Saturday, October 31, 2020

पुराने की कद्र

हमेशा नए आने वाले पर नज़र रखो,यदि नए आने वाले से पुराने वफ़ादार लोग उठकर जाने लगें, समझ लो यह नयापन बर्बादी लाएगा ।
जिसके पास खुद कोई प्रभावी प्लान नही होता है,वह बड़ी चालाकी से पुराने लोगों पर सवाल उठाता है, उनको निकम्मा ठहराता है और फिर उन्हें किनारे लगाकर अपने कद को रोज़ फुला फुला कर बड़ा करता है ।

यह बात हर राजनैतिक दल,सामाजिक संगठन और परिवार के लिए है । यदि पुराने वफ़ादार लोग जा रहे हैं तो समझ लो कि चौखट पर किसी धूर्त युवा ने पैर रख दिया है ।

मैं बदलाव का बड़ा समर्थक हूँ । युवाओं को आगे लाने का भरसक प्रयत्न करता हूँ मगर यह जान लो इसका कतई यह अर्थ नही की पुराने लोगों को,उत्साहजनक परिणाम न देने वाले बुज़ुर्गों को या उस वफ़ादार आदमी को जिसने बुरे वक्त में भी घर मे चिराग जलाए रखा, इनको निकालने,इनको बेइज़्ज़त करने और इनसे किनारा करने के सख्त से सख्त खिलाफ हूँ ।

मैंने गाँधी से सीखा है कि पुराने को साधो । यदि पुराने लोग हटने लगें तो यह किसी भी युवा की सबसे बड़ी अयोग्यता है, जिसके परिणाम बिल्कुल भी सकारात्मक नही होंगे, बल्कि जो घर अभी बुढ़ापा लिये खड़ा था,वह भी ढहकर खत्म हो जाएगा....यदि किसी के आने की आहट,किसी के जाने की सदा है, तो यह बुरी है, बेहद बुरी । फिलहाल जिस भी राजनैतिक दल में जो भी इस परिपाटी पर है, उसकी बर्बादी जल्द ही दिख जाएगी,उससे पहले की सम्भल जाएँ...
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Friday, October 30, 2020

इंदिरा गाँधी

तेरह साल की मामूली सी उम्र में "बाल चरखा संघ"बनाया।बचपन में ही कुछ था,जो लोगो को दिख रहा था।दिल्ली में 47 के दंगो में वोह कूद गई। गाँधी जी के कहने पर उसने दंगो में लोगो की ख़िदमत करना अपना मकसद बना लिया। पीड़ितों की सेवा करना और ज़ख्मो पर मरहम रखना उसकी ज़िन्दगी हो गई । हमसे कई बार होता है किसी की बुराई करते करते हम इतने बुरे हो जाते हैं की उसकी अच्छाइयों को भी नज़रअंदाज़ कर जाते हैं।

इंदिरा गाँधी ने सारी ज़िन्दगी काम किया।सारी ज़िन्दगी मुल्क़ की ख़िदमत में गुज़ारी । इंदिरा को अपनी माटी से ऐसा अटूट प्रेम था,जिसने कभी तबियत से इंदिरा को सोने ही नही दिया,मुल्क की वफ़ादार बेटी इंदिरा ने एक के बाद एक भारत के बाहर अपने कदम बढ़ाए।उनके कदमो से दूसरे मुल्कों में भारत की धाक पहुँची।

अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, बर्मा, चीन, नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में वोह पहुंची। उन्होंने  फ्रांस, जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य, जर्मनी के संघीय गणराज्य, गुयाना, हंगरी, ईरान, इराक और इटली जैसे देशों का आधिकारिक दौरा किया।अल्जीरिया, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया बेल्जियम, ब्राजील, बुल्गारिया, कनाडा, चिली, चेकोस्लोवाकिया, बोलीविया और मिस्र जैसे बहुत से देशों का दौरा किया।वह इंडोनेशिया, जापान, जमैका, केन्या, मलेशिया, मॉरिशस, मेक्सिको, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, नाइजीरिया, ओमान, पोलैंड, रोमानिया, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, सीरिया, स्वीडन, तंजानिया, थाईलैंड,त्रिनिदाद और टोबैगो, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, अमेरिका, सोवियत संघ, उरुग्वे, वेनेजुएला, यूगोस्लाविया, जाम्बिया और जिम्बाब्वे जैसे कई यूरोपीय अमेरिकी और एशियाई देशों के दौरे पर गई।उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भी अपने कदम रखे।

यह गिनती सिर्फ इसलिए है की उस वक़्त वोह कितनी तेज़ कदम बढ़ा रही थीं।मुल्क़ के लिए जी रही थीं।कुछ कदम गलत हो सकते हैं।उसकी सज़ा उनकी ही ज़िन्दगी में उन्हें मिल गई।कुछ को लगा यह सज़ा कम है तो उनकी ज़िन्दगी ही उनसे छीन ली गई। यह नेहरू परिवार की पहली शहादत थी और आज़ाद भारत में बड़ी शख्सियत में महात्मा गाँधी के बाद दूसरी शहादत थी या कहें आने वाले वक्त के लिए  शहादत की नीव थी ।
इंदिरा को अपने हर कदम का बखूबी अंदाज़ा था।इंदिरा ने मुल्क़ तो टूटने से बचा लिया था मगर खुद को बचाने को तनिक भी फिक्रमन्द नहीं थी।उनमे नफ़रत भी नही थी।नफ़रत अगर होती तो उनके अंगरक्षक कब के बदल जाते।

