Saturday, February 29, 2020

नफरत हारेगी दोस्त

नही कहा,कुछ भी नही कहा,इंसान को इंसानियत से दूर होते देखता रहा,बेशर्म लोगों को निर्मम हत्याओं पर  हँसते हुए देखा,कुछ भी नही कहा,क्योंकि कहने से कोई लाभ नही था,करने से लाभ था । कहने और करने के फ़र्क़ को समझना होगा,जब आग लगी हो तो आग आग कहने से आग नही बुझती,बाल्टी में पानी लेकर दौड़ पड़ने से आग बुझती है ।

हमारी सबकी लापरवाही से देश इस मुहाने पर आ गया है कि हर बात केवल हिन्दू मुसलमान की नज़र से देखी जाने लगी है । देश के गुज़रते हर वक़्त को केवल हिन्दू मुसलमान की बहस में खपा दिया जा रहा है । सत्तारूढ़ दल का यह चहीता विषय है, इसलिए वह केवल हिन्दू मुसलमान के चश्मे ही बांटना चाहती है । अब जिन्हें इसे रोकना है, वह ध्यान से सुनें ।

पूरी ज़िन्दगी खप जाएगी नफरत को पाटने में,यह एक घण्टे की तकरीर से हल नही होगा,न दो चार लाख की भीड़ को इकट्ठे करने से यह मिटेगी । सबको बिना किसी का मुँह देखे,खुद के हृदय में प्रेम भरके,हर एक को मोहब्बत की तरफ लाने का प्रयत्न करना होगा । इसमे न प्रचार मिलेगा और न ही नेतागिरी चमकेगी,इसे बिना लाभ हानि के निरन्तर करना होगा । गांव गांव घर घर दिन रात एक करके जाइये,हर स्तर पर लिखिए,कहिए, करिए,लोगों में भरोसा पैदा कीजिये । जब लोग आप पर भरोसा करेंगे तब आपकी सुनेंगे भी,बिना भरोसे के कोई कान भी नही धरेगा ।

और आखरी बात बिना राजनैतिक सोच के नफरत के इस जिन्न को कभी कैद नही कर पाएँगे । नफरत का इस्तेमाल केवल सत्ता शासन और शक्ति पाने के लिए किया जाता है, यह राजनीति ही है, इसका हल भी उसी में है । नफरत के खिलाफ  खुलकर जिस राजनैतिक दल को लड़ते देखो,उसे मज़बूत करो,जो खामोश हैं, उनसे पीछा छुड़ा लो,क्योंकि अगर इन्हें तुम्हारी लाश पर वोट मिलने की सम्भावना होगी,तो यह तुम्हे लाश बनाने में पलक झपकने भर का भी वक़्त नही लेंगे ।
महीनों से गांव गांव टहल रहें, आपको बता रहें कि घरों से निकल आइए,आपके निकलने से ही नफरत खत्म होगी,प्रेम प्रचार से ही फैलेगा । नानक,बुद्ध,रसखान या गांधी कोई भी हो,उन्होंने चल चल कर ही प्रेम का वृक्ष बड़ा किया है । गुमनाम हो जाओ और जीवनभर लोगों में रहो, यह धरती प्रेम के लिए बहुत उपजाऊ है, इसके ख़मीर को पहचानो और लग जाओ, सब ठीक हो जाएगा,यकीन करो,सब ठीक हो जाएगा,हमने भयँकर दंगो में भी इंसानियत की खुशबू देखी हैं ।

Tuesday, February 11, 2020

आपकी जीत

देश की जनता को सुबह शाम कोसने वालो,जनता को कम समझदार आँकने वालों को सोचना चाहिए कि अगर ढंग का विकल्प होगा,तो साम्प्रदायिकता, हिंसा और अहंकार को वह हमेशा हराएगी,जनता बेहद समझदार है । हम लोग अपनी कमियाँ दुरुस्त करने की जगह कह देतें हैं, की लोग ही अच्छा चुनाव नही करते हैं । 

घर बैठे,थाली सजाकर जनता किसी को प्रसाद नही देने वाली । आम आदमी पार्टी की बेहतरी सधी हुई कड़ी मेहनत ने यह मैसेज दिया है कि चाहे जितना काम किया हो,उसे उससे कहीं अधिक मेहनत से जनता के कदमों में रोज़ रखना होगा,जनता इसे स्वीकार करेगी ।

