वोह आते हैं घेरकर।आपके कद को देखते हैं।अपने से एक अँगुल निकलता पाते ही इत्मिनान की साँस लेते हैं।आपके उभरे हुए सीने को देखते हैं।उम्मीद और मज़बूत हो जाती है।चेहरे पर उगी दाढ़ी और मूँछ उन्हें उनके इरादों की भनक देती है।फिर आपकी वोह आँखे जो सालों से किताबों में खोई थीं।उनकी गहराई नापते हैं।अपनी पारखी आँखों से देखते हैं की यह कितना वज़न सह सकता है।आखरी कहें या पहली कहें,वोह चीज़ होती है आपकी तनख्वाह।उसका वज़न इन्हें रिझा देता है।यह तड़प उठते हैं।
तड़प कर यह बोलते हैं आखिर शादी कब कर रहे हो।यह रिश्तेदार होते हैं।दोस्त होते हैं।पड़ोसी या कहें टांग अड़ाऊ प्रजाति।इनका काम ही है एक बाप को बताना की उनका बेटा शादी लायक है।एक माँ को बताना की उसे अब बहु की ज़रूरत है।एक बहन को बताना की फ़िक्र करो।पता नही इनको क्यों लगता है की यह बड़े क़ाबिल लोग हैं।यह लड़के के दिमाग की नस के भीतर घुसकर सूँघ लेते हैं की इसे अब शादी कर लेनी चाहिए।
मुझे शादी की ज़रूरतों पर घेरने वाले से सख्त चिढ़ है।ज़रा देर इनके साथ बैठ क्या लो की यह सर पर चढ़कर पतंग उड़ाने लगते हैं।अलानी फलानी लड़कियों का भूगोल इन्हें याद है।
कमबख्त ज़िन्दगी की किसी मुश्किल पर नही फटके।कभी गणित के मुश्किल सवालों के हल न बता सके।कभी एक भी परिभाषा समझा नही सके।कविताओं के अर्थ के वक़्त यह अनर्थ में रहे।फ्यूचर के लिए कभी रौशनी के नाम पर अगरबत्ती भी नही दिखाई।सीवी तक बनाना नही बताया।एक शहर से दूसरे शहर ख़ाक छानने में भी वोह साथ नही आए।ज़िन्दगी के चार पल क्या सुकून के आए की बिछ पड़े,शादी करलो।
आप शादी कीजिये या न कीजिये,यह फैसला सिर्फ आपका होगा।न सामाजिक दबाओ का और ना लुभावने प्रयासों का।आप ज़िन्दगी के इन पलो को दबाव में मत लें।शादी तभी कीजिये जब दिल और दिमाग तैयार हो।कुछ को लगता है ज़िन्दगी के सारे रास्ते शादी तक ही जाते हैं।उनकी सोच को हवा में उड़ाइए और ज़िन्दगी को आगे बढ़ाइये।कुदरत की बनाई दुनिया को परत दर परत देखिये।घूमिये।दिमाग को खुलने दीजिये।यह शादी करवाने वाले लोगो से तो दूर ही रहें।ऐसे बेजा लोगो को नज़रअंदाज़ कर ज़िन्दगी का लुत्फ़ लें।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, October 31, 2016
शादी शादी
Sunday, October 30, 2016
इंदिरा
तेरह साल की मामूली सी उम्र में "बाल चरखा संघ"बनाया।बचपन में ही कुछ था,जो लोगो को दिख रहा था।दिल्ली में 47 के दंगो में वोह कूद गई।गाँधी के कहने पर उसने दंगो में लोगो की ख़िदमत करना अपना मकसद बना लिया।हमसे कई बार होता है किसी की बुराई करते करते हम इतने बुरे हो जाते हैं की उसकी अच्छाइयों को भी नज़रअंदाज़ कर जाते हैं।
इंदिरा गाँधी ने सारी ज़िन्दगी काम किया।सारी ज़िन्दगी मुल्क़ के लिए जी।इंदिरा ने एक के बाद एक भारत के बाहर अपने कदम बढ़ाए।उनके कदमो से दूसरे मुल्कों में भारत की धाक पहुँची।
अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, बर्मा, चीन, नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में वोह पहुंची। उन्होंने फ्रांस, जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य, जर्मनी के संघीय गणराज्य, गुयाना, हंगरी, ईरान, इराक और इटली जैसे देशों का आधिकारिक दौरा किया।अल्जीरिया, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया बेल्जियम, ब्राजील, बुल्गारिया, कनाडा, चिली, चेकोस्लोवाकिया, बोलीविया और मिस्र जैसे बहुत से देशों का दौरा किया।वह इंडोनेशिया, जापान, जमैका, केन्या, मलेशिया, मॉरिशस, मेक्सिको, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, नाइजीरिया, ओमान, पोलैंड, रोमानिया, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, सीरिया, स्वीडन, तंजानिया, थाईलैंड,त्रिनिदाद और टोबैगो, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, अमेरिका, सोवियत संघ, उरुग्वे, वेनेजुएला, यूगोस्लाविया, जाम्बिया और जिम्बाब्वे जैसे कई यूरोपीय अमेरिकी और एशियाई देशों के दौरे पर गई।उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भी अपने कदम रखे।
यह गिनती सिर्फ इसलिए है की उस वक़्त वोह कितनी तेज़ कदम बढ़ा रही थीं।मुल्क़ के लिए जी रही थीं।कुछ कदम गलत हो सकते हैं।उसकी सज़ा उनकी ही ज़िन्दगी में उन्हें मिल गई।कुछ को लगा यह सज़ा कम है तो उनकी ज़िन्दगी ही उनसे छीन ली गई।यह नेहरू परिवार की पहली शहादत थी या कहें शहादत की नीव थी।
इंदिरा को अपने हर कदम का बखूबी अंदाज़ा था।इंदिरा ने मुल्क़ तो टूटने से बचा लिया था मगर खुद को बचाने को तनिक भी फिक्रमन्द नहीं थी।उनमे नफ़रत भी नही थी।नफ़रत अगर होती तो उनके अंगरक्षक कब के बदल जाते।इंदिरा के दामन में जो भी दाग़ हैं।उन दागो में कहीं साम्प्रदायिकता नही है।कहीं पर नफ़रत नही है।इंदिरा इन सब चीज़ों से आज़ाद थीं।इंदिरा के व्यक्तित्व पर लगातार ऊँगली भी उठी और सराहना भी हुई।आज उनकी शहादत के मौके पर हम उनकी मेहनत,जज़्बे,मोहब्बत और पूरी समर्पित ज़िन्दगी को सलाम करते हैं।
देश की सबसे सशक्त,निडर,प्रधानमन्त्री इंदिरा की बहुमुखी प्रतिभाओं और पूरी ज़िन्दगी मुल्क़ के लिए लगा देने को दिल से सलाम।
Saturday, October 29, 2016
दीपोत्सव
ज़मीन बेचैन थी।यह बेचैनी एक दिन की नही थी।बहुत से सालों की थी।लोगों के दिल धड़क रहे थे,कभी तेज़ तो कभी धीरे।घर घर से खुशबूदार खानों की वजह से पूरा इलाका महका हुआ था।बच्चे ख़ुशी में खेल रहे थे,उन्हें खुशियो की वजह नही पता थी।औरते रह रहकर गा रहीं थीं।उनके गानों में खनक थी।आदमी धान की फसलों के संग ठहाकों में थे।
मेरे राम अयोध्या की माटी पर पाँव रखने जा रहे थे।सरयू में उथल पुथल थी।आज सरयू खुद घी का दिया बनने को तड़प रही थी।अयोध्या की माटी का लाल आज लौट रहा था।वही लाल जिसने माटी की लाज रखी थी।जिसने माँ जैसे अल्फ़ाज़ को इज़्ज़त बख्शी थी।
मेरे लिए दीपावली लक्षमी का आना नही है।मेरे लिए मेरे राम का आना दीपावली है।मर्यादा पुरुषोत्तम राम का आना दीपावली है।माँ के कहने पर फ़रमाबरदारी से चौदह साल काँटों भरे जंगलो में ज़िन्दगी के अहम् हिस्से को गुज़ारने वाले का वापिस आना ही दीपावली है।माँ चाहे सगी हो या सौतेली,मगर माँ शब्द को अहमियत देने का पर्व दीपावली है।
मुझे पता है मेरे राम दीपो में तो होंगे मगर लोगों की लक्ष्मी की चाहत के आगे कमज़ोर होंगे।
