Saturday, April 30, 2016

मधु लिमये

रोज़ रोते हो बेरोज़गारी,महँगाई, भृष्टाचार,बेईमानी,गैर बराबरी पर।इतना रोते हो की रोनू हो गए हो।अच्छा यह झूठ मूठ का रोना हमारे नेता खूब समझते हैं।वह जानते हैं यह सिर्फ ड्रामेबाज़ लोग हैं।रोज़ रोएँगे।अगर इनका रोना,तकलीफे,गम सब सच्ची होती तो वह नेता जो इनकी दिल से बात करते थे,इनके लिए मरते थे,इनकी तकलीफो के लिए अपना सबकुछ खत्म कर दिया वह हाशिये पर ना होते।वह नेता इनके घरों में होते।इनके बच्चों में होते।आज वैसे ही एक नेता मधु लिमये का जन्मदिन है।जिसने अपनी पूरी ज़िन्दगी तबाह कर दी अवाम के लिए और यह अवाम,जिसके ज़हन के किसी हिस्से में उनका नाम नही है।मैं खुश होता हूँ देख कर की ड्रामेबाज़ लोगों को ड्रामे में माहिर नेता मिल गया।मधु लिमये को मैं जब पढता हूँ,समझता हूँ तब एक बात तो यक़ीन से कह सकता हूँ की अवाम के लिए इससे अच्छा कोई क्या सोच सकता है।वह जो दिलों को जोड़कर,बराबरी का हिन्दोस्तान बनाना चाहता था ज़मीन में बराबर सो गया।हमे उनके होने का कोई एहसास तक नही।थोड़ा सा मधु लिमये को पढ़ लीजिये तो शायद हिंदुस्तान के बारे में कुछ अच्छा सोच पाइए।जो अपने मज़बूत किरदारों को भुला देते हैं, महशर में सबसे पहले उनका किरदार गिरता है।सलाम मधु लिमये।

Friday, April 29, 2016

ईमाम जाफर सादिक़

कहते हैं सोच में फ़र्क होने से हम अच्छे से अच्छे इंसान को ठुकरा देते हैं।अपनी रवायतों को तोड़ देते हैं।यही हुआ मशहूर वैज्ञानिक,दार्शनिक,चिंतक और ईमाम हज़रत जाफर सादिक के साथ।बहुत से मुसलमानो ने उनको याद करने में अपनी ज़हनी कमज़ोरी को ज़्यादा तवज्जो दी।आज लोग इमाम जाफर की याद में कूँडे मनाएंगे और बहुत से लोग इसकी मुखालफत करेंगे।मगर मुखालफत में यह मत भूलें की वह क्या थे।
इमाम जाफर अल सादिक हज़रत अली की चौथी पीढी में थे।उनके वालिद इमाम मोहम्मद बाक़र खुद वैज्ञानिक थे और मदीने में अपना कॉलेज चलाते हुए सैंकडों बच्चों को पढ़ाते थे।अपने पिता के बाद जाफर अल सादिक ने यह काम संभाला और अपने शागिर्दों को कुछ ऐसी बातें बताईं जो इससे पहले किसी ने नही बताई।
उन्होंने अरस्तू की चार मूल तत्वों की थ्योरी से इनकार किया और कहा कि मुझे हैरत है कि अरस्तू ने कहा कि दुनिया में केवल चार तत्व हैं, मिटटी, पानी, आग और हवा।मिटटी खुद तत्व नहीं है बल्कि इसमें बहुत सारे तत्व हैं।इसी तरह जाफर अल सादिक ने पानी, आग और हवा को भी तत्व नहीं माना।हवा को भी तत्वों का मिश्रण माना और बताया कि इनमें से हर तत्व सांस के लिए ज़रूरी है। मेडिकल साइंस में इमाम सादिक ने बताया कि मिटटी में पाए जाने वाले सभी तत्व मानव शरीर में भी होते हैं। इनमें चार तत्व अधिक मात्रा में, आठ कम मात्रा में और आठ अन्य सूक्ष्म मात्रा में होते हैं।
उन्‍होंने बताया, "जो पत्थर तुम सामने गतिहीन देख रहे हो, उसके अन्दर बहुत तेज़ गतियाँ हो रही हैं। उसके बाद कहा, "यह पत्थर बहुत पहले द्रव अवस्था में था।आज भी अगर इस पत्थर को बहुत अधिक गर्म किया जाए तो यह द्रव अवस्था में आ जायेगा।
ऑप्टिक्स का बुनियादी सिद्धांत 'प्रकाश जब किसी वस्तु से परिवर्तित होकर आँख तक पहुँचता है तो वह वस्तु दिखाई देती है।साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि ब्रह्माण्ड में कुछ भी स्थिर नहीं है। सब कुछ गतिमान है।
ब्रह्माण्ड के बारे में एक रोचक थ्योरी उन्होंने बताई कि ब्रह्माण्ड हमेशा एक जैसी अवस्था में नहीं होता। एक समयांतराल में यह फैलता है और दूसरे समयांतराल में यह सिकुड़ता है।
उनके मशहूर शागिर्दों में जाबिर इब्ने हय्यान , इमाम अबू हनीफ, मालिक इब्न अनस थे।
अब ज़रा से भी महसूस कर सकें तो उन्हें महसूस कर लें।जिन रवायतो को आप मज़ाक बताते हैं उन्हीं ने आज उनको ज़िंदा रखा है वरना ढूंढते रहते अरबी फ़ारसी की किताबों में।कई बार रवायतें इसी लिये डाली जाती हैं की शख्सियतें और उनके काम पीढ़ीदर पीढ़ी नीचे पहुँच जाए।दिमाग में गुरुर ना हो तो सीख लीजिए।

