Sunday, April 29, 2018

बुद्ध पूर्णिमा

जब सोने की चमक महलों को रोशन कर रही थी।शुद्दोधन और महामाया कपिलवस्तु की खूबसूरती निखार रहे थे।महामाया ने जब महल से बाहर कदम रखा तो लुम्बिनी के जँगल में एक बच्चे को जन्म दिया।सिद्धार्थ।वही सिद्धार्थ जो सोलह साल की उम्र में यशोधरा की रूह बना और राहुल का साया बना।वही सिद्धार्थ जिसने शुद्दोधन से कहलवा लिया की बचाने वाला मारने वाले से बड़ा है।

ईसा से 563 साल पहले पैदा होने वाला सिद्धार्थ जब दुनिया का सारा उरूज,चमक,परिवार,दोस्त,खानदान तज कर जँगल में निकला।पैरो में काँटे चुभे,धूल,धूप, बारिश,आँधी,भूख ने तोड़ा मगर वह डिगा नही।हम और आप जब मामूली सी ख्वाहिशों को नही छोड़ पाते तब उसने ज़रूरतों को छोड़ा।जब वह लौटा तब सिद्धार्थ खत्म हो चुका था।दुनिया ने तब गौतम बुद्ध को देखा।

आज बुद्ध पूर्णिमा है, मेंरे गौतम का दिन है।मुझे जिसने बताया इंसान सिर्फ इंसान है, उसमे कोई फ़र्क नही।ख़िदमत सिर्फ ख़िदमत है जो बिना फ़र्क की जाए।मेरे गौतम ने बहुत पहले सत्य, अहिँसा का वह दर्शन दिया जो लोग भूल चुके थे।बुद्ध को पूजने से ज़्यादा बुद्ध को ज़िन्दगी में उतारना होगा।ज़िन्दगी बयानबाज़ी से नही प्रयोग से बढ़ती है।बुद्ध के प्रयोग से।
आइये हम सब बुद्ध से प्रयोग करना सीखा, जिससे हर इंसान की ज़िन्दगी आसान हो जाए।रूहे सुकून पा जाए।दिल की तड़पन और कसक खत्म हो जाए।मेरे बुद्ध के होंटो की मुस्कान के मानिंद यह दुनिया मुस्कुरा दे।सुन लो मेरे बुद्ध।मेरे गौतम।मेरे गौतम बुद्ध।

Tuesday, April 24, 2018

निर्लज्जता समय के खड़ग सिंह की

किसी को बचपन के कुछ चैप्टर अगर याद हों तो उनमे से एक थे बाबा भारती ।जिनका घोड़ा खड़ग सिंह डाकू एक बीमार अपाहिज के वेष में छल करके छीन ले जाता है ।बाबा भारती उस भागते हुए डाकू से सिर्फ इतना कहते हैं की यह घटना किसी को मत बताना,वरना लोगों का बीमार ज़रूरतमंद पर से विश्वास हट जाएगा।उनकी मदद कोई नही करेगा ।

यह सन्दर्भ क्यों लिया,क्योंकि हालात ही कुछ ऐसे पैदा हुए हैं ।एक व्यक्ति है, जो कुछ भी करके अपने अस्पताल में मर रहे बच्चों को बचाने निकलता है ।अगस्त में जब बच्चे मरते हैं, कहकर लोग जान छुड़ा लेते हैं, तब वह पसीने से तर बतर पूरे भारत की सबसे गहरी और दर्दनाक रात को मदद करने भागता फिरता है ।जिसको दुनिया सलाम करती है मगर किसी की आँख में वह इस क़दर चुभने लगता है की उसकी यही नेकी उसकी ज़िन्दगी का जंजाल बन जाती है ।

