Friday, April 28, 2017

मनोविज्ञान बचपन का

हम जब छोटे होते तो सबसे ज़्यादा अपने परिवार से डरते हैं।बाहर का कुछ भी गलत मेरे परिवार को न पता चले।हमारा परिवार चाहे जिस क़दर गलती करे मगर हम उसे गलत कहने की हिम्मत बचपन में ला नही पाते।यानि कुल मिलाकर पहला डर अपने आप से होता है।स्कूल की लड़ाई घर न पहुँच जाए।स्कूल बस की मोहब्बत घर न पहुँच जाए।दोस्तों के साथ क्लास बंक करना कहीं घर वालो को न पता चल जाए।यानि हमारी शुरआत हमारे अपनों के डर से होती है।फिर हम बड़े होते हैं।नौकरी करते हैं।फिर डर की हमारी कम्पनी का डर।

हमारे ऑफिस का डर।यह बात ऑफिस में न पता चल जाए।मेरी यह दिक्कत कम्पनी में खुल न जाए।यानि यहाँ भी अपने से ही डर।अगर हम।किसी संगठन या पार्टी में हैं तो यहाँ भी डर।अपने लीडर से डर की उसे कहीं मेरी कमज़ोरी न दिख जाए।अपने लीडर की सैकड़ो कमज़ोरी पर वही ख़ामोशी जो परिवार के लिए थी।अपने कम्पनी के बॉस की कमियों पर वही पर्दा जो पहले घर के बड़ो की करतूतों पर हम डालते थे।यह हम इसलिए बता रहे हैं की हमारा मनोविज्ञान समझो।जो व्यक्ति शुरआत से डर के एक साय में रहा हो,जो की उसपर लादा भी नही गया,उसने खुद गढ़ा हो वोह हमेशा इसका बोझ उठाएगा।

वोह कभी हिम्मत करके अपने बॉस, कलीग,लीडर,संगठन,पार्टी,धर्म के विरुद्ध नही जा पाएगा।उसे हमेशा डर रहेगा की हमारे अपने नाराज़ हो सकते हैं।तो ऐसे लोगों पर ज़बरदस्ती कुछ मत लादो,इन्हें वक़्त दो,शायद अच्छा बुरा देखना आ ही जाए।वरना जैसे भीड़ में जन्म लिया है, भीड़ बनकर खत्म भी हो जाएँगे।इनमे जो अपने दिमाग से काम लेगा वोह बिरला ही होगा क्योंकि उसे अपने अंदर का बहुत कुछ पता होगा।जो अपनी कमियां जानकर नेतृत्व देता है वोह लम्बे वक़्त तक नेतृत्व करता है।बहुत बड़ी हिम्मत चाहिए गलत होते हुए देखकर अपनों से बगावत के लिए।इसके लिए पूरे बचपन से जवानी तक का ज़ोर एक झटके में लगाना पड़ता है, जो सबमें नही हो सकता।

मेरा तो सिर्फ इतना मानना भर है की जो समाज का रूप हमे आज दिखता है, वोह कहीं न कहीं हममे बहुत पहले बीज की शक्ल में डाल दिया जाता है।अब अगर जिसे आज समाज कुरूप दिखाई दे तो वोह सुंदर बनाने की क्रीम लेकर न खड़ा होए,यह क्रीम भरम है।उसे सुंदर समाज के बीज रोपने होंगे।और जिसे यह समाज सुंदर नज़र आ रहा हो वोह इसकी खूबसूरती सम्भालने में लगे,सिर्फ निहारे ही नही।जो धैर्य से आगे बढ़ेगा लम्बे समय तक वही राज करेगा वोह चाहे अच्छा हो या बुरा

Thursday, April 27, 2017

फेबियन

हैनिबॉल लड़ने में ज़बरदस्त माहिर था।रोम उसके सामने असहाय था।पन्द्रह बीस सालों तक वोह रोम की सेना में किसी बद्तर ख्वाब की तरह आता था।उससे सीधे लड़ना मौत को दावत देना था।तब रोम में एक सेनापति हुआ फेबियस।वोह लगातार लड़ता रहा हैनिबॉल से,इनके बीच कभी सीधी लड़ाई नही हुई।रोज़ रोज़ थोड़ी बहुत लड़ाई करीब दस साल चली।इन सालों में लड़ते लड़ते रोम की चमकदार संस्क्रति हैनिबॉल की सीमा में जाने लगी।लम्बे वर्षों के संघर्ष के बाद फेबियस ने जीत हासिल की और ज़मीन के एक बड़े हिस्से पर रोम का एकछत्र राज शुरू हुआ।