इंदिरा के दामन पर जो भी छींटे डाली जाती हैं,उन छींटों में कहीं साम्प्रदायिकता नही है,कहीं पर नफ़रत नही है।इंदिरा इन सब चीज़ों से आज़ाद थीं।इंदिरा के व्यक्तित्व पर लगातार ऊँगली भी उठी और सराहना भी हुई।लिखने को कितना कुछ लिख सकते हैं उनकी शख्सियत पर मगर वक़्त उनको ज़िन्दगी में उतारने का है। आज उनकी शहादत के मौके पर हम उनकी मेहनत,जज़्बे,मोहब्बत और पूरी समर्पित ज़िन्दगी को सलाम करते हैं।
देश की सबसे सशक्त,निडर,प्रधानमन्त्री इंदिरा की बहुमुखी प्रतिभाओं और पूरी ज़िन्दगी मुल्क़ के लिए लगा देने को दिल से सलाम।

जिन्होंने मुल्क की खिदमत में एक नाखून तक नही कटवाया वह तो इंदिरा की शहादत से जलन रखेंगे ही मगर वाक़ई जो भारत गणराज्य का नागरिक है,वह अपनी बेमिसाल हिम्मती इंदिरा की इज़्ज़त करेगा । मेरा मानना है, इसमे कोई ज़बरदस्ती नही की इंदिरा के बाद से देश की कुर्सी पर वैसी कोई शख्सियत नही विराजी,इंदिरा बहुत अलग थीं,तमाम परतों में ढली एक मज़बूत काया...वीर शहीद इंदिरा गाँधी को उनकी शहादत पर कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से नमन...
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Thursday, October 29, 2020

हज़रत मोहम्मद के नाम से

जब आप किसी को मानते हैं मगर उसकी कही को नही मानते हैं, तब आप दो दिशाओं में फँसकर बर्बादी की तरफ बढ़ते हैं । अगर आप पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब को तो मानते हैं मगर उनकी कही बात नही मानते,तो फिर आप उनके नज़दीक रहकर भी नज़दीक नही होते हैं ।

पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद एक समुदाय की ताक़त का नाम है मगर जज़्बात में आकर पूरा एक समुदाय उन्हें अपनी कमजोरी बनाने पर तुला है । एक समझदार इंसान की सबसे बुरी चीज़ है, उसकी कमज़ोरी का ज़ाहिर हो जाना । अब कोई भी बेहूदा इंसान इस कमज़ोरी से जब चाहे तब अच्छे भले इंसानों को भड़का सकता है ।

आप मेरी लाख बुराई कर सकते हैं,मेरा सर नेज़ो पर टांग सकते हैं, हमे कोई शिकवा नही होगा । बस एक ही बात का शिकवा रहेगा कि काश पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद को पढ़कर समझकर अपने रास्ते बनाए होते । हर उस बुराई से ऐसे ही लड़ते जिसे हज़रत मोहम्मद साहब ने बुरा कहा है ।

आज की शाम जब पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब की याद में रौशनी को देखिएगा, फ़िज़ाओं में रौशनी बिखेरियेगा,तब एक पल के लिए ज़रूर सोचिएगा की वह दुनिया की आलातरीन कौन हस्ती थी जिसने अपने मिजाज़ से,जिसने अपने क़ौल से,जिसने अपनी खिदमत से अपने से ठीक मुख़्तलिफ़ लोगों को अपना बना लिया था ।

आज जब मैं एक से एक दानिशमंद को उनके नामपर अपनी लाइन से बहक जाने को देखता हूँ तो अफ़सोस होता है कि यह उन्हें तो मानते हैं मगर उनकी नही मानते हैं ।
मैं अपने पैग़म्बर की मार्फ़त दुआ करता हूँ कि उनके पीछे चलने वालों को मोहब्बत के साथ अपने से खिलाफ लोगों को बर्दाश्त करने की कूव्वत दे ।

हुज़ूर की शान में गुस्ताख़ी सिर्फ कार्टून बनाने या कुछ अल्लम गल्लम बकने में ही नही है, बल्कि हुज़ूर का नाम लेते हुए हुज़ूर के दिखाए रास्ते से डिग जाने में भी है । आप हमारी जमकर आलोचना कीजिये मगर यह जान लीजिए पैगम्बर हज़रत मोहम्मद मोहब्बत का नाम है, खिदमत का नाम हैं, जिसको हमारे जीते जी कोई रुसवा नही कर सकता है ।