बाबा भारती के वक़्त एक डाकू  धोखा देता है,जिसे बाबा भारती के वचन बेचैन कर देते हैं ।अब स्थिति बदली हुई है, उस डाकू की जगह एक शानदार व्यक्तित्व है, जो कहता है, "मीडिया के सामने बहुत हीरो बन रहे हो,देख लेंगे तुम्हे ।" अब बस फ़र्क इतना है की इस वक़्त बाबा भारती के पाले में खड़ा शख्स यह नही कह सका की, महराज यह क़िस्सा किसी को मत बताइयेगा वरना लोगों का नेकी करने से भरोसा उठ जाएगा ।बाबा भारती के सामने तो वखड़ग सिंह  प्रयाश्चित करने आता है, इसके ठीक उलट आजका यह शख्स बिना सुनवाई और बेल के महीनों से जेल में है ।

हम सबको देखिये,उसका नाम लिखते ही,हमे उसमे से गुनाह की बू आने लगती है ।उसका मज़हब ही उसके गुनह की चुगली करता है ।हमे पता है, कुछ लोग मन से ही मान चुके हैं की वह डॉक्टर ही गुनहगार है, हम इन मानसिक बीमार लोगों की तरफ मुँह भी नही करते ।मेरी फ़िक्र बस इतनी है की कहीं लोग नेकी करना ही न छोड़ दें ।क्योंकि बहुत तंग नज़र और छोटे से दिल के लोगों को नाम और काम दोनों खटकते हैं ।बाबा भारती के वक़्त के डाकू के तो दिल भी था मगर अब यहाँ इसकी भी कोई गुंजाईश नज़र नही आती ।...

Tuesday, April 17, 2018

विश्व धरोहर दिवस

खँडहर की दरकी हुई दीवारें, उनपर काई से पनपी कालिख़।दर और दरवाज़े।ख़ाली ताखें और सूनें फाटक।हर दर ओ दीवार हमे रोकती है, पकड़ती है, खींचती है।अपनी दास्तान सुनाना चाहती है।बेवक़ूफ़ खण्डहर।यहाँ दिल और रूह खण्डहर हुए जा रहे हैं, यह अपनी दास्तान सुनाने को बेचैन हैं।मैं जानता हूँ तुममे आज भी हज़ार किस्से दफ़न हैं।तुममे मेरे पुरखों की रूह है।उनके बचपन की शरारतो से आखरी साँस तक के पल कैद हैं, मगर क्या करें।ज़िंदगी दाल चावल से निकलने नही देती।इण्डिया गेट,लालकिला,ताजमहल,इमामबाड़ा,हवा महल जैसी किस्मत सबकी नही हैं।

यहाँ भी हमने क्लास बना रखा है।छोटे और कमज़ोर खण्डहर आज भी हमे नज़र नहीं आते।इन्हें देख कर दिल कचोटता है।रसमन ही सही जी चाह रहा है पास के किसी खण्डहर की दीवार को गले लगा लूँ।उससे पूंछू की दोस्त कितने खुशहाल थे तुम।कितने खण्डहर होंगे जिनके आँगन में सफ़ेद चादर में लिपटे तख्त पर पूरा ज़माना बैठता होगा।आज उन आँगनों में जँगल हैं जहाँ कभी कोई रात के अँधेरे में भी सूई ढूंढ लेता था।हमने सबने अपनी ज़िन्दगी में एक न एक घर को खण्डहर में बदलते ज़रूर देखा होगा।जब इन्हें देखना तब अपने आप से सवाल करना की यह जो खण्डहर है जब यहाँ इंसान थे तो यह घर था।इंसान गए और यह खण्डहर हो गया।इसलिए इंसान की फ़िक्र करना।उन्हें रोकना,उन्हें बचाना वरना ज़मीन का हर हिस्सा खण्डहर हो जाएगा।

ए मेरी दरकी हुई दीवारों तुम्हे पता है हमने कितनी गलतियां की हैं, तुमही उन्हें महसूस कर सकते हो।हमने तो ज़िंदगियों का मोल न समझा तो दीवारें क्या चीज़ हैं।हम हर ईंट में,हर लखौरी में नफ़रत ही ढूंढ सके हैं।ऐ ख़ाली पड़े वीरान बरामदों हम तुममें उठते ठहाकों,कहकहो को महसूस ही नही कर सकते क्योंकि मेरे दिल की सीमाएँ निर्धारित हैं।मेरे पाँव बंधे हैं।मैं चाहकर तुममें अपने आप को नही देख सकता।आज भले ही हैरिटेज दिवस हो मगर हमे ज़रा भी परवाह नही की एक दिन हम भी हैरिटेज हो जाएँगे और आने वाली नस्ले पढ़ेंगी की शीशे से चमकती अथाह ऊँची इमारतों में एक वक़्त जानवर भी रहते थे।यह जानवर जँगली और घरेलू दोनों से ज़्यादा खूँखार और बेलगाम थे।