हर दल और राजनैतिक व्यक्ति को इस चुनाव से सीखना होगा,काम किया है तो उसे खूब बतलाइए और आखरी दिन तक काम पर ही डटे रहिए नाकि कोई दूसरी थूनी लगाकर छप्पर रोकने का असफल प्रयास करें ।

कार्यकर्ताओं का सम्मान और उनकी ट्रेनिंग दोनों आप से सीखनी होगी,छोटी छोटी आहटों पर नज़र रखनी होगी । दो चार नमूने पालकर पार्टी उनपर छोड़कर जीत के लिए निश्चिंत हो जाना,अब नही चलेगा ।

निसंदेह दिल्ली में आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने जीतोड़ मेहनत की थी । जिसके मन मे विभाजनकारी मैल और हिंसा थी,उन्हें जनता ने मेहनत के बावजूद हरा दिया । जिनके मन में जनता के लिए प्रेम,समर्पण और भविष्य था,उनसे भी खूब मेहनत करवाकर जनता ने स्वीकार कर लिया है।

मेहनत का कोई विकल्प नही है । मेहनत का न ही कोई तोड़ है । कुछ पाने के लिए अथाह मेहनत करनी पड़ती है, बहुत से लोगों की ज़रूरत होती है, सहयोग और विश्वास की आवश्यकता होती है, साथियों से स्नेह इसका ज़रूरी हिस्सा है, इसके साथ मन अच्छा हो और भविष्य की योजनाएँ हों,तो जनता आपको स्वीकार करेगी ही करेगी । जनता बेवक़ूफ़ नही है, जो ख्वाब दिखाए,जिसके ख्वाब पर उसे भरोसा हो,वह विजय नही पाएगा तो क्या पाएगा । आम आदमी पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं,दोस्तों और सहयोगियों को खूब बधाई ।

अंतिम बात धर्म को यदि सही हाथों में धारण कर लिया जाए,तो वह विकास करता है, गलत हाथों में चला जाए,तो विनाश,धर्म गलत नही है, हाथ गलत होते हैं । धर्म को गाली मत दें,बल्कि उसके घिनौने हाथों से छीनकर परोपकारी हाथों में दे दें,तब देखें धर्म कितना लाभदायक बनता है । यह धर्म, परिश्रम,सत्य और अहिंसा की विजय है, जनता को सलाम अपनी सेवा के लिए अच्छा विकल्प चुना ।
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Monday, February 10, 2020

गार्गी की लड़कियां

अब चुनाव परिणाम ही अच्छे नहीं लगते,कोई भी जीते । एक हारे हुए समाज मे कोई विजय,कोई पराजय क्या ही प्रभाव डालेगी । एक समाज जो अन्दर से बदल रहा है या सड़ रहा है या सड़ते हुए बदल रहा है, उसपर इन परिणामों की छाँव का उल्लास या रुदन क्या ही देखा जाए ।

जेएनयू की लड़कियों से शुरू होकर जामिया की लड़कियों से होते हुए,आज़मगढ़ की औरतों पर पड़ती लाठियों के साथ गार्गी कॉलेज की लड़कियों के गिरहबान तक पहुँच चुके वहशी,प्रशिक्षित, हिंसक हाथ पर कितनी खामोशी रही है । यह निष्ठुर समाज जो मीडिया के उठाने से निर्भया के वक़्त मोमबत्तियों का ढेर उठा लेता है, वही समाज गार्गी कॉलेज पर मीडिया की खामोशी के साथ इतना खामोश है, जैसे कुछ हुआ ही न हो ,बड़ी मासूमियत से कह देगा,हमे तो पता ही नही क्या हुआ ।

अरे समाज को पहला सवाल तो यही करना चाहिए कि लड़कियों को छेड़ने और अश्लील हरकतों के करने में उनके ईष्ट के नाम के नारे लगाना, उन्हें अपमानित करना है । धर्म को घिनौना खेल बनने से अगर नही रोका और धर्म को हिंसक भीड़ का हथियार बनते हुए देखने से विचलित नही हुए तो बस ठहरे रहिए,आईएसआईएस ने जैसे बर्बादी दिखाई थी,ऐसी ही बर्बादी होगी । हम सबकी यह बातें आज भले समझ न आएँ, मगर जब समझ आएँगी, तब बर्बादी हो चुकी होगी ।

