Tuesday, February 28, 2017

नौजवान ज़िंदाबाद

पता नही कैसे तुम यह आहट सुन नही पा रहे हो।तुम्हे लगता है आजके नौजवान बेकार हैं।वोह मोबाईल और दूसरी चीजों में घुसे हुए हैं।आजका नौजवान तफ़रीह और अपने आप के सिवा किसी को नही देखता।हमे लगता है जो यह सोच रहे हैं उन्होंने यातो आँखे बन्द कर रखी हैं या वोह देखना नही चाहते।

आप हर तरफ देखिये नौजवानों के झुण्ड लड़ रहे हैं।ज़ुल्म के खिलाफ उनकी खुली बगावत चल रही है।बच्चों से लड़ने के लिए कैबिनेट मिनिस्टर से लेकर सड़क छाप गली के गुंडे तक लगे हुए हैं।हमारे पास अपना कोई लीडर नही है और न हम बनाना चाहते हैं।आप देखिये हर मुद्दे पर नौजवान सड़क पर है,उन नौजवानों में बुढ़ों से बेहतर समझ और लड़ने की झलक है।

निर्भया से नजीब तक देख डालिये हर तरफ नौजवान ही थे जो लड़ रहे थे।बूढ़े तो हमे अन्ना की तरह ठग कर निकल गए।हमे अच्छा लगता है की न हम लेफ्ट हैं और न राईट, हम एक सुक़ून भरे हिंदुस्तान के लिए लड़ रहें हैं।हमारे साथी जूझ रहें हैं।आपको राष्ट्रवाद की हिंचकिया आने लगी होंगी,आए कोई फ़र्क नही पड़ता।

निकम्मेपन को देखिये ज़रा जेएनयू,हैदराबाद यूनिवर्सिटी,बनारस यूनिवर्सटी,अलीगढ़ यूनिवर्सटी,जम्मू यूनिवर्सिटी,इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और अब दिल्ली यूनिवर्सिटी में जो माहौल बनाया गया उसका ज़िम्मेदार कौन है।सारी गलती बच्चों की है तो शासन कौन निकम्मा चला रहा है।लड़कियों पर हाथ उठ रहे हैं और कौन बेहिस बच्चियों को बचाने की बात कर रहा है।
अजब माहौल है,अपने बोलने के लिए भी लड़ना पर रहा है।उन लड़कियों को सलाम जो बिना डरे लड़ रही हैं।उन लड़को को सलाम जो घुटने नही टेक रहे हैं।उन लिखने वालो की कलम को सलाम जो लगातार ज़ुल्म और निरंकुशता के विरुद्ध लिख रहे हैं।आप उठकर देखिये हर तरफ नौजवान भिड़े हुए हैं।कोई नौजवान सड़क पर है तो कोई कलम से उसे लिख रहा है।मगर इतना दिल में बैठा लीजिये यह नौजवान बहुत बेहतर है।
एक बार ठंडे दिमाग से सोचियेगा वोह कौन लोग हैं जो राजनितिक पार्टियों के अलावा यूनिवर्सिटी के बच्चों से भी लड़ता है।आखिर वोह बच्चों से लड़कर क्या हासिल करना चाहते हैं।और हाँ यह जो झूठे आज़ादी के नारों के इलज़ाम से उनपर हमला करते हैं, ज़रा सी शर्म बाकि हो तो सारी यूनिवर्सिटी के झगड़ो के मुद्दों को दोबारा पढ़ना।हमे सियासत सिखाने मत चले आना,एक बार खुद के दिल में झाँकना और देखना क्या ऐसे हिंदुस्तान खूबसूरत बनेगा।
मायूस और टूटे हुए दिलों की बुनयाद पर कभी कोई देश मज़बूत नही हो सकता।देश की फ़िक्र हमे हैं इसलिए हम बेचैन हैं।नौजवानों की चीखें हमे बेताब करती हैं।पता नही कौन वोह नीरो वंशज के लोग हैं जो अपने बच्चों के दिलों के हाल को समझ नही पा रहे हैं।मेरा हर उस नौजवान के सामने सर झुक जाता है जो लिखकर,लड़कर,जूझकर देश की खूबसूरती बरकरार रखने के लिए लगा है।