मैं मज़दूर

कल 1मई यानि मज़दूर दिवस है।हमारी छुट्टी का दिन।हमारे आपके जैसों का दिन।हमारे साथियों का दिन।वह जिन्होंने हमारे घरों की नीव रखी।उसपर ईंटें रखी।दीवारें और छत रखी।जहाँ हम सब सुकून पाते हैं।उन सबको याद करने का दिन।विधान भवनों,राज भवनों,महलों और ऊँची ऊँची इमारतों को बनाने वाले मज़दूरों को याद करने का दिन।तपती धूप में पीठ से रिसते पसीने और जूझने की अमिट आत्माओं को याद करने का दिन।रिक्शा चलाती मोटी नसों वाले पैरों को याद करने का दिन।हमारे कूड़े जैसे जिस्म को ढोने वाले मेहनती बदनों को सलाम करने का दिन।आराम,जी वही आराम जिसे आराम बनाया है उन हाथों को चूमने का दिन।बोझा उठाए फ़ख्र से मज़बूत रीढ़ को सलाम करने का दिन।हम सबके मज़दूर होने का दिन।यह दिन सिर्फ प्रतीक भर है बस अगर दिल में इंसानियत है तो हर मज़दूर को अपनी तरह मज़दूर ही समझो।जो तक़लीफ़ तुम्हे होती है ऑफिस में,मैदानों में वह धूप से तपते,जिस्म को तोड़ते मज़दूरों को मत दो।दिल गवारा करे तो आज होली या ईद की तरह हर मज़दूर भाई से गले मिलो और कहो हम तुम एक जैसे हैं।तुम सूखे मैदानों के मज़दूर हो तो हम ढकी छतों के मज़दूर।आओ गले मिलकर यह फासला तोड़ दें।गले लगाए मज़दूर की तस्वीर डालो जैसे सेलिब्रिटी के साथ की डालते हो।उनको समझो,महसूस करो और अपने में घुल जाने दो तब तो मज़दूर दिवस है वरना यह दिन तो हर साल आएगा ही।हर तरह के मज़दूरों एक हो,एक यही हैं जो हर फ़र्क मिटा सकते हैं।

