Thursday, July 26, 2018

कलाम

कितना वक़्त गुज़र गया।यही 27 जुलाई थी की आप एक झटके में हमे छोड़ गए।पहले बहुत रोता था,अब खुश होता हूँ की अच्छा हुआ आप चले गए,वरना आपकी भी इज़्ज़त तार तार हो रही होती ।इस वक़्त भला कौन बच ही पा रहा ।घुट घुटकर आपको याद करते हुए आज मैं दिल से कमज़ोर हो गया हूँ।आँखे तो पहले ही बेजान हो चुकी हैं।आपको टूटकर याद कर रहा हूँ।कई जगह आपपर बोलने के लिए बुलाया गया है।मुझे नही पता की मैं आप पर बोल पाउँगा।जब आपसे मिला था तो यक़ीन नही था की उन यादों को इतनी बार लिखना और कहना पड़ेगा।

मेरे पास कुछ नही है की मैं आप पर बड़े बड़े प्रोग्राम कर पाऊँ।मैं सिसक कर रहा जा रहा हूँ की आज मेरी आत्मा की पुण्यतिथि है मगर मैं खुद उसको याद नही कर पा रहा हूँ।गुज़री रात आपकी तस्वीर के साथ गुज़री थी।इतनी बार उसपर हाथ फेरा था की उंगलियो को आपके उलझे बाल महसूस होने लगे थे।मैं पिछले कई दिन से आपसे मिलता रहा हूँ।आपकी छोटी छोटी आँखे मुझे बड़ा परेशान करती हैं।जब मैं कहता हूँ की कुछ नही हो सकता हैं तब आप सख्त हो जाते हैं।मुझे कामचोर कह कर डाँटते हैं।

मैं फिर खड़ा हो जाता हूँ।कलाम साहब,नही नही मेरे कलाम,आज आपको सब याद करेंगे।इस याद के सिलसिले में मुझ गरीब की याद बड़ी मामूली सी,फीकी सी है।लेकिन हमे पता है आप सारा लावलश्कर छोड़कर मेरी यादों में ही आएँगे।डॉक्टर साहब मैं कह नही सकता आप महसूस तो कर ही रहे होंगे की हमे क्या चाहिए।आपके जाने के बाद हम सब बेहद अकेले हो गए हैं।इस अकेलेपन ने हमे अक्खड़ और बदतमीज़ बना दिया है।आज जब आप मेरे पास आइयेगा तो हमे बताइयेगा दिल मासूम कैसे होता है।

इस वक़्त हमे मिज़ाइल नही जाननी,विज्ञानं भी अब क्या जानना जब मौत सामने खड़ी हो । हमे बताइयेगा मोहब्बत कैसे होती है।हमे उड़ने की नही पहले चलने की ट्रेनिंग दीजियेगा।आपका 2020 के भारत का सपना धुन्धला न हो इसलिए हम सब लाइन लगाएं खड़े थे ।अब सब उसी लाइन में एक दूसरे का गला नोच रहें हैं ।इन खड़े लोगों को एक साथ मोहब्बत से खड़े होने की दुआ दीजिये कलाम।कलाम मैं, हाँ मैं, बिलकुल अकेला,टुटा हुआ हूँ।बस एक आप हैं जो ऊपर से मुझे जोड़े हुए हैं।आखरी बात या तो वापिस आ जाइये नही तो हमे बुला लीजिये।तबियत अब लगती नही यहाँ । मुझपर 27 जुलाई कयामत की तरह गुज़रती है।मुझसे बर्दाश्त नही होता है यह दिन.रह रह आप ही नज़र आते हैं.....