अब यह क़िस्सा इसलिए क्योंकि युद्ध की नीति के लिए अंग्रेजी में एक शब्द है "फेबियन"।फेबियन का अर्थ होता है ऐसी लड़ाई जिसे दो टूक फैसले तक न पहुँचने दिया जाए।यानि हल्का हल्का लड़ना धैर्य के साथ।यह नीति जितने बड़े शासन हुए हैं सबने अपनाई है।लड़ाई का उद्देश्य केवल रोके रखना,यह इस क़दर कारगर रही है की जहाँ प्रयोग की गई वहाँ उस पूरे भूभाग को अपने में मिला लेकर सम्राज्य बन गया।

फेबियस कहता था की बहुत बार मज़बूत दुश्मन से सीधे लड़ना बेवकूफी होती है।अगर हम हारेंगे भी तो धीरे धीरे,यानि हमारा शासन एकदम से नही जाएगा।खैर वोह धैर्य वाले लोग थे,तभी इतना लम्बा शासन कर पाए।अब तो जल्दबाज़ लोग हैं।एकदम से सब जीतकर सब हार जाना चाहते हैं।
राजनीती में भी फेबियन मन्त्र ही सबसे कारगर है अगर आप एकदम से सत्ता में आ गए और अक़्ल से काम नही लिया तो एकदम से चले भी जाएँगे।

वैसे हैनिबॉल जैसा क्रूर सेनापति तक हार गया तो बाकि क्या चीज़ हैं।मुझे तो लगता है फेबियन नियम घर में भी खूब फॉलो होता है।एक पत्नी धीरे धीरे पति से लड़ती है और प्रेम करती है, उसे लड़ाई और प्रेम में उलझाए रखती है फिर एक दिन विजय प्राप्त करती है।वैसे भी जो नियम किसी व्यक्ति के नाम से जुड़ जाए वोह असाधरण होता है।कारगर होता है।जल्दबाज़ लोग इसमें मीन मेख निकालें बाकि फेबियस के फेबियन को समझें।बहुत से रास्ते इसी में क़ैद हैं।जीतने के लिए पहले लड़ना सीखो।

Tuesday, April 25, 2017

चौदहवीं आशिक़ी

भूलने को तो नही कहेंगे।तुम मुझे भूलना मत।हाँ जब तुम अपने पति के गले में फूलों की माला डालना तब मेरी लम्बी गर्दन को न महसूस करने लग जाना।तुम्हारे पति की गर्दन न होने की हद तक छोटी है।लोहिया पार्क की बँसवाड़ी के नीचे जब तुम मेरे गले में चार फूल और सिर्फ धागे की माला डाल कसमे खा रही थी,उसे तो भूल ही जाना।

हाँ जब तुम उसका एटीएम लेना तो वही दिन वापिस कर देना मेरी तरह हफ्ता भर मत रखे रहना।जब तुम मेरा एटीएम नही दे रही थी तो मैं सोचता था की क्यों दो,यह सब है तो तुम्हारा ही।मेरी कमाई और किसके लिए थी।तुम उसके सामने लिखने मत बैठ जाना,एक तो बेतुकी कविता लिखोगी,ऊपर से लिखते लिखते कहीं मेरी आँखों की तारीफ़ न लिख जाना।तुम्हारी सोलह कविताओं के चालीस छंदों में मेरी भूरी आँखों कही ज़िक्र है।इसलिए कहीं लिखते लिखते उसकी काली आँखों में मेरी भूरी आँखे न मिला देना।

तुम अब उन रेस्टोरेंट में भी मत जाना जिनके वेटर तुम्हे तब तक पानी नही देते थे जब तक मैं नही आ जाता था।वोह तुम्हे तब भी पानी नही देंगे,तुम्हे पता है, इसलिए उन वेटर का इम्तेहान मत लेना,वरना फेल ही हो जाओगी जैसे रेडियो के इम्तेहान में हुई थीं।क़ाफ़ को काफ कहकर बाहर कर दी गई थीं।तब तुमने चीखकर कहा था की यह मनहूस उर्दू,तभी मैंने..खैर छोड़ो।।हाँ वोह पराग में मत जाना वरना वोह बूढ़ा वाला वेटर तुमसे ज़रूर पूछेगा की मैम आपकी और सर की आज कुल कितने लीटर चाय हो गई जबकि उसे नही पता की तुम छाछ वाले के साथ अब नाप तोल कर रही हो।