मेरे राम के तलवों में लगे काँटे पर जब अयोध्या की माटी लगेगी आज,वोह छण मेरे लिए दीपावली है।मेरे राम के चेहरे पर जँगल की उतरी थकान को जब सरयू धोएगी,वोह है दीपावली।जब मेरे राम को उसका भाई गले से लगाकर ज़ार ज़ार रोएगा,तो वोह है दीपावली।मेरे राम का,हाँ मेरे का होना ही दीपावली है।सिर्फ यही एक वजह ही है की आज मेरी दीपावली है।आज मैं राम के संग अयोध्या की दहलीज़ को महसूस कर रहा हूँ।मेरी यही दीपावली है।दीपावली मुबारक उनको जिनके दिलों,किरदारों,ज़िन्दगी,ज़हन में हैं मेरे राम।
Friday, October 28, 2016
अब बस
जी चाहता है इन अखबारों को फाड़ दूँ।नोच लूँ इनमे से खबरें।हर लफ़्ज़ को रेज़ा रेज़ा करके बिखेर दूँ।तब भी चैन नही आएगा।मालूम है कुछ भी कर लूँ,भरे दिल को बहने का रास्ता नही मिलेगा।
जब पढ़ता हूँ की हमारा एक जवान शहीद हुआ।तो यह लफ़्ज़ कलेजा फाड़ देते हैं।दिमाग उस जवान की जगह पूरे परिवार तक दौड़ जाता है।मैं सोच नही पाता की किसी भी जवान का यूँ जाना कितना ज़रूरी है।क्यों ऐसा नही हो सकता की उसकी ज़िन्दगी का मोल समझा जाए।क्यों सरहद पर वोह सिर्फ शहादत का इंतज़ार करें।
एक के बाद एक गिनते गिनते भी सैकड़ा पार हो गया।कोई क्यों नही जवाब देता।हमे अपने सैनिक के बदले दस सर नही चाहिए।उन दस सरों का आचार डालेंगे क्या।हमे हमारे सैनिकों की ज़िन्दगी चाहिए।हमे हमारे जवानो की ज़िन्दगी चाहिए।हमे शहादत का तमगा नही बल्कि हमारी आपकी तरह बूढ़ा होता हुआ सैनिक चाहिए।मौत का दर्द,किसी भी तमगे या कोई भी बात से कम नही हो सकता।कोई भी ईनाम टूटी चूड़ियों की जगह नही ले सकता।कोई भी हाथ बाप का हाथ नही बन सकता।इसलिए कह रहे हैं, उन्हें यूँहीं मत शहीद होने दें।
जहाँ सबकुछ महंगा है,आप सफाई,गंगा के लिए टैक्स तो लगा रहे हैं।इन सबसे बाहर निकालिये।सेना की सुरक्षा के लिए कुछ कीजिये,कोई बोलेगा भी नही इसपर।हम हर चीज़ में सब्र कर सकते हैं मगर सैनिको की शहादत देखि नही जाती।आप पाकिस्तान को मुहतोड़ जवाब दीजिये,मगर उस जवाब में शहादत हमारे हिस्से कम ही आए।यह आश्वस्त कीजिये की जवाब के बाद भी हमारे घरों में चूड़ियाँ न टूटे।सबक ऐसा सिखाइये की बाद तक हमारे बच्चों के सरों से साया न हटे।
रोज़ रोज़ शहादत हमे कमज़ोर करेगी।घर घर से उठने वाली सिसकियाँ दूसरों को सेना में जाने से रोकेंगी।उतावले होकर इन लफ़्ज़ों पर चीखियेगा नहीं।सोचिये,गम्भीरता से सोचिये,की हमारे लिए एक जवान कितना अहम् है।उसकी ज़िन्दगी कितनी अहम् है।उसका होना कितना अहम् है।बस सबकुछ छोड़कर उनकी ज़िंदगियों की हिफाज़त कीजिये।ताकि सिसकियाँ मुल्क़ के अंदर दाखिल न हों।मेरे सैनिक मेरी इज़्ज़त और हिम्मत हैं।अपनी इज़्ज़त और हिम्मत की हिफाज़त हम सबके लिए ज़रूरी है।अब और शहादत हमारे हिस्से में न आए।बस।
Thursday, October 27, 2016
डर के आगे और डर है।
कुछ लोग सुबह से शाम तक सिर्फ डर बेच रहे हैं।उनकी दुकान में सिर्फ और सिर्फ डर है।यह डर कहीं न कहीं लोगों को कमज़ोर कर रहा है।
एक मुँह बोले एक्टिविस्ट थे,उन्होंने बोलना शुरू किया "साथियों,वक़्त बेहद बुरा है।हर तरफ अँधेरा है।आप समझ नही रहे हैं किस किस तरह की ताक़तें हमारे वजूद को खत्म करने पर तुली हैं और नही तो क्या क्या..."
