Sunday, July 30, 2017

प्रेमचन्द और रफ़ी

आज बताइये रोएँ या खुश होएं।एक तरफ है कलम जी रहा तो दूसरी तरफ कलम की आवाज़ की रूह जा रही।एक तरफ क़िस्से खुद को कहने की क़तार में खड़े होने को बेचैन हैं तो दूसरी तरफ क़ुदरत की आवाज़ ज़मीन में दबने को तैयार।एक ने सियाही में डूबने को आज ही आया और एक है जो सियाही में डूबने की आवाज़ को यूँहीं हवा में तैराकर खामोश हो गया।

कहते हैं रोज़ ही लाखों मरते हैं और लाखो पैदा होते हैं।पैदा होती इस खेप से इतना तो तय है की ईश्वर का अभी दिल भरा नही है और वह दुनिया को थोक के भाव नए लोग भेज रहें हैं।इनमे से छाँटो बीनो मतलब के लोग और उन्हें तराश कर अपने लिए ख़ास बना लो।इतना खास की जब यह जाएँ तो यह लाखों के बराबर क्या उससे भी ज़्यादा हों।इनका मरना और इनका पैदा होना लाखों के लिए उस दिन पैदा होने और मरने की शोहरत का दिन हो जाए।

एक फटे जूते पहनकर समाज की खुली सीवन को टंकता गया तो दूसरा बेचैन,टूटते,बिखरते दिलों को आवाज़ देकर मुक़म्मल दिल बनाता हुआ चला गया।आजका दिन खास है।आजका दिन दो जिस्मों के लिए एक ज़मीन पर आने जाने का दिन है।

आज प्रेमचन्द की पैदाइश तो मोहम्मद रफ़ी की रुखसती का दिन है।एक ने हमीद के हाथ में चिमटा पकड़कर ईदगाह को उकेरा तो दूसरे के गले से फूटा भजन हर मन्दिर के गलियारे में फैल गया।दोनों ने अपने फ़न की बुलन्दी को छूकर भी दिल और दिमाग को ज़मीन पर रखा,यही तो इनकी खासियत है।

मेरी ज़िन्दगी को तराशने में रफ़ी और प्रेमचन्द दोनों को बड़ा हाथ है।एक ने मुझे लिखना सिखाया तो दूसरे ने रूह को इतना नरम बनाया की उसमे गुरूर,झगड़ा,बदला सब खत्म होकर संगीत उभरा।इस पर भी दोनों ने कभी अँगूठा नही माँगा।मैं रफ़ी के गाँव में मौजूद उस वक़्त को याद करते करते रो देता हूँ जब एक फ़क़ीर को अपनी आवाज़ सुनाने को बेचैन रफ़ी,दरवाज़े की ओट लगाए खड़े थे।फ़क़ीर उनको सुनता जाता और कहता जाता की तू बहुत ऊंचाई पर जाएगा क्योंकि तेरी आवाज़ में ख़ुदा है।मैं रफ़ी को यूँ घर छोड़ते भी सिसक जाता हूँ जब बाप ने कहा की ठीक है, तुम मुम्बई जाओ मगर तब ही लौटना जब कामयाब होना वरना भूल जाना यह दर ओ दीवार।

मैं मुम्बई से हारकर लौटे प्रेमचन्द को भी देख मायूस हो जाता हूँ मगर यहाँ उनकी अपनी कोशिश पर हिम्मत आती है।फटे जूते ग़ुरबत की शिकायत भले करें मगर माथे पर बिखरी लकीरें अफ़साना निगार की गहराइयों की चुगली करती रहती थीं।

खैर आज प्रेमचन्द और रफ़ी साहब दोनों को एक साथ मिलाकर महसूस करने का दिन है।हमारी ज़मीन के खूबसूरत आँगन में आज प्रेमचन्द ने पाँव रखे तो रफ़ी वह आँगन अपना काम करके छोड़कर आगे बढ़ गए।जन्मतिथि और पुण्यतिथि में आज एकसा खालीपन है।प्रेमचन्द रफ़ी की आवाज़ सुनकर मुस्कुरा रहें हैं तो रफ़ी प्रेमचन्द के अल्फ़ाज़ों को आवाज़ देकर गीत बना रहें हैं।यहाँ मैं उनकी आवाज़ को सुन रहा हूँ,वह प्रेमचन्द को आज गा रहे हैं....