हुज़ूर के नामपर हुए किसी भी क़त्ल को सही नही ठहराया जा सकता । हम न उनकी सुनते हैं, जो गाहे बगाहे इस्लाम को हिंसा की शक्ल मे देखते हैं और न ही उनकी सुनते हैं, जो उनके नामपर क़त्ल को जायज ठहराते  हैं । 

ईद ए मिलादुन्नबी की मुबारकबाद बस यही दुआ की हमारे दिल अल्लह नरम करे और हमसे इंसानियत फ़रोग़ पाए,यही रसूल का रास्ता है । जो इंसानियत से डिगेगा, हमारे रसूल के रास्ते से डिगेगा ।

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Wednesday, October 28, 2020

बृज यात्रा

ज़मीन जब मोहब्बत की माँग करती है, तो किसी इंसान में ऐसे बीज रोप देती है, जिसके चलने से मोहब्बत फ़िज़ाओं में फैल जाए । वह कुछ इंसानों को ऐसे दरख़्त में तब्दील कर देती है, जिनसे ज़माना सांस पाता है । आज जब हमें लग रहा कि नफरत बुलंद हो रही,तब ऐसे इंसान कहते हैं कि दोस्त ज़मीन पर तो उतरो,मोहब्बत तुम्हारा इंतेज़ार कर रही है ।

यह फैसल भाई हैं और उनके सहयात्री,जो "बृज 84 कोसी परिक्रमा" कर रहे हैं । इनका मकसद अपने हृदय में प्रेम को जगाना है, यह बताना भी है कि चाहे जब लौटिए,शांति और समृद्धि के लिए प्रेम की ओर ही आना होगा ।

26 अक्टूबर से 29 अक्टूबर तक चलने वाली यह यात्रा ऐसे अनुभव को खुद में समेटे है कि आप हैरत करेंगे । फैसल भाई का कहना है कि कोई भी दिल प्रेम से खाली नही है, बस उसके अन्दर के प्रेम को अपने आने की सूचना पहुँचानी है । प्रेम कभी मरता नही है, हमारे न आने से वह खामोश भले हो जाए मगर जब कोई उसे आवाज़ देगा,तो इंसान के अन्दर का प्रेम बोल ज़रूर उठेगा ।

खुदाई ख़िदमतगार की इस "बृज 84 कोसी यात्रा " यात्रा को देखते रहिए । जितना हो सके इसके मकसद को आगे बढ़ाइए और अपने हृदय में प्रेम के दीये को जलाए रखिये । यकीनन नफरत बुरी तरह हारेंगी और प्रेम घर घर महकेगा क्योंकि प्रेम के साथ कृष्ण जी हैं, जहाँ प्रेम है, वहीं कृष्ण जी हैं, इसलिए देर सबेर प्रेम का परचम लहराएगा । 

सभी यात्रियों को मुबारकबाद और शुभकामनाएं की वह उस मकसद तक पहुँच रहे हैं, जिसके ख्वाब हम सब देखते हैं । आपकी मेहनत बहुतों के दिलों का सुक़ून है । यह जो थककर आप झपकी लेते हैं, यह हमारे जागने की प्रथम सूचना है । आपके कदम इस मिट्टी के रँग, खुशबू और ख़मीर को एक दिन ज़रूर उभारेंगे.....

अखिलेश यादव

राजनीति प्रयोगों का नाम है और इस इंसान ने इतनी कम उम्र में जितने प्रयोग करें हैं, वह बहुत कम लोगों के हिस्से में आया है । आज जब राज्यसभा सीटों में शानदार पॉलिटिकल ट्विस्ट देखने को मिला, तो लगा कि हमारे बीच अभी वह राजनैतिक चेतनाएँ खत्म नही हुई हैं, जिनपर स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स चलते हैं ।

हम अखिलेश यादव की कद्र करते हैं, वजह सिर्फ एक है कि उनको एक साथ अलग अलग देखने की समझ है । उन्हें कोई राजनैतिक उड़ान दिखाकर चरा नही सकता है । वह खुद प्रयोग करने का रिस्क रखते हैं, नतीजे तो अच्छे बुरे आते ही रहते हैं लेकिन यह निडर होकर खुद पर भरोसा करते हैं ।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी के पास इतनी व्यापक समझ वाला नौजवान शीर्ष नेतृत्व नही है । आप मीडिया और आईटी सेल के प्रोपेगेंडा को बाहर रखकर देखेंगे तब समझ पाएँगे इनमे मासूमियत के साथ शानदार समझ है । कब बोलना है, कितना बोलना है, कहाँ बोलना है, क्या बोलना है, इसमें अखिलेश यादव का कोई सानी नही है । यह न उत्तेजित होते हैं और न ही शांत,बीच की एक अपनी लाईन है, उसपर खड़े मिलते हैं ।

कल तक राज्यसभा की सीटों पर एक से एक चाणक्य बने फिर रहे थे,सब एक झटके में हवा हो गए । हम इस कूटनीति के ही तो कायल हैं, राजनीति ऐसे ही होती है ।