ज़रा से चूकने पर यह अपने ही भाई की बोटी नोचकर जश्न मनाया करते थे।आज भले इस ओढ़ी हुई खाल में इस सच को ढक लो मगर जब यह खण्डहर होंगे तब जब यह बोलेंगे कोई नही रोक पाएगा इन डामर से चमकती सड़कों की चीखो का सच।अगर हो सके तो ऐ खण्डहरों हमे खण्डहर होने से पहले सीधी राह दिखा दो।आज तो तुम्हे मोहब्बत से मना ही रहे हैं, बसतुम हमेशा ज़हन में रहो जब तक हम सब हैरिटेज नही हो जाते ।हैरिटेज की हिफाज़त तो करो ही साथ ऐसे क़दम छोड़ते जाओ की भविष्य तुम्हे देख कोसे न।आज विश्व धरोहर दिवस है हो सके तो अपने इर्द गिर्द ख़ाली पड़े हैरिटेज इमारत में जाओ,सरकारी मोहर वाली हैरिटेज नही,खुद महसूस करने वाली इमारतों में और खुद से ख़ूब बाते करो।ताकि दिल का मैल निकल जाए और खण्डहर से इंसान बाहर आए।यह चमत्कार सिर्फ ऐसी ही इमारते कर सकती हैं।

Monday, April 16, 2018

Sunday, April 15, 2018

चार्ली चेपलिन

इस तस्वीर को पहचान लीजिये।यह वोह चेहरा है जो हमे सम्भालने के लिए कहीं छुप गया ।हमारे ज़ख्मो पर मरहम रखता रखता गुम हो गया ।हमे हमारे मतलब का चेहरा याद रह गया।इनसे सीखें की कैसे बिना तलवार उठाए,चीखें चिल्लाए बिना भी अपने अंदर छुपे हुनर से बड़ी से बड़ी सल्तनत को जवाब दिया जा सकता है।महसूस कीजिये कैसे किसी दर्द में डूबे दिल को मुस्कान की छाँव में लाया जा सकता है।जब ज़ुल्म इन्तेहा कर जाए तब यह एक रास्ता बनाते हैं।जब इंसानियत टुकड़ो टुकड़ों में बट जाए तब इनके जैसे किरदार खुद को मिटाकर टूटे दिलों को जज़्बात से जोड़ते हैं।

यहाँ तक हमे हमारे ग़म भुलाने के लिए इन्होंने जो चेहरा अपने खूबसूरत चेहरे पर ओढ़ लिया,मैं सोच कर हैरान हूँ की यह किस तक़लीफ़ से गुज़रे होंगे।उस चेहरे को अपनाना जिस चेहरे के विरुद्ध ही लड़ाई हो,बड़े जिगरे का काम है। जब आईने में अपनी सूरत देखते होंगे तो किस क़द्र दिल रोता होगा,मगर हर आँसू की ज़ब्त करके वह हमारे डूबे हुए दिलों को पार लगाते हैं ।
सबसे बड़ी बात तब और अब में उस वक़्त उनका जो दुश्मन था उसके मुकाबले का खूँखार आज कोई भी नही है मगर आज मैं अपने विरोधी का चेहरा तो छोड़िये नाम लेकर भी मज़ाक कर दूँ तो टुकड़े टुकड़े कर दिया जाऊँ। कल जब वह मज़ाक करता था तो जनता उनमे अपने दर्द देखती थी आज दुनिया के किसी भी कोने में नेता का विरोध कीजिये तो आपके साथ कम लोग ही होंगे ।हाँ अगर कुछ दिमागी पिछड़े हुए देश में आपने उनके नेताओं की अक्षमता,क्रूरता,धूर्तता पर सवाल किये तो कहिये भीड़ आपको खींचकर ही मार डाले।पकड़ कर सलाखों में डाल दिया जाए।