गार्गी कॉलेज की लड़कियों को दिल्ली की और सड़कें घेर लेनी चाहिए,जो समाज सड़ने लगे,उसे भला चलने की ही क्या ज़रूरत । चले तो वह,जो बढ़ना चाहे,जिसे पिछड़ना है, उसे सपाट सड़कों की क्या ही आवश्यकता है । जाओ और लड़कियों की रूह पर छपे अपने लम्पट अश्लील असभ्य क्रूर हिंसक नौजवान लड़कों के अपराधों पर पर्दे डालने का बंदोबस्त करो ।

 महाभारत में एक सभा थी,द्रोपदी सामने थी और चीरहरण हो रहा था,पूरा सिंघासन मौन था,बड़े बड़े शूरवीर खामोश थे,एक से एक ज्ञानी चुप थे,मगर आपको क्या लगता था,यह खामोशी दब जाएगी,नही द्रोपदियों की चीखें हर अहंकार के दरबार को दरकाकर तहस नहस कर देंगी,बस देखना यह है कि कौन द्रौपदी के साथ है और कौन अधर्म के साथ है । जेएनयू ,जामिया समेत गार्गी कॉलेज की हर लड़कियों के पक्ष में खड़ा व्यक्ति ही धर्म के साथ है, बाकी सब अधर्म के साथ हैं, क्योंकि वहशी व्यक्ति अधर्मी ही होता है और इसको संरक्षण देने वाला पापी ।

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Friday, February 7, 2020

किताबें

मैं अपने कपड़े उतारकर जिस्म को देखता हूँ।अपने जिस्म को गौर से देखता हूँ।मेरी खाल ज़ख्मो के निशान से नक्काशीदार चादर हुई जाती है। ख़ून बून्द बून्द बहकर,ज़ख्मो की ताज़गी का एहसास करवाता है।सफ़ेद बाज़ुओं पर सुर्ख़ निशानों से उठती भाँप पूछती है की किस काँटों के जँगल से होकर गुज़रे हो।अब कौन कहे की यह ज़ख्म काहे के हैं।
कैसे कहें यह ज़ख्म किसी जँगल के नही हैं।यह निशान काँटों के नही हैं।

यह नुची हुई खाल किसी बीहड़ के रास्ता रोकने की निशानी नही है।यह तो उन रास्तों के निशान हैं जहाँ से कल मैं गुज़रा था।जहाँ से मैं गुज़रता रहा हूँ।जहाँ से हमेशा गुज़रता रहूँगा ,भले सारी खाल जिस्म से खिंच कर निकल जाए।मगर वोह रास्ते कैसे छोड़ूँ।
मुझे किताबे ज़ख्म देती हैं।लाइब्रेरी से निकलते वक़्त किताबें चीखकर झपट पड़ती हैं।धूल में लिपटी यह किताबें मेरा कॉलर पकड़कर लड़ती हैं।पीली और कमज़ोर पड़ चुकी किताबें भी तलवार सा ज़ख्म छोड़ती हैं। किताबों की रैक पर लिखा तो काव्य होता है, मगर मुझपर पिघले सीसे की तरह यह गिरती हैं।

जब जालों को तोड़ता हुआ मैं एक किताब पर हाथ रखता हूँ,तो बगल में रखी किताब हाथो पर गिरकर,उँगलियों को कुचलने लगती है।हर किताब होड़ करती है की मुझे उठाओ,मुझे पढ़ो,मुझे बड़ी मेहनत से लिखा गया है।मुझमे लिखने वाले ने अपनी रूह को निचोड़ दिया था।कोई किताब कह रही होती है की मुझमे अल्फ़ाज़ दर्ज करने वाले ने दसयों दिन खाना नही खाया था।मेरे आखरी पन्नों से पहले मुझे लिखने वाले के बच्चों को पहली मुस्कान नही मिल पाई थी।

पूरी की पूरी लाइब्रेरी मेरे जिस्म से भिड़ती है।हर किताब अपने हिस्से की मोहब्बत, ज़ख्म की शक्ल में देती है।शीशे के सामने खड़ा मैं इन किताबों से निकला दर्द महसूस कर सकता हूँ।सच कहूँ तो इन ज़ख़्मो से उपजी तक़लीफ़ मुझसे फिर कहती है की इन्हें थाम लो।
कुछ तो यहाँ तक चीख़ कर कहती हैं की मेरे पास से हट जाओ।मैंने बड़े बड़े तख्त बर्बाद कर दिए,तुम्हारा क्या वजूद है।किताबें रोज़ मुझसे भिड़ती हैं।मैं रोज़ किताबों में खत्म होता हूँ। वह मुझ अगला पिछला कल दिखाना चाहती हैं, मैं उन कल के निशान अपने जिस्म पर देख आँख बन्द कर लेना चाहता हूँ और कहता हूँ की....
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Tuesday, February 4, 2020

