Saturday, October 23, 2021

दत्तक कॉंग्रेसी

आजकल बिहार समेत कई राज्यों में "दत्तक कॉंग्रेसी" आए हैं । यह इतने भयँकर कॉंग्रेसी हैं कि इन्हें यह नही पता कि बात कैसे की जाती है,कम से कम नेहरू परिवार से न्यूनतम मर्यादा तो इन्हें सीखनी ही चाहिए मगर क्योंकि जिस तरह इनके बड़े भाई बहन कॉंग्रेस से भाजपा में जाने के बाद बहुत बड़े भाजपाई बनते हैं और अनर्गल बयान देकर खुद को संघी बताने की कोशिश करते हैं, यह भी उसी परम्परा के हैं ।

यह "दत्तक कॉंग्रेसी" या कहें दत्तक लीडर,कल चीख रहे थे कि सिवाए कॉंग्रेस के कौन है, जो भाजपा से मिलकर सरकार नही चलाए । तो औरों की बात तो छोड़िए, जिस पार्टी में रहकर दूध के दांत निकले,क्या वह भी भाजपा के सहयोगी हैं और अगर यह बात वह जानते थे,तो काहे उसके टिकट पर लड़कर जान दिए थे,मुझे इसी मक्कारी पर गुस्सा आता है।

असल मे दत्तक लीडर और इनकीं परजीवी विचारधारा हर उस दल में घुस जाती है, जहाँ मोटा पैसा हो और छोटा दिमाग हो । इनके लिए सबसे मुफीद वह जज़्बाती लीडर होते हैं, जिन्होंने घर के बाहर की हवा न खाई हो मगर उनकी पूछ बहुत हो,यह उनके कंधों पर बैठकर अपनी दुकान सजा लेते हैं । 

यह दत्तक कॉंग्रेसी सबसे पहले सर्टिफ़िकेट और मोहर कब्जे में लेते हैं । अब इन्होंने कॉंग्रेसी होने की मोहर हथिया ली है, जिसको देखो उसे कॉंग्रेस से भगाकर संघी होने का सर्टिफिकेट बांट रहे,यह भूल गए जब इनके कानों में लाल सलाम की आवाज़ नही दी गई थी,उससे पहले लालू जी जैसे लोग लड़ रहे थे । यह जो यूज़ एन थ्रो की राजनीति कर रहे हैं, इसका परिणाम देश की सबसे पुरानी पार्टी को ब्याज सहित भुगतना पड़ेगा ।

यहाँ जो कॉंग्रेस के वफादार बैठे हैं,मेरी बात को तब काटें जब लालू प्रसाद और तेजस्वी पर बोले गए अहंकार के शब्दों को सही कह सके । जब सोनिया जी के साथ कोई नही था,तब लालू खड़े थे । लालू तो नए नवेले दत्तक कॉंग्रेसियों की और पुराने संघी कॉंग्रेसियों की चाल का शिकार हो गए । यह जो एकला चलो की नीति है, यह मर्यादा के साथ भी चली जा सकती है ।

यूपी और बिहार दोनों जगह यह अहंकार देख रहे हैं, अभी ज़्यादा नही बस सालभर बाद देखना,जब थर्ड फ्रंट में सारे नए पुराने सहयोगी चले जाएंगे,तब पेट पकड़ कर मत रोना की थर्ड फ्रंट तुम्हारे खिलाफ खड़ा किया गया है । 

अवध में मशहूर कहावत है, "लौंडई सोहबत-सतरिख का मेला" तो यह जो दो चार, बाएं गोद से लेकर दत्तक कॉंग्रेसी पाले है,यह सिर्फ तमाशा भर हैं, यह अपनी विचारधारा में हवा खाकर इधर आए हैं, क्योंकि अब उधर न पैसे हैं और न ही दैहिक क्रांति का चकल्लस,अब कॉंग्रेस उन्हें अपने दबे ख्वाबों को पूरा करने का माध्यम लग रही है । 

आज बात बुरी बहुत लगेगी और लगनी भी चाहिए क्योंकि देश की एक पार्टी,जिसको हम दक्षिणपंथी विचार के सामने दूसरा ध्रुव मानते हैं, वह इतनी दरिद्र हो जाएगी कि दत्तक लीडर उसे खिलौना बना देंगे,हमे सहन नही होता । आज भी लालू जी और अखिलेश जी या तेजस्वी वगैरह ने अपना मयार नही गिराया है कि कल के लड़कों के चक्कर मे सोनिया जी या कॉंग्रेस को उल्टा सीधा कहें ।

और आखरी बात जान लो अगर इतना ही दत्तक लीडर बनकर विचारधारा का भूत सवार हुए है,तो जाकर उनसे पूछो की गुजरात दंगों के आरोपी को इतना क्यों बढ़ने दिया कि आज वह उनके सरो पर सवार है । जिस संघ के खिलाफ संघर्ष कर रहे हो,उसे इतनी खाद पानी किसने दी कि वह नासूर बन गया । यूपीए टू में बर्मा में विवेकानंद फाउंडेशन के कार्यक्रम को करोणों रुपये किसने दिए,जिसमें तुम्हे निपटाने के मंसूबे फले फूले, सावरकर पर डाक टिकट किसने जारी किया ।

हम यह नही कह रहे कि तुम अकेले मत खड़े हो,खूब मेहनत करो और अकेले खड़े होने लायक बनो । दूसरों को गरियाने,उन्हें सर्टिफिकेट बाँटने की जगह अपनी चूले मज़बूत करो । यह कौन सी बदतमीज़ी है कि जुमा जुमा चार दिन हुए पार्टी में आए और बन गए सिंधिया,गरियाने लगे हर पूर्व सहयोगी को,तो तुम्हारा यक़ीन क्या ही करें,कल तुम कहीं और खड़े होंगे और अपने वर्तमान शीर्ष नेताओं को गरिया रहे होंगे ।

मुझे इन दत्तक कॉंग्रेसियों में गांधी-नेहरू की कॉंग्रेस नही नज़र आ रही,मेरी यह बात बाद में सच होते देखना, बिहार समेत कई राज्यों में यह जो दत्तक कॉंग्रेसी आए हैं, यह खा पीकर लौट जाएंगे और हार की माला गांधी परिवार और समाज को पहनाकर निकल लेंगे,क्योंकि यह अनार सिफत लोग हैं, भरभरा कर जल उठेंगे मगर देर तक टिक नही पाएँगे, यह अपनीमूल विचारधारा के नही हुए,यह किसी के नही होंगे, क्योंकि यह मूलतः परजीवी हैं, यह दत्तक लीडर ही रहेंगे ।

लालू और अखिलेश को भूल जाए,वह अपने संगठन,काम और लोगों के बीच चौबीस घण्टे हैं । उनके ऊपर हमले करके आप अपनी कुंठित राजनीति ही दिखा रहे हैं । अभी बहुत वक़्त बाकी है, यह याद रखना की जब सहयोग की ज़रूरत आएगी,तो यह लोग ही फिर सोनिया जी का मुँह देखकर आपके साथ खड़े हो जाएंगे मगर जो हरकते हैं इन दत्तक कॉंग्रेसियों कि, उनके साथ खड़ा ही नही होना चाहिए । मेरी बात दर्ज करलें,वर्तमान गांधी परिवार अपने इन दत्तक लीडर्स पर पछताएगा । इन्हें साथ लेने में कोई बुराई नही,बल्कि अपनी खुद की लगाम भी इनके हाथ सौंप देने में तबाही है ।