आज 16 अप्रैल को अपने चार्ली चेपलिन को याद कर लीजिये।मेरे तो इर्द गिर्द वही हैं।आज चार्ली का जन्मदिन है, हो सके तो उनके उन किस्सों को याद कीजिये जिसमे वोह युद्ध के विरुद्ध या युद्ध में लोगों को मायूस न होने के रास्ते बुन रहे थे।आज एक बार फिर दुनियाभर में गुस्से और बदले की आग से भरे हुए लोग उभर आए हैं, आज फिर चार्ली बेहद अहम् हो गए हैं।चार्ली के विरोध का तरीका भी जानना,बताना और पढ़ाना चाहिए..

Friday, April 13, 2018

वहशी बन सकते हैं!

हम किसी भी अपराधी को सड़क पर खीचकर मार नही सकते ।लाख तक़लीफ़ में हों मौत की सज़ा की वक़ालत नही कर सकते ।हर हाल में बस इतना चाहेंगे की कानून अपना काम ईमानदारी से करे ।
हम तो अपराधियों की तस्वीर साझा करना भी सही नही समझते ।बलात्कार से टूट ज़रूर गए हैं मगर अपने हाथों को किसी के ख़ून में सना हुआ देखने के लिए दिल कभी तैयार नही होगा ।
आप हमे जीभर गालियाँ दीजिये,अनाप शनाप बकिये मगर यह यक़ीन जाने हम अंत तक यही कहेंगे की इसमें शामिल हर अपराधी को सज़ा न्यायालय दे ।हम इन घटनाओ का विरोध ही कर सकते हैं ।हमारे हाथ में न शासन है की फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बना दें,न प्रशासन हाथ में है और न ही किसी भीड़ का समर्थन कर सकते हैं, जो इन्हें सार्वजनिक स्थानों पर फाँसी देने की वक़ालत करे।

हम अपने हर एक की लाश पर खड़े होकर भी बुराई से अपने उसूलों के साथ लड़ने के लिए तैयार हैं ।मेरे अपने घर में दंगो  में टुकड़े टुकड़े में लाश आई मगर फिर भी हमारे बड़ो ने उस दर्द को ज़ब्त करके समाज को एक करने पर ध्यान दिया,यह परवरिश हम भुला नही सकते।

एक बात की गिरह बाँध लें,वहशी से लड़ते लड़ते खुद को वहशी न बनने देना भी एक बहुत बड़ा काम है ।जहाँ अच्छे अच्छे चूक जाते हैं ।हम आम अवाम की बात नही कर रहे मगर जो खुद को समाज के लिए तैयार कर रहें,वह हिम्मत रखे,धैर्य रखें और अंत तक लड़ते हुए अपने आप को बुराई से दूर रखें।

हम किसी के भी मीडिया ट्रायल के खिलाफ हैं ।बस सख़्त और ईमानदार क़ानूनी करवाई हो,इसी के लिए दबाव बना रहें ।इन आंदोलनों,मोमबत्ती के जुलूसों, उपवास से ही आज दोनों मामलो में कानून सख़्त हुआ है।गिरफ्तारी हुईं हैं।इस्तीफे हुए हैं।हमारा हर क़दम कानून को प्रभावी करना है न की आरोपियों को खींचकर सड़क पर मार देना।आप सब भी कोशिश कीजिये की ऐसे ख्याल भी मन में न आएँ, वरना एक बार हिँसा मन में बैठ गई तो कभी भी विध्वंस का रूप ले ही लेगी ।कभी भी आप उस पाले में खड़े मिलेंगे जिनका  आज विरोध कर रहें हैं।सम्भल कर चलिए,वक़्त कठिन भी है और नाज़ुक में,इंसान और वहशी बनने में सूत भर का फासला है, खुद को बचा लीजिये।