Saturday, July 21, 2018

भीड़तंत्र

जब तुम किसी सरकारी स्कूल में शिक्षक बने बैठे होगे और एक भीड़ आएगी तुम्हे पीट पीट मार डालेगी ।चिल्लाएगी की हमारे टैक्स से तनख्वाह पाते हो और पढ़ाते भी नही हो,तब सब तुम्हे मरता हुआ देखेंगे ।
जब तुम सरकारी अस्पताल में डॉक्टर होगे,तो एक भीड़ आएगी और तुम्हे दौड़ा दौड़ा पिटेगी की क्या तुम सही से इलाज भी नही कर सकते,वक़्त पर अस्पताल भी नही आ सकते,तुम सरिया डंडो से पिटते हुए दम तोड़ोगे और कोई उफ़्फ़ भी नही करेगा ।

बाइक पर मस्त तुम बिना हेलमेट के चले जा रहे होगे,पीछे से पन्द्रह बीस लड़को की भीड़ लाठी डंडे से तुम्हारा सर फोड़ देगी,वह भीड़ कहेगी की तुम मेरे देश का कानून भो नही मानते,बिना हेलमेट के चलते हो,तुम्हारी फूटी खोपड़ी से बहते ख़ून को कोई नही देखेगा ।

जब तुम यहाँ वहाँ चलते हुए सड़क पर कूड़ा फेकोगे तो उसी वक़्त एक भीड़ तुम्हारा हाथ काट लेगी और कहेगी की तुम देश को गन्दा कर रहे हो,जब तुम यहाँ वहाँ पेशाब करते देखे जाओगे,तो एक भीड़ तुम्हारा लिंग काटकर हवा में उछालती हुई चीखेगी की यह दीवार गन्दी कर रहा था,हमने इसे शुद्ध कर दिया,लोग तुम्हारे तड़पने पर तालियाँ बजाएँगे ।थानो के बाहर पुलिस पीटी जाएगी,न्यूज़ रूम में ऐंकर और उसके गुर्गे अपने मन के विपरीत बात सुनकर मेहमानो को पीटेंगे ।

आपको लगता है, यह नही होगा,तो आप मूर्ख हैं ।जब भीड़ शासन,सुप्रीम कोर्ट,सरकार को निकम्मा मानकर खुद न्याय करने निकल चुकी है, तो यह भी होगा ।तैयार हो जाइये पिटने के लिए,वह भी अपने ही घरों के बच्चों से,जिन्हें आपने दूसरों को पीटने के लिए तैयार होने दिया है ।
अफसोस यह है की देश किसी की प्राथमिकता में है ही नही ।देश के नामपर केवल भोगौलिक सीमाएँ ही रह गई हैं ।नियम ,कानून,संविधान,प्रशासन सब पंगु बना हुआ है।भीड़ को पुलिस पर भरोसा नही है ।भीड़ को अपनी ही चुनी हुई सरकार पर भरोसा नही है ।भीड़ अपने ही प्रधान सेवक की बात को नकार कर गाय के नामपर किसी को भी खींचकर मार डाल रही है ।तो ऐसी भीड़ जिसके मुँह में ख़ून लग चुका हो,वह जल्द ही पलटेगी और तुम सब,जो ख़ामोशी से हत्याओं का आनंद ले रहे हो,पीटे जाओगे ।

आने वाले वक़्त में लाठी,डंडो,तलवारों,चेन,चाकू और बम से लैस भीड़ ही सिस्टम को चलाएगी ।यह सब होगा,इसे हर उसने होने दिया,जिसने अपने घरों के बच्चों को हत्याओं,हिँसा और बदले को लेकर प्रोत्साहित किया या ऐसा करने वालों को चुनकर प्रोत्साहित किया ।हम सब एक लम्बी प्रार्थना में जा रहें की हे ईश्वर!अगर हम सब गले तक अधर्म में डूबे हैं, फिर भी धरती से आपका अब भी रत्ती भर प्रेम बचा हो,तो हम सबके हृदय को साफ़ करदें,जिससे नफ़रत निकल जाए,वरना अंत बड़ा ही बुरा होने वाला है...