आंदोलन से निखारें

हम सबने CAB से CAA तक संघर्ष किया,NRC के ख़िलाफ़ बिगुल फूके, NPR पर शंकाएँ जताई यानि हर वह चीज़ जो सँविधान को नुकसान पहुँचाता, देशवासियों को परेशान करता,उसकी मुख़ालफ़त की गई है । यह लड़ाई सबकी थी,सबने लड़ी,इसपर भले ही एक धर्म की छाँव डाली गई हो मगर यह सच है इसकी बुनियाद से आजतक के सफ़र में हर धर्म और जाति के लोग शामिल रहें हैं । बस कुछ कट्टर धार्मिक लोग ही इसे अपने अपने धर्म के हिसाब से जामा पहनाना चाहते हैं । कोई कहता है यह मुसलमानों का आंदोलन कहता है, तो कोई चीखकर कहना चाहता है कि, हाँ यह हम मुसलमानों का आंदोलन है, यह बातें अधूरी हैं, इस आंदोलन का चेहरा भले ही कैसा दिखता हो,इसकी सोच गाँधीयन है, तरीका गाँधीयन है, इसलिए यह एक मज़हब का तो कतई ही नही हो सकता है ।

हम इसपर वक़्त भी नही बर्बाद करना चाहते,बस इतना कहना चाहते हैं,हमारी लड़ाई मोदी जी के विचार से है नाकि उनसे । मैं कतई नही चाहता कि मोदी जी का कोई व्यक्तिगत नुकसान हो, न ही उनको जिस्मानी या ज़हनी तक़लीफ़ हो,हाँ मैं यह सौ प्रतिशत चाहता हूँ कि उनको,उनके ही मैदान में यानी चुनाव में लोकतांत्रिक तरीकों से हराया जाए । जिस जनता से वह जीतकर आए हैं, वही जनता ही उन्हें हराकर दिखाए । मैं न उनसे चिढ़ता हूँ न ही घृणा करता हूँ,मैं चाहता हूँ कि कट्टरपन का कोई भी विचार हो,वह हारे,मगर लोकतांत्रिक तरीकों से नाकि कोई और तरह से,इसलिए जो आंदोलन हो रहें,उसे मेरा सहयोग हमेशा है,यह पूरी तरह अहिंसात्मक लोकतांत्रिक तरीका है ।

दूसरी बात नरेंद्र मोदी चुटकी बजाने से पीएम नही बने हैं, बड़ी मेहनत और सधे हुए तरीके से चलकर बने हैं । हमें उनका मुकाबला इसी मैदान मे करना है । बिना थके अटूट और लम्बी मेहनत करनी होगी । यह कहना कि लोग कट्टर हो गए हैं, लोग भक्त बना दिये गए हैं, लोगों की विचारशक्ति छीन ली गई है, सही नही है, क्योंकि हम लोगों को साध नही पा रहें हैं, उन्हें अपनी बातों पर भरोसा नही दिला पा रहें हैं, उन्हें एहसास नही करवा पा रहें हैं, यह हमारी कमी है, लोगों के सर मढ़कर हम अपनी कमियों से भाग नही सकते हैं ।

भाजपा हर चुनाव आक्रामक और गन्दी ज़ुबान इस्तेमाल करके लड़ती है, उसकी कोशिश सारे चुनाव को हिन्दू मुसलमान के मैदान पर लाने की ही होती है । सब पार्टी उसके सामने बेबस नज़र आती हैं । यह कितनी शर्म की बात है, खासकर उनके लिए,जिनके पूर्वज महात्मा गाँधी रहें हों । हमारे तरीकों में ही कमी है, हम गाँधी को मानते हैं मगर जानते नही हैं । सत्य,अहिंसा और न्याय को धारण करने वाला बेबस और लाचार हो ही नही सकता , उसे खुद पर भरोसा करके जूझना चाहिए,सब कुछ जनता पर छोड़ दें कि वह अपने लिए असत्य चुनती है या सत्य,अन्याय या न्याय,अहिंसा या हिंसा,मेहनत कीजिये लोगों में,लोग जगेंगे,सोए हुए को जगाना पड़ता है ना कि यह कहकर निकलना होता है कि वह तो सो रहें,उठेंगे ही नही ।