Monday, February 27, 2017

फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद

अगर फुर्सत मिले तो आतंकियो के नज़दीक़ जाना।उन नामों के जो तुम्हारी ज़बानों पर चढ़े हों।वोह नाम जिनसे तुम्हारे मशहूर पत्रकार वेद वैदिक जैसे लोग मिलते रहें हैं।उनकी ज़बान को सुनना की वोह आतँकी कितने बड़े राष्ट्रवादी हैं।वोह अपने देश को ओढ़ते बिछाते हैं।आतँकी अपने देश से आतँक वाली मोहब्बत तो करते हैं।

तो इतना समझ लो की ख़ाली राष्ट्रवाद की शॉल ओढ़कर कुकृत्यों पर पर्दा नही डाला जा सकता।जिस तरह आतँकी चाहे जितना बड़ा राष्ट्रवादी हो मगर इससे उसके शैतानी काम छुप नही जाते वैसे ही तुम्हारे राष्ट्रवाद की आड़ में गुनह नही छुप सकते।मैं तुम्हारी तरह पागल आशिक नही हूँ की जो हमे नही मिला उसके मुँह पर तेज़ाब डाल दिया।तुम अपने देश से ऐसे ही अब मोहब्बत करने लगे हो।

जो व्यक्ति तुम्हारी कच्ची परिभाषाओं में फिट नही बैठा तुमने उसके मुँह पर तेज़ाब डाल दिया।इससे तुम्हे क्या लगता है की तुमने उसे सज़ा दी है।तुमने अपने भारत की शक्ल पर तेज़ाब डाला है।तुम्हारी सोच इस हद तक घटिया है की दुनिया की किसी की भी बेटी का बलात्कार कर देना चाहते हो।तुम्हारे इतने घिनौने काम को भी लोग राष्ट्रवाद की आड़ में सही ठहरा रहे हैं।

मुझे हरगिज़ हैरत नही है।एक ज़माने में रोम में जब राजनीती ने धर्म को आपने मुकुट में सजाया था।तब उनके छोटे छोटे ज़मीदार भी रोम की माटी के नाम पर आम अवाम से उनका ख़ून तक मांग लेते थे।ज़मीदार घरों से बेटियां यह कहकर उठवा लेते थे की रोम को इसकी ज़रूरत है।रोम की अवाम रोम के लिए ऐसे ही पागलपन में तबतक झूमती रही जबतक उनके दिमाग में राष्ट्रवाद का व्यापार समझ नही आया।

राष्ट्रवाद की सबसे पहली चोट राष्ट्रप्रेमी को दी जाती है।यह एक खरा व्यापार है जिसमे सिर्फ लिया जाता है।यक़ीन न हो तो इस वक़्त आने वाले ज़्यादातर विज्ञापन देख लीजिये लोग टाइल्स,पान मसाला,मोटरसाइकिल,पेंट तक राष्ट्रवाद के नाम पर बेच रहें हैं।हर गलत काम को राष्ट्रवाद का लिबास पहनाकर सही साबित किया जा रहा है।हर ख़ून को राष्ट्रवाद का नाम देकर मुक्ति कहा जा रहा है।सबसे अच्छी बात तो यह की राष्ट्रवाद के नाम पर सबसे ज़्यादा उन्हें बदनाम किया जाने लगा है जिनकी पिछली पुश्ते इसी माटी के लिए तहस नहस हो गई हैं।
मुझसे राष्ट्र और राष्ट्रवाद पर बात करने से पहले देश की नागरिकों की सेवा करके आना।यहाँ उनको कोई तवज्जो नही जो राष्ट्रवाद का व्यापार करते हैं।जब देश सेवा आ जाए तब खड़े होकर कहना की यह गलत है।जब देश के नागरिकों में विभेद करना भूल जाना तब आना।मेरे सामने टिकने से पहले अपने परिवार की आँख में आँख डालकर कहना की हाँ तुम अपने परिवार के प्रति,देश के प्रति समर्पित हो।यहाँ फ़र्ज़ी बहस करके यह मत साबित करना की तुम राष्ट्रवादी हो।ऐसे तो पाकिस्तानी आतंकवादी खुद में राष्ट्रवादी हैं ही।
मेरा राष्ट्रप्रेम संविधान से मोहब्बत से शुरू होता है।हर नागरिक से बिना फ़र्क प्रेम तक जाता है।हर बेटी मुझे मेरे आँगन की बेटी लगती है।हर बेटा मुझे भाई लगता है।मेरे पूर्वज मेरे लिए पूजनीय हैं।मेरे बड़े मेरे लिए सबकुछ हैं।मैं सिर्फ उसे ही सच्चा राष्ट्रप्रेमी मानूंगा जो भारत की मूल आत्मा को छूता हो नाकी आतंकी उनके छिपे आदर्श हों।हम स्वतन्त्रता सेनानियों के घर के लोग हैं जब अंग्रेज़ों को धूल चटा सकते हैं तो यह फ़र्ज़ी राष्ट्रवादी क्या चीज़ हैं।देश के लिए कल भी जान दी थी अब भी उसकी खूबसूरती बनाए रखने के लिए काफ़ी हैं हम।यहाँ तुम्हारे फ़र्ज़ी राष्ट्रवादी सर्टिफिकेट की भी कोई ज़रूरत नही।आतँकी को अपने आप को छोड़ सब आतँकी ही नज़र आते हैं।
अभी वक़्त है देश से सच्ची मोहब्बत करना सीख लो।।सच्ची मोहब्बत।।।