कॉंग्रेस अपने सहयोगियों से लड़कर कभी नही खड़ी हो पाएगी ।  हाँ उनसे बात करके, अलग लड़ने में कोई बुराई नही मगर सहयोगियों पर कीचड़ उछालकर अपने मुँह पर ही वापिस कीचड़ पड़ने का इंतेज़ार कर रही है । अभी वक़्त है, इन दत्तक लीडर्स की लगाम अपने हाथ लें,वरना यह घोड़ा नही नीलघोड़ साबित होंगे और सारा खेत उजाड़ डालेंगे, सारी फसल तबाह कर देंगे केवल दो पत्ते खाने के लिए...
#hashtag #हैशटैग

Wednesday, August 11, 2021

रुक जाओ बर्बाद होने से पहले

कोई मुसलमान भाई अगर परेशान हो तो हमें बताइये,इस ज़ुल्म की हुक़ूमत में भाई हम लोगों को मुत्तहिद रहना चाहिए,कोई तक़लीफ़ में हो तो बताइए,अल्लाह के शुक्र से हम इस क़ाबिल हैं कि उसकी मदद कर सकते हैं । एक।मुसलमान भाई हमसे कह रहे थे,उनकी बात में बड़ी अपनाइयत और क़ौम को लेकर संजीदगी के साथ फ़िक्रमन्दी भी शामिल थी ।हमने उनसे कहा ठीक है, बताते हैं आपको,कुछ लोगों को दरकार है ।

मेरे एक दोस्त हिन्दू भी हैं और वर्तमान राजनीति को स्वर्णयुग की तरह देखते हैं । इसे एक बहुत मज़बूत हुक़ूमत समझते हैं,बाहुबली टाइप मगर उन्हें भी हिन्दू भाइयों की बड़ी फिक्र रहती है । कहते हैं भाई आप तो जानते हैं किस मुश्किल से हम संगठित हुए है । यदि एक न हुए होते तो बिखर जाते । बेचारे भंडारे वगैरह चलाते रहते हैं, एक दिन कहें कोरोनाकाल में की भाई आप तो इतने समाजसेवी हैं, यदि कोई हिन्दू व्यक्ति कमज़ोर और परेशान दिखे,मदद की आवश्यकता हो तो किसी से मत कहिए, सीधे हमें बताइये,हमने भी उनसे हामी भर दी ।

अब देखिए,जो ऊपर मुसलमान भाई की फिक्र में दुबले हुए जा रहे थे,हमने उनसे उनके सगे भाई की मदद करने को कहा,उनका सगा भाई रोज़गर छूटने पर पैसों से कमज़ोर हो गया था,आप यकीन जानिए कौम की फिक्र में दुबलाते उस शख्स ने अपने सगे भाई की मदद नही की और हमें बहाने बनाकर चलता कर दिया ।

जो दूसरे थे,हिंदुओं के लिए उनका रक्त उछाल मार रहा था । उनसे उनके ही धर्म के एक पड़ोसी की मदद करने को कहा,तो पलटी मार गए, यही नही अपनी बहन की ससुराल में बीस किलों आटा देने में सारा धर्म का प्रेम सड़क पर आ गया क्योंकि बहन की ससुराल से उनकी बनती नही थी और पड़ोसी की खुशी उनसे बर्दाश्त नही होती थी ।

यह सच्चाई है, जो मज़हब/धर्म के नामपर झंडे लेकर चीखते चिल्लाते हैं, लोगों को डराते हैं, इकट्ठे करने की अपील करते हैं,इनमें से कोई भी अपने भाई,अपनी बहन,अपने रिश्तेदार,अपने पड़ोसी के काम नही आते,बल्कि उनसे जलते हैं, उनकी तरक्की से कुढ़ते हैं, जानते हैं क्यों,क्योंकि इनमें नफ़रत का बीज है, जो सबसे पहले अपनो को किनारे करता है, फिर समाज को बांटने चलता है । यह समाज को परिवार कभी बना ही नही सकते क्योंकि इनमें प्रेम कम और नफरत अधिक होती है ।

गाँधी का पूरा परिवार आश्रम में रह रहा था,नेहरू का पूरा परिवार आज़ादी की लड़ाई में शामिल था,भगत सिंह और सुभाष के घर के लोग संघर्ष के साथी थे,क्योंकि इनमें जोड़ने की सलाहियत थीं,जो भी मज़हब/धर्म के नामपर लोगों को बटोरेगा,वह सौ फीसद राजनीति ही कर रहा होगा । एक बार इनसे पूछो की तुम अपने भाई के कितना काम आए,क्या वह तुम्हारे धर्म का नही है ।।एक बार पूछो की पड़ोसी के घर कितनी मोहब्बत से गए हो,क्या वह तुम्हारे मज़हब का नही है ।

मैं तो हर धर्म/मज़हब के ठेकेदार को देखता हूँ,तो जानता हूँ कि यह शुद्ध राजनैतिक बहाना है लोगों को अपनी तरफ लाने का,एक भीड़ है, जो अपने दिमाग को गिरवी रख चुकी है, चली जाएगी इनकीं तरफ,बिना यह सोचे कि जो आज हमें इकट्ठे करके वोट करने को कह रहा है, वह मेरी तरक्की से चिढ़ेगा और जब कोई नही होगा,तो हमपर ही अपने ज़ुल्म को दोहराएगा । जाओ पूरी दुनिया देख लो,धर्म/मज़हब के नाम पर सत्ता पाए लोग अपने ही धर्म/मज़हब के लोगों का कितना खून पी रहे हैं, अगर यह तुम्हे आकर्षित करता है, तो तुम्हे तुम्हारी बर्बादी मुबारक,हम तो हमेशा हर तरह की कट्टरता के खिलाफ खड़े मिलेंगे, जब तक तुम्हारा कोई भाई हमें अपने धर्म/मज़हब को बचाने के नाम पर पीट पीट कर मार न डाले...
#hashtag #हैशटैग

Wednesday, May 12, 2021

विपक्ष छोड़ ज़िम्मेदारी ले

फैनहे लोग काम ढेला भर नही करेंगे,रोएंगे इतना कि जैसे इनसे ज़्यादा किसी ने मेहनत नही की है । सत्ता पक्ष विपक्ष के सामने अपना फैनहापन लेकर फिर खड़ा हो गया है । पुराना खटराग चालू है कि विपक्ष नही करने दे रहा,वह हुल्लड़ मचा रहा,बदनाम कर रहा है ।

अरे कौन विपक्ष तुम्हारा हाथ पकड़े ले रहा कि तुम लोगों को वैक्सीन न दे पाओ । विपक्ष कहाँ तुम्हारे पैर खींच रहा कि तुम अस्पताल न बना पाओ । विपक्ष कौन तुमको गोदी में दबोचे है कि तुम लोगों को ऑक्सीजन न दे पाओ । विपक्ष कौन तुम्हे रस्सी से बांधे दे रहा कि गरीब की मदद न कर पाओ । विपक्ष तो कह रहा है की थोड़ा संवेदनशील हो जाओ,तुम इसे हूटिंग ही समझ लो ।