Thursday, April 12, 2018

जलियावाला

हाँ उस रात चूल्हे नही जले थे।हर चूल्हे की रख ठण्डी थी,बर्तन ख़ाली थे।चूल्हों और घर के बाहर फैली मायूसी देख तुम फ़र्क नही कर सकते थे की यह मुसलमान का घर है या हिन्दू का या सिख का।लोग लड़ते जा रहे थे,रोते जा रहे थे।उनका लड़ना धर्म के लिये नही था,उनके आँसू किसी धर्म के रँग के नही थे।उनका एकमात्र लक्ष्य था भारत।मैं जब उस जगह लम्बे अरसे बाद गया तो उस माटी को चूम लिया।
जी चाहा कोई तो रास्ता दिखे की इसकी धूल में मिट जाऊँ।जब जब कोई निरीह,मासूम मरता है मुझे जलियावाला बाग़ याद आ जाता है।मेरी आँख में आँसू तैर जाते हैं की बहुत बार हमे हमारे हक़ों के लिए मरना पड़ता है।

13 अप्रैल हमारे पुरखों के संघर्ष का भी दिन है।जलियावाला बाग़ में अपने हक़ की लिए शहीद होने का दिन।इतना समझ लीजिये।जिस दिन अपनी आज़ादी के लिए इस हद तक तैयार हो जाएँ की मौत रुकावट न लगे,उसी दिन से सामने वाले की उलटी गिनती शुरू।जलियावाला बाग़ ने उसमे भी मोहर लगा दी की जब कोई निरीह का ख़ून बहाता है।तो वह बहा हुआ ख़ून उसके तलवों में चपक कर तब तक निशान छोड़ता रहता है जब तक वोह पूरा साम्रज्य खत्म न हो जाए।हर ख़ून का हिसाब ईश्वर लेगा।हर अन्याय का अंत निश्चित है।

कल जलियावाला में हमारे पुरखों ने भी हथियार नही उठाए थे,आज जब हम सब बलात्कार और हत्याओं का विरोध मोमबत्ती जलाकर कर रहें,तो वही परम्परा पर हैं ।हिँसा से दूर अंत तक अन्याय का विरोध ।आज भी यह अल्फ़ाज़ हमे उसी बाग़ में खड़ा कर देते हैं और कहते हैं अन्याय,अधर्म और पाप से लड़ते हुए शहीद हो जाओ मगर अपने पुरखों को शर्मिंदा मत करना....
जलियावाला बाग  देखो यहीं चली थी गोलिया
ये मत पूछो किसने खेली यहाँ खून की होलिया
एक तरफ़ बन्दूके दन दन एक तरफ़ थी गोलिया
मरनेवाले बोल रहे थे इन्क़लाब की बोलिया
यहा लगा दी बेहनोने भी बाज़ी अपनी जान की॥
आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की।।

Wednesday, April 11, 2018

जन्नत बच्चे और आँसू

जन्नत में एक बहुत बड़ा पेड़ लगा हुआ है।उसकी पत्तियाँ सफ़ेद हैं और सन् सफ़ेद ही रुई के फायों की तरह फूल है ।पूरे पेड़ की डालियाँ बहुत दूर दूर फैली हुई हैं ।पेड़ के नीचे नरम पंखो की तरह सफ़ेद चादर बिछी हुई है। पूरी जन्नत की यह सबसे खूबसूरतजगह है, क्योंकि यहीं इसी पेड़ की छाँव में मोहम्मद साहब,रामजी,ईसा और कान्हा बैठ कर अपनी गढ़ी दुनियाँ को देखते हैं।

आज जब वह सब पेड़ के नीचे थे तो हमेशा सुक़ून में रहने वाली जन्नत की सबसे खूबसूरत जगह सिसकियों से भरी हुई थी ।पेड़ के हर तरफ सफ़ेदी पर सुर्ख़ ख़ून के बहने के निशान थे ।सभी धर्म के मुखियाओं ने एक साथ ऊपर देखा,जिधर से ख़ून की धारा बह रही थी।
उसपर एक बच्ची सिसक रही थी ।उसके रोने के साथ डालों पर खेलते बाकी बच्चे भी रो रहे थे । कान्हा ने लपक कर उसे अपनी गोद में उठा लिया और उसके चारो तरफ ईसा, मोहम्मद साहब और रामजी बैठ गए ।सबने एक साथ कहा,इस पेड़ पर सिर्फ बच्चे रहते हैं ।दुनिया के हर हिस्से में मारे गए बच्चे यहीं तो सुकून पाते हैं।देखो उस डाल पर सब सीरिया से आए बच्चे हैं और तुम्हारे ठीक बगल मे भारत से,
बेटी भला जन्नत में भी आँसू,ज़ख्म,तक़लीफ़ और ख़ून ।