Sunday, February 26, 2017

चन्द्रशेखर आज़ाद

वोह जब बचपन में बेत खाने की सज़ा पा रहा था तो सबने सोचा था की बच्चा है, डर जाएगा।नँगे जिस्म पर जब काला बेंत कत्थई निशान छोड़ता तो बड़े बड़े सिमट कर बैठ जाते,वोह तो बच्चा था।हर बेंत अपना निशान छोड़ता और हर बार उसकी ज़बान दर्द और राल के साथ मुल्क़ का नारा बुलन्द करती।यह नारा मारने वाले को बेचैन करता तो वोह और तेज़ हाथ चलाता।इस तरह उसकी सफ़ेद पीठ पर तब तक ज़ुल्म के निशान पड़ते रहे जब तक वोह बेहोश नही हो गया।
बचपन में मुल्क़ के लिए देखा ख्वाब जब उन बेंतों से नही कमज़ोर हुआ तो बाद में तो इसे बढ़ना ही था।जवानी के जोशीले दौर में उसने लपक कर अपने तरह के हर नौजवान को सहारा दिया।लोग तो उन्हें क्रांतियों से याद रखते हैं।मैं बताता हूँ उससे पहले की जाने वाली अथक मेहनत को।वोह ख़ामोशी से गाँव में निकल जाता,देखता कोई तो नौजवान हो जिसका ख़ून ज़ुल्म के खिलाफ उफान मारता हो।
वोह भूखा, प्यासा बस संगठन को मज़बूत करने के लिए पगडंडियों पर भागता रहता।कब गाँव से शहर निकल जाते पता ही नही चलता।पूरे संगठन को नैतिकता के साथ चलाए रखना भी तो उसकी ही आर्ट थी।नौजवानों के जोश को एक दिशा देना भी तो उसे ही बखूबी आता था।लोग उसके खूबसूरत और जोशीले शरीर और हावभाव से आकर्षित होकर इकट्ठे होते रहे।गंगा यमुना के किनारों पर उसकी बुनी शख्सियतें अंग्रेज़ों को लगाम लगाने को काफी थीं।
मैं बात कर रहा हूँ चन्द्र शेखर आज़ाद की।उस आज़ाद की जो आज के ही दिन शहीद हुआ।जो किसी भी हाल में अँगरेज़ की कैद से बेहतर मौत को समझता था।जिसके सीने में इतना कुछ दबा था की आज़ादी के आंदोलन को कुचला जा सके।जिसके पास नरम गरम सब तरह के लीडरों के अथाह राज़ थे।उसे पता था यह सब अंग्रेज़ों के हाथ लगने से पहले खत्म होने होंगे।
उसे पता था की कहीं उसे इतना ज़ुल्म न दिया जाए की उसकी तक़लीफ़ को देख कोई उसका साथी टूट जाए और राज़ बाहर आ जाए।वोह इतना संवेदनशील था की अपने मामूली से मामूली साथी के लिए दुश्मन पर झपट पड़ता था।मैं कहता हूँ आज़ाद को वैसे मत पढ़ो जैसे लिखा गया है।उनकी संगठन क्षमता,लड़ने के तरीकों और साथियों के लिए सहारा बनने की कला को देखो।ऊपर से आज़ाद की सबको साथ लेकर चलने की खूबी को कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।
हो सके तो आज शहादत के दिन आज़ाद की एक वोह ही खूबी अपना लो जो मुल्क़ के लिए ज़रूरी है।आज़ाद की माटी और माटी के हर तरह के लोगों के लिए जो मोहब्बत थी वोह बेमिसाल थी।औरतों के लिए जो इज़्ज़त थी,उसका कोई जवाब नही।वोह चीखते नही थे बल्कि करते थे।जो भी देश के लोगों में फ़र्क करेगा वोह आज़ाद के रास्ते का तो है ही नही।एक बार पलट कर देखना की इस माटी को किसने किसने सींचा है।किसके ख़ून से इसकी बुनयाद मज़बूत हुई है।आज़ाद को सलाम या नमन से पहले मुल्क़ के हर नागरिक की इज़्ज़त और मोहब्बत को दिल में पैबस्त कर लेना,आज़ाद खुद बखुद आपको देख लेंगे।