अब जुगलकिशोर ज्वेलर्स में लेकर अपने पति को न चली जाना वरना वोह फिर वोह दिल शेप वाली हीरे की अंगूठी लेकर गले पड़ जाएगा।उसे पता है तुम्हे दो सौ रिंग दिखाने से अच्छा है एक यह दिखाओ और तुम झट से बाहर निकल जाओगी।अच्छा यह बताओ वोह तुम्हारी आँख देख कैसे जान जाता था की तुम्हे न लेना एक न देना दो है सिर्फ देखे जा रही हो।मैं तो आजतक तुम्हारी आँख में ऊपर उतरे पानी के अलावा कुछ नही देख पाया।अरे उसदिन जब हम पुराना लखनऊ घूमने गए थे तब तो तुम्हारी आँख का कीचड़ घण्टे भर बाद दिखा था,मेरी कमबख्त आँखे।

तुम्हे तो कोई भी बात एक बार में समझ ही कहाँ आती थी,यह शिकायत करते करते मैं पोस्ट ग्रेजुएट हो गया मगर तब अंदाज़ा हुआ की हाँ तुम्हे मैं नही समझ पाया।तुम तो भक्ति रस ढूंढ रही थीं और मैं श्रंगार रस लिए खड़ा था।खैर जाओ और अपने पति में मुझे मत खोजने लगना।उसकी ज़्यादा तारीफ़ मत करना वरना वोह समझ जाएगा की तुम रट्टा मारकर आई हो जैसे मैं समझ जाता था।इस आखरी ख़त का जवाब मत देना वरना तुम लिखती लिखती सुभद्रा कुमारी चौहान हो जाओगी और इतना वीर रस उड़ेल दोगी की मैं कल फिर शूरवीर बनकर खैर जाओ,काहे का शूरवीर,दफ़ा हो जाओ अपना बेले वाला इतर लेकर।मुझे बेले से ही नफ़रत हो गई है।

Monday, April 24, 2017

टूटते घिरौंदे

तालाब से चिकनी मिटटी निकाल कल घर लाए।लकड़ी की खपच्चो के साथ मिलाकर घर के एक कोने में छोटा सा घिरौन्दा बनाया।बढ़िया लिपाई की फिर चूने और दूसरे रँग से घिरौंदे को रँगना शुरू किया।दिल किसी भी हाल में इसे ख्वाबों का महल बना देने पर तेज़ तेज़ धड़क रहा था।उसके छोटे से आँगन में दो चार पौधे लगाए।कपड़े के गुड़िया गुड्डे घिरौंदे में रखे।पूरा घर दियों और चमक से भर दिया।दिल इतना जल्दबाज़ की घर को सूखने से पहले ही खेलने में आमादा।फिर अड़ोस पड़ोस के बच्चों के साथ उसमे खेलना।ख़ुशी अपने सातवे आसमान पर है।

एक दिन खेला, दो दिन खेला,तीन दिन खेला, फिर।।।फिर धीरे धीरे अपने बनाए घिरौंदे से दिल भरने लगा।शुरू में उसे सजा देने की ललक ठण्डी पड़ गई।खूब खेल लेने के बाद आखिर दिल भर गया।अब क्या।।।जिसने जिसने दीवाली के वक़्त घिरौंदे बनाए होंगे वोह इसे महसूस कर सकते हैं।हफ़्ते भर के बाद हम खुद इस घर को तोड़ते हैं।शुरू में जिसे मज़े और उल्लास से बनाते हैं उसे उसी उल्लास से हफ़्ते भर बाद तोड़ भी डालते हैं।