Saturday, July 29, 2017

चलो हटो

उसकी शलवार से ख़ून टपक रहा था।रिस रिस कर ज़मीन पर एक ख़ून की धार सी करीब डेढ़ मीटर की बन गई थी।शलवार के पायंचे उतर कर पैर के पंजो में फंसे थे।शरीफ महल्ले का मामला था तो लोगो ने एक तहमद ऊपर के जिस्म में डालकर इज़्ज़त ढक ली थी।उसका सीना इतना फैल चुका था की लग ही नही रहा था औरत का है।पूरा तहमद जिस्म पर सपाट सा पड़ा था।चेहरा खुला था,आँखे भी पूरी खुली थीं।किसी ने उसे बन्द करने की ज़हमत नही की।खुली आँखों में रात के नंगेपन को साफ़ तरह देखा जा सकता था।

मैं खड़ा देखता रहा।हल्का हल्का सुनने में आया की गई बारिश की रात कोई चार लड़के इसे यहीं छोड़ गए थे।उसका एक हाथ तहमद से बाहर था।गोरा था काफी।करीब जाने पर उन गोरे हाथों में नाखुनो के निशान दिखे ,जिनपर ख़ून जमकर काला पड़ गया था।जब गौर से बिना शिकन वाला माथा देखा तो अंदाज़ा हो गया की करीब चौदह या पन्द्रह साल की रही होगी,बेचारी।कुछ लोग अफसोस कर रहे थे तो कुछ बेहद गुस्सा।मैं सोच रहा था कौन कमबख्त लोग रहे होंगे जिन्होंने इसकी यह हालत कर दी।हालत क्या,मार ही डाला।बार बार उसकी हरी और पीले फूल वाली शलवार दिख रही थी।

आँखे हटती फिर टिकती।सभी का यही हाल था।सुबह से काफी देर मैं यही देखता रहा।ख़ून खौल भी रहा और जम भी रहा।मन सोच सोच के परेशान की कौन लड़की थी।इसके परिवार पर क्या असर होगा।माँ तो इसकी टूट ही जाएगी।बाप तो ज़मीन में धँस ही जाएगा।अगर भाई हुए तो तड़प कर रह जाएँगे।तहमद से हल्का झलकता पेट देख लगता बेचारी पता नही किस खूबसूरत,नाज़ों से पली खानदान की है।तभी हवा में नाम तैरा।जाति उछली।धर्म चीखा और इस तरह सारा दर्द खाँचो में बंटकर बिखर गया।एक को धकियाते हुए कहा चलो हटो।रास्ता दो।यह सब होता रहता है......

Friday, July 28, 2017

राबिया और मीरा

हो सके तो दो दिशाओं में रखे दिलों की एकसी धड़कन पर कान रखना,दोनों से एक सा संगीत उभर रहा है,ऐसा संगीत जो ईश्वर ने इनके दिलों के सिवा भला कहाँ सुना होगा।जब एक तरफ राबिया बसरी थी तो दूसरी तरफ मीरा थीं।
राबिया ने रेत पर पाँव धरा और निशान मीरा के पाँव के उभरे।बसरा की गलियों में राबिया ने मोहब्बत को मुट्ठी में भर कर उछाला और प्रेम की आँधी यहाँ मीरा के आँचल में आ गई।सर से दुपट्टे को खींच राबिया ने चीखकर कहा की हाँ मुझे उससे मोहब्बत है जिसके सामने सब झुकते हैं तो मीरा ने सर से घूँघट को उलट कर कान्हा से प्रेम का एलान कर डाला।अजब थीं यह दो औरतें, अजब था इनका प्यार।दोनों ने ज़माने से बगावत की और दोनों ने मोहब्बत की,मोहब्बत उससे जिससे क्या औरत क्या आदमी सब डरते हों,पूजते हों।

राबिया एक हाथ में आग और एक हाथ में पानी की बाल्टी लिए चली जा रहीं थीं, की किसी आदमी ने कहा राबिया  इश्क़ में किस क़दर बहक गई हो जो आग और पानी साथ लिए जा रही हो।पलट कर राबिया ने कहा मैं आज दोज़ख में पानी डालकरउसकी आग बुझाकर उसे ठंडा कर दूँगी और जन्नत में आग लगा दूँगी।उस फ़र्क़ को मिटा दूँगी जो एक को नज़रे झुकाने पर मजबूर करे और एक को गुरूर भरी नज़र दे।पैर को छन छन पटकते जब राबिया इश्क़ हक़ीक़ी में जा रहीं थीं तो उसकी छनक यमुना के कनारे रखी बाँसुरी में हरकत पैदा कर रही थी।

