आज बताइये रोएँ या खुश होएं।एक तरफ है कलम जी रहा तो दूसरी तरफ कलम की आवाज़ की रूह जा रही।एक तरफ क़िस्से खुद को कहने की क़तार में खड़े होने को बेचैन हैं तो दूसरी तरफ क़ुदरत की आवाज़ ज़मीन में दबने को तैयार।एक ने सियाही में डूबने को आज ही आया और एक है जो सियाही में डूबने की आवाज़ को यूँहीं हवा में तैराकर खामोश हो गया।
कहते हैं रोज़ ही लाखों मरते हैं और लाखो पैदा होते हैं।पैदा होती इस खेप से इतना तो तय है की ईश्वर का अभी दिल भरा नही है और वह दुनिया को थोक के भाव नए लोग भेज रहें हैं।इनमे से छाँटो बीनो मतलब के लोग और उन्हें तराश कर अपने लिए ख़ास बना लो।इतना खास की जब यह जाएँ तो यह लाखों के बराबर क्या उससे भी ज़्यादा हों।इनका मरना और इनका पैदा होना लाखों के लिए उस दिन पैदा होने और मरने की शोहरत का दिन हो जाए।
एक फटे जूते पहनकर समाज की खुली सीवन को टंकता गया तो दूसरा बेचैन,टूटते,बिखरते दिलों को आवाज़ देकर मुक़म्मल दिल बनाता हुआ चला गया।आजका दिन खास है।आजका दिन दो जिस्मों के लिए एक ज़मीन पर आने जाने का दिन है।
आज प्रेमचन्द की पैदाइश तो मोहम्मद रफ़ी की रुखसती का दिन है।एक ने हमीद के हाथ में चिमटा पकड़कर ईदगाह को उकेरा तो दूसरे के गले से फूटा भजन हर मन्दिर के गलियारे में फैल गया।दोनों ने अपने फ़न की बुलन्दी को छूकर भी दिल और दिमाग को ज़मीन पर रखा,यही तो इनकी खासियत है।
मेरी ज़िन्दगी को तराशने में रफ़ी और प्रेमचन्द दोनों को बड़ा हाथ है।एक ने मुझे लिखना सिखाया तो दूसरे ने रूह को इतना नरम बनाया की उसमे गुरूर,झगड़ा,बदला सब खत्म होकर संगीत उभरा।इस पर भी दोनों ने कभी अँगूठा नही माँगा।मैं रफ़ी के गाँव में मौजूद उस वक़्त को याद करते करते रो देता हूँ जब एक फ़क़ीर को अपनी आवाज़ सुनाने को बेचैन रफ़ी,दरवाज़े की ओट लगाए खड़े थे।फ़क़ीर उनको सुनता जाता और कहता जाता की तू बहुत ऊंचाई पर जाएगा क्योंकि तेरी आवाज़ में ख़ुदा है।मैं रफ़ी को यूँ घर छोड़ते भी सिसक जाता हूँ जब बाप ने कहा की ठीक है, तुम मुम्बई जाओ मगर तब ही लौटना जब कामयाब होना वरना भूल जाना यह दर ओ दीवार।
मैं मुम्बई से हारकर लौटे प्रेमचन्द को भी देख मायूस हो जाता हूँ मगर यहाँ उनकी अपनी कोशिश पर हिम्मत आती है।फटे जूते ग़ुरबत की शिकायत भले करें मगर माथे पर बिखरी लकीरें अफ़साना निगार की गहराइयों की चुगली करती रहती थीं।
खैर आज प्रेमचन्द और रफ़ी साहब दोनों को एक साथ मिलाकर महसूस करने का दिन है।हमारी ज़मीन के खूबसूरत आँगन में आज प्रेमचन्द ने पाँव रखे तो रफ़ी वह आँगन अपना काम करके छोड़कर आगे बढ़ गए।जन्मतिथि और पुण्यतिथि में आज एकसा खालीपन है।प्रेमचन्द रफ़ी की आवाज़ सुनकर मुस्कुरा रहें हैं तो रफ़ी प्रेमचन्द के अल्फ़ाज़ों को आवाज़ देकर गीत बना रहें हैं।यहाँ मैं उनकी आवाज़ को सुन रहा हूँ,वह प्रेमचन्द को आज गा रहे हैं....