हम इंसान ही तो हैं।एक वक़्त के बाद चीजों से दिल भर जाता है।आज़ादी के बाद हमारे नेताओ ने हमारे देश को घिरौंदे की तरह बनाया था।अपने ख्वाबो का देश।हर चीज़ यहाँ लाकर रखी।हर चीज़ बनाई।मगर एक वक़्त के बाद तो दिल भरता ही है।तो अब इससे दिल भर चुका है।जैसे घिरौन्दा तोड़ते वक़्त तालाब से निकालकर मिटटी लाने की मेहनत हमारे ख्याल में नही आती,तिनका तिनका जोड़ने की ज़िद हमारे ज़हन में नही आती उसी तरह देश को बनाने वाली मेहनत को भूलकर हम सिर्फ खत्म करने में लगे हैं।हमारा अब दिल भर चुका है।

देश निर्माण हो चुका, हम आगे बढ़ चुके अब जो पीढ़ी है वो इससे खाई अघाई हुई है।इसीलिए  वोह सब भूलकर तहस नहस करने पर तुली है।हर चीज़ को तोड़ने पर एक उल्लास का माहौल है।हर एक को खत्म करने का आयोजन चल रहा है।हमारे घिरौंदे की टूटती दीवारें उनके कहकहों में धुंधली होती जा रहीं हैं।अब हमारा हमारे घिरौंदे से दिल भर चुका है।एक बार पलट कर देखिएगा देश में क्या क्या नही बनाया गया।हर तरह की सेना,विज्ञानं की प्रयोगशाला,बॉलीवुड,
स्कूल,यूनिवर्सिटी,इसरो,बड़ी बड़ी कम्पनी सब तो आ गए।तरक्की भी हो गई तो अब तो हमारा जी भर चुका है।अब तो बस बचपन के उस खेल को ही खेल रहें हैं।जब करने को कुछ न बचे तो ऊब होने ही लगती है।

यह उबाहट ख़ून,लड़ाई झगड़े,तोड़ फोड़ से वक़्ती शांत होती है।जब तक सब खत्म नही होता तब तक यह उकताहट भी खत्म नही होती।यह मत कहना की ऐसा नही है।जिस वक़्त हर मौत का बढ़िया बहाना मिलता रहेगा,ऐसा ही होगा।हर ख़ून पर वजह का पर्दा डाल कर उसे सही कहा जाएगा,तो यक़ीनन वोह घिरौंदे को तोड़ना ही कहलाएगा।और हाँ जिस तरह घर के बड़े,समझदार बच्चे को घिरौन्दा तोड़ते रोकते नही,उन्हें याद नही दिलाते की यह गलत है, अपनी मेहनत को बर्बाद करना बेवक़ूफ़ी है वैसे ही इस वक़्त सब कुछ नष्ट करने पर आमादा हमारे नौजवानों के पीछे खड़े बुज़ुर्ग भी हैं।

लो ढहती दीवारों को देखो,मुँह पर रुमाल रख लो कहीं धूल तुम्हारे फेफड़ो में दमा न कर दे।जाओ और विनाश का मज़ा लो।जो हो रहा है सब सही है।इस वक़्त जो अपने आँगन को देख ज़रा भी परेशान है वही देशभक्त है, सिर्फ वही बाकि मदमस्त,खुश और ठहाके लगाते लोग सबको पता है किसके काम आ रहें हैं।सब कुछ एक खेल ही तो था,खेल कभी न कभी खत्म होता ही है।

Sunday, April 23, 2017

सच क्या है

एक सूफ़ी थे उनकी खुशबू हर तरफ फैल चुकी थी।एक रोज़ वह एक क़स्बे में दाख़िल हुए।वह क़स्बा बेहद तरक्कीपसंद और अक़लमन्दो का था।उस क़स्बे के सबसे काबिल शख़्स ने अपनों से वादा किया की इनका ढोंग आज यहीं खत्म होगा।रात हुई वह सूफ़ी के खेमे में पहुंचा और उनके पाँव पकड़ लिये।सूफ़ी ने उसे देखा और कहा क्यों परेशान हो।उसने कहा पीर जी बड़ी बेचैनी है,सच की तलाश की बेचैनी,ख़ुदा के सच की बेचैनी सोने नही देती।आप बताइये सच क्या है,खुदा क्या है।