मेरा किसी की हार जीत से डेटा प्रभावित नही होता है । मुझे कोई आरोपों लगाकर किसी की समझ के ख़िलाफ़ नही कर सकता है । मैं राजनीति के उन हिस्सों को देखता हूँ,जो छोटे ज़रूर नज़र आते हों मगर आने वाले वक्त में बड़े बनकर उभरते हैं । उत्तर प्रदेश की राजनीति में आप अखिलेश यादव की आंधी देखने को तैयार हो जाएं,यह मेरा अनुभव है क्योंकि उनकी जो फील्डिंग सज रही है, उसका तोड़ विपक्ष में तो किसी दल के पास नही है, सत्तापक्ष ही उसका मुकाबला करेगी ।

अखिलेश यादव के कदम भले अभी असर नही दिखा सके हों,मगर कभी कदम हल्के नही रहे हैं । रणनीति में अभी उनके पसंघे बराबर कोई नही है । मेरे लिए तो सबसे बेहतर चीज़ है कि अखिलेश यादव के संगठन में कोई हल्का युवा भी नही बैठा है, अखिलेश को कोई संघर्ष की तस्वीरों से झांसा नही दे सकता,यह लीडर आँखे पढ़ना जानता है ।

मैं इनकी हर आलोचना सुन सकता हूँ । हर लीडर की आलोचना होना कोई बुरी बात नही है । मगर एक बार बिना लाग लपेट कहना चाहूँगा की देश की राजनीति में उनके इतना समझदार युवा राजनीतिज्ञ नही है, वह राजनेता है । समझ न आए तो गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव से लेकर आजतक राज्यसभा चुनाव को देख लें,बिना तमाशे ढोल के राजनीतिक कदम कैसे उठते हैं, देख लीजिए ।
एक झटके में किसी को खारिज करना बड़ा आसान है मगर उसे समझना बहुत समझदारी का काम है, जो अक्सर हमसे छूट जाता है....

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Tuesday, October 27, 2020

अपराध महिला के विरुद्ध

हम अब इतने हल्के समाज मे तब्दील हो चुके हैं कि बुराई जब तक लिख न दी जाए,तब तक उसे बुराई नही अच्छाई माना जाता है । अरे भाई कोई लिखे या न लिखे,बोले या न बोले हत्या,झूठ,अन्याय यह सब अपराध में ही गिना जाएगा,इसे हमारी आपकी स्वीकृति की आवश्यकता नही है ।

एक अपराधी लड़के ने एक लड़की की हत्या कर दी,बहाना कथित प्रेम को बनाया गया । हत्या तो अपराध है ही,प्रेम को बहाना लेकर हत्या तो धूर्तता और अपराध का मिश्रण है । अब बताइये,इसे कौन इंसान सही ठहराएगा । कोई भी सभ्य इंसान हत्याओं को सही नही ठहरा सकता ।

अब आते हैं भत्सर्ना पर,जो खुद दिल के चोर होते हैं, वह इधर उधर झाँकते फिरते हैं कि किसने विरोध किया और किसने नही किया । चलो ऐसे लोगों को घेरा जाए । यह दिमाग से इतने दरिद्र होते हैं कि इन्हें यह भी नही पता कि कोई भी इंसान,जिसकी चेतना और विवेक,किसी दूसरे के पास गिरवी नही है, वह कभी भी हत्या,बलात्कार,हिंसा को सही नही ठहरा सकता है, वह तो हमेशा उसके खिलाफ ही होगा,भले वह लिखे या न लिखे ।बोले या न बोले ।

एक चीज़ की गिरह बाँध लें,हत्या,हिंसा,बलात्कार या कोई भी मानवता के विरुद्ध अपराध में हर इंसान इसके खिलाफ रहता है । इसपर शक वही करेगा,जो कभी न कभी ऐसे अपराधों को मौन स्वीकृति दे चुका होता है, तब उसे अपनी तरह सारा संसार मक्कार ही नज़र आता है, जबकि बाहर निकलकर किसी एक से पूछ लो,वह यही कहेगा कि यह बुरा है, बहुत बुरा है, बचो इससे ।

जब जब घटनाओं में हम जाति, धर्म,वर्ग,क्षेत्र का छौंका लगाते हैं, तब हम असल मे अपनी क्रूर मानसिकता को अपराध में घोलकर पीड़ित इंसान के साथ अन्याय कर रहे होते हैं । एक अपराध हुआ है, उसकी सजा मिलनी चाहिए,यह एक शास्वत सत्य है, बाकी इसमे जितने मसाले डाले जाएँ,वह भी इस सत्य को झुठला नही सकते हैं ।

अपराध में लिप्त अपराधी,वह कोई भी हो,उसे सजा मिले, न्याय की प्रक्रिया सरल और जल्द पूरी हो,यही पीड़ित के साथ न्याय है, बाकी अपने घरों के लड़कों को समझाइए की हिंसा दीमक है, जो उनके पूरे कुनबे को खा जाएगी, फिर वह भला कोई भी हो । हिंसा,नफ़रत,हत्या हर उस घर मे विराजेगा जहां अन्याय को स्थान दिया जाएगा । इससे बचिए,यह हम सबके लिए ज़रूरी है ।