यह क्या है, यहाँ तो सारी तक़लीफें खत्म हो जाती हैं और ज़मीन के तमाम अच्छे काम यहाँ हर परेशानी को ख़ुशी में बदल देते हैं। तुम यहाँ भी दर्द में तड़प रही हो,पूरी जन्नत आज बेचैन है, यह हो क्या रहा है ।
तभी दूर बैठे नानक अपनी चादर से आँसू पोछते हुए कहते हैं, तुमहे पता है यह बच्ची यहाँ भी क्यों रो रही है ।क्योंकि इसे यहाँ हमारी सूरत दिख रही है ।वही सूरत जिसके नाम पर इसको ज़मीन पर हमारे ही पूजने वालों ने हमारे ही आँगन में नोच नोच करके,पत्थर पर पटक पटक कर मार डाला ।

ऊपर से तुम्हारे हमारे सबके मानने वाले इस बच्ची के बहते ख़ून को खुद के मुँह पर मलकर हमारे तुम्हारे सामने आते रहे और हम यहाँ से यह सिर्फ देखते ही रह गए । तभी रामजी खड़े हो जाते हैं और तक़लीफ़ और गुस्से की आवाज़ में कहते हैं, यह मेरी बच्ची है।ऐ मोहम्मद सरयू के पानी की सौगन्ध वह धरती पर कभी शाँति नही आने दूँगा,जिस धरती पर इस बच्ची का क़त्ल हुआ है ।हर उसको तड़प तड़प कर नरक द्वार जाना ही होगा जिसने इसका समर्थन किया है ।ऐ मोहम्मद शर्मिंदा हूँ मैं, देखो कान्हा की आँख भी नही उठ रही।

तभी मोहम्मद साहब लरज़ती हुई ज़बान से कहते हैं, हे राम,मायूस मत हों,यह जो कर रहें हैं, वह आपके खिलाफ ही है ।मेरे भी बहुत से मानने वाले अल्लाह हू अकबर कहकर यही सब करते रहें हैं ।हम,आप और बाकि सब जानते हैं इन इंसानों की करतूतें बहुत बद्तर हो चुकी हैं ।यक़ीन जानो हमे वह दिख रहा है, जो यह नही देख पा रहे।हमे इनके खुद के आँगन में ही दोज़ख दिख रही है।यह सब इस बच्ची के ख़ून में शामिल या खामोश लोग उस आग के बहुत नज़दीक़ पहुँच चुके है।यह खत्म होने की कगार पर हैं ।

बच्ची रोए जा रही है ।इंसानों के दिए उसके ज़ख्म पर हर पैग़म्बर और देवता अपनी ओढ़ी चादर से ख़ून पोछ रहें हैं ।रो रोकर मरहम रख रहें हैं ।अपने नए आए इस नन्हे मेहमान से जन्नत में दूसरे बच्चों की सिसकियाँ बढ़ रहीं हैं ।
और यहाँ नीचे, ज़मीन पर सब कुछ सामान्य है, यहाँ फिर कुछ बच्चियां हँसते हुए बाहर निकली हैं और साथ ही बाहर निकले हैं, वह,जिन्हें अपने धर्म,अपनी क़ौम के लिए इनकी मुस्कुरहट को कुचलना है।बाकि सब अपने अपने घरों में बच्ची और मारने वालें दोनों को पाल रहें हैं, कल किसने देखा है, जिसे हम घर समझ रहें,दोज़ख बन जाए शायद....