Thursday, April 28, 2016

कन्फ्यूशियस

एक सोच है की ग़रीब, कमज़ोर कभी अर्श तक नही पहुँच सकता।यह वही सोच है जिसे बहुतों ने सबसे ज़्यादा झुठलाया है।एक वक़्त में लोहार,गड़रिये, मज़दूर,ग़ुलाम जैसों ने  अर्श पाया है, बस यह अपने विचारों पर टिके रहे और उसे हवा देते रहे।जानवरों को घास डालते हुए जब कन्फ्यूशियस राज्य के सिद्धान्त सोचता था तो किसी को भी उसपर यकीन नही था।27 साल ज़िन्दगी के मज़दूरी,बेकारी में बीत जाने पर जब उसने 8 बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तब भी वह फ़िज़ूल ही था।37 साल की उम्र में उसने चीन की परम्परागत किताबों को खंगाल डाला फिर एक सिद्धान्त रखा।ईश्वर,राज्य और जनता का सिद्धान्त।जिसके सामने सब झुक गए। कन्फ्यूशियस ने बड़े बड़े दार्शनिको से कहा "मैं सत्यभास को सत्य से,जौ को गेंहूँ से,मीठी ज़बान को अच्छाई से और कड़वे वचन को ईमानदारी से अलग मानता हूँ तभी सही न्याय कर पाता हूँ"। कन्फ़यूशियस घर घर में सन्त,दार्शनिक,शिक्षक,सलाहकार की हैसियत से जज़्ब हो गया।जब वह भेंड़ों की खालों में पड़े कीड़े बीन रहा था तब किसने सोचा था यह चीन की सत्ता में पड़े कीड़ो को निकाल फेकेगा और भेड़ की तरह ज़मीन को भी साफ कर देगा।आपको भी सलाह है अगर कोई विचार है तो उसपर काम कीजिये।वक़्त लगता है तो लगे।लोग खलिहर, फालतू,बेकार या जो आए कहें उसे सुनने के साथ मेहनत कीजिये।अगर आपका विचार इस नकारात्मक वातावरण से आपको नही निकाल सकता तो आपका विचार दूसरे को क्या ऊर्जा देगा।ऐसा विचार किस काम का जो समाज के नकारात्मक प्रतिक्रिया में ढह जाए।इसलिए ऐसा मज़बूत विचार रखे जो आपको मज़बूत करे,वही आगे चलकर समाज को मज़बूत करेगा।उस विचार को ही थाम लीजिये,वह बीज है जिसमें लम्बी प्रक्रिया के बाद अँकुर फूटेगा।बस मेहनत,ईमानदारी के साथ विचार को बढ़ाये रखें।कन्फ्यूशियस हमारे इर्द गिर्द ही है।

मोरी गंगा रे

उसकी अँगड़ाई,
उसकी चंचलता,
उसका अल्हड़पन,
यही तो है मेरी गंगा।
उसकी मुस्कान,
उसका बहाव,
उसकी तरलता,
यही तो है मेरी गंगा।
धोती हुई पाप,
पोछती आँसू,
देती है मुक्ति,
यही तो है मेरी गंगा।
माँ का आँचल,
बहन का समर्पण,
पत्नी का साथ,
यही तो है मेरी गंगा।
थाम लो,
संवार दो,
निखार दो,
जैसे थी मेरी गंगा।
भविष्य कहेगा,
समय बोलेगा,
बच्चे पढ़ेंगे,
यही तो है मेरी गंगा।
हम सबकी गंगा।
ज़मीन ओ आसमान की गंगा।
यही तो है मेरी गंगा।।।।।।।।।।।।