अब इन्हें कौन बताए की यह तो आम सी बात है।सबको पता है की आने वाला वक़्त सही लोगों के लिए कठिन है।आने वाला क्या,हर दौर में सही लोगों को ही परेशान किया गया है।न हो तो इतिहास की किताबों को छान मारो।सुनिए एक एक्टिविस्ट को ख़ाली डर का पहाड़ नही खड़ा करना होता है।वोह सिर्फ आगाह करके फौरन रास्ते सुझाने और बनाने में लगता है।
एक एक्टिविस्ट लोगो को मज़बूत करता है।उन्हें हौसला देता है।उन्हें उम्मीद देता है।उनमे मौजूद मायूसी को खुद पीकर,उन्हें मुस्कान देता है।तभी तो वोह एक्टिविस्ट है।अब बताइये कोई इनसे कमज़ोर इंसान मिलकर जाए,तो वोह और डर जाए,घबरा जाए,टूट जाए,तो इनकी एक्टिविज्म का क्या फायदा।हाँ अगर इनसे मिलने के बाद उसे मज़बूती मिले,हिम्मत मिले,लड़ने की ताक़त मिले तब तो एक्टिविज्म को सलाम।मुझे पता है बहुत बड़ी तादात में एक्टिविस्ट बहुत बढ़िया काम कर रहे हैं।मगर मैं मुखातिब उनसे हूँ जो सिर्फ़ डरा रहे हैं।
मेरे एक्टिविस्ट साथियों जितना चाहे मेरी बातों को काटिये मगर इतना ख्याल रखिये की आपसे दूसरों को हिम्मत मिले नाकी डर।डर बेचना तो दूसरों का काम है।आपका काम डर को खत्म करना है।उठिये आपमें बहुत सी अच्छाइयाँ हैं, तभी आपने एक्टिविज्म को अपनाया है।आप लोगो को ताक़त दें।उन्हें रास्ते सुझाएँ।उन्हें बताएँ की वक़्त बुरा नही है हिम्मत से काम लें।हर शाम दोपहर के बाद शाम आएगी।वोह शाम ठण्डी ठण्डी हवा के झोखे से दोपहर की सारी तपिश का गुरूर तोड़ देगी।तुम हिम्मत और मुस्कुराहट के साथ इस भरी दोपहर का मुकाबला करो।तुम्हारी मुस्कुराहट ही सूरज को चिढ़ा देगी।यक़ीन मानो तुम्हारे तपिश से सूखे होंटो पर शाम की नरमी ज़रूर आएगी।
ऐ एक्टिविस्ट साथियों।डर को रोको।डर को खत्म करो।डर को मिटाने में लगो।यही तुम्हारा,हमारा,एक्टिविज्म का फ़र्ज़ है।
Wednesday, October 26, 2016
मज़हब नमक है
मज़हब नमक है।नमक अगर कम होगा तो नुकसान तो नही होगा,मगर आप फीके फीके लगेंगे।हाँ अगर यह ज़्यादा हो गया,तो यक़ीनन यह बदमज़ा हो जाएगा।दूसरी बीमारियाँ पैदा करेगा।आपको बिलकुल गला देगा।
मज़हब उतना ही अच्छा है, जितने से स्वाद आए।जितने से जिस्म की ज़रूरते पूरी हो सकें, बस।ज़्यादा तो पागलपन ही पैदा करेगा।आपको तो खत्म करेगा ही साथ ही दूसरों को भी गला देगा।
मज़हब नमक है से मतलब है की मज़हब ज़रूरी भी है।बिना इसके आप फीके हैं।आपमें अगर यह नही है तो बहुत से एहसास भी नही पैदा होंगे।बहुत से दूसरों के दर्द को आप पहचान भी नही सकेंगे।
नमक थोड़ा कम या ज़्यादा भी चल सकता है।मगर जब यह ज़रूरत से भी कम या ज़्यादा हो जाएगा तो नुकसान ही करेगा।अब यह मत पूछियेगा की यह ज़रूरत भर कितना होता है।अगर दिमाग के सारे हिस्से काम कर रहे हों,तो यह समझना आसान हो जाएगा की कितना मज़हब फायदेमंद हैं और कितना नुकसानदेह।