Saturday, February 25, 2017

दूर की ढोल

"दूर के ढोल सुहावने होते हैं।"रट रट कर यह मुहावरे दिमाग में बैठाए।इनका अर्थ बचपन में इतना लगता था की अगर ढोल करीब बजने लगे तो कान फट जाएँगे,थोड़ा दूर बजे तो ढोल का मज़ा आएगा।बस यही अर्थ बचपन भर ढोया।
अब जाकर यह मुहावरा दिल ओ दिमाग में पैबस्त हुआ।जब दूर से एक नामचीन हस्ती को देखा।उनकी चमक देखी।दिल में आया काश इनसे मिल पाता।वोह मौका भी आया,हम मिले।हमारे लिए किसी ख्वाब से कम नही था उनसे मिलना।फिर नज़दीकियां बढ़ी,तब उनके दिल में सड़ रहे गोश्त से उठने वाली बदबू ने नाक को बेचैन कर दिया।इतनी गन्दी ज़हेनियत,यह हैं मेरी पसन्द।मैं दूर भागा।
यह करते करते सैकड़ों मशहूर हस्तियों के पास पहुँचा और उनके पास से होने वाले तेज़ शोर से भागता रहा।तब जाकर यह मुहावरा दिल ओ दिमाग में छाया की वाक़ई दूर के ढोल सुहावने होते हैं।इनके नज़दीक़ मत जाओ वरना ढोल से चिढ़न पैदा हो जाएगी।
कभी कभी दूसरा मुहावरा "ढोल के अंदर पोल" भी इनमे सही साबित होता है।आप उन शख्सियतों के जब करीब जाकर देखते हैं की यह तो सिर्फ मढ़ा हुआ है अंदर से ख़ाली है तब भी अफसोस होता है।हम बहुत बार सदियों पहले गढ़े मुहावरे हमेशा ज़िन्दगी में जीते रहते हैं।

इतना समझ लें,जिसे आप दूर से देखकर बेचैन हो उठते हैं।उसके नज़दीक़ मत जाइये।दूर से आपको भी ख़ुशी मिलेगी और उसको भी कोई तक़लीफ़ नही होगी।किसी के इतना नज़दीक़ भी मत जाए की उसकी बदबू नाक तक आने लगे।इन्हें दूर से देखिये,दूर से यह ध्रुव तारे नज़र आते हैं, करीब से सिर्फ यह चूने का ढेला भर हैं।इसलिए दोस्त किसी की कुछ चमक से बेचैन मत होना।अगर बेचैन होना तो करीब पहुँचकर अँधेरा देख अफसोस न करना।नाक पर रुमाल रखकर उस शख्सियत को बर्दाश्त कर लेना।बेचारे इंसान ही तो हैं।हाँ मगर ऊपर वाला मुहावरा गढ़ने वाले अंजान दार्शनिक को एक मुस्कान दे देना की वाक़ई ढोल करीब आने पर हमने कानों में रुई लगा ली थी।

