आजकल बिहार समेत कई राज्यों में "दत्तक कॉंग्रेसी" आए हैं । यह इतने भयँकर कॉंग्रेसी हैं कि इन्हें यह नही पता कि बात कैसे की जाती है,कम से कम नेहरू परिवार से न्यूनतम मर्यादा तो इन्हें सीखनी ही चाहिए मगर क्योंकि जिस तरह इनके बड़े भाई बहन कॉंग्रेस से भाजपा में जाने के बाद बहुत बड़े भाजपाई बनते हैं और अनर्गल बयान देकर खुद को संघी बताने की कोशिश करते हैं, यह भी उसी परम्परा के हैं ।
यह "दत्तक कॉंग्रेसी" या कहें दत्तक लीडर,कल चीख रहे थे कि सिवाए कॉंग्रेस के कौन है, जो भाजपा से मिलकर सरकार नही चलाए । तो औरों की बात तो छोड़िए, जिस पार्टी में रहकर दूध के दांत निकले,क्या वह भी भाजपा के सहयोगी हैं और अगर यह बात वह जानते थे,तो काहे उसके टिकट पर लड़कर जान दिए थे,मुझे इसी मक्कारी पर गुस्सा आता है।
असल मे दत्तक लीडर और इनकीं परजीवी विचारधारा हर उस दल में घुस जाती है, जहाँ मोटा पैसा हो और छोटा दिमाग हो । इनके लिए सबसे मुफीद वह जज़्बाती लीडर होते हैं, जिन्होंने घर के बाहर की हवा न खाई हो मगर उनकी पूछ बहुत हो,यह उनके कंधों पर बैठकर अपनी दुकान सजा लेते हैं ।
यह दत्तक कॉंग्रेसी सबसे पहले सर्टिफ़िकेट और मोहर कब्जे में लेते हैं । अब इन्होंने कॉंग्रेसी होने की मोहर हथिया ली है, जिसको देखो उसे कॉंग्रेस से भगाकर संघी होने का सर्टिफिकेट बांट रहे,यह भूल गए जब इनके कानों में लाल सलाम की आवाज़ नही दी गई थी,उससे पहले लालू जी जैसे लोग लड़ रहे थे । यह जो यूज़ एन थ्रो की राजनीति कर रहे हैं, इसका परिणाम देश की सबसे पुरानी पार्टी को ब्याज सहित भुगतना पड़ेगा ।
यहाँ जो कॉंग्रेस के वफादार बैठे हैं,मेरी बात को तब काटें जब लालू प्रसाद और तेजस्वी पर बोले गए अहंकार के शब्दों को सही कह सके । जब सोनिया जी के साथ कोई नही था,तब लालू खड़े थे । लालू तो नए नवेले दत्तक कॉंग्रेसियों की और पुराने संघी कॉंग्रेसियों की चाल का शिकार हो गए । यह जो एकला चलो की नीति है, यह मर्यादा के साथ भी चली जा सकती है ।
यूपी और बिहार दोनों जगह यह अहंकार देख रहे हैं, अभी ज़्यादा नही बस सालभर बाद देखना,जब थर्ड फ्रंट में सारे नए पुराने सहयोगी चले जाएंगे,तब पेट पकड़ कर मत रोना की थर्ड फ्रंट तुम्हारे खिलाफ खड़ा किया गया है ।
अवध में मशहूर कहावत है, "लौंडई सोहबत-सतरिख का मेला" तो यह जो दो चार, बाएं गोद से लेकर दत्तक कॉंग्रेसी पाले है,यह सिर्फ तमाशा भर हैं, यह अपनी विचारधारा में हवा खाकर इधर आए हैं, क्योंकि अब उधर न पैसे हैं और न ही दैहिक क्रांति का चकल्लस,अब कॉंग्रेस उन्हें अपने दबे ख्वाबों को पूरा करने का माध्यम लग रही है ।