वैसे भी हर मज़हब के मूल कर्तव्य या फ़र्ज़ को देखेंगे,तो आपको लग जाएगा की वाक़ई यह नमक भर हैं।उसके बाद जुड़ी ज़्यादतर चीज़ें ही उसकी लिमिट को बढ़ा रही हैं।मैं कभी नही कहूँगा की तुम मज़हब छोड़कर यूँ ही भटको।मैं कभी नही कहूँगा की तुम नास्तिक बनों,नास्तिक कहना और होना में बड़ा अन्तर है,होने में बड़ी साधना है।शरीर की साधना।शरीर जिनसे सम्भलता नही,वोह नास्तिकता का झण्डा लिए खड़े हैं, उनके जैसा बनने को कभी नही कहेंगे।
अगर आप नमक भर मज़हब रखेंगे,तो यक़ीन जानिए आपमें मौजूद हर चीज़ का स्वाद आएगा।हर खूबी निखरेगी।हर खुशबू महकेगी।मगर जब यह ज़्यादा होगा तो सारी खूबियाँ नमक की भेट चढ़ जाएँगी।
मैं बता दूँ,नमक का काम सिर्फ इतना है की दूसरी खूबियों, अच्छाइयों को निकाल कर बाहर लाना।अपने जिस्म को देखिये।रूह को महसूस कीजिये और उसकी ज़रूरत भर नमक उसे दीजिये।यक़ीनन आपका जिस्म और आप बेमिसाल हैं।
Tuesday, October 25, 2016
नुचा हुआ पैर
सड़क किनारे एक पैर पड़ा।नुचा हुआ इंसान का पैर।अंगूठा फूला हुआ ।नुचे हुए पैर में हिफाज़त का काला डोरा बंधा है।कच्चे धागे का डोरा है अगर पक्का होता तो यह पैर पड़ा नही बल्कि चल रहा होता।थोड़ा करीब जाने पर किनारे नाले में पूरा जिस्म दिखा।एक पैर शायद इंसान के लाश बनने की जल्दी में सड़क पर रह गया होगा।
पेट फूला हुआ ।इतना फूला की उसपर कव्वे आराम से चहलकदमी कर रहेे।उन्हें उसपर उचकने में मज़ा आ रहा है ।उचकते में उसकी बदन पर पड़ी चेकदार मैली शर्ट का बटन कव्वे के पैरों में बार बार फंस रहा।जब भी कोई कव्वे का पैर फंसता वोह शोर करता,उसके साथ सारे शोर करते और इस शोर में उसकी लाश की आवाज़,हाँ लाश की आवाज़ दब जा रही है।
करीब से देखा तो सर पानी में डूबा हुआ।नाक के ऊपर काई की हरी हरी परत ।पेट पर कुछ काले काले लाठियो के निशान हैं।लाठियों नहीं, शायद मोटे केबल के निशान होंगे,क्योकि वोह पौने चाँद की तरह उभरे हैं।सांवलेपन में भी उभरे चाँद पर जमी ख़ून की बूँद साफ़ नज़र आ रही हैं।बायाँ हाथ कुचला हुआ लगा।कुचली हुई हथेली और दूर पड़े पैर से कोई भी बता सकता है, खींचतान में पैर ने हार मान ली होगी।
बदन को पैर ने पहले छोड़ दिया।कँधे को देखकर लग रहा है की उसे खींच कर यहाँ फेका गया है।बगल में ही धान के खूबसूरत खेत में धान लहरा रहा है।फूले पेट में उगे बालों से लग रहा था की उम्र करीब पच्चीस छब्बीस रही होगा।दाएँ हाथ में रस्सी फंसी हुई है।रस्सी की मज़बूत पकड़ से कलाई से ख़ून टपक टपक के जम चुका है।लगा,जैसे अभी कोई उससे जानवर छीनकर गया हो।लगा जैसे जाते जाते वोह जानवर हो गया हो।लड़के की लाश पड़ी हुई है।गाय धान चर रहीं हैं।जानवरों का झुँड अपना काम करके पिछली रात ही जा चुका।