Friday, February 24, 2017

बात तो करो

मैं जब ज़ख्म पर हाथ धरता हूँ तो ज़ख्म खुद फूट पड़ते हैं।उसमे से हर तरह का दर्द बह निकलता है।उस दर्द के बहाव में चीखें आँसुओं से लथपथ बाहर आती रहती है।इन चीखों के बाद ही तो सुक़ून है।
हो सकता है आप बड़े तुर्रम खाँ न हों मगर आप सुन तो सकते ही हैं।अपने इर्द गिर्द बैठे हर उस शख्स को सुनने की कोशिश कीजिये जिसके माथे की सिलवटें आपको ठहरने को कह रही हो।उसकी आँखे आपको कुछ बताना चाह रही हों।दिल अंदर से बार बार आपको अपनी तरफ खींचने की आवाज़ कर रहा हो।
वक़्त धीरे धीरे कम होता जा रहा है फिर भी अगर किसी को सुन सको तो सुनो।उसको एक ढाँढस तो दे ही दो की कुछ हो न हो अंत तक मैं तो रहूँगा।यह इसलिए आज कह रहा हूँ क्योंकि मेरे नज़दीक़ का एक बहुत संवेदनशील साथी कुछ दिन से बुझा बुझा सा था।
मैंने तो समझकर बात कर ली और वोह एक दम से बह निकला।फूट फूट रोया और फिर कुछ हल्का होकर घर चला गया।वहाँ से थैंक्स का मैसेज किया।कल पता चला उसके घर से एक लाश निकली।दिल टूट गया।जी चाहा की उसका कॉलर पकड़ लूँ मगर क्या करता।
लाश उसकी नही उसकी बहन की थी।बहन भी कुछ डिप्रेस थी जिसे घर के किसी शख्स ने महसूस ही नही किया।यहाँ तक उस साथी ने भी नही जो खुद हफ्ता भर पहले ऐसे ही खड़ा था।
मुझसे रोते हुए उसने कहा की आपने तो इतनी दूर से मेरा दिल पढ़ लिया मगर मैं अपने पास बैठी अपनी बहन को पढ़ नही पाया।पूछ नही पाया।कुछ बता नही पाया।इसलिए कह रहा हूँ बात करो।अपने इर्द गिर्द बात करो।बिना फ़र्क बात करो ताकि ज़ख्म को फूटने का रास्ता मिले।तभी तो ज़ख्म सूखेगा और जिस्म मुस्कुराएगा।

Thursday, February 23, 2017

शिव

वो जिसने देवता क्या राक्षसो का भी ख्याल किया।सबको बराबर की मोहब्बत दी।उन सबके हिस्सों का ज़हर खुद पी लिया।वो जिनको मानने में देवता,इंसान,जानवर,राक्षस,संत सब हैं।आप सबको शिव त्रिशूल में दिखते होंगे हमे तो हर कोमल ह्रदय में शिव दिखते हैं।जिनको सबके जज़्बात का एहसास था।जो बिना किसी चालाकी के सबके अपने था।हर एक की पहुँच में थे।पाप पुण्य के ऊपर,वही तो शिव थे।
शिव की तीसरी आँख से पहले कोमल दिल को देखो।आँख तो एक झटके में दिख जाएगी मगर नीले बदन में दिल तब दिखेगा जब दिल से देखोगे।मासूमियत तब दिखेगी जब दिल शिव के लिए सच्ची मोहब्बत होगी।उनके मानने वाले ज़हर उगल सकते हैं मगर उनसे मोहब्बत करने वाले ज़हर पीते हैं।इंसानियत की ख़ुशी के लिए हम ज़हर पी ले तभी तो हम शिव के हैं और शिव हमारे हैं।
बिना फ़र्क किये सबको गले लगाए तभी तो आपमे शिव होंगे।सांप और गंगा एक ही जिस्म में बसे ऐसे विशाल ह्रदय के हैं मेंरे शिव।हाँ मेरे शिव।आप पूजिए हम तो उनसे मोहब्बत करते हैं।
मैं पलट कर देखता हूँ तो सर झुक जाता है की शिव का दिल कितना बड़ा और मासूम था।कौन नही था जो शिव तक आसानी से पहुँच जाता था,किसे आखिर शिव हासिल नही थे।उनको पाने में न कोई शर्ते,न बन्धन,न नियम वोह तो सबके हैं।नीले जिस्म में मौजूद सफ़ेद रँग सा ठहराव ऊपर से चेहरे पर दूर तक बिखरी मुस्कान अपने आप में सारा संसार लपेटे हुए।
पार्वती को अपने समक्ष बैठा कर औरत के दर्जे की हिमायत करते शिव आखिर क्यों नही दिखते।प्रकृति के हर सजीव में कोई विभेद किये बिना वोह सबके हैं।जानवर,कीड़े मकौड़े,पक्षी,मछली,इंसान सब तो शिव की चौखट तक आसानी से पहुँच सकते हैं, क्योंकि शिव आकार, लिंग,विचार सबको पार करके ही तो गले लगाते हैं।मुझे शिव से मोहब्बत।शिव को मुझसे मोहब्बत है।जहाँ मोहब्बत होगी वहाँ किसी तरह का भेद नही होगा।वही तो शिव होंगे।मोहब्बत शिव में है, शिव मोहब्बत में है।हो सके तो उनके नाम लेकर चीख़ पुकारने से अच्छा है, उनके ह्रदय के गुलाबीपन को महसूस करना।मेरे शिव बड़ी आसानी से मोहब्बत वाले दिल में उतर जाते हैं।जिस दिन तुम्हारी ज़बान से शिव या भोले,तुम्हारे ह्रदय में उतर जाएँगे वही दिन महाशिवरात्रि होगी।वही मेरे शिव का पर्व होगा,मोहब्बत का पर्व,निर्माण का पर्व,ज़हर पीकर दूसरे को ज़िन्दगी देने का पर्व,मेरे शिव का मूल यही तो है।