दूसरी तरफ रेगिस्तान से प्रेम में मतवाली मीरा सब छोड़कर गोकुल पहुँच गईं।गोकुल में गोपाल की चौखट के पीठाधीश ने मीरा से यह कहकर मिलने से इंकार कर दिया की वह पुरुष हैं और किसी महिला से नही मिलते।मीरा ने पलट कर कहलवा दिया की वाह,मैं तो समझती थी की इस पृथ्वी पर केवल एक ही पुरुष है और वह है मेरे कान्हा।।यहाँ तो और भी पुरुष हैं।यह जवाब सुन मीरा के पास नँगे पाँव भागकर आए पीठाधीश की तड़प वृंदावन में उठी मगर महसूस बसरा में की गई।

ऐसा नही है की मुझे इश्क़ नही या इसका एहसास नही मगर मैं आजभी मीरा और राबिया के दिल में उठी मोहब्बत से बाहर ही नही आ पा रहा हूँ।ऐसी मोहब्बत जो ज़माने की ज़ंज़ीर तो तोड़े मगर अपनी रौशनी से कई सदियों को जोड़ दे।जिसको पढ़ भर लेने से दिल की बेचैनी सुक़ून में बदल जाए।एक ऐसा इश्क़ जिसके सामने आसमान झुक जाए और उसपर पलथी मारे बैठा ईश्वर,बाहें खोल ज़मीन पर उतर आए।जिसमे डर न हो,जिसमे लालच न हो,जो हो तो और कुछ न हो,ऐसा इश्क़।।मैं फरहाद,मजनू,रोमियो से पार मीरा और राबिया की धूँधली शक्ल देख रहा हूँ।वह मुस्कुरा रहीं हैं और शब्द यहाँ बहते चले जा रहें हैं....

Friday, July 21, 2017

चाय चटनी और हम

भला होए मुए अंग्रेज़ों का जो आए तो कम से कम एक आध चीज़ ढंग की दे गए।ई जो दो चार पसलियों के बीच फंसा दिल है न,ई सिर्फ अंग्रेज़ों की एकही बात पर छलाँग मारता है वह है चाय।

ज़रा सोचें की अंग्रेज़ चाय की पत्ती को सुखाकर उबालना और उबालकर पीने का जादूई पानी न दे गए होते तो क्या होता।एक बार तो हमे लगा की अगर असम के खेत की जगह अवध की चौखट पर चाय के पौधे उगे होते तो इतना तो जान लें की अंग्रेज़ों के मुँह से ख़ून आ जाता तब भी वह चाय पिला न पाते।

जानतें हैं क्यों,क्योंकि अवध की औरते तो हर हरी पत्ती देख चटनी बनाने में माहिर हैं।चाय की पत्ती में लस्सुन,मिर्चा, नमक मिलाकर सिल पर पीस देती और मोटी रोटी के साथ थाल सजा देंती,लीजिये चाय की चटनी और फलानी रोटी।अँगरेज़ भी सर पीट लेते और चाय भी अपने द्रव अवस्था से गारा अवस्था में आ जाती।

ई ही लिए कहते हैं अँगरेज़ बड़ा उपकार किहिन की पहले ही पीने का पूरा तरीका सिखा गए,वरना पक्का चटनी ही मिलती।खैर चाय में दूध मिलाकर हमने उसे अपनी गोरा करने वाली खसलत में तो ढाल ही लिया है।अंग्रेज़ों को लगता था की हम काली चाय पियेंगे,बदअक़्ल,जब हम चमड़ी गोरी करने के लिए अलानी फलानी लवली क्रीम का बाजार बना सकते हैं तो चाय काली पियेंगे,दूध मिलाकर उसे भी गोरा कर लिया।।गोरी गोरी घोसी वाली चाय।।।