पीर जी ने कहा तुम्हे नही पता ख़ुदा क्या है।जी,नही पता तभी तो आपके पास आया हूँ।पीर ने कहा जब तुम्हे नही पता तो कैसे जानोगे की सच क्या है।आप बताइये तो मैं समझ लूँगा।पीर ने कहा यह जो लालटेन लिए हो यही ख़ुदा है,यही सच है।यह कैसे हो सकता है मेरे पीर।पीर मुस्कुराये और कहा यह जो मिठाई है यही तो सच है, ख़ुदा है।वह फिर मायूस हुआ।अच्छा वह जो दूर आसमान में तारा दिख रहा है वह ही ख़ुदा है।वह माथे पर त्यौरियां दे सुर्ख़ हो गया।फिर पीर ने पोटली से एक ऐसी चीज़ निकाली जो उसने कभी नही देखी थी पहले।

पीर ने कहा यही तो ख़ुदा है,यही तो सच है।जब उसने फिर इनकार किया तब पीर ने उसके सर पर हाथ रखते हुए कहा की भटकना बन्द करो।अगर तुम्हे नही पता होता की ख़ुदा क्या है, सच क्या है तो तू कबका मेरी पहले ही बताई हुई चीज़ को सही मान लेता।तुम्हे पता है की सच क्या है।अपने काम और ज्ञान में वक़्त लगाओ।उन सवालों में मत उलझो जिनके जवाब तुम्हारे ही अंदर हैं।तुम जिसे भी सच मानते हो उसे पकड़े रहो,उससे मोहब्बत करो और उसकी खुशबू को महसूस करो।फालतू की बहसों से सिर्फ मायूसी हाथ आएगी।मेहनत करके दुनिया को खूबसूरत बनाओ मेरे दोस्त।

तुममें इतनी सलाहियत हैं की तुम लोगों की ज़िन्दगी आसान कर सकते हो लेकिन तुम गैर ज़रूरी सवालों में उलझे हो।आगे बढ़ो विज्ञान में ख़ुदा या सच मत ढूंढो पहले इस दुनिया को आसान करो,तकलीफो को दूर करो।ख़ुदा के जानने से ज़्यादा ज़रूरी है तुम बीमारिया जानो उनके इलाज में लगो।फसलों को बढ़ाओ।बच्चों की तालीम और तरक्की में लगो।वह ज़ार कतार रोता रहा वह इस बार वाक़ई सूफ़ी के पैरों में गिर पड़ा।

Friday, April 21, 2017

जँगल बचा लो

तुम्हे पता है यह जो देवनागरी लिपि है यह जँगल से निकली है।हर अक्षर को पेड़ पर लटकते जानवरों की छाया से बुना गया है।संगीत भी जँगल से निकला है।खाना,पहनना यहाँ तक तुम्हारी हर हरकत इन जंगलो से ही निकली है।हम सबको पता है इस भूमि से निकले हर धर्म की पृष्ठभूमि जँगल में बनी है मगर कोई उसे बचाना नही चाहता।जँगल में बुद्ध,राम,नानक,महावीर,कृष्ण,शिव सब रहे मगर अब कोई भी धर्म को ओढ़े इंसान इन्हें खत्म करने के लिए आलोचना नही करता।जिनके पैगम्बरों ने पौधे रोपे, उन्हें बचाने के फरमान दिए वोह दूसरे की ज़िन्दगी को उलझाने में लगे हैं, वोह भी नही उठते,नही कहते की हमारे पेड़ो जंगलो को काटना अधर्म है।हरे पेड़ को सुखा देना ज़ुल्म है।तकलीफ़ होती है जब इन जँगल को खत्म होते देखता हूँ।इन्हें कटवाने वालों को जाहिल भी नही कह सकता।एक झटके में हज़ारों पेड़ काटकर कमबख्त विकास करना चाहते हैं, झूठे।

देखते देखते बहुत से जँगल हमारे इर्द गिर्द के कहाँ गए पता नहीं।अब कोई नही खड़ा होता चिपको आंदोलन जैसा।जब सरकारें हरे हरे पेड़ो को काटकर कंक्रीट का शहर खड़ा करती हैं तब तकलीफ़ होती है।पानी को तरसेंगे हम सब इसका पुख़्ता यकीन है।मैं एक पेड़ को कटता हुआ देखता हूँ तो सोचता हूँ हमारे आने वाले बच्चों की सांसे रुक रही हैं।जिन्हें ज़रा भी फ़िक्र है वह आगे आए, उन सरकारों के दामन खींच ले जो आपके बच्चों की सांसे खत्म कर रही हैं।उनका पानी बन्द कर दे जो आपके हिस्से का पानी खत्म कर रहे हैं।अगर वह एक जँगल काँटे तो उनके घरों में इतने पेड़ लगाए की जँगल हो जाए।आइये अपने कदम खुद उठाए, जहाँ जगह दिखे पौधा रोप दे।