किसी को नही पता की लड़का कौन है।यह धान चरती गायों का मालिक कौन है।मगर सबको पता है की वोह जानवरों का झुँड कौन है।किस घर से है।हाँ,बहुत बार जानवर घरों में ही होते हैं।ऐसा जानवर जो शिकार तो करता है मगर खाता नही।ऐसा जानवर जो ख़ून तो बहाता है मगर पीता नहीं।उस जानवर को गलतफहमी हो जाती है की वोह इंसान है।तभी तो शिकार को खाता पीता नही है।
Monday, October 24, 2016
वाद
यह जो वाद है न यही सारे विवाद की जड़ है।जो जिस वाद का झण्डा लिए चिल्ला रहा है, उसमे उसी वाद की सबसे ज़्यादा कमी है।इनको लगता है की मेरा ही वाद सबसे बढ़िया है,बाकि तो जाहिल हैं।दूसरों को लगता है की उनका वाद बेहतर है, बाकि सब बुरे हैं।यही सोच इन्हें लड़ाए हुए है।
कोई भी वाद उतनी ही देर तक अच्छा है जबतक वोह किसी दूसरे को नुकसान नही पहुँचा रहा है।जैसे ही वाद के तलवों में ख़ून की चिपचिपाहट लगे,समझ लो यह वाद सड़ना शुरू हो चुका है।उससे पीछा छुड़ा लो।किसी भी वाद के इतने गुलाम न बनों, की तुम्हारा अपना दिमाग,तुम्हारा ही न रहे।वोह किसी वाद की गठरी बन न रह जाए।
थोड़ा सा अपने दिमाग की तहें खोलो।उसमे लगे ज़ंग को खुरचो।साफ़ करो।तब देखो अपनी नज़र से।मेरी मानो यह वाद कुछ वक़्त के बाद ज़ंग में बदल जाते हैं।दिमाग की नसों को सड़ा देते हैं।इनको समझो और अपने दिमाग को रफ्तार देकर बस आगे बढ़ो।आजकी मुश्किलें सुलझाओ।कल की मुस्कुराहट के बीज आज बो।अपने दिमाग को समझो।उसमे सबकुछ है।वोह सम्पूर्ण है, बस ठहर कर उसको देखो।अपने दिमाग पर बारीक़ निगह रखो।सब रास्ते खुद बखुद दिखने लगेंगे।
यहाँ मैंने हर बार वाद लिखा है, अपनी नफ़रत या मोहब्बत के हिसाब से उसके आगे जो भी सोच को जोड़ लें,बात सबके लिए समान ही है।
Sunday, October 23, 2016
अवसान
लखनऊ में चार दिन के बाद वोह कानपूर चले गए।लखनऊ के यह चार दिन बहुत अहम् थे।कानपूर में भी लोगो से मिलने का सिलसिला चलता रहा।उन्हें तक़लीफ़ थी,मगर काम बहुत बाकि थे।24 अक्टूबर यानि आजकी सुबह कानपूर से वोह दिल्ली आ गए।घर पर डा. ने बीपी चेक किया।बीपी ज़बरदस्त बढ़ा हुआ।
डॉ ने किसी भी हाल में दो महीने बिलकुल आराम को कहा,मगर उन्हें कहाँ परवाह।एक के बाद एक इंतज़ार करने वाले हर एक से मिलते रहे।ठहाकों में डॉ को यहाँ तक कह दिया की तुम लोग डराने वाले लोग हो।मैं इन झमेलों में फसने वाला नही।शाम को दिल्ली में उनकी जनसभा थी।लाखों की भीड़,डॉ के लाख मना करने पर भी उन्होंने अवाम का दिल तोड़ना गवारा न किया।वोह वहाँ गए। वोह तेज़ी से माईक की तरफ बढ़ रहे थे।चेहरा सुर्ख़ था,पसीना लगतार आ रहा था।आज वोह इकट्ठा लाखों की भीड़ के सामने दिल की हर परते खोल देना चाहते थे।दिल था की रुक रुक के साथ चल रहा था।