Wednesday, April 27, 2016

शाह की बेटी

मज़ा तो तब आया जब किरमान के बादशाह के यहाँ उनकी बेटी के लिए पड़ोसी मुल्क़ के सुल्तान के बेटे का पैग़ाम आया।सूफ़ी मिजाज़ में ढल चुके शाहशुजा इससे पीछा छुड़ाना चाहते थे।जाकर सन्नाटे में एक पत्थर की आड़ में बैठ गए और सोचने लगे।इतने में एक बेहद गरीब मगर चेहरे पर अजब चमक वाले किसी लड़के को देखा।पास गए तो देखा वह बड़ी लगन से ख़ुदा से आवाम की मुश्किलात दूर करने की दुआ करते जा रहा था और किसी ग़ुलाम के पैर का ज़ख्म साफ कर रहा था।उन्होंने उससे कहा तुम शादी करोगे।लड़का बोला मुझ ग़रीब से कौन शादी करेगा।शाहशुजा बोले मैं किरमान का बादशाह तुम्हे अपनी बेटी का हाथ देना चाहता हूँ।तुम नेक,परहेज़गार और खिदमतगार हो।तो इस तरह शादी हुई और रात में उनकी बेटी सुसराल पहुँची।वहा टूटे से घर में एक कटोरे मे सूखी रोटी के टुकड़े और एक पतीली में दूध रखा देख वह उठ गई और वापिस अपने मैके यानि बादशाह के महल जाने लगी।तभी उसका शौहर बोला मुझे पहले ही पता था की मलिकाएं झोपड़ी में नही रुका करती और सुखी रोटी तो उनके गले में फंसेगी।तभी वह रूकती है और शौहर की तरफ मुखातिब होकर कहती है हाँ मैं अपने वालिद के यहाँ जा रही हूँ यह पूछने की उन्होंने कहा था की तुम्हारी शादी अल्लह के नेक,परहेज़गार बन्दे से कर रहे हैं मगर यहाँ तो उल्टा है।जो शख्स कल के लिए सुखी रोटी और दूध बचाकर रख ले उसका ईमान कितना कमज़ोर है वह ख़ुदा पर भरोसा न रखकर अपने पर एतबार कर रहा।ऐसे होंते हैं कहीं ईमान वाले।शौहर शर्मिंदा होकर माफ़ी माँगने लगे।यह बाप,बेटा,बेटी और दामाद सब आला दर्जे के सूफ़ी हुए जिन्होंने अपने किरदार से रेत तो रेत जँगल में भी इंसानियत पैदा कर दी।सूफ़िज़्म का झोंका हर हारे हुए को ताज़ा करने की क़ूवत रखता है।

Tuesday, April 26, 2016

सूफी

शाहशुजा किरमानी लम्बे वक़्त नहीं सोए।यहाँ तक जब नींद आए तो आँखो में नमक लगा लें।एक अरसे के बाद जब सोए तो ख्वाब में ख़ुदा को सुना।वह बोल उठे या ख़ुदा हम हमेशा जागे की आप को पा लें मगर आप तो ख्वाब में आए।आवाज़ आई शाहशुजा तुम बादशाह थे।तुमने जाग कर मुझे ढूंढा।उस जागने में तुमने ख़ल्क़ की खूब ख़िदमत की।खूब काम किया।आवाम की हर परेशानी दूर की साथ में तुम्हारी आँखे मुझे ढूंढती रही।एक पल के लिए नही भुलाया।तुमने अपने हाँथो से बीमार गुलामो की ख़िदमत की,पैर दबाए।तुमने ज़ख्मो पर खुद मरहम रखा और रात रात तुम मुझे ही याद रखते रहे।तुमने दिन दिन काम किया और रात रात अपने ख़ुदा को याद किया।तो तुम समझ लो तुम्हारा ख़ुदा तुमसे कितनी मोहब्बत करता है।अगर मैं तुमहे जागते में मिलता तो तुम ताउम्र जागते इसलिए ख्वाब में आया हूँ।ताकि मेरा बन्दा तकलीफ़ में न रहे।कहते हैं शाहशुजा ने फिर सोना शुरू किया कभी कभी।मगर फिर ख्वाब का क्या हुआ पता नही बस इतना की वह अपने दोनों बच्चों को भी ख़िदमत में लगा ले गए।उनके बेटे ने हिंदुस्तान का रुख किया और राजस्थान,दिल्ली,अवध होते हुए अवध की सरहद पर रौशनी बिखेरते हुए सो गए।उनके बेटे महल,सल्तनत एक गुलाम वज़ीर को दे कर खिदमते ख़ल्क़ के लिए निकल गए।सुल्तान ने फखीरी अपना ली यही तो कमाल था सूफ़िज़्म का।बेटी का क़िस्सा तो बेहद नायाब है।उनसे जुड़े बहुत से किस्से हैं जो शायद कभी लिख पाऊँ, सैकड़ो सूफ़ियों के किस्से हैं शायद कह पाऊँ।हज़ारों दास्ताँ याद हैं शायद उन्हें पहुँचा पाऊँ।अमन और मोहब्बत के लिए सूफ़िज़्म एक बड़ा रास्ता है जो कठिन है मगर मंज़िल तक जाता है।जिन्हें भी मुल्क़,आवाम की ख़िदमत करनी है वह सूफ़िज़्म पढ़ें, समझें और उतारे।हम भी अपनी शाम से पहले सब लिख डालना चाहते हैं।