सच में मैं सोचकर ही डर गया था की अगर चाय इस रूप में हमे न मिलती तो हम इसे कैसे इस्तेमाल कर रहे होते।न होता तो एक आध तम्बू वाले वैद्य इसकी डंठल से दातून बनाकर दाँतो को चमकवा रहे होते या कोई पुराने खानदानी हक़ीम मर्दाना कमज़ोरी का इलाज भी इसी के काढ़े में ढूंढ लाते।खैर अंग्रेज़ों ने ई सबसे अलग हमे एक बढ़िया पेय दिया और हमे वैसे भी हर चीज़ को उधिया कर लेने की आदत है तो हमने सुबह की पहली किरण से शाम को दम तोड़ते सूरज और रात को चांदनी उगलते चाँद तक इस चाय को अपना लिया और ज़रूरी काम की तरह वह ज़िन्दगी में शामिल है।दो वक़्त के खाने के साथ तीन वक़्त की चाय जड़कर हमने चाय को बराबर बैठा लिया।मेरे मामले में तो कमबख्त चाय मोहब्बत है, हाँ मोहब्बत....

Thursday, July 20, 2017

शीरा

एक बार शैतान ने एक इनसान को बहकाने की कोशिश की।उसे बहुत तरह बहकाया,फुसलाया,फसाया मगर वो उसकी चाल में रत्ती भर ना आया।इंसान शरीफ था साथ ही खूबसूरत दिल का मालिक तो उसपर शैतान का एक भी जादू न चला।आख़िर में झल्ला कर शैतान ने उससे कहा की अच्छा यार मेरा एक़ मामूली सा काम तो  कर दोगे ना।

उस इंसान ने हमदर्दी खाकर हांमी भर दी और पूछा क्या करना है ।झट से शैतान ने पास में हलवाई की कढ़ाई में जलेबी के लिए तैयार हो रहे शीरे में ऊँगली डाली और कहा ये लो शीरा और इसे बस जुम्मन की दुकान की दीवार पर लगा दो।उसने ऐसा ही किया एक बूँद शीरा दीवार में लगा दिया और पूछा इससे क्या होगा?यह क्या फ़ालतू का काम था।

तो शैतान ने कहा चलो दूर बैठ के देखते हैं।कुछ देर बाद शीरे पर कई सारी मक्खियाँ आकर बैठ गयी।मक्खियों को देख छिपकली उसे खाने आ गयी।छिपकली दुम हिलाती उधर पहुंची,मक्खियाँ तो उड़ गईं मगर छिपकली पर कहीं से एक बिल्ली लपकी।बिल्ली को देख पास ही टहल रहे शुक्ला जी का कुत्ता उस पर टूट पड़ा।कुत्ते के कूदने से मिठाई की थाल जो गिरी तो गिरी,जुम्मन हलवाई का पारा सातवें आसमान पर।जुम्मन ने कुत्ता देख गाली गलोज शुरू करदी।बहस करते करते कुत्ते के मालिक शुक्ला जी का कॉलर पकड़ लिया।

यह बात दूर क़स्बे तक फैल गयी की एक जुम्मन ने हमारे शुक्ला जी पर हाथ उठाया।उसकी इतनी हिम्मत की हम पर हाथ उठाए।हम क्या अब इन जुम्मन से दबकर रहेंगे।दूसरी तरफ इसकी भनक पहुँची तो उधर भी पूरी क़ौम जुम्मन की टोपी के नीचे आ गई।एक तरफ की भीड़ जनेऊ के धागे में बंध गई तो दूसरी तरफ टोपी में सिमट गई।पूरा शहर आग के हवाले हो गया,दोनो तरफ के सैकड़ो मासूम मार दिये गये।जले घरों से उठता धुआँ देख शैतान ठाहाके मारकर हँसा और वो इंसान अपनी ऊँगली पर लगा शीरा देखता रह गया।जैसे हम लोग अक्सर सब मिटने के बाद देखते रह जाते हैं, ठीक वैसे ही,ठहाके और चीखें उसे शून्य की तरफ ले जा रही हैं......