Monday, July 16, 2018

फीफा वर्डकप

फुटबॉल का ख़ुमार उतर गया हो,क्रोएशिया की प्रेसिडेंट को जीभर देख लिया हो,फ़्रांस के राष्ट्रपति बच्चों की तरह ख़ुशी से उछल उछल अपने खिलाड़ियों को गले लगाता वह पल धुंधला गया हो तो एक बार अपना गिरेहबान भी झाँक लें ।देख लीजिये लखनऊ जैसे शहर के बराबर देश दुनिया के सबसे बड़े खेल के फ़ाइनल में था और हम एक सौ पैंतीस करोड़ लोग थे,वह उनकी शुरआत से ही नदारद थे ।

हाँ अगर कोई विश्वकप हिन्दू-मुस्लिम करने का होता तो यक़ीनन हमे कोई पछाड़ नही सकता था ।या यही फुटबॉल केवल मुँह से खेला जाता तब भी हमारा कोई सानी नही होता ।क्रोएशिया के जो बच्चे मैदान में अपने मुल्क़ का झण्डा सबसे ऊपर ले जा पाए,वह भी हमारे बच्चों से वाट्सएप पर नफ़रत फैलाने में बुरी तरह हार जाते ।क्रोएशिया के खिलाड़ी एक दूसरे का हाथ पकड़ अपने मुल्क़ का सर जिस तेज़ी से ऊपर ले गए,हमारे बच्चे उतनी ही तेज़ी से एक दूसरे का हाथ तोड़कर नीचे आए हैं ।
हाँलाकि बच्चों को क्या कहना,यहाँ तो बड़ो से ही उन्होंने नफ़रत सीखी है ।मुल्क़ को खेल,विज्ञानं में आगे ले जाने की जगह धर्म में रँगने की शाखाओं में बड़ो नेही तो भेजा है ।
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी पर राज करने वाली सरकार के पास भी कोई प्लान नही की उसका झण्डा भी फुटबॉल जैसे महान विश्वकप में भागीदारी कर सके।विश्व के नक्शे पर जिस देश को लेंस लेकर ढूंढना पड़े,उसकी राष्ट्रपति अपने बच्चों को बिना फ़र्क किये पलपल हौंसला देती रही ।उनको ऐसा माहौल दिया की दुनिया ने इस देश को पलकों पर बैठा लिया ।

एक हम हैं, जो न जाने कब विश्व गुरु थे,उसी नशे को सूँघ सूँघ एक दूसरे को खत्म कर देने पर आमादा हैं ।हमारे लीडर भी उन्हें ही पसन्द करते हैं जो जीतने नफ़रत से सने हुए हैं ।वह भी हौंसला घर को जलाने वालों को देते हैं, बनाने वालों को नही ।
क्रोएशिया के लिए ख़ुशी का पल एशिया कउन तमाम देशों के लिए गैरत का पल होना चाहिए था,जो उसके कई सौ गुना आबादी को ढो तो रहें हैं मगर उनमे से एक ढंग का खिलाड़ी नही बना पा रहें ।
हमसे पचासों साल बाद जन्म छोटा सा देश अपने सारे भेद मिटाकर मज़बूती से फीफा की चमकती ट्रॉफी तक का सफ़र कर गया और हम एक दूसरे का कुर्ता नोचते हुए धार्मिक योद्धा ही बनकर रह गए ।वह भीड़ बनकर ट्रॉफी को चूम रहे थे और हम भीड़ बनकर किसी एक को कुचलकर मार रहे थे ।वह एक साथ मोहब्बत से लबरेज़ अपनी राष्ट्रपति के साथ खुशियों के चरम पर थे और हम अपने शीर्ष नेतृत्व के अल्फ़ाज़ों से हिन्दू मुसलमान में बंटना सीख रहे थे।