Monday, April 25, 2016

पार

{ये नज़्म १४ अगस्त की रात को लिखी और १५ अगस्त की सुबह पढ़ी। .. ये पूरी नज़्म तो नि है हा उसके कुछ अशार है जो आपके सामने रखता हु }

आज इस पार खड़ा हूँ मै  

उस पार खड़े तुम भी हो 

आंसू है हमारी आँखों में 

तो ग़मज़दा तुम भी हो 

जिगर मचलता है मेरा यहाँ 

तो ज़ख़्मी दिल तुम भी हो 

रोटी को ढूँढती है निगाहे

तो  मुफलिस तुम भी हो 

गला हमारा रुन्धता है यहाँ

 तो मायूस आँख तुम भी हो।

रूह बिलखती है देख सन्नाटा

तो घुटता अँधेरा तुम भी हो 

चिराग मै ढूँढता हूँ यहाँ 

 रौशनी के मुन्तज़र तुम भी हो 

मुल्क परेशां यहाँ भी है 

तो यार बीमार तुम भी हो 

दर्द में तड़पन है इधर

चाक सीना तुम भी हो

आओ मिलकर फिर महकें

पहले जैसे हमारे तुम भी हो।

मुल्क़ परेशान है यहाँ
तो यार बीमार तुम भी हो।।
इस पार खड़ा हूँ मै 

उस पार खड़े तुम भी हो। .. .............

कंकर कंकर

तुमको लगता है तुम बड़े क़ाबिल और दिमाग में अव्वल लोग हो।झूठ।किसी झाँसे में हो।एक आजकी तारीख़ में अपनी ज़हेनियत को देखो और पलट कर इन्हें पढ़ लो जिन्होंने हमारे होने की नीव रखी।जब तुम बिखरे,टूटे,कमज़ोर से थे तब इन्होंने मोहब्बत से,खूबसूरत बोली और ज़बान से वह लिख डाला जिसने अनजान दिलों को एक कर दिया।इक दौर में मौलाना दाऊद ने चंदायन को लिख एक रौशनी दी क्या यह किसी ख्वाब से कम है।प्रेमवन जीव निरंजन को जब शेख रिज़्कुल्लाह मुस्तकी ने लिखा तब क्या दौर रहा होगा।बनने के उस दौर में सपनावती, मुग्धावती, मृगावती,मधुमालती,प्रेमवती जैसी मोहब्बत की दास्तान उकेरी गई।उस्मान,शेख नबी,कासिम शाह,नूर मुहम्मद,जान कवि,शेख निसार,शाह नजफ़ अली,ख्वाजा अहमद,शेख रहीम,कवि नासिर,अमीर खुसरु,मालिक मोहम्मद जायसी यह वह नाम हैं जिन्होंने हिन्दुस्तान की रूह को छुआ।जायसी ने तो पदमावत, अखरावट,आखिरी कलाम, महरी बाईसी यानि कहर नामा,चित्रलेखा,मस्लानामा,कन्हावत जैसी रचना करके एक शिखर बना डाला।यह वह वक़्त था जब कंकर कंकर जुड़ कर इमारतों की तामीर हो रही थी।तो जब सदियों पहले यह कारनामे किये जा सकते थे तो आज क्यों नहीं।आज किसी की कलम दिलों को क्यों नही जोड़ती।आज किसी की ज़बान दिलों का दर्द क्यों नही दूर करती।हाँ अगर आजभी आपकी ज़बान,आपका दिल आपकी रूह सच्ची हो तो हर लफ्ज़ असर करेगा।दिलों में उतर कर असर दिखाएगा।हमें भी पुरखों की तरह आज दिल जोड़ने वाली कलम तराशनी होगी।सच्चाई और मोहब्बत की सियाही डालनी होगी।आज हमे जायसी और खुसरु की ज़रूरत पहले से ज़्यादा है।कुछ नही तो यही पढ़कर ज़बान को खूबसूरत बना लो दोस्त।दिल को दिल बना दो।वक़्त लगेगा मगर होगा।