Wednesday, July 12, 2017

बारिश बिरहीं अंदरसे

बारिश में सिर्फ फलेंदे ही नही आते।पीले मेढक भी तो दिखते रहते हैं।वैसे जब बारिश का ज़िक्र होता है तो प्रकृति की उपज के ही इर्द गिर्द हम ठहर जाते हैं।कभी हरियाली तो कभी फल तो कभी कीड़े मकौड़ों के ज़िक्र से ही खुश हुआ करते हैं।
बारिश जो हमारे दिलों में आती है, उसे भी तो अल्फ़ाज़ मिल ही जाते हैं मगर जो बारिश हमारे बावर्चीखानों में आती है उसका क्या।।

चार बून्द गिरी नही की ज़बान बेसन प्याज़ की पकौड़ी के नाम से कुलबुलाने लगती है।पकौड़ी न भी हो तो चाय तो बारिश साथ ही लेकर आती है।अगर हम बारिश को नज़दीक़ से देखें तो यह पकौड़ी से बहुत आगे निकल चुकी होती है।हमारे घरों में सादे से पराठे चने की दाल से प्रेग्नेंट होकर बिरहीं बन जाते हैं।बारिश में बिरहीं का खाया जाना भी तो एक बेहतरीन शगल है।भले पड़ोस में बाढ़ आई हो मगर बिरहीं के क्या कहने,ज़बान ऐसे बहकाती है जैसे बिरहीं न बनी तो बारिश फ़िज़ूल है।

खैर बिरहीं से जब दिल भर जाए तो ज़बान मीठे की तरफ राल टपकाती है और नंबर आता है तिल्ली से मेकअप किये अंदरसे का।।।बारिश हो और अंदरसे की गोलियाँ न हों तो बारिश को क्या कहें,सिर्फ कीचड़।।रुदौली के अंदरसे तो अपने आप में अव्वल हैं।मुझे तो लगता है रुदौली में मजाज़ के बाद कोई मशहूर हुआ तो वह अंदरसे ही हैं जिसने मजाज़ के जज़्बात से निकले अल्फ़ाज़ पर अपनी मिठास उड़ेल दी।खैर हम भी बकरी चराने लगे।बात कहाँ की कहाँ पहुँचा दी।

हाँ तो बारिश में घर में या बाहर बनने वाले उन पकवान को खींचकर घर तक ज़रूर लाइए जो आपने बचपन में खाया होगा।यह पकवान परम्परागत तरीके से अगली पीढ़ी तक जाने चाहियें।इनका ज़िक्र होना चाहिए ताकि यह भी पता चले हमारे बुज़ुर्ग हर मौसम का कैसे लुत्फ़ लेते थे।मुश्किल से मुश्किल वक़्त में भी वह ज़िन्दगी के मज़े लेकर मुस्कुराते रहे और उनमे से छोटी छोटी खुशियाँ ढूंढकर उन्हें बड़ी ख़ुशी बनाते रहे।
यह हैरान परेशान नौजवान मौसम मुस्कुराना ही तो भूल गए हैं।ठहाके तो हैं मगर उनमे फीकापन है।हँसी तो है मगर बनावटी।।।सबके साथ बैठकर हर मौसम की खूबी के पकवानो को चखिए।मज़े लीजिये वरना बारिश तो आती जाती रहेगी ही।लुत्फ़ नही उठाएँगे तो सड़क पर सिर्फ कीचड़ ही तो नज़र आएगा जो दिन बदिन बढ़ता जा रहा है।।।

Monday, July 10, 2017

प्रेम गीत

हाँ तो मैं अब प्रेम गीत लिखूँ।वह गीत जिसमे बच्चों की भूख मत हो।वह पंक्तियाँ जो गरीब के ज़िक्र से गरीब न हों।ऐसा गीत जिसमे बेकसूरों की मौत की चीख़ न हो।मैं चाहता हूँ झर झर झड़ती बारिश पर लिखूँ।मदमस्त भौरों पर लिखूँ।मन्द मन्द हवाओं को लिखूँ।मेरे लिखने में चीखें एक बाधा है।जब मैं भौरों की आवाज़ सुनता हूँ तो मुझे भीख माँगते बच्चों की भिनभिनाहट सुनाई देती है।कैसे लिखें प्यारे भौरों पर।मेरी कलम बारिश की हर बून्द को समेट लेना चाहती है मगर उस औरत के आँसू मेरी कलम को खट्टी कर देते हैं।मैं सावन की बिखरी हरियाली पर कलम धरना चाहता हूँ मगर बर्फ़ में बिखरी लाशें मेरी सियाही जमा दे रही हैं।