Monday, April 9, 2018

इमाम जाफ़र 22 रजब

यह पढ़कर मज़ा तो बिल्कुल नही आएगा मगर क्या करें हम नही लिखेंगे तो कौन लिखेगा ।हमारे बूढ़े किस क़दर चालाक थे,उन्हें पता था की हम किताबों की तरफ़ जल्दी रुख नही करेंगे।हम किसी के पास कुछ सीखने भी नही जाएँगे।तो उन्होंने अपने बीच से क़ाबिल लोगों से जुड़े दिनों को त्योहारों में डाल दिया की कम से कम इसी बहाने इनका नाम तो चलता रहेगा।जब किसी को जानना होगा तो इन नाम के बहाने ही सही उस किरदार को ढूंढकर पढ़ेगा और अपनी ज़िन्दगी के साथ दुनिया को बेहतर रास्ता दिखाएगा।मगर नही,हम ज़्यादा क़ाबिल थे,हमने यह चेन तोड़ दी।

कहते हैं सोच में फ़र्क होने से हम अच्छे से अच्छे इंसान को ठुकरा देते हैं।अपनी रवायतों को तोड़ देते हैं।
यही हुआ मशहूर वैज्ञानिक,दार्शनिक,चिंतक और ईमाम हज़रत जाफर सादिक के साथ।बहुत से मुसलमानो ने उनको याद करने में अपनी ज़हनी कमज़ोरी को ज़्यादा तवज्जो दी।आज लोग इमाम जाफर की याद में 22 रजब की नज़्र करेंगे और बहुत से लोग इसकी मुखालफत करेंगे।मगर मुखालफत में यह मत भूलें की वह क्या थे।

इमाम जाफर अल सादिक हज़रत अली की चौथी पीढी में थे।उनके वालिद इमाम मोहम्मद बाक़र खुद वैज्ञानिक थे और मदीने में अपना कॉलेज चलाते हुए सैंकडों बच्चों को पढ़ाते थे।अपने पिता के बाद जाफर अल सादिक ने यह काम संभाला और अपने शागिर्दों को कुछ ऐसी बातें बताईं जो इससे पहले किसी ने नही बताई।
उन्होंने अरस्तू की चार मूल तत्वों की थ्योरी से इनकार किया और कहा कि मुझे हैरत है कि अरस्तू ने कहा कि दुनिया में केवल चार तत्व हैं, मिटटी, पानी, आग और हवा।मिटटी खुद तत्व नहीं है बल्कि इसमें बहुत सारे तत्व हैं।इसी तरह जाफर अल सादिक ने पानी, आग और हवा को भी तत्व नहीं माना।हवा को भी तत्वों का मिश्रण माना और बताया कि इनमें से हर तत्व सांस के लिए ज़रूरी है। मेडिकल साइंस में इमाम सादिक ने बताया कि मिटटी में पाए जाने वाले सभी तत्व मानव शरीर में भी होते हैं। इनमें चार तत्व अधिक मात्रा में, आठ कम मात्रा में और आठ अन्य सूक्ष्म मात्रा में होते हैं।

उन्‍होंने बताया, "जो पत्थर तुम सामने गतिहीन देख रहे हो, उसके अन्दर बहुत तेज़ गतियाँ हो रही हैं। उसके बाद कहा, "यह पत्थर बहुत पहले द्रव अवस्था में था।आज भी अगर इस पत्थर को बहुत अधिक गर्म किया जाए तो यह द्रव अवस्था में आ जायेगा।
ऑप्टिक्स का बुनियादी सिद्धांत 'प्रकाश जब किसी वस्तु से परिवर्तित होकर आँख तक पहुँचता है तो वह वस्तु दिखाई देती है।साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि ब्रह्माण्ड में कुछ भी स्थिर नहीं है। सब कुछ गतिमान है।
ब्रह्माण्ड के बारे में एक रोचक थ्योरी उन्होंने बताई कि ब्रह्माण्ड हमेशा एक जैसी अवस्था में नहीं होता। एक समयांतराल में यह फैलता है और दूसरे समयांतराल में यह सिकुड़ता है।