Saturday, April 23, 2016

सच बनाम सच

एक सूफ़ी थे उनकी खुशबू हर तरफ फैल चुकी थी।एक रोज़ वह एक क़स्बे में दाख़िल हुए।वह क़स्बा बेहद तरक्कीपसंद और अक़लमन्दो का था।उस क़स्बे के सबसे काबिल शख़्स ने अपनों से वादा किया की इनका ढोंग आज यहीं खत्म होगा।रात हुई वह सूफ़ी के खेमे में पहुंचा और उनके पाँव पकड़ लिये।सूफ़ी ने उसे देखा और कहा क्यों परेशान हो।उसने कहा पीर जी बड़ी बेचैनी है,सच की तलाश की बेचैनी,ख़ुदा के सच की बेचैनी सोने नही देती।आप बताइये सच क्या है।खुदा क्या है।पीर जी ने कहा तुम्हे नही पता ख़ुदा क्या है।जी,नही पता तभी तो आपके पास आया हूँ।पीर ने कहा जब तुम्हे नही पता तो कैसे जानोगे की सच क्या है।आप बताइये।पीर ने कहा यह जो लालटेन लिए हो यही ख़ुदा है,यही सच है।यह कैसे हो सकता है मेरे पीर।पीर मुस्कुराये और कहा यह जो मिठाई है यही तो सच है, ख़ुदा है।वह फिर मायूस हुआ।अच्छा वह जो दूर आसमान में तारा दिख रहा है वह ही ख़ुदा है।वह माथे पर त्यौरियां दे सुर्ख़ हो गया।फिर पीर ने पोटली से एक ऐसी चीज़ निकाली जो उसने कभी नही देखी थी पहले।पीर ने कहा यही तो ख़ुदा है,यही तो सच है।जब उसने फिर इनकार किया तब पीर ने उसके सर पर हाथ रखते हुए कहा की भटकना बन्द करो।अगर तुम्हे नही पता होता की ख़ुदा क्या है, सच क्या है तो तू कबका मेरी पहले ही बताई हुई चीज़ को सही मान लेता।तुम्हे पता है की सच क्या है।अपने काम और ज्ञान में वक़्त लगाओ।उन सवालों में मत उलझो जिनके जवाब तुम्हारे ही अंदर हैं।तुम जिसे भी सच मानते हो उसे पकड़े रहो,उससे मोहब्बत करो और उसकी खुशबू को महसूस करो।फालतू की बहसों से सिर्फ मायूसी हाथ आएगी।मेहनत करके दुनिया को खूबसूरत बनाओ मेरे दोस्त।तुममें इतनी सलाहियत हैं की तुम लोगों की ज़िन्दगी आसान कर सकते हो लेकिन तुम गैर ज़रूरी सवालों में उलझे हो।आगे बढ़ो विज्ञानं से ख़ुदा या सच मत ढूंढो पहले इस दुनिया को आसान करो,तकलीफो को दूर करो।ख़ुदा के जानने से ज़्यादा ज़रूरी है तुम बीमारिया जानो उनके इलाज में लगो।फसलों को बढ़ाओ।बच्चों की तालीम और तरक्की में लगो।वह ज़ार कतार रोता रहा वह इस बार वाक़ई सूफ़ी के पैरों में गिर पड़ा।