अब सचिन कहें कि हूटिंग हो रही थी,तो हम रन नही बना पाए,धोनी कहें कि हूटिंग में हमसे कप्तानी नही हो पाई । गांगुली कहें कि हूटिंग से हमे बदनाम किया जा रहा,तो हम बैटिंग कैसे करें । अरे अगर तुम वाक़ई कुछ कर रहे हो तो हूटिंग से क्या घबराना,धोनी, सचिन,गांगुली सब अपने काम से पहचाने गए,हूटिंग पर फैनहापन फैलाने से नही सम्मान पाए हैं ।

एक बात जान लें,अगर आपने ईमानदारी से काम किया है, तो कोई विपक्ष आपको बदनाम नही कर पाएगा । अगर लोगों को ऑक्सीजन और अस्पताल समय पर मिला है, तो कोई इसे झुठला नही पाएगा । नदियों में लाशें फूलकर तैरती हुईं दिखें,श्मशान में लाइन लगनी पड़े,दवाओं के लिए मुँहमाँगी रकम देनी पड़ी,एक अदद बेड के लिए हर घर की चौखट पर भीख मांगनी पड़े, तो इसे अगर कोई कहे या न कहे,आवाम को महसूस तो होगी ही,यहाँ विपक्ष के ऊपर नथुने फुलाकर रोने से काम नही चलेगा,आपको असलियत में काम करना होगा ।

बचपन में जो लौंडा ढंग से क्रिकेट नही खेल पाता, वह कभी बल्ले की कमी निकालता, कभी पिच की,कभी बॉल की,तो कभी सामने के खिलाड़ियों की,तो कभी तेज़ धूप की,तो कभी हम हवाओं की,तो कभी जूते की तो कभी मैच देख रहे लोगों की,मगर वह कभी अपनी कमी नही देखता,इसलिए वह कभी अच्छा क्रिकेटर नही बन पाता । इसलिए कह रहे विपक्ष पर ठीकरा फोड़ने से पहले अपनी ज़िम्मेदारी उठाना सीखें ।

विपक्ष वही करेगा,जो उसे करना चाहिए, आपकी पहाड़ जैसी गलतियों को वह बतलाएगा,आप चाहे नथुने फुला फुलाकर उन्हें चाहे साही बना दें,विपक्ष अपना चरित्र नही छोड़ेगा, आप भी सत्ता का चरित्र यानि ज़िम्मेदारी लेना,सीखिए । लोगों को तक़लीफ़ थी,है, यह देखिये,विपक्ष को गरियाने का बहुत मौका मिलेगा, उसपर राजनीति मत कीजिये, वरना जल्द ही विपक्ष में होइएगा और फिर कोई और आपके गले में अपनी नाकामियां डालकर रायता फैलाएगा ।
#hashtag #हैशटैग

Saturday, May 8, 2021

मदर्स डे

हैप्पी मदर्स डे । अक्सर जब भी मदर्स डे आता तो हम इमोशनल हों जाते हैं, मां में संसार,ईश्वर,देवी सब देखने लगते हैं, हमें तो साक्षात देवी के अस्त्र शस्त्र भी दिखने लगते हैं । जैसे ही फूल से झड़ते शब्द लिखने बैठते हैं, लगता है कोई बहुत ही चपटी चीज़ पीठ में चट सी चिपकी है, जब तक इसको पहचानने की कोशिश करें,तब तक गिनती दहाई छूने लगती और जब अपने बहुत से निशान छोड़ देती,तब एहसास होता कि चप्पल है, जिसने अपनी जगह को दगा देकर,हाथों से अपने हुनर को दिखाने को हमारी पीठ चुनी है ।

मां है तो तमाम एहसासों का नाम मगर जिसने हैंगर की मार ही न खाई हो,वह कैसे भला माँ को याद कर पाएगा । सर पर हाथ तो तब फिरते थे,जब बुरे दिन होते मगर अच्छे दिनों में अगर झाड़ू,वाइपर,बेलन,पँखा हमारे जिस्म को न छू लें,तो लगता मां हैं ही नही क्या,इनके बिना मां का तसव्वुर बेईमानी लगता है । 

पिता जी पर रखा गुस्सा हो या दादी की ज़ुबान को ज़ब्त करते हुए अपने दर्द को रास्ता देना हो,जो सबसे आसान शिकार मिलता,उसपर बरसने वाले इन हाथों को आज याद करना चाहिए । हम हमेशा संवेदनाओं से लदे पेड़ की तरह मां को याद नही करना चाहते,हम उन्हें देवी की तरह एक कमरे में बैठाकर पूजना नही चाहते । हम उनकी मार से बचते हुए ज़िन्दगी गुजारना चाहते हैं, उनकी घूरती हुई आंखों के डर के साय में निडर होना चाहते हैं ।

हमारी पीठें,हमारे सर,हमारे कूल्हे,हमारी फीलियां गवाह होनी चाहिए कि जब इन्होंने अपनी सीमाएं लांघी थीं, तो इन्हें छाँट दिया गया था । मुझे मां का वही रूप पसन्द है, जो बच्चों को बच्चा बनाए रखती थीं । मुझे वह बड़ी होती औलाद की माँ नही पसन्द,जिसे अपनी खुशी को गले मे घोटना पड़े । मुझे अपने बेटे के सामने संकोच में मुँह न खोलने वाली मां नही पसन्द,बल्कि बेटे के कनपटी लाल करके उसकी गलती को सुधार देने वाली मां पसन्द है ।
मुझे मां की मूरत नही पसन्द बल्कि गलती करके मां के सामने मूरत बनी औलाद वाली मां पसन्द है । हममें से अधिकतर को ऐसी ही मां मिली हैं, जिन्होंने हमे छाँट कर बड़ा किया है । तो क्या हमारी मोहब्बत में कोई कमी आ गई,हरगिज़ नही,बल्कि बनावटीपन के हर पर्दे हमने उतार दिए ।

आज मदर्स डे है, तबियत से याद कीजिये मगर बदन के उस हिस्से को भी सहला लीजिये, जिसपर माँ ने तराश लगाई थी । वह बड़े ही फीकी औलादें हैं, जिनको मां के हाथ के अस्त्र का स्पर्श नही हुआ है, खैर हम लोगों को तबियत से स्पर्श हुआ है । मुनव्वर राना के शेर तो श्रद्धा लाते हैं मगर मां के हाथ का बटा प्रसाद भी याद आता है, यही मिश्रण तो हमारा जीवन है, जिसे हम कम नही करना चाहते,मदर्स डे की शुभकामनाएं💐♥️
#hashtag #हैशटैग

बोया पेड़ बबूल

एक बात हमेशा पढ़ते आए थे मगर उसपर इतना पुख़्ता यक़ीन नही था । हमें लगता था कि जो मिसालें दी जाती हैं, वह सच्ची शायद ही हों,हम बस मिसालें दोहरा दिया करते थे,कभी यह नही सोचा कि यह हमारे सामने इस क़दर सच्ची होकर खड़ी हो जाएंगी ।

एक मिसाल थी कि बबूल का बीज बोओगे तो फल आम के नही पाओगे । हम लोग अक्सर इसको बोल देते थे,हम तो बहुत बार कट्टरपन के पक्ष में खड़े लोगों से यह कहा करते थे,मगर सच में हमें नही लगता था कि यह मिसाल इतनी जल्दी आंखों में आँखे डालकर हमारे सामने खड़ी हो जाएगी ।