हो सकता है, यह लफ़्ज़ बुरे लगें, आप हमे ही उल्टा सीधा कहें,मगर यह भी तो सच है बेगैरती में भी हमारा कोई सानी नही है ।मुझे बचपन में स्कूल याद हैं, तब उसमे खेल की पूरी किट होती थी ।हमारे टीचर हमे खेलना सिखाते थे,शायद आज हमारे बीच से कोई ढंग का फुटबॉल खिलाड़ी बन भी जाता मगर देश में एक दौर वह भी आया ।जब धर्म के तम्बू तान दिए गए ।क्या स्कूल क्या घर सब जगह से सब खत्म,बस एक ही नारा हवा में तैरता चला गया और वह सारी सुविधाएं तहस नहस हो गई ।सरकारों को भी समझ आ गया इन्हें बस धर्म का शरबत दो,इन्हें और कुछ नही चाहिए ।आज जाकर देख लीजिये अगर एक भी स्कूल में ढंग का खेल का एक भी सामान हो,हाँ मैं दावे से कहूँगा इसके अलावा टीचर हों या बच्चे,वह वाट्सएप ग्रुप में नफ़रत और बाँटने वाले मैसेज ही फॉरवर्ड कर रहे होंगे ।फुटबॉल का फॉरवर्ड भूलकर नफ़रत के फॉरवर्ड में लगे यह बच्चे किसी और देश के नही हैं, हमारे ही हैं, मगर हमे इनकी भी फ़िक्र नही ।

अभी वक़्त हैं, धार्मिक नफ़रत के साथ खेलने की जगह मैदानों में अच्छे खेल खेलिए ।मैदानों को धर्म से पाटने की जगह खेल के लिए छोड़िये ।वरना दुनिया के छोटेछोटे देश फीफा अवार्ड कितनी बार मिला,इसकी गिनती गिनेंगे और हम,हाँ हम कितनी लाशें गिरी,कितने घर जले,कितने ब्लात्कारहुए,कितने के हाथ काटे,इसका ही स्कोर गिनेंगे ।बुरा लगे तो लगे मगर तक़लीफ़ का वक़्त है की इतने शानदार,रोमांचक, ऐतिहासिक और भव्य फीफा वर्डकप में हमारी राई बराबर मुल्क़ शिखर पर था और सवा सौ करोण भीड़ वाले हम सिर्फ ताली बजा रहे थे ।सम्भल जाइये उससे पहले की सब खत्म हो...

Sunday, July 15, 2018

बेग़म अनीस क़िदवई

पढ़ना भी भला कौन चाहता है ।कहते हैं अगर अपने माटी की ख़िदमत की है, तो एक न एक रोज़ उसकी महक दुनिया महसूस करेगी ।मेरे पास लिखने को हज़ार पन्ने हैं, लाखो शब्द हैं मगर मैं उनकी शख्सियत पर क्या क्या लिखूँ ।

साहित्य अकादमी सम्मान से नवाज़ी,दो बार राज्य सभा सांसद, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी और सबसे बढ़कर बंटवारे में शरणार्थी कैम्प में जीजान से ख़िदमत करने वाली बेग़म अनीस क़िदवई ।

शायद वह इकलौती औरत जिसने कैम्प में लाशो को नहलाया,कफ़न दफ़्न किया,यहाँ तक कब्रें भी खोदी,तब जाकर बंटवारे से उपजा ज़ख्म हम पाट पाए थे ।हज़ारों लड़कियों को जो बेच दी गई,जो उठा ले जाइ गई,जिन्हें भीड़ ने काफिलों से लूटकर छीन लिया,अपने घरों में बांध लिया ।चुन चुन कर एक एक लड़की को वापिस उसके परिवार में पहुँचाने वाली बेग़म अनीस क़िदवई ।

आज नवभारत टाइम्स के सम्पादकीय के एकदा में भी बेग़म अनीस क़िदवई की ज़िन्दगी का एक लम्हा लिखा है ।आज उनकी पुण्यतिथि है ।खोजिए,इन्हें पढ़िए,इनके दिलों को हौसले को महसूस कीजिये ।यह जो सत्तर साल हम मिल बाँटकर साथ वक़्त गुज़ार लिए,उसकी बुनियाद हैं बेग़म अनीस क़िदवई ।