किसी की भत्सर्ना का इंतेज़ार मत कीजिये,समाज को संभालने और सुधारने निकलिए । बच्चों पर ध्यान दीजिए,उनमें सरलता, प्रेम,त्याग और समर्पण के मूल तत्व पिरोए वरना कोई दिन आपकी चौखट से कोई किसी को अपने अहंकार में निगल जाएगा । अपने बच्चों को बचा लीजिये,उन्हें इंसानों जैसा बर्ताव करना सिखाइये और बताइये,अपराध की नियति दण्ड है, इससे कोई नही बचेगा,कोई भी नही । देश के कानून पर भरोसा रखिये, अपराधी के समर्थन में खड़ा होना,खुद को अपराधी बनाना है, यह बच्चों को सिखाइये । 

उस बेटी को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि,देश के संविधान और कोर्ट से उम्मीद है कि अपराधी को बहुत जल्द उसके किये की सज़ा मिल जाएगी । हमें भी आगे बढ़कर ऐसे अपराधी को अपने घरों में न पैदा होने देने के लिए सजग होना होगा । 

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Monday, October 26, 2020

गाँधी

जब उस्ताद जाग रहा होता है, तब शागिर्द को नीम गहरी नींद ले लेनी चाहिए,क्योंकि जब उस्ताद पाँव ज़मीन पर रखेगा,तो उसकी पहली थाप शागिर्द को ही महसूस करनी होगी और फिर उस शागिर्द को जागते हुए उस्ताद के बुने ख्वाब को पूरा करने के लिए आखरी सांस तक जगना ही होगा ।

गाँधी से मोहब्बत है, इसलिए नही की वह बड़े राजनैतिक कार्यकर्ता थे बल्कि इसलिए कि उन्होंने जिसे छुआ,उसमें खुद को डाल दिया । लोग जैसे थे,वैसे स्वीकारा, फिर जैसा चाहा, वैसा बनाया । गाँधी एक शानदार प्रयोगशाला थे,जहाँ इंसानों को इंसान बनाने की प्रक्रिया चलती थीं ।

गाँधी ने बताया नफरत का विकल्प और अधिक नफरत नही है, बल्कि प्रेम है । झूठ का विकल्प और अधिक झूठ नही बल्कि सच है । मक्कारी का विकल्प और अधिक धूर्तता नही है, बल्कि सरलता है । एक दिन ज़मीन थककर मानेगी की झूठ के सामने सच ही टिकेगा,नफरत के सामने प्रेम...
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Sunday, October 25, 2020

गणेश शंकर

मेरे लिए जिस तरह राजनीति में पंडित नेहरू लिटमस पेपर हैं, ठीक वैसे ही पत्रकारिता में गणेश शंकर विद्यार्थी हैं, इनसे ही हम दाएं या बाएं का फर्क देखते हैं, मेरे लिए गणेश जी का जीवन वही माप है, जिसपर रोज़ खुदको रखकर तौलते हैं और हमेशा कम निकलते हैं । गणेश जी के ज़िक्र उस दिल मे होने चाहिए जो अपनी मौत तक हिन्दू मुसलमान में एकता चाहते हैं । एक बात उनसे और सीखिए,नए लोगों को बढ़ाना,समझाना और सहारा देकर खड़ा करना,यह भी तो हम भूल चुके हैं ।

गणेश शंकर विद्यार्थी का आज जन्मदिन है ।1890 अक्टूबर 26 को जन्मे गणेश उस पत्रकारिता की लम्बी लकीर हैं जिसे अभी तक कोई पार नही कर सका ।गणेश शंकर कभी यह कहकर रोए नही और न ही लोगों को उकसाया की हमे मार दिया जाएगा । न ही वह चीखे चिल्लाए और न ही डरे।बेख़ौफ़,साफदिल गणेश उस कट्टर मुसलमानों की भीड़ में कूद गए जो उनके नाम से ही उन्हें खत्म करने को आमादा थी ।वह उन कट्टर हिन्दुओं में भी उतरे जो मुसलमानो के घर और दुकान जलाकर उनके लोगों को मार देना चाहती थी ।

गणेश जब कट्टरपन से पगलाई भीड़ के सामने थे,तब भीड़ ठहर गई । लोगों ने कहा गणेश भैय्या हैं रुक जाओ,भीड़ रुक गई और गणेश जी के लफ्ज़ सुनना चाहती थी मगर एक बार नफ़रत में दहक चुके लोग,भला कब रुकते,भीड़ के पीछे से किसी ने उनपर कोई  धारदार हथियार से हमला किया और भीड़ तीतर बितर हो गई,गणेश एकता और भाईचारा के पौधे को अपने खून से सींचने निकल गए ।