हमने नफरत की माला पहनाकर,अपने दिल को इसके ज़हर में डुबाकर एक व्यक्ति को सिर्फ इसलिए चुन लिया,की उसकी खूबी ही नफरत थी । हमने बबूल को लाइन लगकर बोया था,सबके दिमाग मे मीठे आम की तस्वीर उभर रही थी । हुआ क्या,जब पेड़ बड़ा हुआ,तो कांटो ने हमारा स्वागत किया,फल की आस में दो फलों वाले कांटे ने पाँव में चुभकर एहसास करवाया की जो बोया है, वही पाओगे ।

यह बात सच्ची साबित हुई कि किसी के प्रति नफरत रखकर, ईर्ष्या को पालकर,हिंसा पर पलके झुकाकर, झूठ को ज़ेवर बनाकर,कभी कोई नस्ल खूबसूरती से आगे नही बढ़ सकती है । जब दिल में विनाश,नफ़रत और दूसरे की बर्बादी के बीज रोपे जाएँगे,तो तामीर भी नफरत के महल ही होंगे,जो हमारे चबूतरों से खुशियों को ऐसे उड़ा देंगे,जैसे वहशी बिल्ली को देख कबूतर उड़ जाते हैं ।

एक धर्म,एक जाति, एक क्षेत्र से की गई नफ़रत सिवाए सबकी बर्बादी के और कुछ नही लाती । हाथ मे बबूल के बीज लिए आम के ख्वाब देखना,खुद से छलावा था । खुद को धोखा देना था, अपने बच्चों को ग़लत रास्ता दिखलाना था । यह सब साबित हो गया है । कांटे को चुभना आता है, उसे होंठो से चूमना सिर्फ भरम था ।

जब भी अपने चुने इंसान को देखना,तो गौर कर देखना उसकी खूबियों को,उसके पास सिर्फ एक खूबी है, जो हमारी नफ़रत को सांस देती है बस । हो सके तो अपनी मिट्टी से वफादार हो जाना,इस मिट्टी पर खड़े लोगों से मोहब्बत करने वाला ही इसका वफादार है । इस मिट्टी पर खड़े इंसान की पीठ में खंजर उतारने वाला इस मिट्टी का दुश्मन है, हो सके तो तमाम तबाही के बाद आपस में मोहब्बत कर लेना ।

यह बात किसी एक धर्म,जाति, वर्ग,क्षेत्र या लिंग के लिए नही है । हर एक केलिए है कि आपस मे प्रेम,सद्भावना,एकता से रहो, ताकि हर दर्द का मिलकर मुकाबला कर सको । जो तुम्हे बांटे, उसमे बबूल के बीज देख लो और अपने बच्चे के हाथ में आम थमाने का अगर ख्वाब देखते हो,तो इस बीज से दूरी बना लो ।
#hashtag #हैशटैग

Thursday, May 6, 2021

कहानी यम और मलकुल

आसमान के नीचे और ज़मीन के ऊपर बड़ी अफरा तफरीह थी । दो अजीब सी शक्ल वाले लोग पसीने से तर बतर मेहनत में लगे हुए थे । दोनों अपने कामों को इस क़दर मुस्तैदी से अंजाम दे रहे थे कि एक से एक मेहनती इंसान भी उनके सामने शर्मिंदा हो जाए,हालांकि इंसान शर्मिंदा होने के सिवा कर भी क्या सकता है ।

दोनों आजकल ओवरटाइम कर रहे थे,ओवरटाइम क्यों कहे,बल्कि टाइम जैसी चीज़ गायब हो चुकी थी, बस काम ही काम था । यह दोनों आपस मे पहले परिचित थे या नही,पता नही,मगर आजकल दोनों लगातार भागदौड़ कर रहे थे,अपने नीचे की कलीग को निर्देश देते और ख़ुद बिना उनकी तरफ देखें, अगले बिस्तर की तरफ बढ़ जाते,हाँ बिस्तर, उनके काम की वजह आज बिस्तर पर ही तो थी ।

यह दोनों अपने अपने मानने वालों के घर जाते और इतनी तेज़ी से उस घर से निकल जाते की घर के लोग कुछ समझ पाते,उससे पहले यह दूसरे घर घुस जाते,यूँ इनका आना जाना कोहराम मचाए था,मगर यह सब चीज़ों से कान ढके,बस बढ़ते ही चले जा रहे थे ।

अब तक अपने अपने हिस्से के घरों में दाख़िल होने वाले यह दोनों,अचानक एक ऐसे घर में पहुँच गए,जहाँ इनके पैर ठिठक गए । एक को एक महिला को लेकर जाना था, दूसरे को उस महिला के पुरुष को ले जाना था,दोनों के जाने का वक़्त एक था,इसलिए यह दोनों अचानक एक घर पहुँच गए ।
दोनों ने पहली बार नज़र भरकर एक दूसरे को देखा, फिर बिस्तर पर पड़े दो इंसान देखे और उनके सीने पर हाथ रखे एक चार साल के बच्चे को देखा । बच्चा अपने हाथों से दोनों को जिलाने की नाकाम कोशिश कर रहा था । बिस्तर पर पड़े उसके मां बाप सांस उखड़ने और चलने के बीच दम लेकर बच्चे को देखते और कसमसा कर रह जाते ।
दूर खड़े यह दोनों पहली बार शंका में थे कि कौन पहले अपना काम करे,जब दोनों बच्चे को देखते तो ठहर जाते,इनकीं आंखों में शर्म थी,यह शर्म पहले भी तमाम बच्चों को अनाथ करते आ जानी थी मगर सबको पता है, हम अकेले बहुत बेशर्म होते हैं, किसी के सामने बड़े शर्मदार,तो आज मौका था कि यह दोनों आमने सामने थे,तो एक दूसरे की आंख में शर्म भी टपकने लगी ।

एक ने पूछा,तुम कौन हो,उसने कहा मलकुल मौत और सवालिया नज़रे पहले वाले कि तरफ गड़ाई,वह बोला मैं यमराज । मलकुल मौत ने अपने समकक्ष यमराज को देख कहा,आजकल आपपर बहुत काम पड़ रहा होगा,यमराज ने हाँ में सर हिलाया और बोले,आप को भी लगातार लगे रहना पड़ रहा होगा,इन इंसानों को थोक में ढोना मुश्किल हो रहा,खैर अपनी सुनाए, यह दोनों अपनी बातचीत में लग गए और उधर बिस्तर पर पड़े दोनों अपने बच्चे को सांसों के सहारे आखरी गिनती सिखाने लगे ।

जब दोनों की बात खत्म हुई,तो यमराज बोले,इसका क्या करें,एक तुम्हारा है, रक हमारा,यह बच्चे का क्या होगा,इसे लेने किसे आना पड़ेगा । मलकुल मौत बोली हो सकता है, बच्चे को हम सबकी ज़रूरत ही नही पड़े,वह खुद ही चला आए,जहाँ उसकी मर्जी हो,हमे तो इनमें से अदला बदली कर लेनी चाहिए । यमराज बोले हाँ, यह दोनों ज़िन्दगी भर गंगा जमुनी तहज़ीब ज़ुबान पर लाते रहे हैं, चलो आज इंसानों की गंगा जमुनी तहजीब अपनाकर देखी जाए,तुम मेरे वाले को लो जाओ और हम तुम्हारे वाले को लेकर चलते हैं ।