"आज़ादी की छाँव में" उनकी लिखी किताब पढ़िए और रोइये ।देखिये ज़मीन को मज़हब के नाम से फाड़ने पर कितने दिल टूटे थे ।इस सबसे इतर उस वक़्त के हालात देखिये,वह कौन लोग थे जो तब भी भीड़ बनकर डरा रहे थे ।सैकड़ो साल से साथ रह रहे अपने भाइयों को खींचकर गाँव से बाहर कर रहे थे और कितनी हो बेंटियों को गले में रस्सी डालकर,बिना कपड़ों के घर में बाँधे रखे थे ।यह सारे दर्द,यह सारी नाइंसाफी,यह सारे ज़ख्म को बेग़म अनीस क़िदवई और मृदुला साराभाई ने साथ साथ भरकर हमारे देश की बुनियाद रखी है ।आज,हाँ आज तो उन्हें याद ही करलें...हम तो रो रोकर पलट कर देखते हैं, की काश इनके रत्ती भर सेवा और समर्पण आ जाए,तो इस माटी की ख़िदमत में मर मिटूँ...

Friday, July 13, 2018

कैंसर कैंसर ही है

उसके हाथ में लगा ज़ख्म पककर मवाद के साथ बजबजा रहा था ।किसी ने कहा,यह ज़ख्म नासूर बन जाएगा,वह नाराज़ हो गए की इसे ज़ख्म क्यों कहा,नासूर क्यों कहा ।
उनके घर के आपस के झगड़े में सबके कपड़े नुच गए,पूरे नँगे वह एक दूसरे की खाल खींच रहे थे,किसी ने कहा भाई नँगे हो चुके हो अब तो रुक जाए,वह नाराज़ हो गए की नँगे क्यों कहा ।

उनके मुँह में उभरा छाला,बड़ा होकर फूटकर बहने लगा ।दर्द में वह तड़पते रहे मगर जैसे ही डॉक्टर ने कहा,यह कैंसर अब सही नही होगा,वह नाराज़ हो गए की कैंसर क्यों कहा ।

उनका बच्चा चार चार विषयों में फेल होकर उनके ही दबाव के फंदे में झूलकर आत्महत्या कर लेता है ।जैसे ही पड़ोसी उसकी मौत में फ़ेल शब्द को जोड़ते हैं, वह नाराज़ हो जाते हैं की फ़ेल क्यों कहा ।

उनका लड़का तमाम लड़कियों को जँगल में घसीटकर बलात्कार करता है ।पकड़ा जाता है ।मारा जाता है ।सलाखों में पहुँचता है ।जैसे लोग उसे बलात्कारी कहते हैं, वह नाराज़ हो जाते हैं की बलात्कारी क्यों कहा ।

नौकरी दिलाने के नाम से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस या राशन कार्ड बनवाने के भी पैसे ले लेते हैं ।लोग उन्हें दलाल कहते हैं, वह नाराज़ हो जाते हैं की दलाल क्यों कहा ।

भीड़ में इक्ट्ठे होकर किसी एक को खींचकर मार देते हैं ।उसके ख़ून की छीटें मुँह पर मलते हैं ।जश्न मनाते हैं ।हर हत्यारे को मालाओं से लाद देते हैं ।जब उन्हें वहशी कहा जाता है तब,वह नाराज़ हो जाते हैं की वहशी क्यों कहा ।

आर्मी के होते हुए खुद हथियार रखेंगे,खुद ट्रेनिंग लेंगे,लोगों को मरने मारने के लिए उक्साएंगे,अपने विचारों को लाठी डंडे तलवार बंदूख बम और भीड़ के ज़ोर पर थोपेंगे ।कोई उन्हें आतँकी कह देगा तब,वह नाराज़ हो जाएँगे की आतँकी क्यों कहा ।

यह अजीब दुनिया के अजीब लोग हैं ।जो हैं,वही सुनने पर बिलख पड़ते हैं ।ख़ून से सने हाथों पर भी खुद को महात्मा कहलवाना चाहते हैं ।ऊसर को उपजाओ कहलवाना चाहते हैं ।यह बड़े अजीब लोग काँच बनकर हीरा दिखना चाहते हैं ।यह झूठे होकर सच्चे बनना चाहते हैं ।अधर्मी होकर धर्मात्मा बनने चाहते हैं ।इनके बीच वही ज़िंदा रहेगा जो चुप रहकर हाँ में हाँ कहेगा ।हर वह मारा जाएगा,जिसकी ज़बान झूठ बोलने पर एँठेगी ।जो मरकर भी नँगे को नँगा ही कहेगा ।