माँ-बाप हमे पैदा करते हैं, पालते हैं मगर यह पेड़ ही हमे ज़िंदा रखते हैं।जँगल बचाइये अगर मज़हबी फसादों से फुर्सत मिल जाए।पेड़ लगाइये अगर अपनी संस्कृति बचाए रखनी है तो।हिम्मत करके अपने नेताओं और अफसरों से पूछिये की क्या पेड़,जँगल काटना ही अंतिम विकल्प था।धर्म की रक्षा से पहले सांसो की रक्षा कीजिये।मुझे पता है इस सब्जेक्ट में मसाला नही है, मज़ा नही फिर भी बच्चों की ज़िन्दगी के लिए ध्यान दीजिये।

अर्थ डे, इनवायरमेंट डे, अलाने फलाने डे आते जाते रहेंगे मगर कुछ कारगर नही होगा अगर पेड़ लगाने और बचाने की तरफ से ध्यान हटा लिया है।हमे पता है आजकल आप दूसरे बेहद ज़रूरी मुद्दों में वक़्त दे रहे हैं।घन्टो टीवी चैनल आपको दुनिया के सबसे ज़रूरी कामो में उलझाए हैं।हर एक सरकार आपको सुधारने में लगी हुई है और आपको भी अपने से ज़्यादा पड़ोसी की ज़िन्दगी,रहन सहन,खान पान की फ़िक्र है।तो भाई जब आप इस क़दर संवेदनशील प्रजाति बन ही चुके हैं तो पड़ोस के लोगो के लिए दो चार ऑक्सीजन के ट्रांसफार्मर भी रख दीजिये।ताकि आपका पड़ोसी बढ़िया ऑक्सीजन लेकर आपका एहसानमन्द रहे है।हम आपसे अपने लिए नही कह रहे हैं क्योंकि हमे अच्छे से पता है की आपको अपनी रत्ती भर फ़िक्र नही,आपतो अगल बगल की चिंताओं में दुबले हुए जा रहें हैं।अपने लिए नही मगर दूसरे के लिए जँगल को बचाइये और बढ़ाइये।एक जँगल ही है जो सबको खाना और संरक्षण देता है।वही दे भी सकता है।

Thursday, April 20, 2017

इंसानों को सम्भाल लो

बहुत ज़बरदस्त आग लगी।पूरा घर बड़ी बड़ी लपटों में घिरा गया।आग की प्रचण्डता विकराल रूप धर कर सब कुछ जला देना चाहती है।घर के अंदर कुछ इंसानों के चीखने की आवाज़ आने लगीं।लगा की कुछ जिंदगियां दहशत में चीख़ रहीं उन्हें बचाया जा सकता है।अंदर से कुछ बच्चों के चीखने की आवाज़ें आसपास के शोर को रुलाने लगीं।कुछ नौजवान आग की परवाह किये बिना घर के तरफ बढ़े।वोह अपनी जान की क़ीमत पर उन ज़िंदगियों को बचा लेना चाहते है।

तभी एक बूढ़े ने उन्हें रोक लिया।क्या करने जा रहे हो,नौजवानों ने कहा यहाँ फंसे इंसानों को बचाने।तब बूढ़े ने घूर कर देखा और कहा,मूर्खों यह वक़्त घर बचाने का है।यह दीवारों पर पानी डालो।घर में रखा सामान जल रहा है उसे बचाओ।अंदर काँच की प्लेटें आग से चटख रहीं हैं उन्हें बचाओ।यह दो चार लोगों के चक्कर में वक़्त मत बर्बाद करो।जाओ जल्दी से घर की आग पर काबू पाओ।तभी एक नौजवान उस बूढ़े पर चढ़ उठा और सुर्ख़ आँखों से गुस्से में चीखा की इस वक़्त अंदर फंसी औरतो की ज़िन्दगी अहम् है या यह दीवारें।बच्चों को बचाना ज़रूरी है या क्रॉकरी।