दोनों ने ऐसा ही किया और जैसे ही घर से बाहर निकले,मलकुल मौत के कंधे पर यमराज का हाथ था,दोनों कहकहे लगा रहे थे ,मलकुल मौत ने कहा,भाई,आपके पास आजकल हमसे ज्यादा काम है, कहिए तो हम भी हाथ बंटा लिया करें । आप अकेले पपरेशान होते हैं । यमराज की आंख में आंसू आ गए और मलकुल मौत से कहा, यह कोरोनाकाल निकल जाए,तो हम मिलकर साथ खाना खाएँगे, हम भाई ही तो है, अगर मिलकर काम करते,तो इतनी बोरियत नही लगती,कभी तुम मेरे आंसू पोछते तो कभी हम तुम्हारे,ज़िन्दगी कितनी खूबसूरत होती यार । बच्चा बिस्तर पर पड़े जिस्म देख रहा था और देख रहा था गंगा जमुनी तहज़ीब को दूर आसमान और ज़मीन के दरमियान गुम होते हुए भी....
#hashtag
#हैशटैग

Monday, May 3, 2021

हज़रत अली

किसी को लगता था कि धोखे से पीठ में उतारा एक ख़न्जर उनको ख़त्म कर देगा,ज़ालिम भूल रहा था कि वह शख्सियत मिट्टी के जिस्म की मोहताज ही नही थी । उनका जिस्म तो रुखसत हुआ मगर उनकी रूह दुनिया में ऐसी चमकी,ऐसी चमकी की पूरी क़ायनात ही रौशनी से भर उठी। उनमें नरमी ऐसी की नरमी से पिघला मोम भी उनके पैतियाने बैठ सीखे।   ताक़त इतनी की उस दौर में का सख्त तपा हुआ लोहा मुरझा जाए । मोहब्बत इतनी की ख़ुशबू रहती दुनिया के बाद भी महके है। इल्म इतना की लाखों किताबें एक करवट से निकलें। ख़िदमत ऐसी की दुनिया की सबसे शानदार मिसाल । दानशीलता ऐसी की खुद का खून निचोड़ कर ज़रूरतमंद में बाँट दें । इंसाफ ऐसा की तराज़ू का कांटा माशा भर भी इधर उधर न झुके । यूँ कहे हर फ़न में तारीख़ गढ़ने वाली नायाब शख़्सियत ।

जिनकी पैदाइश का गवाह काबा और शहादत के आँसू मस्जिद ने बहाए हों  । जिनको मिटाने के लिए भी रास्ता वह चुना गया,जब उनका सर खुदा के सजदे में हो, खुदा के सामने झुके सर पर भी पीठ पर वार करके सोचा था कि उन्हें मिटा लेंगे और वह चमक कर घर घर,नस्ल नस्ल में रौशन हो गए ।यह हैं हमारे  हज़रत अली ।

मेरा दिल जब डूबकर लड़खड़ाता है तो उसे सहारा देते हैं मेरे अली। अली ने सूफ़िज़्म की वह नीव रखी जिसकी आगोश में सारा जहाँ आ गया। जब उन्होंने मोहब्बत से बाहे फैलाई पूरी आवाम सर झुका के खड़ी हो गई। हर एक के सवाल,परेशानी,दर्द,तकलीफ़ में जिसने फाहे का काम किया वह अली थे। 

जब आँखों में अँधेरा और मुस्तकबिल में कालिख़ दिखी तब रौशनी का काम किया अली ने। मेरे अली ने हर पके दर्द में शिफ़ा का चीरा लगाया। हर तकलीफ़ में मरहम के फाहे रखे ।  इंसानियत को अपनी मोहब्बत और दूरंदेश सोच से ऐसा रास्ता दिखाया की इंसानियत की राह आसान हो गई।

 जिन्होंने हज़ारों साल पहले वह कह दिया जिसकी आज भी उतनी ही ज़रूरत है जितनी तब थी। अपने क़ातिल तक के लिए कहा की इसको सिर्फ इतनी ही सज़ा देना जितना इसका गुनाह है । सज़ा गुनाह से बढ़कर मत हो। इंसाफ में माशा भर फ़र्क़ न आने पाए ।

आज 21वीं रमज़ान उनकी शहादत का दिन है,एक कुंठित बीमार दिमाग ने उन्हें खत्म करना चाहा था। 19वी रमज़ान को पीठ पर खंजर मारा और 21वीं रमज़ान यानी आजके रोज़ हज़रत अली जिस्म से आज़ाद होकर इंसानियत के ज़र्रे ज़र्रे में ज़िन्दा हो गए । अली अपने जिस्म से उठकर आम लोगों की रूह में उतर गए। आज जब हज़रत अली को याद करिए,तो सबसे पहले खुद में सब्र लाइये, हिम्मत को जगह दीजिये,सख़ावत को ज़ेवर बनाइये,इल्म में डूब जाइये और ऐसे मोती चुनिए की इंसानियत मुस्कुराए ।

 हज़रत अली से सीखिए की गरीब अमीर के फ़र्क़ बिना,मज़हब और सोच के फ़र्क़ बिना,काले गोरे के फ़र्क़ बिना,औरत आदमी के फ़र्क़ बिना इंसाफ और मदद कैसे की जाती है । दुनिया की वह नायाब मिसाल जिसने अपनी बीवी हज़रत फातिमा को बराबर से बैठाया,उनके इल्म ओ हुनर को महकने दिया,उनके किरदार पर पहरे बैठाने की जगह उसे खुलने दिया,बेपनाह मोहब्बत भी की और हौसला भी दिया । अपने बच्चों को सच्चाई के लिए मर मिटने का सबक़ देकर बड़ा किया, उनमें ख़िदमत को कूट कूट कर पैबस्त किया और ज़ुल्म के आगे झुकने की जगह तनकर खड़े होने का गुर सिखाया,उनसे सीखिए और अपने परिवार,अपने घर,अपने दोस्तों,जानने वालों को सुधारिये, सिखाइये,खुद को निखारिये,यही हज़रत अली को याद करने का सबसे बेहतर तरीका है ।

जो इंसाफ के साथ है, वह हज़रत अली के पीछे खड़ा है । जो ज़ुल्मी के ख़िलाफ़ मज़लूम के साथ खड़ा है, उसके सर पर हज़रत अली का हाथ है । जो इल्म के लिए भूख प्यास भूला है, उसकी आँखों की चमक हज़रत अली हैं । जो झुककर परेशान को सहारा दे रहा, उसके कंधों पर हज़रत अली का हाथ है । जो यतीमों को मोहब्बत,इज़्ज़त और मज़बूती दे रहा,उसके दिल की खुशबू हैं हज़रत अली । जो हर एक कि बराबरी के लिए लड़ रहा,उसकी ढाल हैं हज़रत अली । हर अच्छाइयों की वजह हैं, हमारे हज़रत अली,बस दुआ की सुई की नोक के बराबर भी आपका किरदार हममें आ जाए,तो ज़माना महक जाए,दुआएँ ...