मैं फूलों को छूकर अपनी कलम में सियाही भारना चाहता हूँ मगर ज़मीन से उठती भीनी भीनी नफ़रत की गर्मी मेरे फूलों को कुम्हला देती है।तुम्ही बताओ मैं कैसे प्रेम गीत लिखूँ।वक़्त घटता जा रहा है, कलम सूखती जा रही है, कोई यह जल्दी से तक़लीफ़ की बदसूरत तस्वीर को हटाए ताकि मैं झट से उठकर प्रेमगीत लिखूँ।जिसमे श्रृंगार रस का अनन्त रस भरा हो।जाओ कह दो अब मैं लिखूंगा वह गुलाबी गुलाबी गीत जिसे पढ़ वह खूबसूरत होंट मुस्कुराएंगे।जिनके शब्द खूबसूरत गालों को छूकर खुशबू बिखेरेंगे।

जाओ मैं तुम्हारी परवाह नही करता।मैंने भूख,चीख,तड़प, प्यास,टूटन,बिखरन,मौत सबसे मुँह मोड़ लिया है।हाँ हाँ तुम समझ लो यहाँ मेरे अंदर का इंसान मर चुका है और मेरा कवि हृदय ज़िंदा होकर आज कालजयी प्रेमगीत रचने वाला है।वह गीत जो कभी नही लिखा गया।ख़ून से सनी ज़मीन में खड़ा मैं आज नफ़रत से भीगी सियाही से वह अमर प्रेम गीत लिखने वाला हूँ जो मेरी कलम को अमर और मुझे मरा हुआ बना देगा।मेरे हाथ अब रोज़ रोज़ बेकसूरों की मौत की आवाज़ सुनकर हरकत करना बन्द कर चुके हैं।कफ़न से ढकी सात आठ लाशें अब मुझे किसी कॉपी के सादे वरख से लगते हैं।मैं इनपर प्रेम गीत लिखने वाला हूँ।खुद के अंदर हल्की सी बची इंसानियत को मारकर अमर प्रेम गीत की रचना बस चन्द लाश दूर है....

Sunday, July 9, 2017

सावन

पूरे साल तुम्हारी एड़ियों से घिस घिस करके जो वह अपना रूप बिगाड़ लेती है।तुम्हारे गन्दे दिमाग से उपजे कामो को बर्दाश्त करते करते उसकी मुस्कान मिट जाती है।तुम सब जो पूरे साल उसकी छाती पर मूँग दलते हो,वह इससे इसी महीने निपटती है।

सावन मेरी धरती के मेकप का महीना है।पूरे साल जितना तुम बिगाड़ते हो उससे ज़्यादा वह इस महीने में कवर कर लेती है।सावन का महीना हमारे हिस्से की धरती के निखरने का महीना है।वह इस महीने इतना कुछ खुद में समेट लेगी की तुम साल भर लूट लूट कर खाना,बिना फ़िक्र किये उसकी हरी घाँस में ख़ून को बहाते जाना,वह सब पीकर तुम्हे अच्छे फल,फसल और पानी देती रहेगी।सावन जितना धरती के ऊपर उसे निखारेगा उससे कहीं ज़्यादा धरती के अंदर निखरेगा।

खैर अगर इस महीने में भी तुम्हारा दिमाग ताज़ा न हुआ।उसमे कहीं खुरचन भर भी नफ़रत रह गई।इस महीने के गुज़रने के बाद भी अगर तुम अपने साथ के नागरिकों से लड़ते रहते हो तो यह सेवन सिर्फ और सिर्फ धरती के लिए आया है।तुम्हारे लिए नही।।।

हो सके तो झूले पर अपने उन दोस्तों के साथ बैठ जाओ,जिन्हें राजनीती,धर्म या जाति की वजह से पीछे छोड़ आए हो और लम्बी लम्बी पीगें बढ़ाओ ताकि देश लहलहाता हुआ आगे खुले आसमान में बढ़ जाए....यही तो सावन की आमद है।मज़े करो,दिमाग को ताज़ा और खुशबूदार करो,ताकि इस बार भी यह सावन निराश न जाए।।।।।।

Saturday, July 8, 2017

गुरु पूर्णिमा

हल्की हल्की गर्मी तो कभी हल्की ठण्ड।बारिश भी भिगो भिगो करके दिमाग को ताज़ा कर देती।यह मौसम आज का नही है, सदियों से हैं।आषाढ़ की खूबसूरती और ताज़गी ने हमेशा हमारे दिमाग की बन्द तहों को खोला है।बहुत करीब से देखिये तो जुलाई में खुलने वाले स्कूल उसी परम्परा का हिस्सा हैं जो कहती है की यह मौसम नए बीज के अंकुरण का है।