Wednesday, February 22, 2017

इलाज करो

कोई किसी को मार रहा है तो कोई किसी को सहारा दे रहा है।कोई अँगारे उगल रहा है तो कोई पानी लिए खड़ा है।हर तरफ एक सा माहौल।कोई आने वाले कल को एकन्गा बना देना चाहता है तो कोई उसकी सूरत खूबसूरत बनाने में लगा हुआ है।अजब हाल है।
उन तोड़ने वाले,भड़काने वाले,नफ़रत फैलाने वाले लोगों को गौर से देखना होगा।इनके बचपन में झाँकिये।यह नफ़रत के बीज वहीं कहीं दबाए गए थे।जिसे अब दरख्त की तरह हम देख रहे हैं।इनकी आँखों में झाँकिये देखिये उसमे कोई विचार की जगह सिर्फ गुस्सा दिखेगा।इनके साथ इनके बड़ो ने बचपन में कुछ तो गलत किया है।
यह जो आज समाज को जला देना चाहते हैं, इनके बचपन मे इनके साथ कुछ तो ऐसी गलत हरकत इनके संगठन,घर या मोहल्ले में हुआ है जिसकी गहरी छाप इनके दिमागों में छपी हुई है।मैं जब इनको चीखते चिल्लाते अपने से बड़ो को मारते और गाली बकते देखता हूँ,तो एक बार प्रश्न ज़रूर उठता है की इनके दिल में इतना विद्रोह क्यों।
मैं दावे से कह सकता हूँ व्यक्तिगत नुकसान उठाए बिना कोई हद दर्जे पागलपन पर नही उठ सकता है।इनके शरीर को देखा जाए तो वोह निशान ज़रूर मिलेंगे जो इनको गुस्से से भर देते हैं।इनकी आत्मा को भी मारा जाता रहा होगा।जिसकी कोर इन्हें चलाने वालों के हाथ में दबी हुई है।
हर बवाली की आत्मा या शरीर को ऐसी चोट दी गई होती है जो उसके जीवन में तो नही दिखती है मगर उनमे इतने गहरे अंदर तक दबी होती हैं की वोह नफ़रत में उबला करता है।
इनकी समस्या को पकड़िये।उसपर मरहम रखिये।आत्मा को पहुंचाई गई चोट को महसूस करिये,यह सुधर जाएँगे।मैं ने एक से एक बड़े गुंडे को अपने सामने रोते हुए देखा है।उनका रोना तब था जब उनको,वोह क्या हैं का दर्शन करा दें।इतना ख्याल रखें भीड़ कभी सुधरती नही मगर व्यक्ति के सुधरने की गुंजाईश कभी खत्म नही होती।उठिये और सुधार में लगिए।डॉक्टर बीमारी पर चर्चा ही कर सकते हैं मगर बीमारी की बुराई करते हुए वक़्त नही काट सकते।उठिये और डॉक्टर बनकर नफ़रत का इलाज शुरू कीजिये।