Thursday, January 28, 2021

अच्छे दिन

एक बार एक नवाब अपने वज़ीरों के साथ नदी पार कर रहे थे । नदी में भयँकर भूचाल आया हुआ था । पानी कभी ऊपर होता, कभी नीचे,नाव हिलती डुलती रहती । नाव में नवाब का एक ग़ुलाम भी था । 

नाव के सभी सवार सतर्क तो थे मगर अपने कामों में भी लगे थे । नदी की बेचैनी तो दिख रही थी मगर नवाब साहब भी शतरंज में लगे हुए थे । मगर नदी के विकराल रूप से डरकर गुलाम बार बार चीख रहा था,रो रहा था,परेशान हो रहा था,जिससे सबके कामों में व्यधान हो रहा था ।

जब गुलाम के फैनहे पन की अति हो गई,तब वज़ीर नवाब से बोला,हुज़ूर कहिए तो इसे चुप कराएं, नवाब ने पंकज त्रिपाठी की तरह अपनी भौं और पलको से इशारा कर दिया । वज़ीर ने पलक झपकते ही गुलाम को नदी में फेंक दिया ।

आठ दस गोते लगाने के बाद ग़ुलाम को बालों से खींचकर वापिस नाव पर ले आए,अब वह नाव के एक किनारे चुपचाप बैठा था । शांत । सयंम और ठहरा हुआ,नवाब को हैरत हुई,तो फिर सवालिया भौं उचकाई...

वज़ीर बोला, हुज़ूर असल में इसने नदी के बुरे रूप को महसूस ही नही किया था,यह डूबना जानता ही नही था,तभी जब नाव में सुक़ून से बैठा था,तो उसे वह ही बुरा वक्त लग रहा था । जब इसे असली बुरे दिन का एहसास हो गया,तो नाव पर बैठे रहने की अहमियत इसे समझ आई ।अक्सर जो अच्छे वक़्त में रोया करते हैं, उन्हें बुरे वक्त का मज़ा ही नही पता होता है, हुज़ूर ।

यह कहानी आज भी सही है, मनमोहन सिंह के वक़्त रोने चिल्लाने वाले भी विकराल नदी में फेंक दिए गए हैं । जहां उनके आँसू पर लोग हंसते हैं, तक़लीफ़ पर भरे पेट से मज़ाक उड़ाते हैं, बस अफसोस यह है कि इनको वापिस नाव पर लाने वाला वज़ीर नही है, वज़ीर है, मगर यह आज भी उसके हाथ पर भरोसा नही कर रहे, उसे पकड़ कर बदतरीन वक़्त से निकलने की कोशिश नही कर रहे....अभी तो हर एक कि बारी आनी है, नफ़रत से खड़ी इमारतें सिर्फ अशांति ही ला सकती हैं, अक्लमंदी इसी में है कि वापिस नाव में बैठ जाओ,उससे पहले की डूबने की नौबत आए...
#हैशटैग #hashtag

Monday, January 25, 2021

26 जनवरी

आज का दिन तो दुनिया देख रही है, की क्या होता है, गण और क्या होता है तंत्र और क्या होता है गणतंत्र । सरकार की ज़िद ने दुनिया के बड़े लोकतंत्र के उन रूप को भी आज बाहर कर दिया जो धुँधला गए थे । आज किसान अपनी परेड के साथ यह एहसास दिलाने में कामयाब होंगे कि सच्चा लोकतंत्र अपने अधिकारों के लिए जागरूक जनता से ही फलता फूलता है । जनता को गणतंत्र की महत्ता और अपनी आज़ाद सांस के लिए जूझने का जज़्बा सिखाने वाले हमारे पूर्वज आज बहुत खुश होंगे,क्योंकि उन्हें खुशी होगी कि अन्याय,अधर्म,हिंसा और अहंकार के विरुद्ध हमारे लोग सिर्फ अंग्रेजों से लड़ना ही नही जानते,बल्कि हर उससे जूझना जानते हैं,जो इनके पैरोकार हैं ।

ख़ैर आज कोई मामूली दिन नहीं है।यह वही दिन है जब एक देश नें  दुनिया के सामने कहा मै धर्म निरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र हूँ।मै अपने सभी नागरिकों को बराबर के अधिकार देता हूँ ।जो हमारी सामाजिक कड़ी में पिछड़ गए उन्हे अपने प्रयास से बराबर लाने की मेहनत करूँगा ।

यह वही दिन है जब दुनिया नें सबसे बड़े,सबसे महान संविधान के दर्शन किए । यह वही पवित्र किताब है जिसने किसान,चाय वाला,अखबार वाला सबको देश के शीर्ष पद पर पहुंचने की ताकत दी। जिसने हर सांस लेते इंसान को,जिसे अपने अच्छे बुरे को गढ़ने की समझ आ गई हो, उसे अपना मुस्तक़बिल चुनने के लिए वोट देने का अधिकार दिया ।

हमने दुनिया को दिखा दिया एक से एक योग्य को शीर्ष पर लाकर।यह कोई हंसी खेल नहीं था,जिन्हें आप सुबह शाम कोसते हैं उन्होने आपको बोलने की आज ही आज़ादी दी थी।वह मीडिया जो गुलामी में सिसकती थी आज ही आज़ाद हुई थी।यह वही दिन था जब दुनिया नें महात्मा के ख्वाबों के भारत के दर्शन किए थे। 

सबने मिलकर मोहब्बत से भारत नाम पर मोहर लगाई थी।हो सकता है आपको कोई हिटलर जैसा तानाशाह पसंद आता हो,हो सकता है आपका धर्म इसमें थोड़ा पिछड़ गया हो,हो सकता है आपकी विचारधारा इससे कुंठित हुई हो फिर भी हमारे गणतंत्र नें इससे बहुत ऊपर उठ कर सबको थामा है।इतना मान लीजिए सच्चा देशप्रेमी वही है जो अपने देश के मूल्यों,संविधान में सच्ची आस्था रखता हो ।

हमारे संविधान की आत्मा धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र है।इसके इतर सारी बातें बेइमानी हैं। हम सबको संविधान की प्रस्तावना को कंठस्त कर लेना चाहिए । अपने देश से मोहब्बत कीजिए,उसे आज़ाद करने में अपना सबकुछ लुटा देने वालों की बिना किसी पूर्वग्रह के इज़्ज़त कीजिये और किसी भी हाल में अपने संविधान को मानने के लिए तैयार रहिए।आज का दिन बेहद बड़ा है,उसकी अहमियत समझिए ।पार्टी,धर्म ,संगठन ,विचारधारा से ऊपर उठ कर आप सबको महान गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएँ ।आइये मोहब्बत के साथ मिलकर अपने महान देश को खुशहाली तरक्की की तरफ ले जाएँ ।
#हैशटैग  #hashtag

Friday, January 22, 2021

सुभाष बाबू

लोग मर रहे थे।पूरा शहर हैजा की चपेट में था।कहीं बच्चे की लाश पर माँ तड़प रही थी तो कहीं औरते सुहाग की चूड़िया तोड़ रही थीं।कहीं बीवी को खोने के ग़म में कोई आदमी छुपकर फफक कर रो रहा था।शहर का मशहूर बदमाश हैदर खान का भी परिवार हैज़ा की गिरफ्त में था।हैदर खान खूँखार था मगर हैज़ा के आगे एक न चली।सबका ख़ून एक झटके में बहा देने वाला अपने परिवार को हैज़ा के सामने बेबस देख रहा था।