आषाढ़ की पहली पूर्णिमा इसीलिए तो वेद व्यास को आज ही जनमती है।संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान और महाभारत के रचयिता वेद व्यास के जन्म में छुपी इस पूर्णिमा की गुत्थी बड़ी ही गहरी है।धरती पर मानव जन्म से इन दिनों को ज्ञान अर्जन के सर्वश्रेष्ठ दिनों में गिना जाता रहा है।यह सच भी है जुलाई में रोपा ज्ञान धान की फसल की तरह अच्छी पैदावार करता है और ज़्यादा समय तक ज़हन में रहता है।

आजके दिन गु और रु को समझने का भी दिन है।गु है अंधकार और रू है उसे रोकने वाला।तभी तो वह है गुरु और आज है पूर्णिमा।प्रकाण्ड विद्वान के जन्म की पूर्णिमा जिसने अपने रचे पदों को ऐसे शिष्यों को कंठस्त करा दिया की वह रचनाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी आज ज़मीन के छोटे से हिस्से पर रहने वाली सबसे बड़ी आबादी में फैल गया।यानि महर्षि वेद व्यास का जन्म।यानि व्यास पूर्णिमा।यानि गुरु पूर्णिमा।

आज उन हर गुरु को याद कीजिये जिन्होंने कान उमेठे।जिन्होंने छड़ियों से अपने ज्ञान को हमारे दिमाग की जगह हथेली में ठूंसा।उन्हें भी याद कीजिये जिन्होंने हमे इंसान बना दिया।हर एक के हिस्से में भले वेद व्यास न हों मगर हर एक के हिस्से में गुरु ज़रूर रहें हैं।अब वह गुरु चाहे जिसे अँधेरा समझते हों,उन्होंने उसे दूर तो किया है।मेरे लगभग सभी गुरु मानवता के बड़े पैरोकार रहे।हम सबकी ज़िन्दगी में गुरुओं की छाप दिखती ही है।आज गुरु पूर्णिमा पर हर उसको भी याद करने का वक़्त है जिसने हमे कुछ भी सिखाया।यह गुरु हमारे छोटे छोटे वेद व्यास ही तो हैं।गुरु पूर्णिमा को अंदर झांकिए और हो सके तो इंसान बन जाइये।क्योंकि गुरु शिष्य परम्परा सिर्फ इंसानों में हैं और इंसान होने की पहली शर्त ही मोहब्बत,समर्पण,त्याग है।बधाई सभी गुरुओं को......

Thursday, July 6, 2017

दँगे दँगे

दूर एक हाथ कटा पड़ा था।उस हाथ का जिस्म अलग एक खम्भे से टेक लगाए पड़ा था।शायद औरत थी।करीब से देखा तो फुसफुसा रही थी और करीब गया तो फुसफुसाहट समझ आने लगी।एक हाथ से हाथ जोड़ते हुए वह कह रही है"मेरी बेटी से एक एक करके बलात्कार करो,एक साथ करोगे मर जाएगी।वह मर जाएगी,ए आदमियों इधर आ जाओ,उसपर एक साथ मत टूटो, वह मर जाएगी।"

यह शब्द अगर किसी इंसान ने सुने होते तो उसके जिस्म की अकड़न शर्मिंदगी से खुद बखुद खत्म हो जाती।दूर उसकी आठ साल की बच्ची पड़ी थी।करीब जाकर देखने पर महसूस हुआ जो हमारे लिए आठ साल की बच्ची थी,वह अभी किसी वहशी झुँड के लिए औरत थी।

कभी उस औरत को देखता तो कभी उस बच्ची को,तो कभी जले हुए घर देखता तो कभी बारिश की तरह बिखरे पड़े ख़ून को।लड़की के होंट वहशियों की गन्दगी से छुप गए थे।रुमाल को गीला करके मैं उसके मुँह को साफ़ करता की आँसू फिर टपक कर उसका मुँह गीला कर देते।मैं बार बार साफ़ करता,वह बार बार गन्दा हो जाता।उसके जिस्म से उठती दूसरे झुण्ड की बदबू दिमाग में इस तरह चढ़ी की कल दोपहर की पी चाय एक झटके में मुँह से निकल गई।