Tuesday, February 21, 2017

मौलाना आज़ाद

जामा मस्जिद का दरवाज़ा।एक कंधे की टेक लगाए खड़ा एक शख्स।रुंधा गला।भर्राती आवाज़...रुक जाओ मुसलमानो,तुम्हे जामा मस्जिद की मीनारे पुकार रही हैं..... एक मज़बूत आवाज़ जिसने टूटते रिश्तों,भौरोसे को रोक दिया।हर शख्स ठहर गया जो जहाँ था।।।।।।दौड़ कर अपने खड़े भाइयो को गले लगा लिया और कहा,हम जैसे भी रहे,खाना हो य न हो मगर अब तुमको नही छोड़ेंगे।इसी माटी में दफ़न होंगे।वादा।
जामा मस्जिद की दीवारें गवाह हैं की बटते हुए लोगों को उसके सहन से ही जोड़ा गया था।उसके दरवाज़े पर खड़े शख्स ने वोट की नही बल्कि दिल जोड़ने की अपील की थी।उसकी मीनारों से उस बूढ़े शख्स की टूटती हुई आवाज़ भी इंसान को रोने को मजबूर कर रही थी।
वोह लाल दीवारें देख रहीं थी कोई कैसे इतने दिलों पर राज कर सकता है।जब हर तरफ अपनो से भरोसा टूट रहा था तब उसकी आवाज़ सिर्फ आवाज़ लोगों में ऐसा भरोसा दे गई की इंसान इस माटी का होकर रह गया।

नफ़रत के जितने बोल बोल लो,यही लाल किले से अब जितना चाहे आप ज़हर उगल लें।हमारे बीच पहुंचकर आप चाहे जितना बाँट लें।आपकी भूल है, हम पानी हैं।हमे उन ईंटो से चुना गया है जिसकी बुनयाद हर तोड़ने वाले के हाथ से बहुत दूर है।यक़ीन न हो तो हमारे ख़मीर में शामिल उस शख्स को देख लो जो अपने आप में इंस्टिट्यूट था।जिसकी ज़मीन पर जितनी पकड़ थी उतनी ही कलम पर।उतनी ही ज़बान पर।तभी तो वोह दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र का सबसे पहला शिक्षामंत्री बने।उनकी रखी बुनयाद पर ही आज हम झण्डे गाड़ रहे हैं।
एक बार देखना इस मुल्क़ की बुनयाद में कौन कौन सी ईंट हैं।उनके दिल कितने बड़े थे।अपने किरदार,बातो में एक सा वज़न रखने वाले वोह मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे।आज उन्हें याद करलें।आज उनको रोज़ से ज़्यादा याद करने का दिन है।उनकी जामा मस्जिद की स्पीच को सुन लीजिये।आपके पाँव खुद बखुद नफ़रत से दूर मोहब्बत को जोड़ने बढ़ जाएँगे।

Monday, February 20, 2017

फ़ालतू लिख गए

मैं आज लिख नही पा रहा हूँ।चाहता हूँ फैलती हुई नफ़रत पर लिखूँ तो दिमाग कहता है कहाँ है नफ़रत,किसको देख कर लिखोगे नफ़रत के खिलाफ।तब मैं उनको देखता हूँ जिनसे मिला हूँ या जिनसे मिलता हूँ या कहें जिनसे रोज़ मिलता हूँ।उनमे से तो किसी में नफ़रत नही है।
फिर मैं उनपर क्यों कलम धरूँ जो दूर कहीं आग उगल रहे हैं।उनको क्यों शब्दों में बाँधू जो खुलेआम दिल तोड़ रहे हैं।मैं उन लोगों को तवज्जे ही क्यों दूँ जो हमारे बीच की मोहब्बत की खुशबू को बदबू में बदलने बैठे हुए हैं।मैं इनपर क्यों वक़्त ज़ाया करूँ।
मुझे लगता है दूर स्टेज पर चुनाव में वोट पाने के लिए लार टपकाते नेता की आग उगलती ज़बान से बेहतर है अपने साथ चलने वाले उनको लिखूँ,जिनका होना हमे ताक़त देता है।मेरे हीरो तो वोह हैं जिनके साथ मुझे सुक़ून मिलता है।क्या हम नफ़रत के इतने भूखे हैं की अपने यहाँ के तो छोड़ ही दें,पड़ोस के भी कुछ नफ़रत बाटने वालों को कालीन पर बैठा रखा है।तो क्या अब इसपर कुछ बात करके हम अपना वक़्त नही बर्बाद करेंगे।
जिन्हें वाक़ई सुक़ून चाहिए वोह दूर दुनिया की आग की तपिश को बुझा सके तो उठे वरना खुद आग उगल कर उस आग को और न बढ़ाएँ।अपने इर्द गिर्द।उन चेहरों को पहचाने जिनके होने से आपके चेहरे पर मुस्कान आती है।उन्हें पास रखें।वही आपके हीरों हैं वरना यूँ सियासी मेढक तो अँगारे छिटकाते ही रहेंगे।
मुझे अपने दोस्तों का साथ पसन्द है, बस एक यही लाइन मुझे हर लाइन की तक़लीफ़ से दूर रखती है।सियासत से इतर मोहब्बत के चबूतरे पर,दोस्ती की कुर्सी पर बैठ मुस्कुराइए बाकि इन आग उगलते लोगों को कॉमेडी शो के किरदार समझये तो तफ़रीह और आएगी।इनको सबको evm में कैद करके दोबारा ज़िन्दगी में उत्पात मचाए रखने के लिए मत याद कीजिये।लिखना नहीं था क्या क्या लिख गए।खैर मुस्कुराइए की हम अब तक नही लड़े,भरसक कोशिश के बावजूद रहीम राम को टिकाकर चाय पीते रहे....