तभी नौजवानो का एक दल आता है।जिसका नेतृत्व एक खूबसूरत नौजवान कर रहा है।वोह हैदर खान के घर में फैली गन्दगी को साफ़ करने लगते हैं।यह दल पूरे शहर में सफ़ाई अभियान चलाकर हैज़ा से निपट रहे थे।हैदर खान दरी पर पड़ा पड़ा लड़को को सफ़ाई करते हुए देखता है।जब सफ़ाई हो जाती है तो लड़को से वोह पूछता है तुम हमें जानते हो।मैं एक खूँखार बदमाश हूँ।मेरी चौखट पर डर के मारे लोग नही आते।मुझसे कोई मिलना पसन्द नही करता।

तब दल का नौजवान लीडर कहता है ए हैदर खान हमें पता है तुम क्या हो।तुम इतनी ताक़त के बावजूद हैज़ा के आगे बेबस हो।मेरे लिए तुम्हारी तक़लीफ़ दूर करना ज़रूरी है।हम सब शहर की सफ़ाई करके हैज़ा से लड़ रहे हैं।तुम्हारे घर में इतनी गन्दगी थी की उसे तो साफ़ करना ही था।तब हैदर खान कहता है तुमको क्या लगता है की तुमने मेरा घर साफ़ किया है।तुमने तो मेरा मन साफ़ किया है और यह कहता हुआ हैदर खान उस नौजवान केगले लग कर रोने लगा।साथ ही बदमाशी छोड़ समाज के लिए लग गया।

अब सुनिए यह नौजवान कौन था।आज़ाद हिन्द फ़ौज़ को गढ़ने वाले,गाँधी को सबसे पहले राष्ट्रपिता कहने वाले,देश के सबसे ज़्यादा दिलों पर राज करने वाले नेता जी सुभाष चन्द्र बोस।उनके शौर्य और संगठन और क़ाबलियत को लेकर बहुत से किस्से याद हैं।मगर आज उनकी पैदाइश के दिन उस शुरआत को बताना ज़रूरी था जो एक लीडर को गढ़ता है।

सुभाष को मानने वाले सुभाष की ज़िन्दगी से सीख आगे बढ़ते हैं।सुभाष के विचार और मार्ग को खत्म करने वाले उनको गाँधी,कांग्रेस और दूसरे विवादों में उलझाते हैं।वोह सुभाष की ज़िन्दगी के खूबसूरत पलो पर बात नही करेंगे।उनकी दिल जोड़ने की कोशिश को नही समझेंगे।उनके भारत के हर नागरिक और धर्म के प्रति मोहब्बत को नही बताएँगे।यह तोड़ने वाले लोग नेता जी के जीवन से सिर्फ विवाद ही खोजकर लाते हैं।उन नफ़रत फैलाने वालों को अपना काम करने दें।आप नेताजी के जन्मदिन पर उनकी ज़िन्दगी के बड़े कदमो,त्याग,प्रेम,सेवा,राष्ट्र प्रेम,समर्पण,संगठन क्षमता के किस्सों को आम कीजिये।

एकबात दिल में बैठा लीजिये,हिन्दू मुसलमान के बीच नफरत बोने वाला और आपस में नफरत करने वाला कोई भी व्यक्ति सुभाष बाबू का चाहे जितना नाम ले ले, वह उनके रास्ते का हरगिज़ नही हो सकता । नफरत और बाँटने वालों से सुभाष बाबू भी उतना ही नापसन्द करते थे,जितना गांधी और नेहरू,इसलिए यह जान लो नफरत दिल मे रखकर सुभाष बाबू को दिल मे नही ले सकते हो,ऐसा कोई भी प्रयोजन सिर्फ एक धोखा है । सुभाष बाबू को हर एकता और भाईचारे को मानने वालों की तरफ से आज याद करने का दिन है....
#हैशटैग #hashtag

फ़ैयाज़ सिद्दीक़ी

अगर आप सैकड़ों पन्नों के दर्शन को एक लाइन में उतरता देखना चाहते हैं, तो आपको इनको पढ़ना चाहिए । मैं हैरत में हूँ कि हमारे बीच इतने बेहतरीन लिखने वालों को क्यों नही खोजकर पढ़ा जाता । यह दिल्ली में रह रही एक शानदार शख्सियत
Faiyaz Siddiquie भाई हैं । इनका दिल इनकीं मुस्कुराहट सा है और लिखावट इनकीं मुस्कुराहट को अल्फ़ाज़ का जामा पहनाकर, हमारे जैसों पर असर पैदा करती है ।

ज़बरदस्त नॉलेज और कहानी गढ़ने में माहिर,साथ ही ह्यूमर की शानदार समझ रखने वाले फ़ैयाज़ भाई को जानना हमारे सबके लिए ज़रूरी है । दिल्ली में इनकीं मेहमाननवाजी ने दिल तो जीता मगर दिल पर कब्ज़ा इनके हुनर ने किया था ।

बहुत कम लोगों से खुलने वाली यह शख्सियत जिनकी दोस्त हो,उन्हें फ़ख़्र करना चाहिए । इनके मन में ऐसी ऐसी कहानियां कौंधती हैं, जिनपर सैकड़ो पन्ने लिखे जा सकते हैं । यह कहानियां तो लिखते ही हैं,शेर ओ शायरी मेंभी बराबर का दख़ल रखते हैं, ऊपर से वन लाइनर के बेताज बादशाह हैं। इनके लेखन में बिल्कुल नया दर्शन है, जो कभी कभार हमें बहुत आकर्षित करता है, दिल करता है कि काश यह हमने लिखा होता,मन कहता है, तुम ही ने तो लिखा है । अपने से अलग क्या ही देखें, जिसकी इतनी बेलौस मोहब्बत मेरी रँगत बढ़ाती हो । लिखने पढ़ने के सिवा एक बेहद ही दिलचस्प इंसान हैं । हम एक शख्सियत जो इतनी खूबियाँ रखती हो उसपर क्या ही लिखें,उनके मिज़ाज की खूबसूरती मुस्कुराहट की शक्ल में  सामने है ही....
#हैशटैग #hashtag

Thursday, January 14, 2021

धर्म और राजनीति

यह तो सभी समझते हैं, फ़र्क़ बस इतना है कि अगर हमारे मज़हब का लीडर मज़हब की शाल ओढ़कर सियासत कर रहा,तो वह हमारी आवाज़ है और अगर कोई दूसरे मज़हब का लीडर,अपने मज़हब की शाल ओढ़कर राजनीति कर रहा,तो वह कट्टर है ।

जिस राजनीति का शिकार बन रहे हो दोस्त,उस राजनीति की जड़े अगर अपने आँगन में जमने दोगे, तो कभी सुक़ून नही आएगा,क्योंकि ज़हर चाहे जिस थाली में रहे, ज़हर ही रहेगा,इसलिए राजनीति और लीडरशिप में कम से कम उन्हें देखो,जो सामने से धर्म की ओट लेकर आपसे वोट नही माँग रहे ।