ख़ैर वह वक़्त निकल गया ।मारने वाले लोग नए आ गए तो मरने वाले भी नए आ गए ।गणेश शंकर को नमन की उन्होंने लिखने की ऐसी लकीर खींची जिसपर चलना सच्चे दिल की निशानी है । गणेश की मोहब्बत लम्बे अरसे तक हम जैसों को ताक़त देती रहेगी । हममें में से जो मर जाएँगे मगर शिकवा नही करेंगे ।जो मिट जाएँगे मगर अपनी माटी को शर्मिंदा नही होने देंगे । गणेश जी ने हमे सिखाया की हम सबके ख़ून से इंसानियत अगर खुशहाल हो तो मरना हमारा फ़र्ज़ हो जाता है... गणेश नमन आपको....
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Monday, October 19, 2020

रबीउल अव्वल

इस्लामी महीना रबीउल अव्वल का आगाज़ हो गया है । यह महीना पैगम्बर हज़रत मोहम्मद की दुनिया में ली साँसों के हिसाब की शिनाख्त का महीना है । जब हम लोग ठीक मुसलमान नही हुए थे,जब हम लोगों को कपड़े और दाढ़ी टोपी की जगह किरदार की शिनाख्त की तरबियत दी जाती थी,तब यह महीना हमारे घरों की ज़ीनत होता था ।

घर घर महीने की शुरुआत से ही रोज़ मीलाद होती थी । जिनमें पैगम्बर हज़रत मोहम्मद का दुनिया मे आना, दुनिया को समझना,दुनिया से सीखना और दुनिया को सिखाना और किरदार को तराशना घर घर मे सुनाया जाता था । यह खलिस ऐसा तरीका था जिससे कोई भी अपने पैग़म्बर के किरदार को समझ लेता,बच्चे और बूढ़े खुद को तरबियत दे लेते मगर फिर हमने तरक्की कर ली । फिर हम पढ़े लिखे मुसलमान हो गए और फिर यह फ़ालतू की रवायतों को घरों के जंग लगे सन्दूक में समेट कर रख दिया और एक रोज़ पुरानी छत ढह गई,उसमे सन्दूक समेत खूबसूरत रवायतें दबकर खत्म हो गई ।

मैं इस्लामी नुक्ते नज़र पर उंगली नही चलाना चाहता,मैं तो बस इस महीने की आमद पर बचपन के उन दिनों को याद कर रहा हूँ,जब तख्त पर मेरी नानी बैठी कुछ पढ़ती थीं और हम खीर खाने के ख्वाब देखते हुए,उनके पढ़ने को सुना करते थे । जब सुनकर उठते थे तो ज़ुबान पर खीर होती थी और ज़हन में शानदार तारीख़ दर्ज ही जाती थी । आज भी हमें मोहम्मद साहब का जीवन चरित्र पढ़ने की ज़रूरत नही पड़ी,क्योंकि हर करवट को सुनकर बड़े हुए हैं ।

मीलाद मेरे लिए वर्कशॉप थीं,ख़ैर इस महीने हम कोशिश करेंगे कि हज़रत मोहम्मद की ज़िन्दगी के तमाम बदलाव आपतक ला सकें । रेत में मोहब्बत की तस्वीर उकेर सकें । यह पूरा महीना उनके ज़िक्र का महीना है, हमें वह लोग ज्ञान न दें जो कहते हैं कि रोज़ ही उनके ज़िक्र के दिन हैं । कोई किसी का भी रोज़ ज़िक्र नही कर सकता अगर करता है तो वह इस दुनिया से हट चुका होता है, इसलिए आम लोगों के लिए खास दिन,खास महीने हमेशा बहुत खास ज़िक्र के रहेंगे ।

हम यहाँ इरके फिरके वाले ज़हन के कंगाल लोगों का ज़िक्र भी नही करते हैं । मेरा मानना है, हज़रत मोहम्मद एक वैश्विक चरित्र हैं । उनपर पूरी दुनिया का अधिकार है । उन्हें जैसे चाहे याद करे,यह कोई कुंद ज़हन नही तय करेगा । जिस तरह दुनिया को रोशनी देने वाली हर पर्सिनोलिटी से हम बेहतर चीज़े लेते हैं, मोहम्मद साहब से भी लेंगे,उन्हें केवल एक धर्म या एक क़ौम या एक फिरके या एक मुल्क की सीमाओं में कैद करना, उनके साथ ज़ुल्म है ।

रबीउल अव्वल की सभी को मुबारकबाद । हज़रत मोहम्मद की तबियत से ज़िक्र के महीने की मुबारकबाद । रौशनी का ज़मीन पर आना मुबारक....पैगम्बर हज़रत मोहम्मद पर बात कीजिये,मोहब्बत कीजिये,मोहब्बत ही मोहम्मद हैं, इससे डिगकर उनके नही रहोगे,इसलिए कोई भी तरीका अपनाओ,इकट्ठे हो और उनकी बात करो,भले ही वह मीलाद हो या कुछ और,ज़िक्र के रास्ते खोलो,ज़िक्र को रोको मत....
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Friday, October 16, 2020

