँख से  बहाएगा भला ।

मृत्यु अपने कँधे पर ढेरों ज़िन्दगियों को एक झटके में लाश में बदल कर जा रही है । हम उसे जाते हुए देख रहें हैं ।गिद्ध जिसे इंसान कहते हैं की खत्म हो गए,तो ज़ाहिर है हर खत्म होती चीज़ को सम्भालना इंसान का ही कर्तव्य है ।तो इंसान खुद अब गिद्ध हो गया है ।मृत्यु जब उन सबको ले जा रही है तो इंसान से गिद्ध बने लोग,अब रो नही रहें हैं बल्कि अपने बीच बचे इंसानों के कपड़े नोच रहें हैं ।वह इनकी खाल नोच देना चाहते हैं ।वह गिद्ध भी हैं और इंसान भी,इसलिए पहले इंसान बनकर मृत्यु के आने का नया रास्ता बना रहें,उसके जाने के बाद,अपनी सदियों से दबी भूख मिटाएंगे यह गिद्ध ।देखो मृत्यु जा रही है, तुम्हे उसकी पीठ दिख रही होगी,मुझे उसके घुटने दिख रहें .....

Thursday, October 18, 2018

मजाज़

दो नाम कहें या दो दौर कहें,या एक दौर की दो नुमाइश कहें, मजाज़ और मंटो।।इनके दिलों को ज़मीन के बंटवारे ने कमज़ोर कर दिया।मजाज़ भले ही मंटो से सात आठ महीने बड़े रहें हो मगर मंटो ने मजाज़ से दस महीने पहले रुखसत होकर यह फासला भी खत्म कर दिया।सन् 55 की शुरआत मंटो को ले गई तो जाता जाता सन् 55 अपने साथ मजाज़ को भी लेते गया।

एक ने कहानियाँ बुनी तो एक ने ग़ज़लें।दोनों में एकसा दर्द।दोनों की कैफ़ियत एक सी,मसखरे इतने की ज़िन्दगी ही मज़ाक बन गई।अर्रे हम भी मजाज़ को याद करते करते मंटो तक चले गए।दिमाग अजब बहका है मेरा भी,यह भी नही की मजाज़ को पहले आजके दिन की पैदाइश की मुबारकबाद तो दे देते।लेकिन क्या करें,यह दोनों कच्ची उम्र की मौतों ने जितना मेरे ज़हन पर ज़ुल्म किया है,उतना किसी चीज़ से नही हुआ।
मजाज़ को रुदौली से लखनऊ,अलीगढ़,दिल्ली,बम्बई किन किन गलियों से पहचाने।जब जब गुज़रता हूँ तो लगता है की अभी मजाज़ निकल के गए हैं यहाँ से,सब बेरौनक हो रखा है।मुझे मजाज़ की नज़्मों से ज़्यादा मजाज़ की ज़िन्दगी अपनी ओर घसीटती है।जब मैं किसी अमीर शख्स की महफ़िल में अपने फ़न की नुमाइश के लिए बुलाया जाता हूँ,तो मजाज़ मेरा हाथ पकड़,मुझे रोक लेते हैं।

रोक कर कहते हैं की यह तुम्हे बेइन्तहां चाय पिलाएंगे जैसे मुझे शराब पिलाते थे।जब इनकी तबियत भर जाएगी तो तुम्हारे लिए भी सर्द रात में बाहर का दरवाज़ा खोल देंगे और तुम अपनी वाह वाह वाह वाली आवाज़ों के शोर को सुनते सुनते कहीं सड़क किनारे लेट जाओगे और कोहरा चादर बनकर तुम्हे ढँक लेगा,जहाँ सबकी तो सुबह होगी मगर मजाज़ की नही...

मैं रुक जाता हूँ और मजाज़ से ज़िन्दगी के तमाम तजर्बे पर बात करता रहता हूँ।इतनी बात,इतनी बात की कहने को कुछ रह ही नही जाता तो दोनों चुप होकर एक दूसरे को देखने लगते हैं।उन्हें शिकवा की मैं पहले क्यों नही आया,हमे शिकवा की वह थोड़ा और क्यों नही रुके,यूँहीं,बस यूँहीं मजाज़ मेरे पास से उठकर चले जाते हैं और मजाज़ को पैदाइश की मुबारकबाद अनसुनी रह जाती है... हमेशा की तरह अनसुनी....
जैसे उसे पैदा होने से कोई लिल्लाही बैर हो,जैसे वह मौत को ही मोहब्बत करता हो...लोग पैदाइश की मुबारकबाद देते हैं और वह चीखकर रो भी नही पाता, बस सिसककर अल्फ़ाज़ में बह जाता है, और जब कोई मौत का दावतनामा लाता है तो मजाज़ चहककर उसे मुस्कुराते हुए होंटो पर लगा गटक जाता है, क्योंकि उसे पता है जिस दुनिया में उसकी ख्वाहिश न शामिल हों,वह बदसूरत है दुनिया...क्या मुबारकबाद दें मजाज़,फिर भी आपकी पैदाइश दुनिया को मुबारक की उन्होंने कम वक़्त में बहुत बड़ा वक़्त देख लिया...