तुम सठिया चुके हो कहता हुआ वोह नौजवान आग में कूद गया।धीरे धीरे सब लोग बचा लिए गए और बाद में काफी नुकसान के बाद घर में दीवारों के सिवा कुछ नही बचा जलाने को,तब आग भी शांत हो गई।
जब वोह लोग बूढ़े के सामने से गुज़रे और उसे तुच्छ नज़र से देखा तो बूढ़ा उनपर चीखा की तुम सब झूठे हो,मक्कार हो,फरेबी हो।तुम जो दिखते हो,वोह हो नही।तब उनमे से एक बूढ़े से बोला की हमने तो ज़िन्दगी बचाई,तो इसमें फ़रेब क्या है, मक्कारी क्या है।तब बूढ़ा बोला और जब बात देश की आती है तब।

तब तुम दीवारें बचाते हो ज़िंदगियों को खत्म करके।तब तुम भूगोल के चक्कर में मानवता को जल जाने देते हो।जब देश में नफ़रत की लपटे होती हैं तब तुम इंसानों की फ़िक्र करते हो भला,इसी लिए तुम मक्कार हो।उस दिन तुम्हे उन बच्चों को भुन जाने देना था,तुम्हे दीवारें बचानी चाहिए थीं।तुम इन दीवारों में बैठकर कविता लिखते।उसकी दीवारों में चिपकी बच्चों की खालें तुम्हे शब्द परोसती।तुम उसमे बिखरी हड्डियों में सुर,लय ताल ढूंढते मगर नही उस वक़्त तुम्हारे ह्रदय में छणभर के लिए ईश्वर आया और तुम्हे इंसान बना गया।

यह समझ लो इंसान हैं तो ज़मीन है।अगर इंसान नही तो ज़मीन का आचार डालो।मंगल गृह तक हो आओ अगर इंसान न मिले तो वहाँ रहते घबराओगे।जिस तरह घर में जल रहे बच्चों की चीखें सुनी थी,क्योंकि उस वक़्त तुम किसी और की नही सुन रहे थे,अपने दिल की आहट के पीछे चले गए।उसी तरह यहाँ मौजूद हर तक़लीफ़ को सुनो।ज़मीन से पहले इंसान को बचाने दौड़ना वरना बेटा बहुत बूढ़े मिलेंगे जो तुमसे सिर्फ दीवार बचवाएंगे।

Wednesday, April 19, 2017

इमाम सादिक़ ज़फ़र और कूँडे

हमारे बूढ़े किस क़दर चालाक थे,उन्हें पता था की हम किताबों का रुख नही करेंगे।हम किसी के पास कुछ सीखने भी नही जाएँगे।तो उन्होंने अपने बीच से क़ाबिल लोगों से जुड़े दिनों को त्योहारों में डाल दिया की कम से कम इसी बहाने इनका नाम तो चलता रहेगा।जब किसी को लगेगा तो इन नाम के बहाने ही सही उस किरदार को ढूंढकर पढ़ेगा और अपनी ज़िन्दगी के साथ दुनिया को बेहतर रास्ता दिखाएगा।मगर नही,हम ज़्यादा क़ाबिल थे,हमने यह चेन तोड़ दी।कहते हैं सोच में फ़र्क होने से हम अच्छे से अच्छे इंसान को ठुकरा देते हैं।अपनी रवायतों को तोड़ देते हैं।

यही हुआ मशहूर वैज्ञानिक,दार्शनिक,चिंतक और ईमाम हज़रत जाफर सादिक के साथ।बहुत से मुसलमानो ने उनको याद करने में अपनी ज़हनी कमज़ोरी को ज़्यादा तवज्जो दी।आज लोग इमाम जाफर की याद में कूँडे मनाएंगे और बहुत से लोग इसकी मुखालफत करेंगे।मगर मुखालफत में यह मत भूलें की वह क्या थे।

इमाम जाफर अल सादिक हज़रत अली की चौथी पीढी में थे।उनके वालिद इमाम मोहम्मद बाक़र खुद वैज्ञानिक थे और मदीने में अपना कॉलेज चलाते हुए सैंकडों बच्चों को पढ़ाते थे।अपने पिता के बाद जाफर अल सादिक ने यह काम संभाला और अपने शागिर्दों को कुछ ऐसी बातें बताईं जो इससे पहले किसी ने नही बताई।