अभी वक़्त हैं, जिसे जो दिखना है, वह बने,वही स्वीकार करे ।लोग तो एक बार दबाव में सब मान लेंगे मगर कर्मो का फल नस्लें भुगतेंगी ।यह आज़माई हुई बात है ।वक़्त रहते कैंसर को कैंसर कहना सीख लें,तभी ईलाज सम्भव है, तभी हालत बेहतर होने की उम्मीद की जा सकती है, वरना नफ़रत का कैंसर हम सबको दर्दनाक मौत देगा...

Thursday, July 12, 2018

यह मौसम यह ज़ायके

बारिश में सिर्फ फलेंदे ही नही आते।पीले मेढक भी तो दिखते रहते हैं।चटख सुर्ख़ बीज बहोटी भी तो होती है ।वैसे जब बारिश का ज़िक्र होता है तो प्रकृति की उपज के ही इर्द गिर्द हम ठहर जाते हैं।कभी हरियाली तो कभी फल तो कभी कीड़े मकौड़ों के ज़िक्र से ही खुश हुआ करते हैं।
बारिश जो हमारे दिलों में आती है, उसे भी तो अल्फ़ाज़ मिल ही जाते हैं मगर जो बारिश हमारे बावर्चीखानों में आती है उसका क्या।।

चार बून्द गिरी नही की ज़बान बेसन प्याज़ की पकौड़ी के नाम से कुलबुलाने लगती है।पकौड़ी न भी हो तो चाय तो बारिश साथ ही लेकर आती है।अगर हम बारिश को नज़दीक़ से देखें तो यह पकौड़ी से बहुत आगे निकल चुकी होती है।हमारे घरों में सादे से पराठे चने की दाल से प्रेग्नेंट होकर बिरहीं बन जाते हैं।बारिश में बिरहीं का खाया जाना भी तो एक बेहतरीन शगल है।भले पड़ोस में बाढ़ आई हो मगर बिरहीं के क्या कहने,ज़बान ऐसे बहकाती है जैसे बिरहीं न बनी तो बारिश फ़िज़ूल है।

खैर बिरहीं से जब दिल भर जाए तो ज़बान मीठे की तरफ राल टपकाती है और नंबर आता है तिल्ली से मेकअप किये अंदरसे का।।।बारिश हो और अंदरसे की गोलियाँ न हों तो बारिश को क्या कहें,सिर्फ कीचड़।।रुदौली के अंदरसे तो अपने आप में अव्वल हैं।मुझे तो लगता है रुदौली में मजाज़ के बाद कोई मशहूर हुआ तो वह अंदरसे ही हैं जिसने मजाज़ के जज़्बात से निकले अल्फ़ाज़ पर अपनी मिठास उड़ेल दी।खैर हम भी बकरी चराने लगे।बात कहाँ की कहाँ पहुँचा दी।

हाँ तो बारिश में घर में या बाहर बनने वाले उन पकवान को खींचकर घर तक ज़रूर लाइए जो आपने बचपन में खाया होगा।यह पकवान परम्परागत तरीके से अगली पीढ़ी तक जाने चाहियें।इनका ज़िक्र होना चाहिए ताकि यह भी पता चले हमारे बुज़ुर्ग हर मौसम का कैसे लुत्फ़ लेते थे ।मुश्किल से मुश्किल वक़्त में भी वह ज़िन्दगी के मज़े लेकर मुस्कुराते रहे और उनमे से छोटी छोटी खुशियाँ ढूंढकर उन्हें बड़ी ख़ुशी बनाते रहे।