उनके मशहूर शागिर्दों में जाबिर इब्ने हय्यान , इमाम अबू हनीफ, मालिक इब्न अनस थे।जिन रवायतो को आप मज़ाक बताते हैं उन्हीं ने आज उनको ज़िंदा रखा है वरना ढूंढते रहते अरबी फ़ारसी की किताबों में।कई बार रवायतें इसी लिये डाली जाती हैं की शख्सियतें और उनके काम पीढ़ी दर पीढ़ी नीचे पहुँच जाए।यह तरीके वोह नही समझेंगे जो एक झटके में सब खत्म कर देना चाहते हैं।

हम सभी धर्म के लोगों से कहते हैं की अपने बीच से अच्छे लोगों के किस्से आम करो। वह ही समाज की मशाल हैं ।हमे भी इमाम जाफ़र ही रास्ता दिखाएंगे ।आज 22 रजब की नज़्र भले मत कीजिये मगर उन्हें याद तो कर ही लें ।जो करें उनकी इज़्ज़त कीजिए ।इतने महान वैज्ञानिक और विचारक को याद करने वाले भी कुछ बेहतर ही हैं।

Sunday, April 8, 2018

Friday, April 6, 2018

बेग़म हज़रतमहल

कुछ तारीख़ें सिर्फ़ तारीख़ भर नही होती बल्कि पूरे एक ज़माने का ढलना होती है। आज वही 7 अप्रैल है ।जब अवध की शान और ताक़त मोहम्मदी खानम यानि बेग़म हज़रत महल दुनिया को छोड़ गई थी। अवध की वह बेगम जिसने लपक कर 1857 क्राँति की आग थामी थी। जिसने लखनऊ में अंग्रेज़ों के झण्डे को दुनिया में सबसे पहले कहीं ज़मीं दोज किया था।नवाबो के किस्से तो खूब ज़बानों पर हैं, उनके नाज़ुक मिजाज पर तो खूब बाते होती रही हैं मगर उनके ही बीच से उनकी नाज़ों में पली बढ़ी बेगम ने जब क्रांति की सख़्त तपिश सही उसका ज़िक्र कम ही होता है।

बेगम ने हर ओर मोर्चा लिया।सल्तनत की खूबसूरत ठण्डी हवाओं को सख़्त लू के थपेड़ो में बदलते देखा।अपनी नाक के नीचे खड़े पियादों को बदलते देखा।जब ज़मीन की वफ़ादारी की बात आई तो पल पल यही लखनऊ से नेपाल तक वफादारों को बालिश्त बालिश्त भर जागीरों में बिकते हुए देखा।अवध के नफीस तख्त से काठमांडू की तंग गालियों में ज़िन्दगी से लड़ने वाली मज़बूत,संवेदनशील,सहनशील और जुझारू बेगम का ज़िक्र आज तो कर ही लें।हमे याद है पिछले दिनों हमारी मांगो पर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बेगम हज़रत महल यूनिवर्सिटी बनाने का वादा किया था।खैर वादे का क्या,वोह तो होते रहते हैं।मेरी समझ से आज बेगम को मुल्क़ की मज़बूती के लिए याद कीजिये।

अफसोस तो तब होता है जब महिलाओं पर बराबरी और उनको आगे लाने वाले समाजसेवियों के बैनर में बेगम हजऱत महल नही होती हैं।अवध पर जान छिड़कने वालो की ज़बान पर बेगम हज़रत महल नही होती हैं।कवियों,लेखकों की गोष्ठियों में हज़रत महल नही होती हैं।
यही वह हैरतअंगेज़,जुझारू बेगम थी जो बिरतानियो से लड़ती हुई अपने दिल की सुकून गाह से निकली।अवध की खूबसूरत सरज़मीन से रुखसत होकर नेपाल के काठमांडू में आज भी सो रही है।जैसे हम यहाँ सो रहे हैं खामोश।

ज़रा सा बेग़म हज़रत महल को याद कर लीजिये शायद उनका जूझना सुआरत हो जाए।शायद उनका काँटों पर चलना मखमल में बदल जाए।उनके दिल की धड़कन महसूस कीजिये वह आज भी हर बोलने वाले में ज़िंदा हैं।हर आज़ाद ख्याल में ज़िंदा हैं।