नवरात्र

जिसमें प्रेम नही है, वह कैसे नवरात्र के पहले दिन की महिमा को समझेगा । जिस हृदय में प्रेम,त्याग और सहिष्णुता है, वह ही तो पवित्र नवरात्र के योग्य हृदय है, क्योंकि इसकी शुरुआत ही उन शैलपुत्री से होती है जो कहती हैं,

हे शिव तुम्हे पता है की पिता जी ने एक बहुत बड़ा यज्ञ रखा है।हमे नही बुलाया।सती अपने पति शिव को अपने पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ में न बुलाए जाने पर ग़म में थीं।सती ने शिव से पूछा की चलो हो सकता बुलाना भूल गए हों,तो हमे जाना चाहिए की नही।शिव मना कर देते हैं।सती के दिल को करार नही आता।माँ,बाप,बहनो से मिलने की तड़पन सती को बेचैन कर देती है।उन्हें शिव का इनकार तोड़ देता है।इस क़दर ख्वाहिश को देख शिव जाने को राज़ी हो जाते हैं।सती की एक एक मुस्कान शिव के लिए ख़ुशी थी।

दोनों साथ पिता प्रजापति दक्ष के यहाँ जाते हैं।मगर वहाँ तो माहौल ही उल्टा।कोई सीधे मुँह बात ही नही कर रहा।दक्ष ने शिव से मुँह फेर रखा।नाराज़गी की इन्तेहाँ की बेटी सती पर भी कोई ध्यान नहीं।बहनें बोली बोलने में लगीं,शिव का मज़ाक उड़ाया जाने लगा।सती से पति शिव की उछलती इज़्ज़त देखि न गई।एक बेटी बाप का क्या करती।एक बहन दूसरी बहन को क्या जवाब देती।सती चाहती तो सबको एक झटके में खत्म कर देती।मगर नहीं, उसने अपने आप को खत्म कर लिया।अपने आप को भस्म कर डाला।शिव अपनी सती का यह हाल देख नही सके और एक झटके में दक्ष के सारे अमले जमले को खत्म करके सती के गम में डूब गए।

सती ने योगाग्नि से ख़ुद को खत्म कर लिया।अपने तप से शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में अगलाजन्म लिया।इस बार वे “शैलपुत्री”के नाम से मशहूर हुईं।
शिव की मोहब्बत में इतनी ताक़त थी की सती फिर से उनके साथ रहीं।इस नयी ज़िन्दगी में भी वोह शिव की पत्नि बनीं।यही शैलपुत्री ज़मीन के सभी चरिंद, परिन्द,शजर हजर के लिए हिम्मत बनीं।लोगों ने उन्हें पूजा।उनकी मूर्तियाँ जँगल,जानवर,इंसान सबकी हिफाज़त की पहचान बनी।इन्ही शैलपुत्री की पूजा से ताक़त,सब्र,हिम्मत,मोहब्बत,बुराई के ख़ात्मे और अच्छाई के जश्न नवरात्र की शुरआत होती है।

सिर्फ इतना मानना भर है की जो भी धागा तुम्हे जोड़ सके,उसे पकड़ो।जो भी डोर तुम्हारे सबके दिलों को थाम सके,उसे मज़बूत करो।अपने इर्द गिर्द रह रहे हर इंसान की खुशियों में वजह ढूँढो, उन्हें महसूस करो और उसे सेलिब्रेट करो।उनके गम को देखो,मायूसी को पकड़ो और सहारा दो।कोई भी त्यौहार बेवजह नही है।कोई भी लोग बेवजह नही हैं।किसी की भी संस्कृति फ़िज़ूल नही है।हर एक में मोहब्बत है।उसे ज़िंदा रखो।

आज से नवरात्र शुरू हो रहे हैं।मां शैलपुत्री हम सबको एक साथ मुस्कुराता हुआ देखना चाहेंगी, न की अपनों का ख़ून बहाते।अगर अपनों का ख़ून बहाना होता तो सती की कहानी कुछ और ही होती और पवित्र नवरात्र की शुरआत कुछ और होती ।

 यदि तुम्हारे हृदय में वास्तव में उनके लिए मां का स्थान है, तो धरती पर मौजूद हर इंसान में उनके बच्चों की अनुभति करो और मां को उसकी सभी औलादों से बराबर का प्रेम करके उपहार दो,एक माँ अपने बच्चों को प्रेम में देखना चाहती हैं, नफरत में डूबे बच्चे मां के लिए अभिशाप हैं, इसलिए प्रेम करो और प्रेम फैलाओ ।आज पहले दिन से सीखिये और मोहब्बत को फ़िज़ाओं में घोल दीजिये।नवरात्र की खूब मुबारकबाद....
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Wednesday, October 14, 2020

कलाम की सालगिरह

डॉक्टर अब्दुल कलाम एक औसत व्यक्ति थे । उनसे अच्छे अच्छे क़ाबिल वैज्ञानिक हुए हैं । उन्हें ज़बरदस्ती सर पर चढ़ाया जाता रहा है । वह ओवररेटेड हैं । धर्म के मामले में वह खाली थे । डॉक्टर कलाम को जबरदस्ती इतने ऊँचे स्थान पर बैठाया जाता है जबकि वह इसके बराबर के थे भी नही,सैकड़ो कहानियाँ हैं, जो बताती हैं कि यह चरित्र केवल गढ़ा गया है, बुद्धिजीवीयों में उनकी गड़ना बहुत कमज़ोर है । 