हमारे हैरान परेशान नौजवान मुस्कुराना ही तो भूल गए हैं।ठहाके तो हैं मगर उनमे फीकापन है।हँसी तो है मगर बनावटी।।।सबके साथ बैठकर हर मौसम की खूबी के पकवानो को चखिए।मज़े लीजिये वरना बारिश तो आती जाती रहेगी ही।लुत्फ़ नही उठाएँगे तो सड़क पर सिर्फ कीचड़ ही तो नज़र आएगा जो दिन बदिन बढ़ता जा रहा है।।।

Sunday, July 1, 2018

पड़ोसी धर्म

वह घर में अपने गिरते कद से परेशान थे ।घर के लोगों को उन्होंने पहले भरोसा दिलाया था की उनके हाथ में कमान रहेगी तो राशन,बिलों का भुगतान,बच्चों की फ़ीस और घर के दूसरे लोगों की ज़रूरते हमेशा वक़्त पर पूरी होंगी ।यह वादे और घर की लगाम लिए हुए उनके कई बरस गुज़र गए मगर घर में रोज़ ही कोई न कोई कमी निकलती और उनपर सवाल उठते ।पूरे घर का हर हिसाब किताब गड़बड़,हर एक छोटी छोटी चीजों से परेशान होने लगा,अब इन साहब को कुछ समझ नही आए ।अब सवाल उनकी घर की हुकूमत पर उठने लगे ।यहाँ तक माँ और पत्नी भी ताने देनी लगी ।उनकी तमाम लफ्फाज़ी उनके ही बच्चों के सवाल के आगे बिखर जाती ।

एक रोज़ छत पर खड़े अपने पड़ोसी को यह दिक्कत बता रहे थे,उनसे सलाह ली की बताओ घर का निज़ाम कैसे अपने हाथों में बरकरार रखें ।पड़ोसी तजुर्बेकार था,उसने कहा यार तुम हमसे लड़ लो ।वह हैरान से पड़ोसी का मुँह देखने लगे,तभी वह बताता है की कल सुबह तुम हमसे लड़ना,लड़ाई इतनी हो की तुम्हारे घर वाले सब कुछ भूलकर तुम्हारे पीछे खड़े होंगे ।घरों के बेवक़ूफ़ लोग तमाम आँसू और जज़्बात के साथ तुम्हारी मदद भी करेंगे ।अपने हिस्से की रोटी और दौलत भी तुम्हारे कदमो में डाल देंगे और कहेंगे,पड़ोसी को हराना ही हमारा सबका एकमात्र ध्येय है ।तुम्हारी सारी कमी नज़रअंदाज़ करके वह हमे हराने लग जाएँगे और मेरे हारते ही तुम्हारे सारे पाप धुल जाएँगे और घर में अगले कई साल तक तुम्हारी वाह वाह भी रहेगी ।जो थोड़ी बहुत उठा पठक हो,तो इन्हें हल्का फुल्का आपस में लड़वाकर मज़े करते रहना ।

सब बात समझकर उन्होंने अपने पड़ोसी से कहा की यह तो अचूक मन्त्र दिया मगर इससे तुम्हे क्या लाभ ।पड़ोसी ने मुस्कुराकर कहा, यही तो पड़ोसी धर्म है, जब हमे ज़रूरत हो तब तुम भी यही करना ।दोनों ठहाके मारकर हँसते हैं की तभी पड़ोसी के घर से बर्तन फेंकने की आवाज़ आती है ।तब पड़ोसी बोलता है,सुबह एक भाई को कँजूस और दूसरे को बेवकूफ कहलवाया था ।आपस में लड़ रहें हैं, अभी जाकर दोनों को डाँटेंगे,पुचकारेंगे और मज़े से दोनों के कँधे पर चैन की नींद लेंगे और राज करेंगे ।यह याद रखना हुक़ूमत का कोई भाई,बहन या रिश्तेदार,दोस्त नही होता ।मज़े करो दोस्त ।दोनों पड़ोसी हँसते हुए अपनी अपनी छत से उतरते हैं ।दोनों की छतों के बीच रात में जो महीन लकीर होती,वह रौशनी फैलते फैलते चौड़ी होती होती कुछ कुछ सरहद सी लगने लगती है...