Sunday, February 19, 2017

पायथागोरस

मैं कहता हूँ जब तुम प्योर दूध के लिए घँटों घोसी की चौखट पर बैठ सकते हो,शुद्ध घी के लिए 20 किलोमीटर दूर जा सकते हो तो खुद को शुद्ध करने के लिए थोड़ा वक़्त क्यों नही दे सकते।मैं नही कहूँगा की तुम जंगलो की ख़ाक छानो, या आसमान पर पाँव धर दो।बस अपनी पिछली किताब को दोबारा खंगालो।जिन नामो को कभी भी पढ़ा हो और वोह याद हों तो उन्हें दोबारा टटोल कर पढ़ो।
पायथागोरस प्रमेय तो याद होगी है।या याद न सही तो पायथागोरस तो नाम सुना होगा।एक बार उन्हें उनकी प्रमेय से अलग झाँक कर देखो।मैं तो हैरत में हूँ की इतने बड़े दार्शनिक को प्रमेय की पहचान में कैद कर दिया।यह देखो उसने अपने दिल में झाँक कर कैसे समाज को एक किया।कैसे एक गणितज्ञ ने दर्शन का वोह सिद्धान्त रखा की दिल गुलाबी हो गए।
पाइथोगोरस की समझ धार्मिक और वैज्ञानिक थी, उनकी नजर में विज्ञान और धर्म एक दुसरे से सम्बंधित हैं।वह आत्मा के पुनर्जन्म में विश्वास करते थे।उनका मानना था कि आत्मा जब तक सदाचारी नहीं हो जाती तब तक वह मानव, पशु या पेड़ पौधों में बार बार अवतार लेती रहती है। उनका पुनर्जन्म का विचार प्राचीन यूनानी धर्म से बहुत हद तक प्रभावित था।पायथागोरस पहले इंसान थे जिसने यह प्रस्तावित किया की विचार,प्रक्रिया और आत्मा दिल में न होकर मस्तिष्क में स्थित है।

पाइथोगोरस का एक विश्वास यह था कि जीवन का सार संख्या है। इस प्रकार से, सभी चीजों की स्थिरता ब्रह्माण्ड को बनाती है। स्वास्थ्य जैसी चीजें तत्वों के एक स्थिर अनुपात पर निर्भर करती हैं; किसी भी चीज का बहुत कम या बहुत ज्यादा होना एक असंतुलन का कारण होता है जो किसी भी जीव को अस्वस्थ बना सकता है। वे विचारों की तुलना संख्या की गणनाओं से करते थे। जब दर्शन लोक सिद्धांतों से जुड़ जाता है तो वह विश्वास बन जाता है कि जीवन के सार को संख्याओं के रूप में खोजा जा सकता है।
मैं कहता हूँ की अगर तुम्हे वाक़ई समाज में निर्माण को आगे लाना है तो पायथागोरस जैसी ईंटों को पहचानो।उन्हें पढ़ो,खोजकर पढ़ो ताकि तुम्हारे पास कोई कमी न रह जाए।मैं उन दिमागों के लिए कभी नही कुछ कहता जो भीड़ की तरह चल रहे हैं।मेरे लिए वोह अहम् हैं जिनको मुल्क़ के लिए तड़प हैं।जो देश बनाना चाहते हैं तोड़ना नही।जो दिल जोड़कर मुल्क़ की इमारतों को खुशहाल बनाना चाहते हैं।वोह सब उठो और हर उसके काम को देखो जिसने ज़ीरो से शुरआत की थी।पायथागोरस उसी में आगे आगे झण्डा लिए खड़े मिलेंगे दोस्त।