तमाशा

सुन सको तो सुनों हम सबकी हालत एक वैश्या जैसी हो गई है।वह रोज़ बिस्तर पर दूसरों के संग आवाज़ें निकालती है।उसे एहसास कराती है की मैं आज ही पहली बार उसके साथ लेटी हूँ।जबकि उसको अच्छे से पता है बिस्तर और लोग बदलते रहेंगे उसका काम तो एक है।उसका एहसास सुन्न हो चुका है।उसे फ़र्क नही पड़ता की क्या हो रहा।उसे सिर्फ पैसों के लिए यह आवाज़ें निकालनी ही निकालनी हैं।उसी तरह हमारे भी एहसास सुन्न हो चुके हैं।जब कुछ बुरा होता है तो अफसोस लिख देते हैं।मोमबत्ती लेकर खड़े हो जाते हैं।दुआओं में भी यही हाल है बस रोज़ खड़े होकर माँगते रहते है।दुआ,प्रार्थना,पार्टी,जुलुस सब जगह सिर्फ हम एक आवाज़ निकालते हैं जिससे लोगों को एहसास हो की हम हैं।संघर्ष है।जैसे वैश्या एहसास दिलाती है।ज़रा भी सच्चाई हो दर्द में तो तमाशे न हों।काम हो।दिल से काम हो।जब दिल में कुछ उलझन होती है तो दुनिया उसे महसूस करती है, जुड़ती है और साथ चलती है।आज जो आपकी आवाज़ों की तासीर ख़राब हो गई उसकी वजह ही है की आपने सिर्फ लड़ाई प्रतीकों में लड़ी है।हम महँगाई, भरष्टाचार,झूठ,गरीबी,बेरोज़गारी,सूखा, किसान सबके लिए बस एक आवाज़ ही उठाते आए हैं।वैचारिक जूझना तो हममे है ही नही।घर से निकल कर लड़ना,लोगों के साथ खड़े होना भूखे प्यासे बिना तमाशे के हमे अब नही भाता।विचारों की तो बात ही नहीं,विचार के लिए सिर्फ दो रास्ते हैं या तो बढ़ जाना या तो मर जाना।तीसरा विकल्प विचार के लिए नही है।अपनी आवाज़ में सच्चाई,वज़न और मोहब्बत लाइए ताकि एक अच्छा कदम फ़रेब न लगे।जिन्हें भी अल्पसंख्यको,बहुसंख्यको,पिछड़ो के लिए वाक़ई कुछ करना है, मुल्क की ज़रा भी मोहब्बत है वह निकले तब तक निकले जब तक दिक्कत या वो खुद खत्म न हों जाए।वैसे यह कठिन रास्ता है बेहद कठिन आसान है बिस्तर पर पड़े आवाज़ निकालना।अपना रास्ता खुद चुनें।जिन्हें कड़वी लगें यह बातें उन्हें लगें।