किसी ने आकर मुझे उठाया,मैंने पलट कर सवालिया अंदाज़ में उसे देखा।उसने कहा दोस्त परेशान मत हो।दंगो में ऐसा ही होता है।भीड़ किसी को भी नही बख्शती।यह हमारा दुर्भाग्य है की हम इसमें फंस गए।दँगे हर एक को खत्म कर देते हैं।यही बहुत रहा की हम ज़िंदा बच तो गए।।।।।वह मुझ मुर्दे से बोले जा रहा था जैसे वह बोले जा रही थी।"मेरी बेटी से एक एक कर के बलात्कार करो,एक साथ मत करो,वह सह नही पाएगी,मर जाएगी"

Wednesday, July 5, 2017

भीख के हाथ

मैं तड़प कर रह गया जब एक बच्चा भगवान की तस्वीर लिए मेरे सुक़ून भरे दिनों की प्रार्थना कर रहा था।भीख माँगता वह बच्चा भगवान को हाथ में लिए सख़्त धूप में कभी इधर भागता तो कभी उधर भागता।उसके पैर में न चप्पल और तन पर न ढंग का कपड़ा।आँखे धँसी और भूख से ग़ायब पेट ऊपर से ज़ेबरा लाइन से झलकती पसलियां।वह बार बार भगवान की तस्वीर मेरे सामने बढ़ा दे,आखिर रुक कर मैंने उस भगवान पर ही सवाल कर दिया,जो तुम्हे इस क़दर धूप में दूसरे इंसानों के सामने हाथ फैलवा दे,वह भगवान किस काम का,वह तुम्हारे कहने से दूसरे का क्या भला करेगा।

मैं बार बार सोचूँ की यह जो भगवान है किस काम का है।इस बच्चे की मदद कर नही पा रहा और बच्चा इनसे अपनी मदद की जगह हमारी मदद की भीख माँगकर दो रूपये की जुगाड़ कर रहा है।कितना अजीब है न।बच्चों को भीख माँगता देखना मेरे दिल को बेहद तड़पाता है।मैं भगवान की लानत मनामत करता हुआ मार्क्स लेनिन तक पहुँच गया।पूंजीवाद,साम्राज्यवाद तक सोच डाला।इस पूरी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करता हुआ कॉफी हॉउस में दो कप कॉफी उँडेल गया।गाँधी के बारे में सोचा,तो थोड़ा सा विवेकानंद भी सरक कर आ गए।मदर टेरेसा भी सफ़ेद चादर ओढ़े हमारे इस ग़म में शामिल हो गई।

मैं मेज़ पर बैठा उस भगवान की उस बच्चे की हथेली में बैठे होने की मुस्कान सोच सोच कुढ़ने लगा।कैसे भगवान है जो बच्चे से भी भीख मनवा रहें हैं।इसका मतलब यह तो हैं ही नही।कोई भगवान हो ही नही सकता जो बच्चों के जलती सड़क पर नँगे पाँव चलने से तड़प न जाए।तभी कॉफी हॉउस से बाहर निकला।वारामदे में कुछ लोग ज़मीन पर किताबें और पोस्टर बेच रहे थे।

मेरे मन में कौंधा की आखिर कितनी नामवर नामवर फ़ोटो यहाँ सजे हैं।क्या इनके नाम पर कोई एक रूपये देगा।मैंने सोचा की यह बच्चा अगर गाँधी,टेरेसा,लेनिन,मार्क्स की तस्वीर लेकर सड़क पर निकले तो क्या कुछ मिलेगा।नही,बिलकुल भी नही।तब मुझे वह मुस्कुराते हुए भगवान याद आ गए।जो हैं की नही।थे या नही।कुछ पता नही।मगर अपनी मामूली सी तस्वीर से दो वक़्त के खाने का जुगाड़ तो करवा ही दे रहें हैं।जिस दिन किसी की तस्वीर,किसी के पेट की भूख मिटाने लग जाएगी उस दिन भगवान का भरम टूटेगा वरना तब तक भगवान भगवान ही हैं।मेरा भी भरम टूट गया की यह तस्वीर किसी काम की नही क्योंकि उस बच्चे की थाली में तब तक साठ रूपये आ गए थे।अब यह पैसे उस बच्चे को मिले या उसको सड़क पर बैठाने वाले को उसका भगवान ही जानता है।