स्टेज पर पहुँचते ही "रफ़ी क़िदवई,ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद" के नारे गूँजने लगे।उन्होंने बोलना शुरू किया।उनके पहले लफ़्ज़ के साथ ही एक ख़ामोशी दौड़ गई।काँग्रेस के सात सालों के कामो को बताने की झड़ी लगा दी।भीड़ जोश में थी।रफ़ी अहमद का चेहरा सुर्ख़ हो रहा था।करीब सात मिनट बोलने के बाद वोह वहीं गिर पड़े।फौरन ही उन्हें हॉस्पिटल ले जाया जाने लगा।मगर उन्होंने घर चलने का इशारा किया।घर तक रफ़ी अहमद क़िदवई नही पहुँचे बल्कि उनका जिस्म ही पहुँचा।
हर एक खामोश था की सुबह तक इतना ज़िंदादिल इंसान कहाँ चला गया।वोह जो सिर्फ मुल्क़ के लिए जीता वोह कहाँ चला गया।लखनऊ खामोश था की उसमे बिताए वोह चार दिन आखरी थे।रफ़ी अहमद क़िदवई के शरीर को मसौली तक लाने की ज़िम्मेदारी लाल बहादुर शास्त्री की थी।हर स्टेशन पर जुटती भीड़ को सम्बोधित करते हुए वोह टूट रहे थे।वोह रोते और कहते भीड़ नही मान रही है रफ़ी साहब।।रफ़ी आप उठो,आपको लोग देखना चाहते हैं।उठो लोग आपको ही सुनना चाहते हैं।यह लाखों का मजमा रफ़ी अहमद क़िदवई को महसूस करना चाहता है।हर तरफ नम आँखे और अनगिनत सर बता रहे थे की आज कौन ख़ामोशी से अपना सफ़र पूरा कर चुका है।
आपको कभी नही भूलेंगे रफ़ी अहमद क़िदवई,कभी नही,कभी नही।
Friday, October 21, 2016
पढ़ो
देखो आगाह कर रहा हूँ।समझ लो।जब तुममे से किसी को लगने लग जाए की पढ़ाई से बेहतर कमाई है।पढ़ने से बेहतर काम है।तो समझ जाना तुम गुलामी की आखरी सीढ़ी पर हो।
जिस सम्प्रदाय में यह बात आम हो जाए की हमे पढ़ाई से कुछ नही मिलना।हमे बच्चों को काम देना है।वोह आज तो रोटी का जुगाड़ कर लेंगे।मगर कल उनके बच्चे,बच्चों के बच्चे,पढ़े लिखे सम्प्रदाय के शौचालय साफ़ करते मिलेंगे।यक़ीन न हो तो गर्दन घुमा कर देख लो।जो पीछे पाखानो में कोई दूसरे का टॉयलेट साफ़ कर रहा है,वही तुम्हारा आने वाला कल होगा,अगर तुमने किताबो से दूरी बना ली।ऐसे काम करवा कर तुम्हारी आत्मा।को मारा जाएगा।आत्मा अगर जीवित रह सकती है तो सिर्फ एक चीज़ से,वोह है।पढ़ाई।
मैं नही कहता की तुम पँचर मत जोड़ो।बिलकुल जोड़ो,मगर पढ़कर।तुम झाड़ू लगाओ,मगर पढ़कर।यह पढ़ाई सिर्फ इसलिए है ताकि तुम दिमाग से गुलाम मत बन पाओ।जब कभी कोई ठण्डी हवा का झोखा आए तो तुम उसे महसूस कर पाओ।कोई कभी तुम्हे उठाना चाहे,तो तुम्हारी रीढ़ मौजूद रहे,उठने के लिए।
हाँ मेरे दोस्त,यह पढ़ाई तुम्हारे जिस्म में रीढ़ की हड्डी की तरह है।इसे मज़बूत करो।हफ्ते में तीन दिन खाना खाओ मगर पढ़ो।यह झूठ है की भूखे पेट भजन नहीं होता।
भूखे पेट भजन हो सकता है।किया गया है।लोगो ने किया है।किसी बहकावे में मत आना खुद पढ़ो,बच्चों को पढ़ाओ।अगर थोड़ी हैसियत है तो अच्छे स्कूल में भेजो।ताकि बच्चों को हौसला आए।
जब तुम सब पढ़ लिख जाओगे।तभी तो उभरी हुई कमियों को ठीक कर पाओगे।तभी तो मुस्कुराओगे।तुम्हारी मुस्कान ही तो भारत है।भारत को हमेशा आगे बढ़ाने के लिए पढ़ो।
Wednesday, October 19, 2016
वहशी