Friday, April 22, 2016

सेना का वक़ार बना रहे

एक मुहावरा था "पेट भी जले और पीठ भी जले"।सेना और संघर्ष में यह बिल्कुल सही लगता है।जब सेना कुकर्म की तरफ बढ़ती है तब पेट जलता है, जब सेना पर ऊँगली उठती है तो पीठ जलती है।सौ फीसदी तो ना नागरिक सही हैं और ना हीं सेना।मैदानी इलाकों में बैठकर सेना का सम्मान तो हम खुद करते हैं, मगर पहाड़ी इलाकों में कुछ जगह सेना गलत होती है।जब बलात्कार जैसे आरोप सेना के किसी भी जवान पर लगें तो बुरा लगता है।जब ट्रेन के डब्बों में सेना के जवान जबरन कब्ज़ा कर ले तो बुरा लगता है।वहीं जब नागरिक सेना के सम्मान को ठेस पहुंचाए तो बुरा लगता है।जब अन्तर्राष्ट्रीय उंगलियां हमारी सेना पर उठे तो बुरा लगता है।वैसे गलत को गलत कहने की हिम्मत होनी चाहिए।एक तरफ किसी दुर्घटना में सेना के मदद के हाथ सर झुकाने को मजबूर कर देते हैं, वहीं दूसरी ओर किसी औरत के जिस्म पर हाथ डालते सेना के हाथ सर को शर्म से झुका देते हैं।जिन्हें लगता है ऐसा सेना के जवान नही करते हैं वह पहले तो कुंवे से निकले और देखे देश कितना बड़ा,कितनी विविधता और कैसे बसा हुआ है।मेरे दिल में सेना के लिए दूसरे किसी भी नागरिक से ज़्यादा इज़्ज़त है इसलिए उनको गुनाह की छूट भी कम ही होगी।जिसके दिल में मुल्क और सेना से मोहब्बत होगी वह किसी भी हाल में नही चाहेगा की सेना का जवान दुराचरण का हो।जो गलत को गलत नही कह सकता वह बुज़दिल है और एक बुज़दिल कभी सैनिक नही हो सकता।सैनिक देश की मान मर्यादा के लिए जान देता है, मर्यादा तोड़ता नही है।सलाम उन सैनिकों को जिन्होंने आजतक इस परम्परा को निभाया है।जो गलत हैं वह सज़ा पाएँगे, हमारे कानून में बहुत ताकत है।सेना की इज़्ज़त कीजिये,वह आपकी इज़्ज़त के लिए लड़ेगी।

सुनहरा ख़्वाब

जो क़ौम इतिहास के पन्नों में अपनी ताक़त ढूंढेगी वह कभी मज़बूती से खड़ी नही हो पाएगी।आपके पुरखों ने जो किया वह उनकी मेहनत थी।उसकी कहानियां याद कर लें मगर अपनी कामचोरियो में उसे मत इस्तेमाल करें।उनकी गौरव गाथाओं से जितनी जल्दी हो बाहर निकल कर आज को देखो।आजकी दिक्कत को देखो।अपने पिछड़ेपन को देखो।बच्चों की आँखों में देखो की कितने ख्वाबो को मार रहे हो।दोस्त इतिहास हर क़ौम, हर मज़हब का सुनहरा ही रहा है।वह सुनहरा तुम्हारे पुरखों की कुर्बानियो से हुआ है।अगर अपने बच्चों को सुनहरा कल देना है तो आज क़ुरबानी दो।टूट कर मेहनत करो।विज्ञान में तरक्की करो ताकि ज़्यादा दिन तक मज़बूत मुल्कों के सामने हाथ फैलाकर मत खड़े होना पड़े।इल्म और मेहनत यही दोनों चीज़ें आपकी ज़िन्दगी आसान करेंगे।जो मज़हब,ज़ात पात के नाम लड़ रहे हैं उनमे ज़रा भी मोहब्बत नहीं मुल्क़ की।जो सिर्फ़ अपने धर्म के लिए लड़ रहा उसे लड़ने दो।तुम खुद और अपने बच्चों को इल्म और मेहनत में झोंक दो।तब देखना यह फ़सादी कमरों में पड़े रो रहे होंगे और तुम्हारे चेहरों पर मुल्क़ की तरक्की की चमक और मुस्कान होगी।दोस्त ख़ून का क़तरा क़तरा बच्चों की चमकदार ज़िन्दगी के लिए लगा दो।हम तो नही होंगे मगर हमारी आने वाली नस्ले अपने पुरखों की क़ुरबानी पर दुनिया से बराबरी से मुखातिब होंगी।आइये जी तोड़ मेहनत से बदल दे अपना कल।