यह बातें हमारे इर्द गिर्द अक्सर घूमती रहती हैं । लोग कलाम की चर्चा होने से उनमें कीड़े निकालते हैं और चर्चा न होने में भी कीड़े ही निकालेंगे । कुछ लोग मक्खी सिफत के होते हैं, गन्दगी ढूंढकर उसपर ही बैठते हैं । ऐसे ही लोग कलाम में कमियां ढूंढते हैं, फिर उसे अपने पैरों से दूसरे घरों तक फैलाते फिरते हैं ।

कलाम के वैज्ञानिक पक्ष पर हम नही जाते,न ही राजनीति की परत को खोलेंगे,हम सिर्फ इतना कहेंगे कि जिस एकता और भाईचारे की बातें हम।सब करते नही थकते हैं, क्या उसकी जीती जागती मिसाल नही थे डॉ अब्दुल कलाम । एक ही जिस्म में सभी धर्मों के मूल को समेटे सादी ज़िन्दगी नही गुज़ार रहे थे कलाम । जाओ और कोई ऐसा किरदार इतनी ऊँचाई पर बैठा ढूंढकर लाओ,जिसकी ज़ुबान,दिल,किरदार और काम में यकसा चाल हो । जिसमें प्रेम हो,जिसमे समर्पण हो,जो सिर्फ जोड़ने के लिए जाना जाता हो,जिसके रहने से कोई भी खतरा न महसूस करे,जिसके जाने से उस सड़क पर हमेशा हमेशा के लिए सन्नाटा हो जाए ।

आज डॉक्टर अब्दुल कलाम का जन्मदिन है । रामेश्वरम से उठे और रामेश्वरम में ही सो चुकी इस शख्सियत के बीच के हिस्से को दुनिया हमेशा याद रखेगी । कोई उनकी आलोचना में किताबें भर दे या कोई भी उनकी तारीफ में लाइब्रेरी भर दे,दोनों उनके नज़दीक बेकार हैं तबतक,जब तक उनके खुद के किरदार में यह लिखा पढ़ा झलके न । डॉ कलाम किरदार से मज़बूत इंसान थे । राम और अल्लाह को एक ज़ुबान पर ही नही बल्कि एक दिल मे बसाने वाले व्यक्ति थे । कृष्ण और खुसरू को अपनी धड़कन में पिरोने जानते थे और दुनिया की सबसे मासूम क़ौम में भरपूर जगह रखते थे । यह क़ौम थे,बच्चे । बच्चे जिसे मोहब्बत करने लगे,बच्चों को जो मोहब्बत करने लगे,समझ लो कि अबयहाँ मक्कारी नही बल्कि हृदय की पवित्रता का जादू चलेगा ।

मैं अपनी मुलाकातों का ज़िक्र नही करता हूँ मगर यह अनुभव ज़रूर बता सकता हूँ कि आजतक मिली हर शख्सियत से उनका मिलना सबसे अलहदा और सबसे पवित्र था । आज उनका जन्मदिन है, सिर्फ इसलिए लिख रहें कि जिस चश्मे से उन्हें देखिएगा,उसी चश्मे से हर उसको देखिएगा,जिसे आप मानते हैं । अगर राजनीति में कोई डा कलाम से बीस होगा तो सरलता में सत्तरह ही होगा, कोई विज्ञान में बीस होगा तो सच्चाई में अठ्ठारह ही होगा । कलाम हो सकता है हर ओर अठ्ठारह ही हों मगर जिधर हैं, तो उधर मज़बूत हैं ।

मैं हमेशा उसे ही लीडर मानता हूँ जो बहुत सारे विषयों में दखल रखता हो,जो बहुत तरह के काम कर सकता हो,जिसकी आंखों में घोड़े वाली पट्टी न बंधी हो, जो उसे एक ही दिशा में दौड़ाए,मेरा लीडर हर दिशा में दौड़ने वाला होगा, भले वह सेकंड या थर्ड आए मगर उसकी मौजूदगी हर ओर हो और ऐसी खूबी वाले डॉ कलाम ही वह आखरी व्यक्ति थे,जिनसे हमने हाथ मिलाया था । इंतेज़ार है कि कोई तो आए, जो बैठे तो विषय की बाध्यता न रहकर उसका वजूद बोलता रहे,कलाम ऐसी ही भरपूर शख्सियत थे ।

 आजकल तो आप बहुत बहुत याद आते हैं, जब जब प्रेम कमज़ोर होगा, कलाम की ज़रूरत बढ़ती ही चली जाएगी,कलाम प्रेम में ज़िन्दा रहते हैं और प्रेम के खत्म होने पर प्रेम को लाने के लिए उठ खड़े होते हैं,कलाम मरा नही करते हैं....
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