इतिहास में हिटलर के आने के तमाम किस्से भरे पड़े हैं, हिटलरशाही के संकेत और शंकाएँ हमें दिखने ही लगते हैं, तो इन्हें रोकने के भी नियम-तरीके हैं । अब जब आंदोलन की चाभी आप सबके पास है, सरकार के असंवेदनशील अविवेकीपन से अब लोगों की भी आंदोलनों में कमी नही है,तब इन्हे समझाइए,इनको तैयार कीजिये ताकि यह आगे बढ़कर लीडर बन सकें । इतनी भीड़ को अगर भीड़ ही रहने दिया गया,तो यह हमारा फेलियर होगा,अब निकले हुए क़दम मज़बूत कदम बने,इसमे लगना होगा । जहाँ कहीं भी आन्दोलन पर पुलिस हिंसक रवैय्या अपना रही है, उसका मुकाबला बिना घबराए,बिना उत्तेजित हुए,धैर्य और साहस से देना है, साहस यह कि हम हर हिंसा का मुकाबला अहिंसा से करेंगे,कोई लाठी हमे कमज़ोर नही कर पाएगी,हर चोट हमे और मज़बूत करेगी । बस इन मौकों पर सँगठित हों और खुद को तमाम कमियों से छुटकारा दिलाएं,सुधार करें और नई तारीख़ की बुनियाद रखें ।
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Monday, February 3, 2020

घृणा नही प्रेम

नफ़रत जितनी बढ़ेगी,उसके मिटने की संभावना भी उसी अनुपात में उतनी ही तेज़ पढ़ेगी । देखिये, नफरत को खत्म ही होना है और अंत मे सहयोग और सहिष्णुता ही विजयी होगी क्योंकि यह ज़रूरत है ।
अब अगर आपको अपने इर्द गिर्द नफरत और बदले से भरे हुए लोग दिख रहे हैं । अपने धर्म के सिवा दूसरे धर्म को खलनायक की तरह देखने वालों की भीड़ बढ़ रही है । लोगों में एक दूसरे को बर्दाश्त करने की ताकत कम हो रही है, तब आपकी ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है । यही सारे लोग ही तो प्रेम,सहिष्णुता,भाईचारा,और सहयोग के काम आएँगे,मंगल ग्रह से तो लोग आएँगे नही । इन्ही नफरत से बीमार लोगों को ठीक करना है, इनके ही साथ दुनिया को बढ़ना है, इसलिए इनसे घृणा मत कीजिये,बल्कि इनपर दया कीजिये और इनके इलाज की युक्ति खोजिए ।

गाँधी का रास्ता गांधी रटते रटते नही हो जाएगा,गांधी का रास्ता गांधी को उतारने से बनेगा । छोटी छोटी घटनाओं को,छोटे छोटे व्यक्तियों को बड़ा बनाकर सिर्फ चमक ही बटोरी जा सकती है । मैं तो इसका भी पक्षधर नही की गोडसे पर बहुत बात हो,जितनी बात होगी उतना बड़ा नाम वह तैयार होगा,मैं तो इस नाम को लिखना ही नही चाहता क्योंकि इसने कोई भी तो ऐसा काम नही किया जिसपर वक़्त दिया जाए,हत्यारों पर हम क्यों ही बात करें,हम तो उनपर बात करें,जिन्होंने दुनिया को दिशा दी हैं । ठीक उसी तरह आंदोलनों के तमाम अवरोध को हम महिमामण्डित न ही करें बल्कि उनपर बात करें जो इस मोर्चे को सम्भाले जूझ रहीं हैं ।

एक और अंतिम बात,यह गांठ बांध लो कि अंत मे विजय प्रेम की ही होनी है । यह माना हुआ सच है कि नफरत जिस शरीर मे जन्म लेगी उसे ही सबसे अधिक नुकसान पहुँचाएगी और नफरत का हार कर तबाह होना उसके पैदा होने के साथ ही तय हो जाता है, बस प्रेम,सहिष्णुता और सहयोग धारण करने वाले उसके आगे घुटने न टेके और अपनी अंतिम सांस तक इसिपर टिके रहें कि हम अपने सबसे बड़े भयँकर विरोधी ,वह चाहे जितना हिंसक,अधर्मी,कुकर्मी,खूखांर ही क्यों न हो, उससे न ही डरेंगे और न ही घृणा करेंगे,हम उसे जीतकर दिखाएँगे, यह ही गाँधी मार्ग है ।

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