उन्होंने अरस्तू की चार मूल तत्वों की थ्योरी से इनकार किया और कहा कि मुझे हैरत है कि अरस्तू ने कहा कि दुनिया में केवल चार तत्व हैं, मिटटी, पानी, आग और हवा।मिटटी खुद तत्व नहीं है बल्कि इसमें बहुत सारे तत्व हैं।इसी तरह जाफर अल सादिक ने पानी, आग और हवा को भी तत्व नहीं माना।हवा को भी तत्वों का मिश्रण माना और बताया कि इनमें से हर तत्व सांस के लिए ज़रूरी है। मेडिकल साइंस में इमाम सादिक ने बताया कि मिटटी में पाए जाने वाले सभी तत्व मानव शरीर में भी होते हैं। इनमें चार तत्व अधिक मात्रा में, आठ कम मात्रा में और आठ अन्य सूक्ष्म मात्रा में होते हैं।
उन्‍होंने बताया, "जो पत्थर तुम सामने गतिहीन देख रहे हो, उसके अन्दर बहुत तेज़ गतियाँ हो रही हैं। उसके बाद कहा, "यह पत्थर बहुत पहले द्रव अवस्था में था।आज भी अगर इस पत्थर को बहुत अधिक गर्म किया जाए तो यह द्रव अवस्था में आ जायेगा।

ऑप्टिक्स का बुनियादी सिद्धांत 'प्रकाश जब किसी वस्तु से परिवर्तित होकर आँख तक पहुँचता है तो वह वस्तु दिखाई देती है।साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि ब्रह्माण्ड में कुछ भी स्थिर नहीं है। सब कुछ गतिमान है।
ब्रह्माण्ड के बारे में एक रोचक थ्योरी उन्होंने बताई कि ब्रह्माण्ड हमेशा एक जैसी अवस्था में नहीं होता। एक समयांतराल में यह फैलता है और दूसरे समयांतराल में यह सिकुड़ता है।

उनके मशहूर शागिर्दों में जाबिर इब्ने हय्यान , इमाम अबू हनीफ, मालिक इब्न अनस थे।
अब ज़रा से भी महसूस कर सकें तो उन्हें महसूस कर लें।जिन रवायतो को आप मज़ाक बताते हैं उन्हीं ने आज उनको ज़िंदा रखा है वरना ढूंढते रहते अरबी फ़ारसी की किताबों में।कई बार रवायतें इसी लिये डाली जाती हैं की शख्सियतें और उनके काम पीढ़ी दर पीढ़ी नीचे पहुँच जाए।यह तरीके वोह नही समझेंगे जो एक झटके में सब खत्म कर देना चाहते हैं।तुम सब कीचड़ उछालना एक दूसरे पर मगर ज़रा उन घरों को देखना की तुमसे वोह लोग बेहतर हैं जो अपने हीरों को किसी भी बहाने,किसी भी तरह याद तो रखते हैं।

मैं हर धर्म के लोगों से कहता हूँ की अपने बीच से अच्छे लोगों के किस्से आम करो।हमे इमाम जाफ़र रास्ता दिखाएंगे नाकी कोई अल्लम् गल्लम् मौलाना।फिर कह रहे हैं अपने पीछे पलट कर देखो तो आजकी जहालत से पीछा छुट जाए।किसी मुद्दों पर कव्वों की तरह कांव कांव से बेहतर है विज्ञान को देखो,गणित को समझो और दुनिया की ज़िन्दगी आसान करो।आज कूँडे भरते देख मज़ाक उड़ाते वक़्त अपने गिरेहबान में झाँकना की तुम्हारे आँगन में क्या किसी सलीकेमन्द, क़ाबिल,वैज्ञानिक को ऐसे याद किया जाता है।वोह जाहिल हैं मगर अपने से क़ाबिल की इज़्ज़त करना जानते हैं।रसमन ही सही इमाम सादिक़ जाफ़र उनके घरों में साँस तो ले रहें हैं।तुम कुछ मत करो उनपर खुले सेमिनार करो,उनकी खोज पर बात करो,उनके लिखे को पढ़ो,तब आने वाली नस्लें सर उठा पाएँगी और तुम दुनिया को कुछ दे पाओगे वरना ऐसे ही ज़िन्दगी को अनाप शनाप कामों में तबाह करते रहो।