आज बात बुरी बहुत लगेगी और लगनी भी चाहिए क्योंकि देश की एक पार्टी,जिसको हम दक्षिणपंथी विचार के सामने दूसरा ध्रुव मानते हैं, वह इतनी दरिद्र हो जाएगी कि दत्तक लीडर उसे खिलौना बना देंगे,हमे सहन नही होता । आज भी लालू जी और अखिलेश जी या तेजस्वी वगैरह ने अपना मयार नही गिराया है कि कल के लड़कों के चक्कर मे सोनिया जी या कॉंग्रेस को उल्टा सीधा कहें ।
और आखरी बात जान लो अगर इतना ही दत्तक लीडर बनकर विचारधारा का भूत सवार हुए है,तो जाकर उनसे पूछो की गुजरात दंगों के आरोपी को इतना क्यों बढ़ने दिया कि आज वह उनके सरो पर सवार है । जिस संघ के खिलाफ संघर्ष कर रहे हो,उसे इतनी खाद पानी किसने दी कि वह नासूर बन गया । यूपीए टू में बर्मा में विवेकानंद फाउंडेशन के कार्यक्रम को करोणों रुपये किसने दिए,जिसमें तुम्हे निपटाने के मंसूबे फले फूले, सावरकर पर डाक टिकट किसने जारी किया ।
हम यह नही कह रहे कि तुम अकेले मत खड़े हो,खूब मेहनत करो और अकेले खड़े होने लायक बनो । दूसरों को गरियाने,उन्हें सर्टिफिकेट बाँटने की जगह अपनी चूले मज़बूत करो । यह कौन सी बदतमीज़ी है कि जुमा जुमा चार दिन हुए पार्टी में आए और बन गए सिंधिया,गरियाने लगे हर पूर्व सहयोगी को,तो तुम्हारा यक़ीन क्या ही करें,कल तुम कहीं और खड़े होंगे और अपने वर्तमान शीर्ष नेताओं को गरिया रहे होंगे ।
मुझे इन दत्तक कॉंग्रेसियों में गांधी-नेहरू की कॉंग्रेस नही नज़र आ रही,मेरी यह बात बाद में सच होते देखना, बिहार समेत कई राज्यों में यह जो दत्तक कॉंग्रेसी आए हैं, यह खा पीकर लौट जाएंगे और हार की माला गांधी परिवार और समाज को पहनाकर निकल लेंगे,क्योंकि यह अनार सिफत लोग हैं, भरभरा कर जल उठेंगे मगर देर तक टिक नही पाएँगे, यह अपनीमूल विचारधारा के नही हुए,यह किसी के नही होंगे, क्योंकि यह मूलतः परजीवी हैं, यह दत्तक लीडर ही रहेंगे ।
लालू और अखिलेश को भूल जाए,वह अपने संगठन,काम और लोगों के बीच चौबीस घण्टे हैं । उनके ऊपर हमले करके आप अपनी कुंठित राजनीति ही दिखा रहे हैं । अभी बहुत वक़्त बाकी है, यह याद रखना की जब सहयोग की ज़रूरत आएगी,तो यह लोग ही फिर सोनिया जी का मुँह देखकर आपके साथ खड़े हो जाएंगे मगर जो हरकते हैं इन दत्तक कॉंग्रेसियों कि, उनके साथ खड़ा ही नही होना चाहिए । मेरी बात दर्ज करलें,वर्तमान गांधी परिवार अपने इन दत्तक लीडर्स पर पछताएगा । इन्हें साथ लेने में कोई बुराई नही,बल्कि अपनी खुद की लगाम भी इनके हाथ सौंप देने में तबाही है ।
कॉंग्रेस अपने सहयोगियों से लड़कर कभी नही खड़ी हो पाएगी । हाँ उनसे बात करके, अलग लड़ने में कोई बुराई नही मगर सहयोगियों पर कीचड़ उछालकर अपने मुँह पर ही वापिस कीचड़ पड़ने का इंतेज़ार कर रही है । अभी वक़्त है, इन दत्तक लीडर्स की लगाम अपने हाथ लें,वरना यह घोड़ा नही नीलघोड़ साबित होंगे और सारा खेत उजाड़ डालेंगे, सारी फसल तबाह कर देंगे केवल दो पत्ते खाने के लिए...
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