आओ तुम्हे हम गर्भ फाड़ना सिखाएँ।यह बड़ी कमाल की विधा है।आने वाले दौर में जिन्हें यह आता होगा,वोह अखबारो के पहले पन्ने पर जगह पाएँगे।वोह सियासत के शिखर पर पहुँचेंगे।इसमें भविष्य सिर्फ यहीं नही है।समन्दर पार तो इसमें सुनहरा कल है।काले झण्डे थामे जब तुम पेट फाड़कर गर्भ निकालोगे तो वोह रोमांचक वीडियो करोणों लाईक बटोरेंगा यूट्यूब पर।
हाँ तो सबसे पहला काम अपने दिल को काली चादर से ढक दो।दिल बेईमान है ,हो सकता है मौके पर लरज़ जाए,और तुम अपनी कला का प्रदर्शन ना कर पाओ।दिमाग की सुनना, वोह बड़ा शातिर है।हर माहौल में ढल जाता है।हाँ दूसरी बात घर से निकलते वक़्त अपनी सारी डिग्री विग्री को आग लगा देना,यह कोई काम की नही हैं।एक बार पलट कर देखना की तुम किस तरह के घर से हो,उसके ठीक विपरीत वाली गर्भवति महिला का पेट फाड़ना है।तो हाँ महिला के ठीक विपरीत धर्म का हथियार उठाना।याद रखना उसकी नोक बहुत तेज़ हो।
एक बार अपनी माँ या बहन या बीबी को ज़रूर देख लेना।ताकि जब तुम तलवार या त्रिशूल की नोक पर गर्भ को टांग कर विजयी मुद्रा में निकलोगे तो तुम्हारी कलाई लचके ना।भीड़ को देखकर ज़रा भी मत घबराना।यह तुम्हारे ही लोग हैं, जो चाहकर भी तुम्हारी तरह जिगरे वाला काम नही कर सकते।मगर यह नारे लगाकर,तुम्हारी शौर्य गाथा बड़े चाव से सुनाएँगे।यह बुज़दिल लोग हैं जो गर्भ को तलवार पर टाँगकर नही चल सकते,इसलिए यह जो जहाँ है, वही से तुम्हारा समर्थन करेगा।
तुम यक़ीन जानो अगर ईश्वर ने तुम्हारे इस काम की तुम्हे सज़ा भी दी तो ये भी मानो उतनी ही सज़ा इन नारेबाज़ो समर्थको को भी मिलेगी।ईश्वर न्याय करता है।हाँ तो एक बार और जब तुम यह करने चलना तो घर में पले जानवर या सड़क पर मिलने वाले जानवरों से आँख मत मिलाना,उन्हें शर्म आ जाएगी।तुम दिल में नफ़रत की अंगेठी को दहकने देना।जब तुम नफ़रत में होंगे तो तुम वोह सब कर जाओगे,जो तुम शैतानियत में सोचते हो।तुम्हे इंसान कीट पतंगे नज़र आएँगे।तुम बस इंसान मत बनना वरना यह काम कर नही पाओगे।
मेरी सुनो रास्ते दो हैं।या तो गर्भ को तलवार त्रिशूल की नोक पर टाँग कर जश्न मनाओ या तो हाँ या तो मोहब्बत के लिए निकल जाओ।हर आने वाले बच्चे के लिए खूबसूरत दुनिया बनाओ।अपने बच्चों के लिए ख़ून से सनी ज़मीन मत बनाओं।जितना हो सके सम्प्रदायिक,खूनी, वहशी,दँगाई से दूर रहो।वरना तलवारों और त्रिशूलों पर गर्भ लटकते लटकते कब आपका ख़ून उसमे मिल जाएगा पता भी नही चलेगा।और हाँ ईश्वर का न्याय होगा,जिसमे गर्भ टाँगने वाला और उसे टाँगे हुए को मौन समर्थन देने वाला,दोनों एक ही पलड़े पर होंगे।
यह एक मज़हब या धर्म का विषय नही है।यह हर उसका चेहरा है जो गाहे बगाहे दूसरे के ख़ून पर क़हक़हे लगाता है।आओ मोहब्बत से आगे बढ़े।आओ अपने बच्चों की खूबसूरत ज़मीन तैयार करें।आओ सब खूबसूरत और नरम बनाने के लिए बेचैन हों।