धर्म जीने का सलीका हो सकता है मगर राजनीति की सीढ़ी नही,फिर वह दुनिया का चाहे जितना बेहतरीन वक्ता हो,कितना ही क़ाबिल इंसान हो अगर उसने अपनी सियासत में मज़हब घोला है, तो यह एक भयँकर धोखा है । हम किसी एक का नाम लिखकर इस शास्वत सत्य को एक कपड़े में समेटना नही चाहते,क्योंकि यह हर दहलीज़ के लिए सच है, कट्टरपन और नफ़रत, कभी भी सुक़ून और तरक्की नही ला सकते,इसे चाहे आज मानो या कल ।

सुक़ून और नफ़रत, आग और पानी की तरह हैं,एक साथ रह ही नही सकते,इसलिए सुक़ून और तरक्की के तलबगार हो तो खुद को मज़हबी सियासी शोरवे से अलग कर लो,वरना वैसे ही हँसे जाओगे,जैसे इन नफरती ताक़तों पर तरस खाते हुए हँसा जा रहे हैं,जो अपना सब गवाकर सिर्फ इस लिए खुश हैं, की सामने वाला तक़लीफ़ में है....
#हैशटैग #hashtag
#hashtag #हैशटैग

Saturday, January 9, 2021

गांधी की वापसी

वह जनवरी ही का महीना था । वह आज की ही तारीख़ थी । वह यही ज़मीन थी,बस साल कोई और था,साल 1915...जब इस ज़मीन पर हमेशा के लिए जम जाने वाली जड़ों,जिन्हें लोग अक्सर क़दम कहते हैं, वह पड़े । इस माटी का मोहन लौट आया ।

वह ज़ंज़ीरे जो हर सांस पर कसी हुई थीं,उन्होंने उसके आने की चाप सुनी । वह दिल जो आज़ादी की झलक के लिए धड़क रहे थे, उन्हेंने उसके पाँव की धमक महसूस की । वह गोखले जो अफ्रीका में एक सूरज देख आए थे,उनके दरवाज़े पर उनकी आँखों में वह सूरज उतरते देख रहे थे,इस माटी का मोहन लौट आया था ।

आज के दिन गाँधी अफ्रीका में एक जीत चुकी लड़ाई के योद्धा बनकर अपने आँगन को सँवारने आए थे । लोग उन्हें देखना चाहते थे और वह लोगों में आज़ादी की ललक देखना चाहते थे । लोग उन्हें कुछ हल्का बहुत जानते थे और वह लोगों को कुछ हल्का बहुत जानते थे,फिर आज से एक दूसरे को समझने का सफर शुरू हुआ । दुनिया ने देखा कि वह कैसे एक दूसरे में मिल गए कि इनकीं पहचान ही जुदा नही रही,जो गाँधी थे,वह भारत हो गए और जो भारत था,ह गाँधी हो गया,मिट्टी मिट्टी से मिलकर निखर गई और सौंधी खुशबू हवा में तैर गई ।

आज गाँधी के अफ्रीका से लौटने का दिन है । इस पवित्र मिट्टी का अपने इस बच्चे को महात्मा बनाने के सफ़र को देखिये,कैसे एक माँ अपने बच्चे को महात्मा बनाती है, यह समझने का वक़्त है । जो मुल्क गाँधी की समझ में कम आया था,जब गाँधी ने यात्रा के लिए पांव बढ़ाए, देश उनके सामने खुलता चला गया और कितना खुला की गांधी और देश मे पर्दे जैसा कुछ रह ही नही गया ।

अफ्रीका में गाँधी के नाम के झंडे गड़ चुके थे । उनपर तब ही बायोग्राफी लिखी जा चुकी थीं । अखबारों में कसीदे लिखे जा चुके थे । पहचान पहले ही जम चुकी थी मगर भारत अब भी उनका इंतेज़ार कर रहा था,जो आज के रोज़ खत्म हुआ । आज रौशनी का दिन है....गाँधी की वापसी और हमारे आगे बढ़ जाने का दिन
#hashtag #हैशटैग

Saturday, January 2, 2021

सावित्री और मोहन राकेश

वोह जब चलती थीं तो लोग उनपर गोबर फेंकते,कूड़ा फेंकते,पत्थर फेंकते,लोग उनके हौसलें को अपने मन की गंदगी से तोड़ना चाहते,मगर वोह बगल में एक अदद दूसरी साड़ी दबाए आगे बढ़ जाती। उनमें एक उम्मीद थी,यही उम्मीद और मेहनत इन पत्थरो के ज़ख्म,कूड़े और गोबर की गन्दगी से कहीं ज़्यादा बड़ी थी। उन्होंने लड़कियों का पहला स्कूल खोला,खुद पहली महिला प्रिंसिपल हुई। उन्होंने कलम उठाकर मराठा ज़मीन पर कविता उकेरी तो हिम्मत देकर खुद लड़कियों को कलम पकड़ाई। यह वोह पहली औरत है जिसके सामने हाथ में पत्थर लिए मर्द और औरते झुकती चली गईं।

आज जिनकी रखी नीव पर रौशनी डाल रहा हूँ वोह सावित्री बाई फूले हैं।उनका जन्मदिन है आज। जो लड़कियां आज़ादी की बात करती हैं, जो लड़के लड़कियों के खुले आसमान की वकालत करते हैं।वोह गहरी आँखों से सावित्री बाई फूले को देख ले,पढ़ ले और अपनी उम्मीद और ख्वाहिश को ज़मीन दें।लोग सावित्री बाई के पैरों में काँटे बो रहे थे,वोह उनकी नस्लों के पाँव के काँटे चुन रही थीं।कम से कम आज तुम सब उनपर फेंकी गई गन्दगी को महसूस तो करो,सावित्री बाई का आँचल तुम्हे महका देगा।आज उनको रोज़ से ज़्यादा याद करो।

एक तरफ सावित्री बाई की पैदाइश का जश्न है तो दूसरी तरफ मेरे दोस्त मोहन राकेश का ग़म।कोर्स की किताबों में जिन मोहन राकेश को रट रट बड़ा हुआ।पता ही नही चला की कब वोह रूह में उतर गए।भारतेन्दु के बाद मोहन राकेश ही वोह थे जिन्होंने नाटकों को ऐसे थामा की हर नाटक,हर किरदार,हर मंच पर मोहन राकेश ही रह गए।दिल्ली की सर्द सुबह जब मोहन राकेश नही उठे तो लगा किसी नाटक का कोई नायक अचानक सो गया है मगर नही आजकी वोह सुबह नाट्य जगत की शाम थी।मेरे मोहन कभी नही उठे मगर वोह हर वक़्त मेरे इर्द गिर्द रहते हैं।जब मैं थियेटर में पाँव धरता हूँ तो चुपके से वोह कहते हैं, मैं भी तुम्हारे साथ नाटक देख रहा हूँ।मैं अपने कन्धों पर उनके रखे हाथ को जी लेता हूँ।

मेरे लिए सावित्री बाई की ख़ुशी है तो मोहन राकेश का गम भी है।एक की कलम कविता में डूब लड़कियों की सुबह बुन रही थी।तो दूसरे की कलम नाटकों में उलझ कर इतिहास बना रही थी।अपने देश की सौंधी खुशबू को महसूस करना हो तो इन सबको जान लो वरना एक दिन जानने को तरसोगे की मेरी माटी क्या है।इसकी महक कैसी है।इसका रँग क्या है।इससे फूटती रौशनी कैसी है।हाँ,यही मेरा भारत है।
#हैशटैग #hashtag